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कहानी

सितारों पे डालती हूँ मैं कमंद
वर्तुल सिंह


मेरे दिल मेरे मुसाफिर-1

1984 का वो दिन, रेसिडेंसी रोड पर चाँद चिनार मंदिर के ठीक सामने इंडियन कॉफी हाउस में बैठा, मैं, चिल्लई खुर्द की पिलीतिमा को चिनार और खूबानी के दरख्तों से फिसलते हुए, श्रीनगर के लाल चौक के आसपास स्थित होटलों और गुपकर रोड के घरों के अंदर दुबकते हुए देख रहा था। हालाँकि उनके पत्तों की कपिशयति और उस साल के चालीस दिनों की हाड़ गलाने वाली चिल्लई कलाँ की बर्फ के छज्जों और दहलीज पर अब भी अटके होने के बावजूद, कश्मीर का मौसम अब एक हल्की खुमारी और खुश्की की तरफ, धीरे धीरे बढ़ने लगा था। बसंत ऋतु का द्योतक सीटीबाज पोशिनोल पक्षी का इश्किया निशोफ, बादामवारी से आती चिपचिपाती फूले बादाम की मादक खुशबू और जबरवान पहाड़ों से सरसराती बयार ने पूरे वादिए कश्मीर को अपने आगोश में ले लिया था। मौसम भी मानो उस साल कश्मीरियों के लिए अमन और राजनीतिक ठहराव की ओर संकेत कर रहा था। शाहरुख रहमतुल्लाह की सरकार, शेख रहमतुल्लाह की योजनाओं को क्रियान्वित कर रही थी और कुल मिला कर कश्मीरियों को कई सालों बाद प्रजातांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास होने लगा था। लेकिन इस बात से सब बेखबर थे कि यह सब एक फरेब था, मौसम भी हम सबके साथ दगाबाजी कर रहा था। राजनैतिक सरगर्मियाँ बेखौफ अपनी निरंकुश चाल चल रहीं थीं और उनके अंतर्प्रवाह समूचे कश्मीर में हलचल मचाने में सक्रिय थे। कश्मीर के उथल पुथल के इतिहास में अक्सर, 'चाणक्य की नीति लता', रात के अँधेरे में नहीं लहलहाती बल्कि उस समय, जब श्रीनगर से राजधानी जम्मू में विंटर कैपिटल के रूप में स्थानांतरित हो जाती है, तब! रहमतुल्लाह परिवार में ही सत्ता की हवस रखने वाले और दिल्ली की तानाशाही सरकार के नुमाइंदों के दरमियान, गुपकर रोड के कुछ चुनिंदा घर और लाल चौक के आसपास के अभिजात्य होटलों में उन साजिशों को अंजाम दिया जा रहा था, और मैं, अनजाने में या शायद अपनी वाहवाही कराने के लोभ में उन साजिशों की दलदल में फँसता चला जा रहा था। उस समय तक मुझे नहीं मालूम था कि मेरी इन हरकतों से वादिए कश्मीर की आबो-हवा में आतंक, विषाद और संदेह का एक ऐसा घातक मिश्रण तैयार होगा जो आने वाले सालों में चिल्लई खुर्द की पिलीतीमा को हमेशा के लिए खूँरेजी कर देगा! मेरे दिल मेरे मुसाफिर, मैंने ऐसा क्यों किया?

इस सफर की दास्ताँ के लिए क्यों, एक नहीं, कई, हजारों हर्फ, एक से बढ़ कर एक पैने, वजनदार, खरे और चमकदार हर्फ को फिर ढूँढ़ता रहता है ख्याल, वो हर्फ जिसमें वादिए कश्मीर की वास्तविकता का दर्द छिपा हो? वो हर्फ जो कश्मीर से जुड़े सभी आमफहम के अरमानों और सपनों को व्यक्त कर सके।

मैं अपने घर की दोपहर की उकता देने वाली गहमागहमी से बचने लगभग रोज ही कॉफी हाउस, जिसे हम कश्मीरी में समनबल (मिलने का स्थान) कहते थे, आ जाता था। देवदार की लकड़ियों से बने भारी भरकम जीने से होते हुए, दरवाजा अचानक एक बड़े से हाल में खुलता था, जहाँ सिगरेट के धुएँ और कॉफी की गहन गंध की धुंध सी छाई रहती थी। यहाँ की दीवारें राजनीति और कविता, थिएटर और कथा शिल्प के सभी पारंपरिक कूल कगारों को ढहा कर अपनी एक मौलिक रचना हर दिन प्रस्तुत करते हुए, बहुश्रुत आवाजों और फुसफुसाहटों से द्युतिमान रहती थीं। हाल के बीचोबीच एक विशालकाय समोवर रखा हुआ था, एकचित्त, शांत, तटस्थ गज की तरह गंभीर, आसपास की मेजों और कुर्सियों को निष्प्रभ करते हुए। श्रीनगर का यह शायद सबसे विशाल समोवर था। किसी समय में यह कुपवारा श्रीनगर राजमार्ग पर स्थित किसी सराय में हुआ करता था। व्यापारियों और भिक्षुओं के लगातार आते कारवाँ के लिए, एक बार में सैकड़ों प्याले चाय इसमें बनाई जाती थी। उस समोवर के ऊपर न जाने कितने लेख लिखे गए थे जिसमें सबने अपने अपने तरीके से इसकी पुष्टि करने की कोशिश की थी कि, श्रीनगर में इसका आगमन मध्य एशिया से, संभवतः समरकंद या बुखारा से किसी कारवाँ के साथ हुआ था। अमन ने यहाँ बैठे हुए एक बार कहा था कि कश्मीरियों की संस्कृति में अनगिनत ऐसे लैत्मोटिव्स (विशिष्ट पहचान के प्रतीक) हैं, जिनका प्रारूप मध्य एशियाई है। उसका तो यहाँ तक मानना है कि कश्मीरी पंडित और मुसलमानों में शेख और सैयद की नस्ल भी मूल रूप से मध्य एशियाई ही है।

मैंने उस दिन कॉफी का पहला घूँट लिया ही था कि लाल ट्वीड का फिरन पहने एक आदमी मेरे सामने वाली कुर्सी खींच कर बैठ गया। मेरे लिए यह आम बात थी, पॉलिटिकल रिपोर्टर होने के कारण अक्सर अजनबियों से पाला पड़ता था। वह बिना किसी लाग लपेट के अपनी खुरदरी आवाज में फुसफुसाया -

"आप ज़फर कौल साहब हैं न?" मेरे हामी भरने पर उसने कहा "देवी शरण ठाकुर साहब होटल ब्रोडवे में चार बजे मिलना चाहते हैं।"

इससे पहले मैं उससे कुछ पूछूँ, वो वहाँ से नदारद हो गया था। फिरन उसने बेशक पहन रखी थी लेकिन उसकी जुबाँ और चेहरे पर विशिष्ट रूप से जम्मू की छाप थी। मैं जानता था कि इधर कुछ दिनों से किसी गंभीर राजनैतिक विस्फोट की बात जोर पकड़ रही थी, लेकिन कैसे और क्यों इसका खुलासा नहीं हो पा रहा था। मैं उन दिनों 'आईना', उर्दू दैनिक अखबार, और कश्मीर टाइम्स, अंग्रेजी दैनिक में अंशकालिक संवाददाता के रूप में काम कर रहा था। अपने परिवार के पारंपरिक कालीन के कारोबार से उकता कर मैंने अपने हिस्से की कुछ पूँजी, अपने अखबार की पब्लिशिंग में भी लगाई थी। उन दिनों सरकार खास तौर पर केंद्र सरकार की न्यूज प्रिंट निर्यात संबंधी नीतियाँ बेहद दमघोंटू थीं। अखबार चलाने का मतलब केंद्र सरकार के इशारों पर चलना था। ठाकुर, शेख मोहम्मद रहमतुल्लाह और उनके मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री और उनके करीबी सहयोगी रह चुके थे। राजनीतिक हलकों में एक आम धारणा थी कि शाहरुख के उन्हें पार्टी से बाहर फेंकने के पहले वे उनके भी सलाहकार थे। उनके पिता की मृत्यु के बाद देवीशरण ठाकुर ही थे, जिन्होंने शाहरुख को जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उसी दौरान, हमने अपनी संपादकीय नीति के तहत एक रचनात्मक आलोचना का रुख अख्तियार करते हुए, शाहरुख की सरकार के खिलाफ एक मुहिम शुरू की थी। संभवतः ठाकुर मेरा इस्तेमाल, शाहरुख से अपना हिसाब बराबर करने के लिए, करना चाहता हो। उस समय तक मुझे इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि मैं जनतंत्र का गला घोटने की एक साजिश में फँसने वाला हूँ।

बहरहाल मैंने कॉफी खत्म की और कुछ समकालीन राजनैतिक मुद्दों से लैस होकर होटल ब्रॉडवे की ओर चलने लगा, यह सोचते हुए कि ठाकुर मेरे साथ कौन सा सीक्रेट डील करना चाहता है? मैं थोड़ा परेशान था क्योंकि यह पहली बार था जब मैं इतने ऊँचे ओहदे के व्यक्ति से इतने व्यक्तिगत और अनौपचारिक माहौल में मिलने जा रहा था। मैंने धीरे से दरवाजे पर दस्तक दी; एक गंभीर आवाज ने, अंदर आने को कहा। मुझे देख कर ठाकुर ने सोफे से उठ कर मुझे गले लगाया और इंटरकॉम पर कॉफी का ऑर्डर दिया। इसके बाद कमरे में सघन चुप्पी, काफी देर तक बनी रही। खामोशी का आलम ऐसा था कि पास के चिनार पर बैठे खंजन पक्षी के जोड़ों की कूजन भी साफ सुनाई दे रही थी। अंततः ठाकुर ने खखारते हुए कहा : "आपके लिए अच्छी खबर है। हमने शाहरुख अब्दुल्ला से छुटकारा पाने और उनकी जगह ग़ुलाम मुहम्मद को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया है। साथ ही एक नई सरकार बनाने की सभी व्यवस्थाएँ भी कर दी गई हैं, लेकिन अभी भी कुछ महीने लग सकते हैं।"

"लेकिन मैं इसमें आप की क्या मदद कर सकता हूँ, यह तो बहुत बड़ा फैसला है," मैंने परेशान होते हुए कहा।

ठाकुर ने कहा "आप शाहरुख और उनके नेशनल कन्फेडरेशन के आलोचकों में से एक हैं। जिन दोनों समाचार पत्रों के लिए आप काम कर रहे हैं, वे एक ही दृष्टिकोण के हैं। आप निडर भी हैं और मुझे पसंद भी। हम चाहते हैं कि आप अंतिम हमले में हमसे जुड़ें और मुझे यकीन है कि आप न नहीं कहेंगे।"

ठाकुर ने अपनी आवाज को और भी मुलायम और मद्धिम करते हुए कहा "मैंने आपके बारे में ग़ुलाम मुहम्मद साहिब समेत अपने सभी सहयोगियों को पहले से ही बताया है, उन्होंने मेरे विचार की सराहना की है। नई सरकार बनने के बाद आपका और आपके अखबार, खासकर अखबारी कागज संबंधी आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाएगा।"

मैंने इस विषय पर सोचने के लिए उनसे कुछ समय माँगा। घर पहुँच कर मुझे अचानक ध्यान आया कि ठाकुर ने मुझे बातों बातों में एक चेतावनी भी दे दी थी। न्यूजप्रिंट के आभाव में कई अखबार बंद हो चुके थे। मैंने दो दिनों में ही उनको अपना पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दे दिया। अपने दोनों अखबारों के जरिये, शाहरुख की सरकार के खिलाफ, कुछ पुख्ता लेकिन ज्यादातर सुनी सुनाई अफवाहों को हमने हवा देना शुरू कर दिया। शाहरुख के ही बहनोई ग़ुलाम मुहम्मद अब अपनी ख्वाहिशों को खुलेआम अंजाम देने लगे थे। हालाँकि लाल चौक पर शाहरुख के खिलाफ एक उकसाने वाले भाषण से वे भीड़ द्वारा पिटते पिटते बचे थे।

2 जुलाई सुबह साढ़े पाँच बजे गुपकार रोड स्थित अपने आवास के बरामदे में, इंटेलिजेंस ब्यूरो के आई.जी. कामेश्वर मिश्रा, डल झील की तरफ से आती बिसांदा झकोर से उकता कर वापस कमरे में जाने के लिए मुड़े ही थे कि उन्हें राजभवन की ओर जाने वाली गाड़ियों के एक काफिले ने हैरान कर दिया! इससे पहले कि वे कुछ सोच पाते उनके लैंडलाइन की घंटी झनझनाने लगी। राज्यपाल गजमोहन उनसे शीघ्र मिलना चाहते थे। लगभग उसी समय श्रीनगर हवाई अड्डे की चौकसी कर रहे सीमा सुरक्षा बल के हुमहुमा कैंप कमांडर शमशेर सिंह पीटी परेड पर जाने की तयारी कर रहे थे। अचानक उनके लोकल नेटवर्क के हस्तचलित टेलीफोन की बेसुरी घंटी ने उन्हें तिलमिला दिया। यह फोन आपातिक स्थिति में ही इस्तेमाल होता था। दूसरी तरफ G ब्रांच (खुफिया विभाग) के मुख्याधिकारी ने अपनी उनींदी आवाज में उनसे तुरंत हवाई अड्डे को सेक्योर कर के, तीन कंपनियों के ठहरने और अन्य लौजिस्टिक्स के बंदोबस्त का आदेश दिया। फोन रखते हुए उन्होंने इतना जरूर बता दिया कि आठ बजे के पहले पहले फोर्स का डेप्लोयमेंट करना है। यानी दो घंटे पहले तक किसी को कानोंकान खबर नहीं थी कि शाहरुख की सरकार राज्यपाल गजमोहन गिराने वाले हैं। कामेश्वर मिश्रा और शमशेर सिंह, ये दोनों मेरे सबसे बड़े खबरी थे, मेरा इनसे संबंध खबरों के आदान प्रदान का था। उन्होंने अपनी आगे की कार्रवाई से पहले मुझे फोन पर इन असाधारण गतिविधियों से अवगत कराया। मुझे मेरे दोस्त और शाहरुख के प्रेस सलाहकार जावेद मीर ने बताया कि शाहरुख अन्य दिनों की अपेक्षा उस दिन कुछ ज्यादा ही ऊर्जावान थे, और सुबह सुबह गोल्फ कोर्स के लिए रवाना हो चुके थे। आधे रास्ते में ही उन्हें राजभवन तलब कर लिया गया। अंततः 2 जुलाई 1984 को राज्यपाल गजमोहन ने कश्मीर के जनतंत्र को नेस्तनाबूद कर दिया। मेरा योगदान इसमें खासा था, मैं मानता हूँ कि उस समय तक मुझे इसके एंडगेम का जरा भी अंदेशा नहीं था और न ही इसका एहसास कि भविष्य की यह दस्तक, "खिड़कियों के बंद शीशे तोड़ जाएगी...!!!"

आज पाँच साल बाद जब मैं अपने बचपन के दोस्त अमन कौल से मिलने और उसको कश्मीर छोड़ने के लिए सचेत करने जा रहा हूँ। साथ साथ अपने खौफनाक कारनामों का ख़म्याज़ाःकशी भी करने जा रहा हूँ। अमन को 'मेरे बचपन का दोस्त' कहना कितना बेमानी लग रहा है, क्योंकि उससे मिले हुए मुझे अरसा हो गया। वह मेरी बहन हीपोश को पसंद करता है, और शायद मुहब्बत भी (उसे नहीं मालूम कि मुझे यह बात पता थी) और जिसे वो प्यार से हिप्पी कहता है। हम दोनों का पुश्तैनी घर अनंतनाग जिले का मशहूर गाँव डोरू शहाबाद है। कहते हैं डोरू शाहबाद की मिट्टी में तखलीकी इस कदर रची बसी है कि वहाँ के चिनार, मौसम के अनुरूप क्षितिज पर टँगे हुए चटकीले रंगों वाली पेटिंग्स की छटा बिखेरते रहते हैं। सेब इतने मीठे और रसीले कि खाने के बाद लब ऐसे चिपक जाएँ कि खुले तो केवल बोसे के लिए, झरनों का संगीत संतूर की तरंगों सा मधुर और हवाओं में मदमाते पांपोश की बेसुध करने वाली नशीली खुशबू है। इसी गाँव में कश्मीर के कीट्स माने जाने वाले रसूल मीर ने अपनी प्रेम की कुटिया निर्मित की थी, अमन और मेरे अजीज अंतरराष्ट्रीय स्तर के जाने माने रंगकर्मी भवानी बशीर यासिर ने कश्मीर के पहले रंगमंडल की आधारशिला यहीं डाली थी। उनके रंगमंडल "कलाकार रेपर्टरी सर्कल" की विशेषता कश्मीर के देवी देवताओं से जुड़े अनेक मिथक और पौराणिक नाट्यों का मंचन करना था। उन्होंने कश्मीरी भाषा की विलुप्त 'शारदा' लिपि में लिखे कई ऐसे ग्रंथ साहित्य को न केवल लुप्त होने से बचाया था बल्कि, उनके संरक्षण के लिए सरकारी अनुदान से एक लाइब्रेरी भी बनाई थी। कश्मीर के गनदेरबल स्थित खीर भवानी मंदिर में देवी को पारंपरिक रूप से वसंत ऋतु में खीर चढ़ाई जाती है और ऐसी भी मान्यता है कि किसी भी प्राकृतिक आपदा से पहले यहाँ के कुंड का पानी काला हो जाता है। भवानी भाई ने इन्हीं दोनों रूपरंगों पर एक अद्भुत नृत्य नाटिका का मंचन मंदिर की ही पृष्ठभूमि में किया था। मैं भूल गया ...अमन कौल को मैंने अहडूस रेस्तराँ में मिलने के लिए टाइम दे रखा है। रिहर्सल के छह महीने बाद वह मेरे बुलाने पर ही श्रीनगर आया और मैं जानता हूँ शायद मेरी सूचना के बाद श्रीनगर की यह उसकी आखिरी यात्रा होगी...!

मेरे दिल मेरे मुसाफिर -2

ज़फर भाई के जाने के बाद यदि गफ़ूर मेरी तंद्रा भंग नहीं करता तो संभवतः मैं सदियों तक ऐसे ही बैठा रहता। इतने सालों बाद अपने किए के लिए प्रायश्चित क्यों? और यह कश्मीर पलायन की बात पंडितों के लिए यानी? मतलब क्या? अभी तक तो मैं केवल इसे अफवाह ही मानता था। गफ़ूर डबडबाई आँखों से अहदूस रेस्तराँ के उस कुहासों से लिपटे काँच को चीरते हुए, कॉफी हाउस की तरफ देखे जा रहा था। शायद मैं भी अपने ट्रांस में उसी ओर देख रहा था, शायद मेरा ध्यान आकर्षित करने के लिए उसने चम्मच गिराया होगा या प्लेटों को टकराया होगा। उसने बोलना उस दिन से बंद कर दिया था जिस दिन से अलगावादियों ने कॉफी हाउस को बम से उड़ा दिया था, हाँ जुलाई 1988 को, जब सबसे पहले धमाके ने वादी को एक खौफनाक चेतावनी दी थी। गफ़ूर पहले कॉफी हाउस में वेटर था, और श्रीनगर के बुद्धिजीवियों, खासकर बोहेमियन कलाकारों में उसका अपना दबदबा था। उसके कई कारण थे, एक तो उसके पास सभी विवादों को खत्म करने की अद्भुत प्रतिभा थी, अमूमन उसकी टिप्पणी आखिरी और निर्णायक होती। लेकिन सबसे बड़ा कारण उसका फौजी ओल्ड मोंक रम का जुगाड़ करना था। मुफलिसी के उन दिनों में सबसे उम्दा और सस्ती फौजी रम ही तो थी। गफ़ूर, कॉफी हाउस का स्टार अट्रैक्शन भी था। वह उसके इतिहास का चलता फिरता एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका था। कौन कौन सी हस्तियाँ किस कुर्सी पर और कितनी देर उठती बैठती थीं? किसने क्या बोला? किसने कितने सपने सँजोए? सबका लेखा जोखा उसके पास था। मैंने उठ कर खिड़की के कुहासे को हाथ से साफ किया... एक जखीरा खरामा खरामा खुलता चला गया और उसके अंदर से उठती यादों के बुलबुले मुक्ताकाश में तेजी से फटने लगे।

वे अमन चैन के दिन थे जब, यहीं इसी कॉफी हाउस में मशहूर पेंटर मकबूल फिदा हुसैन अपने परम मित्र कश्मीरी चित्रकार ग़ुलाम रसूल संतोष के साथ घंटों बातचीत में मशगूल रहते और यहीं पर शायद उन्होंने अपना एकमात्र सेल्फपॉर्ट्रट बना कर एक प्रशंसक को भेंट किया था। यहीं पर कश्मीर के चर्चित रंगकर्मी एम.के. रैना और सफदर हाशमी जो कश्मीर युनिवर्सिटी में अंग्रेजी के प्रोफेसर भी थे, अपनी शामें बिताया करते थे। मैं जब भी श्रीनगर आता तो भवानी बशीर भाई के साथ ही। हीपोश से मेरी मुलाकात बशीर भाई की रंगशाला में ही हुई थी। लेकिन उसके बड़े भाई ज़फर कौल को मैं पहले से जानता था। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से पास आउट होने के बाद बशीर भाई के कहने पर ही मैंने कश्मीर को अपनी कर्मभूमि भी बनाने का निर्णय लिया। हीपोश यानी हिप्पी मेरी दिलरुबा, मैं उसे इसी नाम से पुकारता हूँ, चटख, शोख, बेबाक, गौर वर्ण के साथ सेब की गहरी लालिमा युक्त कपोल। हमेशा ख्वाब देखती उसकी बोझिल पलकों वाली, बादामी अधखुली आँखें। उसके लब, कैसे बयान करूँ? मीर साहब का सहारा लेना पड़ेगा "नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए... पंखुड़ी इक गुलाब की सी है", हिप्पी का पसंदीदा गायक, साठवें दशक का मशहूर इंग्लैंड का पॉप सिंगर क्लिफ रिचर्ड था। मैं उसके गाने "लकी लिप्स आर ऑल्वेज किसिंग" से कइयों बार उसको प्रभावित करने की कोशिश करता रहता था। उसके सुनहरे लेकिन ऋषि मुनियों जैसे उलझे केश, किसी घने अरण्य जैसे आकर्षक और रहस्यमय थे। उसकी काकुल को उँगलियों से नहीं सुलझाया जा सकता था...! आम कश्मीरी लड़कियों की तुलना में लंबी और थोड़ी सी मांसल, जिससे उसमें एक स्तब्ध कर देने वाली कामुकता झलकती थी। उसकी चाल ऐसी जैसे हर कदम पर दुनिया को एक चुनौती दे रही हो, अक्खड़पन ऐसा कि हर सवाल का जवाब सवाल से होता था। हिप्पी जब पाँच साल की थी तब उसकी माँ का देहांत हो गया था, मुझे लगता है उसमें वो ढिठाई घर में उसका अपनी माँ की भूमिका निभाने और लगभग एक मातृसत्ता चलाने के कारण ही था। स्टेज पर रोल प्ले में महारत हासिल थी उसको। हीपोश अपनी शख्सियत और मौजूदगी से हर जगह को सुवासित करती रहती थी। ठीक अपने नाम के अनुरूप, बेला की खुशबू की तरह।

हमने भवानी बशीर भाई के निर्देशन में कई विलुप्त नाट्य शैली, जो कल्हण के समय में, लगभग ग्यारहवीं शताब्दी में हिंदू राजा हर्ष देव के द्वारा 'नाल्यमंडप' नाम से चर्चित था, उसका पुनरुत्थान किया था। हर्ष देव स्वयं भी अभिनय करते थे। आज की सांस्कृतिक कश्मीरियत में हर्ष देव का बहुत बड़ा योगदान है। बशीर भाई ने 'नाल्यमंडप' को कश्मीर की लोक परंपरा की नाट्य शैली 'भाँड पाथेर' (भाँड - अभिनेता; पाथेर- अभिनय) की तर्ज पर बहुचर्चित किया। मैं उनके साथ एक महत्वाकांक्षी नृत्य नाटिका, जो कि शिव के तांडव पर आधारित थी की पुरजोर तयारी में लगा था। मैं, शिव और हिपोश सती की भूमिका में उसके मुख्य पात्र थे। बशीर भाई ने श्रीनगर के करीब अवंतिपुर के अवंतेश्वर मंदिर को अपना रंगमंच बनाया था। हालाँकि अब इस मंदिर के केवल अवशेष हैं लेकिन इसका विशाल खंभों से घिरा खुला प्रांगण, इतनी वृहद नृत्य नाटिका के लिए सबसे उपयुक्त स्थान था। और फिर यह कश्मीर के उस युग को भी पुनर्जीवित कर रहा था, जिसको इस्लाम के आने के बाद भुला दिया गया था।

इन दिनों हम लगभग रोज ही अवंतिपुर जाते थे और फिर रिहर्सल के दौरान हुई खामियों का विश्लेषण श्रीनगर के कॉफी हाउस में किया करते थे। इसी दौरान हीपोश मेरे और करीब होती गई। कई बार वो मेरे साथ मिनी बस में वापस आती। रिहर्सल के बाद अक्सर ही आसपास के गाँवों में, भवानी बशीर भाई के चाहने वाले, हम सब को लजीज खाना खिलाते। उनमें एक अब्दुल भट्ट भी थे जो अवंतिपुर इलाके के एक बड़े रईस थे। उनके पास कई एकड़ में फैले केसर के खेत थे और उन्हीं के बीचोंबीच बेहद सौंदर्यपरकता से बनाया हुआ उनका मजेंटा (रानी रंग) रंग के छाजन वाला घर था। लजीज खाने के अलावा मेरा उस घर से एक खूबसूरत सा रिश्ता भी था।

कश्मीर के मौसम में एक विचित्र चपलता है। जब अचानक बसंत ऋतु की शुष्क होती बयार से, जंगली ट्यूलिप, वह जबरवान पहाड़ी की तलहटी में बने ट्यूलिप गार्डेन वाले ट्यूलिप की तरह नहीं, जो परेड करने के लिए मुस्तैद सैनिकों के दस्ते की तरह बोरिंग और कतारबद्ध दिखते हैं, बल्कि वो ट्यूलिप, जिनके नाजुक तने बैले डान्सर्स की तरह इठलाते हुए, अपनी बहुरंगी पंखुड़ियों के साथ थिरकने लगते हैं और जब पिघलती बर्फ और मखमली हरी घास से जूझते हुए, काज में बटन की तरह अटके जिद्दी मोतिया फूलों की कालीन, गुलमर्ग और तोशा मैदान के सपाट फैलाव को आच्छादित करने लगते हैं, तब जांस्कर पहाड़ी शृंखला के कार्गिल और द्रास की तरफ से कुछ आवारा लफंगे बादल, बसंत ऋतु के साथ होड़ लगाने के प्रयास में ठिठोली करते हैं, और वादिए कश्मीर को निमिष पलों के लिए सिक्त करते हुए उतनी ही तेजी से विलुप्त भी हो जाते हैं। वो पल, प्रेमियों में एक आदिम कामोन्माद को सुलगाने वाला पल है। गंधर्व पल। ठीक ऐसे ही एक दिन, गहरे नीले आसमान और मंदिर के पीतांबरी प्रकोष्ठ को रहस्यमय करते हुए घने मेघों के एक जत्थे ने वातावरण को धुँधला बना दिया। देखते देखते बारिश की बड़ी बड़ी बूँदें हमें चोट पहुँचाने लगीं। बशीर भाई ने रिहर्सल को रद्द कर दिया और हम सब लगभग भागते हुए, नील लोहित रंग से पटे केसर के खेतों को लाँघते, अब्दुल भट्ट के घर पहुँचे। अब्दुल भाई के दरवाजा खोलने से पहले ही, बेवजह, हिप्पी ऊपर अटारी पर जाने लगी, जिसका जीना बाहर की तरफ से था। मैं भी अनायास उसके पीछे हो लिया।

हिप्पी की लटों से टपकते पानी, और अटारी की खुली खिड़की से आती बौछार से धानी रंग का उसका कुर्ता, उसके शरीर से चिपक रहा था। उसने अपने दुपट्टे को लहराते हुए अपने से अलग किया और उसे निचोड़ने लगी। "मेरे पीछे क्यों आए ...और मुझे सड़कछाप लखैरों की तरह क्यों घूर रहे हो?" "बस यों ही..." हकलाते हुए मैंने कहा। "अरबी सीखते वक्त मैंने एक बार मौलाना से 'तल्मीह' लब्ज़ का मतलब पूछ लिया। वो जनाब कई दिनों तक मुझसे रूठे रहे..." हिप्पी अपनी खनखनाती हुई हँसी के साथ कहे जा रही थी... "मुझे बाद में पता चला कि उसका मतलब वही होता है जिस ढंग से तुम मुझे अभी घूर रहे थे"। मैंने कहा " मैं बताऊँ, मैं तुम्हें क्यों घूर रहा था?" "क्यों?" मैंने थोड़ा निडर होते हुए, खिड़की को बंद करने की धृष्टता की। "नहीं ...खुली रहने दो" उसका इतना डपट कर मना करना मेरे लिए पर्याप्त संकेत था कि दाल अभी नहीं गलने वाली। बरसात और जोर पकड़ने लगी। 1955 में बनी एबेल गान्स की 'नेपोलियन' फिल्म के एक सीन की तरह, बारिश की बूँदों से टिन के पाटन पर नगाड़े के ढमढम जैसा शोर उत्पन्न होने से, हम दोनों को लगभग चीखते हुए एक दूसरे से बात करनी पड़ रही थी। बाल्कनी के तीन तरफ से खुली जगह को बारिश की मोटी चादर ढके हुए थी, यानी हम बाहरी दुनिया की नजरों से ओझल थे। मैं उसके थोड़े करीब आ कर उसके कान में बोला "कभी तो खुल के बरस अब्र-ए-मेहरबाँ की तरह"। उसकी सुराहीदार गर्दन और लगभग पारदर्शी कर्णपालिका को मैंने पहली बार इतने करीब और ध्यान से देखा। तुहीना फेस क्रीम और ईमामी पाउडर की मिलजुली गंध, उसके भीगे कपड़ों की गमक और बाहर से आती कच्चे केसर और मिट्टी की सोंधी खुशबू ने मुझे एक नशीले आगोश में जकड़ना शुरू कर दिया। प्रणय निवेदन के लिए मैं बेचैन हो रहा था। शायद हिप्पी को मेरी कमजोरी में आनंद आने लगा था। वो बिना कुछ बोले लगभग नुमाइशिए अंदाज में, इठलाते हुए अपने भीगे बदन से चिपके कुर्ते को अलग करने की कोशिश करने लगी, उसकी दूधिया पीठ से उसके काले ब्रा, कामाग्नि की ललक की ललकार से अर्थगर्भित हो रहे थे। मैंने गौर किया उसके ब्रा के दो हुक खुल गए थे और वे एक ही हुक पर टिके हुए थे, जिससे उसके वक्ष का कुछ हिस्सा दिखने लगा था, "अधखुली कंचुकी उरोज अध आधे खुले..."!

मौसम की फुसलाहट, अपने महफूज निजीपन या फिर बारिश के शोर की वजह से हम अपने दरमियाँ एक अजीब बेतकल्लुफी को महसूस करने लगे थे। मैंने थोड़ा निडर होते हुए उससे कहा "मैं तुम्हारे काले ब्रा और गदराए जिस्म को देख रहा था..."। हिप्पी अचानक अपने दोनों हाथों से अपने आप को बांधती हुई सिकुड़ गई, उसने तुरंत बेंच पर पड़े अपने दुपट्टे को खींचा और अपने आप को ढकने लगी। एक गहरी लालिमा अब धीरे धीरे, उसके दोनों कपोलों से फिसलते हुए उसके चेहरे पर फैलने लगी। कम से कम हिप्पी के संदर्भ में, मैंने कभी मुखारुणिमा की कल्पना नहीं की थी। अपनी बोल्डनेस के बिलकुल विपरीत, वो मुझे उस वक्त कितनी वल्नरेबल और असुरक्षित लग रही थी। उसका नारीत्व कितना कामुक था। अब वो मुझे घूरने लगी... अपनी निगाहों की उस कशिश और थरथराते होठों की लपक से वो एक अनुक्त इकरार का इशारा भी कर रही थी, मैं इस पल को हर सूरत में जब्त करना चाहता था... और मैंने वैसा ही किया। मेरी बाँहों का शिकंजा उसकी कमर और पीठ पर कसता गया, आगोश में लेते ही उसने एक सिसकारी ली और अपने आप को पूरी तरह समर्पित कर दिया। वह थोड़ी सी कसमसाई और फिर पिघलने लगी। मैंने उसकी गर्दन पर दाँत गड़ा कर एक लव साइन बना दिया। उसके भीगे हुए बालों से एक खट्टी मीठी सुगंध निकल रही थी। मैं उसके कान को अपने दाँतों से धीरे धीरे दबाने लगा और उसकी कर्णपालिका पर अपनी जीभ के सिरे से लगातार एक वृत्त बनाते हुए, उसका चुंबन लेने के इरादे से उसके होठों की तरफ हौले से बढ़ा, लेकिन हम दोनों की लंबी नाक एक दूसरे से टकरा गई, कामाग्नि के उस ज्वर में भी हम मुस्कुराने लगे। उसके गुदाज लबों के बोसे में बू-ए-खूँ की मदहोशी थी। उसकी सिसकारी अब एक रुदन में परिवर्तित होती जा रही थी, जो मुझे, बारिश के शोर के साथ एक लयात्मक स्वर लहरी की तरह स्पंदित करने लगी। बारिश धीरे-धीरे बंद हो चली थी। अचानक लकड़ी की सीढ़ी से किसी के ऊपर चढ़ने की आहट आई, हिप्पी मुझे जोर से धक्का देते हुए अपने कपड़ों और बालों को ठीक करने लगी, मैं अटारी से निकल कर बाल्कनी में आ गया। बशीर भाई अपने स्थूलकाय शरीर से हाँफते हुए ऊपर आ रहे थे। उन्होंने मेरे और हिप्पी की तरफ एक शरारती निगाह डाली और हिप्पी से बोले "जाओ हीपोश, बाई काकिन को थोड़ा खाना लगाने में मदद कर दो।" फिर मेरी बगल में बाल्कनी की रेलिंग पर हाथ रख कर मंचीय लहजे में बोले "एक बार, केवल एक बार, एक घटना जो मुझे याद है... जब 28 जुलाई, 1967 में, श्रीनगर की सरकार द्वारा संचालित अपना बाजार की एक सेल्स गर्ल, परमेश्वरी हांडू ने अपने मुस्लिम सहकर्मी गुलाम रसूल से शादी की। आठ दिन पहले, वो महिला इस्लाम में परिवर्तित हो गई थी और एक नया नाम परवीन अख्तर ले लिया था। यह वादिए कश्मीर का पहला अंतर धार्मिक प्रेम विवाह था और इससे उन दिनों काफी तहलका मचा था। मैंने किसी पंडित पुरुष को मुसलमान स्त्री के साथ शादी करने की बात अभी तक नहीं सुनी। खैर ...हो सकता है शुरूआत तुमसे हो... क्यों? बहरहाल यह बताओ कि तुम मुसलमान बनोगे या इसको हिंदू बनाओगे? "बशीर भाई... हमने इतने आगे तक तो सोचा ही नहीं है..." मैं तिलमिला कर बोला। "सोचना पड़ेगा और यह वादी में संभव होगा कि नहीं, मैं नहीं जानता? हम सब तरक्कीपसंद लोग हैं। हम सबके लिए नए कश्मीर का सपना कितना मायने रखता है, इससे तुम अनजान नहीं हो। लेकिन शादी गंभीर मसला है अमन।" मुझे क्या पता था कि इसका फैसला मेरे हाथों से केवल छह महीनों के भीतर ही निकल जाएगा।

एक बार रम के नशे में, वामपंथ से लैस और हीपोश को इंप्रेस करने के इरादे से भी, मैंने कॉफी हाउस की मेज पर खड़े होकर अपनी एक नज़्म वहाँ उपस्थित सभी लोगों को समर्पित कर दी...

तुम्हारे आने से
आ जाती है शाम हौले से
अपनी तन्हाइयों को समेटे
चल पड़ती है रैन फिर ही
अपने सफर में
हम पकड़ लेते हैं एक दुबका हुआ उजिआरा
छू लेते हैं धूपकिनारा
अब के बरस खूब महकेंगे दश्ते गुलाब
उठा लेंगे हम एक परचम सुर्ख लाल
ख्लाफ उनके, जिनके दामन से टपकते है खूँदार असबाब
कहते हैं हर सू दिखाई देंगे वो जलवागर इस साल

इंप्रेस होने के बजाय हिप्पी ने मुझसे व्यंग्यपूर्वक कहा "यह क्या था? कभी अपना कुछ ओरिजिनल भी लिखा करो अमन... फ़ैज और जिगर से बाहर आ जाओ..." "कमाल है हिप्पी" मैं अपनी लड़खड़ाती जबान में डिफेंसिव हो जाता हूँ... "मैंने स्वयं लिखा है, किसी को कॉपी नहीं किया...। विचार और मीटर मेरा है, प्रेरणा उनसे बेशक हो सकती है।" मुझे नहीं मालूम था लेकिन अब मुझे लग रहा है कि, शायद मुझे जिगर की नज़्म पूरी कर देनी चाहिए थी "क्या-क्या फरेब देती है मेरी नजर मुझे" इस साल।

ज़फर भाई ने मुझे जो कुछ भी बताया वह अकल्पनीय था। कश्मीर में धर्म के नाम पर विघटन? असंभव! कश्मीरी पंडितों और कश्मीरी मुसलमानों ने सदियों से एक साझी विरासत को सींचा है और उसको पोषित-पल्लवित किया है। कश्मीर के इतिहास के किसी भी दौर में - सलातीनी, पादशाही-चगतई या फिर सबसे क्रूर समय अफगानों के शाहानी दुर्रानी के दौर में भी पंडितों को धर्म के नाम पर कभी निशाना नहीं बनाया गया था।

"मुझे डर है शायद मैंने जिन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया है, पंडितों को यहाँ से जाना पड़ेगा... अरे...! हमेशा के लिए नहीं कुछ दिनों के लिए। सब कुछ बंद हो जाएगा... जे.के.एल.एफ. के हाथों से अब यह मूवमेंट फिसल रहा है... सरहद पार के कट्टरपंथी तंजीम हिजबुल मुजाहिद्दीन और लश्करे तोएबा इन पर हावी हो रहे हैं। तुम्हें भी सावधान रहना होगा..."

"थिएटर करने के लिए..." मैंने बचकाने अंदाज में पूछा।

"चुप क्यों हो बोलो, बोलो भी, किसलिए ...इतनी लंबी चुप्पी क्यों... तुम्हें मेज पर मुक्का मारने की जरूरत नहीं... मसला क्या है?!"

ज़फर भाई ने नजर बचाते हुए कहा "...पंडितों को जाना पड़ेगा।"

"क्या बकवास... सांप्रदायिकता...?"

"हाँ मेरे दोस्त। अब यह एक कटु सत्य है" ज़फर भाई के इन लब्जों से मेरे जेहन में ख़ंजर-ए-बेदाद की ऐसी ख़लिश महसूस होने लगी कि मैं नीम बेहोशी की अवस्था में अनाप शनाप बोलने लगा।

"मुस्लिम - हिंदू, कश्मीरियत। भूल गए तुम कि कश्मीरी पंडितों ने भी JKLF के साथ, बेशक राजनैतिक तो नहीं, लेकिन सांस्कृतिक कश्मीरियत की अलग पहचान के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया था। मेरे पिताजी बताते हैं कि जब दिसंबर 1963 में 'मो-ए-मुकद्दस' की जो घटना घटी थी, जहाँ मोहम्मद साहब के पवित्र बाल हजरत बल दरगाह से रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हो गए थे, तब उन पंद्रह दिनों के मो-ए-मुकद्दस आंदोलन में पंडितों ने भी अपने मुसलमान भाइयों के साथ सड़क पर उतर कर उन दिनों के चर्चित नारों "मो-ए-मुकद्दस को बहाल करो" "असली मुल्जिम पेश करो" को बुलंद किया था। और क्या हमारे मुसलमान भाइयों ने उन कट्टरपंथियों का विरोध नहीं किया था जिन्हें मीरवाइज कश्मीरियत के नाम पर बरगला रहे थे और जितने हिंदू स्थलों के नाम हैं उनका इस्लामीकरण कर रहे थे ...आप भी तो थे ज़फर भाई, जब पवित्र शंकराचार्य पर्वत को ये "तक्त-ए-सुलेमान" बनाने पर तुले हुए थे... बशीर भाई का नाटक ...और जो हम अभी अपनी साझी विरासत का उत्सव मनाने जा रहे हैं ...वो शिव के ऊपर जो नाट्य मंचन करने वाले हैं...? ठीक है बशीर भाई नहीं तो मैं उसे संचालित करूँगा, एन.एस.डी. थोड़े ही वापस जाऊँगा रहना यहीं हैं।"

"भूल जाओ वो सब अमन, वो अब संभव नहीं। नो थिएटर माइ फ्रेंड, जानते हो हमारी जितनी झीलें हैं न, डल, नगीन और वूलर इनके पानी का रंग लाल होगा ...खीर भवानी मंदिर के कुंड का पानी काला नहीं लाल होने लगा है... वादी में अब केवल खूँनाबःफ़िशान का उत्सव और मंचन होगा! तुम्हें पता नहीं है, हम इंडिया में रहते हुए, कश्मीरियत के तहत ऑटोनोमी (स्वराज) की बात कर रहे थे, हम 1953 के पहले की सियासत-ए-तरतीब चाहते थे जब हमारे मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री और गवर्नर को सदर-ए-रियासत का खिताब था। और ये सरहद पार वाली तंजीमें हमें इंडिया से अलग होकर पाकिस्तान में विलय होने के लिए आजादी की जंग छेड़ने के लिए मजबूर कर रहे हैं। इन्होंने JKLF के लीडरों को तो पहले धर्म के नाम पर जेहाद के लिए गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन जब कश्मीरियत को इतना पुख्ता हालत में देखा तो जेहाद के बैनर के अंतर्गत, खुलेआम आतंकवाद के खौफनाक ख्यालात को निर्ममता से अंजाम देना शुरू कर दिया है। कश्मीरियों को इन्हें खाने ठहरने के साथ अपनी लड़कियों को भी देना पड़ रहा है। और भारतीय फौज को जैसे ही खबर लगती है वे हमारे गाँव के गाँव उजाड़ देते हैं। हमारी हालत 'जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी' वाली हो गई है, मुझे याद है तुमने एक बार इस मुहावरे का प्रयोग हीपोश और मेरे दरमियाँ किसी बहस में, बीच बचाव करते हुए किया था।"

ज़फर भाई के डरावने शब्दों की गूँज अब और गंभीर होती जा रही थी।

"तुम्हें शायद नहीं पता श्रीनगर के पिक्चर हाल अब टॉर्चर चैंबर में तब्दील हो गए हैं ...उत्तर कश्मीर में खासकर बारामुल्ला और सोपोर में पंडितों के गाँव को खाली करने का आदेश अलगाववादियों ने दे दिया है। वहाँ से रातोंरात कश्मीरी पंडितों के जत्थे, सेक्युरिटी फोर्सेस की मदद से जम्मू पलायित हो चुके हैं। और सुनो हिंदुओं के गाँव में पोस्टर्स चिपका दिए गए हैं लिखा है "रलिवे, त्सलिव या गालिव" (इस्लाम कबूल करो, या स्थान छोड़ दो अन्यथा नष्ट हो जाओ) और इसकी लाउडस्पीकर से उद्घोषणा भी की जा रही है। और जानते हो ये सरहद पार वाले, हम कश्मीरियों को उम्माह (धार्मिक समुदाय) का नहीं मानते क्योंकि इस्लाम की जिस महान तसव्वुफ की परंपरा का पालन हम करते हैं उसे ये खालिस इस्लाम नहीं मानते। यही वजह है कि, हमारे मस्जिदों के लिए इन्हें इंडिया के यू.पी. और बिहार से मुल्लों को इंपोर्ट करना पड़ रहा है। इन्होंने तो चिट्टैसिंह पूरा में सरदारों को भी नहीं बख्शा है। मैं तुम्हें सचेत करने आया हूँ, रिपोर्टर होने के कारण मुझे पहले ही खुफिया संदेश मिल जाते हैं। कामराज (उत्तर) कश्मीर के बाद अब जल्द ही मराज (दक्षिण) कश्मीर भी इसकी चपेट में आने वाला है। तुम अपने परिवार के साथ जितनी जल्दी हो चले जाओ ...मुझे लगता है इंडिया की सरकार भी यही चाहती है, इससे इनको ग्लोबल स्तर पर पाकिस्तान पर दबाव डालने का, एक कूटनीतिक वर्चस्व मिल जाएगा और इनके फौजियों को हिंदुओं को कलैटरल डैमज (आनुषंगिक क्षति) में शामिल नहीं करना पड़ेगा।"

मुझे लगा कि मैं सपना देख रहा हूँ... यानी हम पंडितों को पाकिस्तान और हिंदुस्तान दोनों ही मोहरा बना रहे हैं? मुझे राजनीति की समझ नहीं है और न ही मैं राजनीतिक अस्थिरता के सामाजिक सूचकों पर कभी ध्यान देता हूँ। लेकिन इधर कुछ दिनों से जब भी मैं हिप्पी के साथ शहर-ए-खास के नौहट्टा या जाइना कदल या अली कदल की तरफ, जहूर अहमद भट्ट की डेढ़ सौ साल पुरानी दुकान पर हरिसा खाने जाता था, मैंने कुछ गैरमामूली गतिविधियों पर गौर किया। अचानक लड़कियों और औरतों में बुर्खा का चलन कुछ ज्यादा ही तेजी से होने लगा था। मैंने हिप्पी से पूछा कि ऐसा क्यों हुआ है? अपने तंजिए अंदाज में उसने तुरंत कहा :

"अरब का पैसा है... ये अब हमें पाँचों वक्त नमाज पढ़ने और दरगाहों और मजारों में न जाने के लिए प्रेरित करेंगे। तुमने देखा नहीं श्रीनगर और अनंतनाग के गाँवों में कितनी तेजी से मस्जिदों का निर्माण हो रहा है? हाँ और ये हमारे कश्मीरी वास्तुशिल्प में नहीं बल्कि विशिष्ट अरबी डिजाइन में हैं"।

हिप्पी ठीक कह रही थी। वादी का इस्लामीकरण जोर पकड़ता जा रहा है। ऐसे समाज में पंडितों के लिए, लाजिमी है, कोई जगह नहीं होगी। मुझे लगता है जिस खालिस वहाबी इस्लाम को ये थोपना चाहते हैं वहाँ तो शियाओं के लिए भी जगह नहीं हैं। और इसी तरह के इस्लाम के ठेकेदार वादी में जेहाद का ऐलान करने वाले थे...

1989 अक्तूबर का महीना, मुझे कहीं से सहज ही एहसास होने लगा था कि अब मैं श्रीनगर शायद कभी नहीं आ सकता। मैंने एक शिकारा किराये पर लिया और अकेले डल झील पर चल पड़ा। झील के समानांतर जबारवान पहाड़ी शृंखला के गंजे सुनहरे भूरे प्रतिबिंब, जल पर चप्पू का ध्वनिक, आश्चर्यजनक रूप से शांत जंगली परिंदों के एक झुंड का ऊपर मँडराना, हवा का थम जाना, चार चिनार पर खिंजा की नीरवता, नगीन झील की तरफ ढलते सूरज का तंबयी विगलन मानो, यह सब प्रतीकात्मक और समग्र रूप से मुझे अलविदा कहने के लिए एकजुट हुए हैं। मैंने चार चिनार पहुँच कर नाव को पास के पोपलर दरख्त से बांधा और चिनार के सूखे पत्ते से पटी जमीं पर चलने लगा। सूखे पत्ते मेरे पैरों तले कराह रहे थे, मेरे आने से भौंचक्की गिलहरियों ने फुर्ती से पेड़ पर पनाह ले ली। उनकी इस हरकत ने कुछ बेजान पत्तों को टहनियों से जुदा कर दिया। मैं अनायास ही सबसे विशाल चिनार पेड़ के नीचे जाकर खड़ा हो गया। मैंने दोनों हाथों से शंख बजाने की मुद्रा में एक जोरदार हुंकार मारी। शाखाओं पर अब भी कुछ हरे पत्तों को भेदते, इस नाद से, एक अपेक्षाकृत काफी बड़ा गैरिक पत्ता सरसराता हुआ मद्धिम गति से लहराते हुए ठीक मेरे सामने आ गिरा। मैं समझ गया चार चिनार का मेरे लिए यह आखिरी सलाम था। अलविदा...! अलविदा...!!

मेरे दिल मेरे मुसाफिर ऐसा क्यों हुआ?

मेरे दिल मेरे मुसाफिर-3

जनवरी 1990 की वो काली रात जब हमारे गाँव के पंडितों के घरों से दबी-दबी सी आवाजें आ रही थीं जैसे किसी गहरे कुएँ से आ रही हों... एक मिली-जुली हूक... दयनीयता और प्रताड़ना की उठती है और फिर सब कुछ शांत हो जाता है। अमन को गए हुए आज पाँच साल हो गए। वादिए कश्मीर की हालत दिनोंदिन बद से बदतर होती जा रही है। लेकिन मैं अब ठीक हूँ। मेरे हाथ अब भी काँपते हैं और मैंने हकलाना भी शुरू कर दिया है। मेरी कलाइयों पर उभरे हुए आड़े तिरछे निशान जिन्हें बहुत बारीकी से देखने की आवश्यकता नहीं है। मैं खुद को काट दिया करती थी क्योंकि, यह एक ऐसा दर्द था जो मुझे अच्छा लगने लगा था। मेरे चेहरे और पूरे शरीर पर मर्दों जैसे बाल निकल गए थे। मैंने कुछ ठीक होने के बाद जब अपने चेहरे को देखा तो मैं दंग रह गई। समूचे चेहरे पर मुलायम सब्ज़ा-ए-ख़त उग गए थे। मेरे अब्बा ने सोचा कि मुझ पर किसी जिन्न का साया पड़ गया है। वैसे भी पक्षाघात के कारण उनकी निर्भरता दयालु रिश्तेदारों पर ही थी। उनके कहने पर वे मुझे अक्सर न जाने कितने पीरों के पास इलाज के लिए भेज दिया करते थे। जो मुझ पर घिनौनी चालों का इस्तेमाल किया करते। उनमें से कुछ मेरे चेहरे पर अपने मुँह में पानी भरके थूकते या मेरे बालों को पकड़ कर घसीटते और झाड़ू से मारते थे। एक तो मेरे शरीर पर रेंगने वाले कीड़े भी डाला करता था। कश्मीर में अब महिलाओं और पुरुषों दोनों की आबादी का आधा हिस्सा, मानसिक विकार के किसी न किसी रूप से पीड़ित है। हमारे समाज में मनोचिकित्सक के पास जाने वाला कलंक इतना व्यापक है जिससे, खासकर महिलाओं का बेहद शोषण किया जा रहा है, जिन्हें एक वैज्ञानिक पद्धति से इलाज की बहुत ज्यादा जरूरत है - आत्म अभिव्यक्ति के विस्तार की जगह कम होने से युवा लड़कियाँ समाज से अपना सामन्जस्य बनाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। जिन माँओं के बेटे गायब हैं, मारे गए लोगों की युवा विधवाएँ, वो जो अपने आप को 'हाफ विडो' यानी अर्द्ध विधवा कहती हैं, जिनके पतियों का कोई सुराग नहीं है कि वे कहाँ है? (अमन के जाने के बाद, शायद मैं भी उनमें से एक हूँ - क्वार्टर विडो तो हूँ ही) और उन वृद्धों पर भी जिन पर आतंकवाद का आरोप लगाया गया है, सभी किसी न किसी Post-traumatic Stress Disorder (PTSD) और अवसाद से पीड़ित हैं। पुरुषों द्वारा घरेलू दुर्व्यवहार और बल प्रयोग, जो कश्मीरी संस्कृति में असाधारण था, भी महिलाओं के बीच अवसाद के प्रमुख कारणों में से एक है, यह भी उपजी है संघर्ष और आतंकवाद से। अक्सर, कश्मीरी पुरुष सुरक्षा कर्मियों के हाथों अपमानित महसूस करते हैं, वे धौंस और धमकाए जाने की हीन भावना से ग्रस्त हो कर, अपना क्रोध अपने परिवार वालों पर व्यक्त करते हैं। लेकिन ऐसा कभी भी नहीं था। बचपन में मैंने देखा है कि मेरे गाँव में वयस्कों के बीच किसी मसले पर यदि हाथापायी की नौबत आने तक का कोई मतभेद हो जाता था, तो अक्सर वे फेरन के लटके हुए आस्तीन के भाग से, एक दूसरे पर वार किया करते थे। अब तो किराने से समान लाना भी एक जंग लड़ने जैसा हो गया है, खासकर यदि आप किसी कारण अपना पहचान पत्र लेना भूल गए हों। ज़फर भाई ने समय पर मुझे अपने रिश्तेदारों के चंगुल से बचाया और वे मुझे डॉ. आरिफ के रावलपोरा स्थित उस गुप्त क्लीनिक पर ले गए जहाँ, डॉ आरिफ फार्मेसी के आवरण में एक काउंसिलिंग सेंटर चलाते और मानसिक रोग की दवाएँ दिया करते थे।

ढोंगी बाबाओं और पीरों से झाड़फूँक, मनोवैज्ञानिक विकार के ड्रग्स, जिनसे मैं केवल सोती रहती थी, लेने के बाद मैंने सब कुछ छोड़ दिया। मुझे पता था मेरी तरह अनगिनत महिलाएँ एक दशक के इस 'आर्मी कैंप' वाली जिंदगी और रोजमर्रे की जद्दोजहद को झेलती हुई पागलपन का शिकार हो गई थीं। लेकिन मैंने दृढ़ निश्चय किया कि मैं अपने को इस विकार और इस ग्लानि से मुक्त करूँगी। मेरे पास केवल दो ही प्रेरणास्रोत थे, एक तो अपने इस मुल्क की आबोहवा थी, जो हर दिन एक आशाजनक संदेश ले कर आती है और दूसरी अलिश्बा, मेरे कलेजे का टुकड़ा। मैं जानती हूँ वो कश्मीर के लिए एक विकल्प ले कर आएगी। मैं जानती हूँ। अलिश्बा, एक खूबसूरत उजाला, नाम ज़फर भाई ने रखा था, उनका भी यही कहना था कि वो अपने नाम को सार्थक करेगी।

लेकिन आज ठीक होने के बाद मैंने यह दुःस्‍वप्‍न क्यों देखा और वो भी इतने खूबसूरत दिन। अलिश्बा और 1990 की रात की घटनाओं के नख शायद इसलिए कुरेदते हुए मेरे सीने में धँस गए हैं, और मेरे हृदय को लहूलुहान करने लगे हैं। अचानक मेरी नाभि से निकल कर एक भूरे रंग का मोटा नाग जिसके दो फन थे, मेरे जिस्म पर रेंगने लगा। उसके वक्षस्थल पर गहरे घावों में से हरे रंग का द्रव्य बह रहा था जो काले काले केंचुओं की तरह बजबजा रहे थे। उसके नथुनों से एक दयनीय रिरियाहट जो कि कभी कभी असहनीय दर्द से एक चीत्कार में परिवर्तित हो कर गूँजने लगती थी। और फिर मैं एक गहरी खाईं में गिरने लगती हूँ... फिर अचानक दो हंस केसरिया रंग के एक रेशमी चादर को दोनों सिरों से पकड़े हुए तेजी से मेरे नीचे गोता लगाते हैं और मुझे उस चादर पर रोक लेते हैं। चादर में लेटे हुए मैं गुलाबी रंग की एक गोलमटोल बच्ची को अपने ऊपर तितली की तरह उड़ते हुए देखती हूँ। उसके दाएँ हाथ के ऊपर एक दमकता हुआ चाँद और सितारा टँका हुआ था। वो मुस्कुरा रही है और अपने दाएँ हाथ को आशीर्वाद देने की मुद्रा में उठाती है। मैं देखती हूँ कि उसके हाथ से वो चाँद और सितारा उछल कर लहराते हुए केसरिया रेशमी चादर के एक कोने में अटक जाता है। वह सर्प... अमन के साथ शीमर सर का वो दिन ...अलिश्बा ...चाँद सितारा...। ये सब यादें मुझे झकझोरने लगीं।

मैं बहुत दिनों से शीमर सर जाने का सोच रही थी। पता नहीं क्यों मुझे वह जगह बहुत दिलचस्प लगती थी। मेरी नानी के पास कश्मीर के ऐसे कई स्थानों से जुड़े किस्से, मिथक और किवदंतियों का खजाना था। उन्होंने मुझे एक बार शीमर सर के बारे में एक किस्सा सुनाया था। शीमर सर झील शोपियाँ की तरफ से आठ हजार फीट ऊपर है और बुधल पीर के रास्ते से सात हजार फीट पीर पंजाल पहाड़ी शृंखला पर है। इस झील के बारे में मानना है कि उसमें एक विशालकाय सर्प है जो पांडुर रंग का है, जिसके दो फन हैं और उसके वक्षस्थल से गहरे हरे रंग का एक द्रव्य लगातार बहता रहता है। वह कभी कभार थोड़ी देर के लिए अपना फन पानी के बाहर निकालता है। बड़े वाले फन की आँखों में गुस्सा और तिरस्कार भरा रहता है जब कि छोटा वाला फन डबडबाई आँखों से चारों दिशाओं में और फिर देर तक बड़े वाले फन को कराहते और आह भरते हुए देखता रहता है।

शीमर सर जम्मू से उत्तर की ओर रीयासी नामक जनपद में स्थित था। उस राज्य की बागडोर राजा जंबू लोचन के हाथ में थी। उसने अपने भतीजे राजा बलवंत देव को रीयासी का जनपद प्रामुख नियुक्त किया जिसने आगे जाकर रीयासी के डोगरे राजाओं के वंश की नींव डाली। उनका एक चहेता कलाकार था जिसका नाम नैनसुख था। नैनसुख ने ही पहाड़ी शैली के लघुचित्रों की परंपरा का विकास किया। नैनसुख ने ही बलवंत देव के वंश चिन्ह को गढ़ा है। यह एक स्वर्ण बारहसिंगा है जिसके बारह सींगों की शाखाएँ गरुड़ के सिर और उसकी चोंच की तरह एक-दूसरे से गुँथी हुई हैं। उसका मुख एक मुड़ी हुई कटार के आकार का है। आज वो कल्पना और मूर्तिकला का एक उत्कृष्ट धरोहर माना जाता है। वह एक फक्कड़ किस्म का कलाकार था जो अपने चित्रों की विषय वस्तु और वानस्पतिक रंगों की तलाश के लिए पहाड़ों की शृंखलाओं और जंगलों में भटकता रहता था।

एक बार उसकी भेंट घुमंतू बकरवाल जनजाति के एक विलक्षण बूढ़े से हुई। उस बूढ़े ने उसको बताया कि उसकी उम्र सौ साल से ऊपर है और उसे बुधल पीर दर्रे से शोपियान जाने वाले रास्ते पर, शीमर सर नामक एक बड़ी झील के एक बेहद गूढ़ रहस्य के बारे में जानकारी है। लेकिन वो इसकी जानकारी केवल राजा को ही दे सकता है, क्योंकि राजा ही इतना सुपात्र और कर्मठ है, जो इस जानकारी से लोक का कल्याण कर सकता है। इससे राजा चक्रवर्ती भी होगा और अकूत प्राकृतिक संपदा का मालिक भी बनेगा। नैनसुख ने उस बूढ़े के लिए तुरंत बकरे के बालों से बनी मोटे कंबल की पालकी बनवाई, और उसको उस में बैठा कर राजा के समक्ष प्रस्तुत किया। राजा ने धैर्यपूर्वक उस बूढ़े की बात सुनी। बूढ़े ने कहा कि वो विस्तार से यह सब एकांत में ही बता सकता है। नैनसुख को भी वहाँ रहने की अनुमति नहीं मिली।

वो बूढ़ा बताने लगा "मेरा नाम हेमू दस्तगीर है और मैं पिछले सौ साल से समूचे बकरवालों के कबीले का पीर हूँ। सुन राजा, मैं तुझे एक ऐसा अनुष्ठान बताने जा रहा हूँ जिसको यदि तूने विधिपूर्वक कर दिया तो तुझे एक ऐसा राज मिलेगा जो धरती में स्वर्ग होगा और यदि कोई त्रुटि हो गई तो तुझे अपनी जान भी गँवानी पड़ सकती है। यहाँ से उत्तर की तरफ लगभग चालीस कोस की दूरी पर एक झील है, जिसका रास्ता दुर्गम जंगलों और पहाड़ों से होता हुआ तोशा मैदान में खुलता है। वहाँ पर 'पीर की दाढ़ी' नाम की एक कंदरा है, यहाँ पहुँच कर तुम सरसों के तेल वाला दीपक और जंगली गोंद की धूप अवश्य जलाना। वहीं मेरे गुरु की मजार भी है। वहाँ तुम हरे रेशम की चादर चढ़ाना, जिसके रेशम, हरे शहतूत के पेड़ पर पले रेशम कीड़ों से निकाले गए हों। इसके आगे का रास्ता बेहद सँकरा है और तुम उसको केवल अपने संकल्प और दृढ़ निश्चय के बल पर ही पार कर सकते हो। उसको पार करने के बाद तुम्हें एक गहरे नीले रंग की झील मिलेगी जिसका कोई छोर दिखाई नहीं देता। उस झील में एक सिरमौर नाम का सर्प है जो कि भूरे रंग का है और जिसका फन अभ्रक की तरह झिलमिलाता रहता है। यदि तुम उसको बसंत ऋतु में, कुहू की रात के दूसरे पहर, काले गुलाबों की पंखुड़ियों के अर्पण के साथ, काली गाय का कच्चा दूध, स्याह गोमेद से बने पात्र में पिलाओगे तो वो तुम्हें अपने राज्य का एक बड़ा भाग दान कर देगा और उसकी रक्षा भी करेगा। ध्यान रखना तुम्हें काला वस्त्र धारण करना पड़ेगा और स्याह गोमेद वाले पात्र को अपने राज्य के एक पवित्र और सार्वजनिक स्थान पर रखना होगा, जहाँ उसका दर्शन आम जन कर सकें। और हाँ, कोई भी लाल वस्तु नहीं ले जाना। लाल वर्ण से वो क्रोधित हो जाता है, उसकी आँखों से पानी निकलने लगता है, जिससे वो अंधा हो जाता है। इससे पहले भी कई बार महत्वाकांक्षी राजाओं ने उसका राज्य छीनने के लिए उसे मारने कोशिश की है। लेकिन उनका अंत विनाशकारी और भयावह परिस्थितियों में हो गया। जितना वो दे उतना स्वीकार करना। उसके आने से पहले आकाश से सारे तारे गायब हो जाएँगे और बिन बादलों के भी भयंकर बारिश होगी और बिजली कड़केगी। तुम घबराना मत क्योंकि वो टेंगरी नामक एक देवता का गर्जन होगा, जिसका वास वज्रपात में ही है और वो इस सर्प का रक्षक भी है। सिरमौर अपने देवता को आदर देने के लिए गगनमंडल तक जाएगा और फिर यदि वो खुश हो गया तो तुम्हारे माथे पर अपनी जिह्वा से एक शीतल स्पर्श करेगा। राज्य प्राप्ति के पश्चात तुम अपने नाम के आगे से 'देव' हटा देना, 'देव' नाम के साथ लगाना अहम का द्योतक है"।

राजा को यह सब विस्मयकारी तो लगा लेकिन उसको थोड़ा संशय भी हुआ। उसने पूछा "ये बताएँ कुलपति यदि आपकी बात सच न हुई तो..." इससे पहले कि राजा अपनी बात पूरी कर पता, उस बूढ़े ने गंभीर आवाज में कहा "इसका सबसे बड़ा प्रमाण तुम्हें इसी अमावस्या को मिल जाएगा। मुझे मेरे गुरु ने बताया था कि इस गूढ़ रहस्य को बताने के बाद मेरी मृत्यु, आने वाली अमावस्या की रात, जो कि कल है, में हो जाएगी। मेरे गुरु के साथ भी ऐसा ही हुआ था। चूँकि उनको कोई योग्य व्यक्ति लोक के कल्याण के लिए नहीं मिल पाया उन्होंने यह रहस्य मुझे बताया। मैंने सुना है कि तुम कलाकारों की बहुत कद्र करते हो। मेरा मानना है कि जिस राज्य में कलाकारों का अभिवादन होता है वहाँ जनकल्याण भी निहित होता है। हमारी पीरों की परंपरा में हम सांसारिक माया मोह में नहीं पड़ते। अब मैं शायद चैन से मर सकता हूँ...!" राजा अवाक हो कर बूढ़े पीर की बात सुनता रहा...!!

आने वाली रात में उस पीर की मृत्यु हो गई। राजा ने नैनसुख से उस पीर के लिए एक भव्य दरगाह बनाने को कहा जिसका नाम उसने 'पीर बाबा दस्तगीर की दरगाह' रखा और उसको एक बड़े उत्सव में, धूमधाम के साथ जनता के सुपुर्द कर दिया। उसके बाद उसने बूढ़े पीर के द्वारा द्वारा बताए गए नियमों का अक्षरशः पालन करते हुए सिरमौर के दर्शन किए। सिरमौर ने राजा को अपने राज्य के दक्षिण सिरे से एक चौथाई हिस्सा उसके राज्य के साथ विलय के लिए दान दिया। उसने कहा कि तुम्हारे वापस जाने के कई शताब्दियों बाद तुम्हारा पुनर्जन्म होगा, तब तक मेरे राज्य के इस भाग के जल का निकास पूर्ण हो जाएगा। और एक ऐसी घाटी का आविर्भाव होगा जो कि सारे संसार की सबसे दुर्लभ और बहुमूल्य वस्तुओं से पूर्णतः भरी होगी। और हुआ भी ऐसा ही।

लेकिन राजा से इस अनुष्ठान के दौरान दो भारी भूलें हो गई थीं। राजा ने सिरमौर द्वारा दिए गए राज्य को प्राप्त तो कर लिया लेकिन इन दो दुर्घटनाओं के कारण उसको टेंगरी और सिरमौर के वरदहस्त से वंचित रहना पड़ा। पहली दुर्घटना तो उसी समय हो गई जब राजा 'पीर की दाढ़ी' पार कर के उस मंत्रमुग्ध कर देने वाली छटा से इतना अभिभूत हो गया कि वह दीपक, धूप और चादर के बारे में बिलकुल भूल गया। उसके बाद सिरमौर से मिलने के बाद जब वो वापस आ रहा था तो उसके कुछ चारणों के हाथ से वो बड़ा सा काले गोमेद का पात्र गहरी खाई में गिर कर चकनाचूर हो गया। तभी बिन बादल फिर गर्जन हुआ और टेंगरी ने राजा से कहा "राजन अब मैं तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकता।" राजा को पछतावा तो हुआ, लेकिन नए राज्य मिलने की खुशी में वह उसे जल्द ही भूल भी गया। बलवंत देव अपने पुनर्जन्म में बलवंत सिंह बना और जब उसने अपने नए राज्य का अवलोकन किया तो उसके मुँह से निकला "क्या यह वही राज्य है जिसके लिए मैंने इतनी मेहनत की थी। इसका तो तीन चौथाई हिस्सा जल, पर्वत शृंखलाओं और अरण्यों से भरा है!"

राजा इस बात से बेखबर था कि उसके महल में पड़ोसी देश का एक भेदिया सरतराश के भेष में अपना पैर जमा चुका था। जब वो बूढ़ा पीर राजा को यह गुप्त संदेश दे रहा था तो भेदिए ने, किसी तरह से वो सारी जानकारी हासिल कर ली। लेकिन वो हड़बड़ी में बूढ़े द्वारा दिए गए कुछ जरूरी एहतियातों को भूल गया। बलवंत सिंह अपने राज्य को सिरमौर के राज्य में पूरा विलय करने के तुरंत बाद ही, उस भेदिए ने अपने राजा को इसकी सूचना दे दी। चूँकि भेदिया बलवंत सिंह के राज्य में काफी दिनों से था, उसके राजा ने उसी को सिरमौर को खुश करने का दायित्व दिया। भेदिया सिरमौर के पास पहुँच तो गया लेकिन उसके दल के कुछ लोग जोश में आकर लाल रंग के पताके फहराने लगे। सिरमौर क्रोध से आगबबूला हो चीत्कार मारने लगा और उसकी आँखों से लिसलिसा पानी मवाद की तरह बहने लगा, आँखों की जलन से वो इतना बेचैन हो गया कि झील के पानी की सतह पर अपने फन को पटकने लगा। उसके शरीर की तपन से झील का पानी उफन कर आसपास के स्थानों में भर गया। भेदिया और उसके दल के लोग भयभीत हो कर सिरमौर के फन पर कटार से वार किया और कुछ ने बाणों से उसके वक्ष स्थल को बींध दिया, जहाँ से हरे रंग का द्रव्य बहने लगा। तभी टेंगरी ने बिन बादल ऐसी गर्जना की, जिसके आर्तनाद से भेदिए और उसके दल के सभी लोगों की मौत हो गई। लेकिन बेचारे सिरमौर के फन के दो टुकड़े हो गए और उसके आँखों की रोशनी कम से कमतर होती गई और हरे रंग के द्रव्य के लगातार बहने से उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया।

जब मैंने यह कहानी अमन को सुनाई, तो वह भी शीमर सर जाने के लिए व्याकुल हो गया। अमन ने मुझे याद दिलाया कि कॉफी हाउस में जो विशालकाय समोवर है उस पर शीमर सर के सर्प सिरमौर और टेंगरी का एक काल्पनिक चित्र उकेरा हुआ है। अमन ने बताया कि मध्य एशिया की सभी खानाबदोश लड़ाकू जनजातियाँ, टेंगरी को अपना देवता मानती रही हैं। टेंगरी का उल्लेख शक, कुषाण, हूण, मंगोल और तुर्कों की दंतकथाओं में पाया गया है। कश्मीर में संभवतः यह व्यापारियों और भिक्षुओं के निरंतर आवागमन के द्वारा लाया गया है।

रिहर्सल अपने अंतिम चरण में था। लेकिन उसी दौरान एक दिन बशीर भाई को किसी मुकदमें के सिलसिले में श्रीनगर जाना पड़ा। उन पर मीर वाइज के समर्थकों द्वारा खीर भवानी मंदिर में बुतपरस्ती और इस्लाम विरोधी नाट्य मंचन करने और पाक साफ नेकदिल आवाम को गुमराह करने का आरोप था। हम लोग तड़के ही शोपियन के लिए निकल पड़े। अमन पिकनिक और हाईकिंग की तैयारी कर के आया था। मैंने भी अपना रकसैक ले लिया। रख्ते सफर के साथ हम लोग मुगलों के पुराने रास्ते से होते हुए बुधल पीर पहुँचे, पीर की दरगाह और पीर की गली से होते हुए शीमर सर की दुरारोह पहाड़ी पर चढ़ने लगे। अमन ने मुझसे दरगाह पर चादर चढ़ाने और पीर की गली में गोंद की धूप जलाने वाली बात याद दिलाई। मैंने मुस्कराकर कहा 'क्या हम भी सिरमौर से मिलने जा रहे हैं? अप्रैल के महीने की गुनगुनी धूप और पहाड़ों के चीड़ के वनों की स्फूर्तिदायक सुगंध से हम दोनों रोमांचित थे। रास्ते में बकरवालों के काफिले अब मैदानी इलाकों को छोड़ कर पहाड़ों पर जाने की तैयारी करने लगे थे। उनके मवेशियों को उनके भेड़ियों की तरह दिखने वाले स्वामिभक्त कुत्ते एक झुंड में इकट्ठा करने के लिए भौंक रहे थे। चीड़ की सुगंध के साथ, कभी कभार मवेशियों के शरीर से उठती चरपरी दुर्गंध वातावरण को दूषित कर देती। बकरवालों के ऐसे ही एक खेमे से जब हम गुजर रहे थे तो एक बकरवाल महिला ने अपनी चार साल की एक बच्ची की ओर इशारा कर के कहा "छोरी लिस्सी है, कुछ दवाई दे दो।" उसका मतलब था कि बीमारी से वो कमजोर हो गई है, उसे कुछ विटामिन की आवश्यकता है। मैंने उसको बहलाने के लिए कुछ बिसकुट और पॉपिंस दे दिया। उसको जब यह पता चला कि हम लोग शीमर सर जा रहे हैं, तो उसने हमें एक सीधी चढ़ाई वाला लेकिन बेहद कम समय में झील तक पहुँचाने वाला रास्ता बताया।

शीमर सर पहुँच कर उसके गहरे नीले रंग से अभिभूत और उसके चारों ओर से उठती रहस्यमयी धुंध को देखकर स्तंभित हो कर हम एक दूसरे का हाथ थामे, चुपचाप उस अलौकिक मंजर को सोखते रहे। अमन ने आखिरकार उन दैवी पलों के सन्नाटे को भंग करते हुए पूछा -

"लंच लाई हो न?"

और मुझे भी एहसास हुआ कि तीन चार घंटे की थकाने वाली यात्रा के बाद जबरदस्त भूख लग गई थी। मैंने कहा "परवीना फोफ ने तबाकमाज बनाया था, नानबाई से लवास, और रात की बची नडरू की सब्जी भी लाई हूँ। और साथ में रसना का शर्बत। मज़ेदार पिकनिक होगी न...!!"

"मेरे पास रसना से भी अधिक शानदार चीज है, तुम्हें पीनी पड़ेगी हिप्पी!"

"ऐसी क्या चीज है?"

अमन ने अपने खादी के झोले से एक बोतल निकाली और उसको पेंडुलम की तरह हिलाते हुआ बोला। "जिन, ब्लू रिबंड जिन... इसको पी कर इनसान के अंदर का जिन्न बाहर निकल आता है..."

"फिर उस को बोतल में कैसे बंद करोगे...?"

"वो मैं बाद में बताऊँगा..."

उसके जवाब में एक नटखट चुहलबाजी थी। बहरहाल, अब्दुल भाई के घर हुए इत्तफाक को दो हफ्ते हो गए थे। मैं जानबूझकर अमन के सामने अनजान बनी रही और उसके प्रयासों को अनदेखा करती रही। शायद अमन उन पलों को फिर से जीना चाह रहा था या संभव है उससे भी कुछ आगे बढ़ने की जुर्रत करने वाला हो...!! ये सब सोचकर मुझे एक खूबसूरत सी झुरझुरी होने लगी।

अमन ने दो मोटे शीशे के गिलास निकाले और नींबू के कटे हुए टुकड़ों के साथ उनमें जिन उड़ेलने लगा। फिर उसने फ्लास्क से मेरे ग्लास में रसना मिला दिया। मुझे थोड़ी घबराहट हुई। मैंने अमन से पूछा "बहुत नशा तो नहीं होगा न...?"

"हुआ भी तो क्या...?"

"मेरी उल्टी सीधी हरकत करने से तुम मेरी खिल्ली उड़ाओगे..."

मेरे कुछ और बोलने से पहले उसने "चीयर्स" कहते हुए एक ही बार में अपना गिलास खाली कर दिया। मैंने भी धीरे धीरे पीना शुरू किया...!

"तबाकमाज निकालो"

मैंने हॉटकेस खोल कर उसके सामने रख दिया। वो उसे थोड़ी उपेक्षित निगाहों से देखने लगा। मैंने पूछा -

"क्या हुआ? गरम है, चलो शुरू करते हैं, लेकिन यह तुम्हारे यहाँ पंडितों की तरह बनाया हुआ तबाकमाज नहीं है। तुमने मुझे बताया था कि वाजों ने वाजवान के इस सबसे खास पकवान को बनाने की विधि पंडितों से सीखी थी। तुम्हें पता है इसे कैसे बनाते हैं?"

"मैंने देखा है इसे बनते हुए...! बहुत अधिक समय लेने वाला व्यंजन है। सामान्यतः बकरे की पसलियों वाले गोश्त को दूध में इतना पकाते हैं कि दूध सूख कर उन पसलियों में चिपक जाता है।"

मैं उसके द्वारा बनाए गए दूसरे ग्लास से रफ्ता रफ्ता एक दूसरी दुनिया में प्रवेश कर रही थी। झील में पड़ती पहाड़ों की सुमधुर बर्फ और विरलती हुई हरियाली का प्रतिबिंब, दूर कीपदार कंदराओं में से सीटी बजाती हवा और आसमान में सफेद बादलों के समूह से एक स्वप्निल माहौल निर्मित होता जा रहा था। अमन सफेद फूलों और मखमली घास के ऊपर लेटा, दाँतों से देवदार के सूखे नुकीले पत्तों को चबाते हुए बोले जा रहा था। मैं उसके सिरहाने एक पत्थर पर बैठी थी। झील की गहरी नीलिमा की आभा और अमन के ऊपर देवदार के पत्तों से छन कर आती धूप, उसके सुंदर चेहरे को और दीप्तिमान कर रही थी। उसका चौड़ा सीना और टीशर्ट के खुले बटन से झाँकते भूरे बालों के गुच्छे उसके व्यक्तित्व को अप्रतिरोध्य कामाकर्षक बना रहे थे। उसकी गंभीर आवाज में एक सहलाने वाली संगीतमयता थी। जिन का जिन्न शायद बोतल से बाहर निकलने लगा था। मैं एक तन्मय तंद्रा में उसकी बात सुनती रही। ग़ालिब अपने तंजिए अंदाज में फुसफुसा रहे थे -

रौ में है रख़्श-ए-उम्र कहाँ देखिए थमे

न हाथ बाग पर है न पा है रिकाब में

"उसके बाद, दूसरे तसले में घी को पिघलाते हैं, और एक एक करके पसलियों को तला जाता है। फिर उसमें पीसी हुई सौंफ और कुछ गरम मसालों को मिला कर बादाम की कतरनों के साथ सर्व करते हैं। मैंने यह रेसिपी अपने NSD के एक प्रोफेसर को बताया तो उन्होंने अपने दिल पर हाथ रखते हुए कहा कि 'मैं इसके बनाने के तरीके को सुनते हुए ही अपने हृदय की धमनियों में, कोलेस्ट्रॉल को जमते हुए महसूस कर रहा हूँ" अमन हँसते हुए बोला।

लेकिन मुझे क्या हो रहा है? अमन ने अब मुझे तीसरा गिलास भी थमा दिया। मैं लवास और नडरू को भी चटाई पर लगाने लगी। तभी अमन जो अब उठ कर झील के किनारे की ओर बढ़ गया था, मुझे इशारे से बुलाया। उसने झील के बीचों बीच उठते उफान की ओर देखते हुए बोला

"लगता है सिरमौर को तुम्हारे तबाकमाज की खुशबू बेचैन कर रही है ...वो देखो पानी कैसे हिलोरें लेने लगा है।"

मुझे भी झील की सतह पर काफी दूर तक पानी के ऊपर नीचे होते हुए एक रैखिक आकार लेने का आभास होने लगा। अमन और मैं नशे में थे। अचानक आसमान में स्याह बादलों का जमघट होने और तेज हवा चलने से अब सचमुच झील का पानी हिलोरें लेने लगा। दोपहर के समय भी तिमिराच्छन्न वातावरण होने के बावजूद सब कुछ एक मायावी व्यापकता से परिपूर्ण हो गया। और... और ...फिर गर्जन के साथ चकाचौंध करने वाला एक चमकदार स्तंभीय व्रजपात झील में समाता चला गया। अमन अपनी लड़खड़ाती जबान में बुदबुदाया।

"लो अब टेंगरी की ही कमी रह गई थी... लेकिन सिरमौर तो बेचारा घायल है। ओह... तभी टेंगरी खुद ही उससे मिलने झील में चला गया..."

और फिर मोटी मोटी बूँदों के साथ बारिश शुरू हो गई। हमने चटाई समेटी और पास ही टीले पर स्थित एक बाशा (बकरवालों के अस्थायी आश्रय। वे इन्हें मिट्टी और पत्थर की दीवाल बना कर चीड़ और देवदार के पत्तों और टहनियों से छा देते हैं, जहाँ वे गर्मियाँ बिताते हैं।) में घुस गए। नीम अँधियारे और आर्द्रता के साथ, अंदर एक रिहाईशी गरमाहट थी। एक चबूतरे पर सूखे देवदार के पत्ते और पहाड़ी बकरे के बालों को बिछा कर गद्देदार बिस्तर बनाया था। मैं झुक कर उसी चबूतरे पर चटाई बिछाने लगी, तभी मैंने अमन की निगाहों को अपने नितंबों पर चुभते हुए महसूस किया। अमन दरवाजे पर पड़े एक लकड़ी के कुंदे पर बैठ कर बाकी बची जिन को खाली कर रहा था। बारिश के साथ अब ओले भी पड़ने लगे। मैं भाग कर अमन के पास आ गई। वाकई हतप्रभ करने वाला दृश्य था। आलूबुखारे के आकार के ओलों के झड़ाझड़ से सारा इलाका मानो गॉल्फ बॉल से भरा टोकरा लग रहा था। जिन और उस नजारे के नशे से बेखबर मुझे पता ही नहीं चला की कब अमन ने अपने दोनों हाथों से मेरी कमर को घेर लिया और मेरी गर्दन पर अपने होठ रगड़ने लगा। एक मदहोश आलिंगन और फिर मैं अपने आप को चबूतरे पर बने बिस्तर में पाती हूँ। अमन के शरीर से उठती मर्दानी गंध, जिन और नींबू की महक, उसका चुंबन, मुझे निर्वस्त्र करते उसके हाथ मेरे उरोजों को निचोड़ते हुए। फिर न चाहते हुए भी मेरी टाँगें खुलती गईं। मैं उसकी दाढ़ी के अधकटे बालों का घर्षण अपनी जंघाओं के अंदरूनी भाग में महसूस करने लगी। मैंने उस हर्षोन्माद और वेदना के बीच झूलना शुरू कर दिया, जहाँ मैं केवल अपने शरीर की ही नहीं बल्कि एक अन्य अजीजी शरीर की उष्णता को महसूस करने लगी थी। और फिर... अमन का हाँफना और मुझे दबोच कर सो जाना। यह सब वास्तविक थी या मैं सपना देख रही थी...?

लेकिन यह सब सपना नहीं था...!! अलिश्बा मेरे पेट में थी। रिहर्सल बंद होने के बाद, अमन से मेरी मुलाकात केवल गाँव के किसी सामूहिक कार्यक्रमों में ही होती। मैंने अभी तक उसे अलिश्बा के बारे में नहीं बताया था। मेरा वजन बढ़ने लगा था और मैं महिलाओं से दूर भागती। कई रिश्तेदार ने कुछ इशारा भी किया था, लेकिन मेरे विद्रोही स्वभाव से सभी भयभीत रहते। लोगों के अटकले लगाने से पहले ही मैंने अपने फूले हुए पेट को ढीले फेरन से ढकना शुरू कर दिया था। मैं जानबूझकर अपनी कांगरी को पेट तक नीचे लटका लेती थी ताकि वो भी मेरे उभरे हुए फुलाव का छद्मावरण कर सके। मैं अमन को इसकी सूचना देने का उचित समय ढूँढ़ रही थी। मेरी प्लानिंग थी कि ज़फर भाई और बशीर भाई को खबर कर के अमन और मैं दिल्ली चले जाएँगे और कुछ समय बाद यहाँ के माहौल को देखते हुए वापस आ जाएँगे। लेकिन मुझे क्या पता था कि ठीक उसी साल, उसी महीने जब अलिश्बा पैदा होने वाली थी, पंडितों को सदा के लिए कश्मीर छोड़ने पर मजबूर कर दिया जाएगा। सब कुछ इतनी तेजी से बदलने लगा कि अमन से मेरा मिलना बंद हो गया। पंडित खौफ में रहते और पठाननुमा दिखने वाले विदेशी एके 47 के साथ घूमते हुए नजर आते। दरगाह अब कब्रगाह लगते हैं। कहाँ गया वोह सूफी संगीत और फिर अचानक, जनवरी की वह काली रात। मुझे कहीं से यह भी लगने लगा था कि इन विपत्तियों का सामना हम, पीर की गली में धूप न जलाने के कारण कर रहे हैं। मुझे अपने बच्चे के लिए कुछ तो करना पड़ेगा। अमन का अब सहारा नहीं था, मैं ज़फर भाई को उनके दफ्तर फोन करने के इरादे से, गाँव के एकलौते पीसीओ पर जब पहुँची तो वहाँ पर फौजियों की लंबी कतार देख कर उल्टे पैर वापस आ गई। मुझे अचानक ध्यान आया कि अनंतनाग के मेरे कान्वेंट स्कूल की सिस्टर इसाबेल, अब अनंतनाग के एकमात्र चर्च, चैपल ऑफ जॉन बिशप में हैड नन हैं। वे रोजगार के लिए और पारंपरिक काश्मीरी सलमा सितारे के उद्योग को संरक्षण देने के लिए चर्च के प्रांगण में "चिनार जरदोजी अंजुमन" नाम से एक NGO भी चलाती हैं। मुझे लगता है कि इन्हीं दिनों, मैं इन तनावों और अपने भविष्य को लेकर दहशत के कारण, धीरे धीरे अपना मानसिक संतुलन खोने लगी थी। अनंतनाग पहुँच कर मैंने सबसे पहले ज़फर भाई को फोन द्वारा, सब कुछ साफ साफ बता दिया। उनकी तरफ से जाहिर है, केवल एक झकझोर देने वाली चुप्पी थी। फिर शायद, सिस्टर इसाबेल ने मुझे अपने साथ ही रखा जहाँ मैं अपना वक्त, शादी के कपड़ों में गोटे लगाने और सलमा सितारा टाँकने में बिताया करती...। प्रसव पीड़ा के बाद क्या हुआ मुझे कुछ भी ध्यान नहीं है। मेरे दिल मेरे मुसाफिर यह सब कैसे हुआ ?

सितारों पे डालती हूँ मैं कमंद

मेरे पैदा होने के बाद, तुम्हें काफी देर बाद होश आया। होश आते ही माओज, तुमने मुझे सिस्टर इसाबेल के हाथों से छीन लिया। लेकिन पता नहीं क्यों तुम्हारे स्तनों का दूध सूख चुका था। मैं भूख से बिलख रही थी। लेकिन तुम किसी को भी पास आने नहीं देती। जो भी मुझे दूध की बोतल देने की कोशिश करता, तुम उस पर जानवरों के जैसे दाँत और नाखूनों को दिखाते हुए थूक देती थी। तुम अपने गले से एक अजीब घुरघुराहट और गुर्राने की आवाज निकालती। सिस्टर इसाबेल के "चिनार जरदोजी अंजुमन" में जो महिलाएँ आती थी, वे एक पुराने कश्मीरी लोक कथा का हवाला देते हुए तुम्हें मादा वनमानुष में परिवर्तित हो गई एक राजकुमारी से तुलना करते, आपस में खुसर पुसर करने लगी थीं। सिस्टर इसाबेल ने अपनी तरफ से, तुम्हें शांत करने की काफी कोशिश की। वे एक बड़े से क्रॉस को लेकर 'आमेन' कहते हुए तुमसे बातचीत करना चाह रही थीं, लेकिन तुमने अपने नाखूनों से उनका मुँह नोच लिया। अंत में सिस्टर इसाबेल ने पास के अस्पताल के डॉक्टर की मदद से तुम्हें ट्रैंगक्वलाइज कराया और, मुझे दूध पिलाया। ऐसे दौरे तुम्हें अक्सर पड़ने लगे थे और तुम्हारा ज्यादातर समय दवा के असर में सोते हुए बीतता था। लगभग दस दिनों के बाद ज़फर मामू आए और उन्होंने मुझे गोद में उठाते हुए कहा "अरे यह तो अलिश्बा है, तुम हम सबके लिए एक नया कश्मीर बनाओगी, एक तेजोमय सुबह के साथ। हम सब को उसका इंतजार रहेगा अलिश्बा"। फिर उन्होंने सिस्टर इसाबेल को आश्वस्त किया और बोले कि "जल्द ही मैं अलिश्बा और हीपोश को साथ ले जाऊँगा"। लेकिन उन्होंने तुमसे कोई बातचीत नहीं की।

उस रात पूरे अनंतनाग घाटी की बिजली गुल थी। त्राल पहाड़ी से तूफान का बर्फीला बवंडर लुढ़कते हुए अनंतनाग शहर पर एक विध्वंसकारक आक्रमण कर दिया। पोपलर के छोटे पेड़ और मोहल्ला सारनाल में सेबों से लदे ट्रकों के तिरपाल, रुई के फाहों की तरह उड़ने लगे थे। चैपल के घंटों के लगातार बजने और तूफान से जंगली हाथियों के एक साथ चिंघाड़ने जैसे शोर शराबे से लोग आतंकित हो कर अपने अपने घरों में दुबके हुए थे। दवा का असर समाप्त होने के बाद तुम अचानक उठी और कार्यशाला में बिखरे पड़े सोने के पानी चढ़े, पीतल के छोटे छोटे अर्द्धचंद्रमा और सितारों के टुकड़ों में से एक चाँद और तारे को उठा लिया। तुम कुछ बुदबुदा रही थी माओज, तुम कह रही थी की मेरी परवरिश कश्मीर के बाहर ही संभव होगी। मुझे तुम अल्लाह के भरोसे छोड़ रही हो। तुमने उस रात, बुखारी की दहकती हुई सतह पर उस चाँद और सितारे को गरम किया और बारी बारी से मेरी दाहिनी कलाई पर दागते हुए निशान बना दिया। मैं बिलबिला कर कलपने लगी लेकिन मेरा क्रंदन तूफान के शोर में दब गया। तुम कितनी डरावनी लग रही थे माओज, तुम्हारे बाल खुले हुए थे, आँखों का काजल बहकर तुम्हारे कपोलों को स्याह बना दिया था। तुम्हारी अधखुली आँखें खुल कर गोल गोल हो गई थीं और उनमें से चिनगारी की लपट जैसी निकल रही थी। उस अँधेरे कमरे में केवल दहकते बुखारी से निकलती बहुरंगी रोशनी में तुम्हारा व्यक्तित्व साइकेडेलिक लग रहा था। तुम बोलती जा रही थी, "अलिश्बा मैं तुझे इसी निशान से ढूँढ़ लूँगी, तू मेरी ही नहीं कश्मीर की दिलेर कूर है।" उसके बाद तुमने वहीं पड़े ढेर सारे ऊन के गोलों को इकट्ठा किया और मुझे उसमें लपेट दिया। तूफान अब भी थमा नहीं था, तुम मुझे उसी खौफनाक मंजर में लेकर चुपके से निकल आई। चर्च के पास ही स्थित मोहल्ला सारनाल में, सेबों के लाइन से लदे ट्रकों में से, एक ट्रक के खाली पड़े क्रेट में तुमने मुझे सुला दिया।

बहुत ज्यादा चीखने और लगातार हिचकियों से मैं निढाल हो गई थी। माओज ने वैसे मुझे पेट भर दूध पिला दिया था। थोड़ी देर के बाद मैं सो गई। उठने के बाद से मैंने चीखना शुरू कर दिया, बहुत देर बाद मैंने ट्रक को रुकते हुए महसूस किया, किसी ने पीछे के भाग को खोला और आश्चर्य से मुझे बाहर निकाल कर चीखा "ओए यारा ये किसके पाप को ढो रहा है?" उनकी आपस में कुछ बातचीत हुई और फिर वे मुझे ढाबे से दूध लेकर चम्मच से पिलाने लगे। वे बोल रहे थे "तीन घंटे बाद पठानकोट आ जाएगा मुझे वहाँ के एक यतीमखाने के बारे में जानकारी है। वहीं इसे दे देते हैं" पेट भर जाने से मैं फिर सो गई। नींद खुलने के बाद मैंने पाया की मैं एक बड़े से कमरे में, पालने में झूल रही हूँ। मेरी तरह वहाँ दर्जनों बच्चे थे। मुझे गुदगुदा बिस्तर और समय पर दूध मिलने लगा। लेकिन मेरे भीतर एक असुरक्षा ऐसी बैठी थी कि थोड़ी देर के सन्नाटे से भी मैं भयभीत हो कर जोर-जोर से रोने लगती। धीरे धीरे माओज की यादें धुँधली होने लगी। मुझे एक नई माँ की तलाश थी।

एक दिन मुझे बहुत जल्दी नहला धुला कर तैयार किया गया। मेरी आया, सुखमीत, जिसने मेरा नाम अपनी पसंदीदा हीरोइन करीना के नाम पर रख दिया था, मुझे ले कर एक ऑफिसनुमा कमरे में आई। मुझे किसी ने अपनी गोद में लिया। मैंने ध्यान से उस महिला के चेहरे को देखा और शायद माओज से बिछुड़ने के बाद मैं पहली बार मुसकुराई। उस चेहरे में मुझे अपने नए जीवन और भविष्य की आश्वस्तता दिखी। मैं खुश रहने लगी लेकिन बहुत दिन बीत जाने के बाद भी मुझे लेने कोई नहीं आया। असुरक्षा धीरे धीरे बढ़ने लगी। मेरी नई माँ क्यों नहीं आ रही मुझे लेने? मुझे ज्वर रहने लगा और मैं कमजोर भी हो गई। अंततः मेरा सपना पूरा हुआ। मैं एक ऐसी जगह पहुँच गई हूँ जहाँ से मैं अपने ज़फर माम के सपनों को साकार करूँगी। बहुत जल्द मैं अमन को लेकर लौटूँगी और हीपोश की खुशबू से फिर से वादिए कश्मीर को सराबोर कर दूँगी। क्योंकि सितारों पे डालती हूँ मैं कमंद...!!


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हिंदी समय में वर्तुल सिंह की रचनाएँ