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कहानी

संपत्ति
रमेश पोखरियाल निशंक


यूँ तो इस कार्यालय में सभी काम ध्यानपूर्वक ही किया जाता। वैसे भी अचल संपत्ति के स्वामित्व परिवर्तन का काम जोखिम भरा तो है ही। खास तौर से तब जब संपत्ति के असली स्वामी की मृत्यु हो चुकी हो। नकली वसीयतनामें, फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र लगाकर भी लोग संपत्ति हस्तांतरण को चले आते। कई बार तो बच्चे, माँ-बाप का ही फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र ही ले आते।

'इसे कहते हैं घोर कलयुग। संपत्ति हड़पने के लिए बच्चे माँ-बाप के मरने की प्रतीक्षा नहीं कर रहे।' बिहारी बाबू पान चबाते हुए कहते।

'अरे बाबूजी पॉपर्टी का तो चक्कर ही ऐसा है। ये तो मुर्दे को भी कब्र से उठाकर खड़ा कर देता है। और जिंदे को भी जीते जी कब्र में गाड़ देता है।' हरिहर चपरासी खैनी मलते हुए उनकी बात का जवाब देता।

कई बार तो इन नकली कागजों के असली से प्रतीत होने के कारण करोड़ों की संपत्ति के यूँ ही वारे-न्यारे हो जाते। कभी गलती से तो कभी मिलीभगत से।

शहर में कुछ जमीनें ऐसी भी थी जिनके मालिक कब के मर खप गए थे। बच्चे विदेशों में थे। उनके लिए इस संपत्ति का मूल्य कौड़ियों के बराबर था। ऐसी संपत्ति पर अक्सर भू-माफियाओं की गिद्ध दृष्टि लगी रहती। इन्हीं जमीनों के लिए खूनी संघर्ष तक होते।

इस कार्यालय के कर्मचारियों की भी पौ-बारह थी। कभी तो गलत काम करने के पैसे मिल जाते और अगर जमीन बड़ी होती तो एक छोटा सा प्लॉट मिलने की संभावना बनी रहती। ऐसा खून लग गया था सबके मुँह पर कि सही काम भी बिना सुविधा शुल्क लिए न करते। हाथ में अर्जी लिए खड़ा जीता जागता इनसान उन्हें मुर्गा नजर आता। और उसे हलाल करने के लिए सारा कार्यालय एकजुट हो उठता। एकता की ऐसी मिसाल शायद ही कभी किसी और मौके पर दिखाई देती हो।

तभी कुछ ऐसा हुआ कि पूरा कार्यालय डोल गया। ऐसा लगा जैसे एक जलजला सा आ गया हो, जिसने सब कुछ बदल कर रख दिया। अभी तक तो कार्यालय में 'जैसा राजा वैसी प्रजा' वाला कानून चलता था लेकिन कार्यालय के राजा की शिकायतें बहुत बढ़ जाने के बाद अंततः उसे बदल दिया गया। यदि राजा थोड़ा सा उन्नीस-बीस भी होता तो चल जाता लेकिन ये तो बहुत ही अलग था।

आते ही ईमानदारी और संवेदनशीलता पर लंबा चौड़ा भाषण दे डाला। अधिकांश लोगों को ये भाषण उबाऊ और बाबा आदम के जमाने के मूल्यों वाला लगा।

'किस जमाने की आइडियोलॉजी झाड़ रहे थे साहब। अगर हकीकत में भी ऐसे ही हुए तो!' एक जूनियर साहब बोले।

'अरे शुरू-शुरू में सब ऐसा ही कहते हैं। बाद में इसी रंग में रँग जाते हैं। आखिर हरे-हरे नोट किसे पसंद नहीं।' पास ही खड़े दूसरे साहब ने कहा।

लेकिन ऐसा हुआ नहीं। साहब की कथनी और करनी में कोई अंतर न था। चोरी छिपे रिश्वत लेने की कोई शिकायत उन तक पहुँच जाती तो सामने ऐसी झाड़ पिलाते कि सुनने वाला पानी-पानी हो जाय।

शाही जिंदगी जीने की आदत वालों के लिए जब हवा-पानी कम होने लगा तो उन्होंने यहाँ से तबादले करवाने आरंभ किए। जो कमाया था उसका एक छोटा सा हिस्सा मलाईदार जगह पर तबादला करवाने में खर्च कर दिया।

इसी तरह साहब की बिरादरी के भी कुछ लोग थे। यद्यपि उनकी संख्या अब कम रह गई है लेकिन जितनी भी थी उन्हें अपने कार्यालय में पाकर बड़े साहब खुश हुए।

अब लोगों के सही काम फटाफट होने लगे और गलत काम करवाने वाले दफ्तर के अंदर भी कदम न रख पाते।

इन्हीं दिनों एक व्यक्ति ने मृतक के इकलौते पुत्र होने का दावा करते हुए संपत्ति अपने नाम हस्तांतरित करने हेतु अर्जी दी। जो कुछ भी उसने लिखा था और जो भी दस्तावेज प्रस्तुत किए थे उससे उसका दावा सही प्रतीत होता था।

उसको दो-तीन दिन बाद आने को कह अधिकारी अपने काम में लग गए। ध्यान से देखा तो मकान की रजिस्ट्री में एक महिला का नाम भी दिखाई दिया।

'माँ होंगी। इनकी भी मृत्यु हो गई होगी शायद। तभी बेटा अपने नाम पर स्वामित्व परिवर्तन को कह रहा है।'

'आपकी माँ की भी मृत्यु हो चुकी है क्या?'

चौथे दिन जब वह व्यक्ति अपने काम की प्रगति पूछने आया तो अधिकारी ने अपना सवाल दाग दिया।

'जी नहीं वह अलग रहती हैं। उनका तलाक हो चुका है।'

'कब?'

'जी, पच्चीस-तीस बरस हो गए।'

'पच्चीस-तीस बरस। अधिकारी बुदबुदाई। मकान के कागज देखे। वह तो सिर्फ 15 वर्ष पुराने थे। जब पच्चीस-तीस बरस दोनों के तलाक को हो गए तो इस व्यक्ति ने उनके नाम पर क्यों संपत्ति खरीदी?' वो सोच में पड़ गई। इस प्रश्न का जवाब तो यह व्यक्ति जो अपने आपको मृतक का बेटा कह रहा था, ही दे सकता था।

'लेकिन इस पॉपर्टी में तो आपके पिता के साथ-साथ आपकी माँ का नाम भी है।' फाइल पर नजरें गड़ाए हुए ही उन्होंने अपनी बात कही और अब प्रतिक्रिया जानने हेतु अपने सामने बैठे व्यक्ति की ओर देखने लगी।

'ये असंभव है। ये कैसे हो सकता है?' उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे।

'आप स्वयं देख लीजिए।' और उसने फाइल व्यक्ति के सामने रख दी। उसे स्वयं आश्चर्य था कि इस व्यक्ति ने कभी इस रजिस्ट्री को ध्यान से नहीं देखा था क्या? प्रथम पृष्ठ पर ही दोनों के नाम स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।

'ये देखो ये रहा, सुमंगला कुमारी' अधिकारी ने अपनी उँगली उसी स्थान पर रख दी।

'सुमंगला कुमारी! ये तो मेरी माँ नहीं। उनका नाम तो शारदा है।'

'आपकी माँ नहीं! लेकिन जो भी है, होंगी तो आपके परिवार से ही और आपकी जानकारी में जरूर होगा। आप इन्हें लेकर आइए तभी कार्यवाही होगी।' और उन्होंने फाइल बंद कर दी।

व्यक्ति लौट गया। फिर कई दिन तक नहीं आया। अब उस महिला को लेकर ही आएगा शायद। और या तो फ्राड होगा। चाहता ही नहीं होगा कि उसके पिता की संपत्ति में कोई और भी हिस्सेदार बने।

इस बात को दो महीने बीत गए। संबंधित अधिकारी भी भूल गई कि ऐसी कोई फाइल उनके पास आई थी।

एक दिन एक महिला उन अधिकारी को ढूँढ़ते हुए आ पहुँची।

'मेरे पति ने एक फाइल दी थी मकान उनके नाम करने को।'

'कौन सी फाइल?' उन्हें याद न आया। ऐसे तो बहुत सी फाइल थी उनके पास।

'वही जिसमें किन्हीं एक और महिला का नाम भी था।' वह सकुचाते हुए बोली।

'हाँ-हाँ, याद आया। लेकिन आप तो इतने दिन से आए ही नहीं। ले आए आप उन महिला को?' अधिकारी ने एक ही साँस में कई बातें कह डाली।

'जी दरअसल बात ये है कि...।' बात आरंभ कर उस महिला ने इधर-उधर देखा फिर चुप हो गई।

'हाँ-हाँ बताओ क्या बात है?'

'हम उस महिला को नहीं जानते।'

'कैसी बात कर रही हैं आप? आपके ससुर जी ने अपनी संपत्ति में उनका नाम लिखा है और आप कह रही हैं कि आप उन्हें जानती नहीं।'

और उसके बाद उस महिला ने जो कहानी सुनाई उस पर अधिकारी विश्वास करे या ना करे यह उसकी समझ में नहीं आया।

महिला के अनुसार उसके पूज्य स्वर्गीय श्वसुर महोदय देश के एक प्रमुख संस्थान में उच्च पद पर आसीन थे। स्वभाव से प्रखर अपने विषय के जाने-माने ज्ञाता। गुस्सा ऐसा कि नाक पर मक्खी न बैठने देते। इसे संयोग कहें या कुछ और विवाह भी ऐसी लड़की से हुआ जिनका स्वभाव लगभग उन्हीं की तरह था। वह भी एक इंजीनियरिंग संस्थान में प्रवक्ता थीं और अपने क्षेत्र की विद्वान। दोनों में से कोई भी अपने आप को कमतर समझने की भूल न करता।

अहं का टकराव तू-तू, मैं-मैं की नौबत ला देता और अंततः दोनों में कई-कई दिन के अबोले की नौबत आती। आरंभ में दोनों ही अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में इतने व्यस्त थे कि संतान के बारे में सोचा ही नहीं।

पाँच वर्ष बाद जीवन में कुछ ठहराव आया तो दोनों को संतान के रूप मे एक पुत्र की प्राप्ति हुई।

एक नए प्राणी को अपने जीवन में आया देख दोनों का जीवन कुछ समय के लिए तो भावमय हो गया लेकिन थोड़े ही समय के बाद दोनों की महत्वाकांक्षाओं ने फिर सिर उठाना आरंभ कर दिया। बच्चे की देखभाल को लेकर ही दोनों में झगड़े होने लगते। यों तो बच्चे के सभी कार्यों के लिए घर में आया थी लेकिन पति चाहते कि पत्नी स्वयं बच्चे की देखभाल करे।

'मेरी नौकरी तुमसे कमतर नहीं फिर मैं ही क्यों? मैं भी तुम्हारी तरह थक कर आती हूँ फिर बच्चे की देखभाल मैं ही क्यों करूँ तुम क्यों नहीं?'

पत्नी का ये तर्क सुन पति भन्ना जाते और शुरू होती एक और महाभारत।

इन्हीं झगड़ों के बीच पुत्र पाँच वर्ष का हो गया। दोनों ने उसे किसी अच्छे हॉस्टल में डाल अपने कर्तव्य की इतिश्री की और अपनी-अपनी राह ली। पत्नी ने बेहतर भविष्य की आकांक्षा लिए अपना तबादला दूसरी जगह करवा लिया और दोनों अलग-अलग रहने लगे।

बेटे को न तो हॉस्टल पसंद आया न ही वो माता-पिता के बीच होने वाले रोज के झगड़ों की यादों को मन से निकाल पाया। स्वयं भी लड़ाई झगड़े में सबसे आगे रहता और पढ़ाई में फिसड्डी। वह दस वर्ष का हुआ तो अंततः माता-पिता के बीच में तलाक हो गया। एक दूसरे के बंधन की परवाह तो उन्होंने पहले भी बहुत अधिक न की थी लेकिन अब तो वह स्वच्छंद थे। बेटा पिता के संपर्क में ही अधिक रहता लेकिन ढंग से पढ़ाई न कर पाया। जब पच्चीस वर्ष की उम्र तक भी बेटा कुछ न कर पाया और पिता सेवानिवृत हो गए तो अपने रिटायरमेंट के पैसों से उसके लिए कुछ छोटे-मोटे व्यापार का बंदोबस्त किया। तीन-चार वर्ष बाद बेटे का विवाह भी कर दिया। बेटे के विवाह के एक वर्ष बाद ही उन्हें ब्रेन हैमरेज का ऐसा अटैक पड़ा जो उनकी सारी शक्ति छीन ले गया। न तो बोलने की शक्ति रही और न चलने की। जब इस पढ़े लिखे व्यक्ति को हस्ताक्षर के स्थान पर सभी दस्तावेजों पर अँगूठा लगाना पड़ा तो उनके आँसू निकल आए।

'मैडम दस साल तक उन्हें ऐसे ही पाला। बहुत सेवा की उनकी। इतने पढ़े-लिखे और प्रखर इनसान का बुढ़ापे में यह हश्र देख आँसू निकल आते। लेकिन हम कर ही क्या सकते थे। बेचारों ने बहुत झेला मरने से पहले।' और वह अपने आँसू पोंछने लगी।

'तो आपके विवाह को दस वर्ष हुए अभी।' अधिकारी बुदबुदाई।

'जी ग्यारह वर्ष।'

'और तुम कहती हो कि तुम इस सुमंगला नाम की महिला को नहीं जानती। आपकी सास से अलग होने के बाद दूसरी शादी तो नहीं की थी उन्होंने?' उन्होंने अपना संदेह जताया।

'नहीं मैडम। पिछले ग्यारह वर्ष से तो वे हमारे साथ थे। हमने तो न कभी देखा न कभी सुना इनके बारे में।' वह इस महिला के नाम से बिल्कुल अनजान दीख रही थी।

'अपने पति से पूछिए, वे जानते होंगे।'

'अगर वह जानते होते तो मैं आपके पास क्यों आती? उन्हें कुछ नहीं पता।'

महिला द्वारा सुनाई गई कहानी विश्वसनीय तो नहीं थी और साथ ही उसकी कहानी के आधार पर मकान का स्वामित्व परिवर्तन भी नहीं किया जा सकता था। आखिर वह महिला इस मकान की आधी हिस्सेदार थी।

महिला को यही बात समझा दी गई। कुछ देर उसने बहस की और अंत में उसने जो कहा उसने अधिकारी के संदेह को और बढ़ा दिया।

'देखिए रजिस्ट्री में जिनका नाम है उन्हें तो हम जानते नहीं। अब आप ही हमारी मदद कीजिए। आप जो चाहेंगी जैसा चाहेंगी हम कर देंगे।' महिला ने पास आकर लगभग फुसफुसाते स्वर में अधिकारी से कहा।

उस महिला की बात सुन अधिकारी का खून खौल उठा लेकिन उसने किसी तरह अपने आप को संयत किया। मन ही मन अब वह इस मामले की तह तक जाने की ठान चुकी थी।

अब इस प्रकरण को बड़े साहब के कान में डालना भी जरूरी हो गया था। साहब को भी दाल में कुछ काला लगा। संपत्ति की कीमत भी ठीकठाक थी।

'कहीं ऐसा तो नहीं कि बेटा होने का इसका दावा ही गलत हो। वरना यह कैसे संभव है कि पुत्र को ऐसी किसी महिला के बारे में मालूम ही नहीं जिसके नाम पर संपत्ति क्रय की गई है।' साहब के चेहरे पर संशय के बादल घिर आए।

'मैं भी यही सोच रही हूँ सर। अगर आप इजाजत दें तो मैं स्वयं इन्क्वायरी करना चाहूँगी।' महिला अधिकारी अब इस व्यक्ति को छोड़ने के मूड में न थी।

'हाँ हाँ, जरूर। आप अवश्य पता लगाइए कि वस्तुस्थिति क्या है?'

और साहब का इशारा पाते ही उनके अंदर की जासूसी प्रवृत्ति उभर आई। तरह-तरह के खयाल मन में आते रहे। कौन होगी ये औरत? क्या रिश्ता होगा इसका मृतक से, और अगर कोई रिश्ता है तो बेटे-बहू को कुछ भी मालूम क्यों नहीं है? इन्हीं सब सवालों से जूझती अगले ही दिन एक सहायक को साथ ले वह उस क्षेत्र में पहुँच गई जहाँ मृतक का आवास था।

एक बड़े से भूखंड पर बना आवास जिसके चारों ओर खड़े अखरोट, देवदार, आम, लीची के पेड़ भवन के अस्तित्व को तो छुपा ही जाते थे। घर के बाहर गेट पर धुँधले अक्षरों में लिखा 'अरण्य वाटिका' उस जगह की विशिष्टता को परिभाषित करता प्रतीत हो रहा था।

आसपास कुछ लोगों से पूछताछ की लेकिन वह सभी इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत नए थे। दरअसल ये कॉलोनी बसी ही छह-सात बरस पहले थी। इससे पहले तो बड़े-बड़े भूखण्डों में इक्के-दुक्के मकान ही थे।

'हमने तो यहाँ एक वृद्ध आदमी और उनके बेटे बहुओं को ही देखा है।'

'बेचारों ने बहुत कष्ट झेला, लकवा मार गया था उन्हें। कुछ दिनों पहले ही तो स्वर्गवास हुआ उनका।'

'उनकी पत्नी! नहीं नहीं। वह तो अकेले ही रहते थे अपने बेटे-बहू के साथ।'

बस यही और ऐसे ही कुछ जवाब।

'कोई ऐसा परिवार भी है जो पिछले पंद्रह-बीस बरस से यहाँ रह रहा हो?' उन्होंने एक व्यक्ति से पूछा।

'जी वो सामने वाला मकान देख रही हैं आप। वही सबसे पुराने हैं यहाँ पर लेकिन यहाँ नहीं रहते। उनका चौकीदार रहता है। उससे कुछ पूछना चाहें तो पूछ सकते हैं आप।' एक व्यक्ति ने बताया।

'जी साहब तो विदेश रहत। वुई बिटवा अमरीका मा रहित साहब और मेमसाब भी उहीं हैं।'

'कब आएँगे?'

'अगले महीने। पचीस तारीख की फ्लाइट है उनकी।'

पच्चीस तारीख के बाद आने का निश्चय कर दोनों वापस आ गए।

'जी मि. प्रशांत चौधरी के बारे में कुछ जानकारी लेनी थी। आप यहाँ पर सबसे पुराने हैं इसलिए...।'

उनके आने के दो तीन दिन बाद ही अधिकारी फिर अपने सहायक सहित वहाँ पहुँच गई। गृह स्वामी का रोबदाब देख पहले पहल तो उनकी उनसे कुछ पूछने की हिम्मत न हुई लेकिन जानकारी तो लेनी ही थी। यही लोग अब उनका एक मात्र सहारा थे।

'उसका नालायक बेटा तो है अभी, उससे क्यों नहीं पूछते?' उनकी रोबदार आवाज सुनकर वो फिर सहम गए।

'उन्हीं से पूछा था लेकिन वो कुछ बताते ही नहीं।'

और उन्होंने संपत्ति में नाम परिवर्तन का पूरा किस्सा उन्हें सुना दिया।

'प्रशांत का बेटा नालायक है वह तो मुझे पता था लेकिन इतना नालायक होगा मुझे पता न था।' उनके चेहरे पर आक्रोश की रेखाएँ उभर आईं। उसके बाद उन्होंने जो बात बताई उससे उन्हें असलियत पता चली।

तलाक के बाद प्रशांत ने कुछ समय तक तो अपनी नौकरी, शोध और प्रगति से इतर कुछ सोचा ही नहीं। यहाँ तक कि छात्रावास में रहने वाला बेटा क्या कर रहा है इसकी भी उन्हें चिंता न रहती। लेकिन ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती गई और बेटे की शिकायतें बढ़ने लगी उन्हें अपना दर्द बाँटने के लिए किसी की आवश्यकता महसूस हुई। बेटे की नालायकी से उपजे तनाव के कारण उनका स्वयं का काम भी प्रभावित हुआ। मन में अपराधबोध ने घर कर दिया था। बेटे की इस स्थिति के लिए वह स्वयं को अधिक जिम्मेदार मानते। ये उनके घोर अवसाद के क्षण थे।

इसी समय उनकी जिंदगी में आई सुमंगला। सुमंगला उनके ऑफिस में ही स्टैनो थी। माता-पिता थे नहीं। छोटे भाई बहनों की जिम्मेदारी पूरी करने में जिंदगी होम कर दी। सब अपने-अपने घरों में व्यस्त थे। अकेली रह गई थी सुमंगला। जीवन के लगभग पचास बसंत देख चुकी सुमंगला ने तो अब अपने विवाह के सपने देखना भी बंद कर दिया था।

सुमंगला और प्रशांत कब एक दूसरे के पूरक बन गए पता तक न चला। वैवाहिक जीवन में प्रेमपूर्वक समर्पण का सुख तो प्रशांत को कभी मिला न था। सुमंगला के मुँह से प्यार के दो बोल सुन प्रशांत अभिभूत हो उठा।

और एक दिन सारी मान्यताओं, सारे सामाजिक बंधनों को तोड़ प्रशांत सुमंगला को अपने घर ले आए। आखिर एक नया बंधन जो बँध गया था दोनों के बीच में। किसी ने कहा उन्होंने मंदिर में विधिवत विवाह किया है तो किसी ने कहा कि ऐसे ही दोनों ने साथ रहना आरंभ कर दिया है।

लेकिन उन दोनों को किसी की परवाह न थी। सुमंगला का साथ पाकर प्रशांत खुश थे लेकिन बेटे को सुमंगला फूटी आँख न सुहाती। सुमंगला ने बहुत कोशिश की कि वहे अपने पिता को समझे लेकिन कोई भी बहाने कर वह घर से बाहर रहने की ही कोशिश करता।

अपनी और सुमंगला की जमा पूँजी से दोनों ने बहुत मन से ये घर खरीदा था। इस घर को व्यवस्थित और सजाकर रखने में सुमंगला ने कोई कसर न छोड़ी।

कुछ समय बाद प्रशांत रिटायर हुए। बेटा तब तक भी व्यवस्थित न हो पाया था। इधर-उधर ही रहने वाला उनका बेटा पिता की सेवानिवृत्ति की खबर सुन वापस चला आया। सुमंगला खुश थी। इकलौता बेटा घर वापस तो लौटा। उसे नहीं पता था कि वह तो पिता के पैसे के लिए वापस लौटा है।

बेटे ने पिता से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की एजेन्सी लेने को कहा। प्रशांत इस पक्ष में न थे लेकिन घर बचाए रखने की धुन में सुमंगला प्रशांत को मनाने में कामयाब हुई। शेष जमा पूँजी पुत्र के लिए एजेन्सी दिलवाने में खर्च हो गई। सुमंगला अपनी जमा पूँजी तो पहले ही घर खरीदने में लगा चुकी थी। अब उसने अपने फंड से भी पैसा निकालकर दे दिया।

प्रशांत ने बहुत मना किया लेकिन सुमंगला न मानी।

'एक ही तो बेटा है हमारा। सब कुछ अंततः उसी का होना है। कुछ अच्छा करना चाहता है तो मदद करो उसकी। हमारे जीने के लिए तो हमारी पेंशन ही काफी होगी।' और सुमंगला बेपरवाही से हँस दी। अभी तो उसकी सेवानिवृत्ति के लिए भी समय था और वो पूरी तनख्वाह ले रही थी।

तीन-चार वर्ष सब ठीक चला। सुमंगला और प्रशांत के बेटे के बीच कड़वाहट कुछ तो कम हुई थी।

अब सुमंगला बेटे के लिए बहू की खोज में थी। अगले वर्ष ही वह भी तो सेवानिवृत्त होने वाली थी।

और इसके बाद आरंभ हुए सुमंगला और प्रशांत के दुर्दिन। पुत्र का विवाह हो गया। नई बहू के पैर घर में पड़ते ही कलह आरंभ हो गया। बहू इतनी कर्कश थी कि बोलने से पहले ये भी न सोचती कि क्या कह रही है और किससे कह रही है। न उम्र का लिहाज न रिश्ते की मर्यादा। प्रशांत और सुमंगला के रिश्ते को अनैतिकता का जामा पहनाने में भी कोई कसर न छोड़ी उसने।

प्रशांत और सुमंगला दोनों खून के घूँट पी रह जाते। बेटा ही अगर ढंग का होता तो बहू ही इतनी हिम्मत कहाँ से होती कि सास-ससुर के लिए मुँह से अपशब्द निकाल सके। लेकिन जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो किसी और को क्या दोष देना।

नित्यप्रति की कलह और बेटे बहू के हाल देख प्रशांत को एक दिन भयंकर ब्रेन स्ट्रोक पड़ा। समय पर इलाज हो गया बच गया वरना दौरा प्राणघातक था। बच तो गए लेकिन चलने, बोलने की शक्ति जाती रही। अपाहिज प्रशांत ने अब बिस्तर पकड़ लिया।

सुमंगला के रिटायर होने के उपरांत मिली बची-खुची रकम अब प्रशांत के इलाज में खर्च हो गई।

'और उसके बाद हम लोग बच्चों के बुलाने पर अमरीका चले गए। प्रशांत उस समय न बोल पाता न हाथ पैर हिला पाता था।' वह सज्जन बता रहे थे और दोनों लोग ध्यान से उनकी बात सुन रहे थे। वह कुछ देर चुप हुए तो उनकी तंद्रा टूटी। अब तक ये तो समझ में आ चुका था कि सुमंगला कौन थी लेकिन अब कहाँ गई ये जानना बाकी था। और यही बात उन्होंने उनसे पूछ ली।

'पता नहीं। पिछले बरस जब हम वापस इंडिया आए थे तो सबसे पहले प्रशांत का हालचाल पूछने गए। सुमंगला वहाँ नहीं थी और प्रशांत की हालत बद से बदतर थी। जीने की इच्छा ही खत्म हो गई थी उसकी तो क्या खाक ठीक होता वह।'

'आपने पूछा नहीं कि सुमंगला जी कहाँ हैं?'

महिला अधिकारी अपनी उत्सुकता छुपा नहीं पा रही थी।

'नहीं मैडम। मैंने पूछना चाहा। बेटे-बहू क्यों बताते और प्रशांत बताने की स्थिति में नहीं था। हाँ सुमंगला का नाम सुन उसकी आँखों में आँसू अवश्य भर आए थे।'

'अब तो वही बात हो गई। जहाँ से चले थे, ये तो वहीं पहुँच गए। इतने बड़े शहर में सुमंगला जी को कहाँ ढूँढ़ेंगे?' महिला अधिकारी परेशान थी। साथ ही उसे प्रशांत के बेटे-बहू पर गुस्सा भी कम न आ रहा था। जिस महिला ने उसके पिता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया उसके साथ ये बदसलूकी?

'एक तरीका है मैडम उन्हें ढूँढ़ने का।'

'क्या?' दोनों के मुँह से एक साथ निकल पड़ा।

'सुमंगला सरकारी सेवा में थी। उनका ऑफिस मैं बता सकता हूँ। वहाँ से आप ये पता कर लीजिए कि वह पेंशन किस बैंक से ले रही है और उसमें उनका पता क्या है?'

काम कठिन था। सहायक ने तो स्पष्ट मना कर दिया।

'छोड़िए मैडम। क्यों इतने लंबे चक्कर में पड़ रही हैं? हम संपत्ति हस्तांतरित तो करेंगे नहीं। पति-पत्नी की गरज होगी तो ढूँढ़कर लाएँगे उन्हें।'

लेकिन महिला अधिकारी के अंदर की औरत भी जाग चुकी थी अब तक।

'यह काम मैं स्वयं कर लूँगी। आखिर एक महिला के साथ अन्याय हुआ है।' अधिकारी का रूखा स्वर सुन सहायक मन मारकर तैयार हो गया। और अंततः उनकी यह कवायद रंग लाई। पूछताछ करते-करते अंततः उनकी खोज एक वृद्धाश्रम पर जाकर समाप्त हुई।

सुमंगला की आँखों में प्रश्नचिन्ह था। इतने वर्षों से तो कोई आया नहीं था उनसे मिलने। उस अभागन को तो यह भी पता नहीं था कि प्रशांत अब इस दुनिया में नहीं रहा।

'मुक्ति मिल गई उन्हें। बहुत भुगता उन्होंने।' और उसने आकाश की ओर मुँह कर हाथ जोड़ दिया। मानो प्रशांत की मुक्ति के लिए ईश्वर का धन्यवाद कर रही हो।

'लेकिन आप कौन हैं? और यहाँ कैसे?' उन दोनों के सुमंगला को मिलने आने का रहस्य उन्हें अब तक समझ न आया था।

'जी दरअसल आपके बेटे ने प्रशांत जी की संपत्ति अपने नाम करने को कहा था और...' और उन्होंने पूरी कहानी सुना दी।

सुमंगला जी मुस्करा दी। उन्होंने उन्हें अगले सप्ताह फिर बुलाया।

इतनी देर में सहायक ने बाकी लोगों से ये भी पता कर लिया था कि किन परिस्थितियों में सुमंगला जी को घर छोड़ना पड़ा था।

अधिकांश लोगों को तो उनके बारे में ज्यादा पता न था। वह किसी को कुछ नहीं बताती थी लेकिन बहुत समय से रह रही एक वृद्धा ने बताया कि उनके बेटे-बहू ने पति के अपाहिज हो जाने के बाद उन्हें धक्के देकर बाहर कर दिया। वहाँ से निकल वह अपने भाइयों के पास भी गईं पर कहीं सहारा न मिला।

अपनी सारी जमा पूँजी पहले मकान, फिर पुत्र के व्यवसाय और अंततः प्रशांत की बीमारी में खर्च कर चुकी सुमंगला के पास अब मासिक पेंशन के अलावा जीविकोपार्जन का कोई और जरिया न था। तब से सुमंगला यहीं इसी आश्रम में रह रही थी। आरंभ में एक-दो बार प्रशांत के हाल जानने का प्रयास भी किया लेकिन प्रशांत के बेटे-बहू ने उसे अंदर तक न घुसने दिया। उसके बाद वह वहाँ कभी न गई।

महिला अधिकारी दुखी थी। कोई ऐसा भी कर सकता है एक वृद्ध महिला के साथ? उसे प्रशांत के बेटे-बहू पर बहुत गुस्सा आया। अब आएँगे तो बताएगी उन्हें कि उन्होंने अच्छा नहीं किया। वह मन ही मन सोच रही थी कि सुमंगला ने अगले सप्ताह उन्हें क्यों बुलाया होगा।

यों तो उनका काम समाप्त हो चुका था। सुमंगला को उन्होंने जीवित ढूँढ़ लिया था और उसके जिंदा रहते उसकी सहमति के बिना संपत्ति हस्तांतरित नहीं हो सकती थी फिर भी सुमंगला जी के बुलावे को वो टाल न सकी।

वृद्धाआश्रम पहुँची तो सुमंगला ने एक लिफाफा उन्हें थमा दिया।

'क्या है ये?'

'अब आपको बेटे के नाम पर संपत्ति हस्तांतरित करने में परेशानी नहीं होगी।'

अधिकारी ने लिफाफा खोल कर देखा। गिफ्ट डीड थी। सुमंगला ने अपने हिस्से की संपत्ति प्रशांत के बेटे को उपहार स्वरूप दे दी थी।

'ये क्या किया आपने? उन्होंने आपके साथ इतना बुरा व्यवहार किया और आपने...?'

उन्होंने अधिकारी को हाथ के इशारे से रोक दिया और अपनी बात कहनी आरंभ की। कहते हुए उनके स्वर में दृढ़ता और लगाव दोनों के मिले जुले भाव थे।

'वो प्रशांत का बेटा है और प्रशांत मेरे लिए सब कुछ था। जो कुछ प्रशांत ने मुझे दिया वह मेरे जीवन में अमृत के समान है। उसी अमृत के प्रभाव और उनके साथ बिताए समय के सहारे मैं अपना शेष जीवन गुजर लूँगी। प्रशांत की हर चीज मेरी अपनी है इसलिए बेटा और बहू भी मेरे अपने हैं। अपनों को कुछ देकर बहुत संतोष मिलता है बेटा।'

वापस लौटते हुए महिला अधिकारी के कानों में सुमंगला के कहे ये शब्द गूँज रहे थे, आँखों की कोरें नम हो आई थी।

संपत्ति प्रशांत के बेटे के नाम हो गई। कागजों के हिसाब से सब काम सही हुआ था। लेकिन बड़े साहब और संबंधित अधिकारी के मन में अपराध बोध था कि सब कुछ सही होते हुए भी कुछ गलत हो रहा था। काश वह इतनी छानबीन न करते तो ऐसा न होता।


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