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कहानी

गिल्टी रोजेस
चित्रा मुद्गल


वह नागपुर के केंद्रीय कारागार में सोलह अक्टूबर उन्नीस सौ बयालीस की सुबह थी। कुछ बीती सुबहों से अलग-डग भरती नरम धूप में आँच छींटती!

मुंबई से चले थे तो उम्मीद ने सहलाया था कि वर्षा के बाद भी मुंबई के मौसम को धरे बैठी अक्टूबर की उमस और चिलचिली से नागपुर मुक्त होगा। नागपुर पहुँचकर भी भ्रम बना रहा। कविकुलशिरोमणि कालिदास के संदेशवाहक मेघदूत अब तक डेरा जमाए हुए हैं।

नागपुर के केंद्रीय कारागार के अधीक्षक चौधरी साहब से मिलवाया था 'ऑब्जेक्शन ओवररूल्ड' लघु उपन्यास की वकील लेखिका अलका आर्य ने, जिनसे मेरी भेंट नागपुर के एमेच्योर आर्टिस्ट एसोसिएशन द्वारा आयोजित अखिल भारतीय नाट्य स्पर्द्धा में संयोग से हुई थी। हमारी आवभगत की जिम्मेदारी अलका के कंधों पर ही थी। उसके वकील होने के परिचय ने सहूलियत को सांध दी। अलका ने यह भी बताया कि नागपुर के केंद्रीय कारागार में दंड भोग रही तीन महिला कैदियों के मुकदमे वह स्वयं लड़ रही है, बलात्कार संबंधी कानून-भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 376 के अंतर्गत। मेरी हताशा को उसने परे धकेला - चौधरी साहब ने आपके पत्र का अनुकूल जवाब नहीं दिया तो क्या हुआ, मैं मिलवाऊँगी आपको आजीवन कारावास प्राप्त महिला बंदिनी से।

नाटक संध्या को देखने होते थे। दिन में फुर्सत थी। तय हुआ, कल सुबह हम ठीक नौ बजे अलका को तैयार मिलें। चौधरी साहब से उसकी बात हो गई है। चर्चा के दौरान उन्होंने स्वीकार किया है कि उन्हें मेरा पत्र मिला था, जिसमें मैंने अपनी नागपुर यात्रा के दौरान आजीवन कारावास या मृत्युदंड-प्राप्त किसी महिला बंदिनी से मिलने की इच्छा प्रकट की थी। बात उतनी सहज नहीं थी, इसलिए उन्होंने तवज्जो नहीं दी।

नाट्य समारोह में हम चार महिलाएँ बतौर निर्णायक आमंत्रित थीं। गुजरात से उर्मिला भट्ट, दिल्ली से इंदुजा अवस्थी, मुंबई से विविध भारती की कार्यक्रम निर्माता अनुराधा शर्मा और मैं। इंदुजा अवस्थी इच्छा होते हुए भी किसी कारणवश हमारे साथ न आ सकीं।

कारागार के विशाल प्रवेशद्वार के बाएँ पल्ले पर जड़ी खिड़कीनुमा चौखट के भीतर पाँव देते ही लगा कि यह भारत की आम जेलों जैसी नहीं है। अपेक्षित परिवेश के ठीक उलट वातावरण। एकाएक लगा कि हम जैसे किसी हस्तशिल्प प्रशिक्षण केंद्र में आ गए हों। छोटे-छोटे समूहों में विभक्त पुरुष कैदी कहीं दरियाँ बुनने में संलग्न थे, तो कहीं पायदान, टोकरियाँ, चटाइयाँ। महिला वार्ड में कुछ बंदिनियाँ अखबारों की रद्दी से लिफाफे बना रही थीं, तो कुछ पुरुष कैदियों की ही भाँति दरियाँ, पायदान आदि बुनने में जुटी हुई थीं। सूती पायदानों में आकर्षक फूल-पत्तियों की कारीगरी देखते ही बनती थी। यह कारागार अधीक्षक एस.पी. चौधरी की स्वस्थ सोच, मानवीय सहानुभूति और सृजनशील कर्तव्य-भावना का परिणाम था।

चौधरी साहब से हमारी आँखों का कौतूहल छिपा न रहा। उत्साह से भरकर वे बताने लगे कि रचनात्मकता कैदियों को आत्मनिर्भर ही नहीं बनाती, बल्कि मनोचिकित्सक की भाँति अपराधी मनोवृत्ति को बदलने और सहज मानवीय मनोवृत्ति को परिष्कृत करने का काम भी करती है लेकिन जघन्य अपराधियों को कड़ी निगरानी के बावजूद इस तरह खुले में नहीं रखा जा सकता। उन्हें हम उनकी कोठरियों में ही कागज-कलम मुहैया कराते हैं। उनसे आग्रह करते हैं कि वे अपने अंतर्द्वंद्व को कविता या गद्य के रूप में अभिव्यक्ति दें। अनपढ़ कैदियों को ड्राइंग पेपर पर रंगों और रेखाओं से जो जी में आए, बनाने की प्रेरणा देते हैं और फिर समस्त सामग्री एकत्र कर हम उसे हस्तलिखित पत्रिका का रूप देते हैं। पत्रिका दिखाएँगे हम आपको। पत्रिका की जिल्द तक कैदियों ने ही बांधी है, खूब सजा-सँवारकर।

''आपकी लेखनी ने बहुत-से दिलों के कोने टटोले होंगे लेकिन इनके सच को इनके अलावा कोई और नहीं छू सकता - '' संग-संग डग भरते हुए चौधरी साहब अचानक किसी खोह में दाखिल हो गए से लगे।

गलत नहीं कहा था चौधरी साहब ने।

पौने दो घंटे की कारागार-परिक्रमा के उपरांत हम जिस अंधी सुंरग में दाखिल हुए थे, लगा था कि उससे बाहर निकलने को कोई दरवाजा बना ही नहीं है।

अनुभवों के खुरदरे अध्यायों में सहसा काले आँसुओं से तर अनगिनत काले पृष्ठ आ जुड़े, जिनकी कचोटती कालिख पृष्ठ छूते ही उँगलियों में ताजे लहू-सी आज भी छलछला आती है।

दुस्वप्न की कुरूप विसंगतियों की आर्त आत्माएँ मेरी चेतना में जब-तब अपनी लटकी गर्दनें तानने लगती हैं, और मैं छूटता साहस सँजो, अपनी अभिव्यक्ति में उनके ठौर-ठिकाने तलाशती, कागजों पर पछाड़ें खाने लगती हूँ - कहाँ बैठाऊँ उन्हें!

जीवित मौत-सी दुखना मेरे सामने बैठी हुई थी - आठ-दस औरतों के गोल में, कंडों के उन्नत बिटौरे-से ऊँचे हो रहे कटी सब्जियों के ढेर के किनारे, उन्हीं के संग सब्जियाँ काटते हुए।

मेरी जिज्ञासा से जुड़ते ही दुखना के सूखे, पपड़ियाए होंठों पर फीकी मुस्कान ने डेरा जमाया। जेल की रामरसोई के लिए उनका यह रोज का कार्यक्रम है। ये ताजी सब्जियाँ थोक में सब्जीमंडी से नहीं आईं बल्कि जेल की तरकारी बाड़ी में उगाई गई हैं। अपने श्रम-बिंदुओं से सींचा है इन्हें कैदियों ने। मस्तिष्क में प्रश्न फनफनाए - किन हाथों का खोट है, जिन्होंने समाज-विकास में लगने वाले इन हाथों को विवश कर दिया तमंचे और लपलपाते छुरे पकड़ने को?

चौधरी साहब ने बताया, उम्र अधिक नहीं है दुखना की। सपनों में पींगें भरने की इंद्रधनुषी वय में वह जेल भेज दी गई दंड भोगने। भागलपुर की है। तबादला होते-होते यहाँ आ गई। निम्न वर्ग की महिलाओं के लिए समर्पित उसके जिले की एक राजनीतिक कार्यकर्ता की गुहार और कानूनी प्रयत्नों के बूते उसे आजीवन कारावास के दंड में कुछ वर्षों की रियायत मिल गई है।

बगल में आ बैठी भग्न कंदील-सी काठी में तीलियों का ढाँचा मात्र बनी हुई दुखना, चौधरी साहब के कथन को झुठलाती पचास से कम की नहीं लग रही थी।

बहुत उकसाने पर जबान खोली दुखना ने।

''हमने, सौत की पाँच औलादों में से बच रहे इकलौते जवान बेटवा को छुरा भोंक मार दिया। न भोंकते तो उस जल्लाद से अपनी लाज-लज्जा कैसे बचाते? भरी दोपहरी वो हमको कोठरी में खींच, साँकल चढ़ा, भूमि पर पटक दिया, छूटने को छटपटाते हम चीखते-चिल्लाते रहे। कोऊ न सुना। सुनते काहे! सौत और ससुर की शह थी उसको। पहली बेर क्षमा कर दिए। दूजी-तीजी बेर की जबरई पर गम खाके मुँह सी लिए। समझाए - रिश्ते में हम तेरी महतारी हुए। तेर बाप की दूसरी ब्याही। तेरी महतारी से लौ-लगाव नहीं था, सो हमसे सात फेरे लिए तेरे बाप ने। हमारा दोष? तेरी महतारी तो मुझे छोड़ दूसरे को जा बैठी थी। बिरादरी को खाना-पानी दे बाप और उसमें छुट्टा-छुट्टी भी हो गई थी। लौट के आई है तो मालकिन बनी हुई है। देहरी तो मरद की दया की खातिर न! काहे को कि छिनार उसकी इकलौती औलाद की महतारी जो ठहरी। जिस पल जी उचटा मरद का, निकाल फेंकेगा तेरी माई को। छिमा करेगा तेरी करतूतों को? मगर कौनों फरक नहीं पड़ा हरजाई के बेटवा पर। रँडुए ससुर और सौत की लगा-लगी का खेल जो ठहरा। मंशा थी उनकी हमको घर से बाहर निकाल फिंकवाने की। चाह-दुलार करने वाले मरद की नजर में नीचे गिराने की। छिनार सिद्ध करने की। हमको निकलवा दोबारा घर की मालकिन बनने की। हमारे घर में डोलते रँडुए ससुर से उसकी लगा-लगी तो कैसे चले! सो, हम थे उनकी आँख की किरकिरी। बेटवा का क्या! सौ कतल करके भी बेटवा बेटवा ही रहेगा। उसको त्यागना मरद के बूते का नहीं, हार-थक के।''

सहसा दुखना का स्वर भर्रा आया। अनुराधा ने ममता से उमग, पीठ सहला ढाँढ़स बँधाया मगर बाँध अरराते आवेग को सँभाल नहीं पाया।

''लाज-लज्जा बचाने को, हम अपनी ही घिंचई हँसुए से काहे न रेत लिए - '' हिचकियों के प्रवाह में ग्लानि ऊभ-चुभ होने लगी।

कुछ पल उपरांत वह स्वयमेव संयत हुई।

''नई धार कराके आया हँसुआ कोठरी में एक और लगी भड़ियों के पीछे लुका दिया। जैसे ही बेटवा ने भूमि पर हमको पटकने की कोशिश किया, धमकाया उसको, 'लौटने दे बाप को खेत से। न तेरी जल्लादई का भांडा फोड़ा आज तो हमको कहना। रह नहीं पाओगे फिर माई-बेटवा इस घर में - ' जबर बेअसर हँसा, 'तेरी चुगली का कोई असर नहीं होने वाला। बाप के कान पहले ही भरे जा चुके हैं कि तू छिनार कितनी भूखी-पियासी है। इस उमर में तू उसके बूते की नहीं। अकेले मुझे ही नहीं फँसा रखा, टोले में और भी हैं तेरी चाह के संठे-गंठे। गाँव का गाँव थू-थू कर रहा है तुझपे। गनीमत मना और सटक ले नैहर, वरना ऐसी दुर्गति करवाऊँगा कि मुझे छोड़ दस और चढ़ेंगे तुझ पर -'

''बस, झेला नहीं गया - बिजली की फुर्ती से हँसुआ उठाया और जब तक वो सँभले, रेत के धर दी हरामी की गटई। कबूल लिए जुर्म पुलिस-दरोगा के सामने, जवान-जहीन बेटवा खोके मरद होश खो बैठा। पुलिस-दरोगा के सामने ही हमको लात-घूँसों से हनिया-हनिया के रौंदा, 'हरामिन, अपने को सती-साबितरी सिद्ध करने की तूने इतनी बड़ी कीमत वसूली, वंश नाश कर दिया हमरा - '

''पाँच साल कट गए, दो बाकी हैं, इत्ती कम सजा काहे हुई हमें। इन सलाखन के बाहर की दुनिया हमरे रहने लायक नहीं है। पाँच बरस में भूले-बिसरे एक दफे बापू आए मिलने। बोल गए कि तेरा मरद बदले की आग से भरा तुझे रेतने को फन्नाया घूम रहा है। तू जेहल काट बाहर आई नहीं कि, कहत रहा कि बदचलन ने बेटवा का मुँह बंद करने के लिए उसके प्राण ले लिए। निरवंशी बना दिया हमको।

''माई और बहन-भाइयों को देखने को जी हुड़कता है, तो चौधरी साहब तसल्ली देते हैं, 'भगवान की पत्थर की मूरत को तू भगवान मानती है न! तू मानती है दुखना, तो मूरत भगवान है। मुझे अपना बाप मान ले।'

''चौधरी साहब ने आस दी है कि कोशिश करेंगे वो हमारी खातिर कि सजा खत्म होते ही जेहल में हमारी नौकरी लग जाए - ''

''जेहल नहीं छोड़ना चाहते हम, असली जेहल छोड़ आए हैं।''

मैंने उसे अपना और शालिनी ताई का पता लिखकर थमा दिया। कारावास खत्म होने पर दुखना अगर मुंबई में रहने का मन बनाए तो मुझे या ताई को पत्र डलवा दे। उषा नगर, भांडुप में विधवा शालिनी ताई के अपने छोटे-से फ्लैट में 'माँ का घर' आश्रम है। कुछ दिनों अपने पास रखकर हमारा प्रयास होता है कि शोषितों को अच्छे घरों में सेवा-टहल की नौकरी मिल जाए। बाकायदा लिखत-पढ़त के साथ। दुर्व्यवहार की शिकायत मिलते ही संबंधित परिवार को चेतावनी दी जाती है या शोषिता को नौकरी से हटा लिया जाता है। विज्ञापनों के माध्यम से जरूरतमंद विधुरों के संग विवाह का भी उपक्रम होता है। उम्मीद से अधिक सफलता अर्जित हो रही है शोषिताओं के पुनर्वास कार्यक्रम में। अपनी सामर्थ्य और सीमा में शालिनी ताई का निजी प्रयत्न है। जरूरत पड़ने पर ताई हमारे घरों को भी आसरे के लिए उपयोग करने में नहीं हिचकिचातीं।

चित्त अस्थिर हो उठा। कानूनी दाँव-पेंचों के लचीलेपन में कब तक स्त्री अन्याय और अविश्वासजन्य दमन की पात्र बनती रहेगी? विकल्पहीनता की स्थिति में आत्मरक्षा के लिए उठाया गया कदम क्या उतना ही संगीन जुर्म है, जितना स्त्री के साथ किया गया बलात्कार? महिला अपराधियों के लिए दंडविधान के तहत सरकार ने सींखचों की व्यवस्था तो की है किंतु क्या इस विवेचना की आवश्यकता कभी महसूस की या कर रही है दोहरे मानदंडों और मूल्यों से भरे भारतीय दकियानूसी समाज में जबरन लांछित स्त्री के लिए क्या कोई वापसी की राह है? दुखना का दोष इतना-भर है कि अपने संग हुई जबरई को उसे पहले दिन ही उजागर कर देने का साहस सँजोना चाहिए था। नहीं सँजो पाई तो शायद लोक-मर्यादाओं के शील-संकोच के कारण। उस पवित्रतम रिश्ते के कारण, जिसके निरंतर बढ़ते दमन ने उसकी सहिष्णुता को अंततः प्रतिहिंसी प्रतिवाद में बदल दिया।

गुनाबाई भी आजीवन कारावास प्राप्त कैदी थीं - कैदी नंबर एक सौ बयासी, जिनके मृत्युदंड को संभवतः उनके स्त्री होने की वजह से आजीवन कारावास में परिवर्तित कर देने की उदारता बरती गई थी। ढूह समान ऊँची जमीन के एक वृहत वृत्ताकार हिस्से में, सुर्ख गुलाबों की लहलहाई क्यारियों में खुरपी लिए खाद छींटती दिखीं गुनाबाई। सुर्ख गुलाबों की सघनाहट के बीच लगी ऊँची तख्ती पर लिखे हुए शब्दों ने एकबारगी चौंकाया -'गिल्टी रोजेज'।

''गिल्टी रोजेज?'' मैंने साभिप्राय चौधरी साहब की ओर देखा।

''यही जवाब देंगी?'' खुरपी और खाद की थैली छोड़, नजरें झुकाएँ उठ खड़ी हुईं गुनाबाई की और संकेत किया उन्होंने, ''शायद ये आपके प्रश्न का जवाब न भी दे पाएँ, मगर इनकी विदारक अंतर्कथा का मर्म 'गिल्टी रोजेज' को अवश्य परिभाषित करेगा।''

पलस्टर उधड़ी-सी साँवली कृशकाय देह के बावजूद सिर पर सनई-से सफेद बालों ने किसी तपस्विनी से अनायास भेंट हो जाने की-सी सात्विक ऊष्मा से भर दिया।

''ये सुर्ख गुलाब गुनाबाई ने उगाए हैं। इतने बड़े आकार के सुर्ख गुलाब नागपुर में कहीं अन्यत्र नहीं दिखाई देंगे।'' अपनी स्थापना की प्रामाणिकता के लिए चौधरी साहब ने अलका की ओर देखा।

''सही है।'' अलका ने उनसे सहमति जताई। ''मौसम की नरमी-गरमी से बेअसर इन सुर्ख गुलाबों की क्यारियाँ सदैव लहलहाती रहती हैं। गुनाबाई के ममत्व का आँचल जो है इनके सिर पर!''

चौधरी साहब ने ललक से भरकर बताया - शहर में जब भी किसी बच्ची का जन्मदिन होता है, माँ-बाप विशेष रूप से अपनी बच्ची के लिए बतौर शुभकामना 'गिल्टी रोजेज' का गुलदस्ता मँगवाते हैं। गुलदस्ता बड़े चाव से गुनाबाई अपने हाथों से बनाती है। एक-एक पंखुरी को हृदय से आशीषती है।

अपनी अनुपस्थिति से गुनाबाई के संकोच को तोड़ने की मंशा से चौधरी साहब उसके पास हमें अकेला छोड़ अपने कार्यालय की ओर चल दिए।

नौवारी धोती की लांग कसे, घुटनों में मुँह गड़ाए तपस्विनी विषम अतीत की कुरूप विडंबनाओं की तहें खोलते सिसकियों में डूब गई। भूडोल की दहशतजदा तरंगें छू गईं हमारी जिज्ञासा को। बड़ी कठिनाई से ढाँढ़स के शब्दों ने उससे नाता जोड़ा। प्रकृतिस्थ होने की चेष्टा में उसने हृदय के विचलन को स्वयं संयत किया।

गुलाबों में सुर्खी और इतनी गाढ़ी सुर्खी गुलाबों की अपनी नहीं थी, गुनाबाई की सूखी पसलियों में खुदे जख्मों का ताजा लहू सिंचा हुआ था उनकी पंखुरियों में!

नासिक में रहने वाली गुनाबाई घरों में रसोई बना, चौका-बासन कर गुजर-बसर करती थी। किशोरी से युवा हो रही उसकी बड़ी बेटी छठे दर्जे में पढ़ रही थी। उससे छोटी जुड़वा बेटियाँ नगरपालिका की पाठशाला में दूसरे दर्जे में पढ़ती थीं। गुनाबाई का पति कभी क्लीनर रहा था पर अब बिल्कुल निठल्ला और दारुड़िया हो गया था। गुनाबाई उससे इस बात के लिए झींकती-लड़ती रहती कि अब वह गुनाबाई की अनुपस्थिति में जुआरी-शराबी ठेला-ड्राइवरों को लेकर घर न आया करे और न उनके संग बैठ, बच्चियों के सामने दारू पीते हुए ताश-पत्ती खेला करे। पहले जो चल जाता था, अब नहीं चल सकता। बड़ी बेटी जवानी की दहलीज पर पाँव रख चुकी है। जुड़वा बेटियाँ सयानी होने की डगर पर हैं। मेहनत-मशक्कत से वह उन्हें पढ़ा-लिखाकर आत्मनिर्भर बनाने का सपना देख रही हैं। क्या असर होगा उन पर बाप की उच्छृंखलताओं का?

गुनाबाई की यह मुँहजोरी! वह भी अड्डेबाज दोस्तों के सामने? आगबबूला पति ने उनके सामने ही उसे लात-घूसों से रौंदना शुरू कर दिया। माँ को पिटता देख भयभीत बच्चियों की घिग्घी बँध जाती। बीच-बचाव के लिए वे पड़ोसियों को बुला लातीं।

एक दोपहरी पति गुनाबाई से बोला कि उसका हितचिंतक दोस्त चिखल कह रहा था, 'तू खोपड़ी से गटर साआल्ला पाई-पाई को तरस रहा है। क्यों? अरे, जो कर सकता है वो धंधा तो कर! अपनी बड़ी बेटी को कॉलगर्ल बना। मैं होटल में गिराहक दिलाएगा। उसकी किल्लती नहीं होने की तेरे को। मेरा जिम्मा। तेरी खूबसूरत कमसिन छोकरी दिन में एक गिराहक भी निबटाएगी तो अक्खा घर की जिंदगी ऐशो-आराम से कटने की। बोल, क्या बोल रहा?'

क्रोध से काँपती गुनाबाई ने पति का मुँह नोच लिया, 'तू बाप है कि दल्ला? चिखल के मुँह पे जाके मूत। बोल उसको, अपनी छोकरी को ले जाके बैठा दे कोठे पे। रोटी मिलती न तेरे को? दारू पीने को मिलती है न? और क्या चाहिए तेरे को? मांस पका के खाएगा तू छोकरियों का?'

एक शाम गुनाबाई टहल से घर लौटी तो बड़ी बेटी को चटाई पर बेहाल पड़े पाया। मुट्ठी में पचास-पचास के तीन नोट खुँसे हुए थे। सहमी हुई दोनों जुड़वा बेटियों ने बताया कि बाप ताई (दीदी) को टैक्सी में बिठा के किदर को ले गया होता। चिखल भाऊ बाप के साथ होते।

''खुद किदर गया?''

छोटी बेटियाँ निरुत्तर हो गईं। बड़ी ने हिचकियाँ तोड़ते हुए अपने संग हुई अमानवीयता बयान की। यह भी बताया कि बाप ने मिले रुपयों में से डेढ़ सौ खुद ले लिए। मुर्गे और दारू की दावत उड़ाने चिखल भाऊ के संग किसी अड्डे पर गया है।

उस रात गुनाबाई शतरंजी पर लेटी तो दिमाग में द्वंद्व की आरियाँ-सी चलने लगीं। क्यों ईश्वर ने उसे बेटियाँ दीं? एक नहीं, तीन-तीन! कैसे होगी उनकी रक्षा? कोठे पर पहुँचे बिना रह पाएँगी क्या? जब अपना बाप ही उनकी अस्मत की दलाली पर उतर आया हो? उस भड़वे का बस चलता तो वह उसे भी चकला खोलने को बाध्य कर देता। डरता था उसके चचेरे भाई रमाकांत से। रमाकांत ने ही उसे डरा-धमका रखा था कि वह उसकी बहन के साथ कायदे से रहे। अपने हाथ-पैरों की खुजली काबू में रखे, वरना वह उसके हाथ-पैर बंबू-सा तोड़कर गटर में फेंक देगा। रमाकांत भाऊ गाँव गया था पिछली बारिश में। उफनती गोदावरी में नाव उलट गई। भतीजे को बचाने के पीछे अपने प्राण भी गँवा बैठा। दोनों ही नहीं बचे।

पति की ज्यादतियाँ सहती-झेलती चली आई तो बस इस इंतजार में कि उसकी बेटियाँ पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर हो जाएँ तो उसकी नियति बदल जाए। बदल सकती है उसकी नियति? लेकिन पति के जीवित रहते तो कदापि नहीं। कितना लड़ेगी वह? कब तक लड़ेगी? आज उस दुस्साहसी ने बड़ी बेटी की देह की कमाई खाई है। मुँह में खून लग गया, छोटी बेटियाँ बच पाएँगी क्या?

एक उपाय है नरक से सदैव के लिए मुक्ति पाने का। दो रोज पहले ही वह राशनकार्ड पर मिट्टी का तेल छुड़ाकर लाई है। पीपा भरा रखा है। शतरंजी पर पड़ी सो रही लड़कियों पर इसे उँड़ेल माचिस की तीली दिखा दे और पीपे के शेष तेल को अपने ऊपर उँड़ेल खतम करे कहानी?

तीली लगते ही भभकी लपटों में बिलबिलाती-चीखती बच्चियाँ उसकी ओर दौड़ीं। तब कहीं जाकर उसे होश आया। कैसा अनर्थ कर बैठी वह! लपटों से घिरी वह बचाव के लिए दरवाजा खोल बाहर आई। आर्त स्वर में पड़ोसियों को गुहारा उसने। बदहवास, भौंचक पड़ोसियों ने उन पर ही पानी नहीं उलीचा, घर को भी आग लगने से बचाया, वरना क्या उनके अपने घर सुरक्षित रह पाते?

अस्पताल में तीनों बच्चियाँ एक हफ्ता भी नहीं निकाल पाईं। बच गई अभिशाप-सी केवल वह। पुलिस के सामने ही नहीं, कोर्ट में भी उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया -अपनी तीनों मासूम बेटियों की उसने जान-बूझकर हत्या की क्यों की यह वह नहीं बताना चाहती। वह स्वीकारती है कि उसने जो किया, गलत किया मगर यह भी मानती है कि अगर बच्चियाँ बच जातीं तो शायद भावुकता छोड़कर वह उनकी दोबारा हत्या कर देती। यह समाज उसे उनके रहने लायक नहीं लगता -

कड़ी निगरानी के बावजूद जेल की कोठरी में सिर पटक-पटक कई बार गुनाबाई ने अपने प्राण लेने चाहे। एक बार तो उनके फटे माथे पर सोलह टाँके आए।

गुनाबाई ने खड़े होकर कमर पर से नौवारी धोती का पल्ला हटा, आगे-पीछे से बुरी तरह से जली हुई कमर दिखाई, ''येऽऽ मेरी जुड़वा बेटियों की, जलती हुई नन्ही बाजुओं से जली हुई चमड़ी है।'' कंठ अवरुद्ध हो आया गुनाबाई का, ''आकर मेरी कमर से लिपट गई थीं। माँ बचा लेगी उन्हें, उन्हें क्या पता - ''

घुटनों में औंधा गुनाबाई का चेहरा पश्चाताप और दुख से गल रहा था बूँद-बूँद।

चौधरी साहब ने गुनाबाई को पश्चाताप की अग्नि में तिल-तिल जलते-छटपटाते देखा तो उन्हें मृत्यु से जीवन की ओर लौटा लाने के लिए संकल्पबद्ध हो उठे। उन्होंने एक सुझाव दिया - कारागार की अन्य महिला बंदिनियों के संग गुनाबाई दरी-पायदान न बुने, सुर्ख गुलाब उगाए। मदद करेंगे वे उसकी। जेल में जमीन का एक टुकड़ा मुहैया करवाएँगे। प्रशिक्षित करेगा जेल का माली। बताएगा उन्हें कि पौधों को कैसे सेया-पाला जाता है। टहनियों पर फिर-फिर खिलते सुर्ख गुलाब उसकी स्वर्गवासी बेटियों-से फिर-फिर जनमेंगे। उनके हाथों सजेंगे-सँवरेंगे।

चौधरी साहब ने अपनी अवकाश-प्राप्ति की सूचना देते हुए कुछ बरस पहले लिखा था कि यरवदा जेल में उनके स्थानांतरण से पूर्व ही 'प्लूरिसी' के चलते गुनाबाई बच नहीं पाई, दुखना नागपुर के ही एक स्कूल में विद्यार्थियों को पानी पिलाने की नौकरी पर है।

नागपुर के केंद्रीय कारागार में शायद अब भी 'गिल्टी रोजेज' की क्यारियाँ हों। नहीं होंगी तो बस, उन पर अपनी छाँह धरे तपस्विनी गुनाबाई! अनुत्तरित प्रश्न आज भी कलेजे में खदबदाता है - क्या सचमुच गुनाबाई हमारे बीच से उठ गई है? क्या खत्म हो गई उनके साथ ही उनकी करुण कहानी? जब भी डायरी के पन्ने पलट संकल्पबद्ध हो 'गिल्टी रोजेज' कहानी लिखने के लिए बैठती हूँ, गुनाबाई के हाथ आहिस्ता से मेरी कलाई धर लेते हैं, 'क्यों मजाक कर रही हैं, मेमसाब! सच को तुम कहानी बनाने जा रही हो?'


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