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कविता

जब बीत जाएगा समय
कृष्णमोहन झा


बहुत अदृश्य और अनाम चीजों की एक विराट प्रतियोगिता आयोजित है
जिसका एक प्रतियोगी यह समय भी है।

हम जो इतना चहकते हैं इतना बहकते हैं इतना बिलखते हैं और फिर विलीन हो जाते हैं
दरअसल समय के पैरों से उड़ती हुई धूल के
फिर जमीन तक लौट आने की अवधि के अलग-अलग चरण हैं।

कल जब सबकुछ को जगाता सबकुछ बजाता सबकुछ को डराता हुआ बीत जाएगा समय
फिर से इसी दृश्य में नहाएगी नीरवता
वह नदियों को अँजुरी में भरकर समय का तर्पण करेगी
और फिर इन तारों की छाँह में खुद को बिछाकर लेट जाएगी।


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