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कविता

भीमबेटका
लीना मल्होत्रा राव


कभी 'भीमबेटका' गए हैं आप
इन गुफाओं के अँधेरे,
रहस्य की चादर ओढ़े
आप की प्रतीक्षा कर रहे हैं
बस
एक ही कदम दूर रखे हैं यहाँ दस लाख वर्ष !

गाइड चंद्रशेखर दिखाता है कई चित्र लाल और सफेद रंगों के
एक हिरन
जीवन और मृत्यु के संधि पल पर टिका
पीछे मुड़ कर देख रहा है दस लाख वर्ष से

एक आदमी हाथ में भाला लिए अपने शिकार का पीछा कर रहा है

एक घोडा
अपनी दोनों टाँगें हवा में उठाए
अगली सभ्यता में छलाँग लगाने को आतुर है
दस लाख वर्ष से

कुछ लोग त्रिभुजाकार उदर लिए,
मृदंग और ढोलक पर भूख का उत्सव मना रहे हैं

दस लाख वर्ष बाद
कुछ पर्यटक अचंभे की आँखें फाड़े
उस पीड़ा को ढूँढ़ रहे हैं जिसके रंग में कूँची डुबो
चित्रकार ने भविष्य का ऐसा चित्र बनाया, जो कभी अतीत नहीं हुआ
इन्हीं पर्यटकों में मैं भी शामिल हूँ

जमीन पर एक वृत्त खींच दिया गया है
चंद्रशेखर गाइड उसके भीतर बुलाता है

- यहाँ से देखिए खुला हुआ बाघ का जबड़ा
जबड़े के भीतर बने चित्र
मैं देखती हूँ बाघ के जबड़े में टिकी निडर सभ्यता को
जो अपने सहजीवियों के साथ संतुलन में है
एक कछुआ है क्षितिज के पार कुछ खोजता हुआ
एक स्त्री की आकृति है
जिसके धड़ पर सर रखा है
जो न की मुद्रा में हिलते ही टूट कर गिर पड़ेगा
मुझे लगता है ये शिलाएँ नहीं हठयोगी हैं
अपने तप में लीन
कुछ प्रश्नों के उत्तर खोजते हुए

इन गुफाओं की दीवारों पर कुछ प्यालेनुमा गड्ढे हैं
गाइड बताता है यह अवनल हैं इन्हें हवा और पानी ने काट कर बनाया है
मैं उसे स्पर्श करती हूँ
तभी अवनलों में बसी बूढ़ी पीड़ा अपनी आँखें खोल देती है
उसकी पीड़ा में अपनों से ही आघात पाने का मर्म है
जो उसे दस लाख वर्ष से जीवित रखे हुए है

अब हम एक रिक्त सभा कक्ष में आते हैं
जिसके मध्य में एक ऊँचा पत्थर रखा है
चंद्रशेखर बताता है यह राजा के बैठने का स्थान था
संभवतः यहीं पर बैठकर राजा अपनी सेनाओं को निर्देश देता था

बैठिए बैठ कर देखिए
मैं उस दस लाख वर्ष पुराने पत्थर पर बैठती हूँ

अब मैं राजा हूँ
सत्तावान
मेरे सामने अब अक्षौहिणी सेना है
जिसे मैं कहता हूँ
जाओ, द्रौपदी को बाल से पकड़ कर सभाकक्ष में खींच कर ले आओ
यही भरी सभा में उसे नंगा कर दो
जाओ इशरत जहाँ को मार कर उसके शव के हाथ में बंदूक रख दो
जाओ
सीरिया के तेल के नीचे दबे जैविक हथियार नष्ट कर दो
मेरी बड़बड़ाहट सुन कर चंद्रशेखर मुझे झिंझोड़ता है

मैं हड़बड़ा कर अपने सत्तावान होने पर शर्मिंदगी से उठ खड़ी होती हूँ

लौटते हुए मेरी नजर एक फूलदान के चित्र पर पड़ती है
जिसमें से एक फूल दस लाख वर्ष से सजा हुआ झाँक रहा है
और मुरझाया नहीं है


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