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उपन्यास

कुछ गाँव गाँव कुछ शहर शहर
नीना पॉल


तेजेंद्र शर्मा को समर्पित

 

प्रेरणा

"नीना आज कल क्या लिख रही हैं।"

"एक उपन्यास लिखने का मन है। दो तीन विषय दिमाग में घूम भी रहे हैं किंतु कुछ समझ में नहीं आ रहा कि कहाँ से शुरू करूँ।"

"हूँ... आप लेस्टर में कब से रह रही हैं?"

"करीब पिछले तीन दशक से... पहले लेस्टर के ही एक गाँव लॉफ़्बरो में रहती थी अब कुछ वर्षों से लेस्टर में रह रही हूँ।"

"तो फिर... इतने वर्षों से आप लेस्टर में हैं। अपने चारों ओर नजर डालिए विषय तो आपके सामने खड़ा है। आपने लेस्टर के कितने उतार-चढ़ाव देखे होंगे। चलाइए कलम और लिख डालिए लेस्टर शहर पर अगला उपन्यास..."

यहाँ के वरिष्ठ कहानीकार तेजेंद्र शर्मा जी का दिल की गहराइयों से धन्यवाद जो बातों ही बातों में मुझे उपन्यास के लिए एक विषय देकर मेरे दिमाग में उथल-पुथल मचा गए। मैं रात भर सोचती रही कि इस विषय पर क्या लिखा जा सकता है। कैसे शुरू करूँ... कहाँ से करूँ... इसके लिए सामग्री कहाँ से मिलेगी। तेजेंद्र जी ने मुझ पर विश्वास करके मुझे यहाँ के जन जीवन पर लिखने को बोला है तो अब मेरा भी फर्ज बनता है कि कुछ अलग सा लिख कर दिखाऊँ। यह मेरे लिए भी एक नया अनुभव था। मेरी सोच सुझे काफी वर्ष पीछे ले गई। जिस दिन से मैं ब्रिटेन आई एक एक करके वह सारी घटनाएँ आँखों के सामने से गुजरने लगीं। बस इसी उधेड़बुन में रात भर सो ना पाई।

दूसरे दिन से ही मेरा लेस्टर के विषय में रिसर्च आरंभ हो गया। मैं 1973 से लेस्टर में हूँ। यहाँ की इकोनोमी का उत्कर्षापकर्ष देखा है... माइनर्स की दो हड़ताल देखी हैं जो ब्रिटेन की इकोनोमी के अपकर्ष का कारण बनी।

यह विषय उतना सरल नहीं था जितना कि सुनने में लगता है। मैंने इसी विषय के ऊपर लिखने की ठान ली। कुछ ऐसा भी नहीं लिखना चाहती थी जो उपन्यास लेस्टर का इतिहास बन कर रह जाए।

एक अंग्रेज दंपति टैरी जेक्सन व फ्लोरी जेक्सन मेरे बहुत पुराने मित्र हैं। टैरी लेस्टर के ही एक प्रसिद्ध गाँव लॉफ़्बरो के स्कूलों के गवर्नर रह चुके हैं। इनके बहुत से अध्यापक व लेखक मित्र भी हैं। मैंने अपनी बात इनके सम्मुख रखी।

टैरी व फ्लोरी का हार्दिक धन्यवाद जिन्होंने मेरी बात की गंभीरता को जानते हुए इस उपन्यास को शुरू कराने में मेरी बहुत सहायता की। इन्होंने मुझे तीन ऐसे अंग्रेज लेखकों से मिलवाया जिन्होंने लेस्टर के इतिहास के विषय में लिखा है। मेरा मुख्य उद्देश्य लेस्टर का इतिहास नहीं यहाँ के रहन सहन और एशियंस पर उसका प्रभाव के विषय में लिखना था। फिर भी उन लेखकों से मिलना बहुत लाभदायक सिद्ध हुआ।

इनसे बात-चीत करते हुए मेरी कलम भी नोट्स लेने में सक्रिय रही।

1973 में जब मैं ब्रिटेन आई तो मेरा निवास स्थान लॉफ़्बरो था। लॉफ़्बरो में काफी एशियंस दिखाई दिए। अधिकतर लोग यहाँ के कारखानों में ही काम करते मिले। इनमें बहुत से तो डिग्रियों के मालिक भी थे। उस समय इकोनोमी अपनी चरम सीमा पर थी। काम की कोई कमी ना थी। घरों में पर्चे फेंके जाते थे कि आओ हमारे कारखाने में काम करो। उन दिनों यूनियन का बोलबाला था।

एक फैसले से ब्रिटेन की इकोनोमी अपकर्ष की ओर चल पड़ी। इसमें दोष यूनियन को दिया जाए या सरकार को... पतन तो हुआ। यह कैसे हुआ। इसका कुछ आभास आपको उपन्यास पढ़ कर हो जाएगा।

मैं यहाँ हेजल फिश का भी धन्यवाद कर दूँ जिन्होंने मेरे लिए ब्रेडगेट लायब्रेरी व लॉफ़्बरो लायब्रेरी से सामग्री एकत्रित करके भेजी। हेजल फिश सैकंडरी स्कूल की अध्यापिका रह चुकी हैं जिनका वर्णन इस उपन्यास में भी मिलेगा। इनसे और भी बहुत सी बातों की जानकारी प्राप्त हुई जिसके बिना शायद मैं इस उपन्यास को लिखने का साहस ना जुटा पाती।

कुछ पुराने कारखानों के मालिकों से भी मुलाकात का सौभाग्य प्राप्त हुआ जिनको माइनर्स की दूसरी हड़ताल के कारण अपने चलते हुए कारखानों को ताला लगाना पड़ा था।

जहाँ से जो भी जानकारी मिली मैंने सब को इकट्ठा किया। आधुनिक आविष्कार इंटरनेट की सहायता से काफी सामग्री एकत्रित करके करीब तीन वर्ष पहले मैंने इस उपन्यास की नींव रखी थी। अभी शुरुआत ही की थी कि अस्वस्थता के कारण सब बीच में ही छूट गया। हस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए मैं इस उपन्यास के विषय में ही सोचती रहती। यह मेरे लिए भी एक अलग सा नया अनुभव था।

वैसे तो प्रत्येक लेखक को अपनी हर रचना प्रिय होती है। आपको पढ़ कर ही पता चल जाएगा कि इस उपन्यास को लिखने में मैंने बहुत मेहनत की है। मेरा यह प्रयास कहाँ तक पाठकों को प्रभावित करता है यह तो उनकी प्रतिक्रिया से ही पता चलेगा।

"कुछ गाँव गाँव कुछ शहर शहर" मेरा तीसरा उपन्यास है। इससे पहले दो उपन्यास "रिहाई" और "तलाश" पाठकों की प्रशंसा और सम्मान पा चुके हैं। रिहाई उपन्यास के लिए "अखिल भारतीय हिंदी सम्मेलन" द्वारा सम्मान मिला व "तलाश" उपन्यास के लिए कथा यूके द्वारा "पद्मानंद साहित्य सम्मान" जो ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमंस में मिलता है लेने का सौभाग्य प्राप्त कर चुकी हूँ।

यहाँ मैं अपने बच्चों का भी धन्यवाद कर दूँ जो हर कार्य में मेरे साथ खड़े मिलते हैं। अब आप पर निर्भर करता है कि पढ़ कर अपनी प्रतिक्रिया दीजिए कि मुभे अपने इस प्रयास में कहाँ तक सफलता मिली है।

नीना पॉल

 

कुछ गाँव गाँव कुछ शहर शहर

एक हल्की सी आवाज से निशा की नींद खुल गई।

आवाज खुली खड़की से आई थी। जम्हाइयाँ और अँगड़ाइयाँ लेते हुए उसने कंबल को एक ओर सरकाया। कल की रात ही कुछ ऐसी उमस से भरी गर्म थी कि खिड़की खोलनी ही पड़ी।

ब्रिटेन में ऐसे अवसर कम ही होते हैं जब रात को ठंडी हवा की जरूरत महसूस हो...। वैसे यहाँ के मौसम का कुछ भरोसा भी तो नहीं किया जा सकता। सर्द हवाओं के बाद जब यह मौसम अचानक करवट लेता है तो वातावरण में एक अजीब सी उमस भर जाती है। ठंडी पड़ी धरती पर जब सूरज की गर्म किरणें थोड़ी गरमाहट पहुँचाने की कोशिश करती हैं उस समय हवा में एक हल्का दबाव सा महसूस होने लगता है। यहाँ की गर्मी भारत जैसी नहीं है कि सूरज का तपता हुआ गोला प्रकट हुआ और सब पसीने से नहा गए। यहाँ तो पसीना निकालने के लिए तेज धूप में बैठना पड़ता है जहाँ पसीना तो कम निकलता है लेकिन चमड़ी का रंग जरूर गहरा हो जाता है।

चमड़ी का रंग गहरा करने हेतु ही तो थोड़ी सी गर्मी होते ही लोग घरों से बाहर निकल पड़ते हैं। जो इतने महीनों से गर्म कपड़ों में लिपटे शरीर को सूर्य की थोड़ी किरणें छू सकें। वैसे ब्रिटेन में सूरज की गर्मी कहाँ नसीब होती है। यहाँ की अंग्रेज महिलाएँ अपने पीले रंग को थोड़ा गहरा करने के लिए बिजली की मशीनों का प्रयोग करती हैं। यह मशीनें भी ऐसी कि नीचे आरामदायक बिस्तर बिछा होता है और ऊपर के पलड़े पर बड़ी बड़ी टयूब लाइट्स लगी होती हैं जिनमें से गर्मी निकलती है।

महिलाएँ अपना रंग भूरा करने के लिए घंटों इन तेज रोशनी और गर्मी से भरी बिजली के नीचे लेटी रहती हैं। यह सोचे बिना कि यह तेज बनावटी गर्मी हानिकारक भी सिद्ध हो सकती है। इससे चमड़ी पर कैंसर होने का भी डर होता है। फिर भी गर्मी में सुंदर दिखने के लिए यह इन मशीनों का प्रयोग करती हैं।

वाह रे उल्टी खोपड़ी... एक ओर तो यह गोरे लोग भूरी चमड़ी वालों से घृणा करते हैं और दूसरी तरफ इतने पाउंड खर्चा करके इन जैसा रंग भी अपनाना चाहते हैं।

रंग तो स्वयं ही बदलेगा जब धूप निकलते ही लोग छोटे-छोटे कपड़े पहने हुए पार्क या किसी समुद्र के किनारे का रुख करते हैं। पार्क में जहाँ बड़े बच्चे आपस में फुटबाल खेलते दिखाई देते हैं तो वहीं छोटे बच्चे झूला झूलते हुए मिलते हैं। ऐसे मौसम को कोई भी चूकना नहीं चाहता। युवा जोड़े भी इस मस्ती से दूर कैसे रह सकते हैं। कुछ लोग तो खुलेआम इनकी मस्ती ही देखने के लिए आते हैं।

मस्ती भी ऐसी कि ब्रिटेन के समुद्री तटों पर लोगों का ताँता लग जाता है। कुछ कुर्सियों पर लेटे धूप का आनंद लेते मिलते हैं तो कुछ रेत पर बैठे बच्चों के साथ घरौंदे बना कर खेल रहे होते हैं। धूप में लेटी हुई अर्धनग्न महिलाएँ शरीर पर लोशन लगा कर सनटेन लेने की कोशिश कर रही हैं। चारों ओर शोर-शराबा, समुद्र की लहरों से खेलते युवा जोड़े, सतरंगी सूरज की किरणों से मेल खाते लोगों के रंग-बिरंगे कपड़े, बच्चों की किलकारियाँ, मस्ती भरा माहौल... यही सब देखने को मिलता है...। यह है ब्रिटेन के सूर्य देवता का कमाल जिसका लोग महीनों इंतजार करते हैं।

इंतजार तो निशा को भी है सुबह का। उसने जम्हाइयाँ लेते हुए बिस्तर छोड़ दिया। वह खिड़की के सामने से पर्दा हटा कर बाहर देखने लगी...।

बाहर का दृष्य बाँहें खोले निशा को निमंत्रण दे रहा था। निशा की आदत है कि सुबह उठते ही वह कुछ समय के लिए खिड़की के पास जरूर खड़ी होती है। जब पहाड़ी के पास घर हो... फूलों से सुगंधित ब्यार चल रही हो... सुबह के उगते सूर्य में हलकी सी गर्मी हो... कौन घर में बैठ सकता है।

निशा लेस्टर के एक गाँव लॉफ़्बरो में रहती है। लॉफ़्बरो जो अपनी युनिवर्सिटी के साथ-साथ और भी बहुत सी चीजों के लिए प्रसिद्ध है। अंतरिक्ष से अपनी पहली उड़ान के दौरान परीक्षण के लिए लाए गए पत्थर के टुकड़े का परीक्षण लॉफ़्बरो युनिवर्सिटी में ही हुआ था।

यहाँ की बहुत ही प्रसिद्ध बीकन हिल का नाम भी लॉफ़्बरो निवासी बड़े गर्व से लेते हैं। निशा बीकन हिल के करीब ही विक्टोरिया स्ट्रीट में रहती है। काली और भूरी चट्टानों से भरी बीकन हिल जिन पर खड़े हो कर पूरे लॉफ़्बरो शहर को देखा जा सकता हैं। चारों तरफ बने हुए एक जैसे मकान, कहीं कारखानों से उठता हुआ धुआँ तो कहीं लंबी टेढ़ी मेढ़ी सड़कें...। दूर से धुंध में डूबा हुआ लॉफ़्बरो का मशहूर क्वीन्स पार्क दिखाई दे रहा है जिसके बीचो बीच में एक लंबा स्मारक चिह्न सुबह की धुँधली धूप में चमक रहा है। जिसे क्रिलियन के नाम से जाना जाता है।

बीकन हिल से ही गर्व से सिर उठाए लॉफ़्बरो के चर्च आकाश को छूते मिलते हैं। जिधर नजर दौड़ाओ बस चारों ओर हरियाली ही हरियाली फैली हुई है। गर्मी के दिनों में बीकन हिल और इसके आस-पास लोगों की काफी रौनक रहती है। शाम के प्राकृतिक दृष्य रोज एक नई कहानी सुनाते हैं। एक तरफ सूरज के डूबने से चट्टानें भूरी और नारंगी रंग में भीग कर अपना सोंदर्य फैला रही होती हैं तो दूसरी ओर धीरे धीरे सरकती रात से चट्टानों पर सलेटी रंग की चादर बिछ जाती है...।

सलेटी रंग नहीं सफेदी से भरी कोहरे की चादर उस दिन भी बिछी हुई थी जब पहली बार निशा की मॉम सरोज ने परिवार सहित ब्रिटेन की धरती पर कदम रखा था।

छोटी सी पाँच महीने की बच्ची निशा को सीने से चिपकाए हीथरो हवाई अड्डे पर सरोज उनके पति सुरेश भाई व माँ सरला बेन डरते हुए भीड़ के साथ आगे बढ़ रहे थे। उनके समान और लोग भी डरे हुए थे जो पहली बार ब्रिटेन आ रहे थे।

डरने की तो बात ही थी। अपना बसा-बसाया घर बार छोड़ कर किसी अज्ञात स्थान पर जा कर फिर से आशियाना बसाना कोई मामूली बात तो थी नहीं। निशा की नानी सरला बेन को एक बार फिर मजबूर हो कर नया घर बसाने के लिए दर-दर भटकना पड़ा। अपना घर-बार छोड़ने का दर्द सरला बेन से अधिक कौन जान सकता है। उनकी खामोश नजरें दिल में उमड़ता तूफान छुपाए हुए थीं।

असली तूफान युगांडा में रहने वाले भारतीयों की जिंदगियों में उस दिन उठा था जब...

सुरेश भाई दुकान को ताला लगा कर बड़े उदास मन से घर में आए। उनका सिर झुका हुआ था। किसी गहरी सोच में डूबे हुए वह धम्म से कुर्सी पर बैठ गए...

सरोज जल्दी से हाथ पोंछते हुए किचन से बाहर आई... "क्या बात है जी... तबियत तो ठीक है। आज दुकान भी जल्दी बंद कर दी।"

"हाँ सरोज चिंता तो इस बात की है कि पता नहीं यह ताला कल खुलेगा भी या नहीं..."

"शुभ-शुभ बोलो जी... ऐसी भी क्या बात हो गई। किसी से झगड़ा हुआ है क्या... शीघ्र बताइए बात क्या है मेरा दिल बैठा जा रहा है।"

"इस बात की अफवाह तो बहुत दिनों से फैल रही थी सरोज। कुछ अकलमंद लोग सब कुछ बेच-बाच के यहाँ से चले भी गए हैं। किंतु कुछ हमारे जैसे भावुक यहीं से चिपके पड़े हैं यह सोच कर कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। पर नहीं सरोज... हमारे राष्ट्रपति इदी अमीन ने खुले आम ऐलान कर दिया है कि सब भारतीवंशी युगांडा छोड़ कर चले जाएँ।"

"क्या... चले जाएँ पर कहाँ...?"

"यह तो नहीं बताया और ना ही कोई जानता है किंतु सप्ताह के अंदर हमारी जमीन जायदाद सब कुछ जब्त कर लिया जाएगा। इतने थोड़े से समय में कोई घर दुकान बेच भी तो नहीं सकता। जब यहाँ के निवासियों को भरा-भराया घर और दुकानें यूँ ही मिल जाएँगी तो कोई क्यों खरीदेगा। हम अपना कुछ निजी सामान ही ले कर जा सकते हैं। इदी अमीन को अपने देश में भारतीय नहीं उनका पैसा, जायदाद व व्यापार चाहिए। मेरा तो दिल बैठा जा रहा है सरोज परिवार के साथ हम कहाँ जाएँगे?"

सरोज की माँ सरला बेन... जिन्होंने दुनिया देखी हुई है वह आगे बढ़ कर सुरेश भाई को धीरज बंधाने लगीं। "घबराइए मत जमाई जी। मैं भी पड़ोसियों से यह बात सुन कर आ रही हूँ। वह सब इंग्लैंड जा रहे हैं। आपके पापा ने जाने से पहले बहुत अच्छा काम किया था कि हम सबका ब्रिटिश पासपोर्ट बनवा दिया था नहीं तो आज हम कहीं के न रहते। हमारे पास भी ब्रिटिश पासपोर्ट है। जिधर सब जा रहे हैं उधर हम भी अपनी किस्मत आजमाने चल पड़ेंगे।"

सब खामोशी से अपना सामान बाँध रहे थे। खामोशी के अतिरिक्त और कोई विकल्प भी तो नहीं था। सब को इस बात का भी ध्यान रखना था कि दो सूटकेस से अधिक न हो जाए नहीं तो हवाई जहाज वाले पैसे लगा देंगे।

नया जीवन आरंभ करने के लिए साथ में केवल दो सूटकेस और 55 पाउंड...

सरोज पैसे गिनते हुए बोली... यह 55 पाउंड कब तक चलेंगे जी। साथ में छोटा बच्चा है... बा हैं। इन 55 पाउंड में हम क्या खाएँगे और कहाँ रहेंगे।

सरोज घबराओ मत। जिसने इस मुसीबत में डाला है वही रास्ता भी दिखाएगा।

जिसे जिधर रास्ता दिखाई दिया वह उधर की ओर चल पड़ा। अधिकतर भारतीयों के पास ब्रिटिश पासपोर्ट थे। अपना निजी सामान ले कर व सब कुछ पीछे छोड़ कर सब ने एक अनजान देश ब्रिटेन का रुख किया।

पीछे केवल घर जायदाद ही नहीं छोड़ा बल्कि वहाँ का मौसम भी छूट गया। ब्रिटेन जैसे ठंडे देश का तो किसी को अनुभव ही नहीं था। हीथरो एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही जिस सबसे पहली चीज का सामना करना पड़ा, वे थीं ब्रिटेन की ठंडी हवाएँ। नवंबर का सर्द महीना था। मौसम के हिसाब से ढंग के कपड़े भी नहीं थे किसी के पास। वैसे अपनी सोच के अनुसार सभी ने गर्म कपड़े पहने हुए थे। शायद किसी को ये अंदाजा नहीं था कि इतनी ठंड भी हो सकती है।

छोटी सी निशा... शाल में लिपटी हुई बाहर की सर्दी से बेखबर सरोज के सीने से चिपकी हुई माँ के शरीर की गर्मी ले रही थी। ठिठुरते हुए अधिकतर लोगों ने लेस्टर का रुख किया। कारण साफ था कि लेस्टर को इंडस्ट्रीज का शहर माना जाता था। यह एक सस्ता शहर भी था। इंडस्ट्रीज के कारण उनके हिसाब का काम भी सारा लेस्टर में था।

लेस्टर में ही इनके आने से पहले कई भारतीय बसे हुए थे। सुरेश भाई को जब पता चला कि उनके दूर के रिश्ते के भाई मुकुल पटेल यहाँ लेस्टर में हैं तो उनके दिल को थोड़ी राहत मिली। यह वो समय था जब ब्रिटिश सरकार ने यहाँ के कारखानों में काम करने के लिए भारतीयों को अनुमति व बीजे दिए थे। उस समय गुजरात से आए लोगों के साथ मुकुल पटेल भी एक थे। ब्रिटेन के कारखानों में काम करने वालों की कमी थी। प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए ब्रिटिश सरकार को यह एक सस्ता और आसान तरीका नजर आया जिस कारण भारत से बहुत से लोगों को यहाँ आने की अनुमति दे दी गई।

गुजरात से ही नहीं भारत के एक प्रदेश पंजाब के देहातों से भी काम करने के लिए लोगों को दिल खोल कर ब्रिटेन में आने के लिए वीजे दिए गए। ब्रिटिश निवासियों ने इनके आने पर आवाज तो उठाई किंतु देश की भलाई के कारण अधिक आपत्ति नहीं जताई। लोग ये सोच कर चुप थे कि पैसा कमा कर थोड़े समय के पश्चात यह लोग वापिस अपने देश लौट जाएँगे। मगर यहाँ की सुख सुविधाएँ व अच्छा वेतन देख कर यह लोग परिवार सहित यहीं बस गए। यहाँ पर बस ही गए तो यहाँ का रहन सहन अपनाने में ही सबने अपनी भलाई समझी।

जब परदेस में कोई अपना मिल जाए तो खुशी दोनों तरफ से होती है। मुकुल पटेल एक बड़ी सी कार ले कर सुरेश भाई के परिवार को लेने हीथरो हवाई अड्डे पर पहुँच गए। ब्रिटेन में कार केवल सुख सविधा के साधन के लिए ही नहीं बल्कि कार यहाँ पर एक जरूरत की वस्तु है... यहाँ के मौसम और दूरियों को देखते हुए। मुकुल भाई को देख कर सबको खुशी हुई। अनजान देश में कोई जाना पहचाना चेहरा देख कर दिल में छुपा डर कुछ हद तक दूर हो जाता है...

कार में बैठते ही मुकुल भाई ने कार में लगा हीटर चालू कर दिया जिससे सर्दी से सबको थोड़ी राहत मिली। सब उत्सुकतावश कार के शीशे से बाहर देख रहे थे। ब्रिटेन की साफ-सुथरी चौड़ी सड़कों पर कैसे कारें चुपचाप अपनी दिशा की ओर भागी जा रहीं हैं। कहीं से भी शोर या भोंपू की आवाज नहीं...। सड़कों पर व किनारे लगे पेड़ों पर सफेद कोहरा बिछा हुआ है। नंगे पेड़ों की डालियाँ सफेद कोहरे के वस्त्र पहने खुशी से झूम रहीं हैं। बीच बीच में धुंध भी मिल जाती। कहीं पर तो धुंध इतनी गहरी हो जाती कि सामने का रास्ता भी ठीक से दिखाई नहीं देता। नजर आती तो बस आगे चलती हुई कारों की लाल बत्तियाँ।

***

परिवार साथ हो और काम हाथ में ना हो तो अपना और प्रियजनों का पेट पालने के लिए इनसान कोई भी काम करने को तैयार हो जाता है।

बाहर से आए लोग तो कोई भी काम करने को तैयार थे किंतु ब्रिटिश निवासी इन्हें अपनाने को तैयार नहीं हुए। इतने सारे एक जैसे लोगों को देख कर वह वैसे ही घबरा गए थे। पहले ही कुछ वर्षों से ब्रिटेन के कारखानों में काम करने के लिए यहाँ की सरकार ने भारतवंशियों को वीजा देना शुरू कर दिया था। जो वह इनके कारखानों में काम करके प्रोडक्शन को योरोप के मुकाबले में और आगे बढ़ा सकें। मेहनती लोग सस्ते दामों पर मिल जाएँ तो और क्या चाहिए।

जहाँ पहले कभी जिन अंग्रेजों ने कोई भारतीय नहीं देखा वहाँ इतने सारे एक जैसे चेहरे देख कर वह पागल हो गए...। एक दूसरे से अपने दिल का डर बताने लगे...

"देखो तो... लगता है इतने सारे एलियंस हमारे देश पर हल्ला बोलने आ रहे हैं" खिड़की का पर्दा हटा कर बाहर झाँकते हुए बलिंडा ने कहा।

"नहीं बलिंडा ये एलियंस नहीं अफ्रीका से आने वाले कुछ और भारतीय हैं।"

"अब हमारा क्या होगा एनी...। यह भारत से आए लोग तो चारों ओर से हमें घेर रहे हैं...। लगता है हमने जो करीब दो सौ साल तक इन पर राज्य किया है ये शायद उसी का बदला लेने इतनी बड़ी संख्या में इकट्ठे हो रहे हैं। हैरानी तो इस बात की है कि सब कुछ जानते हुए भी अंग्रेज सरकार ने इतने सारे लोगों को यहाँ आने की अनुमति कैसे दे दी...।"

अनुमति तो मिली किंतु बेचारे अफ्रीका से निकाले गए लोग बहुत डरे हुए थे। अंग्रेजों का डरना अपनी तरह का था और भारतीयों का दूसरी तरह का। सब एक साथ रहने में ही अपनी भलाई मानते थे। इसमें उनका भी कोई दोष नहीं था। नया देश, नई भाषा, नए लोग वो एक गुट बना कर रहने में ही स्वयं को सुरक्षित समझने लगे।

इससे पहले कोई एक-आध भारतीय ही पढ़ाई के सिलसिले में ब्रिटेन आया करता था। उसे काफी कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता था। कोई भारतीय कितना भी पढ़ा लिखा क्यों ना हो उसे हीनता की भावना से ही देखा जाता था। भारतीयों में भी हीनता आना और डर पैदा होना स्वाभाविक था। इतने साल अंग्रेजों की गुलामी जो सही थी। जहाँ थोड़े से अंग्रेज आ कर अपनी रणनीति से इतने बड़े भारतवर्ष पर राज कर सकते हैं वहीं उन्हीं के देश में कदम रखते हुए घबराहट तो होगी ही।

वैसे एक बात तो ब्रिटिश निवासी भी मानते हैं कि लेस्टर को असली पहचान भारतीयों ने ही दिलाई है। 19वीं सदी के आरंभ में लेस्टर के विषय में कोई जानता भी नहीं था। मोटर-वे पर कहीं लेस्टर का साईन तक नहीं था। यहाँ तक कि ब्रिटेन के नक्शे में छोटा सा लेस्टर का नाम कहीं लिखा मिलता था। यूँ कहिए कि लेस्टर की पहचान भारतीयों से, और भारतीयों की पहचान लेस्टर से हुई।

लेस्टर अपने टैक्सटाइल के नाम से भी जाना जाता है। कपड़ा बुनने से लेकर पूरा वस्त्र तैयार करने के कारखाने यहाँ मौजूद हैं। कच्चा माल सस्ते दामों में भारत से लाकर, फिर उससे सामान तैयार करके पूरी दुनिया में बेचा जाता। प्रोडक्शन और सामान की माँग बढ़ने लगी तो काम करने वालों की कमी महसूस हुई। ऑर्डर्स पूरे करने के लिए अधिक से अधिक लोगों को काम पर रखा जाने लगा।

काम की बात छोड़ो... ब्रिटेन के लोगों को किसी से भी मिल-जुल कर रहना अच्छा नहीं लगता। ये स्वयं को सब से ऊँचा और सभ्य मानते हैं। और तो और अपने जैसे गोरे दिखने वाले अपने ही देशवासी आइरिश लोगों के साथ भी यह मेल-मिलाप रखना पसंद नहीं करते। आइरिश लोगों को चर्च, पब, यहाँ तक कि आइरिश बच्चों को इनके स्कूलों में भी जाने की अनुमति नहीं थी। आइरिश बच्चों को पढ़ाने के लिए कोई इंगलिश अध्यापक तैयार नहीं मिलता। इंगलिश और आइरिश बच्चों में भी आपस में भेद-भाव साफ दिखाई देता।

उस दिन गर्मी बहुत थी। कुछ आइरिश नौजवान ठंडी बियर पीने के लिए एक पब में घुस गए।

ग्राहकों को आया देख कर एक बारमैन ने मुस्कुराते हुए आगे बढ़ कर कहा... यस सर..."

"चार गिलास ठंडी बियर मेरे दोस्तों के लिए देना..."

उस लड़के का आइरिश एक्सेंट सुन कर बारमैन के होठों से मुस्कुराहट गायब हो गई। उसे बगलें झाँकते देख कर दूसरा बारमैन जल्दी से आगे आ कर बोला "हमारे यहाँ बियर नहीं बिकती..." पब लोगों से खचाखच भरा हुआ था। अधिकतर लोग बियर ही पी रहे थे। वह लड़का जरा गुस्से से बोला... "नहीं बिकती तो यह सब कैसे पी रहे हैं।"

"मैंने कहा न हमारे यहाँ बियर नहीं बिकती। आप लोग किसी अपने जैसों के पब में जाइए। यह इंगलिश पब है।"

इस प्रकार सब के सामने अपना अपमान होते देख वह चारों लड़के बारमैन की ओर गुस्से से देखते हुए पब से बाहर हो गए।

पब तो दूर की बात है इंगलिश चर्च में भी इन्हें जाने की अनुमति नहीं थी। चर्च तो इबादत का घर है। जब ऊपर वाले ने सब को एक जैसा पैदा किया है तो फिर ये धरती पे रहने वाले किस अधिकार से मतभेद करते हैं। वो भी इतना कि धर्म के नाम पर मरने मारने पर उतारू हो जाएँ। इंगलिश लोगों से अधिक तो आइरिश धार्मिक माने जाते हैं। हर रविवार को पूरे परिवार के साथ ये चर्च जाते हैं। आइरिश लोग अधिकतर केथोलिक धर्म को मानने वाले होते हैं। वैसे तो ब्रिटेन में हमेशा से ही दो धर्म मानने वाले पाए गए हैं - केथोलिक और प्रोटेस्टियन्स। जिनमें अकसर धर्म के नाम पर झगड़े भी होते रहते हैं...।

***

आज चर्च में बहुत भीड़ व चहल-पहल है। लोगों के चेहरे से खुशी साफ झलक रही है। बात ही कुछ ऐसी है। आज से आइरिश लोगों को भी चर्च में आने की अनुमति जो मिल गई है। अब यह लोग भी जब चाहें चर्च आ सकते हैं।

धार्मिक कार्य समाप्त होते ही माइकल अपने परिवार के साथ आगे बढ़ा पादरी के हाथ को किस करने के लिए जो पादरी उनके मुँह में भी वाइन में भीगा हुआ डबल रोटी का टुकड़ा डाल दें। उसे अपना हाथ देने से पहले ही पादरी ने खींच लिया। वह पीछे खड़े अंग्रेज की ओर बढ़ गया। आयरिश लोगों के चेहरे से सारी खुशी गायब हो गई। चर्च में आने का रास्ता तो खुला किंतु कोई अंग्रेज पादरी इनको संडे सर्विस देने को तैयार नहीं हुआ।

आइरिश लोग भड़क उठे। यह सरासर उनका अपमान था। वह एक दूसरे के सामने अपना गुस्सा प्रकट करने लगे...

"अब हम क्या करेंगे माइकल... केवल चर्च के दरवाजे खुलने से ही हमारी पूजा पूरी नहीं होती। जब सरकार ने हमारे लिए चर्च के दरवाजे खोल दिए हैं तो इन धर्म के ठेकेदारों को क्या आपत्ति हो सकती है।"

"घबराओ मत... यदि यहाँ के पादरी स्वयं को भगवान से भी ऊँचा समझते हैं तो हम इटली से पादरी बुलवाएँगे जो हमें संडे सर्विस दे सके।"

इटली से पादरी तो आ गया किंतु संडे सर्विस से पहले ही उस इटली से आए पादरी के सफेद लंबे चोगे को ले कर विवाद खड़ा हो गया। वैसे भी जब कहीं छोटा सा भी परिवर्तन होता है तो ना चाहने वाले आवाज तो उठाते ही हैं। इटली से आए पादरी और ब्रिटेन के पादरियों में झड़प हो गई... इंगलिश पादरी ने आगे बढ़ कर गुस्से से कहा...

"आप इस प्रकार के कपड़े पहन कर हमारे चर्च में नहीं आ सकते।"

"पहली बात तो चर्च किसी एक का नहीं होता। चर्च केवल इबादत का घर है। और दूसरा क्या आप सब पादरियों की कोई खास युनिफॉर्म है यहाँ पर..."

"नहीं... लेकिन यह पढ़े लिखे लोगों का चर्च है जहाँ ऐसे लंबे चोगों की गुंजाइश नहीं...।"

"धर्म कहाँ कहता है कि आप क्या पहन कर चर्च में आओ। मैं इटली से आया हूँ जो देश धर्म के विषय में आप से अधिक जानता है।"

"अच्छा अब धर्म की परिभाषा आप हमें सिखाएँगे। यह हमारी मेहरबानी समझो जो आप जैसों को हमने चर्च में आने की अनुमति दे दी है। हम अपने धर्म को किसी के साथ नहीं बाँटते।"

"यह धर्म का बँटवारा कब से होने लगा। चाहे किसी भाषा में भी इबादत करो धर्म तो धर्म ही रहेगा। इस प्रकार किसी दूसरे पादरी भाई के अपमान की धर्म अनुमति नहीं देता।"

"हम धर्म के नाम पर कुछ भी कर सकते हैं..."

"धर्म तो भाईचारे का दूसरा नाम है मेरे भाई... धर्म सहनशीलता सिखाता है... आप यह क्यों भूल गए कि करुणा ही धर्म का आधार है... जो मुझे आप में दिखाई नहीं देती... आप धर्म का आदेश नहीं दे सकते। यह दिल से और प्यार से उत्पन्न होने वाली चीज है। जैसे प्यार बुद्धी को स्थिर करता है, धीरज मन को स्थिर करता है, प्रेम हृदय को स्थिर करता है, समर्पण शरीर के आवेश को स्थिर करके शांत करता है, न्याय आत्मा को स्थिर करता है... उसी प्रकार धर्म करुणा को जन्म हेता है। यह सब धर्म के आधार हैं। यह सारे आधार जब स्थिर हो जाते हैं तब मनुष्य करुणा से भर जाता है जिसे हम धर्म का नाम देते हैं। आप इन आधारों का बँटवारा कैसे कर सकते हैं..."

ऐसी धर्म की परिभाषा सुन कर वहाँ खड़े सब पादरियों के मुँह खुले के खुले रह गए। वह लंबे चोगे वाला केथोलिक पादरी उन्हें धर्म का अर्थ समझा कर चर्च से बाहर हो गया।

इटली से आने वाला पादरी अपने संग काफी पैसा लेकर आया था। अधिक पचड़े में ना पड़ने के कारण उन्होंने अपना अलग केथोलिक चर्च बनाने के लिए लेस्टर में ही एक जमीन का टुकड़ा खरीद लिया। जिसे देख कर केथोलिक लोग खुश तो हुए किंतु अपनी परेशानी लेकर पादरी के पास जा पहुँचे...

"फादर... जमीन तो हमने खरीद ली है किंतु इस पर चर्च बनाने का खर्चा कहाँ से उठाएँगे?" माइकल ने उदास स्वर में पूछा।

"बेटे जिसने यह जमीन खरीदने की हिम्मत दी है वही आगे भी सहायता के लिए हाथ बढ़ा देगा।"

प्रयत्नों के पश्चात सहायता मिलनी आरंभ हो गई। इटली में अधिकतर केथोलिक धर्म को मानने वाले रहते हैं। जब उनके पादरी ने ब्रिटेन में पहला केथोलिक चर्च बनाने का प्रस्ताव रखा तो धर्म के नाम पर इटली निवासियों ने दिल खोल कर दान दिया।

इस तरह लेस्टर में ही नहीं पूरे ब्रिटेन में इस पहले केथोलिक चर्च की स्थापना हुई जो लेस्टर की धरती पर बना। इसकी बाकी की बची हुई जमीन पर एक कम्युनिटी सेंटर बनाया गया जो बाद में एक स्कूल में परिवर्तित हो गया। यह स्कूल केवल लड़कियों के लिए ही था। आगे चल कर काफी मुसलमान लड़कियों ने इसमें दाखिला लिया। यह ब्रिटेन का सबसे पहला ऐसा स्कूल था जिसमें अधिकतर एशियंस और आइरिश लड़कियाँ थीं।

इधर आइरिश लोगों के लिए चर्च के दरवाजे खुले और उधर भारतीय बच्चों की मेहनत भी रंग दिखाने लगी। भारतीय बच्चे जान गए थे कि स्कूलों में अपना स्थान बनाने के लिए उन्हें कठिन परिश्रम करना होगा। पढ़ाई में गोरे बच्चों से आगे निकल कर दिखाना होगा। जिन स्कूलों में वह पहले प्रवेश नहीं कर सकते थे उनकी पढ़ाई की लगन को देख कर उन्हीं स्कूलों के दरवाजे उनके लिए खुलने लगे। किंतु केवल स्कूलों के अंदर जाने से ही बच्चों की मुश्किलें समाप्त नहीं हुईं। वहाँ पढ़ने वाले कई अंग्रेज छात्रों को उन्हें अपनाने में बड़ा समय लगा। अंग्रेज और भारतीय छात्र अपने अलग गुट बना कर रहते। अक्सर खेल के मैदान में दोनों की आपस में भिड़ंत भी हो जाया करती।

ये नहीं कि केवल लड़के ही बुली करते हों, लड़कियों में यह भावना और भी अधिक पाई जाती है। हाँ! वह तभी ऐसा करतीं हैं जब तीन चार इकट्ठी होतीं। यह लड़कियाँ जब किसी एशियन को पास से निकलता देखतीं तो नाक पर रूमाल रख कर ऐसे रास्ता बदल लेतीं जैसे सामने से गंदगी का ढेर चला आ रहा हो। कुछ तो घृणा से उनकी तरफ देख कर सड़क पर थूक भी देतीं। वैसे सड़क पर थूकना अंग्रेजी सभ्यता के खिलाफ समझा जाता है। एशियंस के लिए पाकी, ब्लडी बास्टर्ड आदि सुनना तो आम सी बात हो गई...।

***

निशा जब ब्रिटेन आई थी तो कुछ महीने की बच्ची थी। ब्रिटेन में पहले प्ले ग्रुप व फिर यहाँ के स्कूल में पढ़ने के कारण उसे दूसरे बच्चों के समान अंग्रेजी भाषा समझने व बोलने में इतनी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा। फिर भी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ना और अंग्रेजी माहौल में रहना दो अलग बातें हैं। निशा घर में तो अपनी मातृ-भाषा ही बोलती है। जो अंग्रेजी में बोलते ही नहीं सोचते भी अंग्रेजी में ही हों, उनके लहजे को समझने और पकड़ने में समय तो लगता ही है।

सैकंडरी स्कूल में पहुँचते ही निशा को अलग ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। अंग्रेज बच्चे स्वयं को इन सब से ऊँचा मानते थे और अपना अलग ही गुट बनाए रहते थे। एशियन बच्चों का बोलने का ढंग, कपड़े पहनने का ढंग, खाने का ढंग आदि... सबका मजाक उड़ाया जाता।

मजाक उड़ता देख कर भी निशा ने हिम्मत नहीं हारी और अंग्रेज बच्चों से दोस्ती का हाथ बढ़ाने में पहल उसी ने की। एक स्कूल कैंटीन ऐसी जगह होती है जहाँ सभी बच्चे इकट्ठे बैठ कर खाना खाते हैं। कुछ सोच कर निशा अपनी प्लेट ले कर एक मेज की ओर बढ़ी जहाँ पहले से ही कुछ अंग्रेज छात्र बैठे खाना खा रहे थे...।

"इस लड़की का हौंसला तो देखो अपना गुट छोड़ कर अकेली ही हमारी मेज की ओर आ रही है।" खाना खाते हुए एक छात्र बोला...।

"आने दो ना मजा आएगा..."

निशा जैसे ही एक खाली कुर्सी पर बैठने लगी सब ने ऐसे मुँह बनाया जैसे अचानक कोई कड़ुवी चीज खा ली हो।

"हाय... मेरा नाम निशा है। हम एक ही कक्षा में पढ़ते हैं और आपस में जान पहचान ही नहीं तो सोचा क्यों न मैं ही दोस्ती का हाथ बढ़ा दूँ।" निशा ने जैसे ही हाथ आगे बढ़ाया सब ऐसे बनने लगे जैसे उसकी बात समझ में ना आ रही हो। फिर उसके एक्संट का मजाक उड़ा कर हँसने लगे।

उनकी हँसी ही नहीं जुबान भी बंद हो गई जब पढ़ाई में भारतीय बच्चे स्वयं को साबित कर गोरों से आगे निकलने लगे। भारतीय बच्चे समझ गए थे कि अंग्रेज बच्चों का मुकाबला करने के लिए उन्हें उनसे अधिक नंबर लाने होंगे जिसके लिए माँ-बाप ने भी अपना पूरा सहयोग दिया।

कुछ माता पिता इकट्ठे होकर स्कूल की मुख्य अध्यापिका के पास पहुँच गए। मुख्य अध्यापिका इतने सारे बच्चों के माता पिता को देख कर हैरान हो गई। वह शीघ्रता से दफ्तर से बाहर आकर उनके आने का कारण पूछने लगी...

आप सब लोग इतनी बड़ी मात्रा में यहाँ। कोई विशेष शिकायत...

"शिकायत तो नहीं एक विनती ले कर हम सब यहाँ उपस्थित हुए हैं... मैडम आप तो जानती ही हैं कि हमारे बच्चे कितने मेहनती हैं। अंग्रेजी हमारी मातृभाषा नहीं है जिस के कारण वह पिछड़ जाते हैं। हम चाहते हैं कि इन बच्चों को अलग से स्कूल के पश्चात एक दो घंटे अंग्रेजी की शिक्षा दी जाए जो उन्हें अंग्रेजी लहजा समझने में कोई कठिनाई न हो।"

इतने सारे बच्चों के माता-पिता की बात अध्यापिका कैसे ठुकरा सकती थी। उसने सबको आश्वासन ही नहीं दिया बल्कि स्कूल में ही भारतीय बच्चों को अंग्रेजी लिखना बोलना सिखाने के लिए अलग से कक्षाएँ लगनी आरंभ हो गईं। उनकी लगन और मेहनत को देखकर दूसरे अध्यापकों का रवैया भी धीरे-धीरे बदलने लगा। जिस स्कूल में भारतीय बच्चे पढ़ते थे उस स्कूल की पढ़ाई का परिणाम काफी अच्छा आने लगा। अब तो हर बड़े स्कूल ही नहीं बल्कि प्राइवेट स्कूलों ने भी भारतीय बच्चों को अपनाना आरंभ कर दिया जहाँ पहले अमीर अंग्रेजों के बच्चे ही पढ़ सकते थे।

बच्चों की अंग्रेजी भाषा में परिवर्तन साफ दिखाई देने लगा। निशा के माता-पिता के समान और माँ-बाप भी घर में अपने बच्चों को अंग्रेजी में ही बात करने के लिए प्रोत्साहित करते दिखाई दिए। इससे उनके दो मकसद पूरे हो रहे थे। एक तो बच्चों को यहाँ का समाज अपना ले, और वह दूसरे अंग्रेज बच्चों के साथ घुल-मिल कर रहें। इसी बहाने बड़े लोग स्वयं भी काफी अंग्रेजी के शब्द सीख रहे थे।

कुछ भी हो एशियन्स और अंग्रेजों के रहन-सहन में अंतर तो है ही। किसी हद तक ब्रिटिशर्स का डर भी सही था। जब बच्चे एक साथ बड़े होंगे, आपस में मिलें जुलेंगे तो जाहिर सी बात है कि यहाँ के स्वतंत्र माहौल में रहने के कारण लड़के लड़कियों में आपस में नजदीकियाँ भी बढ़ेंगी। युवा बच्चों के मेल-जोल को दोनों परिवार रोक नहीं पाएँगे। अंतर उस समय और भी सामने आएगा जब अंतर्राष्ट्रीय विवाह होंगे। दो भिन्न संस्कृतियों के ऐसे मिलने से टकराव भी अवश्य होंगे।

***

"मम्मा यह लोग तो यहाँ बढ़ते ही जा रहे हैं..." सामने वाले घर में इतने सारे लोगों को आते जाते देख कर मिडल एवन्यू स्ट्रीट के लोग घबरा गए।

"घबराओ मत बेटा यह लोग कुछ समय के लिए ही यहाँ पर हैं। कुछ साल यह यहाँ ब्रिटेन में काम करके, अधिक से अधिक धन कमा कर वापिस अपने देश चले जाएँगे तब तक तो हमें इन्हें झेलना ही होगा।"

"अपने देश तो यह लोग बाद में जाएँगे मम्मा पहले तो यह भी पता नहीं चल रहा कि सामने वाले इतने छोटे से घर में कितने लोग रहते हैं कुछ समझ में नहीं आता।"

"हाँ बेटा जब से सामने वाले घर में रहने वाली महिला जून की मृत्यु हुई है तब से हमारी स्ट्रीट का माहौल ही बदल गया है। मना करने पर भी उसकी बेटी इन लोगों को मकान बेच कर लंदन चली गई है। उसे तो बस पैसों से मतलब था।"

"जी मम्मा... एक छोटा सा तीन बेडरूम का घर और सुबह शाम इतने नए चेहरे दिखाई देते हैं। इतने लोग सोते कैसे होंगे माँ।"

"पता नहीं बेटा... जब तक यह किसी नियम का उल्लंघन ना करें हम कुछ कर भी तो नहीं सकते।"

गोरों की उत्सुकता अपने स्थान पर सही भी थी। एक तीन बेडरूम के घर में दस से भी अधिक लोग रहते हैं। यह लोग शिफ्टों में काम करते हैं। कुछ लोग दिन में और कुछ रात में। किसी का भी परिवार साथ न होने के कारण पाँच बिस्तर को दस लोग प्रयोग में लाते हैं। जो लोग दिन में काम करते वह रात को जिन बिस्तरों पर सोते हैं उन्हीं पर रात को काम करने वाले दिन में सोते हैं। इस प्रकार वह अधिक से अधिक पैसे बचाने की कोशिश कर रहे हैं जो शीघ्र ही या तो अपने देश वापिस चले जाएँ या अपना स्वयं का घर ले कर परिवार को यहाँ बुला सकें।

अंग्रेज तो ऐसा कुछ करने के विषय में कभी सोच भी नहीं सकते थे। उनके लिए ये सब दूसरी ही दुनिया की बातें थीं। जब लोगों ने वापिस भारत जाने के स्थान पर अपने परिवारों को ब्रिटेन में ही बुलाने की बात ब्रिटिश सरकार के सामने रखी तो वह कुछ न कर सकी। सबके पास रहने के लिए वीजा जो थे। एक दूसरे की सहायता से लोगों ने अपने घर खरीदने आरंभ कर दिए जो उनका परिवार आराम से रह सके और वह बच्चों को अच्छा जीवन दे पाएँ।

***

रविवार का दिन था।

अँगड़ाइयाँ लेते हुए निशा ने खिड़की खोल दी। बाहर पक्षियों के शोर से वातावरण भरा हुआ था। खुला मैदान हो... सुबह का समय हो... तो पक्षी भी कहाँ खामोश रहने वाले हैं। सुबह के समय हवा भी ठंडक भरी होती है। ब्रिटेन के हर मौसम की कुछ अपनी ही विशेषताएँ हैं। दिन चाहे कितना भी गर्म क्यों ना हो परंतु सूर्य के ढलते ही हवाओं में एक हलकी सी नमी महसूस होने लगती है। निशा अपने घर की खिड़की से बीकन हिल को साफ देख सकती है। जहाँ विभिन्न आकार और रंग की चट्टानें सिर उठा कर मुस्कुरा रही हैं।

बीकन हिल की दूसरी ओर नीचे उतरते ही पेड़ पौधों से भरा खुला मैदान है। थोड़ा आगे चल कर पानी से भरा तालाब है जिसमें सैंकड़ों बतखें मस्ती में इधर से उधर तैर रही हैं। स्कूल की छुट्टियों में तो इस तालाब के चारों ओर का दृश्य ही कुछ और होता है। जब हर उम्र के बच्चे माता पिता की उँगली थामे हाथों में डबलरोटी से भरा थैला बतखों को खिलाने के लिए ले कर आते हैं। कभी बतखें डबलरोटी लेने के लिए बच्चों के पीछे भागती हैं तो कभी बच्चे इनके पीछे भागते हैं। चारों ओर बस बच्चों का और बतखों का शोर सुनाई देता है।

शोर तो यहाँ की हवाएँ भी खूब करती हैं। रात के सन्नाटे में मस्ती से झूमती हुई पेड़ों की डालियों के बीच से छन्न कर आती हुई सड़क की बत्तियों की रोशनी... जैसे सैंकड़ों साये हाथ थामे चल रहे हों... हरियाली और मौसम में गमीं होने के कारण सुबह के समय चट्टानों पर हलकी सी धुंध बिछ जाती है।

उस गीली मटमैली धुंध को देख कर यूँ प्रतीत होता है... मानों किसी गृहणी की दही बिलोती, चिटक कर टूटी मटकी का झाग से भरा मट्ठा सारी चट्टानों पर इधर से उधर बह रहा हो। उस बिखरे झाग के नीचे से झाँकती हुई भीगी शरारती चट्टानें... ज्यूँ चोरी से माखन खाते हुए किसी नटखट बालक का लिबड़ा हुआ मुखड़ा... सुबह के समय के मंद मंद हवा से लहराते पेड़ और पूरे मैदान में बिछे जंगली फूल... अपनी सोंधी खुशबू से पूरे वातावरण में एक नशीली सुगंध भर देते हैं।

खुली खिड़की से फूलों की सुगंध से भरा ठंडा हवा का झोंका आया और निशा की पतली सी नाइटी के अंदर तक उसके बदन को छूता हुआ निकल गया। एक हल्की सी सिहरन निशा के सिर से पैर तक दौड़ गई। उसने शीघ्रता से खिड़की के पलड़े बंद कर दिए। उसकी साँसें तेज चल रही थीं। निशा का जी चाहा कि एक बार फिर से खिड़की खोल कर उस सिहरन को महसूस करे जो सारे बदन में एक हलकी सी गुदगुदी कर के निकल गई थी...।

महसूस करने की चीज तो ब्रिटेन का मौसम है जो ना जाने कब कौन सी करवट लेकर बैठ जाए।

जैसे इनसान का मस्तिष्क।

यह इनसानी मस्तिष्क भी कहाँ स्थिर रहता है। छोटा सा दिमाग जिसमें इतनी सारी जिज्ञासाएँ भरी हैं... जिनमें अनेक सवाल जवाब अपनी खिचड़ी पकाते रहते हैं। मस्तिष्क का शरीर के सबसे ऊपरी भाग, सिर में होने का भी कोई तो कारण अवश्य होगा...। शायद शरीर के सबसे ऊपरी भाग में होने से वह पूरे शरीर की गतिविधियों पर नजर रख सकता है। यहीं से यह सारी इंद्रियों को कार्य करने के संकेत भेजता रहता है जिससे शरीर का संतुलन बिगड़ने ना पाएँ।

मस्तिष्क विचारों का केंद्र है और विचार ही एकत्रित हो कर आविष्कार करते हैं। आविष्कार हुए, तो आकांक्षाएँ, जिज्ञासाएँ और भी बढ़ने लगीं, जिससे व्यक्ति जीने के, उन्नति करने के नए तरीके खोजने लगा।

ये आकांक्षाएँ ना होतीं तो मनुष्य अभी तक ना जाने कौन सी सदी में विचरण कर रहा होता। माना कि जीवन को आगे बढ़ाने के लिए इच्छाओं की आवश्यकता है परंतु हर चीज का अपना एक सीमित दायरा भी होता है। जब कोई यह दायरा तोड़ कर अपनी बाँहें चारों ओर फैलाने का प्रयत्न करता है तो अपने साथ-साथ दूसरों के लिए भी कष्टदायी सिद्ध होता है।

निशा एक खूबसूरत जवान लड़की है। उसके दिमाग में भी इच्छाओं की सरिता प्रवाहित होती रहती है जैसे बारिशों में बहती उफानी नदिया। नदिया का क्या भरोसा... वह तो एक दिन जा विशाल सागर की आगोश में समा कर अपना आस्तित्व तक खो देती हैं। इतने विशाल, खारे पानी के सागर में उसकी मिठास का महत्व ही समाप्त हो जाता है लेकिन निशा के दिमाग में अनगिनित उठते सवाल एक दिन जवाब खोज कर ही दम लेंगे...।

यह जवाब भी अपने में कई सवाल लिए होते हैं...। बीकन हिल की चोटी पर खड़े हो कर जब भी निशा दूर धरती और आकाश का मिलन देखती तो सोचने लगती कि ये बादलों के उस पार का जीवन कैसा होगा...। क्या वहाँ भी हमारे जैसे लोग रहते होंगे। ...अभी तो मैंने इस पार की जिंदगी को ही पूरी तरह से नहीं पहचाना तो फिर उस पार को जानने की तीव्र इच्छा मन में क्यों जागृत हो रही है। ...उस पार ...जिसे माँ ने भी कभी नहीं देखा लेकिन फिर भी हमेशा हमारा देश कह कर संबोधित करती है...। कैसा होगा वह देश जिसे देखने की ललक माँ के दिल में सदैव पनपती रहती है और जिसकी याद मात्र से नानी की पलकें भीग उठती हैं।

नानी को तो उस देश को छोड़े एक अरसा बीत गया है। क्या इतने वर्षों में वहाँ कोई परिवर्तन न आया होगा। ...जिस देश को माँ और नानी इतने मान के साथ अपना कह कर याद करती हैं क्या इतने समय के पश्चात उस देश के वासी उन्हें अपनाएँगे? ...बस इसी उधेड़बुन में खोई निशा माँ से अकसर उलटे सीधे सवाल कर के जवाब ढूँढ़ का प्रयत्न करती रहती है जिसका सीधा जवाब उसे आज तक नहीं मिला...।

सवाल करना हर बच्चे का अधिकार है पर सामने वाले के पास सही जवाब भी तो होने चाहिए...। निशा बचपन से माँ की जुबानी सुनती आ रही है कि हम भारत देश के रहने वाले हैं। हम कहीं भी रहें लेकिन हमारी जड़ें भारत में रहेंगी। निशा अक्सर सोचती...

वह पेड़ कैसा होगा जिसकी जड़ें तो भारत में हैं और शाखाएँ सारे संसार में फैली हुई हैं...। यदि कभी समय और मौसम की मार खाकर उस पेड़ की जड़ें खोखली होकर धरती में ही धँस गईं तो उन शाखाओं का क्या होगा जिन पर हजारों लोग घरौंदे बना कर रह रहे हैं। क्या वो घरौंदे टूट कर बिखर नहीं जाएँगे... आखिर अपनी जिज्ञासा मिटाने के लिए वह माँ से सवाल करने लगती...

"जब शाखाएँ ही उस पेड़ से अलग हो जाएँगी क्या तब भी हम उस देश से जुड़े हुए कहलाएँगे जिसमें कभी वह पेड़ पनप कर बड़ा हुआ था माँ।"

"बेटा तेरे सवाल तो कभी-कभी मुझे भी उलझन में डाल देते हैं...।

इन्हीं उलझनों का ही तो निशा हमेशा हल ढूँढ़ती रहती है। क्षितिज के उस पार जाने की उसकी इच्छा और भी तीव्र होने लगती है...।

"माँ आप बता सकती हैं कि उस पेड़ की नींव किसने रखी होगी। मैं उनसे मिल कर सब कुछ जानना चाहती हूँ। उस विशाल पेड़ को छूना चाहती हूँ..."

"बेटा मैं भी यही अपनी माँ से और शायद मेरी माँ अपनी माँ से सुनती आ रही हैं कि इस विशाल पेड़ की नींव हमारे पूर्वजों ने रखी थी। यह पूर्वज कितनी पीढ़ियों पुराने हैं इसका इतिहास बताना तो बहुत कठिन है...। मैंने जो अपने बड़े बूढ़ों से सुना है वही तुम्हें बता सकती हूँ कि हमारे पूर्वज भारत देश से हैं। हम संसार के किसी भी कोने में क्यों न चले जाएँ मगर कहलाएँगे भारतवंशी ही।"

"लेकिन माँ हमारा देश तो वही होना चाहिए न जहाँ हम पैदा हुए हैं। जहाँ हम रहते हैं। यह बात मेरी समझ से परे है मॉम कि हम रहें कहीं और कहलाएँ किसी और देश के... जहाँ हम रहते हैं, खाते कमाते हैं, क्या उस देश के प्रति हमारा कोई कर्तव्य नहीं? उस देश के साथ तो नाइंसाफी होगी न माँ...।"

"नाइंसाफी की सोचो तो क्या हमारे साथ कम हुई है, तब भी हम अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। हमने अपनी पहचान नहीं छोड़ी..."

"मनुष्य की पहचान यदि उसके देश से होती है तो आप किस देश की कहलाएँगी माँ... भारत, अफ्रीका या ब्रिटेन...? नानी जी भारत से हैं, आप अफ्रीका में पैदा और बड़ी हुईं हैं। भारत देश आपने कभी देखा नहीं। अब पिछले कई वर्षों से आप ब्रिटेन में रहती हैं तो आप किस देश की कहलाएँगी माँ। मेरे बच्चे या उन के बच्चे किस देश को अपना देश कहेंगे या फिर दर-दर भटकते खानाबदोश कहलाएँगे..."

खा़नाबदोश ही तो हैं हम... निशा की नानी सरला बेन जो दूर बैठी माँ बेटी की बातें बड़े ध्यान से सुन रही हैं मन ही मन सोचने लगीं। जिस युगांडा देश को अपना घर जान कर जी जान तोड़ मेहनत की। तिनका-तिनका जोड़ अपना और बच्चों का पेट काट कर कितने अरमानों से एक आशियाना सजाया था यह सोच कर कि यह घर हमें और हमारे बच्चों को सुरक्षा देगा। जब उसी की छत उड़ गई तो फिर बचा ही क्या अपना कहने के लिए...। इधर सरोज जो स्वयं ही सवालों में घिरी हुई है वह बेटी को क्या जवाब दे।

जवाब तो सरला बेन निशा की नानी भी बरसों से कई सवालों के ढूँढ़ रही है...। दो भाइयों की लाड़ली बहन सरला बेन जो गुजरात के एक शहर नवसारी में अपने परिवार के साथ रहती थी। घर में छोटी होने के कारण सब की चहेती थी। माँ तो अपनी बेटी को नवसारी से बाहर अहमदाबाद तक भेजने को तैयार नहीं थी मगर क्या जानती थी कि उनकी बेटी की तकदीर में कुछ और ही लिखा है। शादी के समय माँ ने गले लगाते हुए ठीक ही कहा था "जा बेटा तुझे तखता हम देते हैं बखता ऊपर वाला दे...।" माँ-बाप बेटी के लिए अच्छा घर तो ढूँढ़ सकते हैं किंतु विरासत में अच्छी तकदीर नहीं दे सकते।

सरला बेन के पति पंकज भाई के चाचा जो युगांडा में रहते थे उनकी अचानक मृत्यु हो गई। वे पीछे पत्नी और दो बेटियों को छोड़ गए थे। अच्छा खासा उनका वहाँ किराना स्टोर चल रहा था। उसे अब सँभालने के लिए घर में कोई पुरुष न था। यह वह समय था जब महिलाएँ काम के लिए घर से बाहर नहीं जाती थीं। कमाना केवल पुरुषों का ही काम था। नौकरों के भरोसे किसी व्यापार को कब तक छोड़ा जा सकता। घर वालों ने सलाह करके पंकज भाई व उनकी नई नवेली पत्नी सरला बेन को युगांडा भेज दिया। उनका सोचना अपने स्थान पर उचित था कि कुछ वर्षों पश्चात वहाँ का काम समेट कर सब वापिस भारत आ जाएँगे। मगर वह जो ऊपर बैठा है न, वह मनुष्य की सोच से बहुत आगे सोचता है और सदा ही अपनी मनमानी करता है...। तकदीर ने कुछ ऐसा चक्कर चलाया कि एक बार उनके कदम अपने देश से बाहर क्या निकले कि फिर पलट कर वापिस न आ पाए। उन्हें एक देश से दूसरे देश में ले गए।

सरला बेन अकसर सोचतीं कि... पहले जन्म स्थान छूटा, फिर कर्म स्थान छूटा अब यह धर्म स्थान देखो कब तक पनाह देता है। धर्म स्थान इसलिए कि सब के पास ब्रिटिश पासपोर्ट होने के कारण ब्रिटिश सरकार को बिना कोई सवाल उठाए इन्हें अपने देश में पनाह देनी ही पड़ी...।

सवाल तो सरोज भी कभी खुल कर अपनी माँ सरला बेन से नहीं कर पाई कि वह किस देश की कहलाएगी। युगांडा जहाँ वह जन्म से लेकर जवानी तक रहीँ उसे वह कैसे भूल जाएँ जिसे कुछ वर्षों पहले बड़े गर्व से वह अपना देश कहती थी।

वह भी क्या समय था। देखते ही देखते कितने ही भारतीय जो अधिकतर गुजरात और पंजाब से थे, आ कर अफ्रीका के विभिन्न शहरों में बसने लगे। जिनमें हिंदू, मुसलमान भी और सिख भी थे। सबसे विशेष बात तो यह थी कि इन सब में आपस में भाईचारे की भावना थी। इनके मन में रंग रूप, जाति पांति का कोई भेद भाव नहीं था। पंजाबी जितनी अच्छी तरह से गुजराती बोल सकता था उससे कहीं अच्छी एक गुजराती पंजाबी बोलता था...। एक ही बिल्डिंग के लोग एक परिवार के समान रहते और मिलते जुलते थे। एक दूसरे के त्यौहारों में शामिल होते थे। अधिकतर लोगों का अपना कारोबार था। विशेषकर किराना स्टोर वगैरह जिसमें एशियन मसाले, दालें, चावल, घी, तेल आदि सामान मिलता था।

गुजराती जहाँ भी जाएँगे वहाँ एशियन खाने पीने की कभी भी कमी नहीं हो सकती। गुजराती अपना खाना पीना और अपनी संस्कृति को साथ लेकर चलते हैं। अफ्रीका में हर चीज का अलग-अलग बाजार लगता है। चूड़ी बाजार, मछली बाजार, सब्जी बाजार आदि...। इन सब बाजारों में एशियंस की दुकानें थीं। गरीबी के कारण थोड़े से पैसों में घरों और दुकानों पर काम करने के लिए वहीं के निवासी अफ्रीकन मिल जाते थे।

युगांडा में बहुत गरीबी थी जिसका फायदा एशियंस ने उठाया। वहाँ के रहने वालों के मुकाबले में एसियंस थोड़े पढ़े-लिखे थे। वह पैसा कमाना जानते थे।

वैसे तो अफ्रीका में खुले मैदान व बहुत जमीन है। परंतु जमीनों पर खेती बाड़ी करने के लिए भी तो धन की आवश्यकता होती है जो वहाँ के गरीब निवासियों के पास नहीं था। एशियंस के घरों व दुकानों पर वह दिन रात काम करते थे। जब पेट में दाना न हो और बच्चों की लाइन लगी हो तो इनसान क्या करे। वह स्वयं तो भूखा रह लेगा किंतु बच्चों को भूख से बिलखता कोई नहीं देख सकता। इस लिए चोरी-चकारी का भी काफी डर रहता था। उन के रंग व गरीबी के कारण वह लोगों की मनमानी और हर प्रकार के जुल्म भी सहते थे। अपने बच्चों का पेट भरने की खातिर हर अपमान सहना उनकी मजबूरी थी।

मजबूरी इनसान से क्या नहीं करवाती। इस पापी पेट को काट कर फेंका भी तो नहीं जा सकता। कोई किसी भी रंग का क्यों ना हो भूख सब को लगती है। पेट ना होता तो कौन काम करता। अफ्रीका से देश निकाला मिलने के पश्चात जब ब्रिटेन में आकर पुरुषों को ही नहीं महिलाओं को भी कारखानों में मेहनत मजदूरी करनी पड़ी तब आटे दाल की कीमत समझ में आई। ब्रिटेन जैसे महँगे देश में घर गृहस्थी की गाड़ी चलाने के लिए जब तक मियाँ बीवी दोनों काम ना करें निर्वाह होना बड़ा कठिन है। जुबान से तो कोई भी नहीं बोल सकता था लेकिन जिस युगांडा देश ने उन्हें पनाह दी थी उसी देश के वासियों पर अत्याचार करने का परिणाम सामने आ गया कि सब को देश निकाला मिल गया।

***

साथ वाले घर में इतनी हलचल देख कर जूलियन ने अपने पति को आवाज दी...

"डेव जल्दी आओ देखो पड़ोसी क्या करने वाले हैं।" पड़ोसी यदि एशियन हों तो अंग्रेजों की उत्सुकता और भी बढ़ जाती है।

इस घर में गुरमेल सिंह अपने परिवार सहित रहते हैं। इनके पास डबल गैरेज है। दो महीने में इनके बेटे रजिंदर सिंह की शादी होने वाली है। शादी के लिए तो गुरुद्वारे का हॉल बुक है परंतु कुछ खास रिश्तेदार जो भारत से आने वाले हैं उनको तो घर पर ही ठहराना होगा। ब्रिटेन में वैसे भी घर इतने बड़े नहीं होते जो मेहमानों को ठहराया जा सके। गुरमेल सिंह ने अपने डबल गैरेज की सफाई करवा कर ठीक-ठाक कर दिया। अब इसमें मेहमान रात को आराम से सो सकते थे। वहीं गैरेज के कोने में सबकी सुविधा को ध्यान में रख कर रात को प्रयोग में लाने के लिए एक छोटी सी टॉयलेट भी बनवा दी गई।

उत्सुकता वश अंग्रेज पड़ोसी बार-बार अपने बेडरूम की खिड़की से झाँक कर देखते कि आखिर गैरेज के एक कोने में ये छोटा सा कमरा कैसे बन रहा है। दूसरों के कार्यों में टाँग अड़ाना तो अंग्रेजों का काम है ही।

आखिर डेव से पूछे बिना नहीं रहा गया... "मिस्टर सिंह... यह गैरेज में क्या बन रहा है...।"

"आपको मैंने बताया था डेव कि मेरे बड़े बेटे रजिंदर सिंह की शादी है। शादी में कुछ बाहर से मेहमान आ रहे हैं। आप तो जानते ही हैं हमारे घर इतने बड़े नहीं हैं जो महमानों को ठहराया जा सके। सोचा गैरेज काफी बड़ा है। क्यों ना उनके सोने का इंतजाम यहीं कर दिया जाए। जुलाई का महीना होगा तो हीटिंग की भी आवश्कता नहीं पड़ेगी। रात को एक बिजली के हीटर से काम चल जाएगा। बस उसी के लिए कुछ काम हो रहा है...।"

डेव का माथा ठनक गया। गोरों के पास न तो भारतीयों जैसा दिमाग है और न ही आवभगत की भावना। इनकी शादियों में भी यदि रात को किसी को ठहरना हो तो वह अपना इंतजाम स्वयं किसी होटल में कर के आएगा।

वह समय ही ऐसा था कि एशियंस की शिकायत लगाने के गोरे हमेशा बहाने ढूँढ़ते रहते थे। फिर क्या था कि अचानक पुलिस की दो गाड़ियाँ आ धमकीं। पुलिस ने जब आकर देखा कि वहाँ आराम की हर वस्तु मौजूद है। किसी प्रकार का कानून भंग नहीं हुआ तो वह कुछ न कर सके। बस ये कह कर चले गए कि ख्याल रहे दस बजे के बाद कोई शोर न हो...।

ब्रिटेन में एक यह भी कानून है कि रात के दस बजे के पश्चात कोई शोर नहीं कर सकता। यहाँ तक कि कोई अपनी कार का हार्न भी नहीं बजा सकता जो किसी की नींद खराब ना हो। आप तो अपने घर में जश्न मना रहे हैं किंतु और लोगों ने काम पर जाना होता है। इस लिए रात देर तक शोर करने की मनाही है।

हाँ, तब एशियंस नहीं गोरे शोर मचाते हैं जब पूरा सप्ताह काम करने के पश्चात शुक्रवार को एशियंस का पे-पैकेट अंग्रेजों के मुकाबले में भारी होता है। किंतु उस समय वह शोर नहीं मचाते जब पब में उनके शराब के दौर पे दौर चल रहे होते हैं और एशियंस ओवरटाइम करके पसीना बहा रहे होते हैं। उस वक्त उनको लालची और न जाने क्या-क्या कह कर गालियाँ दी जातीं हैं। अंग्रेज लड़कों के लिए हफ्ते में चालीस घंटे काम करना भी मुसीबत से कम नहीं होता। उन्हें जल्दी से जल्दी घर भागने की पड़ी रहती है। भई क्यों न भागें... शाम होते ही यदि पब नहीं पहुँचेंगे तो उन की गर्लफ्रेंड्स उन्हें छोड़ कर नहीं भाग जाएँगी...।

और चीजों के साथ-साथ लेस्टर अपने पबस के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है। यहाँ पब में लोग केवल शराब पीने ही नहीं आते बल्कि यह उनका सोशल क्लब भी होता है। यहाँ लोग शराब के साथ पब के गर्मा-गर्म खाने का भी मजा लेते हैं। शाम को सब दोस्त यहाँ इकट्ठे होते हैं। बारी-बारी से ड्रिंक्स के दौर चलते हैं। जब एक हाथ में सिगरेट दूसरे में बियर का गिलास और बगल में गर्लफ्रेंड हो तो शाम भी झूमती हुई गुजरती है। पैसों की भी कोई परवाह नहीं करता चाहे सोमवार से ही उनके पास डबलरोटी के लिए भी कुछ नहीं बचता। वह एक दूसरे से उधार माँगते फिरते हैं।

पब का माहौल कुछ अपनी ही रंगीनियाँ लिए होता है। शुक्रवार और शनिवार की शाम को सड़कों पर विशेषकर पब के अंदर और आस-पास बहुत ही चहल पहल और शोर-शराबा सुनने को मिलता है। लोग अपनी गर्लफ्रेंड्स व पत्नियों की बाहों में बाँहें डाले घूम रहे होते हैं। उस दिन सबकी जेब जो गर्म होती है। लोग पब में तरह-तरह के खेल जैसे क्विज, डार्टस आदि, खेलते मिलते हैं। पब चलाने वाले भी कम दाम पर शराब और बड़ी टी.वी. स्क्रीन पर फुटबाल मैच दिखा कर लोगों के मनोरंजन का पूरा खयाल रखते हैं।

शुक्रवार और शनिवार की रात को पब के आस पास पुलिस भी काफी सतर्क दिखाई देती है। पीने वालों का कोई भरोसा नहीं कि कब पीकर इनका दिमाग फिर जाए और आपस में हाथापाई पर उतर आएँ जो अक्सर शुक्रवार और शनिवार की रातों को देखने को मिलता है। इन दो रातों को पुलिस का काम भी बढ़ जाता है।

यह नहीं कि शराब पीकर पुरुष ही हाथापाई करते हों। कई बार तो महिलाएँ भी नशे में धुत आपस में गुत्थमगुत्था हुई सड़क पर लड़ती हुई मिलती हैं।

लेस्टर की हर बड़ी सड़क पर दो तीन पब होने मामूली बात है। जब हर कोने पर पब हों तो एशियंस भी कैसे उनसे अछूते रह सकते हैं। जैसे-जैसे लेस्टर की जनसंख्या बढ़ने लगी पब वालों की बिक्री में भी बढ़ोती होने लगी। इस बात के लिए वह एशियंस का धन्यवाद करते न शरमाते।

***

यह नहीं कि भारतीय केवल कारखानों में ही काम कर रहे थे। अफ्रीका से आने वाले भारतीय अपने साथ पैसा लेकर आए थे। वहाँ करीब सभी का अपना कारोबार था। यह अफ्रीका में बड़ा बिजनस चलाने वाले एशियंस पहले से ही अपने काम के सिलसिले में ब्रिटेन के लोगों से जुड़े हुए थे जिनमें एशियंस ही नहीं गोरे भी थे। यह लोग पढ़े-लिखे भी थे। वहाँ बड़ा अच्छा समय व्यतीत कर के आ रहे थे।

ब्रिटेन उनके लिए नया नहीं था। उन्हें जैसे ही यह आभास हुआ कि युगांडा के राष्ट्रपति इदी अमीन एशियंस को देश से निकलने का आदेश देने वाले हैं तो वह चुपचाप अपनी दुकानें व मकान बेच कर ब्रिटेन आ गए। अपने कारोबार को लेकर पहले से ही ब्रिटेन से जुड़े होने के कारण उन्हें किसी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा। इनके पास पैसा था। ब्रिटिश पासपोर्ट था। यह अपना हक जान कर ब्रिटेन में आए और आते ही सैटल भी हो गए।

पहले भारत फिर अफ्रीका से भारतवंशियों के आने से ब्रिटेन की इकोनोमी को भी बहुत लाभ हुआ। कारखानों में काम तेजी से चलने लगा। लोगों के पास भरपूर काम था। जिनके पास पैसा था उन्हों ने रहने के लिए मकान व कारोबार के लिए दुकाने लेकर काम करना आरंभ कर दिया। लेस्टर की बेलग्रेव रोड पर धीरे-धीरे साड़ियाँ, सोने चाँदी, हीरे के आभूषण और खाने-पीने की दुकाने दिखाई देने लगीं। जगह जगह गुजराती मिठाई की दुकानें व पंजाबी ढाबे व रेस्तराँ खुल गए।

भारत और अफ्रीका से आए लोगों में अंतर यह है कि भारत से आए लोग स्वयं को प्रवासी कहते हैं। उन्हें ब्रिटेन में वर्किंग वीजे के साथ, जेब में केवल तीन या पाँच पाउंड लेकर ही आने की अनुमति मिली। अफ्रीका से आने वाले लोगों के पास पहले से ही ब्रिटिश पासपोर्ट होने के कारण वह स्वयं को प्रवासी नहीं इस देश का निवासी समझते हैं। उनके पास पैसा भी है और इस देश में रहने के पूरे अधिकार भी।

अधिकार समझ कर ही तो लोग एक दूसरे से पैसा लेकर अपने घर खरीदने लगे...

"मनोज भाई आप घर देख रहे थे कैसा लगा?"

"घर तो अच्छा है लेकिन थोड़ा छोटा है..."

"अरे भाई छोटा है तो क्या हुआ, है तो अपना ही ना। थोड़े समय के पश्चात जब काम अच्छा चल पड़े तो बड़ा भी ले लेना। किराये के मकान में तो डर ही लगा रहता है कि कब मकान मालिक खाली करने को बोल दे।"

"ठीक कहा यार... अकेली जान तो कैसे भी रह ले किंतु बाल बच्चों के साथ दर-दर भटकना भी तो आसान बात नहीं।"

"ठीक कहा मनोज भाई। गोरे तो वैसे ही हम से उखड़े रहते हैं..."

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भारत से केवल देहातों से अनपढ़ लोग ही ब्रिटेन में नहीं आए थे बल्कि कुछ डिग्रियाँ लिए लोग भी थे। जो ठीक प्रकार से अंग्रेजी लिख बोल लेते थे उनके पास अच्छी नौकरियाँ भी थीं। अधिकतर लोगों को अपने रंग-रूप व ठीक से अंग्रेजी न बोल सकने के कारण मजबूर हो कर कारखानों में मजदूरी करनी पड़ी। घर वालों ने उन्हें बड़ी आशाओं के साथ यहाँ भेजा था इस लिए वह वापिस भी किस मुँह से जाते। कुछ ने कारखानों का रुख किया, कुछ टैक्सी ड्राइवर बने और कुछ तकदीर के मारे ऐसे भी थे जिन्हें होटलों में बर्तन धोने तक का काम करना पड़ा।

व्यापार और कारखाने बेलग्रेव रोड के आस पास होने के कारण लोगों ने मकान भी यहीं ढूँढ़ने आरंभ कर दिए। भारतीयों की एक विशेषता है कि घर चाहे छो़टा हो परंतु अपना होना चाहिए किराए का नहीं।

बेलग्रेव रोड के आस-पास जितनी भी स्ट्रीटस हैं उनमें अधिकतर टैरेस्ड घर हैं। टैरेस्ड यानी 10-12 या कभी उस से भी अधिक एक जैसे घर सीधे एक ही कतार में जुड़े हुए होते हैं। हर दो घरों के बीच में घर के पिछवाड़े तक ले जाने के लिए एक छोटी सी गली होती है। ब्रिटेन के कानून के अनुसार घरों से बाहर निकलने के लिए दो रास्ते होना आवश्यक है। यदि कोई दुर्घटना हो जाए, घर में आग लगने से एक रास्ता बंद हो जाए तो दूसरे दरवाजे से निकल कर कम से कम अपनी जान तो बचाई जा सकती है।

सन् 1970 तक यहाँ के आम घरों में सर्दियों में घरों को गर्म करने के लिए गैस या बिजली की सैंट्रल हीटिंग नहीं थी। बड़े मनोरंजक तरीके से घरों को गर्म किया जाता था। नीचे वाले कमरों में दीवार के बीचोबीच एक अँगीठी बनी होती थी जिसमें कोयला जलाया जाता था। यह अँगीठी दो काम करती थी। एक तो कोयले की गर्मी से घर गर्म रहते थे दूसरा इस अँगीठी के ऊपर ही बड़ी सी चिमनी बनी होती थी जो ऊपर बाथरूम से होकर छत पर खुलती थी। (आज कल भी जिन घरों में बिजली या गैस के हीटर हैं उन घरों में यह चिमनियाँ दिखाई देती हैं जिनका काम है हीटर से निकलती जहरीली गैस को सीधे चिमनी के द्वारा बाहर निकाल देना।) कमरे में अँगीठी से थोड़ी दूर दीवार पर एक लोहे की छड़ लटक रही होती थी। उस छड़ को खींचते ही बाथरूम में ठीक चिमनी के ऊपर रखे हुए पानी के टैंक में पानी गर्म होने लगता था। ठीक अँगीठी के ऊपर पानी का टैंक लगाने का भी एक कारण था। क्यों कि हीट हमेशा ऊपर को उठती है। यही हीट ऊपर रखे पानी के टैंक को गर्म करने का काम करती थी। यह गर्म पानी नहाने और सारा दिन घर के काम करने के लिए प्रयोग किया जाता था।

पानी के टैंक इतने बड़े नहीं होते थे जो कि परिवार के सदस्य प्रतिदिन नहा सकें। गोरे तो वैसे भी नहाने के चोर होते हैं। सुबह उठ कर गीले कपड़े से शरीर को पोंछ कर अच्छी तरह से परफ्यूम छिड़क कर काम पर चल देते हैं।

यह वो समय था जब अधिकतर लोग टैरेस्ड घरों में रहते थे। इन घरों में लोगों के नहाने के लिए टब या शावर तक की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। नहाने के लिए पब्लिक बाथ बने होते थे जहाँ पैसे डाल कर गर्म पानी उपलब्ध होता था। लोग सप्ताह में एक बार वहाँ जाते थे नहाने के वास्ते।

जिन घरों में टब थे भी वहाँ सप्ताह में एक बार आधा टब भर कर घर के सारे बच्चों को एक साथ एक ही पानी में नहलाया जाता था।

यह टैरेस्ड घर अधिक बड़े नहीं होते बस दो या तीन बेडरूम के ही होते हैं। घरों में जलाने वाला कोयला या बाकी का फालतू सामान रखने के लिए घरों के नीचे सैलर यानी तहखाने होते हैं। उन दिनों कोयले की खपत बहुत अधिक थी। कारखानों से लेकर घर के हर काम के लिए कोयले की आवश्यकता पड़ती थी।

घर के बाहर सैलर के ठीक ऊपर एक छोटी सी खिड़की बनी होती थी जिसके द्वारा बाहर से ही अँगीठी में जलाने वाला कोयला सैलर में भरा जा सकता था। बहुत से लोग इन कोयले की खदानों में काम करते थे। इन कोयले की खदानों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए घरों में प्रयोग करने का कोयला मुफ्त में मिलता था।

***

लेस्टर अपनी एक और चीज के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है और वह है उसके चारों और बनी हुई केनाल्स। केनाल प्रकृति की नहीं मनुष्य द्वारा बनाई हुई छोटी नहरें हैं जो बारिश का पानी इकट्ठा करने का काम भी करती हैं। उन दिनों इन्हीं केनाल्स के द्वारा ब्रिटेन का सारा व्यापार होता था। इन केनाल का सबसे बड़ा आकर्षण है इनका लॉक सिस्टम। क्यों कि इन में ज्यादा पानी नहीं होता इस लिए थोड़ी थोड़ी दूर पर पानी को रोकने के लिए लंबे दरवाजेनुमा पुल और उनमें लगे ताले हैं। इन्हीं तालों द्वारा केनाल के पानी पर रोक लगाई जाती है। जब कश्ती एक केनाल से दूसरी में जाने लगती है तो ताला और दरवाजा खोल कर पिछली केनाल से थोड़ा पानी आगे आने वाली केनाल में भरा जाता है जो पानी की सतह एक सी रहे और कश्ती आराम से चल सके।

आज भी पानी के इस मनोरंजक तरीके से ऊपर नीचे जाने के दृश्य का अनुभव करने के लिए ही कुछ लोग किराए पर कश्तियाँ लेकर केनाल में उतरते हैं। कई बार तो स्कूल के बच्चों को भी यह सब दिखाने के लिए केनाल बोट ट्रिप पर ले जाया जाता है।

सन् 1960 से पहले इन्हीं केनाल के द्वारा कारखानों का कच्चा माल व घरों के लिए कोयला आदि कश्तियों के द्वारा पहुँचाया जाता था। पहले दूर से कश्तियों में सामान आता था। फिर बाहर तैयार खड़ी घोड़ागाड़ी में सामान लाद कर घरों में ले जाने का काम होता। कश्तियों और घोड़ागाड़ी के द्वारा सामान इधर से उधर पहुँचाना काफी महँगा भी पड़ता था और समय भी अधिक लगता था। इसका स्थान बाद में स्टीम से चलने वाली मालगाड़ियों और सड़क द्वारा सामान पहुँचाने का काम ट्रकों ने ले लिया। धीरे धीरे केनाल्स का प्रयोग कम होते हुए बिल्कुल ही समाप्त सा होने लगा। आज कल लोग इन केनाल्स में घूमने व पिकनिक करने जाते हैं।

केनाल के साथ साथ किनारे से थोड़ी ही दूरी पर मकान बने हुए हैं। पब हैं जहाँ कश्ती को रोक कर वहीं पर तैयार हुए गर्मागरम खाने के साथ ड्रिंक्स का भी मजा लिया जा सकता है। कुछ फिशिंग के शौकीन लोग केनाल के किनारे बैठे सारा दिन मछलियाँ पकड़ते दिखाई देते हैं। केनाल का पानी साफ न होने के कारण पकड़ी हुई मछली खाई नहीं जाती। बस यह तो एक शौक और समय बिताने का एक साधन है। इसी बहाने लोग थोड़ी धूप भी सेंक लेते हैं।

पहले काँटा डाल कर मछली को पकड़ा जाता है फिर उसे तोल कर और उसकी लंबाई नाप कर उसे फिर से पानी में छोड़ देते हैं...। घर जाने से पहले देखा जाता है कि किसने सबसे अधिक व सबसे बड़ी मछली पकड़ी है। यह उनके लिए एक प्रकार का खेल और मन बहलाने का एक जरिया है। सैंकड़ों बतखें वहाँ तैरती व मछलियों का शिकार करती मिलती हैं। जहाँ इनसान होंगे वहाँ खाने के लालच में पक्षी भी दिखाई देंगे...। यह केनाल बारिश का पानी इकट्ठा करने में सहायक सिद्ध होती हैं जो बारिश अधिक होने से पानी सड़कों पर न आ जाए।

यहाँ की बारिश भी एक विशेष चीज है। हर समय अपने साथ छाता रखना पड़ता है कि न जाने कब सूर्य देवता थक कर बादलों की शैया पर विश्राम करने चले जाएँ और हवाओं के हिंडोलों के साथ बरखा रानी अपनी तान छेड़ कर उन्हें लोरी सुनाने आ धमकें।

वैसे गर्मी की बारिश में भीगने का तुत्फ कुछ अपना ही होता है। ब्रिटेन की गर्मी की बारिश का हाल कोई निशा और उसकी सहेलियों से पूछे...

निशा सहेलियों के साथ स्कूल से आ रही थी। आसमान बादलों से भरा हुआ था। फिर भी काफी गर्मी थी। हवा भी उमस भरी थी। देखते ही देखते हवा की गति तेज हो गई... हवा का साथ देने के लिए उतरी दिशा से घुमड़ कर बादल भी आ गए। लोगों का कहना है कि जब उत्तरी दिशा से बादल आएँ तो बरस कर ही जाएँगे। काले घने बादलों में गड़गड़ाहट होते ही जोर से बारिश आरंभ हो गई। कुछ लड़कियाँ बारिश से बचने के लिए पेड़ों का सहारा लेने लगीं तो दूसरी उन्हें खींच कर फिर बारिश में ले आतीं। सब सहेलियाँ एक दूसरे के पीछे भागती हुई मस्ती से शोर मचाते हुए बारिश में भीगने लगीं।

सामने ही निशा का घर दिखाई दे रहा था। एक सर्द हवा के झोंके के साथ जब बादलों ने गरज कर जोर से ओले बरसाने शुरू किए तो सब पेड़ों के नीचे पनाह लेने के लिए भागीं। ओले छोटे हों या बड़े जब किसी गंजे से के सिर पर बरसते हैं तो इसका मजा वही जानता है। जब लड़कियाँ पेड़ों के नीचे भी ना बच पाईं तो निशा के साथ उसके घर की ओर भागीं।

सब बुरी तरह से ओलों की मार खा चुकीं थी। अभी थोड़ी देर पहले जो गर्मी की शिकायत कर रही थीं वही ठंड से बुरी तरह काँपने लगी।

"उफ यह बरसात है कि बर्फ के गोले, इतनी ठंडी बारिश और वह भी गर्मी के मौसम में..." निशा टपकते बालों को निचोड़ते हुए बोली।

"यही तो है ब्रिटेन का मौसम जो यहाँ की महिलाओं के मूड के समान बदलता है..."

थोड़ी देर में आसमान साफ हो गया। जितनी तेजी से बादल आए उतनी ही तेजी से बरस कर चले गए। बादलों के छटते ही सब जा कर बाहर धूप में अपने कपड़े सुखाने के लिए खड़ी हो गईं और फिर धीरे-धीरे अपने घरों की ओर चल पड़ीं...।

"निशा आज मेरे घर चलो इकट्ठे मिल कर होमवर्क करेंगे एंजलीना जाते-जाते रुक कर बोली...।"

"हूँ... तुम चलो एंजलीना मैं मम्मा से पूछ कर और कपड़े बदल कर आती हूँ।"

एंजलीना... जिसे सब लोग एंजी कह कर बुलाते हैं निशा की अच्छी दोस्त है। वह निशा की ही स्ट्रीट में तीन-चार मकान छोड़ कर रहती है। दोनों स्कूल भी एक साथ जाती हैं। एंजी जब भी निशा के घर आती है तो खाना खाकर ही जाती है। उसे एशियन खाना बहुत पसंद है। एंजी की माँ को भी उसके निशा के घर में आने जाने से कोई आपत्ति नहीं है। वह जानती हैं कि निशा पढ़ाई में बहुत तेज है और उसके साथ रह कर एंजी की भी पढ़ाई के प्रति रुचि बढ़ने लगी है। दोनों लड़कियाँ बड़े मन से पढ़ाई कर रही थीं कि घड़ी पर नजर डालते हुए एंजी ने कहा...

"निशा अभी हमारा होमवर्क पूरा नहीं हुआ और शाम के खाने का भी समय हो रहा है... क्यों ना तुम आज खाना हमारे साथ खा लो।"

"लेकिन एंजी तुम्हारी मॉम... "

"मैं अभी मॉम से पूछ कर आती हूँ..." उसकी बात बीच में ही छोड़ कर एंजी भाग खड़ी हुई।

"निशा... एंजी की मम्मी की किचन से आवाज आई... मैं रोस्ट चिकन बना रही हूँ। तुम्हें पसंद है ना। तुम उसके साथ कितने आलू लोगी..."

"जी..."

"हाँ निशा हमारा खाना तुम्हारी तरह नहीं होता। हम गिन कर पूरा हिसाब से बनाते हैं जो खाना दूसरे दिन के लिए बचे नहीं।"

निशा को यह बातें बड़ी अजीब सी लगीं। उसके घर में तो आवश्यकता से अधिक खाना बनता है कि यदि कोई खाने के समय घर पर आ जाए तो शर्मिंदगी का सामना ना करना पड़े। निशा ने झिझकते हुए कहा... जी दो आलू।

भारतीय और अंग्रेजों की संस्कृति में धरती आकाश का अंतर है। भारतीयों के लिए अतिथि भगवान का रूप माना जाता है जबकि अंग्रेजों के घर में कोई बिन बुलाए आ जाए तो कई बार तो वह उसे घर के अंदर आमंत्रित भी नहीं करते बस दरवाजे से ही बात कर के टरका दिया जाता है। अंदर बुला भी लें तो चाय तक नहीं पूछते।

समय पर खाना खाने के लिए आवाज आ गई। आज खाने की मेज पर केवल एंजी और उसकी मॉम ही हैं। एंजी के डैड काम के सिलसिले में कहीं बाहर गए हुए हैं। एक बड़ा भाई है जो युनिवर्सिटी में पढ़ रहा है।

किचन से ही खाने की प्लेटें परोस कर लाई गईं। निशा की प्लेट में एक पीस चिकन का, दो आलू और साथ में उबले हुए गाजर और मटर थे। सबने ऊपर ग्रेवी डाल कर खाना शुरू कर दिया। निशा खाते हुए सोच रही थी... इतने से मेरा क्या बनेगा... घर जाते ही माँ के हाथ के बने हुए थेपले खाऊँगी।

खाने में जो सब से अच्छी चीज निशा को लगी वो थी पुडिंग। घर की बनाई हुई ताजी एपल पाई और उसके ऊपर गर्मागर्म कस्टर्ड बिल्कुल वैसा ही जैसा स्कूल डिनर्स में मिलता है...।

***

लेस्टर के चारों ओर हर आठ-दस मील की दूरी पर छोटे-छोटे गाँव बसे हुए हैं। जैसे लाफ़्बरो, सालबी, कोलविल, ऐशबी, थर्मस्टन, सायस्टन, मेलटन मोबरी आदि। प्रत्येक गाँव की अपनी एक विशेषता है। कोई अपनी यूनिवर्सिटी के लिए, कोई पब और रेस्तराँ के लिए तो कोई लैंडस्केप के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के मेल्टन मोबरी गाँव के कारखाने में बनी हुई पोर्क पाईस तो देश में ही नहीं पूरे योरोप में मशहूर हैं। पाई की पेस्ट्री ऐसी कि अपना स्वाद छोड़ते हुए मुँह में ही घुल जाए। यह सब गाँव लेस्टर का ही एक हिस्सा हैं जिन्हें मिला कर ही यह "लेस्टरशयर" कहलाता है।

लेस्टर को गाँवों का देश भी कहा जाता है क्यों कि यह चारों ओर से गाँवों से घिरा हुआ है। इसी से इसकी गिनती ब्रिटेन के बड़े शहरों में होती है। कुछ लोग रिटायर होने के पश्चात छोटी जगह पर रहना अधिक पसंद करते हैं जहाँ वह शहरों की भीड़-भाड़ से दूर रह कर प्रकृति का मजा लेते हुए टहल सकें। गर्मी के दिनों में यहाँ रंग-बिरंगे बाग व घरों के बाहर टँगी हुई फूलों से भरी टोकरियों से सारा वातावरण महकता है।

निशा जिस घर में अपने परिवार के साथ रहती है वह एक कोने का मकान है। लेस्टर के लोगों का कहना है कि यदि किसी एशियन के पास कोने का घर है तो समझ लो कि वहाँ एक दुकान खुल जाएगी।

निशा के पापा ने भी नीचे के कमरे को और बड़ा करवा कर उसमें शैल्फ वगैरह लगवा एक अच्छी सी दुकान में परिवर्तित कर दिया। घर के पास कोई और दुकान भी नहीं थी जो रात देर तक खुली मिले। वैसे इन दुकानों की बिक्री शाम 6 बजे के बाद बाकी सारी दुकानें और सुपरमार्किट बंद हो जाने के पश्चात अच्छी खासी हो जाती है। इन कोने की दुकानों में घर में प्रयोग होने वाला हर छोटा बड़ा सामान, समाचार पत्र से लेकर शराब तक मिलते हैं।

एशियंस का सोचना है कि शराब बेचना महिलाओं का काम नहीं है इसलिए दिन में नानी सरला बेन इस दुकान को चलातीं हैं और शाम को निशा के पापा सुरेश भाई। उस समय ग्राहक अधिकतर बियर, सिगरेट वगैरह लेने आते हैं। आस-पास सब गोरों के मकान होने के कारण शुरू में दुकान चलाने के लिए काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पास में और कोई ऐसी दुकान थी नहीं जो रात देर तक खुलती हो। पब भी थोड़ी दूरी पर थे। धीरे-धीरे ग्राहक आने आरंभ हो गए। सुरेश भाई के हँसमुख स्वभाव और मीठी जुबान ने जल्दी ही ग्राहक खींचना शुरू कर दिया।

सामने से सरोज को आता देख कर सुरेश भाई बोले...

"सरोज दुकान ने ग्राहक खींचने आरंभ कर दिए हैं। ऊपर वाले की मर्जी हुई तो और अच्छी चल पड़ेगी। मैं चाहता हूँ कि आप कारखाने की नौकरी छोड़ कर दिन में बा के साथ दुकान का काम सँभाला करो।"

" नहीं जी... दुकान से अभी इतना खर्चा नहीं निकलता कि मैं अपनी कारखाने की नौकरी छोड़ दूँ। बच्चों की स्कूल की पढ़ाई चाहे मुफ्त होती है परंतु बाकी के खर्चे तो स्वयं ही करने पड़ते हैं। निशा और जितेन जैसे-जैसे बड़े हो रहे हैं उनके खर्चे भी बढ़ रहे हैं। मैं चाह कर भी कारखाने की नौकरी अभी नहीं छोड़ सकती।"

सरोज जैसी और भी बहुत सी महिलाएँ हैं जिन्होंने अफ्रीका में कभी नौकरी नहीं की थी। यहाँ आने पर घर चलाने के लिए सब को कड़ी मेहनत का सामना करना पड़ा। कारखानों में पीस-वर्क के हिसाब से वेतन मिलता है यानी जितना काम उतने पैसे। हर काम गिनती के साथ होता है इस लिए सबकी यही कोशिश रहती है कि बिना किसी से बात किए बस अधिक से अधिक काम किया जाए। उस समय यह तेज हाथ चलाती हुई महिलाएँ किसी मशीन से कम दिखाई नहीं देतीं।

सरोज जिस होजरी में काम करती है वह यहाँ के बहुत ही प्रसिद्ध सर रिचर्ड टाउल्स का कारखाना है। सर रिचर्ड टाउल्स ने अपने कठिन परिश्रम द्वारा देखते ही देखते एक छोटे से कारखाने से तीन बड़े कारखाने खड़े कर लिए। इनके पिता कोयला खदान में काम करने वाले एक मामूली मजदूर थे।

रिचर्ड अपने माता पिता की एकलौती संतान हैं। यह वो समय था जब पीढ़ी दर पीढ़ी लोग कोयला खदानों में काम करते चले आ रहे थे। पढ़ाई केवल अमीर लोगों के बच्चों का काम था। रिचर्ड की माँ एलिजबेथ का यह सपना था कि वह अपने एकलौते बेटे को पढ़ा लिखा कर एक बड़ा आदमी बनाए जिसके लिए पति और बेटे दोनों ने उसका साथ दिया। यह जानते हुए भी कि यह रास्ता बहुत कठिन है। दोनों मियाँ-बीवी ने अपना पेट काट कर आखिर बेटे को युनिवर्सिटी तक पहुँचा ही दिया। रिचर्ड के लिए भी यह सब आसान नहीं था। अमीर बच्चों के साथ वह कहाँ मेल रख सकता था। बहुत कुछ ताड़ना, अवहेलना सहते हुए आखिर वह दिन भी आ गया जब रिचर्ड डिग्री ले कर बाहर आया।

"डिग्री तो मिल गई अब आगे क्या करने का इरादा है बेटे?" माँ ने पूछ ही लिया।

"मैंने अपना ही कुछ काम करने का सोचा है मॉम।"

"अपना काम... क्या करने की सोची है...?"

"मॉम यहाँ अमीर गरीब के बीच बहुत बड़ा अंतर है। अब जब डिग्री ले ही ली है तो मैं किसी के लिए काम नहीं करूँगा। मैं अपना ही कोई काम करना चाहता हूँ।"

"बेटे इस मामले में तुम हमसे अधिक जानते हो जैसा उचित समझो..."

रिचर्ड का काम शुरू करवाने के लिए उसके माता पिता ने अपना बड़ा मकान बेच दिया। वह एक दो बेडरूम के फ्लैट में चले गए। बचे हुए पैसों से रिचर्ड ने एक छोटा सा कारखाना खोल कर उसमें तीन चार ओवरलॉकिंग की मशीनें लगा दीं। जिसके लिए उसे बैंक से भी सहायता लेनी पड़ी। वह दूसरे बड़े कारखानों से ओवरलॉकिंग का काम लाकर अपने कारखाने में तैयार करता। रिचर्ड की हिम्मत, मेहनत व लगन ने रंग दिखाया और काम बढ़ने लगा।

कॉलेज के समय से ही रिचर्ड और जेनी एक दूसरे से प्यार करते हैं। जेनी एक उद्योगपति की बेटी है। उसे मालूम है कि मॉम डैड रिचर्ड से शादी की मंजूरी कभी नहीं देंगे। एक तो अमीर माता पिता की बेटी ऊपर से एकलौती संतान। उसने जब जो माँगा फौरन मिल गया। जेनी जानती थी कि इस बार डैड उसकी बात आसानी से नहीं मानेंगे। अपनी बात मनवाने का उसने दूसरा तरीका निकाला...

"रिचर्ड अब समय आ गया है कि हम दोनो शादी कर लें..." जेनी ने रिचर्ड की बाँहों में मचलते हुए कहा...

"किंतु जेनी तुम्हारे मॉम और डैड... वो तो कभी मंजूरी नहीं देंगे।"

उन्हें देनी ही पड़ेगी... मेरे मन में एक विचार आया है... बस तुम्हारा साथ चाहिए..." पहले तो रिचर्ड को जेनी की बात पसंद नहीं आई किंतु जेनी की जिद के आगे वह झुक गया।

बेटी जब शादी करके सामने खड़ी हो गई तो जेनी के मॉम डैड कुछ न कर सके। हाँ समाज में अपनी इज्जत कायम रखने के लिए उन्हें रिचर्ड को अपनाया ही नहीं बल्कि धूम-धाम से बेटी की शादी सारे समाज के सामने चर्च में कर दी। रिचर्ड की काम के प्रति लगन व मेहनत देख कर जेनी के डैडी ने अपने दामाद का काम बढ़ाने में उसका पूरा साथ दिया। उसकी सफलता को देख कर एक दिन जेनी के डैडी ने उन्हें सलाह दी...

"रिचर्ड अब समय आ गया है कि तुम अपना काम बढ़ाने के लिए एक और कारखाना खोल लो..."

"पर डैडी इसका काम ही कितना फैला हुआ है। जेनी काम में मेरा हाथ बँटाती है। हमारी बेटी रोजी भी अभी छोटी है। और काम बढ़ा लिया तो इसे कौन सँभालेगा।"

तुम इसकी चिंता मत करो। जेनी समझदार है वह सब सँभाल लेगी। तुम नया काम शुरू करो।"

"वो तो ठीक है डैडी लेकिन कारखाना चलाने के लिए वर्क फोर्स की भी तो आवश्यकता होती है। हमारे पास इतने लोग नहीं हैं।"

"तुम यह सब मुझ पर छोड़ दो रिचर्ड। इसका भी उपाय है। मालूम है न कि हमारी सरकार पहले ही गरीब देशों से यहाँ काम करने के लिए मजदूरों को लेकर आई है। उन्हें काम करने के परमिट व बीजे दिए गए हैं। यह लोग एक दो नहीं सैंकड़ों की संख्या में ब्रिटेन में आए हैं। यह मौका अच्छा है। मजदूर स्वयं ही काम की तलाश में इधर आएँगे क्योंकि सारे कारखाने और होजरी तो मिडलैंड्स में ही हैं...। कोशिश करो कि यहीं लॉफ़्बरो में ही कहीं जगह मिल जाए एक और कारखाना खोलने के लिए तो अच्छा होगा।"

बस फिर क्या था देखते ही देखते रिचर्ड ने लॉफ़्बरो में ही एक के बाद एक तीन बड़े कारखाने खड़े कर दिए...। लॉफ़्बरो जैसे छोटे शहर में जिधर भी नजर घुमाओ टाउल्स टैकस्टाइल की इमारतें ही दिखाई देने लगीं। पूरे लेस्टरशयर में उनका दबदबा बढ़ने लगा। कोयला खदान में काम करने वाले एक मामूली से मजदूर का बेटा नाम और इज्जत कमा कर रिचर्ड से "सर रिचर्ड टाउल्स" बन गया।

टाउल्स कारखानों की इमारतें एक विशेष प्रकार के हल्के भूरे रंग की ईंटों से बनी हुई हैं। यह ईंटे भी लॉफ़्बरो के कारखाने में ही तैयार की गई हैं। इमारत के अंदर घुसते ही सामने एक बड़ा सा दरवाजा है लोगों के अंदर आने के लिए। दरवाजे के ऊपर सर उठाए एक बड़ा सा नीले रंग का बोर्ड लगा है जिस पर सफेद शब्दों में लिखा हुआ है "टाउल्स टैक्स्टाइल्स"। दरवाजे से अंदर बाएँ हाथ पर एक बड़ी सी क्लॉक मशीन लगी हुई है। वहाँ काम करने वाले कारखाने में आते ही सबसे पहले अपने नाम और नंबर का कार्ड निकाल कर उस मशीन के अंदर डाल पंच करते हैं जिससे उस पर समय छप जाता है कि वह कितने बजे काम पर आए। ऐसे ही जाते समय सब लोग कार्ड को पंच करके जाते हैं।

दरवाजे में प्रवेश करते ही कहीं मशीनों की आवाजें तो कहीं ट्रॉली को इधर से उधर घसीटने के शोर से पता चल जाता है कि यह कोई बड़ा कारखाना है। यह 70 के दशक का समय था जब कि कारखानों की नहीं काम करने वालों की कमी थी।

सारी कमी पहले भारत और फिर अफ्रीका से आए लोगों ने पूरी कर दी।

सर रिचर्ड एक के बाद एक तीन बड़े कारखानों के मालिक बन गए। इनका सबसे पहला कारखाना... जिसमें रंगाई का काम होता है इसकी इमारत स्वयं अपना इतिहास बताती है। छत और दीवारों पर जमी हुई काई तो कहीं मौसम की मार खाती हुई भुरभुरी ईंटें। यह कारखाना छोटा होने के कारण यहाँ काम करने वाले कम दिखाई देते हैं। यह पुरुष प्रधान कारखाना है। एक बड़े से आँगन में बर्तनों में पानी में घुले हुए विभिन्न प्रकार के रंग पक रहे हैं। कुछ काम करने वाले मजदूर सूती धागों व ऊन के लच्छों को अलग-अलग रंगों में डुबो कर रंग रहे हैं। यह रंगे हुए लच्छे फिर बड़ी टोकरियों में भर कर दूसरे डिपार्टमेंट में भेज दिए जाते हैं।

यहाँ चारों ओर चर्खे लगे हुए हैं। चर्खों पर कुछ ओर आदमीं काम करते हुए मिले। इनका काम उन लच्छों को चर्खों पर चढ़ाना है। चर्खे के बीचो बीच गर्म हवा का पंखा लगा होता है। चर्खा चलते ही यह पंखा भी चल पड़ता है रंगे हुए धागों को सुखाने के लिए। सूखे लच्छों को चर्खे से उतार कर फिर उनके गोले बनते हैं। इन गोलों को बुनाई के लिए दूसरे कारखानों में भेज दिया जाता है।

यहाँ काम बड़े मनोरंजक तरीके से होता है।

दूसरे कारखाने में बुनाई और कटाई का काम है। बुनाई के लिए काफी भारी मशीने लगी होने के कारण केवल पुरुषों को ही इस काम के लिए रखा जाता है। यहाँ शिफ्ट वर्क में चौबिसों घंटे काम चलता रहता है। पहली शिफ्ट सुबह 6 बजे से 2 बजे तक, दूसरी शिफ्ट दोपहर 2 बजे से रात 10 बजे तक व तीसरी शिफ्ट रात के 10 बजे से सुबह के 6 बजे तक चलती है।

इन मशीनों पर काम करने वालों को निटर कहते हैं। एक निटर दस से अधिक मशीनों पर एक साथ काम कर सकता है...।

पहले मशीनों पर धागा चढ़ाते है। मशीनों को बुनाई के डिजाइन के हिसाब से एक बार सैट कर दिया जाए तो वो तब तक वही डिजाइन बनाती रहेंगी जब तक उन्हें बंद न किया जाए। निटर को यह देखना होता है कि धागा कहीं टूट या समाप्त तो नहीं हो गया। यहाँ बड़ी सावधानी व तेजी से काम हो रहा होता है। धागा समाप्त होने से पहले ही निटर को दूसरा गोला तैयार रखना होता है जोड़ने के लिए। जरा सी असावधानी से डिजाइन के आगे पीछे होने का डर होता है। यह बुना हुआ कपड़ा छोटे टुकड़ों में नहीं थान के रूप में बाहर निकलता है। इस काम के लिए निटर्स वेतन भी काफी अच्छा पाते है।

वेतन निटरस को ही नहीं और काम करने वालों को भी उनकी मेहनत के हिसाब से ही मिलता है। यह बुनाई किए हुए थान दूसरे बड़े से कमरे में भेज दिए जाते हैं जहाँ कटाई का काम होता है। इस काम में अधिकतर महिलाएँ दिखाई देती हैं जो नाप नाप के थान से कपड़ा काट कर उसे दूसरों के लिए आगे खिसका देती हैं।

यहाँ एक दीवार पर गत्ते के आकार टँगे हुए हैं। उन गत्ते के बने आकार के अनुसार कुछ महिलाएँ वस्त्रों का केवल आगे और पीछे का हिस्सा काट रही होती हैं और कुछ केवल बाजू। फिर यह सब कटे हुए टुकड़े दर्जन और नाप के हिसाब से बाँध कर ओवरलॉकिंग के लिए दूसरी मशीन पर बैठी महिलाओं के पास चले जाते हैं। वह इन टुकड़ों को जोड़ कर इनकी कच्ची सिलाई कर के अपनी टिकट काट के फिर से बंडल बाँध कर प्रेस के लिए भेज देती हैं।

सरोज सर रिचर्ड के कारखाने में प्रेस का काम करती है।

वह जब से ब्रिटेन आई है बड़ा कठिन परिश्रम कर रही है। चाहे कैसा भी मौसम हो सुबह पाँच बजे उठ कर काम पर जाने से पहले घर के कितने ही काम निपटाने होते हैं। बच्चों का, पति का व अपना दोपहर के खाने का डिब्बा तैयार करना। माँ दुकान सँभालती है इस लिए उनके लिए भोजन की व्यवस्था करना। बच्चों को स्कूल के लिए जगा कर 7.30 से पहले वह काम पर पहुँच जाती है।

ब्रिटेन में आ कर सब ने यही जाना है कि गृहस्थी की गाड़ी तभी पटरी पर सीधी चल सकती है जब पति पत्नी दोनों कमाएँ। नहीं तो घर की आवश्यकताएँ पूरी करना असंभव हो जाए।

आवश्यकताएँ पूरी करने हेतु ही तो महिलाएँ सुबह सबेरे झोला लेकर बच्चों को सोता हुआ छोड़ कर काम पर चल निकलती हैं। सरोज के साथ और भी बहुत सी महिलाएँ प्रेस का काम करती हैं।

ये महिलाएँ जहाँ काम करती है वह एक बहुत बड़ा सा कमरा है। बाएँ हाथ की दीवार के साथ ही 9-10 लंबी प्रेस लगी हुई हैं। यह बहुत बड़ी और भारी दो पलड़ों वाली इंडस्ट्रियल प्रेस होती हैं जिसे पहले कुछ सप्ताह सीखना पड़ता है। इस प्रेस की लंबाई लगभग पाँच फुट और चौड़ाइ तीन-साढ़े तीन फुट होती है। ऊपर और नीचे के दोनों पलड़े बराबर के होते हैं जिन पर गद्देदार कपड़ा कस के बिछा होता है। प्रेस के नीचे तीन पैडल लगे होते हैं। एक ऊपर के पलड़े को नीचे खीचने के लिए, दूसरे को दबाने से स्टीम निकलती है और तीसरा कपड़े को सुखाता और ठंडा करता है।

प्रत्येक प्रेस के सामने एक लंबी मेज काम करने के लिए बिछी हुई है। सामने ही बड़ी-बड़ी खुली अलमारियाँ हैं जो ओवरलॉकिंग किए हुए कपड़ों के बंडल से भरी हुई हैं। महिलाओं को काम देने के लिए दो पुरुष हैं। जिनमें से एक ओवरलॉकिंग के कमरे से ट्राली पर बंडल भर कर लाता है और दूसरा उन्हें प्रेसर की मेज पर रखने का काम करता है। यहाँ मनुष्य भी मशीनों के समान काम कर रहे होते हैं।

काम करने की खातिर ही तो सब अँधेरे मुँह घर से बाहर निकल पड़ते हैं। वरना इतनी सुबह सबेरे गर्म बिस्तर छोड़ कर सर्दी में घरों से बाहर निकलना किसे अच्छा लगता है। मजबूरी इनसान से क्या नहीं करवाती... जब कुछ महिलाओं को अपने बच्चों को सोता छोड़ कर काम पर आना पड़ता है। जब तक सरोज के बच्चे छोटे थे सुरेश भाई रात की शिफ्ट में काम करते थे जो दिन में जब सरोज काम पर जाए तो वह बच्चों का ध्यान रख सकें।

ध्यान तो सरोज का है इस समय अपने काम पर। ओवरलॉकिंग किया कपड़ों का एक बंडल खोल कर सरोज ने उसमें से कुछ कपड़े निकाल कर ठीक से प्रेस के नीचे के पलड़े पर बिछाए। प्रेस पर काम के लिए हाथ और पैर दोनों से काम लिया जाता हैं। बाईं ओर के लगे पहले पैडल को बाएँ पैर से दबाते ही ऊपर का पलड़ा थोड़ा ढीला पड़ गया। शीघ्र ही दाएँ हाथ से ऊपर के पलड़े को नीचे खींच कर उन बिछे हुए कपड़ों पर रख दिया जाता है जो नीचे बिछे कपड़े हिलें नहीं...। तब दूसरे पैडल से 10-15 सेकेंड तक कपड़ों को स्टीम देकर तीसरे पैडल को दबाते हैं जहाँ से ठंडी हवा निकल कर उन प्रेस किए कपड़ों को सुखा देती है। प्रेस किए कपड़ों को फिर से सरोज ने उसी रस्सी से इस प्रकार बांधा कि उनकी प्रेस खराब न हो।

हर एक बंडल के साथ एक लंबी सी टिकट होती है जिस पर प्रत्येक डिपार्टमेंट का नाम लिखा है। काम करने के पश्चात उस बड़ी टिकट में से अपनी छोटी टिकट काट कर व बड़ी टिकट पर अपना नाम लिख कर उसे बंडल के साथ अगले वर्कर के लिए भेज दिया जाता है। बड़ी टिकट पर अपना नाम इस लिए लिखते हैं जो पता चले कि यह काम किस ने किया है।

प्रेस के बाद यह बंडल कटर्स के पास जाता है जहाँ वह पहले ओवरलॉकिंग के धागे को खींच कर निकालती हैं। यह ओवरलॉकिंग किया हुआ कच्चा घागा बड़ी सुगमता से निकल जाता है। डिजाइन दे कर और काट कर इन कपड़ों को सिलाई के लिए भेजते हैं। जब कपड़े को आकार मिल जाता है तो एक बार फिर प्रेसर नाप के अनुसार एक फ्रेम पर वस्त्र को चढ़ा कर उसे सावधानी प्रेस करती हैं।

यहीं पर ही काम समाप्त नहीं होता। प्रेस किए हुए तैयार वस्त्र एग्जामिनर्स के पास जाते हैं जहाँ वे प्रत्येक बने हुए कपड़े की ठीक से जाँच करके प्लाटिक के लिफाफों में डाल कर पैक कर देती हैं। इस प्रकार कितने हाथों से निकल कर एक वस्त्र तैयार होता है। प्रत्येक काम करने वाला साथ लगी बड़ी टिकट से अपनी टिकट काटना नहीं भूलता। शुक्रवार उनकी टिकटों को गिनने के पश्चात सब को उन्हीं टिकटों के अनुसार वेतन दिया जाता है

***

सरोज एक बहुत अनुभवी प्रेसर है। पैसों की कमी होने के कारण वह कभी ओवरटाईम भी कर लेती है। सरोज जहाँ काम करती है वह कमरा थोड़ा बड़ा है। लंच ब्रेक के समय उस की और सहेलियाँ भी जो दूसरे विभागों में काम करती हैं यहीं आ जाती हैं खाना खाने के लिए।

सरोज के साथ वाली प्रेस पर एक युवा गोरी लड़की एंड्रिया काम करती है। अच्छी लड़की है। अधिक पढ़ी लिखी नहीं है। वह ठीक से अपने काम की टिकटें भी नहीं गिन सकती जिसके लिए सरोज उसकी सहायता कर देती है। एंड्रिया का ब्वायफ्रेंड जैक भी उसी का हमउम्र है। कुछ दिनों से वह भी एंड्रिया के साथ खाना खाने के लिए प्रेस के कमरे में ही आने लगा। युवा दिमाग हो और उसमें कभी कोई खुराफात न आए ऐसा तो हो ही नहीं सकता।

कुछ दिन तक तो सब ठीक चलता रहा। एक दिन खाना खाने के पश्चात एंड्रिया को मस्ती सूझी और वह जैक के सामने अपनी मेज पर टाँगें नीचे लटका कर लेट गई। उसका इशारा समझ कर जैक एंड्रिया के साथ शैतानी करने लगा जो शायद एंड्रिया को बहुत अच्छा लगा। अब यह रोज की बात हो गई। बात धीरे धीरे हल्की फुल्की छेड़खानी से आगे बढ़ने लगी। यही शैतानियाँ बदतमीजी पर उतर आईं। दोनों उन बैठी हुई महिलाओं की ओर शैतानी से देखते और शर्मनाक हरकतें करते। सरोज और उसकी दोस्तों से वहाँ बैठना दूभर हो गया।

एक दिन सरोज को इतना गुस्सा आया कि वह खाना वहीं छोड़ कर कहीं चल दी।

"मैनेजर साहब मैं अंदर आ सकती हूँ।"

"अरे सरोज आप... आइए अंदर आइए।" मैनेजर सरोज को जानते हैं कि यह एक बहुत तेज और खामोशी से काम करने वाली महिला हैं। सरोज जो आज मैनेजर के पास आई है तो अवश्य ही कोई जरूरी काम होगा...।

"कहिए सरोज क्या बात है...?"

"सर हमें आधे घंटे का लंच ब्रेक मिलता है। कुछ दिन पहले तक सब ठीक से चल रहा था जब से जैक हमारे कमरे में नहीं आता था।"

"यह जैक कौन है और कहाँ से आता है?" मैनेजर ने जरा जोर से पूछा।

"सर यह कौन है मैं नहीं जानती। ये वहीं काम करने वाली युवा लड़की एंड्रिया का दोस्त है। यह लोग ब्रेक के समय ऐसी शर्मनाक हरकतें करते हैं कि हमारे लिए वहाँ बैठना मुश्किल कर दिया है। आप अभी चल कर अपनी आँखों से देख लीजिए...।"

मैनेजर उसी समय उठ कर सरोज के संग हो लिया।

"जैक... एक कड़कती आवाज आई... एंड्रिया... ये सब क्या हो रहा है। जैक तुम यहाँ क्या कर रहे हो महिलाओं के कमरे में।"

"सर मैं यहाँ अपनी दोस्त एंड्रिया के साथ खाना खाने आता हूँ।"

"वो तो मैने देख ही लिया है कि तुम क्या करने आते हो...। आइंदा तुम किसी भी महिला विभाग में दिखाई दिए तो कारखाने से बाहर कर दिए जाओगे... और तुम एंड्रिया... इतनी ही गर्मी चढ़ी हुई है तो जा कर घर बैठो...।"

घर तो मैं अब इस को बिठाऊँगी जो बड़ी होशियार बनती है...। एंड्रिया ने बॉस से तो माफी माँग ली परंतु मन में सरोज के प्रति एक खुंदक रखी जिस के लिए वह समय की प्रतीक्षा करने लगी।

अंग्रेजों की एक बहुत बड़ी विशेषता है कि वह किसी से कितनी भी दुश्मनी क्यों न रखें परंतु चेहरे पर एक भाव भी नहीं आने देते। हमेशा बत्तीसी निकाल कर और गले मिल कर ही मिलते हैं। समय आने पर कब पीछे से वार कर दें किसी को पता भी नहीं चलेगा...।

यही एंड्रिया ने किया। किसी बड़ी कंपनी के आर्डर की आखिरी तारीख सर पर थी। बड़ी तेजी से काम हो रहा था। सब जानते हैं कि यह बड़ी कंपनियों का जब समय पर आर्डर पूरा नहीं होता तो यह पूरा का पूरा आर्डर कैंसिल कर देती हैं जिस का सारा नुकसान कारखाने को भुगतना पड़ता है। यहाँ का फोरमैन परेशान है आर्डर ठीक समय पर निकालने के लिए। वह सबसे ओवरटाइम करने के लिए पूछ रहा है...

"सरोज दो सप्ताह थोड़ा ओवरटाइम लगा दो बहुत बड़ा आर्डर है..." फोरमैन ने कहा।

"देखिए मैं 40 घंटे में ही इतना काम कर देती हूँ जितना ये बाकी की महिलाएँ ज्यादा समय लगा कर भी नहीं कर पातीं। मेरा तीन साल का बेटा राह देख रहा होता है। मैं आपको कल बताऊँगी...।"

सरोज कल क्या बताती दूसरे दिन वह काम पर आई तो चौंक गई यह क्या... शाम को तो मैं अपनी प्रेस को अच्छा भला छोड़ कर गई थी... यह कपड़े पर इतना बड़ा छेद कहाँ से आ गया। सरोज सोचते हुए वहीं खड़ी हो गई। जब तक पूरा प्रेस का कपड़ा न बदला जाए काम करना असंभव है। स्टीम के साथ जल जाने का डर है।

"सुंदर भाई... सरोज ने वहाँ काम करने वाले आदमी को पुकारा... जरा फोरमैन को बुला दीजिए...। प्रेस का कपड़ा फटा हुआ है ऐसी प्रेस पर काम नहीं हो सकता ये तो मुझे जला देगी। और कोई प्रेस खाली भी नहीं जिस पर मैं जा कर काम करूँ।"

"अरे इतना बड़ा छेद। आप यहीं रुकिए मैं फोरमैन को बुला कर लाता हूँ।"

"यह कैसे हो गया सरोज?" फोरमैन ने आते ही पूछा।

"मालूम नहीं... शाम को तो मैं ठीक ठाक छोड़ कर गई थी। आप जल्दी से इसका कपड़ा बदलवा दीजिए।"

"कपड़ा बदलना इस समय नहीं हो सकता। इतनी सुबह तो मकैनिक नहीं आता। तुम ऐसे करो काम शुरू कर दो जैसे ही मकैनिक आएगा मैं लेकर आता हूँ।"

सरोज जब तक प्रेस पर कपड़े बिछा कर काम करती रही सब ठीक चल रहा था। परंतु जहाँ फ्रेम पर चढ़ा कर प्रेस करने की बारी आई छेद में से गर्म स्टीम सीधी सरोज की बाजू पर लगी। जलन के मारे वह चीख पड़ी। उसकी बाजू पर फफोले पड़ने लगे। सरोज से हमदर्दी दिखाने के स्थान पर फोरमैन उसी को डाँटने लगा...।

"ध्यान से काम नहीं कर सकती थी। जरा सी बात के लिए काम पिछड़ जाएगा।" फोरमैन को अपने बोनस की पड़ी थी। समय पर काम निकल जाए तो उसे बड़ा बोनस मिलेगा।

"अब यह लो कपड़ा हाथ पर बांधो और काम शुरू कर दो। एक-एक मिनट कीमती है।"

सरोज की आँखों में दर्द के मारे आँसू भरे हुए थे। मन तो चाहा कि ये कपड़ा फोरमैन के मुँह पर फेंक कर अभी घर चली जाए। पैसों की आवश्यकता ने उसे वहीं रोक दिया। जले हुए हाथ से स्टीम के साथ काम करना मुश्किल ही नहीं असंभव था।

असंभव को संभव बनाने के लिए एंड्रिया जो थी वहाँ। वह आवाज में प्यार भर कर सहानुभूति जताने चली आई...

"सरोज बहुत जल रहा है। मैं यदि तुम्हारे स्थान पर होती तो यह गंदा कपड़ा फोरमैन के मुँह पर मार कर अभी घर चली जाती।"

"आप अपनी सहानुभूति अपने तक ही रखिए एंड्रिया। जरा जल्दी हाथ चलाइए नहीं तो काम भेजना मुश्किल हो जाएगा पीछे से सुंदर की आवाज आई।"

मुश्किल समय तो अब फोरमैन के लिए आने वाला था। उसका व्यवहार एशियंस के प्रति कभी भी ठीक नहीं रहा। फिर भी किसी ने भी उसकी शिकायत करने की हिम्मत नहीं दिखाई। सब को अपनी नौकरी की चिंता है।

चिंता केवल सुंदर भाई ने व्यक्त की। सुंदर भाई जो इन सब महिलाओं को प्रेस करने के लिए काम देते हैं उनसे सरोज का दुख देखा नहीं गया। फोरमैन के व्यवहार से वह भली भांति परिचित है। उसे केवल अपने काम की पड़ी है कोई वर्कर जिए या मरे उसकी बला से। परंतु मैं सरोज को इनसाफ दिलवाऊँगा। सुंदर ने चुपचाप से जाकर यूनियन से संपर्क किया और उन्हें सब कुछ बता दिया। इस फोरमैन की पहले से ही काफी शिकायतें यूनियन के पास दर्ज थीं। अब कुछ करने का समय आ गया था। इस फोरमैन को सबक सिखाना ही पड़ेगा। यह वो समय था जब यूनियन का काफी बोलबाला था। यूनियन कर्मचारी प्रेस विभाग में आया...

"कम ऑन एवरी बाडी आऊट...। यूनियन के लीडर ने आते ही कहा। सब लोग अपना काम छोड़ दीजिए। इस कारखाने का फोरमैन कहाँ हैं बुलाइए उनको.."

फोरमैन के हाथ पैर फूल गए। वह सब काम छोड़ कर भागा हुआ आया। वह तो सरोज को बाकी एशियन महिलाओं के समान दब्बू और सीधी साधी अनपढ़ औरत समझता था।

"मिस्टर बील्स आप इस बात से अवगत हैं कि आप के यहाँ काम करने वाले एक कर्मचारी के साथ काम करते हुए दुर्घटना हुई है?" यूनियन कर्मचारी टोनी ने कहा।

दुर्घटना तो हुई है किंतु सरोज इस असमंजस में है कि यूनियन को कैसे पता चल गया। अब बिना किसी कारण यहाँ पर इतना बड़ा हंगामा खड़ा हो जाएगा। कारखाना बंद हो गया तो सब उसी को कोसेंगे।

कोस तो इस समय फोरमैन रहा था स्वयं को कि उसने इस ओर ध्यान क्यों नहीं दिया। वह जल्दी से बोला...

"जी मैं जानता हूँ कि यहाँ काम करने वाली महिला सरोज का मामूली सा हाथ जला है और मैंने कपड़ा भी बाँध दिया था उस पर।"

"इसको आप मामूली सा जला कहते हैं..." टोनी ने सरोज की बाँह आगे करते हुए कहा। "ये फफोले देख रहे हैं आप।"

"दुर्घटना रजिस्टर में तो आपने इस को दर्ज कर दिया होगा मिस्टर बील्स?"

"नहीं कर पाया टोनी इतना समय ही नहीं मिला।" फोरमैन अभी भी इस बात की गंभीरता को नहीं समझ रहा था।

सरोज के चेहरे से भय साफ दिखाई दे रहा था। वह तो इसी असमंजस में थी कि यूनियन को पता कैसे चला। सरोज को डरा हुआ देख कर उस यूनियन के आदमी को दया आने लगी।

"सरोज आप डरिए मत, हम आपको इनसाफ दिलवा कर रहेंगे।"

"ठीक है इसको आप इनसाफ दिलाते रहिए हमें कोई आपत्ति नहीं लेकिन इसके कारण हम काम रोक कर क्यों नुकसान उठाएँ?" एंड्रिया काम करते हुए बोली।

"जो आज इनके साथ हुआ है कल आप के साथ भी हो सकता है मिस... क्या है आपका नाम।"

"एंड्रिया..."

"हाँ तो एंड्रिया... अभी तो हमने यह भी पता लगाना है कि अचानक सरोज की प्रेस में इतना बड़ा छेद कहाँ से आ गया। आप इनके साथ वाली प्रेस पर काम करती हैं। शायद आपने ही किसी को देखा हो..."

एंड्रिया एकदम सकते में आ गई। उसने उसी समय काम करना बंद कर दिया।

"किस बात का इनसाफ दिलाने की बात हो रही है टोनी। क्या हुआ है यहाँ कोई मुझे भी बताएगा..." सूचना मिलते ही कारखाने का मैनेजर वहाँ आ गया।

"यहाँ ये हुआ है..." सरोज की बाँह आगे करते हुए टोनी यूनियन