hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कविता

अंतराल
कृष्णमोहन झा


उसके ललाट का चंदन
घाव के निशान में बदल रहा था
उसकी देह का जनेऊ बन रहा था फाँस
उसकी राधा देह बेच रही थी
और उसका जीवन बर्फ की तरह गल रहा था…

विद्यापति को देखा मैंने
राजकमल चौधरी में बदलते हुए।


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में कृष्णमोहन झा की रचनाएँ