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कविता

इस जीवन में
कृष्णमोहन झा


देखकर ही लगता है
कि तुम बहुत आहत हुए हो

हमेशा की तरह
अपमान की एक और लहर
पिछले असंख्य अपमानों के जहर के साथ
एक बार फिर निगल चुकी है तुम्हें
और एक बार फिर
अपनी अटल पीड़ा में असहाय
हतप्रभ और अवाक हो तुम

यद्यपि तुम जानते हो
कि यह
पहली घटना नहीं है तुम्हारे जीवन में
और न ही अंतिम होगी यह
फिर भी तुम्हें एक उम्मीद है खुद से
कि इस जीवन में अपने झरझर दुख से
कुछ ऐसा रचोगे
कि खत्म होने के बाद भी बचोगे
और अंततः साबित कर दोगे खुद को
(जैसे खुद को साबित करना
प्रतिशोध का एक नया तरीका हो)

वैसे तुम्हें पता है
कि कला की रणभूमि में खुद को साबित करने का मतलब है
अपनी केंचुल को अनवरत उतारते जाना
तब तक
जब तक कि त्वचाविहीन व्यग्र देह पर
रक्त की बूँदें ही न छलछला आएँ
और शेष रह जाए
सिर्फ उतप्त हृदय का किसी अगाध में विसर्जित होना

लेकिन
यह तुमसे बेहतर और कौन जानता है
कि छोटी से छोटी चीज को
उसके असली नाम से पुकारने की जिद में
एक शब्द की आदिम आवाज के लिए
ऐसे रहते हो उत्कर्ण
जैसे कोई भूखा-प्यासा मछुआरा
जलाशय में बंसी डालकर
पहरों
सामने टुकुर-टुकुर ताकता रहता है…

इसलिए
अपने युग के बारे में सोचते हुए
तंदूर के ऊपर
सलाखों में झूलते हुए मुर्गे का जो बिंब
बार-बार तुम्हारे मस्तिष्क में आता है उभरकर
वह तुम्हारी चेतना पर बाजार का हमला नहीं है
बल्कि तुम्हारा इतना दुर्निवार
और इतना अंतरंग अंश है वह
जिसे थोड़ा कव्यात्मक बनाकर
तुम अपना रूपक भी नहीं कह सकते।


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