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कहानी

कैसे संबंध
रमेश पोखरियाल निशंक


पलक का मन आज सुबह से उद्विग्न था। कल शाम को उसकी माँ ने बताया कि उसे देखने लड़के वाले आने वाले हैं। वह तैयार रहे।

'किस बात के लिए तैयार रहूँ? एक बार और 'ना' कहे जाने के लिए?' कटुता उसकी बातों से स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी।

'चुप रहो तुम। दो-चार अक्षर पढ़ क्या लिए, बहुत बातें बनाने लगी हो। अपनी बाकी सहेलियों को देखो, सब बाल-बच्चों वाली हो चुकी है अब तक।' माँ ने उसे डाँटते हुए कहा और फिर बड़बड़ाती हुई वहाँ से चली गई।

पलक जानती थी क्या बड़बड़ा रही होगी माँ। माँ पहले तो ऐसी न थी। एक बेटे और एक बेटी की माँ अपने घर-परिवार से सदैव संतुष्ट रहती। पति एक सरकारी विभाग में अधिकारी थे और दोनों बच्चे सुयोग्य। एक आम मध्यवर्गीय परिवार की संतोषी गृहणी की तरह वह सुखी थी।

तो फिर अब ऐसा क्या हो गया कि वह इतनी चिड़चिड़ी हो गई? बच्चों से हमेशा प्यार से बात करने वाली माँ क्यों बात-बात पर काटने को दौड़ती?

सागर और स्वप्ना के विवाह को लगभग चालीस वर्ष बीत चुके थे। विवाह के एक वर्ष बाद पुत्र और तीन वर्ष बाद पुत्री को पा दोनों धन्य हुए। स्वप्ना जहाँ धर्मभीरु, पुरानी मान्यताओं को मानने वाली महिला थी वहीं सागर आधुनिक विचारों के हिमायती।

इसी के चलते उन्होंने अपने पुत्र और पुत्री में कभी कोई अंतर न किया। दोनों एक ही स्कूल में पढ़े। स्वप्ना कभी पलक को लड़की होने के कारण अपनी सीमाओं में रहने को कहती तो सागर उसे टोक देते।

'मेरी बेटी मेरा गर्व है, देखा नहीं तुमने बेटे से भी अच्छी निकली है पढ़ने में। इसे घर का काम थोड़ी करना है। कोई अच्छी नौकरी करेगी और नौकर चाकर रखेगी।' पलक की प्रगति देख सागर गर्व से फूल उठते, लेकिन स्वप्ना कुढ़ जाती।

'अरे अगर घर का कोई काम सीख लेगी तो कुछ बिगड़ जाएगा क्या? जब देखो तब दोस्तों के साथ ही-ही, हू-हू।' पुरानी मान्यताओं से बँधा स्वप्ना का मन बेटी का लड़कों की तरह रहना बर्दाश्त नहीं कर पाता।

दिन बीतते गए। दोनों बच्चे सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते रहे। दोनों ने देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से इंजीनियरिंग की। बेटे ने तो उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना ठीक समझा लेकिन पिता के बहुत समझाने के उपरांत भी पलक आगे पढ़ने को तैयार न हुई। उसे तो नौकरी कर अपने पैरों पर खड़ा होने की जल्दी थी।

स्वप्ना को कभी-कभी लगता पलक स्वावलंबन नहीं बल्कि स्वतंत्रता चाहती है। पर सागर से जब भी अपने मन की बात कही उन्होंने उसे हँसी में उड़ा दिया।

पलक अच्छी विद्यार्थी थी तो नौकरियों की उसे कमी न थी। तुरंत ही बंगलौर की एक आई.टी. फर्म से उसे अच्छे वेतन पर नौकरी मिल गई।

'बैंगलोर?' स्वप्ना चौंक गई।

'हमारे शहर में नौकरियों की कमी है क्या? इतनी दूर अकेली लड़की।'

स्वप्ना ने तो इसकी सपने में भी उम्मीद न की थी। पढ़ाई के लिए पलक बाहर रही थी पर वह कालेज था, वहाँ लड़कियों के लिए छात्रावास था। अब यहाँ अकेली, कैसे होगा सब! ये सोच ही स्वप्ना को बुरी तरह परेशान कर गई।

'माँ तुम चिंता ना करो। अच्छी जॉब मिली है, कंपनी भी अच्छी है। बंगलौर में फर्निश्ड फ्लैट देंगे वह। तुम भी आना मेरे पास।' और पलक माँ की गरदन में झूल गई।

सागर और स्वप्ना दोनों गए थे पलक को छोड़ने। उनके शहर से था भी तो कितनी दूर बंगलौर। पूरे दो दिन लग गए पहुँचने में।

'माँ सेलरी मिलने दो, अगली बार जहाज का टिकट भेजूँगी तुम्हारे लिए। पलक की खुशी थामे नहीं थम रही थी।'

फ्लैट को देख स्वप्ना को कुछ संतोष हुआ। थे तो सिर्फ दो ही कमरे लेकिन जरूरत का सब सामान था। अकेली पलक के लिए यही काफी था।

एक दो दिन बंगलौर में रह सागर और स्वप्ना लौट आए। आरंभ में पलक के रोज फोन आते। फिर धीरे-धीरे उनकी आवृत्ति कम होती गई। अब तो पलक हफ्ते में एक दिन ही फोन कर पाती। किसी और दिन स्वप्ना फोन करती भी तो पलक व्यस्त होती।

नौकरी लगे छह माह से अधिक हो गया था। इस बीच पलक एक बार घर भी होकर गई थी। कुछ ही दिन बाद उसका फोन आया कि कंपनी उस ऑफिस के काम से अमरीका भेजना चाहती है। स्वप्ना तो ये सुन घबरा ही गई।

'अकेली लड़की घर से इतनी दूर। दूसरे देश कैसे जाएगी?'

'क्या मतलब? कैसे जाएगी? हवाई जहाज से जाएगी। दूध-पीती बच्ची नहीं है वह अब। इतनी बड़ी कंपनी में जिम्मेदार पद पर है।' सागर झल्लाकर बोले।

अमरीका जाने से पहले एक बार फिर पलक घर आई। उत्साह से लबरेज।

'पुलकित भी वहीं पर है। उससे भी मिल लेना।' स्वप्ना को बेटे की याद आ गई, जिसने अभी इंजीनियरिंग में परास्नातक कर वहीं एक कंपनी में नौकरी कर ली थी। स्वप्ना चाहती थी पुलकित वापस आए लेकिन वह नहीं आया।

'माँ तुम तो ऐसा कह रही हो जैसे अमरीका हमारे शहर के बराबर हो। मैं कंपनी के काम से जहाँ जा रही हूँ वह भाई के शहर से दूर है। उसी ने कह दिया है, वह मुझसे मिलने आएगा।'

'स्वप्ना चुप्पी लगा गई। सात समंदर पार जाकर बस गए बेटे की पीड़ा ही क्या कम थी जो अब बेटी भी उसी राह चल दी है।' यही सोच मन बार-बार रुआँसा हो उठता।

पलक चली गई। उसे छह माह वहीं रहना था अब।

पलक लौटी तो नए आत्मविश्वास से भरी थी। नया देश, नई दुनिया, नया समाज देख पलक प्रभावित भी थी और प्रसन्न भी।

'माँ मुझे लगता है भाई वहीं शादी कर लेगा।' उसने एक हमला सा किया।

'क्यों? तुझे ऐसा क्यों लगा?' स्वप्ना घबरा गई।

उसने तो पुलकित के लिए लड़कियाँ देखना भी आरंभ कर दिया था।

'एक लड़की रहती है उसके साथ वहाँ।' पलक ने सामान्यतया कह दिया, लेकिन ये न सोचा कि माँ पर इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी।

'लड़की! उसके साथ? ऐसा कैसे हो सकता है? कोई अकेली लड़की अकेले लड़के के साथ कैसे रह सकती है?' भारतीय परिवेश में पली-बढ़ी स्वप्ना के लिए ये अप्रत्याशित था।

'तो इसमें क्या खास है? जानती हो माँ अब तो इंडिया में भी लिव-इन-रिलेशनशिप लीगलाइज कर दिया है। कोर्ट ने कहा है ऐसा।' पलक लापरवाही से बोली।

'बेटा इसे कोर्ट ने मान्यता दी है, पर क्या समाज ने भी मान्यता दी है इसे? कोर्ट चाहे कुछ भी कहे, आखिर रहना तो इसी समाज में है ना। क्या करेंगे उस कानूनी मान्यता का जिसे समाज नहीं मानता?' पलक की बातें स्वप्ना को अच्छी नहीं लग रही थी लेकिन पलक भी बहस पर बहस किए जा रही थी।

'माँ कानून बहुत कुछ होता है, पता है अमरीका में तो जरा-जरा सी बात पर लोग कानून का सहारा लेते हैं। माता-पिता बच्चे को पीट नहीं सकते, वरना बच्चा कोर्ट जा सकता है और माता-पिता को सजा मिल सकती है।'

'कानून में न्याय मिल सकता है, प्यार और अपनापन नहीं। कानून जबरन ये नहीं कह सकता कि माँ-बाप बच्चे को प्यार करें या बच्चे माँ-बाप की भावनाओं का ध्यान रखें।' स्वप्ना के स्वर में पीड़ा थी।

वह अचंभित थी। कैसा देश है ये? न कोई सामाजिक व्यवस्था और न अपनापन। बस कानून से ही सब कुछ हासिल करते रहो। अब तो भारत में भी कैसे-कैसे कानून बनने लगे हैं। बच्चे माँ-बाप को नहीं देख रहे तो उन पर केस कर दो। लड़के-लड़की साथ रहना चाहें तो रहने दो। कोई पूछे इन कानूनों से क्या प्यार हासिल कर पाओगे? वह सभ्यता हासिल कर पाओगे जिसमें सबका स्थान, सबके कार्य निर्धारित थे। स्वप्ना जितना सोचती उतना, उलझती जाती।

पलक चली गई लेकिन स्वप्ना के लिए सोचने को बहुत कुछ छोड़ गई।

ऐसे ही दो वर्ष बीत गए। स्वप्ना पुलकित और पलक दोनों से उनके विवाह के लिए पूछती रही लेकिन किसी ने हामी न भरी। पुलकित भी इस बीच एक बार इंडिया आया था। उससे बातचीत में स्वप्ना समझ गई थी कि पलक का कहना गलत नहीं था। पुलकित वहीं किसी लड़की से शादी करना चाहता था।

बहुत समय से स्वप्ना और सागर पलक के पास भी नहीं जा पाए थे। वही घर आ जाती थी। उसका भी अब एक पैर इंडिया में होता तो दूसरा किसी और देश में। एक बार ऑफिस के ही किसी काम से सागर को मैसूर जाना पड़ा तो दोनों ने मिलकर बंगलौर जाने का कार्यक्रम भी बना लिया।

पहले-पहल माता-पिता के आने की खबर से झूम उठने वाली पलक ने इस बार कोई विशेष उत्साह न दिखाया तो स्वप्ना का माथा ठनका।

'काम में व्यस्त होगी शायद।' यही सोच दोनों पलक के पास चल दिए।

स्वप्ना चार-पाँच दिन पलक के पास रही। दिनभर पलक अपने काम पर होती और स्वप्ना घर पर अकेली। खाली बैठे-बैठे क्या करती, बेटी का घर ही व्यवस्थित करने लगी। घर व्यस्थित करते हुए स्वप्ना को कुछ सामान ऐसा मिला जो लड़कियों के प्रयोग का तो हरगिज नहीं था। आशंकित स्वप्ना ने पलक की अलमारी खोल डाली। पलक के कपड़ों के बीच पुरुष परिधान भी मौजूद थे।

'तुम्हारे साथ कोई और भी रहता है यहाँ?' शाम को पलक घर लौटी तो स्वप्ना ने बिना किसी लाग-लपेट के सीधा प्रश्न पूछ लिया।

'हाँ... नहीं... नहीं तो कोई नहीं।' पलक घबरा गई।

'तुम शादी करना चाहती हो उससे?' पहले सवाल का जवाब सुने बिना स्वप्ना ने दूसरा सवाल दाग दिया।

'नहीं माँ हम सिर्फ अच्छे दोस्त हैं।' हड़बड़ाहट में पलक यह भूल गई कि अभी-अभी उसने इस बात से मना किया है।

'दोस्त! तुम्हारे साथ ही रहता है ना वह?'

'नहीं माँ, कभी-कभी आता है।' पलक ने सिर झुका लिया।

पलक कितना ही ना कहे, लेकिन पलक के हावभाव से स्वप्ना समझ रही थी कि पलक के मन में उस लड़के के प्रति कोमल भावनाएँ जन्म ले चुकी हैं।

'मैं मिलना चाहती हूँ उससे।'

'कैसी बातें करती हो माँ? क्या आप मेरे सभी दोस्तों से मिलती हो? वैसे भी वह आउट ऑफ कंट्री है आजकल।'

पलक ने माँ का विचार सिरे से खारिज कर दिया। झुँझलाहट उसके चेहरे पर स्पष्ट उभर आई।

समय बीतता रहा। सब अपने-अपने में व्यस्त थे। पुलकित ने एक अमेरिकन लड़की से ब्याह रचाया। पत्नी के साथ घर लौटा तो सागर और स्वप्ना ने एक अच्छा सा रिसेप्शन दे डाला। पलक भी आई थी, और उसके कुछ मित्र भी।

कुछ ही दिन बाद पलक चली गई। वह अब और अधिक व्यस्त रहने लगी थी। धीरे-धीरे उसका आना भी कम होता गया। स्वप्ना जितनी बार विवाह के लिए कहती पलक मना करती जाती। ज्यों-ज्यों उसकी उम्र बढ़ रही थी, त्यों-त्यों सागर और स्वप्ना की चिंताएँ भी बढ़ रही थी।

और एक दिन घबराई सी आवाज में पलक की एक सहेली का फोन आया कि तुरंत बंगलौर पहुँच जाएँ। पलक ने डिप्रेशन में आत्महत्या करने की कोशिश की थी। आनन-फानन में हवाई टिकट बुक करा, सागर दंपति बंगलौर पहुँचे, पलक बेहोश पड़ी थी। नींद की ढेर सारी गोलियाँ गटक ली थी उसने।

पलक तो बहुत जिंदादिल लड़की थी। आखिर ऐसा क्या हो गया कि उसे यह कदम उठाना पड़ा। सुवर्णा से पूछा, वही जिसने घर पर फोन कर सागर और स्वप्ना को बुलाया था।

'आंटी, दरअसल सिद्धार्थ की शादी तय हो गई।'

'कौन सिद्धार्थ?' स्वप्ना तो इस नाम के किसी लड़के को जानती तक न थी।

'आप नहीं जानते।' सुवर्णा के स्वर में आश्चर्य था। यही आश्चर्य के भाव उसके चेहरे, उसकी आँखों से भी झलक रहे थे। सिद्धार्थ और पलक के बारे में जो कुछ बताया उसे सुन स्वप्ना जहाँ खड़ी थी वहीं खड़ी रह गई।

सिद्धार्थ और पलक पिछले कई वर्षों से साथ रह रहे थे। सुवर्णा के शब्दों में कहें तो 'लिव इन रिलेशनशिप'। सब लोग यही समझते थे कि दोनों निकट भविष्य में वैवाहिक बंधन में बंध जाएँगे। लेकिन एक हफ्ता पहले ही सिद्धार्थ ने बताया कि उसका विवाह निश्चित हो गया है। पलक और वह सिर्फ अच्छे दोस्त हैं और आगे भी बने रहेंगे। उसने पलक को कभी इस नजर से नहीं देखा, वगैरह-वगैरह।

कुछ दिन पलक उसे समझाती रही - बताती रही कि वह उससे कहीं गहरे जुड़ चुकी है। उसने तो यहाँ तक कहा कि यदि सिद्धार्थ उससे विवाह नहीं करना चाहता तो न करे, वह अपना सारा जीवन यूँ ही उसके साथ रहने को तैयार है।

लेकिन सिद्धार्थ ने यह कहकर साफ इनकार कर दिया कि ऐसा कोई समझौता उनके बीच कभी नहीं हुआ था। पलक अवसाद से घिर चुकी थी और इन्हीं अवसाद के क्षणों में उसने ढेर सारी नींद की गोलियाँ खाली। वह तो भगवान का लाख-लाख शुक्र था कि पलक को अनुपस्थित पा सुवर्णा उसके घर पहुँच गई और जब कई बार घंटी बजाने पर भी दरवाजा न खुला तो सिद्धार्थ से घर की डुप्लिकेट चाबी ले आई जो अभी तक उसी के पास थी।

और उसके बाद की कहानी स्वप्ना के सामने थी पलक की स्थिति कुछ ठीक हुई तो स्वप्ना और सागर उसे अपने साथ ले आए। सिद्धार्थ से मिलना उन्होंने ठीक न समझा। जो व्यक्ति इतने वर्ष उनकी बेटी के साथ रहकर उसकी बात न समझा वह उनकी बात क्या समझता।

पलक की जिंदगी वापस पटरी पर लौटने में कुछ समय लगा। स्वप्ना और सागर ने उसे पूरा सहारा दिया लेकिन स्वप्ना कभी-कभी मन ही मन खीज उठती। बेटी ने जो कुछ किया उसको उनका संस्कारी मन कभी स्वीकार न कर पाता, उसे न्यायालय के इस निर्णय पर क्रोध आता। न्यायालय ने इस तथाकथित 'लिव इन रिलेशनशिप' वैधानिक तो ठहरा दिया लेकिन उससे प्रभावित होने वाली लड़कियों के संबंध में कुछ न सोचा।

पलक धीरे-धीरे नार्मल हो रही थी। दो-तीन माह बाद उसने वापस अपनी नौकरी पर जाने की जिद की तो इस बार सागर ने सिरे से नकार दिया।

'अपना हिसाब कर आओ वहाँ से। मैं तुम्हारे साथ चलूँगा। यहीं तुम्हारी नौकरी के लिए प्रबंध हो जाएगा।' सागर के स्वर का तीखापन पलक के साथ-साथ स्वप्ना ने भी महसूस किया।

पलक अपने शहर में नौकरी करने लगी। कंपनी बंगलौर वाली कंपनी जितनी बड़ी तो न थी लेकिन बहुत छोटी भी नहीं थी। पलक ने वहाँ काम करने का कोई विरोध भी नहीं किया।

स्वप्ना अब पलक के लिए रिश्ते की तलाश में थी, लेकिन पलक का भूत उसका पीछा न छोड़ता। कहने को बंगलौर दूर था लकिन खबर तो हवा की भाँति उड़ कर चली आती।

अभी कुछ दिनों पहले ही तो मिसेज माथुर मार्केट में मिली थी। कैसे हाथ और आँखें मटका-मटका कर मिसेज शर्मा की बेटी के बारे में कह रही थी। उसके बारे में कह चुकी तो पलक के बारे में पूछना भी न भूली।

'तुमने पलक की नौकरी क्यों छुड़वाई? वहाँ तो वो बहुत अच्छी कंपनी में थी।'

'छुड़वाई नहीं वो तो स्वयं ही अपने शहर आना चाहती थी.. इसलिए...' न चाहते हुए भी स्वप्ना ने अटक-अटक कर बात पूरी की।

'ये भी ठीक है। लेकिन वो तुम्हारे पड़ोस में मिसेज वर्मा रहती है वो तो कुछ और ही कह रही थी। मैंने भी कह दिया ऐसा नहीं हो सकता। इतने संस्कारी परिवार की लड़की ऐसा कर ही नहीं सकती।' और मिसेज माथुर ध्यान से स्वप्ना का चेहरा पढ़ने की कोशिश करने लगी।

जल्दी का बहाना कर स्वप्ना चली आई लेकिन मिसेज माथुर की निगाहें देर तक उसका पीछा करती रहीं। स्वप्ना को लगा जैसे दो जोड़ी निगाहें उसकी पीठ पर चिपक गई हों और उसे तन-मन का एक्स-रे लेना चाहती हो।

घर आकर उसने इस बात की खीझ पलक पर ही उतारी।

'कहीं मुँह दिखाने लायक न छोड़ा इस लड़की ने।'

रात्रि के अंधकार में सागर के सीने से लग सुबक उठी स्वप्ना।

सागर उसका सिर सहलाता रहा और समझाता रहा। बताता रहा कि कैसे कड़े प्रयत्नों के बाद पलक सामान्य हुई है। अब कुछ ऐसा न हो कि वो दोबारा कोई गलत कदम उठा ले। उसे सँभालने की जिम्मेदारी उन दोनों की है।

सागर दोहरी जिम्मेदारी निभा रहा था। कभी स्वप्ना को समझाने की तो कभी पलक को। कभी पलक भी ऐसे ही व्यथित हो पिता के पास आ बैठती।

'क्या माँ सारी जिंदगी इस बात को ढोती रहेंगी? स्वयं भी चैन से न रहेंगी और मुझे भी नहीं रहने देंगी ।'

सागर उसे भी समझाते, समझाते कि माँ भारतीय संस्कारों में पली-बढ़ी है। नारी-पुरुष के संबंध का मतलब उसके लिए पिता, पति या भाई का संबंध है। इससे इतर स्त्री-पुरुष में उसके लिए कोई संबंध हो ही नहीं सकता। इसलिए पलक उसे समझे।

पलक कितना समझ पाती, ये तो उसे ही पता था लेकिन सागर माँ बेटी में सामंजस्य बनाने का कोई मौका न चूकते।

स्वप्ना की सबसे बड़ी चिंता पलक को व्यवस्थित करने की थी। रिश्ते आ भी रहे थे लेकिन कोई भी पूर्णता तक नहीं पहुँच पाता। स्वप्ना इसका कारण पलक की पूर्व में की गई गलती को ही मानती।

पलक इस दिखावे से परेशान हो जाती लेकिन सागर के समझाने पर माँ की बात मान लेती और अब ये एक और रिश्ता। माँ के न कहने के बावजूद वह उस दिन ऑफिस भी गई और शाम को थकी माँदी घर वापस लौटी तो मुँह धोने का भी समय न मिला। लड़का व उसके माता-पिता थोड़ी ही देर में पहुँच गए थे।

पलक जैसी थी वैसी ही जाकर उनके सामने बैठ गई। लड़के की ओर निगाह गई तो बुरी तरह चौंक उठी। सामने सिद्धार्थ और उसके माता-पिता बैठे थे। सिद्धार्थ की नजर उससे मिली तो वो भी चौंक उठा।

पलक दो पल भी वहाँ न बैठ पाई। जानती थी माँ नाराज होगी लेकिन तब भी उठकर चली आई और अपने कमरे में आते ही बिस्तर पर ढेर हो गई।

'सिद्धार्थ का तो रिश्ता तय हो गया था फिर अब यह विवाह? क्या उसे पता था कि वह मुझे देखने आ रहा है?' जैसे कई सवाल उसके जेहन में घूम रहे थे।

माँ के लाख कहने पर भी पलक उसके बाद बाहर न आई तो उनके जाने के बाद स्वप्ना का गुस्सा फट पड़ा।

'तुम समझती क्या हो अपने आप को? लड़के वालों को तू पसंद आ गई है पर...'

'पर मुझे वो पसंद नहीं।' पलक की आवाज थोड़ी ऊँची हो गई थी।

'क्यों आखिर? कमी क्या है उस लड़के में? उसकी पहली पत्नी तो विवाह के एक वर्ष बाद ही भगवान को प्यारी हो गई थी और लड़का भी लगभग तेरी ही उम्र का है।

'ओह तो यह है असली बात।' पलक ने सोचा। सिद्धार्थ की पत्नी की मृत्यु हो चुकी है और अब वह दूसरी शादी रचाने चला है।

लेकिन पलक जानती थी उसे क्या करना है। सिद्धार्थ को उसके द्वार पर एक बार फिर भेज कर ईश्वर ने उसके साथ इनसाफ किया है। ईश्वर की सत्ता पर विश्वास होता दिखा उसे। अब 'ना' बोलने की बारी पलक की थी।


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