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कविता

"अभिलाषा"
डॉ विदुषी शर्मा


आओ धरती को सजाएँ, हम एक उपवन की तरह,
इसके हर अंश को महकाएँ हम मधुबन की तरह,
आओ धरती को सजाएँ...........

1
एक धरती है जो बिन मांगे, अपना सब देती,
हमने छलनी किया सीना, चुप कर सब सहती,
रात-दिन सजदा करो, चरणों में भगवन की तरह,
आओ धरती को सजाएँ...

2
अपनी एक सांस भी ले पाएँ, हम में इतना दम नहीं,
बिन तेरे भूख मिटा पाए ऐसा इक भी जन नहीं,
सदा इक साथ रहो, सीने में धडकन की तरह,
आओ धरती को सजाएँ......

3
यदि धरती रहेगी, तो अपना कल भी होगा,
वरना हम सबकी जिंदगी का, यही अंतिम पल होगा,
पूजे हम रज इसकी, माथे पर चंदन की तरह,
आओ धरती को सजाएँ, हम एक उपवन की तरह
इसके हर अंश को महकाएँ, हम मधुबन की तरह
आओ धरती को सजाएँ हम एक उपवन की तरह...


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