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उपन्यास

प्राण
स्वामी विवेकानंद


बहुतों का विचार है, प्राणायाम श्‍वास-प्रश्‍वास की कोई क्रिया है। पर असल में ऐसा नहीं है। वास्‍तव में तो श्‍वास-प्रश्‍वास उन क्रियाओं में से सिर्फ एक ही क्रिया है, जिनके माध्‍यम से हम यथार्थ प्राणायाम की साधना में अधिकारी होते हैं। प्राणायाम का अर्थ है, प्राण का संयम। भारतीय दार्शनिकों के मतानुसार सारा जगत् दो पदार्थों से निर्मित है। उनमें से एक का नाम है आकाश। यह आकाश एक सर्वव्‍यापी, सर्वानुस्‍यूत सत्ता है। जिस किसी वस्‍तु का आकार है, जो कोई वस्‍तु कुछ वस्‍तुओं के मिश्रण से बनी है, वह इस आकाश से ही उत्‍पन्‍न हुई है। यह आकाश ही वायु में परिणत होता है, यही तरल पदार्थ का रूप धारण करता है, यही फिर ठोस आकार को प्राप्‍त होता है; यह आकाश ही सूर्य, पृथ्‍वी, तारा, धूमकेतु आदि में परिणत होता है। समस्‍त प्राणियों के शरीर-पशुओं के शरीर, उद्भिद् आदि जितने रूप हमें देखने को मिलते हैं, जिन वस्‍तुओं का हम इन्द्रियों द्वारा अनुभव कर सकते हैं, यहाँ तक कि, संसार में जो कुछ वस्‍तु हैं, सभी आकाश से उत्‍पन्‍न हुई हैं। जब यह स्‍थूल होकर कोई आकार धारण करता है, तभी हम इसका अनुभव कर सकते हैं। सृष्टि के आदि में एकमात्र आकाश रहता है। फिर कल्‍प के अंत में समस्‍त ठोस, तरल और वाष्‍पीय पदार्थ पुन: आकाश में लीन हो जाते हैं। बाद की सृष्टि फिर से इसी तरह आकाश से उत्‍पन्‍न होती है।

किस शक्ति के प्रभाव से आकाश का जगत् के रूप में परिणाम होता है? इस प्राण की शक्ति से। जिस तरह आकाश इस जगत का कारणस्‍वरूप अनंत, सर्वव्‍यापी भौतिक पदार्थ है, प्राण भी उसी तरह जगत की उत्‍पत्ति के कारणस्‍वरूप आकाशरूप्‍ में परिणत होती है, और जगत की सारी शक्तियाँ प्राण में लीन हो जाती हैं; दूसरे कल्‍प में फिर इसी प्राण से समुदय शक्तियों का विकास होता है। यह प्राण ही गतिरूप में अभिव्‍यक्‍त हुआ है- यहीं गुरुत्‍वाकर्षण या चुम्‍बकशक्ति के रूप में अभिव्‍यक्‍त हो रहा है। यह प्राण ही स्‍नायविक शक्ति-प्रवाह (nerve currents) के रूप में, विचार-शक्ति के रूप में और समुदय दैहिक क्रिया के रूप में अभिव्‍यक्‍त हुआ है। विचार-शक्ति से लेकर अति सामान्‍य बाह्य शक्ति तक, सब कुछ प्राण का ही विकास है। बाह्य और अंतर्जगत की समस्‍त शक्तियाँ जब अपनी मूल अवस्‍था में पहुँचती हैं, तब उसी को प्राण कहते हैं। 'जब अस्ति और नास्ति कुछ भी न था, जब तम से तम आवृत था, तब क्‍या था? यह आकाश ही गतिशून्‍य होकर अवस्थित था। प्राण में किसी प्रकार की बाह्य गति रूद्ध थी, परंतु तब भी प्राण का अस्तित्‍व था। संसार में जितने प्रकार की शक्तियों का विकास अब हुआ है, कल्प के अंत में वे शांतभाव धारण करती हैं- अव्‍यक्‍त अवस्‍था में लीन होती हैं, और दूसरे कल्‍प के आदि में वे ही फिर से व्‍यक्‍त होकर आकाश पर कार्य करती रहती हैं। इसी आकाश से परिदृश्‍यमान साकार वस्‍तुएँ उत्‍पन्‍न होती हैं, और आकाश के विविध परिणाम प्राप्‍त होने पर यह प्राण भी दृश्‍यमान नाना प्रकार की शक्तियों में परिणत होता रहता है। इस प्राण के यथार्थ तत्त्व को जानना और उसको संयत करने की चेष्‍टा करना ही प्राणायाम का प्रकृत अर्थ है।

इस प्राणायाम में सिद्ध होने पर हमारे लिए अनंत शक्ति का द्वार खुल जाता है। मान लो, किसी व्‍यक्ति की समझ में यह प्राण का विषय पूरी तरह आ गया और वह उसे वश करने में भी कृतकार्य हो गया, तो फिर संसार में ऐसी कौन सी शक्ति है, जो उसके अधिकार में न आए? उसकी आज्ञा से चन्‍द्र-सूर्य अपनी जगह से हिलने लगते हैं, क्षुद्रतम परमाणु से बृहत्तम सूर्य तक सभी उसके वशीभूत हो जाते हैं, क्‍योंकि उसने प्राण को जीत लिया है। प्रकृति को वशीभूत करने की शक्ति प्राप्‍त करना ही प्राणायाम की साधना का लक्ष्‍य है। जब योगी सिद्ध हो जाते हैं, तब प्रकृति में ऐसी कोई वस्‍तु नहीं, जो उनके वश में न आ जाए। यदि वे देवताओं का आह्रान करेंगे, तो वे उनकी आज्ञा मात्र से उपस्थित होंगे; यदि मृत व्‍यक्तियों को आने की आज्ञा देंगे, तो वे तुरंत हाजिर हो जाएंगे। प्रकृति की समस्त शक्ति उनकी आज्ञा से दासी की तरह काम करने लगेगी। अज्ञ जन योगी के इन कार्य-कलापों को अलौकिक समझते हैं। हिंदू मन की यह एक विशेषता है कि वह सदैव अंतिम संभाव्य सामान्‍यीकरण के लिए अनुसंधान करता है, और बाद में विशेष पर कार्य करता है।

वेद में यह प्रश्‍न पूछा गया है,कस्मिन्‍नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति ?- ''ऐसी कौन सी वस्‍तु है, जिसका ज्ञान होने पर सब कुछ ज्ञात हो जाता है?'' इस प्रकार, हमारे जितने शास्‍त्र हैं, जितने दर्शन हैं, सबके सब उसी के निर्णय में लगे हुए हैं, जिनके जानने से सब कुछ जाना जा सकता है। यदि कोई शक्ति जगत का तत्त्व थोड़ा-थोड़ा करके जानना चाहे, तो उसे अनंत समय लग जाएगा; क्‍योंकि फिर तो उसे बालू के एक-एक कण तक को भी अलग-अलग रूप से जानना होगा। अत: यह स्‍पष्‍ट है कि इस प्रकार सब कुछ जानना एक प्रकार से असंभव है। तब फिर इस प्रकार के ज्ञान-लाभ की संभावना कहाँ है? एक-एक विषय को अलग-अलग रूप से जानकर मनुष्‍य के लिए सर्वज्ञ होने की संभावना कहाँ है? योगी कहते हैं, इन सब विशिष्‍ट अभिव्‍यक्तियों के पीछे एक सामान्‍य-अमूर्त तत्त्व है। उसको पकड़ सकने या जान लेने पर सब कुछ जाना जा सकता है। इसी प्रकार, वेदों में संपूर्ण जगत को उस एक अखण्‍ड निरपेक्ष सत्‍स्‍वरूप में सामान्‍यीकृत किया गया है। जिन्‍होंने इस सत्‍स्वरूप को पकड़ा है, उन्‍हीं ने संपूर्ण विश्‍व को समझा लिया है। उक्‍त प्रणाली से ही समस्‍त शक्तियों को भी इस प्राण में सामान्‍यीकृत किया गया है। अतएव जिन्‍होंने प्राण को पकड़ा है, उन्‍होंने संसार में जितनी शारीरिक या मानसिक शक्तियाँ हैं, सबको पकड़ लिया है। जिन्‍होंने प्राण को जीता है, उन्‍होंने अपने मन को ही नहीं, वरन्‍ सबके मन को भी जीत लिया है। जिन्‍होंने प्राण को जीत लिया है, उन्‍होंने अपनी देह और दूसरी जितनी देह हैं, सबको अपने अधीन कर लिया है; क्‍योंकि प्राण ही सारी शक्तियों की सामान्‍यीकृत अभि‍व्‍यक्ति है।

किस प्रकार इस प्राण पर विजय पाई जाए, यही प्राणायाम का एकमात्र उद्देश्‍य है। इस प्राणायाम के संबंध में जितनी साधनाएँ और उपदेश हैं, सबका यही एक उद्देश्‍य हैं। हर एक साधनार्थी को, उसके सबसे समीप जो कुछ है, उसी से साधना शुरू करनी चाहिए- उसके निकट जो कुछ है, उस सब पर विजय पाने की चेष्‍टा करनी चाहिए। संसार की सारी वस्‍तुओं में देह हमारे सबसे निकट है और मन उससे भी निकटतर है। जो प्राण संसार में सर्वत्र व्‍याप्‍त है, उसका जो अंश इस शरीर और मन में कार्यशील है, वही अंश हमारे सबसे निकट है। यह जो क्षुद्र प्राण तरंग है- जो हमारी शारीरिक और मानसिक शक्तियों के रूप में परिचित है, वह अनंत प्राण-समुद्र में हमारे सबसे निकटतम तरंग है। यदि हम उस क्षुद्र तरंग पर विजय पा लें, तभी हम समस्‍त प्राण-समुद्र को जीतने की आशा कर सकते हैं। जो योगी इस विषय में कृतकार्य होते हैं, वे सिद्धि पा लेते हैं; तब कोई भी शक्ति उन पर प्रभुत्‍व नहीं जमा सकती। वे एक प्रकार से सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हो जाते हैं। हम सभी देशों में ऐसे संप्रदाय देखते हैं, जो किसी न किसी उपाय से इस प्राण पर विजय प्राप्‍त करने की चेष्‍टा कर रहे हैं। इसी देश में (अमेरिका में) हम मन:शक्ति से आरोग्‍य करने वाले (mind-healers), विश्‍वास से आरोग्‍य करने वाले (faith-healers) प्रेतात्‍मवादी (spiritualists), ईसाई वैज्ञानिक (Christian Scientists), सम्मोहन विद्यावित् (hypnotists) आदि अनेक संप्रदाय देखते हैं। यदि हम इन मतों का विशेष रूप से विश्‍लेषण करें, तो देखेंगे कि इन सब मतों की पृष्‍ठभूमि में वे फिर जानें या न जानें प्राणायाम ही है। उन सब मतों के मूल में एक ही बात है। वे सब एक ही शक्ति को लेकर कार्य कर रहे हैं; पर हाँ, वे उसके संबंध में कुछ जानते नहीं। उन लोगों ने एकाएक मानो एक शक्ति का आविष्‍कार कर डाला है, परंतु उस शक्ति के स्‍वरूप के संबंध में बिल्‍कुल अज्ञ हैं। योगी जिस शक्ति का उपयोग करते हैं, ये भी बिना जाने-बूझे उसी का उपयोग कर रहे हैं। और वह प्राण की ही शक्ति है।

यह प्राण ही समस्त प्राणियों के भीतर जीवनी-शक्ति के रूप में विद्यमान है। विचारणा इसकी सूक्ष्‍मतम और उच्‍चतम अभिव्‍यक्ति है। फिर जिसे हम साधारणत: विचारणा की आख्‍या देते हैं, वही प्राण की एकमात्र वृत्ति नहीं है। इसके अतिरिक्‍त हमारा एक निम्‍नतम कार्यक्षेत्र भी है, जिसे हम जन्‍मजात-प्रवृत्ति (Instinct) अथवा ज्ञानरहित चित्त-वृत्ति अथवा मन की अचेतन भूमि कहते हैं। मान लो, मुझे एक मच्‍छर ने काटा, तो मेरा हाथ अपने ही आप उसे मारने को उठ जाता है। उसे मारने के लिए हाथ को उठाते-गिराते मुझे कोई विशेष सोच-विचार नहीं करना पड़ता। यह भी विचारणा की एक प्रकार की अभिव्‍यक्ति है। शरीर के समस्‍त स्‍वाभाविक कार्य (reflex actions) इसी विचारणा के स्‍तर के अंतर्गत हैं। इससे उन्‍नत विचारणा का एक दूसरा स्‍तर भी है, जिसे संज्ञान अथवा मन की चेतन भूमि कहते हैं। हम युक्ति-तर्क करते हैं, विचार करते हैं, सब विषयों के पक्षापक्ष सोचते हैं, लेकिन इतना ही पर्याप्‍त नहीं है। हमें मालूम है, युक्ति का विचार बिल्‍कुल छोटी सी सीमा के द्वारा सीमित है। वह हम लोगों को कुछ ही दूर तक ले जा सकता है, इसके आगे उसका और अधिकार नहीं। जिस वृत्त के अंदर वह चक्‍कर काटता है, वह बहुत ही सीमित, बहुत की संकीर्ण है। परंतु साथ ही हम यह भी देखते हैं कि बहुत से तथ्‍य बाहर से सहसा इस वृत्त के भीतर आ जाते हैं। पुच्‍छल तारा जिस प्रकार सौर-जगत के अधिकार के भीतर न होने पर भी कभी-कभी उसके भीतर सहसा आ जाता है और हमें दीख पड़ता हैं, उसी प्रकार बहुत से तथ्‍य, हमारी युक्ति के अधिकार के बाहर होने पर भी, उसके भीतर आ जाते हैं। यह निश्चित है कि वे सब तथ्‍य इस सीमा के बाहर से आते हैं; पर हमारा तर्क या युक्ति इस सीमा के परे नहीं जा सकती। इस छोटी सी सीमा के भीतर उन तथ्‍यों के प्रदेश का कारण यदि हम खोजना चाहें, तो हमें अवश्‍य इस सीमा के बाहर जाना होगा। हमारे विचार, हमारी युक्तियाँ वहाँ नहीं पहुँच सकती। योगियों का कहना है कि यह सज्ञान या चेतन भूमि ही हमारे ज्ञान की चरम सीमा नहीं है। मन इन दोनों भूमियों से भी उच्‍चतर भूमि पर विचरण कर सकता है। उस भूमि को हम अतिचेतन भूमि कहते हैं- वही समाधि नामक पूर्ण एकाग्र अवस्‍था है। जब मन उस अवस्‍था में पहुँच जाता है, तब वह युक्ति-तर्क की सीमा के परे चला जाता है, और ऐसे तथ्‍यों का प्रत्‍यक्ष साक्षात्‍कार करता है, जो जन्‍मजात-प्रवृत्ति तर्क द्वारा कभी प्राप्‍त नहीं हैं। शरीर की सारी सूक्ष्‍म से सूक्ष्‍म शक्तियाँ, जो प्राण की ही विभिन्‍न मात्र हैं, यदि सही रास्‍ते से परिचलित हों, तो वे मन पर विशेष रूप से कार्य करती है, और तब मन भी पहले से उच्‍चतर अवस्‍था में अर्थात् अतिचेतन भूमि में चला जाता है और वहाँ से कार्य करता रहता है।

इस विश्‍व में अस्तित्‍व के प्रत्‍येक स्‍तर पर एक अखण्‍ड वस्‍तु राशि दीख पड़ती है। भौतिक संसार की ओर दृष्टिपात करने पर दिखता है कि एक अखण्‍ड वस्‍तु ही मानो नाना रूपों में विराजमान है। वास्‍तव में, तुममें और सूर्य में कोई भेद नहीं। वैज्ञानिक के पास जाओ, वे तुम्‍हें समझा देंगे कि वस्‍तु में भेद केवल काल्‍पनिक है। इस मेज से वास्‍तव में मेरा कोई भेद नहीं। यहाँ मेज अनंत जड़ राशि का मानो एक बिंदु है और मैं उसी का एक दूसरा बिंदु। प्रत्‍येक साकार वस्‍तु इस अनंत जड़ सागर में मानो एक भँवर है। भँवर सारे समय एकरूप नहीं रहते। मान लो, किसी वेगवती नदी में लाखों भँवर हैं; प्रत्‍येक भँवर में प्रतिक्षण नई जलराशि आती है, कुछ देर घूमती है और फिर दूसरी ओर चली जाती है। उसके स्‍थान में एक नई जलराशि आ जाती है। यह जगत् भी इसी प्रकार सतत परिवर्तनशील एक जड़राशि मात्र है और ये सारे रूप उसके भीतर मानो छोटे-छोटे भँवर हैं। कोई भूत समष्टि किसी मनुष्‍य देहरूपी भँवर में घुसती है, और वहाँ कुछ काल तक चक्‍कर काटने के बाद वह बदल जाती है और एक दूसरी भँवर में- किसी पशु-देहरूपी भँवर में प्रवेश करती है। फिर वहाँ कुछ वर्ष तक घूमती रहने के बाद, खनिज पदार्थ नामक दूसरे भँवर में चली जाती है। बस, सतत परिवर्तन होता रहता है। कोई भी वस्‍तु स्थिर नहीं। मेरा शरीर, तुम्‍हारा शरीर नामक कोई वस्‍तु वास्‍तव में नहीं है। वैसा कहना केवल मूर्खता की बात है। केवल एक अखण्‍ड जड़राशि। उसी के किसी बिंदु का नाम है चंद्र, किसी का सूर्य, किसी का मनुष्‍य, किसी का पृथ्‍वी; कोई बिंदु उद्भिद् है, तो कोई खनिज पदार्थ। इनमें से कोई भी सदा एक भाव जैसा नहीं रहता, सभी वस्‍तुओं का सतत परिवर्तन हो रहा है; जड़ का एक बार संश्‍लेषण होता है, फिर विश्‍लेषण। मनोजगत के संबंध में भी ठीक यही बात है। 'ईथर' (आकाश-तत्त्व) को हम सारी जड़ वस्‍तुओं के प्रतिनिधि के रूप में ग्रहण कर सकते हैं। प्राण की सूक्ष्‍मतर स्पंदनशील अवस्‍था में इस ईथर को मन का भी प्रतिनिधिस्‍वरूप कहा जा सकता है। अतएव संपूर्ण मनोजगत भी एक अखण्‍डस्‍वरूप है। जो अपने मन में यह अति सूक्ष्‍म स्वरूप उत्‍पन्‍न कर सकते हैं, वे देखते हैं कि सारा जगत सूक्ष्‍मातिसूक्ष्‍म कंपनों की समष्टि मात्र है। किसी औषधि में हमको इस सूक्ष्‍म अवस्‍था में पहुँचा देने की शक्ति रहती है, यद्यपि उस समय हम इन्द्रिय-राज्‍य के भीतर ही रहते हैं। तुममें से बहुतों को सर हम्फ्री डेवी के प्रसिद्ध प्रयोग की बात याद होगी। हास्‍योत्‍पादक गैस (Laughing Gas) ने जब उनको अभिभूत कर लिया, तब वे भाषण देते समय स्‍तब्‍ध और नि:स्‍पन्‍द होकर खड़े रहे। कुछ देर बाद जब होश आया, तो बोले, ''सारा जगत भावराशि की समष्टि मात्र है।'' कुछ समय के लिए सारे स्‍थूल कंपन (Gross Vibrations) चले गए थे और केवल सूक्ष्‍म कंपन, जिनको उन्‍होंने भावराशि कहा था, बच रहे थे। उन्‍होंने चारों ओर केवल सूक्ष्‍म कंपन देखे थे। संपूर्ण जगत उनकी आँखों में मानो एक महान्‍ विचार-समुद्र में परिणत हो गया था। उस महासमुद्र में वे जगत् की प्रत्‍येक व्‍यष्टि मानो एक छोटा-भाव भँवर बन गई थी।

इस प्रकार हम देखते हैं कि विचार-जगत् में भी अखण्‍ड एकत्व विद्यमान है। और अंत में जब हम आत्‍मा को प्राप्‍त कर लेते हैं, तब एक अखण्‍ड सत्ता के अतिरिक्‍त और कुछ नहीं अनुभव करते। भौतिक पदार्थ के स्‍थूल और सूक्ष्‍म स्पंदनों के परे, सब प्रकार की गतियों के परे वही एक अखण्‍ड सत्ता है। यहाँ तक कि इन गतियों की स्‍थूल अभिव्‍यक्तियों के भीतर भी केवल एकत्‍व विद्यमान है। इन सत्‍यों को अब अस्‍वीकार नहीं किया जा सकता। आधुनिक भौतिक विज्ञान ने भी यह प्रमाणित कर दिया है कि शक्ति-समष्टि सदैव समान है और यह भी सिद्ध हो चुका है कि यह शक्ति-समष्टि दो तरह से अवस्थित है- कभी अव्‍यक्‍त अवस्‍था में और कभी व्‍यक्‍त अवस्‍था में। व्‍यक्‍त अवस्‍था में वह इन नानाविध शक्तियों के रूप धारण करती है। इस प्रकार वह अनंत काल से कभी व्‍यक्‍त और कभी अव्‍यक्‍त भाव धारण करती आ रही है। इस शक्तिरूपी प्राण के संयम का नाम ही प्राणायाम है।

मनुष्‍य-देह में इस प्राण की सबसे स्‍पष्‍ट अभिव्‍यक्ति है- फेकड़े की गति। यदि यह गति रूक जाए, तो देह की सारी कियाएँ तुरंत बंद हो जाएंगी, शरीर के भीतर जो अन्‍यान्‍य शक्तियाँ कार्य कर रही थीं, वे भी शांत भाव धारण कर लेंगी। पर ऐसे भी व्‍यक्ति हैं, जो अपने को इस प्रकार शिक्षित कर लेते हैं कि उनके फेफड़े की गति रूक जाने पर भी उनका शरीर नहीं जाता। ऐसे बहुत से व्‍यक्ति हैं, जो बिना साँस लिए कई महीने तक जमीन के अंदर गड़े रह सकते हैं, पर तो भी उनका देह-नाश नहीं होता। सूक्ष्‍मतर शक्ति को प्राप्‍त करने के लिए हमें स्थूलतर शक्ति की सहायता लेनी पड़ती है। इस प्रकाश क्रमश: सूक्ष्‍म से सूक्ष्‍मतर शक्ति में जाते हुए अंत में हम चरम लक्ष्‍य पर पहुँच जाते हैं। प्राणायाम का यथार्थ अर्थ है- फेफड़े की इस गति का रोध करना। इस गति के साथ श्‍वास का निकट संबंध है। यह गति श्‍वास-प्रश्‍वास द्वारा उत्‍पन्‍न नहीं होती, वरन्‍ वही श्‍वास-प्रश्‍वास की गति को उत्‍पन्‍न कर रही है। यह गति ही, परम की भाँति, वायु को भीतर खींचती है। प्राण इस फेफड़े को चलाता है और फेफड़े की यह गति फिर वायु को खींचती है। इस तरह यह स्‍पष्‍ट है कि प्राणायाम श्‍वास-प्रश्‍वास की क्रिया नहीं है। पेशियों की जो शक्ति फेफड़े को चलाती है, उसको वश में लाना ही प्राणायाम है। जो शक्ति स्‍नायुओं के भीतर से पेशियों के पास जाती है और जो फेफड़े का संचालन करती है, वही प्राण है। प्राणायाम की साधना में हमें उसी को वश में लाना है। जब प्राण पर विजय प्राप्‍त हो जाएगी, तब हम तुरंत देखेंगे कि शरीरस्‍थ प्राण की अन्‍यान्‍य सभी क्रियाएँ हमारे अधिकार में धीरे-धीरे आ गई हैं। मैंने स्‍वयं ऐसे व्‍यक्ति देखे हैं, जिन्‍होंने अपने शरीर की सारी पेशियों को वशीभूत कर लिया है अर्थात वे उनको इच्‍छानुसार चला सकते हैं। और वे ऐसा कर भी क्‍यों न सकेंगे? यदि कुछ पेशियाँ हमारी इच्‍छा के अनुसार चलाई जा सकती हों, तो दूसरी सब पेशियों और स्‍नायुओं को हम इच्‍छानुसार क्‍यों न चला सकेंगे? इसमें असंभव क्‍या है? अब हमारी इस संयम-शक्ति का लोप हो गया है और पेशियों की गति स्‍वयं क्रिए हो गई हो। हम इच्‍छानुसार कानों को नहीं हिला सकते, परंतु हम जानते हैं कि पशुओं में यह शक्ति है। हममें यह शक्ति इसलिए नहीं हैं कि हम इसे काम में नहीं लाते। इसी को क्रम-अवनति अथवा पूर्वावस्‍था की ओर पुनरावर्तन (atavism) कहते हैं।

फिर हम यह भी जानते हैं कि जिस गति ने अब अव्‍यक्‍त भाव धारण किया है, उसे हम फिर से व्‍यक्‍तावस्‍था में ला सकते हैं। दृढ़ अभ्‍यास से द्वारा शरीर की कुछ गतियाँ, जो अभी हमारी इच्‍छा के अधीन नहीं, फिर से पूरी तरह वश में लाई जा सकती हैं। इस प्रकार विचार करने पर दीख पड़ता है कि शरीर का प्रत्‍येक अंश हम पूरी तरह अपनी इच्‍छा के अधीन कर सकते हैं; इसमें कुछ भी संभव नहीं, बल्कि यह तो पूर्णरूपेण संभव है। योगी प्राणायाम द्वारा इसमें कृतकार्य होते हैं। तुम लोगों ने पढ़ा होगा कि प्राणायाम में श्‍वास लेते समय संपूर्ण शरीर को प्राण से पूर्ण करना होता है। अंग्रेजी अनुवाद में प्राण शब्‍द का अर्थ किया गया है श्‍वास। इससे तुम्‍हें सहज ही सन्‍देह हो सकता है कि श्‍वास से संपूर्ण शरीर को कैसे पूरा किया जाए। वास्‍तव में यह अनुवादक का दोष है। देह के सारे अंगों को प्राण अर्थात् इस जीवनी-शक्ति द्वारा भरा जा सकता है, और जब तुम इसमें सफल होगे, तो संपूर्ण शरीर तुम्‍हारे वश में हो जाएगा; और जब तुम इसमें सफल होगे, तो संपूर्ण शरीर तुम्‍हारे वश में हो जाएगा; देह की समस्‍त व्याधियाँ, सारे दु:ख तुम्‍हारी इच्‍छा के अधीन हो जाएंगे। इतना ही नहीं, दूसरे के शरीर पर भी अधिकार जमाने में तुम समर्थ हो जाओगे। संसार में भला-बुरा जो कुछ है, सभी संक्रामक है। यदि तुम्‍हारा शरीर किसी विशेष अवस्‍था में हो, तो उसकी प्रवृत्ति दूसरों में भी वही अवस्‍था उत्‍पन्‍न करने की होगी। यदि तुम सबल और स्‍वस्‍थकाय रहो, तो तुम्‍हारे समीपवर्ती व्‍यक्तियों में भी मानों कुछ स्‍वस्‍थ भाव, कुछ सबल भाव आएगा। और यदि तुम रूग्‍ण और दुर्बल रहो, तो देखोंगे, तुम्‍हारे निकटवर्ती दूसरे व्‍यक्ति भी मानो कुछ रूग्‍ण और दुर्बल हो रहे हैं। तुम्‍हारी देह का कंपन मानो दूसरे के भीतर संचालित हो जाएगा। जब एक व्‍यक्ति दूसरे को रोगमुक्‍त करने की चेष्‍टा करता है, तब उसका पहला प्रयत्‍न यह होता है कि उसका स्‍वास्‍थ्‍य दूसरे में संचालित हो जाए। यही आदिम चिकित्‍सा-प्रणाली है। ज्ञातभाव से हो या अज्ञातभाव से, एक व्‍यक्ति दूसरे की देह में स्‍वास्‍थ्‍य-संचार कर दे सकता है। यदि एक बहुत बलवान व्‍यक्ति किसी दुर्बल व्‍यक्ति के साथ सदैव रहे, तो वह दुर्बल व्‍यक्ति कुछ अंशों में अवश्‍य सबल हो जाएगा। यह बल-संचारण-क्रिया ज्ञातभाव से हो सकती है तथा अज्ञातभाव से भी। जब यह क्रिया ज्ञातभाव से की जाती है, तब इसका कार्य और भी शीघ्र तथा उत्तम रूप से होता है। एक और दूसरे प्रकार की भी आरोग्‍य प्रणाली है, जिसमें आरोग्‍यकारी स्‍वयं बहुत स्‍वस्‍थकाय न होने पर भी दूसरे के शरीर में स्वास्‍थ्‍य का संचार कर दे सकता है। इन स्‍थलों में उस आरोग्‍यकारी व्‍यक्ति को कुछ परिणाम में प्राणजयी समझना चाहिए। वह कुछ समय के लिए अपने प्राण में मानों एक विशेष कंपन उत्‍पन्‍न करके दूसरे के शरीर में उसका संचार कर देता है।

अनेक स्‍थलों में यह कार्य बहुत दूर से भी साधित हुआ है। यदि सचमुच में दूरत्‍व का अर्थ क्रमविच्‍छेद (break) हो, तो दूरत्‍व नामक कोई चीज नहीं। ऐसा दूरत्‍व कहाँ है, जहाँ परस्‍पर कुछ भी संबंध, कुछ भी योग नहीं? सूर्य में और तुममें क्‍या वास्‍तविक कोई क्रमविच्‍छेद है? नहीं, यह तो समस्‍त एक अविच्छिन्‍न अखण्‍ड वस्‍तु हैं; तुम उसके एक अंश हो और सूर्य उसका एक दूसरा अंश। नदी के एक भाग और दूसरे भाग में क्‍या क्रमविच्‍छेद हैं? तो फिर शक्ति भी एक जगह से दूसरी जगह क्‍यों न भ्रमण कर सकेगी? इसके विरोध में तो कोई युक्ति नहीं दी जा सकती। दूर से आरोग्‍य करने की घटनाएँ बिल्‍कुल सत्‍य हैं। इस प्राण को बहुत दूर तक संचालित किया जा सकता है। पर हाँ, इसमें धोखेबाजी बहुत है। यदि इसमें एक घटना सत्‍य हो, तो अन्‍य सैकड़ों असत्‍य और छलकपट के अतिरिक्‍त और कुछ नहीं। लोग इसे जितना सहज समझते हैं, यह उतना सहज नहीं। अधिकतर स्‍थलों में तो देखोंगे कि आरोग्‍य करने वाले चंगा करने के लिए मानव-देह की स्‍वाभाविक स्‍वस्‍थता की ही सहायता लेते हैं। एक एलोपैथ चिकित्‍सक आता है, हैजे के रोगियों की चिकित्‍सा करता है और उन्‍हें दवा देता है; एक होमियोपैथ चिकित्‍सक आता है, वह भी रोगियों को अपनी दवा देता है और शायद एलोपैथ की अपेक्षा अधिक रोगियों को चंगा कर देता है। ऐसा क्‍यो? इसलिए कि वह रोगी के शरीर में किसी तरह का विपर्यय न लाकर प्रकृति को अपनी चाल से काम करने देता है। और विश्‍वास के बल से आरोग्‍य करने वाला तो और भी अधिक रोगियों को चंगा कर देता है, क्‍योंकि वह अपनी इच्‍छा-शक्ति द्वारा कार्य करके विश्‍वास-बल से रोगी की प्रसुप्‍त प्राण-शक्ति की प्रबुद्ध कर देता है।

परंतु विश्‍वास-बल से रोगों को अच्‍छा करने वालों को सदा एक भ्रम हुआ करता है; वे सोचते हैं कि साक्षात्‍ विश्‍वास ही लोगों को रोगमुक्‍त करता है। वास्‍तव में यह नहीं कहा जा सकता कि केवल विश्‍वास इसका कारण है। ऐसे भी रोग हैं, जिसमें रोगी स्‍वयं नहीं समझ पाता कि उसको कोई रोग है। रोगी का अपनी निरोगता पर अतीव विश्‍वास ही रोग का एक प्रधान लक्षण है और इससे आसन्‍न मृत्‍यु की सूचना होती है। इन सब स्‍थलों में केवल विश्‍वास के रोग नहीं टलता। यदि विश्‍वास ही रोग की जड़ काटता हो, तो वे रोगी मौत के मुँह न गए होते। वास्‍तव में रोग तो इस प्राण की शक्ति से ही दूर होता है। प्राणजित पवित्रात्‍मा पुरूष अपने प्राण को एक निर्दिष्‍ट कंपन में ले जा सकते हैं और उसे दूसरे में संचारित करके, उसके भीतर भी उसी प्रकार का कंपन पैदा कर सकते हैं। तुम प्रतिदिन की घटना से यह प्रमाण ले सकते हों। मैं वक्‍तृता दे रहा हूँ। वक्‍तृता देते समय मैं क्‍या कर रहा हूँ? मैं अपने मन को मानो कंपन की एक विशिष्ट स्थिति में लाता हूँ। और मैं मन को इस स्थिति में लाने में जितना ही सफल होऊँगा, तुम मेरी बात सुनकर उतने ही प्रभावित होगे। तुम लोगों को मालूम है, वक्‍तृता देते देते मैं जिस दिन मस्‍त हो जाता हूँ, उस दिन मेरी वक्‍तृता तुमको बहुत अच्‍छी लगती है, पर जब कभी मेरा उत्‍साह घट जाता है, तो तुम्‍हें मेरी वक्‍तृता में उतना आनन्‍द नहीं मिलता।

जगत को हिला-डुला देने वाले तीव्र इच्‍छा-शक्ति संपन्न महापुरूष अपने प्राण को कंपन की एक उच्‍च स्थिति में ला सकते हैं और यह प्राण इतना महान तथा शक्तिशाली होता है कि वह दूसरे को पल भर में लपेट लेता है, हजारों मनुष्‍य उनकी ओर खिंच जाते हैं और संसार के आधे लोग उनके भाव से परिचालित हो जाते हैं। जगत के सभी महान पैगम्‍बरों का प्राण पर अत्यंत अद्भुत संयम था, जिसके बल से वे प्रबल इच्‍छा-शक्ति संपन्न हो गये थे। वे अपने प्राण के भीतर अति उच्‍च कंपन पैदा कर सकते थे, और उसी से उन्‍हें समस्‍त संसार पर प्रभाव विस्‍तार करने की क्षमता प्राप्‍त हुई थी। संसार में शक्ति के जितने विकास देखे जाते हैं, सभी प्राण के संयम से उत्‍पन्‍न होते हैं। मनुष्‍य को यह तथ्‍य भले ही मालूम न हो, पर और किसी तरह इसकी व्‍याख्‍या नहीं हो सकती। तुम्‍हारे शरीरमें यह प्राण-संचालन कभी एक ओर अधिक और दूसरी ओर कम हो जाता है। इससे संतुलन भंग होता है; और जब प्राण का यह संतुलन नष्‍ट होता है, तब रोग की उत्‍पत्ति होती है। अतिरिक्‍त प्राण को हटाकर, जहाँ प्राण का अभाव हैं, वहाँ का अभाव भर सकने से ही रोग अच्‍छा हो जाता है। प्राण कहाँ अधिक है और कहाँ अल्‍प, इसका ज्ञान करना भी प्राणायाम का अंग है। अनुभव-शक्ति इतनी सूक्ष्‍म हो जाएगी कि मन समझ जाएगा, पैर के अँगूठे में या हाथ की अँगुली में जितना प्राण आवश्‍यक है, उतना वहाँ नहीं है, और मन उस प्राण के अभाव को पूरा करने में भी समर्थ हो जाएगा। इस प्रकार प्राणायाम के अनेक अंग हैं। इनको धीरे-धीरे, एक के बाद एक सीखना होगा। अतएव यह स्‍पष्‍ट है कि विभिन्‍न रूपों में प्रकाशित प्राण का संयम सिखाना और उसको विभिन्‍न प्रकार से चलाना ही राजयोग का संपूर्ण क्षेत्र है। जब कोर्इ् अपनी समुदय शक्तियों का संयम करता है, तब वह अपनी देह के भीतर के प्राण का ही संयम करता है। जब कोई ध्‍यान करता है, तो भी समझना चाहिए कि वह प्राण का ही संयम कर रहा है।

महासागर की ओर यदि देखो, तो प्रतीत होगा कि वहाँ पर्वतकाय बड़ी-बड़ी तरंगे है, फिर छोटी-छोटी तरंगे भी हैं, और छोटे-छोटे बुलबुले भी। पर इन सबके पीछे वही अनंत महासमुद्र है। एक ओर वह छोटा बुलबुला अनंत समुद्र से युक्‍त है, फिर दूसरी ओर वह बड़ी तरंग भी उसी महासमुद्र से युक्‍त हैं। इसी प्रकार, संसार में कोई महापुरूष हो सकता है, और कोई छोटा बुलबुला जैसा सामान्‍य व्‍यक्ति, परंतु सभी उसी अनंत महाशक्ति के समुद्र से युक्‍त हैं, जो सभी जीवों का जन्‍मसिद्ध अधिकार है। जहाँ भी जीवनी-शक्ति का प्रकाश देखो, वहाँ समझना कि उसके पीछे अनंत शक्ति का भण्‍डार है। एक छोटा-सा फफूंदी (कुकुरमुत्ता) है; वह संभव है, इतना छोटा, इतना सूक्ष्‍म हो कि उसे अनुवीक्षण यंत्र द्वारा देखना पड़े; उससे आरम्‍भ करो। देखोगे कि वह अनंत शक्ति के भंडार से क्रमश: शक्ति संग्रह करके एक अन्‍य रूप धारण कर रहा है। कालांतर में वह उदभिद के रूप में परिणत होता है, वहीं फिर एक पशु का आकार ग्रहण करता है, फिर मनुष्‍य का रूप लेकर वही अंत में ईश्‍वर-रूप में परिणत हो जाता है। हाँ, इतना अवश्‍य है कि प्राकृतिक नियम से इस व्यापार के घटते-घटते लाखों साल पार हो जाते हैं। परंतु यह समय है क्‍या? बेंग-साधना का वेग बढ़ा देकर समय काफी घटाया जा सकता है। योगियों का कहना है कि साधारण प्रयत्‍न से जिन काम को अधिक लगता है, वहीं वेग बढ़ा देने पर, बहुत थोड़े समय में सध सकता है। हो सकता है, कोई मनुष्‍य इस संसार की अनंत शक्तिराशि में से बहुत थोड़ी-थोड़ी शक्ति लेकर चले। इस प्रकार चलने पर उसे देव-जन्‍म प्राप्‍त करते संभव है, एक लाख वर्ष लग जाए, फिर और भी ऊँची अवस्‍था प्राप्‍त करते शायद पाँच लाख वर्ष लगें। फिर पूर्ण सिद्ध होते और भी पाँच लाख वर्ष लगें। पर उन्‍नति का वेग बढ़ा देने पर यह समय पर हो जाता है। पर्याप्‍त प्रयन्‍त करने पर छ: वर्ष या छ: महीने में ही यह सिद्धि-लाभ क्‍यों न हो सकेगा? युक्ति तो बताती है कि इसमें कोई निर्दिष्‍ट सीमाबद्ध समय नहीं है। सोचो, कोई वाष्‍पीय यंत्र, निर्दिष्‍ट परिणाम में कोयला देने पर, प्रति घंटा दो मील चल सकता है, तो अधिक कोयला देने पर वह और भी शीघ्र चलेगा। इसी प्रकार यदि हम भी तीव्र वेगसंपन्न हों, तो इसी जन्‍म में मुक्ति पाएंगे। पर इस प्रकार युग-युग तक हम प्रतीक्षा क्‍यों करें? इसी क्षण, इस शरीर में ही, इस मनुष्‍य-देह में ही हम मुक्ति-लाभ में समर्थ क्‍यों न होंगे? हम इसी समय वह अनंत ज्ञान, वह अनंत शक्ति क्‍यों न प्राप्‍त कर सकेंगे?

आत्‍मा की उन्‍नति को वेग बढ़ाकर किस प्रकार थोड़े समय में मुक्ति पाई जा सकती है, यही सारे योगशास्‍त्र का लक्ष्‍य और उद्देश्‍य है। जब तक सारे मनुष्‍य मुक्‍त नहीं हो जाते, तब तक प्रतीक्षा करते हुए थोड़ा-थोड़ा करके अग्रसर न होकर, प्रकृति के अनंत शक्ति-भंडार मे से शक्ति ग्रहण करने की शक्ति बढ़ाकर किस प्रकार शीघ्र मुक्ति-लाभ किया जा सकता है; योगियों ने इसका उपाय खोज निकाला है। संसार के सभी पैगम्‍बर, साधु और सिद्ध पुरूषों ने क्‍या किया है। उन्‍होंने एक ही जन्‍म में मानव-जाति का संपूर्ण जीवन बिताया और उन सब अवस्‍थाओं को पार कर लिया है, जिनमें से होते हुए साधारण मानव करोडों जन्‍मों में मुक्‍त होता है। एक जन्‍म में ही वे अपनी मुक्ति का मार्ग तय कर लेते हैं। वे दूसरी कोई चिंता नहीं करते, दूसरी बात के लिए एक क्षण भी समय नहीं देते। उनका पल भर भी व्‍यर्थ नहीं जाता। इस प्रकार उनकी मुक्ति-प्राप्ति का समय घट जाता है। एकाग्रता का अर्थ ही है, शक्ति-संचय की क्षमता को बढ़ाकर समय को घटा लेना। राजयोग इसी एकाग्रता की शक्ति को प्राप्‍त करने का विज्ञान है।

इस प्राणायाम के साथ प्रेतात्‍मवाद (Spiritualism) का क्‍या संबंध है? प्रेतात्‍मवाद भी प्राणायाम की ही एक अभिव्‍यक्ति है। यदि यह सत्‍य हो कि प्रेतात्‍मा का अस्तित्व है और उसे हम देख भर नहीं पाते, तो यह भी बहुत संभव है कि यदीं पर शायद लाखों आत्‍माएँ हैं, जिन्‍हें हम न देख पाते हैं, न अनुभव कर पाते हैं, न छू पाते हैं। संभव है, हम सदा उनके शरीर के भीतर से आ-जा रहे हों। और यह भी बहुत संभव है कि वे भी हमें देखने या किसी प्रकार से अनुभव करने में असमर्थ हों। यह मानों एक वृत्त के भीतर एक और वृत्त है, एक जगत के भीतर एक और जगत। हम पंचेन्द्रिय विशिष्‍ट प्राणी हैं। हमारे प्राण का कंपन एक विशेष प्रकार का है। जिनके प्राण का कंपन हमारी तरह का है, उन्‍हीं को हम देख सकेंगे। परंतु यदि कोई ऐसा प्राणी हो, जिसका प्राण अपेक्षाकृत उच्‍च कंपनशील है, तो उसे हम न देख पाएंगे। प्रकाश के कंपन की तीव्रता अत्यंत अधिक बढ़ जाने पर हम उसे नहीं देख पाते, किंतु बहुत से प्राणियों की आँखें ऐसी शक्तियुक्‍त हैं कि वे उस तरह का प्रकाश देख सकती हैं। इसके विपरीत, यदि आलोक के परमाणुओं का कंपन अत्यंत मृदु या हल्‍का हो, तो भी उसे हम नहीं देख पाते, परंतु उल्‍लू और बिल्‍ली आदि प्राणी उसे देख लेते हैं। हमारी दृष्टि इस प्राण-कंपन के एक विशेष प्रकार को ही देखने में समर्थ हैं। इसी प्रकार वायुराशि की बात लो। वायु मानो स्तर पर रची हुई है। पृथ्‍वी का निकटवर्ती स्‍तर अपने से ऊँचे वाले स्‍तर से अधिक घना है, और इस तरह हम जितने ऊँचे उठते जाएंगे, हमें इस तरह हम जितने ऊँचे उठते जाएंगे, हमें यही दिखेगा कि वायु क्रमश: सूक्ष्‍म होती जा रही है। इसी प्रकार समुद्र की बात लो; समुद्र के जितने ही गहरे प्रदेश में जाओगे, पानी का दबाव उतना ही बढ़ेगा। जो प्राणी समुद्र के नीचे रहते हैं, वे कभी ऊपर नहीं आ सकते, क्‍योंकि यदि वे आएँ, तो उसी समय उनका शरीर टुकड़े हो जाए।

संपूर्ण जगत को ईथर (आकाश-तत्त्व) के एक समुद्र के रूप में सोचों। प्राण की शक्ति से वह मानो स्पंदनशील हो रहा है और विभिन्‍न मात्रा में स्पंदनशील स्‍तरों में बँटा हुआ है। तो देखोगे, जिस केंद्र से स्पंदन शुरू हुआ है, उससे तुम जितनी दूर जाओगे, उतना ही वह स्पंदन मृदु रूप से अनुभूत होगा; केंद्र के पास स्पंदन बहुत द्रुत होता है। और भी सोचो, भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार के स्पंदनों के अलग-अलग स्‍तर हैं। यह संपूर्ण स्पंदन-क्षेत्र मानो विभिन्‍न स्पंदन-स्तरों में विभक्‍त है- कई लाख मील तक एक प्रकार का स्पंदन; फिर कई लाख मील तक एक उच्‍चतर किंतु दूसरे प्रकार का स्पंदन आदि। अत: यह संभव है कि जो प्राण की एक विशेष अवस्‍था के स्‍तर पर वास करते हैं, वे एक दूसरे को पहचान सकेंगे, परंतु अपने से नीचे या ऊँचे स्‍तर वाले जीवों को न पहचान सकेंगे। फिर भी, जैसे हम अनुवीक्षण यंत्र और दूरबीन की सहायता से अपनी दृष्टि का क्षेत्र बड़ा सकते हैं, उसी प्रकार योग के द्वारा मन को विभिन्‍न प्रकार के स्पंदनों से युक्‍त करके हम दूसरे स्‍तर का समाचार अर्थात वहाँ क्‍या हो रहा है, यह जान सकते हैं। समझो, इसी कमरे में ऐसे बहुत से प्राणी हैं, जिन्‍हें हम देख पाते। वे सब प्राण के एक प्रकार के स्पंदन के फल हैं, और हम एक दूसरे प्रकार के। मान लो कि वे प्राण के अधिक स्पंदन से युक्‍त हैं और हम उनकी तुलना में कम स्पंदन से। हम भी प्राणरूप मूल वस्‍तु से गढ़े हुए हैं, और वे भी वही हैं। सभी एक ही समुद्र के भिन्‍न-भिन्‍न अंश मात्र हैं। विभिन्‍नता है केवल स्पंदन की मात्रा में यदि मन को मैं अधिक स्पंदन विशिष्‍ट कर सका, तो मैं फिर इस स्‍तर पर न रहूँगा, मैं फिर तुम लोगों को न देख पाऊँगा। तुम मेरी दृष्टि से अंतर्हित हो जाओंगे और वे मेरी आँखों के सामने आ जाएंगे। तुममें से शायद बहुतों को मालूम है कि वह व्‍यापार सत्‍य है। मन को इस प्रकार स्पंदन की उच्‍चतर भूमि में लाना ही योगाशास्‍त्र में एकमात्र 'समाधि' शब्‍द द्वारा अभिहित किया गया है। उच्‍चतर स्पंदन की ये सब भूमियाँ, मन के सब अतिचेतन स्पंदन इस एक शब्‍द-समाधि में वर्गीकृत हैं। समाधि की निम्‍नतर भूमियों में इन अदृश्‍य प्राणियों किया जाता है। और समाधि की सर्वोच्‍च अवस्‍था तो वह है, जब हमें सत्‍यस्‍वरूप ब्रह्म के दर्शन होते हैं। तब हम उस उपादान को जान लेते हैं, जिससे इन सब बहुविध जीवों की उत्पत्ति हुई है, जैसे एक मृतपिण्‍ड को जान लेने पर समस्‍त मृतपिण्‍ड ज्ञात हो जाता है।

अत: हम देखते हैं कि प्रेतात्‍मवाद में जो कुछ सत्‍य है, वह भी प्राणायाम में समाविष्‍ट है। इसी प्रकार, जब कभी तुम देखो कि कोई दल या संप्रदाय किसी रहस्‍यात्‍मक या गुप्‍त तत्त्व के आविष्‍कार की चेष्‍टाकर रहा है, तो समझना, वह यथार्थत: किसी परिणाम में इस राजयोग की ही साधना कर रहा है, प्राण-संयम की ही चेष्‍टा कर रहा है। जहाँ कहीं किसी प्रकार की असाधारण शक्ति का विकास हुआ है। जहाँ कहीं किसी प्रकार की असाधारण शक्ति का वि‍कास हुआ है, वहाँ प्राण की ही शक्ति का विकास समझना चाहिए। यहाँ तक कि भौतिक विज्ञान भी प्राणायाम के अंतर्गत किए जा सकते हैं। वाष्‍पीय यंत्र को कौन संचालित करता है? प्राण ही वाष्‍प के भीतर से उसको चलाता है। ये जो विद्युत की अद्भूत क्रियाएँ दीख पड़ती हैं, ये सच प्राण को छोड़ भला और क्‍या हो सकती है? भौतिक विज्ञान है क्‍या? वह बाहरी उपायों द्वारा प्राणायाम का विज्ञान है। प्राण जब मानसिक शक्ति के रूप में प्रकाशित होता है, तब मानसिक उपायों द्वारा ही उसका संयम किया जा सकता है। जिस प्राणायाम में प्राण की स्‍थूल अभिव्‍यक्ति को बाह्य उपायों द्वारा जीतने की चेष्‍टा की जाती है, उसे भौतिक विज्ञान कहते हैं; और जिस प्राणायाम में प्राण की मानसिक अभिव्‍यक्तियों को मानसिक उपायों द्वारा संयत करने की चेष्‍टा की जाती है, उसी को राजयोग कहतें हैं।


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