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कविता

लगता है कि जैसे
पंकज चतुर्वेदी


एक मीठे स्वीकार से अनुप्राणित
उस मिलने के बाद
यह छूँछा बिछोह
यह सूनी-सूनी-सी
निष्फल होती-सी लगती
असंगत-सी बेचैनी
अनधिकृत-सी प्रतीक्षा

लगता है कि जैसे
मैं तुम्हारे घर आया हूँ
और तुम
दरवाज़ों को खुला छोड़कर
न जाने कहाँ चली गई हो


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