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कहानी

एक थी जूही
रमेश पोखरियाल निशंक


जूही मसल दी गई। जूही कुचल दी गई। उसके तन और मन पर सैकड़ों घाव बन गए। लगता है। तन पर कैक्टस उग आए हैं, जिसके काँटे रह-रह कर उसी को घायल कर रहे हैं।

यही जूही कल तक इतनी खुश थी, बिल्कुल जूही की तरह। जूही की कली खिल उठी थी। प्रसन्नता का भाव मन में आते ही वह पुष्प बन गई थी। सुंदर सा पुष्प सारी ताजगी अपने में समेटे हुए।

एक अत्यंत गरीब परिवार में पैदा हुई जूही बचपन से ही ढेर सा सौंदर्य अपने में समेटे थी। गुलाबी होंठ, काली और बड़ी-बड़ी आँखें, तीखी नाक, बचपन से ही वह गोलमटोल गुड़िया सी लगती थी। पिता एक आढ़ती के यहाँ मजदूरी करते। शहर के एक कोने में बसी अवैध झुग्गी झोपड़ियों में से एक में रहते थे। जूही के पिता। बंगाल के सीमावर्ती इलाके से काम की तलाश में अपने गृहनगर से बहुत दूर पंजाब के एक शहर में रहने चले आए थे वह। विवाह हुआ तो पत्नी को भी साथ ले आए।

विवाह के एक वर्ष बाद वह एक पुत्री के माता-पिता बने। नाम रखा गया जूही। यों तो जूही शब्द का शाब्दिक अर्थ दोनों में से कोई न जानता था पर उन्हीं दिनों आई एक हिट फिल्म की हीरोइन के नाम पर उन्होंने अपनी इस सुंदर सी बेटी का नाम रखा जूही।

जूही जब तक छह वर्ष की हुई तब तक उसने तीन और भाई-बहन इस दुनिया में आ चुके थे। पिता की कमाई से खर्चा चलना बहुत मुश्किल होता जा रहा था। लेकिन इस सब के बावजूद उन्होंने जूही को स्कूल पढ़ने भेजा। छह वर्ष की जूही जब पहले दिन स्कूल गई तो माता-पिता का सीना गर्व से फूल उठा। उन दोनों ने तो कभी स्कूल का मुँह भी न देखा था।

शारीरिक सौंदर्य की स्वामिनी जूही का दिमाग भी तेज निकला। स्कूल से घर लौटकर कभी किताब हाथ में लेने को न मिलती। माँ घर के काम-काज निबटा सके इसलिए जूही को भाई बहनों को सँभालना होता। फिर भी जूही कक्षा में प्रथम आती। यों तो उस सरकारी स्कूल में उसी की तरह के गरीब बच्चे पढ़ते थे। जिनके माता-पिता को उनकी पढ़ाई से कुछ खास सरोकार न था लेकिन इसके बावजूद जूही ने अपने अध्यापकों के दिल में अपनी जगह बना ही ली।

जब तक जूही चौथी कक्षा में पहुँची तब तक दोनों छोटे भाई भी स्कूल में प्रवेश ले चुके थे। घर में रह गए छोटी बहन और माँ। माता-पिता अनपढ़ थे लेकिन बच्चों को पढ़ाना-लिखाना चाहते। इसलिए हाड़-तोड़ मेहनत करते। पिता देर रात तक काम करते और साथ ही माँ ने भी कुछ घरों में काम करना आरंभ कर दिया। तीनों बच्चे स्कूल जाते तो वह छोटी बेटी को गोद में ले चल देती काम पर।

जूही ने पाँचवीं पास कर ली। छोटे दोनों भाई क्रमशः चौथी और दूसरी में पढ़ रहे थे। लेकिन अब जूही की आगे की पढ़ाई कैसे हो? छोटी बहन भी अब स्कूल जाने लायक हो रही थी। राजकुमारी सी अपनी बेटी को आगे पढ़ाने की लालसा मन में ही दम तोड़ रही थी। सर्वगुण संपन्न अपनी इस बेटी के लिए उन्होंने ढेर सारे सपने देखे थे।

बेटी पढ़ाई करेगी, कहीं नौकरी करेगी, उसकी तरह मजदूरी नहीं करेगी। लोगों के जूठे बर्तन नहीं माँजेगी। और फिर एक दिन एक सुंदर सा राजकुमार उसके रूप गुण पर रीझकर आएगा और उसे ले जाएगा सपनों की दुनिया में। उनकी इस रेतीली, पथरीली काँटों भरी दुनिया से बहुत दूर। लेकिन यह क्या! उनके सपने तो उन्हें अभी चूर होते नजर आ रहे थे।

लेकिन जूही के सपनों को तो भविष्य की उड़ान भरनी थी, सो हल भी निकल आया। स्कूल में प्रथम आने पर उसे वजीफा भी मिल गया और उसकी प्रतिभा को देखते हुए एक अध्यापिका ने मदद भी कर दी।

जूही पहुँच गई बड़े स्कूल, जो छठी से बारहवीं तक था। था भी सिर्फ लड़कियों का ही स्कूल। जूही के सपनों को नए पंख मिले। लेकिन आगे की राह इतनी आसान न थी। माता-पिता किसी तरह चार बच्चों की पढ़ाई का खर्चा निकाल रहे थे। दोनों दिन-रात हाड़ तोड़ परिश्रम करते ताकि बच्चों का भविष्य उज्ज्वल हो। जूही माता-पिता की ये हालत देखती तो मन उद्विग्न हो उठता। क्या वह उनकी कोई मदद नहीं कर सकती? लेकिन वह करे भी तो क्या?

लेकिन उसने भी हार न मानी। आठवीं पास करने के बाद उसने शाम को घर पर ही कुछ बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। इस पर भी कुछ खास मदद न हो पाती। जिस बस्ती में वह रहती थी वहाँ लोगों के पास खाने-ओढ़ने को ही पूरा नहीं पड़ता तो बच्चों की ट्यूशन की पफीस कहाँ से लाते?

'माँ, मैं भी शाम को तुम्हारे साथ काम पर चलूँगी।' एक दिन अपने मन की पीड़ा उसने माँ के सामने बोल ही दी।

माँ चौंक गई, ये क्या कह रही है बेटी! उनकी बेटी दूसरों के घरों में बर्तन धोएगी, झाड़ू लगाएगी। उसकी आँखों में आँसू आ गए। चौदह-पंद्रह वर्ष की जूही की ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ रही थी सौंदर्य उससे भी दुगुनी गति से बढ़ रहा था। माँ उसके चेहरे की ओर देख कर काँप उठी। किसी घर में काम करेगी ये? न जाने किसकी कुदृष्टि इसे लील जाएगी क्या पता? इतने घरों में इतने वर्षों से काम करते हुए न जाने कितने भेड़ियों की लोलुप निगाहों से अपने आप को बचा पाई थी वह। लेकिन क्या यह मासूम बच्ची बचा पाएगी अपने आप को। भय और कुविचार से उसके रोंगटे खड़े हो गए। जूही को उसने अपने सीने से लगा लिया। अपने आँचल में छुपाना चाहती थी उसे लेकिन अब तो जूही उससे भी लंबी हो चुकी थी। उसकी यह चेष्टा भी व्यर्थ हुई।

'जब तक हमारे हाथ-पैर चल रहे हैं तब तक तुझे कुछ भी करने की जरूरत नहीं।' बस इतना ही कहा उसने।

लेकिन कहाँ रह पाए दोनों के हाथ पैर सलामत। भारी सामान टैंपो में लादते वक्त टैंपो असंतुलित हो पिता के ऊपर ही गिर पड़ा। जान तो बच गई लेकिन इलाज के अभाव में दोनों पैरों की शक्ति जाती रही। जूही तब दसवीं में पढ़ रही थी। पिता बिस्तर से आ लगे थे। माँ इस हालत में चिड़चिड़ी हो गई। छोटी-छोटी बातों पर बच्चों की पिटाई और गाली-गलौज यही सब चलता घर में।

जूही समझ गई। बहुत हो गई पढ़ाई। अब तो कुछ न कुछ काम ढूँढ़ना ही होगा। किसी तरह उसने दसवीं के इम्तिहान दिए और फिर काम की तलाश में जुट गई।

जूही के साथ स्कूल में पढ़ती थी निर्मला। उसी की तरह गरीब तो नहीं लेकिन बहुत अच्छे हालत भी न थे उनके घर के। उसकी परिचित कोई निम्मो आंटी घर पर ही लड़कियों से अचार, पापड़, बड़ी, इत्यादि बनवाती और उन्हें बाजार में बेचती। कुछ लड़कियाँ सिलाई बुनाई का काम भी करती। मेहनताना भी काम के अनुसार ठीक ही मिल जाता।

'तू मुझे भी ले चल उनके पास। मुझे काम की बहुत जरूरत है।' और जूही ने निर्मला के हाथ पकड़ लिए।

'माँ मैं काम करूँगी।' जूही ने निर्मला से जो बात हुई थी वो माँ को बता दी।

माँ के पास बहुत कुछ सोचने को न था। न ही था कोई अन्य विकल्प। अपाहिज पति बिस्तर पर पड़ा था। तीनों बच्चों का स्कूल छूटने की कगार पर था और बड़ी बेटी दसवीं पास कर घर पर बैठी थी।

वही बेटी जिसे एक वक्त वह सबकी नजरों से बचाना चाहती थी। दरिद्र परिवार के इस हीरे पर किसी की नजर ना लगे इसके लिए पूरे प्रयास किए, लेकिन अब स्थिति उसके काबू में न थी। हाँ कह दिया उसे। बस इतना ही संतोष था कि बेटी किसी महिला के यहाँ काम करने जा रही है।

जूही निम्मो आंटी के यहाँ जाने लगी। वहाँ और भी बहुत सी लड़कियाँ काम करने आती लेकिन उनमें सबसे बुरी आर्थिक स्थिति जूही की ही थी।

जूही को काम करते महीना हुआ तो आंटी ने पाँच-पाँच सौ के तीन नोट उसके हाथ में पकड़ा दिए।

जूही कभी एकटक उन नोटों की ओर देखती तो कभी आंटी की ओर। नोटों को उसने कस कर मुट्ठी में भींच लिया। बचपन से अभावों में बड़ी हुई जूही ने कभी इतने पैसे एक साथ न देखे थे और फिर ये तो उसकी स्वयं की मेहनत थी।

हथेलियों में पसीना छूट आया तो नोटों के खराब हो जाने के भय से उसने उन्हें सँभाल कर रूमाल में बाँध दिया।

रास्ते भर वह उसे कीमती अमानत की भाँति सहेज कर लाई। अपने आस-पास चलते लोगों को ध्यान से देखा। कहीं इनमें से कोई चोर-उचक्का न हो उसके मन की स्थिति भी अजीब थी। प्रसन्नता और भय के मिले-जुले भाव उसके मन में आ रहे थे।

बहुत सावधानी बरतती वह घर पहुँची और रूमाल की गाँठ खोल अपनी पहली कमाई माँ के हाथ में रख दी। एक कमरे के उस छोटे से घर में एक कोने पर पिता पड़े थे। बेटी समझदार हो गई है यह सोच प्रसन्नता हुई लेकिन जिस बेटी के लिए उन्होंने बड़े-बड़े सपने देखे थे, उसे अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलवाना चाहते थे, उसे छोटी सी उम्र में नौकरी करते देख आँखें भर आई। लेकिन जूही की खुशियाँ बहुत दिन तक कायम न रह सकी। उसने सोचा था कि वह कमाने लगेगी तो घर में सुख-शांति आएगी, चार पैसे आएँगे तो छोटे भाई-बहन भी पढ़ पाएँगे। वह स्वयं तो दसवीं से आगे पढ़ न पाई, सपने अधूरे ही रह गए लेकिन अपने भाई-बहनों के साथ ऐसा न होने देगी।

लेकिन उसका यह सपना भी सपना ही रह गया। उसके कमाए पंद्रह सौ रुपये ऊँट के मुँह में जीरा ही साबित हुए। भाई-बहनों का स्कूल छूट गया। दोनों भाई सारा दिन बस्ती के बच्चों के साथ खेला करते और छोटी बहन घर गृहस्थी के कामों में माँ का हाथ बंटाती। दिनभर कभी पिता की झिड़कियाँ सुनती तो कभी माँ की गालियाँ।

जूही काम तो कर रही थी लेकिन खुश न थी। जूही मुरझाने लगी थी। मन के तनाव का असर काम पर भी पड़ा। सभी ने इसे महसूस किया, निम्मो आंटी ने भी।

'क्या बात है जूही? आजकल तू उदास रहती है। काम में भी मन नहीं लग रहा तेरा।' आंटी ने उचित समय देख एक दिन पूछ लिया।

जूही सकुचाई, ऐसे कैसे अपने घर की बात बाहर वालों को बता दे। लेकिन आंटी होशियार थी, चतुर थी। सच उगलवा ही लिया। समझ गई जूही को और अधिक पैसों की दरकार थी। जिससे वह अपने भाई-बहनों को पढ़-लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा करने के सपने को साकार कर सके।

जूही ने कुछ और काम की भी तलाश की लेकिन सब व्यर्थ। उसकी और उसके परिवार की किस्मत को न बदलना था सो नहीं बदली।

आंटी के यहाँ जो माल तैयार होता उसे लेने वाले ग्राहक भी आते। आंटी का मन हुआ कि उनमें से किसी से जूही की मदद करने को कहें, वैसे वो जूही जैसी मेहनती और ईमानदार लड़की को अपने से जुदा न करना चाहती थी लेकिन जूही की उदासी उससे देखी न जाती।

आंटी के ग्राहकों में एक था सुमित। तीस-बत्तीस वर्षीय सुदर्शन युवक। अच्छा काम चलता उसका। जान-पहचान भी खूब थी। शहर के बड़े-बड़े लोगो में उठना बैठना था। व्यवसाय में मदद करता रहता था।

'बेटा मदद कर इसकी। बहुत परेशान है ये।' आंटी ने सुमित से बात करना उचित समझा। सुमित ने ध्यान से जूही की ओर देखा। उसने निगाहें झुका ली।

'कितना पढ़ी हो?'

'दसवीं तक।'

'टाईप-वाईप करना जानती हो।'

'ना।' जूही ने ना में सिर हिलाया।

सुमित ने आश्वासन तो दिया लेकिन जूही को उसकी बातों में आशा की कोई किरण नजर नहीं आई।

लगभग दो माह बाद सुमित आया। एक जगह नौकरी के इंटरव्यू की बात कहकर और ले गया उसे अपने साथ।

और पहली असफलता के बाद इंटरव्यू का सिलसिला चल लिकला। जहाँ भी जाती वहाँ कंप्यूटर के ज्ञान पर बात अटक जाती। इसी तरह कुछ महीने और बीत गए। घर की हालत बिगड़ती जा रही थी और उसी अनुपात में सुमित की सहानुभूति जूही के प्रति बढ़ती जा रही थी। कभी-कभार वह उसकी आर्थिक मदद भी कर दिया करता। जूही को ठीक न लगता लेकिन आँखों के आगे बीमार पिता व बस्ती में इधर-उधर घूमते भाई-बहन का चेहरा घूम जाता।

'तुम ऐसा करो आंटी के यहाँ से फारिग होने के बाद मेरे ऑफिस में आकर कंप्यूटर सीख लिया करो।' कई साक्षात्कारों के बाद जब जूही को नौकरी न मिली तो सुमित ने सुझाव दिया।

जूही झिझकी। उसे संकोच हुआ। सुमित जानता है कि किसी छोटे-मोटे संस्थान में जाकर भी जूही कंप्यूटर पर टाइप करना सीख सके ऐसी स्थिति नहीं उसकी। तो क्या उसके प्रस्ताव को मान ले जूही? एक बार फिर बिस्तर पर पड़े बेबस पिता, बस्ती की गलियों में अधनंगे घूमते भाई और माँ के क्रोध का अकारण शिकार बनती बहन की छवि उसकी आँखों में घूम गई और सुमित के इस सुझाव को मान लेने में ही उसने भलाई समझी।

अगले ही दिन से जूही ने सुमित के ऑफिस जाना आरंभ किया। ऑफिस क्या, बस एक छोटा सा कमरा था। जिसे बीच में पार्टीशन लगा कर दो कमरों का रूप दे दिया गया था। एक छोटे से केबिन में सुमित स्वयं बैठता और दूसरे में उसके दो कर्मचारी। जूही सायं चार बजे के करीब आंटी के यहाँ से निकलती और पंद्रह-बीस मिनट की दूरी शहर की तंग गलियों को पैदल पूरा करती सुमित के ऑफिस पहुँच जाती। अपने ही ऑफिस के एक लड़के को सुमित ने जूही को कंप्यूटर सिखाने की जिम्मेदारी सौंपी। स्वयं भी कभी-कभी उसकी प्रगति की जानकारी ले लिया करता।

जूही खुश थी, बहुत खुश। की बोर्ड पर उंगलियों रखती तो मखमल का सा अहसास होता। की बोर्ड पर दबाया गया अक्षर सामने कंप्यूटर की स्क्रीन पर नजर आता तो जूही को लगता जैसे वह रुपहले पर्दे पर कोई सुंदर सा ड्रामा देख रही हो। सुमित के प्रति मन में श्रद्धा के भाव उमड़ आते। लगता जैसे स्वयं ईश्वर अवतार लेकर उसके सामने आ गए हों।

दो माह बीत गए। जूही ने हिंदी व अँग्रेजी दोनों टाइपिंग थोड़ी बहुत सीख ली थी।

'मैं तुझे अपने ऑफिस में ही रख लेता लेकिन मेरे पास तो पहले से ही दो लोग हैं। उनमें से किसी को निकाल देना भी ठीक नहीं।' दो दिन बाद किसी इंटरव्यू की बात बता सुमित ने अपने मन की बात भी कह डाली।

जूही कृतज्ञ थी सुमित की। उसने जो भी उसके लिए किया था वह कम नहीं था। और अब वह स्वयं ही उसकी नौकरी हेतु भी प्रयत्न कर रहा था।

इंटरव्यू वाले दिन जूही का मन सुबह से ही उद्विग्न था। कंप्यूटर सीखने के बाद से उसका नौकरी के लिए पहला साक्षात्कार था। तनख्वाह भी चार-पाँच हजार मिलने की उम्मीद थी। क्या वह सफल हो पाएगी? उसने ईश्वर से प्रार्थना की। प्रार्थना की कि उसको सफलता दे। जिससे वह अपने अपाहिज पिता का इलाज करा सके। उसके छोटे भाई-बहन स्कूल जा सकें और उसका ये छोटा सा घर स्वर्ग बन सके।

बहुत यत्न से सिरहाने के नीचे तह कर के रखा हुआ उसने अपना सबसे अच्छा सूट निकाला, तैयार हुई। एक बार फिर ईश्वर की तस्वीर के सामने सिर नवाया और घर से बाहर कदम रखा।

कुछ कदम चली ही थी कि दो बिल्लियाँ आपस में लड़ती-गुर्राती उसके सामने से निकल गई। जूही के कदम ठिठक गए। किसी अपशकुन के डर से नहीं बल्कि बिल्लियों के गुर्राने की आवाज के डर से। उसे लगा ये दोनों अभी उस पर झपट पड़ेगी। उसके पैर काँप गए। दिल धक्क से रह गया। बिल्लियाँ थोड़ी दूर भाग गई तो उसने चैन की साँस ली और चल पड़ी अपने गंतव्य की ओर।

बस्ती से बाहर निकलते ही सुमित गाड़ी लेकर खड़ा था।

'अच्छी लग रही हो।' सुमित ने गाड़ी का दरवाजा खोलते हुए कहा।

जूही मुस्करा दी और अंदर आकर बैठ गई। गाड़ी शहर की सड़कों पर फर्राटे भरने लगी। कुछ देर बाद जूही को लगा कि वह शहर की भीड़-भाड़ छोड़ कहीं बाहर निकल रही है। घर-दफ्तर वाली इमारतें कहीं पीछे छूटती जा रही है। उसने कनखियों से सुमित की ओर देखा। वह प्रसन्न मन किसी फिल्मी गीत की पंक्तियाँ गुनगुना रहा था।

'थोड़ी दूर है यह ऑफिस।' सुमित ने मानो उसके मन की बात पढ़ ली।

थोड़ी देर बाद गाड़ी एक विशाल हरे-भरे कंपाउंड में दाखिल हुई। यहाँ एक ही चाहरदीवारी के अंदर कई सारे छोटे-छोटे भवन बने थे। जूही को कुछ अजीब सा लगा लेकिन उसने ऑफिस के नाम पर कुछ देखा था तो सिर्फ सुमित का ऑफिस।

सुमित उसे एक कमरे में ले आया, लेकिन ये कमरा तो ऑफिस जैसा न था, इतना तो जूही को भी लगा। कमरे में एक कोने पर दो कुर्सियाँ और मेज लगे थे और बीच में था एक बड़ा सा बिस्तर।

घबराई हुई जूही को उसने कंधे से पकड़ कर कुर्सी पर बिठा दिया और उसके बाद जो कुछ हुआ वह जूही के लिए एक दुःस्वप्न से कम नहीं था। लंबा स्वप्न टूटा तो जूही की मुट्ठी में कुछ नोट बंद थे और सुमित उससे कुछ कह रहा था। सुमित के कुछ शब्द उसके कानों में पड़ते कुछ नहीं। आज दिन में भी तो उसने उससे कुछ कहा था। दोनों बार कहे गए शब्द उसके दिमाग में गड्ड-मड्ड हो रहे थे। कौन से शब्दों पर भरोसा करे जूही।

'तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो। जिस दिन से तुम्हें देखा तुम्हारी मेहनत, तुम्हारी सच्चाई, मुझे बहुत अच्छी लगी। अपने घर के लिए अपने परिवार के लिए कुछ करने का जज्बा मुझे अच्छा लगा।'

निष्प्राण सी जूही उसकी बातें कुछ सुन पा रही थी कुछ नहीं। सोच रही थी जब ऐसा ही था तो ये घोर पाप क्यों किया उसने उसके साथ, जिसे अच्छा मानते हैं उसे गंदा करते हैं क्या?

'तू बहुत सुंदर लग रही थी आज। रोक नहीं पाया अपने आप को। जो सजा तू देना चाहे वो स्वीकार है मुझे।' और सुमित ने सिर झुका लिया।

कुछ देर कमरे में मौन पसरा रहा। सुमित का सिर अपने द्वारा किए गए अपराध से झुका था तो जूही का सिर अपने आप पर हुए अपराध के संताप से।

'तू तैयार हो जा। इंटरव्यू के लिए चलना है अब।'

जूही बाथरूम में घुस गई। नल खोला और उसके बहने की आवाज में अपने मुँह को दबाती फूट-फूट कर रो पड़ी। देर तक वो नहाती रही। उसे लग रहा था कि पानी के साथ-साथ उसके तन पर लग आई गंदगी भी बह रही है। नहाकर जब वो बाहर निकली तो सुमित कमरे में न था। थोड़ी देर में दरवाजा खुला लेकिन आगंतुक सुमित न था।

और अब दो-तीन घंटे बाद सुमित का एक नया चेहरा, नया चरित्र लिए उसके सामने बैठा था।

'क्या कर सकती है तू बता? क्या हैसियत है तेरी? बहुत पढ़ी-लिखी है क्या? एम.ए. पास दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं, और तू क्या है, सिर्फ हाई स्कूल पास। सपने देखती है बड़े-बड़े। पिताजी का इलाज कराएगी, भाई-बहनों को पढ़ाएगी? तो क्या आंटी के यहाँ से मिलने वाले पंद्रह सौ रुपल्ली से करेगी अपना सपना पूरा?'

'मुट्ठी खोल और देख कितने रुपए हैं तेरे हाथ में। ये तेरी एक दिन की कमाई है। हिसाब लगा एक दिन के इतने तो महीने के कितने कमा लेगी। सारे पाप धुल जाएँगे तेरे परिवार के। नहीं तो यूँ ही कीड़े-मकोड़ों की तरह गटर में सड़ जाएगी तू और तेरा परिवार।'

जूही को कुछ होश आया। कुछ देर पहले ही तो उसके हाथ में ये रुपए ठूँसे थे सुमित ने। तो क्या ये रुपए उसकी देह का मूल्य थे। जिसे उसने स्वयं भी भोगा और दूसरे को भी...?

छिः! घृणा से उसे उबकाई आने को हुई लेकिन न जाने किस लालचवश रुपयों पर से उसकी पकड़ ढीली न हुई। सुमित को उसने आग्नेय नेत्रों से घूरा।

'ऐसे क्यों देख रही है? देख जज्बाती होकर कुछ नहीं मिलेगा। तू सुंदर है, छोटी है अभी। बस एक यही तो योग्यता है तेरे पास। तो फायदा उठा न इसका। कर दे अपने परिवार की दरिद्रता दूर।'

'कितने पैसे होंगे ये?' जूही ने सोचा।

गोद में रखे अपने हाथ की मुट्ठी को थोड़ा सा खोलकर कुल धनराशि जानने की उत्सुकता उसके मन में जगी। पाँच-पाँच सौ के नोट लग रहे थे। पिछले कितने ही महीनों से आंटी से पाँच-पाँच सौ के तीन नोट ले रही थी जूही। उसकी मोटाई का अंदाजा था उसे। उसकी मुट्ठी में जकड़े नोटों की मोटाई उससे तो ज्यादा ही थी।

'कितने होंगे? दो हजार, ढाई हजार, हाँ शायद इतने ही। एक दिन में ढाई हजार तो एक महीने के कितने? ये गणना तो उसके सपनों से कहीं आगे की थी। इतनी अधिक कि जिसका उसे कभी सपना भी न आया।

इतने रुपयों में पिता का ढंग से इलाज हो सकता है। माँ को घरों के झाड़ू-बरतन से मुक्ति मिल सकती है और उसके तीनों भाई बहन स्कूल जा सकते हैं। उस गंदी बस्ती के कचरे से निकल वह कहीं और पक्का घर भी किराये पर ले सकते हैं। एक इज्जत की जिंदगी जैसे साहब लोगों की होती है।

लेकिन उसकी स्वयं की इज्जत! उसका क्या? किसी न किसी दिन उसके माता-पिता भाई-बहन को पता लगना ही है कि इतना पैसा कहाँ से आ रहा है। उस दिन उनकी नजरों का सामना कर पाएगी क्या वह? बता पाएगी उन्हें कि उन्हें गंदगी के दलदल से निकाल कर स्वयं किस कीचड़ में जा फँसी है वह।

जूही के चेहरे पर भाव आ-जा रहे थे। एक चतुर खिलाड़ी की भाँति सुमित इसके भाव पढ़ने की कोशिश कर रहा था। जूही के घर की स्थिति भी जानता था वो और जूही की मनःस्थिति भी। एक चतुर बहेलिए की भाँति जाल में आ फँसी चिड़िया को फड़फड़ाते देख रहा था। ऐसी न जाने कितनी चिड़ियाओं को अपने जाल में फँसा कर शांत कर चुका था सुमित। फिर ये क्या चीज थी उसके सामने।

'ज्यादा मत सोच इस बारे में। बस अब तो यही सोच कि तेरे कारण तेरे परिवार की दशा सुधर रही है। कितना पुण्य का काम कर रही है तू अपने घर की पाँच जिंदगियों को बचाकर।'

पुण्य! ये शब्द जूही को अच्छा लगा। पाप और पुण्य की परिभाषा क्या है यह तो वह भी अच्छी तरह से नहीं जानती थी लेकिन यह समझ में आया कि अपना सर्वस्व देकर वह पाँच जिंदगियों को बचा रही है।

'तू तो ये काम मजबूरी में कर रही है लेकिन ये बड़े घरों की लड़कियाँ, वह तो अपने ऐशो-आराम के लिए करती हैं ऐसा। ऐसा करने का पाप तो उन्हें लगेगा तुझे नहीं। तेरे जैसी कई गरीब लड़कियाँ ऐसे ही अपने माँ-बाप की सहायता कर रही हैं। निम्मो आंटी के यहाँ आने वाली बहुत सी लड़कियाँ भी...।'

'निम्मो आंटी!' उनका नाम सुन जूही चौंकी। तो क्या वो भी इसमें शामिल हैं। कहीं उन्होंने ही तो सुनियोजित तरीके से उसे सुमित के जाल में नहीं फँसाया?

'लेकिन तू यह मत समझना आंटी ने ऐसा किया। वह तो जानती भी नहीं कि उसके यहाँ काम करने वाली लड़कियाँ ऐसा भी करती हैं। बहुत कड़क औरत है वह किसी की मदद के लिए हर समय मरने-मारने को तैयार रहती है।' सुमित ने आंटी की असलियत सामने रखी तो जूही को संतोष हुआ।

'चल अब तुझे घर छोड़ दूँ।'

सुमित ने कहा तो यंत्रवत नोटों को मुट्ठी में दबाए जूही उठ खड़ी हुई।

'रैन बसेरा होटल एंड रिजॉर्ट'। बाहर निकलते ही उसकी निगाह वहाँ लगे बोर्ड पर पड़ी। होटल और रिजॉर्ट का मतलब ऑफिस तो बिल्कुल नहीं होता ये अब उसकी समझ में आया।

रास्ते भर सुमित की बातें और अपने स्वयं के विचार उसके मन में गड्ड-मड्ड होते रहे। कभी मुट्ठी में अब तक पसीजते नोटों का ध्यान आता तो कभी अपने घर की स्थिति का। वह ऐसा कर रही है क्या ऐसा उसके माता-पिता, भाई-बहनों को कभी पता न चलेगा। उसे लगा जैसे उन्हें सब कुछ पता चल गया है और सब के सब घृणा से उसकी ओर देख रहे हैं।

'मैंने तुझे अब तक कैसे बुरी नजरों से बचाए रखा यह मैं जानती हूँ लेकिन तूने! तूने ऐसा क्यों किया जूही?' माँ रो रही थी और भाई-बहन और पिता की आँखों में उसके लिए घृणा थी।

जूही चौंक उठी। खुली आँखों से देखा गया उसका से स्वप्न कभी भी हकीकत में बदल सकता था।

'मुझे यहीं छोड़ दो। बाजार से कुछ खरीदना है।' बस्ती से कुछ दूर पहले ही वह सुमित की गाड़ी से उतर गई।

सुमित मुस्करा दिया एक क्रूर बहेलिए की भाँति।

'कल बस्ती के बाहर इंतजार करूँगा तेरा।' कहकर उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी।

जूही कुछ देर वहीं खड़ी रही और फिर धीरे-धीरे अपनी बस्ती की ओर चल दी। मन में कई सवाल थे। एक मन कहता वो सुमित की बात मान ले और अपनी इस पाप की कमाई से अपने घरवालों अपने प्रियजनों के लिए एक स्वर्ग खरीद ले।

लेकिन दूसरा मन इसे मानने को तैयार न होता। गरीब घर की होते हुए भी माता-पिता ने बचपन से जिन संस्कारों को उसकी पीठ पर लाद दिया था उनसे मुँह मोड़ने का साहस न होता।

जूही अपनी ही धुन में बढ़ी जा रही थी कि उसने एक आदमी के चिल्लाने की आवाज सुनी। वह एक अधबनी इमारत के सामने खड़ी थी। कई मजदूर वहाँ काम कर रहे थे। एक महिला मजदूर अपनी अधफटी धोती से किसी तरह अपनी इज्जत को ढाँप भूख से बिलखते बच्चे को दूध पिलाने उठी ही थी कि ठेकेदार का आदमी चिल्ला पड़ा।

'तनख्वाह पूरी चाहिए तुझे और काम धेले भर का नहीं। जब देखो तब इस बच्चे को बहाना लेकर कामचोरी। कभी उसे दूध पिलाना है तो कभी इसकी बीमारी का बहाना।'

वह आदमी क्रोध से उस मजदूरन पर चिल्ला भी रहा था और साथ ही अजीब से नेत्रों से उसके उघड़ आए तन को भी घूर रहा था।

उसकी नजरों को भाँप मजदूरन ने घृणा से उस ओर थूक दिया और जूही को आज दिन में जो कुछ भी हुआ उसकी याद दिला गया।

'साला, चोट्टा कहीं का।' मजदूरन ने उसे एक भद्दी गाली दी।

'इसको अपना सब कुछ दे दूँ तो बिना काम के तनख्वाह दे दे ये मुझे। इसके बस में न आई मैं तो इतनी मेहनत के बाद इस रोते से बालक को दूध भी नहीं पिलाने देता।' और उसने बच्चे को स्तन से हटा फिर तसला उठा लिया।

यह सुनकर तो जूही की जैसे सारी दुविधा ही दूर हो गई। अनपढ़ मजदूरन, जिसका पति भी शायद यहीं कहीं मजदूरी कर रहा होगा। अपने साथ होने वाले किसी अन्याय की शिकायत भी कहाँ करे वह बेचारी। लेकिन फिर भी अपना सम्मान बचा कर ठेकेदार की ज्यादतियाँ सहन कर रही है।

वह चाहती तो ठेकेदार की इच्छा पूरी कर आराम की जिंदगी जी सकती थी। काम भी न करना पड़ता और बच्चे को भी ढंग से पाल पाती। लेकिन उसने यह रास्ता न चुना। समाज के अत्यंत निचले व साधनहीन तबके से होते हुए भी अपना सम्मान बचाए हुए है। मजदूरी भी कर रही है तो सिर उठाकर। तो फिर वह ऐसा क्यों नहीं कर सकती?

वह तो दसवीं पास है। आंटी के यहाँ सम्मानजनक नौकरी भी कर रही है। सुमित ने इतना तो किया ही है कि उसे कंप्यूटर पर उँगली चलाना तो सिखा ही दिया है। वह और मेहनत कर सकती है। कहीं टाइपिंग करेगी, कुछ भी करेगी लेकिन जो सुमित चाहता है वह हरगिज नहीं करेगी।

मन के सारे भ्रम दूर हो चुके थे। यों तो संध्या का वक्त था लेकिन जूही के जीवन में नई सुबह के उजाले ने प्रवेश किया था। मुट्ठी में बंद पैसे उसने उसी मजदूर औरत के हाथ में थमाए और तेजी से वहाँ से निकल पड़ी।

घर जाने की बजाय उसने निम्मो आंटी के घर की राह पकड़ी। उनके साथ पुलिस थाने जाकर सुमित को सबक भी तो सिखाना था ताकि वह किसी और जूही को कुचलने की, मसलने की हिम्मत न कर सके।


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