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कहानी

कतरा-कतरा मौत
रमेश पोखरियाल निशंक


गर्मियों की चिलचिलाती धूप में पसीना बहाती कुंती सिर पर धोती का छोर बांधे खेतों में कटाई कर रही थी। हाथ में पकड़ी हँसिया बार-बार पसीने से तर हो जाती। पसीना पोंछने के उपक्रम में कुछ मिट्टी भी धोती से चिपक गई थी। धोती का वास्तविक रंग क्या था यह तो पता ही न चलता। और उस धोती पर भी जगह-जगह गाँठें लगी हुईं। जहाँ धोती फटती, वहीं कुंती गाँठ बाँध लेती। गिन चुन कर पहले दो-तीन ही तो धोतियाँ थी उसके पास। एक को तो शादी-ब्याह में जाने के लिए भी सुरक्षित रखना पड़ता।

पर जब से उसका पति मंगसीरू दिल्ली गया है, तब से उसका जीवन भी थोड़ा सा बदल गया है। दो-चार साड़ी तो ले ही आया है वो उसके लिए। लेकिन खेतों में मजदूरी करते समय तो उन्हें पहन नहीं सकते।

उफ्फ कितनी गर्मी है। आसमान से तो मानो आग बरस रही है। अभी से ये हाल है तो बाद में क्या हाल होगा? कुंती का गला सूख आया। छोटे-छोटे सीढ़ीनुमा खेत लेकिन आसपास कोई पेड़ नहीं, कुंती का मन हुआ, थोड़ी देर कहीं छाँव में बैठ दो घूँट पानी पी ले। पर छाँव नसीब न हुई। प्लास्टिक की एक बोतल में पानी भर लाई थी कुंती, जो अब उबलने की सी स्थिति में पहुँच गया था। यह प्लास्टिक की बोतल पिछले ही महीने मंगसीरू ने लाकर दी थी उसे। कह रहा था इन बोतलों में पानी बिकता है शहर में। सुन कर वह फिक्क से हँस दी थी।

'पानी! ये भी कोई बिकने की चीज है भला।'

'अरे तू क्या जाने क्या-क्या होता है शहर में?' और उसकी आँखों में चमक आ गई। न जाने क्यों उसकी आँखों की ये चमक कुंती को बहुत डरावनी लगी। कहीं उसका मंगसीरू खो न जाए शहर की चकाचौंध में।

कुंती ने दो घूँट पानी से अपनी जिह्वा व गले को तर किया और फिर गेहूँ काटने लगी। इस बार तो फसल भी अच्छी हुई थी। मंगसीरू यहाँ होता तो वह दो चार खेत और बटाई पर ले सकते थे। लेकिन उसे तो न जाने क्या सूझी शहर जाकर नौकरी करने की वहाँ किसी बड़ी कोठी में नौकरी कर रहा है। मंगसीरू गाँव में था तो एक नहीं दो-दो परिवारों के पूरे-पूरे खेत बटाई पर ले लेते थे दोनों।

पंद्रह वर्ष की थी जब कुंती इस घर में ब्याह कर आई थी। घर में थे ससुर और दो छोटे देवर। सास की मृत्यु बहुत पहले हो चुकी थी। दो बेटियाँ थी, उनका भी विवाह हो चुका था। घर में कोई औरत न रही तो मंगसीरू का विवाह कर दिया। वह तब बीस बरस का था।

यों तो सुमेरपुर ठाकुरों का गाँव था पर गाँव के एक कोने पर कुछ नीची जातियों के मकान भी थे। इन लोगों के पास अपनी जमीनें तो थी नहीं इसलिए ठाकुरों के खेतों में ही मजदूरी करते थे।

यों तो पहाड़ के नजरिये से देखने पर सुमेरपुर ठीक बड़ा गाँव था। चालीस-पचास परिवार ठाकुरों के और दस-पंद्रह परिवार नीची जाति के। कुल मिलाकर चहल-पहल रहती गाँव में, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जो पलायन का दौर आरंभ हुआ उसने पूरे गाँव को सूना कर दिया। अच्छे पैसेवालों के बच्चे जो एक बार पढ़ाई के बहाने से शहर गए, फिर गाँव न लौटे। वृद्ध माता-पिता जब असहाय हो गए तो वह भी बच्चों के साथ ही चले गए। बस अब ये लोग छुट्टियों में पिकनिक मनाने की तरह ही गाँव आते या बीच-बीच में बटाई पर दिए अपने खेतों का हिसाब करने।

नीची जात में भी जिनके बच्चे पढ़ने में अच्छे थे वह अपने परिश्रम और सरकार की सहायता से नौकरी तो पा ही गए थे। बस कुछ एक परिवार ही ऐसे थे जिन्हें गरीबी के इस दौर में पढ़ने को भी न मिल पाया नौकरी क्या खाक करते। जिनके बच्चे नौकरी लग गए थे। उनका खर्चा बच्चों के भेजे गए मनीऑर्डर से ही चल जाता इसलिए उन्होंने भी मजदूरी करना छोड़ दिया था। एक समय था जब गरीब भूमिहीन परिवारों का खर्चा बड़ी मुश्किल से चल पाता। लेकिन अब तो स्थिति ये थी कि खेत ज्यादा है और मजदूर कम।

जिन घरों के बड़े बूढ़े स्वर्ग सिधार गए हैं, उनके बच्चों को तो गाँव आने की फुरसत तक नहीं। खेत बंजर पड़े हैं तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन जहाँ बड़े-बूढ़े जिंदा हैं, वह खेतों का अपना मोह छोड़ नहीं पाते। भले ही वहाँ से कुछ न मिले लेकिन खेत बंजर न हो यही उनकी मंशा रहती है। और ऐसे ही कुछ खेतों का काम ले लिया था कुंती ने।

कितना समझाया था मंगसीरू को, मत जा गाँव छोड़कर बहुत खेत हैं, यहाँ अनाज उगाने को। दोनों मेहनत करते तो खूब अनाज पैदा होता। स्वयं के लिए तो पूरा होता ही कुछ बिक भी जाता। कुंती ने सुना था कि अब तो पहाड़ का कोदा-झंगोरा भी शहरों में बिकने लगा है। ब्लाक स्तर पर कई संस्थाएँ बन गई थी जो इस सामान को खरीदकर ले जाती।

कुंती के ब्याह को दस बरस हो चुके थे। इस बीच बहुत कुछ घट गया। स्वयं भी वह दो बच्चों की माँ बन गई। ससुर स्वर्ग सिधार गए। मँझले देवर का ब्याह हो गया। देवरानी इतनी झगड़ालू थी कि दो दिन भी कुंती के साथ निर्वाह न कर पाई। हारकर कुंती को एक ही घर में दो चूल्हे करने पड़े। छोटा देवर घर से शहर भाग गया। अब वहीं किसी होटल में काम कर रहा है। कभी घर की याद आती है तो चला आता है। आजकल वह अपना छोटा सा ढाबा खेलने की तैयारी में है और कुंती उसका घर बसाने की। पच्चीस बरस का होने को आया और अभी तक घर नहीं बसा। यही चिंता कुंती को खाए जाती है। मंगसीरू यहाँ होता तो कितनी मदद मिलती उसे उससे।

मंगसीरू पहले तो ऐसा न था। गाँव में रहते हुए ही जितनी आमदनी हो जाती उससे संतुष्ट रहता। दोनों लोग मेहनत करते तो गुजारे लायक कमा ही लेते। दोनों ही मेहनती थे। इसलिए खूब सारे खेत बटाई पर ले लेते और अब तो बटाई क्या पूरी फसल के मालिक ही वही होते थे। लेकिन बुरा हो इस कुंदन का, न जाने क्या-क्या सब्जबाग दिखाए कि वह दिल्ली जाने को तैयार हो गया। कुंदन स्वयं एक कोठी में चौकीदारी करता। मालिक जब सेना में था तो बड़े चाव से उसने यह मकान बनाया था। दो बच्चे हैं। दोनों ही विदेश में रह रहे हैं। दो वर्ष पूर्व ही कर्नल साहब भगवान को प्यारे हुए तो उसकी पत्नी भी बेटे के पास अमेरिका चली गई और अब उसी कोठी की देखभाल कर रहा था कुंदन। ऐसे ही कई कोठियाँ थी जिनमें चौकीदार की आवश्यकता थी।

कुंदन ने मंगसीरू को भी बड़े-बड़े सपने दिखाए।

'अरे यार यहाँ कर क्या रहा है तू? चल मेरे साथ, मैं दिलाऊँगा तुझे काम। अरे वहाँ जाकर तुझे पता चलेगा कि जिंदगी होती क्या है! यहाँ तो कुछ भी नहीं है।'

बताते हुए कुंदन की आँखें चमक उठती तो मंगसीरू की आँखों में भी कुंदन के दिखाए सपने चमक उठते।

कुछ दिनों की हाँ-ना के बीच झूलता मंगसीरू अब आखिरकार कुंदन के साथ दिल्ली आ ही गया और कुंती रह गई दो बच्चों के साथ अकेली। कहने को तो देवर-देवरानी उसी गाँव में थे, पर उनका तो जरा भी सहारा न था। कुंती तो बिल्कुल भी न चाहती थी कि उसका पति उन्हें अकेला छोड़ शहर चला जाए। तब से उसे गए तीन वर्ष हो चुके थे। बड़ा बेटा चुन्नू तब चार वर्ष का था और छोटी बेटी मुनिया ढाई बरस की।

दिल्ली जाने के दो माह बाद ही मंगसीरू गाँव लौटा तो बौराया हुआ सा इनसान था।

'मैंने वहाँ सबको अपना नाम मंगलसिंह बताया है। मंगसीरू नाम पता नहीं क्यों रख दिया मेरा?' आते ही उसने कुंती के सामने एक धमाका सा किया।

'क्यों? इस नाम में क्या बुराई है?'

'अरे कितना पुराना सा नाम लगता है मंगसीरू, ऐसे लगता है जैसे किसी महीने का नाम बोल रहे हो।'

ठीक ही तो कह रहा था मंगसीरू। पहले ऐसा ही तो होता था। जो बच्चा जिस महीने में पैदा हुआ उसका नाम उसी महीने के नाम पर रख दिया। मार्गशीर्ष महीने में पैदा होने के कारण ही उसका नाम मंगसीरू रखा गया था।

जिस कोठी में मंगसीरू को नौकरी मिली थी, उसके मालिक का कई शहरों में स्वयं का व्यवसाय था। पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी और दोनों विवाहित बेटियाँ अमेरिका में रह रही थी। मालिक स्वयं भी काम के सिलसिले में अधिकांशतः दिल्ली से बाहर ही रहता।

'जल्दी-जल्दी घर नहीं आ पाऊँगा मैं। अभी नई नौकरी है। कुछ दिन हो जाएँ, थोड़ा आमदनी का अंदाजा लग जाए तो तुम लोगों को भी ले जाऊँगा वहीं। अँग्रेजी स्कूल में पढ़ेंगे मेरे चुन्नू और मुनिया।'

'क्यों? अभी तनख्वाह कितनी मिलेगी ये नहीं बताया क्या मालिक ने?'

कुंती को मंगसीरू की हर बात अजीब सी लग रही थी।

'अरे तनख्वाह से क्या होता है? कुंदन कह रहा था कि उससे ज्यादा तो और कमाई हो जाती है वहाँ।'

'और कमाई?'

'तू नहीं समझेगी। जब तेरे लिए ढेर सारा सामान घर वापस लाऊँगा तब समझ में आएगा तेरी।' मंगसीरू की आँखें चमक रही थी।

उसके बाद मंगसीरू छह माह बाद आया था। हाँ इस बीच उसकी एक चिट्ठी और एक दो हजार रुपए का मनीआर्डर जरूर आया था। पोस्टमैन ने जब पहली बार उसके हाथ में दो हजार रुपए रखे तो वो बौरा गई। कहाँ रखे इतने पैसे और क्या करे? उसे तो उन्हें गिनना भी नहीं आता था। उसने पैसे-टक्के तो नहीं पर अनाज खूब देखा था। उसी अनाज के बदले में अपने लिए सब कुछ खरीद लेती थी।

छह माह बाद मंगसीरू आया तो बिल्कुल ही बदला हुआ इनसान था। पैंट, कमीज, आँखों में काला चश्मा, पैरों में महँगे जूते, उसकी तो हर अदा ही निराली थी। और उसके सामने चूल्हा फूँक रही थी, मैली-कुचौली धोती पहने कुंती।

'ऐसे कैसे रहती है तू? थोड़ा ढंग से रहा कर। अच्छे कपड़े पहन, क्रीम-पाउडर लगा। शहरों में देख कैसे टिप-टॉप बनकर रहती है लड़कियाँ।' और मंगसीरू ने अपने बैग से एक अच्छी सी साड़ी और कुछ मेकअप का सामान निकाल उसके हाथ में रख दिया।

'कैसी बातें करते हो तुम भी? अच्छी साड़ी पहन, क्रीम-पाउडर लगाकर क्या खेत में काम करने जाऊँगी मैं!'

कुंती ने साड़ी और अन्य सामान सँभालते हुए कहा,।

'तो कौन कहता है कि तू खेतों में काम कर? मैं कमाऊँगा तू ठाठ से खा। और फिर कुछ ही समय की तो बात है। तू भी चलना मेरे साथ शहर।'

'शहर तो जब चलूँगी तब चलूँगी। अभी तो घर में जो काम है उसे तो करना ही है। अपनी जड़ें इतनी जल्दी नहीं छोड़नी चाहिए।' कुंती के स्वर में कुढ़न स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उसे अपना पति ही अनजाना, अनचीन्हा सा दिख रहा था।

और उसके बाद तो मंगसीरू जितनी बार भी आया कुंती का अनजानापन बढ़ता गया। मंगसीरू के सिर पर तो साब के घर में समय-समय पर होने वाली पार्टियाँ सवार रहती। पार्टी में आने वाले मेहमान, उसमें बनने वाले पकवान और साथ में विदेशी महँगी दारू।

'कुंती तू वहाँ होती तो देखती कि कैसे-कैसे कपड़े पहनती हैं आजकल की लड़कियाँ और कितना पैसा है लोगों के पास। ऐश करते हैं लोग ऐश।'

रात के घुप्प अंधकार में भी कुंती पति की आँखों में चमक देख सकती थी।

'तू वहाँ होती तो देखती।' ये शब्द तो मंगसीरू की जुबान से कई बार निकल जाते लेकिन पहले की भाँति 'तुझे भी वहाँ ले चलूँगा' के बोल न फूटते। उसकी आँखों की चमक के आगे बच्चों को अँग्रेजी स्कूल में पढ़ाने की इच्छा भी धूमिल होती जा रही थी। हाँ लेकिन जब भी वह घर आता बच्चों के लिए ढेर सारे कपड़े खिलौने जरूर लाता। बच्चों को वह बेहद प्यार करता। बच्चे भी उसके एक बार जाने के बाद उसके वापस आने की बेसब्री से प्रतीक्षा करते।

'भाभी, कहाँ हो तुम? गजब हो गया। मैं तो कब से तुम्हें ढूँढ़ रहा हूँ।' देवर बिसेसर घबराया, पसीने से नहाया हुआ कुंती के पास आ खड़ा हुआ। कुंती का जी धक से रह गया। पत्नी द्वारा किए जाने वाले कलह से डर कर बिसेसर तो कुंती से बात तक न करता। तीन बरस हो गए थे भाई को गए लेकिन बिसेसर ने कभी भाभी से ये न पूछा कि उसे कोई परेशानी तो नहीं। फिर आज ऐसा क्या हो गया कि ये यूँ घबराया सा उसे तलाश रहा है।

'क्या हो गया देवरजी? क्यों पसीना-पसीना हो रहे हो?'

'भाभी मैं पड़ोस के गाँव गया था।'

'तो?'

और उसके बाद बिसेसर ने जो बताया उसे सुनकर उसके तो होश ही उड़ गए।

उस गाँव में बिजली थी। बिजली थी तो कुछ पैसे वाले लोगों ने टेलीविजन भी लिया था। उसी में किसी ने मंगसीरू को देखा था। पुलिस वाले पकड़ कर ले जा रहे थे उसे लेकिन नाम मंगल सिंह बता रहे थे। शक्ल तो हू ब हू मंगसीरू जैसी थी।

'कितना पुराना नाम है मंगसीरू? ऐसा लगता है किसी महीने का नाम ले रहे हों। मैंने तो अपना नाम मंगलसिंह रख लिया है।' कुंती के कानों में पति के कहे ये शब्द गुंजायमान हो आए।

'लेकिन उसने किया क्या है? क्यों पकड़ कर ले जा रहे थे उसे पुलिसवाले?' कुंती बौखला गई।

'ज्यादा तो नहीं पता लेकिन किसी खून-वून का मामला लगता है। बिसेसर ने डरते-डरते कहा।'

'खून! मंगसीरू जैसा आदमी किसी का खून कैसे कर सकता है? जरूर कोई गलतफहमी हुई है उन्हें।'

कुंती की आँखें आँसुओं से धुँधला आईं।

'मैं क्या बताऊँ भाभी, मैंने तो टी.वी. देखा नहीं। जो लोगों ने कहा वो सुन लिया और आपको बता दिया।'

अपने आप को किसी तरह सँभालती कुंती घर वापस लौट आई। मन में ढेरों चिंताएँ दुश्चिंताएँ उठ रही थी।

एक मन कहता कि बिसेसर ने जो कुछ कहा वह झूठ है, दूसरा मन कहता कि आखिर आसपास के गाँव के लोग उसे पहचानने में भूल क्यों करेगे?

और अगले कुछ दिनों में जो घटा वह कुंती के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था। कुछ ही दिनों में मंगसीरू के पकड़े जाने की पूरे क्षेत्र में आग की तरह फैल गई।

मंगसीरू और उसका मालिक एक घिनौने अपराध में पकड़े गए थे। अपराध भी ऐसा कि सुनो तो घृणा से रोंगटे खड़े हो जाएँ। कम उम्र की लड़कियों को कुकर्म के बाद मार डाल देने का आरोप था उन पर।

दरअसल जिस कोठी में मंगसीरू काम करना था। उससे थोड़ी ही दूर पर एक झुग्गी बस्ती थी। बस्ती के बच्चे पढ़ने लिखने तो जा न पाते यूँ ही इधर-उधर घूमा करते। ज्यादा ही हुआ तो उनमें से कुछ कूड़ा बीनने का काम कर लेते। वहाँ की लड़कियाँ एक-एक कर गायब हो रही थी।

झुग्गी के बाशिंदों ने जब आरंभ में अपनी लड़कियों की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवानी चाहिए तो उन गरीब लोगों की किसी ने न सुनी बल्कि उल्टा डाँटकर भगा दिया। एक आध लोगों ने दबे स्वर में बड़ी कोठी के मालिक की ओर इशारा किया तो उन पर तो पुलिसवालों का हाथ भी चल गया। आखिर कैसे सहन करते वो बड़ी कोठी वाले के विरुद्ध ये घृणित आरोप। वही बड़ी कोठी वाला, बड़े दिलवाला कई बार अपने यहाँ दावतों का आयोजन करता जिसमें शहर के संभ्रांत और उच्च पदों वाले लोग एकत्रित होते। बड़ी कोठी वाले का आतिथ्य और उसकी पहुँच दोनों ही क्षेत्र में चर्चित थे। पुलिसवालों ने भी कई बार उसका नमक खाया था और उस नमक का कर्ज अदा करना उनका परम कर्तव्य था।

लेकिन पाप का घड़ा तो एक दिन फूटना ही था, सो फूटा। बगल के ही नाले में कई बच्चों की हड्डियाँ मिली। इनमें कुछ बड़ी जवान लड़कियाँ भी थी जो बड़ी कोठी वाले के अतिथियों का मनोरंजन करने समय-समय आती रहती।

मालिक और नौकर दोनों पकड़े गए लेकिन सारा ठीकरा फूटा नौकर के सिर। मालिक ने साफ कह दिया कि उसकी कोठी में उसकी अनुपस्थिति में क्या हो रहा था वह नहीं जानता। पुलिसवालों ने भी उसी का साथ दिया।

गाँव में भी पुलिस आई। कुंती से पूछताछ की। मंगसीरू के अतीत के बारे में पूछा लेकिन कुछ होता तो लोग बताते। खेतों में मजदूरी करने वाला मंगसीरू कब शहर जाकर मंगल सिंह बन बैठा था, गाँव वालों को तो इसका पता भी न था।

'वह ऐसा नहीं कर सकते साहब! वह तो अपने बच्चों को बहुत प्यार करते हैं तो फिर दूसरों के बच्चों के साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं?' कुंती की आँखें धुँधला गई।

लेकिन जब सब कुछ मंगसीरू के विरुद्ध था तो ऐसे में कौन सुनता उसकी। पुलिस आई और चली गई। मंगसीरू और उसके मालिक पर केस चला बलात्कार का, हत्या का और मालिक एक-एक कर सारे अपराधों से बरी होता गया।

तब से दो वर्ष हो चुके हैं। कुंती और उसके बच्चे गाँव वालों के लिए अछूत हो चुके हैं। जिन लोगों के खेतों को कुंती ने बटाई पर लिया था उन्होंने भी उससे खेत वापस ले लिए। कोई उसे मजदूरी भी नहीं देता। जैसे कि वही अपराधी हो।

कुंती ने बड़े बेटे को स्कूल में दाखिला दिला दिया था अब उसे भी वहाँ से निकाल दिया है। चुन्नू को स्कूल में बच्चे भी ताने देते तो मास्टरजी भी। कक्षा में उसे अलग बिठाया जाता। घर आकर चुन्नू रोता, माँ से कई सवाल करता।

'मेरे पिताजी ने क्या बच्चों को मार कर खाया है माँ? स्कूल में आज आशीष कह रहा था।'

माँ का सीना छलनी हो उठता। बच्चे का नन्हा सा मन कैसे सहन करेगा इन आरोपों को? अब तो मंगसीरू के साथ वह अपराध भी जुड़ने लगे थे जो उसने किए ही नहीं। जितने मुँह, उतनी बातें। हारकर उसने चुन्नू को स्कूल से निकाल दिया। यहाँ अब पेट भरने के लाले पड़ गए थे बच्चों को कहाँ से स्कूल पढ़ाती।

मंगसीरू को पिछले दो वर्ष से देखा भी न था उसने। चाहती थी कि उसे देखे। उससे मिले और पूछे कि क्या ऐसा किया भी है या अपने मालिक के कर्मों की सजा भुगत रहा है। बस एक बार यही पूछना चाहती थी वो मंगसीरू से। वह उससे 'ना' कह दे तो वह उसे माफ कर देगी। अदालत उसे कोई भी सजा दे पर ईश्वर के दरबार में अपने पति की माफी की अर्जी वह लगाएगी। लेकिन पहले एक बार वह उससे मिल तो सके। सुना था दिल्ली की सबसे बड़ी जेल में बंद था मंगसीरू।

उसने गाँव में कई लोगों से विनती की कि एक बार कोई उसे दिल्ली ले जाए। अपने देवर से विनती की लेकिन किसी ने उसकी न सुनी छोटा देवर तो इस घटना के बाद से गाँव ही न आया।

कुंती के सामने अब बच्चों का पेट पालने का संकट गहरा गया। जब घर में रखा अन्न समाप्त होने लगा तो उसने ग्राम प्रधान के आगे हाथ जोड़ दिए।

'मेरे बच्चे भूखे मर जाएँगे। मेरे पति ने जो किया उसकी सजा मेरे बच्चों को क्यों?' उसके आँसू निकल आए।

प्रधान पसीज गया। सरकारी योजना के तहत कुछ दिनों की मजदूरी दिलवा दी। कुंती ने राहत की साँस ली।

और तभी ये मनहूस खबर आई कि अदालत ने अपना निर्णय सुना दिया है। मालिक के विरुद्ध कोई सबूत न मिलने के कारण उसे छोड़ दिया गया और मंगसीरू को फाँसी की सजा सुनाई गई।

दो दिन बाद कुंती को इसकी खबर मिली। कुछ समय बाद फाँसी का दिन निर्धारित हो गया। कुंती की बेचैनी बढ़ चुकी है। एक बार पति से मिलने की इच्छा और प्रबल हो उठी है। लेकिन कैसे?

कुंती और उसके बच्चे तो अब घर से बाहर भी नहीं निकलना चाहते। जहाँ जाओ एक ही बात। कुंती को लगता है जैसे ये गुनाह उसके पति ने नहीं बल्कि स्वयं उसने किया है।

मंगसीरू ने अगर अपराध किया तो उसे सजा मिली लेकिन निरपराध कुंती को किस बात की सजा मिल रही है यह सोचने समझने को कोई तैयार नहीं है और कुंती है कि तिल-तिल मरने की सजा भुगत रही है।


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