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कहानी

नए मनसबदार
देवेंद्र चौबे


छोटे मियाँ अब नहीं रहे। गाँव छोड़कर चले गए। सुबह होते ही यह खबर लुत्ती की तरह पूरे गाँव में फैल गई। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि छोटे मियाँ भी ऐसा कर सकते है! जिस गाँव ने उनके पूर्वज महताब खान को 1764 की लड़ाई के बाद गाँव में बसाया था तथा जिनकी पाँच पीढ़ियाँ इस गाँव में रहती आई थी, उसके एक बुजुर्ग का अचानक गाँव छोड़कर जाना, किसी की समझ में नहीं आया! कितना प्यार था उनको इस मिट्टी और यहाँ के पानी से। कहते नहीं थकते थे कि इस गाँव की मिट्टी में न जाने क्या है कि उनके अब्बा हुजूर सन 47 में भी गाँव छोड़कर नहीं गए। पर, अचानक यह क्या हुआ कि छोटे मियाँ को गाँव छोड़कर जाना पड़ा? किसी ने उनसे कुछ कहा, या उस जलसे के सदमे से अब तक उबर नहीं पाए थे? आखिर, हुआ क्या था? लोग समझ नहीं पा रहे थे!

पूरा गाँव सन्न था! एकदम अवाक!! अब क्या होगा? लोग डरे हुए थे। क्या उनकी खोज में गाँव में पुलिस आएगी? कोर्ट-कचहरी होगा? कुत्ते-सियार नाचेंगे? टिटहरियाँ टिटियाएँगी? क्या होगा, अब? किसे बांधकर ले जाएगी पुलिस? पूरे गाँव में यही चर्चा हो रही थी। जिसे देखो वही किसी अनहोनी से आशंकित था।

"करीमन गोड़?"

"उसे क्यों?" उस दिन सुबह चाय की दुकान पर महेश चौधरी के मुँह से करीमन गोड़ का नाम सुनकर माधो पांडे भड़क गए थे, "उसे क्यों पुलिस पकड़ कर ले जाएगी? किया क्या है, उसने कि आपने करीमन का नाम ले लिया?" उनका माथा गरम होने लगा था, "आपने समझ क्या रखा है, गाँव को? मूरख? क्या अब आप जो चाहेंगे, वही होगा? जब से नई सरकार के आने की चर्चा है, तबसे आप सबने गाँव में गदर मचा रखा है!"

"आप भड़क क्यों रहे है, माधो?" महेश चौधरी ने तेज आवाज में कहा था, "आप नई सरकार का नाम मत लीजिए! जब आएगी, तब आपको उसका काम दिखाई देगा! और, क्या आपने पूरे गाँव का ठेका ले रखा है? यह कहिए कि हमारी पार्टी ने आपको गिरने से बचा लिया, नहीं तो बाल-बच्चे भीख माँगते नजर आते! कम-से-कम इज्जत तो बच रही है। भूल गए, जब पिछले साल कैसे आपके जुलूस को सरकारी पार्टी के लोगों ने राह चलते सड़क से उतरने के लिए मजबूर कर दिया था?"

"तो क्या, अब आप अपनी मनमानी चलाएँगे?" माधो पांडे भड़क उठे थे, "और, आपकी सरकार हमें कौन तमगा देनेवाली हैं? रही सही कसर आप लोगों ने छोटे मियाँ की जमीन लेकर निकाल ली है। ले देकर पुराने जमाने से एक ही परिवार तो था इस गाँव में और आप सबने धोखे से उसकी जमीन ले ली! आप लोगों को उनसे जमीन छीनने में जरा भी संकोच नहीं हुआ?"

"आप पगला गए है क्या? क्या बोले जा रहे है?" महेश चौधरी ने मिट्टी का चुकड़ा जमीन पर पटकते हुए कहा था, "आप आन्हर थे क्या? क्या जमीन मैंने अपने लिए लिया है?" फिर उन्होंने आँखें तरेरते हुए धमकी भरे स्वर में कहा था, "किसी ने जबरदस्ती उनसे जमीन नहीं छीनी थी। खुद उन्होंने नेताजी के सामने अपनी जमीन तालाब के लिए दान दिया था। वह भी भरी सभा में! कितना नाम हुआ था उनका! अखबार में फोटो तक छपी थी। पूरे जवार में चर्चा थी। लोग उनकी जय-जयकार कर रहे थे!" यह कहते-कहते उनके चेहरे पर पहले गर्व का भाव आया था। फिर तीखे स्वर में कहा था, "अगर उन्हें जमीन नहीं देनी थी तो बोले क्यों नहीं? जबान गल गई थी, क्या उनकी?"

धीरे-धीरे वहाँ एक छोटी भीड़ इकट्ठी हो गई थी। उन दोनों को लड़ते हुए देखकर कुछ लोगों को मजा आने लगा था। कुछ निस्पृह थे, तो कुछ लोगों की गहरी निगाहें उन पर थी। 'लड़े सब, आपस में! बहुत दिनों से ये बड़के गाँव पर राज कर रहे हैं! मरें सब!!' किसी की बुदबुदाहट सुनाई पड़ी थी।

तभी कहीं से बेनी बाबू आ गए थे। कभी गाँव के मुखिया रह चुके थे। सभी लोग उन्हें खूब मानते थे। पर, कुछ लोग उन्हें देखते ही चिढ़ जाते थे, 'आ गए पंचायत करने! फालतू में सबको उपदेश छाँटेंगे! काम-धंधा तो कुछ है नहीं; पर नेतागिरी करने पहुँच जाते हैं, हर जगह!' बुदबुदाहट फिर सुनाई पड़ी थी।

भीड़ देखकर बेनी बाबू बीच में बोल पड़े थे, "क्या कर रहे है, माधो बाबू, आप? कम-से-कम आप तो समझदारी से काम लीजिए।" फिर, उन्होंने महेश चौधरी की तरफ देखते हुए कहा था, "और अब कितना महाभारत रचवाइएगा इस गाँव में? कुछ तो सब्र करिए!"

"आप इन्हीं को समझाइए!" कहते हुए माधो पांडे चल पड़े थे।

उधर भीड़ धीरे-धीरे छँटने लगी थी। जाते-जाते उनके कानों में महेश चौधरी की आवाज सुनाई पड़ी थी, "जाइए-जाइए! यह धौंस किसी और को दिखाइएगा!"

"अरे माधो भाई, रुकिए तो अरे.ऽ..ऽ...ऽ ...?" बेनी बाबू ने पुकारा था।

पर, माधो पांडे कहा सुननेवाले थे? बेनी बाबू के रोकते-रोकते वे अरार से उतरकर बलुवाई नदी की तरफ बढ़ गए थे। उनका मन एकदम अशांत था। समझ नहीं पा रहे थे, क्या करें? जब से गाँव में हरीश चौधरी और महेश चौधरी नेता हुए थे, तब से कुछ-न-कुछ अनहोनी हो रही थी। जिस सद्भाव के लिए पूरे जवार में इस गाँव की मिसाल दी जाती थी, वह धीरे-धीरे न जाने कहाँ गायब होता जा रहा था। और रही सही कसर गाँव के दक्षिण में बननेवाली बाजार समिति के भवन ने पूरा कर दिया था जिसके चलते आसपास की जमीनें सोने के भाव हो गई थी। जिसे देखो, वही जमीन के लिए गाँव में घुसा चला आता था। मानो जमीन, जमीन न होकर बाजार में मिलनेवाली लौकी की कोई सब्जी हो गई हो! आए दिन जमीन के इस मोलभाव ने गाँव की सामान्य जिंदगी को दूभर बना दिया था।

2.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। सुबह से ही माधो पांडे का मन एकदम अशांत था। रही सही कसर घाट पर महेश चौधरी ने पूरी कर दी थी। समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें? छोटे मियाँ को कहाँ खोजें? अभी कल ही शाम को तो उनके साथ बैठकर मठियवाघाट पर चाय पी थी। 'हाँ, उदास तो वे बहुत थे, सोच नहीं पा रहे थे कि जब आफताब ननिहाल से वापस लौटेगा तो क्या जवाब देंगे? हमेशा कहते रहते थे कि गड़हीवाली जमीन से उसको बड़ा लगाव था। बरसात में जब उसमें कहीं-कहीं पानी इकट्ठा हो जाता तो गाँव के बच्चों के साथ उसकी धमाचौकड़ी देखते ही बनती थी। तीन बीघे वाली जमीन पर बच्चे तूफान ला देते। पानी पर उनके नन्हें पैरों की छप-छपाहट उधर से गुजरनेवाले लोगों को मोह लेती!'

'देखो, बच्चों की पूरी गोपाल मंडली जमुना किनारे धूम मचा रही हैं!' उधर से गुजरती कुछ ग्रामीण महिलाएँ मुदित भाव से बच्चों की छप-छपाहटें सुनती छोटे मियाँ को आशीष देती जाती!

"जानते है, माधो भाई; वह क्या कहता है?" उस शाम चाय पीकर लौटते समय ज्योंहि आफताब का नाम आया था, छोटे मियाँ का चेहरा खिल उठा था।

"क्या?"

"कहता था कि जब वह बड़ा होगा तब, उसमें और पानी भरेगा! क्यों? पूछने पर मुट्ठियाँ बंदकर हाथ हिलाते हुए कहता कि एक छोटी-सी नाव बानाऊँगा और बेचन, गुदली, लछमन - सबके साथ दूर..ऽऽ...ऽ... तालाब में मछली मारने जाऊँगा! ढेर सारी मछलियाँ! कहते हुए अपनी बंद मुट्ठियाँ सामने की तरफ तान देता! पर शायद अल्ला मियाँ को यह मंजूर नहीं था!"

कहते-कहते वे उदास हो गए थे। उनकी आँखों में एक अजीब प्रकार का भाव आ गया था, "यह गाँव अब रहने लायक नहीं रह गया है, माधो भाई! गाँव के जितने लंपट-लफाड़ी थे, अब नेता बन गए हैं। आपके दादाजी या गाँव के बड़े बुजुर्ग क्या किसी नेता से कम थे? जब भी कोई बक्सर आता, उन सबसे मिलने गाँव जरूर आता था। आज तक किसी ने नहीं कहा कि पहले गाँव के लोग किसी नेता से मिलने पटना तो दूर, बक्सर गए हो! और आज के ये नेता?" उनके चेहरे पर एक विचित्र प्रकार की विद्रूपता आ गई थी, "ये रोज अपने नेता से मिलने पटना जाते रहते हैं। पता नहीं, ये वहाँ जाकर दिन भर करते क्या हैं? गाँव के बारे में न जाने क्या-क्या कहते होंगे! और उस दिन जो नेता आए थे... क्या नाम था उनका?" उन्होंने याद करने की कोशिश की, "सुर..ऽ...

"सुरेंद्र सोधी..." माधो पांडे ने बताया।

"हाँ, सुरेंद्र सोधी। कैसे नेता है, ये? न गाँव का सही भूगोल पता है, न इतिहास! सिर्फ राजनीति करनी आती है। वह भी धर्म और जाति की! न जाने क्या-क्या बोले जा रहे थे! जबान में कितना फतूर भरा हुआ था! न जाने किसको देश में रखने की बात कर रहे थे और न जाने किसको विलायत का रास्ता दिखला रहे थे! आते ही लोगों की जमीन हड़प गए! यह नहीं सोचा कि जनता का क्या होगा? वह क्या चाहती है? कहते है, देश के नेता है। पूरे देश में तरक्की लाएँगे! गाँव का विकास करेंगे। देश की सारी समस्याएँ दूर कर देंगे! उज्ज्वल भारत बनाएँगे!" उनके चेहरे पर एक अजीब प्रकार की वितृष्णा का भाव आते जा रहा था, "ये कैसा उज्ज्वल भारत बना रहे हैं हमारे नेता, जहाँ हमारे जैसे लोग दिन-प्रतिदिन गरीब होते जा रहे हैं। शहर के लोग गाँव आ रहे हैं और हम किसान के बच्चे नौकरी के लिए शहर की ओर भाग रहे हैं।"

"सब ठीक हो जाएगा, छोटे भाई!" माधो पांडे समझ नहीं पा रहे थे कि क्या कहें? बस दिलासा देने की कोशिश कर रहे थे, "आप हिम्मत मत हारिए। क्या था, आपके पूर्वजों के पास जब इस गाँव ने उन्हें बसाया था? बस रहने को जमीन ही न दी थी? आज आपके पास इस गाँव में पक्का घर है। ठीक है, सड़क किनारे वाली जमीन चली गई। पर खेत तो है, न?" उन्होंने फिर छोटे मियाँ की हिम्मत बढ़ाने की कोशिश की थी, "भूल गए, ये वही खेत है जहाँ आपके पूर्वज अंग्रेजों से लड़े थे! उस मिट्टी में मिला उनका खून और पानी अब फसल बनकर लहलहाता है! उनकी जाँबाजी के किस्से आज भी कथकौली से लेकर विलायत तक फैले हुए है। ठीक है, वे लड़ाई हार गए थे, पर आपको याद है न, संन्यासी बाबा उनकी कितनी तारीफ करते थे? कहते थे कि इन जाँबाजों ने फख्र से इस इलाके का सिर ऊँचा किया हैं! आज भी कथकौली में उन सबकी मजार पर मजमा लगता है। उनकी शान में लोग हर साल कौव्वाली गाते हैं!"

माधो पांडे की बातें सुनकर थोड़ी देर के लिए छोटे मियाँ की आँखों में चमक भर आई थी। उधर माधो पांडे कहे जा रहे थे, "हमें आप पर गर्व है, छोटे मियाँ! आप वह आदमी है जिनको देखकर इस इलाके का इतिहास नजर आने लगता है। चाहे आज लोग अपने को कितना भी मनसबदार क्यों न माने, पर जो इज्जत आपके परिवार ने कमाई है, जो रुतबा उन्हें हासिल हैं, वह किसी और को क्या नसीब होगा?"

पर माधो पांडे की बातें बहुत देर तक उन्हें दिलासा नहीं दे पाई। कुछ ही देर बाद वह उदास हो गए थे - "क्यों झूठी ढाँढ़स बढ़ा रहे है, माधो भाई? जो बेईमानी मेरे साथ हुई है, उसे क्या आप सुधार सकते है? उसका कोई जवाब है, आपके पास?" थोड़ी देर तक गुमशुम रहे थे वे, "मैंने कब हरीश बाबू से कहा था कि वे महेश चौधरी से कहे कि मैं अपनी जमीन तालाब बनाने के लिए दान कर रहा हूँ? उन्होंने एक बार भी मुझसे पूछना जरूरी न समझा और भरी सभा में घोषणा कर दी? बताइए? कब कहा था मैंने?"

छोटे मियाँ की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी। माधो पांडे के पास इसका कोई जवाब नहीं था। पर कहीं-न-कहीं उन्हें लग रहा था कि छोटे मियाँ जलसेवाले कचोट से अब तक उबर नहीं पाए हैं! वह समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसा क्या करें कि छोटे मियाँ फिर से पुरानी जिंदगी में रम जाए और अगली बार जब पंचकोशी मेले में रामलीला हो तो फिर उनका मन राजा दशरथ बनने को करें!

3.

तभी वह घटना घटी थी। उस दिन शाम के धुंधलके में लौटते समय वे महेश चौधरी से टकरा गए थे। सामने से वे दो-तीन लोगों के साथ आते दिखाई पड़े थे। उनके साथ चलनेवाले लोगों के कंधे पर झोले लटके हुए थे और हाथों में छोटी-छोटी लाठियाँ थी।

'अरे, ये तो वही लोग है जो उस दिन सभा में थे तथा जिन्होंने छोटे मियाँ को चारों ओर से घेर रखा था!' माधो पांडे जब तक कुछ समझते, तब तक वे सामने आकर खड़े हो गए थे। उनकी आँखें फटी-की-फटी रह गई थी! उधर साथ चलते छोटे मियाँ ठिठककर खड़े हो गए थे।

"पार्टीवाले हैं। आप तो मिल चुके हैं, इनसे! जनते ही है कि गाँव में अभी भी बहुत काम कराना बाकी है।" महेश चौधरी ने निर्द्वंद्व भाव से कहा और फिर छोटे मियाँ की तरफ देखते हुए पूछा, "कोई कष्ट तो नहीं हैं?"

छोटे मियाँ कुछ समझ नहीं पाए - 'कष्ट? कैसा कष्ट? गाँव मेरा है। यहाँ मेरा घर है। फिर किस कष्ट के बारे में पूछ रहे है, महेश चौधरी!' अभी वे उधेड़बुन में ही थे कि माधो पांडे की तेज आवाज उनके कानों में सुनाई पड़ी।

"ये सब अभी यही हैं?" माधो पांडे को काटो तो खून नहीं आया - "महेश बाबू, आप दिखाना क्या चाहते है? अब गाँव के मामले बाहरी तय करेंगे?"

"जबान सँभालकर बात करिए..ऽ...! यहाँ बाहरी आदमी कौन है?" अचानक उनकी आवाज तेज हो गई थी, "ये हमारे अतिथि हैं। पार्टी के सम्मानित कार्यकर्ता!" एक क्षण के लिए रुके थे, वे; "और छोटे मियाँ को साथ में लेकर आप गाँव में क्या अनाप-सनाप बकते घूम रहे हैं? यह पार्टी और छोटे मियाँ के बीच का मामला है। जमीन उन्होंने दी, पार्टी ने ली; इसमें आप कहाँ से आ गए? आप बीच में न पड़ें तो ही अच्छा है। आप अपनी नेतागिरी करिए, मुझे कोई कष्ट नहीं है, पर हमें काम करने दीजिए। बीच में मत आइए!" थोड़ी देर के लिए ठहरे थे वे, "और आप, बाहरी किन्हें कह रहें हैं? इन्हें? ये बाहरी नहीं है! इसी देश की संतान हैं, ये! भारतमाता की संतान! सेवा करने यहाँ आए हैं! इनका सम्मान करना सीखिए, गुंडई मत कीजिए!" उनके अंतिम शब्द तीखे हो गए थे। इसके बाद, अचानक वह छोटे मियाँ की तरफ घूमे थे, "और आप छोटे मियाँ, यह आपने क्या तमाशा लगा रखा है? क्या कहते फिर रहे है गाँव भर में? मैंने आपकी जमीन छीन ली है? आपकी कौन-सी जमीन मैंने छीनी है? है, कोई प्रूफ? यह दान में दी गई जमीन, छीनना कैसे हो गया? वह भी भरी सभा में?"

महेश चौधरी की आवाज में एक अजीब प्रकार की दबंगई थी। माधो पांडे भौंचक रह गए थे कि कोई छोटे मियाँ के सामने ऐसी जबान में कैसे बात कर सकता है। उधर छोटे मियाँ की आँखें फैल गई थी। कभी महेश चौधरी की ओर देखते, तो कभी हाथ में छोटी-छोटी लाठियाँ लिए कार्यकर्ताओं की ओर! उनका शरीर ढीला पड़ता जा रहा था।

"यह क्या गुंडागर्दी है, महेश चौधरी? किस जबान में बात कर रहे है, आप?" अचानक माधो पांडे जोर से चिल्लाए थे।

"जो जबान आपकी समझ में आती है!" वह ढिठाई पर उतर आए थे।

"तो आप गुंडई करिएगा?" उन्होंने आसपास खड़े महेश चौधरी के कार्यकर्ताओं की ओर देखते हुए फिर जोर से चिल्लाया था।

तभी शाम के धुंधलके में बगल से नदी तट की ओर जाती कुछ महिलाएँ उनकी बातें सुनकर ठिठककर खड़ी हो गई थी। 'किस बात पर चिल्ला रहे हे ये लोग?' उनमें से एक ने दूसरी से पूछा था। 'वही पार्टी-पॉलिटिक्स!' दूसरी ने कहा। 'छोटे मियाँ से इनका मन नहीं भरा है। लगता है, पूरे गाँव का सत्यानाश करके छोड़ेंगे!' तीसरी ने कहा। तभी पहली ने आगे बढ़ते हुए कहा था 'चलो-चलो, जल्दी लौटना है। घर में बहुत काम पड़ा है।'

बात करते हुए तीनों महिलाएँ आगे बढ़ गई थी। उधर महेश चौधरी और माधो पांडे की बहस जारी थी।

"चिल्लाइए मत, माधो पांडे! कई दिनों से आपकी गुंडई देख रहा हूँ!" महेश चौधरी की आवाज और कड़ी हो गई थी, "और इस भ्रम में मत रहिए कि आपकी जमीन पर विकास का कार्य नहीं होगा! इस गाँव के विकास के लिए बहुत जमीन चाहिए।" उनकी आवाज और कड़ी होती जा रही थी, "बहुत सारी जमीनें! सब.. ऽ...जितना है सब!!"

"अच्छा, अब आपकी निगाह पूरे गाँव की जमीन पर है?" माधो पांडे आपे से बाहर होने लगे थे, "आपको सारे गाँव की जमीन चाहिए? क्या पूरे गाँव को बेचकर खाने का इरादा बना लिया है?"

"हाँ, तो?" कहते हुए महेश चौधरी उनकी तरफ बढ़े थे, "क्या कर लेंगे, आप?"

अभी माधो पांडे कुछ कहते, तभी उन तीनों में से एक, बड़ी मूँछवाला आगे बढ़ा था, "बस्स! आप जहाँ है, वही ठहर जाइए!" और उसने अपनी छोटी लाठी उनकी तरफ तान दी थी। दूसरे ने आगे बढ़कर छोटे मियाँ का हाथ पकड़ लिया था। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उनका चेहरा धीरे-धीरे काला पड़ता जा रहा था। तीसरा महेश चौधरी के साथ ही खड़ा रहा।

तभी आगे बढ़कर महेश चौधरी ने माधो पांडे का कंधा थपथपाया था, "शांत रहिए, माधो बाबू! शांत!! इतनी उत्तेजना ठीक नहीं है। हमें काम करने दीजिए। गाँव का मनसबदार मत बनिए! उसे हमारे लिए छोड़ दीजिए। आपकी पार्टी के दिन अब लद गए। अब पावर में आने का सपना अगले जनम में देखिएगा। भलाई इसी में है कि चुप रहना सीख जाइए!" बड़ी मूँछवाले की छोटी लाठी अब उनकी गरदन की बाईं तरफ धँस गई थी। उधर महेश चौधरी का कहना जारी था, "आप क्या समझते है, यह गाँव ऐसे ही रह जाएगा? हमारा भी तो कुछ फरज बनता है! हमें भी तो इसका विकास करने दीजिए! छियालिस साल से तो आप लोग विकास कर ही रहे थे!"

कहते हुए महेश चौधरी आगे बढ़ गए थे। उनके पीछे तीनों कार्यकर्ता। जाते-जाते महेश चौधरी की आवाज उनके कानों में पड़ी थी, 'इसे ठीक करना पड़ेगा! जब तक ई रहेगा, काम में अड़ंगा लगाते रहेगा। छोटे मियाँ इसी के बल पर कूदता है।'

'एकदम थेथर लगता है, स्साला!' तीनों कार्यकर्ताओं में से किसी एक की आवाज उनके कानों में पड़ी थी, 'कहिए तो दोनों को उड़ा देते है?' 'नहीं-नहीं, कोई और उपाय सोचते है। जब तक ई हरीश बाबू है, तब तक हिंसा...' आगे कुछ सुनाई नहीं पड़ा था।

माधो पांडे अवाक थे! छोटे मियाँ सन्न!! दोनों बहुत देर तक चुपचाप खड़े रहे! माधो पांडे के मन में आँधी-तूफान मचा हुआ था। वह समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें? कहाँ जाएँ? पुलिस थाना? या.ऽ...??

तभी घाट को गई तीनों महिलाएँ लौटी थी। उन दोनों को स्थिर खड़े देख वे समझ नहीं पाई, हुआ क्या था? 'ये यहाँ खड़े क्या कर रहे हैं? अभी तक घर नहीं गए?' पहली ने पूछा था। 'हम का जाने!' दूसरी ने चलते-चलते कहा था। 'क्या हुआ?' तीसरी समझ नहीं पाई। आगे बढ़ते हुए उसने पूछा था।

धीरे-धीरे अब पूरे गाँव पर अंधकार छाने लगा था। घाट पर रह रहकर इक्का-दुक्का लोग आते-जाते दिखाई दे जाते थे। चाय दुकान के लालटेन की रोशनी भी अब धीमी पड़ती जा रही थी। शांत वातावरण में नदी की लहरों की खामोशी के बीच रह-रहकर बसेसर मल्लाह की आवाज - 'रहना नहिं देश बिराना हैऽऽ! ...यह संसार कागद की पुड़िया, बूँद परत घुल जाना है ...यह संसार काँट की बारी, उलझ पुलझ मरि जाना है... कहें कबीर सुनो भाई साधो, सद्गुरु नाम ठिकाना है।' धुंधले अंधकार को चीरकर छोटे मियाँ और माधो पांडे के कानों को भेद रही थी।

कहते है कि जब मनुष्य थिर पड़ जाता है, तब उसकी छठी ज्ञानेंद्रिया या तो विध्वंस करती है, अथवा पुनर्निर्माण! पर मनुष्य जानता है कि चाहे अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, सच उसमें डूबता नहीं है! छोटे मियाँ भी इस बात को जानते थे, परंतु पता नहीं वह कौन-सा भय था कि धीरे-धीरे उनका शरीर शिथिल पड़ता जा रहा था। उधर थोड़ी देर बाद, माधो पांडे की देह में हरकत हुई थी।

4.

उस शाम, बाद में वहाँ क्या हुआ था, ठीक-ठीक किसी को पता नहीं चल पाया। बस उन महिलाओं से रात में कुछ लोगों को यही पता चला कि मठियवाघाट के रास्ते में महेश चौधरी के साथ माधो पांडे और छोटे मियाँ की कुछ कहा-सुनी हो गई थी। उसके बाद से तीनों कार्यकर्ता गाँव से गायब थे। उधर छोटे मियाँ का बड़ा बेटा अनीस, रात से उन्हें खोजने में लगा हुआ था। माधो पांडे अलग परेशान थे। खबर मिली की हरीश चौधरी पार्टी के काम से तड़के डीएमयू से पटना चले गए थे।

तभी सुबह-सुबह पत्ता बटोरने बगीचे में गए करीमन गोड़ ने लौटते हुए दोपहर में बदहवास गाँव में यह खबर दी कि पक्की सड़क से माधो पांडे को पुलिस ने शहर जाते हुए गिरफ्तार कर लिया है।

'कब?' किसी के पूछने पर उसने बताया कि 'जब सासाराम वाली बस जा रही थी।'

उधर लोगों ने शाम को चाय की दुकान पर महेश चौधरी को यह कहते सुना कि 'अब गाँव में उपद्रव नहीं होगा। पूरा विकास होगा। टोटल डेवलॉपमेंट! घर-घर में टी.वी., फ्रिज होगा। कहीं अंधकार नहीं होगा। पूरा गाँव शुद्ध होगा।'

इधर शाम के धुंधलके में भृगु गोड़ की पत्नी को किसी ने अपनी पड़ोसन से यह कहते सुना कि 'अब हम क्या करेंगे? हमारे तो खेत भी नहीं है। रोशनी में घाट पर कैसे जाएँगे?'

अगले दिन सुबह थोड़ी देर से हुई थी।


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