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लेख

रामचरितमानस की दलित चेतना
सर्वेश सिंह


रामचरितमानस का उत्तरकांड, तुलसी द्वारा मान्य भक्ति और दर्शन का निचोड़ है। यहाँ काकभुशुंडि, गरुण को राम भक्ति का ज्ञान देते हैं। यह भक्ति अपने आप में अनोखी है। मानस के नाम पर मठों में प्रचलित जो भक्ति आज दिखती है, ठीक वही मानस द्वारा अधिकृत नहीं है। काकभुशुंडि द्वारा गरुण को दी गई यह भक्ति अमूर्त, अगोचर नहीं अपितु व्यावहारिक रूप से मन के निग्रह, उसकी पवित्रता और सामाजिक सक्रियता से जुड़ी है। यहाँ सांप्रदायिक भक्ति का भुशुंडि निषेध करते हैं, तथा उसे सामाजिक सामंजस्य का हथियार मानते हैं। किंतु मानस में ये काकभुशुंडि आखिर हैं कौन?

यह कितना आश्चर्यजनक और महत्वपूर्ण है कि जिस रामचरितमानस को दलित विरोधी ग्रंथ कहा जाता है, उसमें रामभक्ति के सर्वोच्च अधिकारी काकभुशुंडि हैं, जो शूद्र-ब्राह्मण के, कर्म-फल-परिणाम और जात्यांतर के चक्र, में लय हैं-

'तेहि कलजुग कोशलपुर जाई। जन्मत भएउ शूद्र तन पाई।।'

प्रश्न उठता है कि मानस में ये अभिव्यक्तियाँ अब तक क्यों छुपाई गईं थी? दलित चेतना को छुपाने के पीछे क्या साजिश थी? कौन लोग थे? क्या मंशाएं थीं उनकी? दरअसल, इसे समझने के लिए मानस की व्याख्याओं का इतिहास देखना पड़ेगा।

ब्रिटिश काल में, तथाकथित आधुनिक शिक्षा के अनुरूप, ग्रियर्सन आदि विद्वानों ने तुलसी-साहित्य का एक आंशिक पाठ्यक्रम तैयार किया और साम्राज्यवाद के हितों के अनुरूप हिंदुस्तान में इसका पठन-पाठन चलाया। इस पाठ्यक्रम में तुलसी का साहित्य, विशेषकर मानस, मूलतः भक्ति और आध्यात्म के अर्थ में प्रतिष्ठित किया गया तथा उसकी गहन सामाजिक-सांस्कृतिक व्यंजना को छिपा लिया गया। बल्कि यह भी कि 'फूट डालो और राज करो' की कूटनीति के हिसाब से उसकी व्याख्याओं में तथाकथित ब्राह्मणवाद, पोंगापंथवाद, का चेहरा भी रोप दिया गया।

गोस्वामी तुलसीदास की रचनाओं एवं व्यक्तित्व पर विस्तृत एवं गहन मूल्यांकन का आरम्भ जॉर्ज ग्रियर्सन के लेखन से होता है। इस अध्ययन एवं मूल्यांकन में ग्रियर्सन ने वैज्ञानिक रीति से तुलसी पर चर्चा की है। सन् 1885 ई में वेन की अंतरराष्ट्रीय ओरिएंटल कांग्रेस के सामने ग्रियर्सन ने 'हिन्दुस्तान का मध्यकालीन साहित्य: विशेष रूप से तुलसीदास' विषयक लेख प्रस्तुत किया। इसमें लेखक ने गोस्वामी जी के जीवन-वृत्त, रचनाओं एवं विचारधरा पर चर्चा की है। इन्हीं सूचनाओं को कालांतर में ग्रियर्सन ने सन् 1889 ई. में प्रकाशित अपने ग्रंथ 'माडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान' में तुलसी पर लिखने में उपयोग किया। सन् 1883 ई. 'इंडियन: ए एंटिक्वेरी' में ग्रियर्सन का 'नोट्स आन तुलसीदास' प्रकाशित हुआ। यह तीन भागों में है। पहला अंश कवि की प्रमुख तिथियों की गणना से संबंध रखता है। दूसरा, कृतियों पर आधरित है। इसमें कृतियों की प्रामाणिकता पर चर्चा के उपरांत उन रचनाओं की सूची दी गई है, जिन्हें लेखक गोस्वामी जी की रचनाए मानता है। 6 छोटे ग्रंथों व 6 बड़े ग्रंथों ;आकार की दृष्टि से, को कवि का स्वीकार करके शेष उन सभी ग्रंथों को छोड़ दिया गया है, जिन्हें गोस्वामी से जोड़कर देखा गया था। लेखक द्वारा स्वीकृत कवि की रचनाए इस प्रकार है- गीतावली, कवितावली या कवित्त रामायण, दोहावली या दोहा रामायण, चौपाई रामायण, सतसई, पंचरत्न, श्री रामाज्ञा संकट मोचन, विनय पत्रिका, हनुमानबाहुक और कृष्णावली। तीसरे अंश में कवि के जीवन-वृत्त से संबंध रखने वाली परंपराओं का अध्ययन एवं जनश्रुतियों का संकलन किया गया है।

सन् 1897 ई. में एशियाटिक सोसायटी आफ़ बंगाल की कार्यवाही मे ग्रियर्सन का एक अन्य नोट 'तुलसीदास के कवित्त रामायण की रचना तिथि' छपा। इसमें कवितावली के छंदों के आधर पर इसमें वर्णित महामारी को प्लेग माना गया है। इसी विषय पर ग्रियर्सन का एक अन्य लेख 'तुलसीदास और बनारस में प्लेग के विषय में दूसरा नोट' शीर्षक से उसी पत्रिका में आया। सन् 1903 ई में एक छोटा लेख ''तुलसीदास-कवि और समाज सुधारक' शीर्षक से रायल एशियाटिक सोसायटी के जनरल में प्रकाशित हुआ। इसमें कवि के देहांत संबंधी प्लेग वाली धरणा को ग्रियर्सन ने छोड़ दिया और तुलसी को एक समाज-सुधारक की भी छवि प्रदान की। सन् 1907 ई. में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के जनरल में ग्रियर्सन का लेख 'आधुनिक हिन्दू धर्म और नेस्टोरियनों के प्रति' शीर्षक से छपा। इसी लेख में ग्रियर्सन ने भक्ति मार्ग की उत्पत्ति का श्रेय प्रकारांतर से इन्हीं नेस्टोरियन नामधरी ईसाई मिशनरियों को दिया। ध्यातव्य है, कि ग्रियर्सन के इस विचार का तर्कपूर्ण ढंग से जोरदार खण्डन आगे चलकर भारतीय व पाश्चात्य दोनों विद्वानों ने किया। कुछ ने तो तत्काल उसी वर्ष, उसी पत्रिका में ही किया। सन् 1913 ई. में 'क्या तुलसीदास कृत रामायण अनुवाद ग्रंथ है?'' शीर्षक लेख इसी रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के जनरल में प्रकाशित हुआ। इसमें ग्रियर्सन ने बलिया से प्रकाशित होने वाले एक संस्कृत रामायण को 'रामचरितमानस' का मूल और मानस को उसका अनुवाद कहे जाने का निराकरण किया है। तुलसीदास संबंधी ग्रियर्सन का कदाचित अंतिम उल्लेखनीय लेख 'तुलसीदास' शीर्षक से सन् 1921 ई. में 'एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रेलिजन एण्ड एथिक्स' में निकला। यह लेख ग्रियर्सन के तुलसी संबंधी समग्र विचारों का सारांश प्रस्तुत करता है।

तुलसी की उदारता ने ग्रियर्सन का मन मोह लिया। ग्रियर्सन ने वर्नाक्युलर लिटरेचर में तुलसी पर लिखा है -'as a father and mother delight to hear the lisping practice of their little one.' तुलसी ने चिर सौरभ की माला गूँथी और जिस देवता की भक्ति वे करते थे, उसके चरणों पर उसे दीनतापूर्वक चढ़ा दी।

ग्रियर्सन के पश्चात भारतीय संस्कृति पर विचार के क्रम में तुलसीदास को आधुनिक दृष्टि से देखने का संकेत विल्सन के यहाँ भी मिलता है। 'द-स्केच ऑफ दि रेलिजस सेक्टर ऑफ दि हिंदूज' नामक विल्सन का एक निबंध सन् 1831 ई. में 'एशियाटिक रिसर्च' में पहली बार छपा। जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है, इस निबंध में हिंदू धर्म पर चर्चा के क्रम में तुलसी का जिक्र आया है। अतः विल्सन के यहाँ तुलसी की रचनाओं पर कोई विशेष चर्चा नहीं हुई है, केवल कुछ रचनाओं का नामोल्लेख है। विल्सन द्वारा प्रस्तुत तुलसी का जीवन-वृत्त नाभादास के विवरणों एवं जनश्रुतियों पर आधरित है। विल्सन के इस प्रयत्न में सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि एक विदेशी विद्वान ने इस क्षेत्र में रुचि दिखाई है। इसमें आलोचनात्मक विश्लेषण की तलाश करने की तुलना में इसे एक प्रस्थान बिंदु के रूप में देखना चाहिए। जहाँ से तुलसी साहित्य पर विश्लेषणात्मक अध्ययन का क्रम शुरू होता है। इसका प्रमाण यह है कि, विल्सन के बाद के कई विद्वानों ने तुलसी पर लिखते हुए विल्सन द्वारा प्रस्तुत विवरणों का प्रयोग किया है।

तुलसी को धर्म और अध्यात्म के खाते में डालने की यह प्रवृत्ति दरअसल हिंदी के मध्यकालीन तेजस्वी भक्ति-काव्य के केंद्र पर अंग्रेजों सबसे सशक्त हमला था जिसका असर भविष्य पर भी पड़ना था, और वह बड़ी निर्ममता से पड़ा भी। जैसे हिंदू-मुस्लिम एकता को, वैसे ही तुलसी की समन्वयात्मक चेतना को भी, अंग्रेजों ने दो फाँक कर दिया। तो, यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें मानस की प्रगतिशील व्याख्याओं को छुपाया गया। दलित चेतना को पर्दे में डाला गया ताकि देश को विभाजित रखे रहा जाए और शासन किया जा सके। जबकि काकभुशुण्डि प्रकरण का गंभीर अध्ययन करने के बाद मानस का एक अलग ही चेहरा सामने आता है।

काकभुशुण्डि, तुलसी के साथ-साथ शिव व स्वयं राम द्वारा भी समर्थित, राम भक्ति के प्रखर प्रवक्ता हैं- 'मति अकुंठ हरि भगति अखंडा' राम भक्ति का सामाजिक-सार, तुलसी व शिव के मत में, केवल काकभुशुंडि ही जानते हैं। इसीलिए विष्णु के वाहक गरुण, मोहवश, सशंकित, जब शिव के पास जाते हैं, तो शिव रामभक्ति के मर्म को समझने हेतु उन्हें काकभुशुंडि के पास ही भेजते हैं। काकभुशुंडि और गरुण का यह संवाद ही मानस का असली दर्शन है जो अद्वितीय है। नारद और शांडिल्य से अधिक बेहतर और लौकिक, भक्ति की अवधारणा काकभुशुंडि उत्तरकांड में रखते हैं। शिव तो कथा सुनाकर पार्वती का मोह भर हरते हैं पर मानस की धरती पर राम कथा और भक्ति के असली मर्मज्ञ भुशुंडि ही हैं।

काकभुभुशुंडि की जीवन दास्तान अभिशप्त है। किसी जनम में वे शूद्र कुल में अवध में जन्मे। शिव की परम भक्ति की। उसके अलावा हर देवता की निंदा की -

'शिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी।'

यानी अवध में रहते हुए राम से विरोध! गुरु समझाते रहे किंतु यह अभिमान इतना बढ़ा कि- 'हरिजन द्विज देखे जरउँ करउँ विष्णु कर द्रोह।' पर, गुरु अपमान व विष्णु द्रोह का फल उन्हें चखना पड़ा। स्वयं शिव उन्हें भयंकर शाप देते हैं- 'अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा' हालाँकि काकभुशुंडि द्वारा विनती करने पर वे द्रवित भी होते हैं तथा अखंड राम भक्ति का वरदान भी देते हैं- 'अप्रतिहत गति होइहि तोरी'। भक्ति की अखंड पिपासा में फिर शूद्र और ब्राह्मण के रूप में अभिशप्त, अनेक जन्मों में भटकने के बाद दुबारा अवध में जन्म लेने पर काकभुशुंडि को प्रबोध होता है तथा राम भक्ति दृढ़ होती है- 'रघुपति जस गावत फिरहुँ छन छन नव अनुराग।' इस प्रकार एक शूद्र अपनी दृढ़ता से राम भक्ति का सर्वोच्च अधिकारी बनता है। पूरे उत्तरकांड में ज्ञान-भक्ति के आधिकारिक निर्णायक यही शूद्र-ऋषि काकभुशुंडि हैं। यही भुशुंडि राम को 'गरीब निवाजे' घोषित करते हैं।

पूरे मानस में भुशुंडी की ज्ञान-भक्ति तितिक्षा सबसे लोमहर्षक है। एक संशयाकुल मन से वह राम के रहस्य के पीछे भागते हैं। भक्त-भगवान् की यह कश्मकश उत्तरकाण्ड में अद्वितीय एवं पूरा पढने योग्य है-

जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू। मो पर करहु कृपा अरु नेहू॥
मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी॥

हे प्रभो! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देते हैं और मुझ पर कृपा और स्नेह करते हैं, तो हे स्वामी! मैं अपना मन-भाया वर माँगता हूँ। आप उदार हैं और हृदय के भीतर की जाननेवाले हैं।

दो० - अबिरल भगति बिसुद्ध तव श्रुति पुरान जो गाव।
जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव॥ 84(क)॥

आपकी जिस अविरल (प्रगाढ़) एवं विशुद्ध (अनन्य निष्काम) भक्ति को श्रुति और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर मुनि खोजते हैं और प्रभु की कृपा से कोई विरला ही जिसे पाता है॥ 84(क)॥

भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुखधाम।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम॥ 84(ख)॥

हे भक्तों के (मन-इच्छित फल देने वाले) कल्पवृक्ष! हे शरणागत के हितकारी! हे कृपासागर! हे सुखधान राम! दया करके मुझे अपनी वही भक्ति दीजिए॥ 84(ख)॥

एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक॥
सुनु बायस तैं सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना॥

'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहकर रघुवंश के स्वामी परम सुख देनेवाले वचन बोले- हे काक! सुन, तू स्वभाव से ही बुद्धिमान है। ऐसा वरदान कैसे न माँगता?

सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी॥
जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं॥

तूने सब सुखों की खान भक्ति माँग ली, जगत में तेरे समान बड़भागी कोई नहीं है। वे मुनि जो जप और योग की अग्नि से शरीर जलाते रहते हैं, करोड़ों यत्न करके भी जिसको (जिस भक्ति को) नहीं पाते।

रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई॥
सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें॥

वही भक्ति तूने माँगी। तेरी चतुराई देखकर मैं रीझ गया। यह चतुराई मुझे बहुत ही अच्छी लगी। हे पक्षी! सुन, मेरी कृपा से अब समस्त शुभ गुण तेरे हृदय में बसेंगे।

भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा॥
जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा॥

भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, मेरी लीलाएँ और उनके रहस्य तथा विभाग - इन सबके भेद को तू मेरी कृपा से ही जान जाएगा। तुझे साधन का कष्ट नहीं होगा।

ध्यान दें, मानस में यह अनोखा भक्त है जिसे ऐसा वरदान मिल रहा है की उसे साधन का कष्ट नहीं होगा। यह दरअसल तुलसी की निर्मल दृष्टि है जो भुशुण्डी प्रकरण के माध्यम से भक्ति की सर्वथा एक नयी तस्वीर हमारे सामने रखती है।

ऐसे में आश्चर्य होता है कि लोग- 'ढोल गँवार शूद्र पशु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।' जैसी एक लाइन तो प्रगतिशील जन चट से देख लेते हैं किंतु पूरे उत्तरकांड में काकभुशुंडि को नहीं देख पाते जिसे तुलसी राम भक्ति का सिरमौर बनाते हैं। इन्हीं एक-दो लाइनों के आधार पर आज तक मानस को दलित विरोधी ग्रंथ सिद्ध किया जाता रहा है, जबकि भक्ति की धुरी मानस में काकभुशुंडि के हाथों दे दी गई है। अतः विनय है कि मानस को समग्रता में देखें और 'काकभुशुंडि-प्रसंगों' को पाठ्यक्रमों में शामिल करें तथा उसके आधार पर मानस की दलित चिंता पर फिर से विचार विनिमय करें।


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