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कविता

मेरे घर के सामने रहती है एक औरत
नरेंद्र जैन


मेरे घर के सामने
रहती है एक औरत
जो शाम को संजा कहती है
और नवंबर को कार्तिक
मुझे बहुत अच्छा लगता है
जो संजा होते ही
एक दीया जलाती है
और पड़ोस के एक कुत्ते के लिए,
जिसे वह मोती कहती है,
रोज एक रोटी बनाती है
मुझे बहुत अच्छा लगता है
जो हफ्ते में एक दिन
गेरू और खड़िया से
आँगन और दीवार के हाशिये को रँगती है
और सुबह शाम
गमले में लगे पौधे को पानी देती है
मुझे बहुत अच्छा लगता है
मेरे घर के सामने रहती है एक औरत


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