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उपन्यास

प्राण का आध्‍यात्मिक रूप
स्वामी विवेकानंद


योगियों के मतानुसार मेरूदण्‍ड के भीतर इड़ा और पिंगला नाम के दो स्‍नायविक शक्ति-प्रवाह, और मेरूदण्‍डस्‍थ मज्‍जा के बीच सुषुम्‍णा नाम की एक शून्‍य नली है। इस शून्‍य नली के सबसे नीचे कुण्‍डलिनी का आधारभूत पद्य अवस्थित है। योगियों का कहना है कि वह त्रिकोणाकार है। योगियों की रूपक भाषा में कुण्‍डलिनी-शक्ति उस स्‍थान पर कुण्‍डलाकार हो विराज रही है। जब यह कुण्‍डलिनी-शक्ति जगती है, तब वह इस शून्‍य नली के भीतर से मार्ग बनाकर ऊपर उठने का प्रयत्‍न करती है, और ज्‍यों ज्‍यों वह एक-एक सोपान ऊपर उठती जाती है, त्‍यों-त्‍यों मन के स्‍तर पर स्‍तर मानो खुलते जाते हैं और योगी को अनेक प्रकार के अलौकिक दर्शन होने लगते हैं तथा अद्भुत शक्तियाँ प्राप्‍त होने लगती हैं। जब वह कुण्‍डलिनी मस्‍तक पर चढ़ जाती है, तब योगी संपूर्ण रूप से शरीर और मन से पृथक्‍ हो जाते हैं और उनकी आत्‍मा अपने मुक्‍त स्‍वभाव की उपलब्धि करती है। हमें मालूम है कि मेरूमज्‍जा एक विशेष प्रकार से गठित है। अंग्रेज़ी के आठ अंक (8) को यदि इस तरह (00) लम्‍बा कर लिया जाए, तो देखेंगे कि उसके दो अंश हैं और वे दोनेां अंश बीच से जुड़े हुए हैं। इस तरह के अनेक अंकों को एक पर एक रखने पर जैसा दीख पड़ता है, मेरूमज्‍जा बहुत कुछ वैसी ही है। उसके बायीं ओर इड़ा है और दाहिनी और पिंगला; और जो शून्‍य नली मेरूमज्‍जा के ठीक बीच में से गई है, वही सुषुम्‍णा है। कटिप्रदेशस्‍थ मेरूदण्‍ड की कुछ अस्थियों के बाद ही मेरूमज्‍जा समाप्‍त हो गई है, परंतु वहाँ से भी तागे के समान एक बहुत ही सूक्ष्‍म पदार्थ बराबर नीचे उतरता गया है। सुषुम्‍णा नली वहाँ भी अवस्थित है, परंतु वहाँ बहुत सूक्ष्‍म हो गयी है। नीचे की ओर उस नली का मुँह बन्‍द रहता है। उसके निकट ही कटिप्रदेशस्‍थ नाड़ी-जाल (sacral plexus) अवस्थित है, जो आजकल के शरीरशास्‍त्र (physiology) के मत से त्रिकोणाकार है। इन विभिन्‍न नाड़ी-जालों के केंद्र मेरूमज्‍जा के भीतर अवस्थित हैं; वे नाड़ी-जाल योगियों के भिन्‍न भिन्‍न पद्यों या चक्रों के तौर पर लिए जा सकते हैं।

योगियों का कहना है कि सबसे नीचे मूलाधार से लेकर मस्तिष्‍क में स्थित सहस्‍त्रार सा सहस्‍त्रदल पद्य तक कुछ चक्र हैं। यदि हम उन पद्यों को पूर्वोक्‍त नाड़ी-जाल (plexus) के प्रतिरूप समझें, तो आजकल के शरीरशास्‍त्र के द्वारा बहुत सहज ही योगियों की बात का मर्म समझ में आ जायगा। हमें मालूम है कि हमारे स्‍नायुओं के भीतर दो प्रकार के प्रवाह हैं; उनमें से एक को अन्‍तर्मुखी और दूसरे को बहिर्मुखी, एक को ज्ञानात्‍मक और दूसरे को कर्मात्‍मक, एक को केंद्रागामी और दूसरे को केंद्रापसारी कहा जा सकता है। उनमें से एक मस्तिष्‍क की ओर संवाद ले जाता है, और दूसरा मस्तिष्‍क से बाहर, समुदय अंगों में। परंतु अंत में ये प्रवाह मस्तिष्‍क से संयुक्‍त हो जाते हैं। आगे आने वाले विषय को स्‍पष्‍ट रूप से समझने के लिए हमें कुछ और बातें ध्‍यान में रखनी होंगी। यह मेरूमज्‍जा मस्तिष्‍क में जाकर एक प्रकार के 'बल्‍ब' में-मेडुला (medulla) नामक एक अण्‍डाकार पदार्थ में अंत हो जाती है, जो मस्तिष्‍क के साथ संयुक्‍त नहीं है, वरन्‍ मस्तिष्‍क में जो एक तरल पदार्थ है, उसमें तैरता रहता है। अत: यदि सिर पर कोई आघात लगे, तो उस आघात की शक्ति उस तरल पदार्थ में बिखर जाती है, और इससे उस बल्‍ब को कोई चोट नहीं पहुँचती। यह एक महत्त्वपूर्ण बात है, जो हमें स्‍मरण रखनी चाहिए। दूसरे, हमें यह भी जान लेना होगा कि इन सब चक्रों में से सबसे नीचे स्थित मूलाधार, मस्तिष्‍क में स्थित सहस्‍त्रार और नाभिदेश में स्थित मणिपुर-इन तीन चक्रों की बात हमें विशेष रूप से ध्‍यान में रखनी होगी।

अब भौतिक विज्ञान का एक तत्त्व हमें समझना है। हम लोगों ने विद्युत्‍ और उससे संयुक्‍त अन्‍य बहुविध शक्तियों की बातें सुनी हैं। विद्युत्‍ क्‍या है, यह किसी को मालूम नहीं। हम लोग इतना ही जानते हैं कि विद्युत्‍ एक प्रकार की गति है। जगत्‍ में और भी अनेक प्रकार की गतियाँ हैं; विद्युत्‍ से उनका भेद क्‍या है? मान लो, यह मेज़ चल रहा है और उसके परमाणु विभिन्‍न दिशाओं में जा रहे हैं। अब यदि उन परमाणुओं को एक ही दिशा में चलाया जाए, तो वह विद्युत्‍ के माध्‍यम से ही किया जा सकता है। समस्‍त परमाणु यदि एक ओर गतिशील हों, तो उसीको वैद्युत् गति कहते हैं। इस कमरे में जो वायु है, उसके सारे परमाणुओं को यदि लगातार एक ओर चलाया जाए, तो यह कमरा एक महान बैटरी (battery) के रूप में परिणत हो जाएगा। शरीरशास्‍त्र की एक और बात हमें स्‍मरण रखनी होगी। वह यह है कि जो स्‍नायु-केंद्र श्‍वास-प्रश्‍वास-यन्‍त्रों को नियमित करता है, उसका सारे स्‍नायु-प्रवाहों के नियमन पर भी कुछ अधिकार है।

अब हम प्राणायाम-क्रिया के साधन का कारण समझ सकेंगे। पहले तो, यदि श्‍वास-प्रश्‍वास की गति नियमित की जाए, तो शरीर के सारे परमाणु एक ही दिशा में गतिशील होने का प्रयत्‍न करेंगे। जब विभिन्‍न दिशाओं में दौड़नेवाला मन एकमुखी होकर एक दृढ़ इच्‍छा-शक्ति के रूप में परिणत होता है, तब सारे स्‍नायु-प्रवाह भी परिवर्तित होकर एक प्रकार की विद्युद्वत गति प्राप्‍त करते हैं; क्‍योंकि स्‍नायुओं पर विद्युत-क्रिया करने पर देखा गया है कि उनके दोनों प्रांतों में धनात्‍मक और ऋणात्‍मक, इन विपरीत शक्तिद्वय का उद्भव होता है। इसी से यह स्‍पष्‍ट है कि जब इच्‍छा-शक्ति स्‍नायु-प्रवाह के रूप में परिणत होती है, तब वह एक प्रकार के विद्युत्‍ का आकार धारण कर लेती है। जब शरीर की सारी गतियाँ सम्‍पूर्ण रूप से एकाभिमुखी होती हैं, तब वह शरीर मानो इच्‍छा-शक्ति का एक प्रबल विद्युदाधार बन जाता है। यह प्रबल इच्‍छा-शक्ति प्राप्‍त करना ही योगी का उद्देश्‍य है। इस तरह, शरीरशास्‍त्र की सहायता से प्राणायाम-क्रिया की व्‍याख्‍या की जा सकती है। वह शरीर के भीतर एक प्रकार की एकमुखी गति पैदा कर देती है और श्‍वास-प्रश्‍वास-केंद्र पर आधिपत्‍य करके शरीर के अन्‍यान्‍य केंद्रों को भी वश में लाने में सहायता पहुँचाती है। यहाँ पर प्राणायाम का लक्ष्‍य मूलाधार में कुण्‍डलाकार में अवस्थित कुण्‍डलिनी-शक्ति को उद्बुद्ध करना है।

हम जो कुछ देखते हैं, कल्‍पना करते हैं या जो कोई स्‍वप्‍न देखते हैं, सारे अनुभव हमें आकाश में करने पड़ते हैं। हम साधारणत: जिस परिदृश्‍यमान आकाश को देखते हैं, उसका नाम है महाकाश। योगी जब दूसरों का मनोभाव समझने लगते हैं या अलौकिक वस्‍तुएँ देखने लगते हैं, तब वे सब दर्शन चित्ताकाश में होते हैं। और जब अनुभूति विषयशून्‍य हो जाती है, जब आत्‍मा अपने स्‍वरूप में प्रकाशित होती है, तब उसका नाम है चिदाकाश। जब कुण्‍डलिनी-शक्ति जागकर सुषुम्‍णा नाड़ी में प्रवेश करती है, तब जो सब विषय अनुभूत होते हैं, वे चित्ताकाश में ही होते हैं। जब वह उस नाड़ी की अन्‍त‍िम सीमा मस्‍तक में पहुँचती हैं, तब चिदाकाश में एक विषयशून्‍य ज्ञान अनुभूत होता है।

अ‍ब विद्युत्‍ की उपमा फिर से ली जाय। हम देखते हैं कि मनुष्‍य केवल तार के योग से एक जगह से दूसरी जगह विद्युत्‍-प्रवाह चला सकता है, परंतु प्रकृति अपने महान्‍ शक्ति-प्रवाहों को भेजने के लिए किसी तार का सहारा नहीं लेती। इसी से अच्‍छी तरह समझ में आ जाता है कि किसी प्रवाह को चलाने के लिए वास्‍तव में तार की कोई आवश्‍यकता नहीं। हम तार के बिना काम नहीं कर सकते, इसीलिए हमें उसकी आवश्‍यकता पड़ती है। जैसे विद्युत्‍-प्रवाह तार की सहायता से विभिन्‍न दिशाओं में प्रवाहित होता है, ठीक उसी तरह शरीर की समस्‍त संवेदनाएँ और गतियाँ मस्तिष्‍क में और मस्तिष्‍क से बहिर्देश में प्रेरित की जाती हैं; वह स्‍नायु-तन्‍तुरूप तार की ही सहायता से होता है। मेरूमज्‍जा-मध्‍यस्‍थ ज्ञानात्‍मक और कर्मात्‍मक स्‍नायु-गुच्‍छ-स्‍तम्‍भ ही योगियों की इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ हैं। उन दोनों प्रधान नाड़ियों के भीतर से ही पूर्वोक्‍त अन्‍तर्मुखी और बहिर्मुखी शक्ति-प्रवाहद्वय संचरित हो रहे हैं। परंतु बात अब यह है कि इस प्रकार के तार के समान किसी पदार्थ की सहायता बिना मस्तिष्‍क से चारों ओर विभिन्‍न संवाद भेजना और भिन्‍न भिन्‍न स्‍थानों से मस्तिष्‍क का विभिन्‍न संवाद ग्रहण करना संभव क्‍यों न होगा? प्रकृति में तो ऐसे व्‍यापार घटते देखे जाते हैं। योगियों का कहना है कि इसमें कृतकार्य होने पर ही भौतिक बंधनों को लाँघा जा सकता है। तो अब इसमें कृतकार्य होने का उपाय क्‍या है? यदि मेरूदण्‍डमध्‍यस्‍थ सुषुम्‍णा के भीतर से स्‍नायुप्रवाह चलाया जा सके, तो यह समस्‍या मिट जाएगी। मन ने ही यह स्‍नायु-जाल तैयार किया है, और उसी को यह जाल तोड़कर किसी प्रकार की सहायता की राह न देखते हुए, अपना काम करना होगा। तभी सारा ज्ञान हमारे अधिकार में आएगा, देह का बंधन फिर न रह जाएगा। इसीलिए सुषुम्‍णा नाड़ी पर विजय पाना हमारे लिए इतना आवश्‍यक है। यदि तुम इस शून्‍य नली के भीतर से, स्‍नायु-जाल की सहायता के बिना भी मानसिक प्रवाह चला सको, तो बस, इस समस्‍या का समाधान हो गया। योगी कहते हैं कि यह संभव है।

साधारण मनुष्‍यों में सुषुम्‍णा निम्‍नतर छोर में बंद रहती है; उसके माध्‍यम से कोई कार्य नहीं होता। योगियों का कहना है कि इस सुषुम्‍णा का द्वार खोलकर उसके माध्‍यम से स्‍नायु-प्रवाह चलाने की एक निर्दिष्‍ट साधना है। बाह्य विषय के संस्‍पर्श से उत्‍पन्‍न संवेदना जब किसी केंद्र में पहुँचती है, तब उस केंद्र में एक प्रतिक्रिया होती है। स्‍वयंक्रिय केंद्रों (automatic centres) में उन प्रतिक्रियाओं का फल केवल गति होता है, पर सचेतन केंद्रों (conscious centres) में पहले अनुभव, और फिर बाद में गति होती है। सारी अनुभूतियाँ बाहर से आई हुई क्रियाओं की प्रतिक्रिया मात्र हैं। तो फिर स्‍वप्‍न में अनुभूति किस तरह होती है? उस समय तो बाहर की कोई क्रिया नहीं रहती। अतएव स्‍पष्‍ट है कि विषय के अभिघात से पैदा हुई स्‍नायविक गतियाँ शरीर के किसी न किसी स्‍थान पर अवश्‍य अव्‍यक्‍त भाव से रहती हैं। मान लो, मैंने एक नगर देखा। 'नगर' नामक बाह्य वस्‍तु के आघात की जो प्रतिक्रिया है, उसी से उस नगर की अनुभूति होती है। अर्थात्‍ उस नगर की बाह्य वस्‍तु द्वारा हमारे अंतर्वाही स्‍नायुओं में जो गतिविशेष उत्‍पन्‍न हुई है, उससे मस्तिष्‍क के भीतर के परमाणुओं में एक गति पैदा हो गई है। आज बहुत दिन बाद भी वह नगर मेरी स्‍मृति में आता है। इस स्‍मृति में भी ठीक वही व्‍यापार होता है, पर अपेक्षाकृत हल्‍के रूप में। किंतु जो क्रिया मस्तिष्‍क के भीतर उस प्रकार का मृदुतर कंपन ला देती है, वह भला कहाँ से आती है? यह तो कभी नहीं कहा जा सकता कि वह उसी पहले के विषय-अभिघात से पैदा हुई है। अत:स्‍पष्‍ट है कि विषय-अभिघात से उत्‍पन्‍न गतिप्रवाह या संवेदनाएँ शरीर के किसी स्‍थान पर कुण्‍डलीकृत होकर विद्यमान हैं और उनके अभिघात के फल से ही स्‍वप्‍न-अनुभूति रूप मृदु प्रतिक्रिया की उत्‍पत्ति होती है।

जिस केंद्र में विषय-अभिघात से उत्‍पन्‍न संवेदनाओं के बचे हुए अंश का संस्‍कार-समष्टि मानो संचित सी रहती है, उसे मूलाधार कहते हैं, और उस कुण्‍डलीकृत क्रियाशक्ति को कुण्‍डलिनी कहते हैं। सम्‍भवत: गतिशक्तियों का अवशिष्‍ट अंश भी इसी जगह कुण्‍डलीकृत होकर संचित है; क्‍योंकि गंभीर अध्‍ययन और बाह्य वस्‍तुओं पर मनन के बाद शरीर के जिस स्‍थान पर यह मूलाधार चक्र (सम्‍भवत: sacral plexus) अवस्थित है, वह तप्‍त हो जाता है। अब यदि इस कुण्‍डलिनी-शक्ति को जगाकर उसे ज्ञातभाव से सुषुम्‍णा नली में से प्रवाहित करते हुए एक केंद्र से दूसरे केंद्र को ऊपर लाया जाय, तो वह ज्‍यों-ज्‍यों विभिन्‍न केंद्रों पर क्रिया करेगी, त्‍यों-त्‍यों प्रबल प्रतिक्रिया की उत्‍पत्ति होगी। जब शक्ति का बिल्‍कुल सामान्‍य अंश किसी स्‍नायु-तन्‍तु के भीतर से प्रवाहित होकर विभिन्‍न केंद्रों से प्रतिक्रिया उत्‍पन्‍न करता है, तब वही स्‍वप्‍न अथवा कल्‍पना के नाम से अभिहित होता है। किंतु जब मूलाधार में संचित विपुलायतन शक्तिपुंज दीर्घर्घ-कालव्‍यापी तीव्र ध्‍यान के बल से उद्बुद्ध होकर सुषुम्‍णा-मार्ग में भ्रमण करता है और विभिन्‍न केंद्रों पर आघात करता है, तो उस समय एक बड़ी प्रबल प्रतिक्रिया होती है, जो स्‍वप्‍न अथवा कल्‍पनाकालीन प्रतिक्रिया से तो अनंतगुनी श्रेष्‍ठ है ही, पर जाग्रतकालीन विषय-ज्ञान की प्रतिक्रिया से भी अनन्‍तगुनी प्रबल है। यही अतीन्द्रिय अनुभूति है। फिर जब वह शक्तिपुज समस्‍त ज्ञान के, समस्‍त संवेदनाओं के केंद्रस्‍वरूप मस्तिष्‍क में पहुँचता है, तब संपूर्ण मस्तिष्‍क मानो प्रतिक्रिया करता है और इसका फल है ज्ञान का पूर्ण प्रकाश या आत्‍म-साक्षात्‍कार। कुण्‍डलिनी-शक्ति जैसे-जैसे एक केंद्र से दूसरे केंद्र को जाती है, वैसे ही वैसे मन का मानो एक एक परदा खुलता जाता है और तब योगी इस जगत की अपने सूक्ष्‍म या कारणरूप में उपलब्धि करते हैं। और तभी विषय-स्‍पर्श से उत्‍पन्‍न हुई संवेदना और उसकी प्रतिक्रियारूप जो जगत के कारण हैं, उनका यथार्थ स्‍वरूप हमें ज्ञात हो जाता है। अतएव तब हम सारे विषयों का पूर्ण ज्ञान प्राप्‍त कर लेते हैं; क्‍योंकि कारण को जान लेने पर कार्य का ज्ञान अवश्‍य होगा।

इस प्रकार हमने देखा कि कुण्‍डलिनी को जगा देना ही तत्त्वज्ञान, अतिचेतन अनुभूति या आत्‍म-साक्षात्‍कार का एकमात्र उपाय है। कुण्‍डलिनी को जाग्रत करने के अनेक उपाय हैं। किसी की कुण्‍डलिनी भगवान के प्रति प्रेम के बल से ही जाग्रत हो जाती है, किसी की सिद्ध महापुरूषों की कृपा से और किसी की सूक्ष्‍म ज्ञान-विचार द्वारा। लोग जिसे अलौकिक शक्ति या ज्ञान कहते हैं, उसका जहाँ कहीं कुछ प्रकाश दीख पड़े, तो समझना होगा कि वहाँ कुछ परिमाण में यह कुण्‍डलिनी-शक्ति सुषुम्‍णा के भीतर किसी तरह प्रवेश पा गई है। तो भी इस प्रकार की अलौकिक घटनाओं में से अधिकतर स्‍थलों में देखा जाएगा कि उस व्‍यक्ति ने बिना जाने एकाएक ऐसी कोई साधना कर डाली है, जिससे उसकी कुण्‍डलिनी-शक्ति अज्ञातभाव से कुछ परिमाण में स्‍वतंत्र होकर सुषुम्‍णा के भीतर प्रवेश कर गई है। समस्‍त उपासना, ज्ञातभाव से हो अथवा अज्ञातभाव से, उसी एक लक्ष्‍य पर पहुँचा देती है अर्थात्‍ उससे कुण्‍डलिनी जाग्रत हो जाती है। जो सोचते हैं कि मैंने अपनी प्रार्थना का उत्तर पाया, उन्‍हें मालूम नहीं कि प्रार्थनारूप मनोवृत्ति के द्वारा वे अपनी ही देह में स्थित अनन्‍त शक्ति के एक बिन्‍दु को जगाने में समर्थ हुए हैं। अतएव योगी घोषणा करते हैं कि मनुष्‍य बिना जाने जिसकी विभिन्‍न नामों से, डरते डरते और कष्‍ट उठाकर उपासना करता है, उसके पास किस तरह अग्रसर होना होगा, यह जान लेने पर समझ में आ जाएगा कि वही प्रत्‍येक व्‍यक्ति में कुंडलीकृत यथार्थ शक्ति है-चिरन्‍तन सुख की जननी है। अतएव राजयोग यथार्थ धर्मविज्ञान है। वह सारी उपासना, सारी प्रार्थना, विभिन्‍न प्रकार की साधना-पद्धति और समुदय अलौकिक घटनाओं की युक्तिसंगत व्‍याख्‍या है।


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