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सफलता के अचूक मंत्र
रमेश पोखरियाल निशंक


 

सफलता के

अचूक मंत्र

 

 

 

डॉ . रमेश पोखरियाल ' निशंक '

 

 

 

 

 

डायमंड बुक्स

 

 

 

ISBN: 978-81-288-2864-5

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा. लि.

X-30, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया,

फेज-2, नई दिल्ली-110020

फोन : 011-41611861

फैक्स : 011-41611866

E-maill : sales@diamondpublication.com

Website : www.dbp.in

संस्करण : 2010

मुद्रकः आदर्श प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली-32

SAFALTA KE ACHOOK MANTRA

By: Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

 

 

भूमिका

 

ऊंची सोच , बड़ी सफलता !

अपने विषयों की अच्छी जानकारी, कार्य के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण और भरपूर उत्साह से संपन्न होते हुए भी ऐसा देखा जाता है कि कुछ लोग अपने जीवन में वह सफलता अर्जित नहीं कर पाते हैं जो अनेक प्रकार से उनसे पीछे रह गये लोग अचानक प्राप्त कर लेते हैं। ऐसी स्थिति में व्यावसायिक योग्यता और दक्षता के बावजूद विफल लोगों के पास कुंठित होकर कुढ़ते रहने के अलावा कोई और चारा नहीं बचता। कुछ लोग ऐसी स्थितियों में अपनी विफलता के कारणों की तलाश करते हैं तो कुछ भाग्य या व्यवस्था की त्रासदी मानकर हताश हो जाते हैं।

प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि तथा देश के पूर्व प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविता की इन दो पंक्तियों में जीवन का मर्म छिपा है:

छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता

टूटे दिल से कोई खड़ा नहीं होता

अर्थात् यदि जीवन में कुछ बड़ा करना है, औरों से अधिक सफलता प्राप्त करनी है, तो आपको अपनी सोच अधिक व्यापक रखनी होगी तथा औरों के प्रति उदारता के भाव को जीवन में उतारना होगा। दूसरों को छोटा समझने वाला तो बडा हो ही नहीं सकता, साथ ही मन में खिन्नता, आक्रोश, क्रोध, अवसाद तथा निजी दु:ख लेकर आप कभी आत्मनिर्भर हो ही नहीं सकते। सफलता एक बहुत व्यापक दृष्टिकोण है और यह उन्हीं को मिलती है, जिन्हे सभी से सहज स्नेह होता है, जो दूसरों को नीचा दिखाने में रुचि नहीं लेते और जिनके निजी सुख-दु:ख उनके लक्ष्य तक की यात्रा में महत्त्व नहीं रखते।

प्रसिद्ध विचारक नेपोलियन हिल ने सही कहा है- 'सफलता और समृद्धि का जन्म विचार से होता है। जब हम वास्तव में सफलता को पाने के लिए तैयार हो जाते हैं तब हमें वह हकीकत में दिखाई देने लगती है। एक प्रभावी विचार हमें सफलता की मंजिल तक पहुंचा सकता है। इसके बाद जब हमारे पास समृद्धि आती है तो इतनी तीव्रता से आती है और इतनी ज्यादा मात्रा में आती है कि हमें अचरज होने लगता है... इतने दिनों तक समृद्धि कहां छिपी हुई थी!'

कई लोगों पर असफलता का डर इतना हावी हो जाता है कि वे किसी भी महत्त्वपूर्ण काम में हाथ डालने से हिचकिचाते हैं, उनकी जुबान पर बस एक ही वाक्य रहता है- 'बहुत मुश्किल है, मैं नहीं कर पाऊंगा इसे।' ऐसे लोगों के मन में जिंदगी-भर इस बात का दुःख रहता है कि एक बार प्रयास करके देख लेते तो शायद बात बन जाती।

सफलता और असफलता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब भी कोई व्यक्ति कुछ काम करता है तो उसका इन दो पहलुओं में से किसी एक से सामना होता ही है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सफलता एवं असफलता का पता काम पूरा होने के बाद ही चल पाता है। अगर काम शुरू करने से पहले ही असफलता का डर दिल में पाल लिया जाए तो असफल होने की पूरी-पूरी संभावना बन जाती है।

मैंने अपना जीवन एक विद्यालय के शिक्षक के रूप में आरंभ किया था। मुझे कभी भी यह चिंता नहीं थी कि मैं भविष्य में क्या बनूंगा? कैसे बनूंगा? बनूंगा भी या नहीं? मैंने केवल एक कार्य किया, वह यह कि ईश्वर ने मुझे जो भी अवसर दिया, अपनी पूरी शक्ति और बुद्धि लगाकर मैंने उसका प्रयोग किया। जिससे भी मिला, उसे उपेक्षित करने के बजाय अपना बनाने का प्रयास किया। विरोधों का सामना दृढ़ता और आत्मविश्वास से किया। समय का कभी भी दुरुपयोग नहीं किया। अपने बड़ों से जो भी सीख मिली उसे प्रसाद समझकर ग्रहण किया। आलोचकों को अपना मित्र मानकर अपनी कमियों को सुधारा।

इस पुस्तक में मैंने अब तक जो भी जीवन से सीखा है, उसे सहजता और सरलता से आपके सामने प्रस्तुत करने की चेष्टा की है। हो सकता है कि इस पुस्तक में दिये गये सफलता के मंत्रों से आपको भी लाभ हो और आप अपनी जीवनधारा को एक नयी दिशा दे सकें।

आपके विचारों और पत्रों की मैं उत्सुकता से प्रतीक्षा करूंगा।

- डॉ . रमेश पोखरियाल ' निशंक '

 

 

विषय - सूची

भूमिका-

1. सफलता की परिभाषा

2. सफलता के आधार

3. सफलता और परिश्रम

4. सफलता के लिए सुनिए

5. सकारात्मक सोच और सफलता

6. सफलता के लिए संघर्ष

7. लक्ष्यों की प्राप्ति कैसे करें

8. सफलता को टिकाऊ कैसे बनाएं

9. भाग्य को कोसना छोड़ें

10. बदलें अपनी सोच

11. करिए कुछ अलग भी

12. सीखें आलोचना प्रबंधन

13. आलोचना का सामना कैसे करें

14. आत्मानुशासन का महत्त्व

15. आत्ममुग्धता से बचें

16. आत्ममूल्यांकन से सफलता

18. प्रसन्न रहना सीखें

19. हमेशा प्रसन्न रहने के सात तरीके

20. प्रसन्नता के सूत्र

21. तनाव मुक्त रहिए

22. कार्य स्थल के तनाव से कैसे निकलें

23. कार्य संतुष्टि और सफलता

24. तनाव प्रबन्धन और सफलता

25. अनिद्रा से बचाव

26. थकान से कैसे निपटें

27. हिम्मत से बांधों समय की डोर

28. समय के साथ बदलें

29. समय प्रबन्धन

30. समय प्रबन्धन से सफलता

31. साहस का विकास करें

32. नई शुरुआत से घबराएं नहीं

33. रिश्तों को संवारें

34. औरों के लिए जीना

35. जीवन में भरें रंग

36. कृतज्ञता व्यक्त करें

37. सीख लें असफलताओं से

38. भूलने की आदत

39. विश्वास के महत्व को समझें

40. सज्जनता से सफलता

41. व्यक्तित्व से सफलता

42. कैसे करें सर्वोत्तम प्रदर्शन

43. श्रेष्ठता के सिद्धांत

44. ढूंढ़ लीजिए खुद में खूबियां

45. जरूरी हैं भविष्य दृष्टि

46. कुछ व्यक्तित्व : जिन्होंने सफलता की गाथा लिखी

अंत में

 

1

सफलता की परिभाषा

' दूसरे व्यक्ति आप पर जितना विश्वास करते हैं , आप

उतना ही सफल होते हैं। ' - स्वेट मार्टन

सफल कौन है? वह सामाजिक कार्यकर्ता जो गांव के बच्चों को शिक्षा देने का लक्ष्य पा लेता है या वह व्यक्ति जो लाखों-करोड़ों का बिजनेस और ऐशो-आराम की जिंदगी जी रहा हो, वह क्लर्क जो अपने लिए घर बनाकर और बच्चों की शादियां कर सारे कामों से निवृत्त हो चुका है या वह विद्यार्थी जिसने आईएएस की परीक्षा पास की है या फिर वह खिलाड़ी या बिजनेसमैन जो एक सफलता के बाद भी दूसरी सफलता के लिए बेचैन रहता है। इस प्रश्न का उत्तर आपको अलग-अलग ही मिलेगा जैसे कि कोई, कार्यकर्ता को, तो कोई बिजनेसमैन, तो कोई क्लर्क या विद्यार्थी को सफल मानेगा। किसी के लिए एक ही सफलता काफी है, तो दूसरे के लिए एक सफलता के बाद दूसरी सफलता और फिर तीसरी, चौथी....। हर व्यक्ति के लिए सफलता के मायने अलग-अलग होते हैं।

तो फिर पूर्ण सफलता क्या है? इस शब्द को मनोवैज्ञानिक, व्यवहार वैज्ञानिक, दार्शनिक, धर्म, समाज वैज्ञानिक, मानवशास्त्री, प्रेरक गरु सभी अपने-अपने तरीके से परिभाषित करते हैं। समाज विज्ञान इसे सिर्फ बोध की स्थिति बताता है। समाज वैज्ञानिकों के अनुसार सफलता एक सोच है, एक अवधारणा। जो उसे महसूस करने वाले पर निर्भर करती है। सफलता वह स्थिति है जहां व्यक्ति स्वयं को देखना चाहता है। किसी के लिए नई बढ़िया कार, विदेश में छुट्टियां मनाना, नया घर, नई नौकरी सफलता के दायरे में आती है। अगर उसके पास ये सारी चीजें नहीं होती तो वह उन्हें पाने के लिए संसाधनों और अवसरों की तलाश में जुट जाता है। कुछ लोगों को बहुत ज्यादा पैसे, कमाई, स्वतंत्रता, ऐश्वर्य जैसी चीजों की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे लोग जीवन में मिली छोटी-छोटी चीजों से सफलता. का अनुभव करते हैं। मनोवैज्ञानिक डॉ. निक एरिजा कहते हैं, " किसी चीज को पाना आंतरिक स्थिति है न कि बाहरी। यह सच है कि बाहरी चीजें आंतरिक स्थिति को प्रेरणा देती हैं , लेकिन अंततः जो सफलता अन्तर्मन में महसूस होती है , वही सबसे महत्त्वपूर्ण है। " कुछ लोग सफलता और धन को एक मान लेते हैं। अर्थशास्त्री जॉन मार्क्स रुपयों के बल पर हर ख्वाहिश पूरी कर लेने की ताकत रखने वाले को सफल मानते हैं। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में कहा है कि सामान्य के बीच अपनी योग्यता को साबित करना ही सफलता है। वहीं दुनिया भर के साधु-महात्माओं ने उन व्यक्तियों को सफल माना है जो सांसारिक चीजों से ऊपर उठकर सोचते हैं। भारतीय विद्वानों के अनुसार सफल वही है, जिसने अपनी इच्छाओं पर काबू पा लिया है। समाज विज्ञानी इसे तुलनात्मक स्थिति मानते हैं। समाज वैज्ञानिक केविन मैक्कैली का कहना है कि सफलता एक अमूर्त विषय है। इसे मापने के लिए कोई तराजू उपलब्ध नहीं है। फिर भी लोग इसे नापते हैं। सफलता को नापने का मीटर उनकी संस्कृति व आर्थिक स्थिति होती है। इन्हीं तत्त्वों को आधार मानकर वे अपनी तुलना दूसरे व्यक्ति से करते हैं और अपनी सफलता या असफलता का निर्धारण करते हैं।

व्यवहार विज्ञानी गेरी रेयान सफलता का अर्थ समझने के लिए सबसे पहले मनुष्य की प्रकृति को समझने की बात करते हैं। उनके अनुसार हर मनुष्य के सोचने, समझने, समीक्षा व प्रतिक्रिया करने का तरीका अलग-अलग होता है। इसमें शरीर के तीनों भाग- शरीर, आत्मा व प्रवृत्ति काम करते हैं। यही उन्हें सफलता का आभास भी दिलाते हैं।

सफलता का रहस्य मनुष्य की सोच और सफलता को देखने की क्षमता में छिपा है। अमेरिकी मनोविज्ञान के पिता विलियम जेम्स कहते हैं- "हम जो सोचते हैं, उसे हासिल कर सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर भावनाओं की ऐसी अंतहीन शक्ति है, जो उसे किसी भी समस्या से लड़ने में मदद करती है। वह अपनी सारी कमजोरियों से बाहर आ सकता है। आर्थिक निर्भरता प्राप्त कर सकता है। आध्यात्मिक रूप से जाग्रत हो सकता है। हर चीज जिसका संबंध सफलता से है वह हासिल कर सकता है। यह सफलता का स्रोत हर व्यक्ति में उपलब्ध है, जिसे वे सफलता कंपास से समझाते हैं।" जेम्स के मुताबिक यह कंपास प्राकृतिक रूप से आपके अंदर उपलब्ध होता है, और हमेशा सही दिशा दिखाने का काम करता है। यह कंपास भौगोलिक दिशा दिखाने की जगह सफलता का मार्ग. बताता है। कोई भी व्यक्ति इसके जरिए यह जान सकता है कि उसके पास सफल होने के लिए कितनी क्षमता है। एक तरह से यह सफलता की आधारशिला भी तैयार करता है। सफलता का मार्ग दिखाने में इसका उपयोग सबसे अधिक तब किया जा सकता है जब आप सफलता और असफलता की धुंध में खो जाएं। यह दिमाग को विकल्प खोजने में मदद करता है। अब्राहम लिंकन ने एक बार कहा था- ' सफल लोगों का प्रतिशत तब बढ़ सकता है जब वे अपने दिमाग को उस काम के लिए तैयार कर लें। '

आस्ट्रेलिया के मनोवैज्ञानिक एलन रिचर्डसन द्वारा बास्केटबॉल खिलाड़ियों पर किया गया प्रयोग भी इस बात का समर्थन करता है, जिसमें उन्होंने खिलाडियों को तीन समूहों अ, ब, स में बांट दिया। समूह 'अ' को उन्होंने प्रतिदिन 20 मिनट तक फ्री थ्रो का अभ्यास करने का अवसर दिया। समूह 'ब' को उन्होंने अभ्यास न करने की सलाह दी और 'स' को रोज 20 मिनट तक मानसिक रूप से अभ्यास करने को कहा। शोध के अंत में पाया गया कि 'अ' समूह के खिलाड़ियों की फ्री थ्रो क्षमता में 25 प्रतिशत तक का सुधार आया। आशा के अनुरूप समूह 'ब' के लोगों में कोई सुधार नहीं था। लेकिन समूह 'स' के लोगों में 24 प्रतिशत तक का सुधार पाया गया जो 'अ' समूह के बराबर था। जबकि वे बास्केटबाल कोर्ट में गए ही नहीं। यह प्रयोग साबित करता है कि हमारा दिमाग कठिन से कठिन लक्ष्य को भी पूरा कर सकता है। बस आप हर दम तैयार रहें।

लेखक फिल कोविंगटन इस बात को और पुख्ता करते हैं। उनके अनुसार हमारे अंदर सफलता की दो अवस्थाएं होती हैं, पहली यह हमारे निर्णय पर आधारित होती है, जिसमें हम यह सोचते हैं कि सफलता हमारे लिए क्या है? और दूसरा वह बोध जिसमें हम जानते हैं कि इसके लिए हम क्या अच्छा कर सकते हैं? इसका मतलब यह हुआ कि वास्तविक सफलता का साधन आंतरिक व मानसिक स्थिति है। लेकिन तंत्रिका विज्ञान और व्यवहार विज्ञान इसे मानसिक स्थिति न कहकर भावनात्मक स्थिति कहता है। सफलता के गुर बताने वाले ज्यादातर परामर्शदाता इस बात पर जोर देते हैं कि 'भावनात्मक समझ' सफलता व जीवन में खुशियों की बेहतर भविष्यवक्ता होती है। यह तार्किक समझ से ज्यादा सटीक होती है। विज्ञान इस बात की पुष्टि करता है कि आकर्षण ही सफलता हासिल करने के लिए प्रेरित करता है, जिसकी वजह से आपको बाह्य चीजों पर बहुत अधिक निर्भर नहीं रहना पड़ता।

तंत्रिका विज्ञान और व्यवहार विज्ञान ने बहुत स्पष्ट रूप से समझाया है कि जब हम किसी चीज से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं- तब अपने दिमाग के तंत्रिका तंत्र को शारीरिक रूप से उस चीज के प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित कर देते हैं। इस न्यूरोबायोलॉजिकल खोज को पारलौकिक लेखक सदियों से ' आकर्षण का कानून' कहते रहे हैं। इस प्राचीन कानून को यदि आधुनिक विज्ञान की भाषा में कहें तो इसका मतलब हुआ हम उसी चीज के प्रति आकर्षित होते हैं, जिस पर हम भावनाओं को जानबूझकर केंद्रित करते हैं। ऐसा करते समय हम उस चीज पर सीधे ध्यान केंद्रित करने के लिए दिमाग के तंत्रिका तंत्र को मजबूती प्रदान करते हैं। इस तरह दिमाग सपनों को पूरा करने की मशीन बन जाता है। ऐसे कई लोग हैं जो कॉलेज या स्कूल की पढाई के दौरान बहुत मेधावी छात्र रहे। लेकिन वे जीवन में सफल नहीं कहलाए। ऐसे व्यक्ति जीवन स्तर को उठाने वाली चीजों से भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाते। उनमें किसी चीज को पाने की भावनात्मक वचनबद्धता की कमी रहती है। वहीं कमजोर या सामान्य बुद्धि के छात्र बड़े पदों पर पहुंच जाते हैं, या बड़े व्यापारी बन जाते हैं। सफल और खुशहाल जीवन जीने के लिए उन्हें जोश की भावना कुछ पाने के लिए सीधे प्रेरित करती है। हम इसे कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि गरीबी से दूर भागने या आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति छोटे से छोटा या बड़े से बड़ा काम कर सकता है। अरस्तू के शब्दों में कहें तो आवेग से प्रेरित लोग कहीं ज्यादा साहसी, उत्साह और आशा से भरे हुए होते हैं। शुरुआत में आवेग उन्हें डरने से रोकता है, जबकि बाद में उन्हें आत्मविश्वास के साथ प्रेरित करता है।

मनोवैज्ञानिक जॉन गार्टनर इसका संबंध आनुवांशिक गुण से बताते हैं। उनका कहना हैं कि सफलता प्राप्त करने का गुण आनुवांशिक होता है। व्यक्ति में पहले से सफलता प्राप्त करने का गुण मौजूद रहता है, जो इसे माता-पिता से मिलता है। लैलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के संस्थापक शेफस्काई इस विचार को सिरे से खारिज करते हैं। वे कहते हैं, "सफल व्यक्तियों का इतिहास इस बात का गवाह है कि सफलता वंशानुगत नहीं होती व जीन, आयु, रंग इत्यादि पर निर्भर न करके व्यक्तिगत प्रयासों पर निर्भर करती है।" अनगिनत अध्ययनों में यह बात साबित हुई है कि लोगों का उत्तराधिकार, अचानक लॉटरी या और किसी तरह से मिलने वाला पैसा कुछ सालों में खत्म हो जाता है और उन्हें अपनी शुरुआत शून्य से करनी होती है।

शेफस्काई की बात वजनदार लगती है। अब्राहम लिंकन , महात्मा गांधी और धीरूभाई अंबानी जैसी अनगिनत हस्तियां हैं, जहां इस वंशानुगत गुण का उनकी सफलता से कोई वास्ता नहीं है।

समाजविज्ञानी भी वंशानुगत सफलता की बात को नकारते हैं। इनके अनुसार सफलता व्यक्तिगत होती है, जो अपनी बुद्धि, प्रयास और संरचनात्मकता पर निर्भर करती है। छात्र से लेकर शोधकर्ता, क्लर्क से लेकर किसी कंपनी के सीईओ तक को आगे बढ़ने के लिए बुद्धि या मस्तिष्क की शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। अगर तंत्रिका तंत्र शोधकर्ताओं की बात मानें तो दिमाग मांसपेशी की तरह है, जिसकी क्षमता को जितना चाहें उतना बढाया जा सकता है। यह जितना इस्तेमाल होगा, उतना शक्तिशाली बनेगा।

कदम-कदम पर मिली सफलता जहां एक ओर लोकप्रिय बनाती है, वहीं दूसरी तत्त्व यह भी है कि यह सफल व्यक्ति के अंदर अपनी लतं भी डाल देती है। सफलता के आदी बन चुके लोगों के लिए सफलता की लत शब्द का प्रयोग करना गलत नहीं होगा। स्टील किंगलक्ष्मी निवास मित्तल कहते हैं कि 'एक के बाद दूसरी सफलता के पीछे दौड़ने का मतलब है , आप किसी अवसर को छोड़ना नहीं चाहते। मैं भी किसी अवसर को छोड़ना नहीं चाहता हूं। ' शोधकर्ता कहते हैं कि आपके अगले कदम के आगे आपकी पिछली सफलता चलती है जिसके कारण कई काम वैसे ही आसान हो जाते हैं।

असफलता का डर मनोवैज्ञानिक डर है। जो व्यक्ति को पहले ही हार मानने के लिए उकसाता है। खेल मनोविज्ञान के अनुसार, सफलता की तरह असफलता भी आंतरिक धारणा है। यह प्रत्येक व्यक्ति की मानसिक स्थिति का भाग है। आप अपने अंदर विजय भावना लेकर चलते हैं। खेल मनोवैज्ञानिक पीटर जेनसन बेनरीड ने ओलंपिक खिलाड़ियों पर किए अध्ययन में पाया कि खेल में जीत से मात्र एक पल पहले खिलाड़ी पर किए गए अध्ययन में पाया कि खेल में जीत से मात्र एक पल पहले खिलाड़ी इस बात को स्वीकार कर लेता है कि वह हारेगा या जीतेगा।

अंततः परिणाम भी उसी के अनुसार आता है। यह बात आम लोगों की जिन्दगी पर भी लागू होती है। एक छोटा-सा पल जो जीत से एक कदम दूर होता है, इस पल में जो भी निर्णय हम लेते हैं वह या तो असफलता का कलंक लगा जाता है या विजयमाला पहनाता है।

प्रसिद्ध लेखक गेरी सिम्पसन सफलता के गणित के आधार पर इस बात को प्रमाणित करते हैं। यदि आप सफलता के लिए मानसिक रूप से मात्र 95 प्रतिशत तैयार हैं यानी उस सफलता के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है तो यह स्थिति सफलता के प्रतिशत को शून्य कर देती है। गेरी के गणितीय सिद्धांत के अनुसार समझें तो शून्य का 95 प्रतिशत शून्य होता है।

अधिकतर लोग सफल होने से रह जाते हैं और उनका प्रयास शून्य पर आकर खत्म हो जाता है। हाथ आती है तो सिर्फ असफलता। असफलता की तरह सफलता भी एक गतिशील स्थिति है। आज अगर आप सफल हैं तो कल असफल भी हो सकते हैं। सफल व्यक्तियों ने अपनी सफलता के मूलमंत्र के रूप में एक बात ज़रूरी कही है 'सफलता पाना जितना कठिन है उतना ही कठिन उसे बनाए रखना भी है। ' इस डर से कि आप हार जाएंगे, सफलता के लिए कोशिश न करना सबसे बड़ी हार होगी।

 

2

सफलता के आधार

' संकल्प कीजिए और उस पर पूर्ण निष्ठा से निरंतर

आचरण कीजिए , आप पायेंगे कि सब कुछ संभव है। '

- मोराबी

जागरूकता

आप और दुनिया एक हैं, यह जान लेना ही जागरूकता है। आप जो चाहते हैं वही दुनिया भी चाहती है। यह तभी सत्य हो सकता है, जब आप इसमें विश्वास करें। अगर आप जागरूकता के सही तरीकों का पालन करेंगे तो यह दुनिया भी आपकी योजनाओं को पूरा करने में मदद करेगी। भगवान हमें सपने देता है, किंतु यह आपका उत्तरदायित्व है कि आप इन्हें देखें और साकार करें। यह तय कर लें कि आपका सपना बड़ा है। यहां एक वास्तविक जिंदगी का उदाहरण दिया जा रहा है। ए और बी दोनों समुद्र में जाते हैं। एक अपने साथ एक खाली गिलास ले जाता है और दूसरा एक बाल्टी। आप समझ सकते हैं किसे क्या चाहिए?

विश्वास

विश्वास का संबंध आपके नजरिए से होता है। जैसा कि प्रसिद्ध अमरीकी उद्योगपति हेनरी फोर्ड ने कहा था कि यदि आप विश्वास कर सकते हैं तो भी आप सही हैं या विश्वास नहीं कर सकते ह तो भी आप सही हैं। यह सब आप पर निर्भर करता है।

इसे हम इस कहानी से समझ सकते हैं। एक लड़के ने एक संत को पराजित करने का मन बनाया। इसके लिए उसने एक बेवकूफी-भरी योजना बनाई। उसने सोचा कि मैं संत के पास हाथों में एक पक्षी को लेकर जाऊंगा। चूंकि संत सभी कुछ जानते हैं, इसलिए मैं उनसे पूछंगा कि जो चिड़िया मेरे हाथ में है वह जिंदा है या नहीं। यदि वे जवाब देते हैं कि जिंदा है, तो मैं उसकी गर्दन दबा दूंगा। यदि वे कहते हैं कि वह मर गई है, तो वे गलत साबित हो जाएंगे। उसने अपनी योजना के अनुसार वैसा ही किया। लेकिन संत उसकी चतुराई को समझ गए। उन्होंने कहा कि इस पक्षी की दशा वैसी ही जैसा तुम चाहोगे। ऐसा ही हमारी जिंदगी में होता है। जैसा हम चाहते हैं, वैसा ही हमारा नजरिया बनता है और हम भी वैसे ही बनते हैं।

अनिर्णय

पसंद का संबंध हमारे कर्म से है। आप कभी भी जीत नहीं सकते, यदि आप कोई शुरुआत न करें। एक बहुत ही आलसी इंसान की कहानी है। वह बिना मेहनत किए हुए धनवान बनना चाहता था। उसने भगवान से निरंतर प्रार्थना की कि कृपया मेरी लॉटरी जीतने में मदद करो। भगवान अवतरित हुए और उसकी इच्छा को पूरा करने का आश्वासन किया। वह धैर्यपूर्वक इंतजार करने लगा लेकिन उसकी इच्छा पूरी नहीं हुई। उसने भगवान से फिर प्रार्थना की और कहा कि भगवान! आपने अपना वादा पूरा नहीं किया। भगवान ने कहा कि वत्स! तुम्हें कम से कम लॉटरी के टिकट खरीदने की मेहनत तो करनी ही होगी। तभी तो मैं तुम्हारे बंपर प्राइज जीतने की व्यवस्था कर पाऊंगा।

गीता में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं किअच्छा या बुरा निर्णय सभी सही होते हैं, किंतु अनिर्णय आत्मघाती होगा। इतिहास गवाह है कि अनिर्णय और बिना कर्म के कई महान सपने हमेशा के लिए खत्म हो गए। सफल होने के लिए जरूरी है कि आप सबसे पहले आरामदायक स्थिति से बाहर आ जाएं। घर, रिश्ते, नौकरी और आदतें सभी कुछ आरामदायक होती हैं, किंतु अंत में सभी कुछ आपको मानों आगे बढ़ने से रोकते हैं।

प्रयास

त्याग का मतलब है सभी कुछ समर्पित कर देना। एक बालक एक पत्थर को हटाने का प्रयास कर रहा था। बार-बार की कोशिशों के बाद भी वह सफल नहीं हो सका। थके-हारे बेटे को देख रहे पिता ने पछा 'क्या तुमने सारे प्रयास किए?' बेटे ने कहा- 'हाँ!' पिता ने कहा- 'मुझे लगता तो नहीं है, क्योंकि तुमने मदद के लिए मुझसे नहीं कहा' इस उदाहरण को पढ़कर आप भी सोचिए, कि आप ईश्वर से मदद मांग सकते हैं, क्योंकि उसी ने हमें बनाया हैं। फिर उससे मदद मांगने में संकोच कैसा? अपने सभी प्रयासों में आपको उसे भी अपना भागीदार बनाना चाहिए।

आनंद

संपूर्ण आनंद जरूरी है। सामान्यतया हम कर्म करते हैं, और उसके बाद यदि परिणाम उम्मीद के अनुसार नहीं मिले तो शिकायत करते हैं। जबकि यदि आप थोड़ा भी हासिल करते हैं, तो उसका रोमांच कम नहीं होता है। विद्वानों ने कहा है कि ऐसी स्थिति में हमें अगले कार्य में जुट जाना चाहिए।

 

3

सफलता और परिश्रम

 

' परिश्रमी कभी दरिद्र नहीं रहता , आत्मचिंतक कभी

पापी नहीं हो सकता , मौन रहने से कभी झगड़ा नहीं

होता और सावधान व्यक्ति को भय नहीं सता सकता। '

- चाणक्य

आधुनिक उद्योगपतियों का स्वभाव यूं तो इंसानी फितरत का रंग-बिरंगा नजारा है। कोई बेहद मिलनसार है तो कोई घोर एकांतप्रिय, कोई शाहखर्च है तो कोई पक्का मक्खीचूस, कोई मनमोह लेता है तो कोई महाबोर है। मगर इन सबमें बहुत-सी बातें समान भी होती हैं, जो सफलता की ओर बढ़ने में सहायक होती हैं। जो महत्वाकांक्षा की अनिवार्य योग्यता हैं। यह जानी-मानी बातें हैं कि व्यापार को शिखर तक पहुंचाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। रोजाना बारह घंटे का दफ्तर, दिन के भोजन के समय भी कारोबारी मुलाकातें, रातों में और छुट्टी के दिन भी काम- यह उद्योगपतियों की आम दिनचर्या होती है। परिश्रम ही सफलता का पहला सूत्र है। जिसके लिए काम का नशा चढ़ना जरूरी है।

काम की धुन

विश्वविख्यात भारतीय उद्योगपति जे. आर. डी. टाटा को काम करने का नशा था। वह प्रत्येक कार्य में उत्कृष्टता हासिल करने का प्रयास करते थे और उनकी कार्यशैली में एक विशिष्ट नैतिकता होती थी, जिसने टाटाओं को उद्योग की दुनिया में ऊँचाईयों पर पहुँचाया।

कितने ही उद्योगपति कबूल करते हैं कि उन्हें काम का नशा है। अटलांटा के नौजवान उद्योगपति राबर्ट एडवर्ड टर्नर तृतीय ने एक साक्षात्कार में कहा था, 'मैं घरवालों की सारी आवश्यकताएं पूरी कर चुका हूं, फिर भी कमाए जा रहा हूं। क्यों? क्योंकि यह एक ऐसी मस्ती है, जो छोड़ते नहीं बनती।' यूनाइटेड टेक्नोलॉजीज के चेयरमैन हैरी ग्रे को भयंकर दुर्घटना के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ गया। इस पर उन्होंने फाइलें लेकर अपने सेक्रेटरी को भी वहां बुलवा लिया, और महीनों पीठ के बल लेटे-लेटे काम निपटाते रहे।

रिलायंस उद्योग समूह के संस्थापक धीरूभाई अंबानी ने बहुत थोड़ी संपदा से कार्य आरंभ किया। कम संसाधनों से अधिक उत्पादन तथा हर कार्य में गुणवत्ता को सर्वोपरि रखकर उन्होंने रिलांयस उद्योग को समृद्ध बनाया। इसी तरह मोदी उद्योग के संस्थापक राय बहादुर गूजरमल मोदी और उनके पुत्र भी आगे बढ़े। आधुनिक भारतीय उद्योगपति भी अपनी कार्यशैली से ही दुनिया में कामयाब हुए हैं।

उसकी छुट्टी न हुई जिसको सबक याद हुआ

ये उद्योगपति इस कदर कार्यनिष्ठ होते हैं कि छुट्टी-वुट्टी उनके लिए एक बेहूदगी है। अमेरिकन स्टैंडर्ड इन्कॉर्पोरेटेड के अध्यक्ष विलियम मार्वाड लंबी छुट्टियों के बजाय लंबे वीक एंड्स को पसंद करते हैं। वह कहते हैं, 'चौथा दिन बीतते-बीतते मुझे अकुलाहट होने लगती है।' अटलांटा के फूक्वा इंडस्ट्रीज के संस्थापक जॉन लुक्स फूक्वा एक बार दो सप्ताह की छुट्टी मनाने स्विट्जरलैंड गए, मगर तीन दिन बाद ही दफ्तर लौट आए। बोले, 'महल सारे एक-से होते हैं। एक देखा तो समझो, सभी देख लिए।' विलक्षण कार्यानुरक्ति के लिए उद्योगपतियों को असाधारण ऊर्जा चाहिए। बहुत से होनहार, युवा उद्यमी केवल इसलिए. सफल नहीं हुए कि उनके कस-बल जुदा किस्म के थे। जेरॉक्स के पीटर मैककोलो कहते हैं, 'जल्दी ही यह पता चल जाता है कि कौन दौड़ में पिछड़ जाएगा।' यही बात लिटन इंडस्ट्रीज के टैक्स थार्नटन ने कही है, 'दौड़ने वाले घोड़ों का पालन-पोषण दौड़ के लिए ही किया जाता है। यही बात मनुष्यों पर भी लागू होती है, क्योंकि उद्यम संस्कारों में होता है।'

प्रेरक है सत्ता

सफल उद्यमियों को कड़ी मेहनत की प्रेरणा कहाँ से मिलती है? धन की कामना आदमी को व्यवसाय की ओर उन्मुख करती है, परंतु ऊंचाइयां छूने का प्रेरक धन नहीं होता। यह प्रेरक है सत्ता की लालसा। मानसिटो कंपनी के प्रधान अधिकारी जॉन वेलर हैनली को अब तक याद है कि किशोरावस्था से ही वे दूसरों से मनचाहा काम करा लेने की फिराक में रहते थे। शुरू-शुरू में जब वे सोडा वाटर की दुकान पर काम करते थे, तब भी वे ग्राहकों से माल्टमिश्रित मिल्क शेक में अंडा डालकर पीने का आग्रह करते रहते थे। डोनाल्ड वेल्सन फ्राई अपने परिश्रम के बल पर 44 वर्ष की आयु में फोर्ड मोटर्स के ग्रुप- वाइस प्रेजीडेंट बन गए, पर उन्हें तसल्ली नहीं हुई। वे कहते थे, 'मुझे एक पूरा कारोबार खुद चलाना है।' अंततः फोर्ड को छोड़कर वे बेल एंड हाबेल के प्रधान अधिकारी बन बैठे। यह कंपनी फोर्ड के मुकाबले बित्ते-भर की थी, मगर पूरी की पूरी उनके अधीन थी।

जबर्दस्त जिज्ञासु

उद्योगपति जबर्दस्त जिज्ञासु होते हैं। होनहारों का गुण उनके करियर के प्रारंभ में ही स्पष्ट हो जाता है- वह कभी भी अपनी जगह पर नहीं बैठते। वह दूसरे विभागों में घूमता, लोगों से सवाल-जवाब करता, उन्हें परामर्श देता, तंग करता रहता है। एटी एंड टी के पूर्व प्रधान अधिकारी जॉन डिवट्स कई बार मेंटनेंस विभाग के कर्मचारियों के साथ टेलीफोन लगाने या तारों की मरम्मत में उनका हाथ बंटाते रहते। 'फायूँन' में प्रकाशित उनके एक उपाध्यक्ष का संस्मरण है: "बॉस और मैं एक कमरे के सामने से गुजरे। मैंने पूछा, जॉन साहब, पता नहीं ये सब क्या हो रहा है! इस पर वे जरा तेज आवाज में बोले, 'पर मैं जानता हूं वे क्या कर रहे हैं।'

उद्योगपतियों की कुछ और विशेषताएं भी होती हैं। मौका न चूकने के मामले में वे लाजवाब होते हैं। निहायत चौकस- एकदम घात में। निजी फायदे का कोई भी मौका उनके हाथ से नहीं निकल सकता। इस सबके अलावा, ये लोग सच्चे अर्थों में आस्थापात्र होते हैं। अपने काम में, अपने माल में, अपनी कंपनी में और निरंकुश उद्योग प्रणाली में उन्हें गहरी आस्था होती है। और क्यों न हो, इसमें उन्हें सफलता जो मिली है!

 

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सफलता के लिए सुनिए

' यदि आप सिर्फ बोलना जानते हैं , तो कभी सफल नहीं हो सकते। '

- विंस्टन चर्चिल

सुनना एक कला है, जिसे अपने भीतर विकसित किया जाए तो इससे जीवन में सफलता की सीढ़ियां चढ़ना आसान हो सकता है। जिस व्यक्ति में सुनने की कला या 'लिसनिंग स्किल' होती है। वह दूसरों के साथ बेहतर संवाद स्थापित करने में हमेशा सफल होता है।

सुनना एक जटिल संवाद प्रक्रिया है, जो ध्वनि तरंगों को सुन लेने मात्र से अधिक है। इस दौरान वक्ता और श्रोता की शारीरिक व मानसिक उपलब्धि, वक्ता द्वारा श्रोता तक संदेश का सही प्रतिपादन, श्रोता द्वारा संदेश को याद रखे जाने और उस पर श्रोता की प्रतिक्रिया आदि कुछ बातें अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

शोधों से पता चला है कि एक सामान्य व्यक्ति दिन-भर में बोलने से दो गुना व लिखने या पढ़ने से पांच गुना अधिक बातें सुनता है। दिनभर के कार्य में औसतन हम 80 प्रतिशत समय संवाद में व्यतीत कर देते हैं। इसमें से भी 45 प्रतिशत समय मात्र सुनने में ही व्यतीत होता है।

अच्छे श्रोता होने के महत्त्व को जानने से पहले यह समझना जरूरी हैं कि हम दूसरों से बातें क्यों करते हैं। आइए जानते हैं मौखिक संवाद के चार मूल उद्देश्यों को -

1. अपना परिचय देने के लिए अथवा नया संबंध स्थापित करने के लिए।

2. अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए।

3. किसी को जानकारी प्रदान करने के लिए।

4. अपनी बात मनवाने के लिए।

आइए, अब देखते हैं कि अच्छे श्रोता में क्या गुण होने चाहिए।

· अच्छे श्रोता हमेशा वक्ता की बातों से अपने काम की बात ग्रहण कर लेते हैं।

· अच्छे श्रोता वक्ता की रीति या शैली की जगह उसकी बातों में निहित संदेश और उसके अर्थ पर ध्यान देते हैं. जबकि सामान्यत: लोग वक्ता के बात करने के तरीके पर ध्यान देते हैं।

· अच्छे श्रोता वक्ता की बात पूर्ण होने तक उसे सुनते हैं जबकि सामान्य व्यक्ति बीच में ही अपनी बात करने लगते हैं।

· अच्छे श्रोता अपनी पुरानी जानकारी से वक्ता के संदेश को जोड़ने का प्रयास करते हैं जबकि सामान्य व्यक्ति सिर्फ सुनते-भर हैं।

· एक अच्छा श्रोता न केवल बातें सुनता है बल्कि वक्ता के हाव-भाव और आवाज की तीव्रता पर भी ध्यान देता है।

· एक अच्छा श्रोता बात पूर्ण हो जाने के बाद उस पर विचार करता है और अपने काम की बातें याद रख लेता है।

इस तरह हमें सफल जीवन के लिए स्वयं के भीतर एक अच्छे श्रोता के गुण विकसित करने चाहिए। याद रखें, वक्ता भी एक अच्छे श्रोता से प्रभावित होता है और अपने मन में उसके प्रति सम्मान रखता है।

 

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सकारात्मक सोच

और सफलता

' सद्गुणियों के सान्निध्य से व्यक्ति में गुणों का विकास होता है।

दुष्टों की संगति से विनाश निश्चित है। '

- गोस्वामी तुलसीदास

सकारात्मक सोच, आपको जीवन के हर मोड़ पर कुछ-न-कुछ सकारात्मक देती है तो सकारात्मक सोच अकारण और निराधार नहीं होती, इस सोच को योजनाबद्ध रूप से विकसित किया जा सकता है। आइए देखें कि इसके लिए कौन-से तत्व आवश्यक है?

धैर्य रखें

धैर्य सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है। अगर आपमें धैर्य की भावना है, तो स्वाभाविक है कि आपके मन में कभी नकारात्मक विचार नहीं आ सकते। अक्सर हम- 'मुझे यह अवसर नहीं मिला', 'काश! मेरा बच्चा पढ़ाई में तेज होता।' 'अमुक की नौकरी चली गई, अब क्या होगा?' -ऐसी बातों के लिए हम दुख व्यक्त करते हैं। ऐसा रोना रोने से कुछ हासिल नहीं होता। अगर आप ऐसे मोड़ पर धैर्य बरतेंगे और परिस्थिति से निबटने का रास्ता खोजें, तभी उस चिंता को दूर कर सकेंगे।

आशावादी बनें

आशाएं ही सफलता की सीढ़ी तक आपको पहुँचाती हैं, निराशा सिर्फ कुंठाओं से भर देती है। 'मैं क्यों नहीं कर सकता', 'इस बार अवसर मुझे ही मिलेगा' आप ऐसी सोच से ही आगे बढ़ सकते हैं। यह न सोचें कि मेरी किस्मत ही अच्छी नहीं, सारी दुनिया को मुझसे समस्या है। आशावादी बनकर तो देखें। आपकी सारी समस्याएं खुद-ब-खुद दूर हो जाएंगी।

संतोष रखें

जिस घड़ी आप अपने भीतर संतोष का भाव पैदा कर लेंगे, उसी पल से आप सकारात्मक सोचने लगेंगे और अनावश्यक तनाव से बचेंगे। जो मिला है, जितना मिला है- उसमें संतोष बरतें। कहते हैं कि संतोष में ही परम सुख है, संतोष से बढ़कर कुछ भी नहीं। अवसाद की स्थिति से बचने के लिए संतोष एकमात्र उपचार है।

प्रेरणा की शक्ति को पहचानें

हर कोई अपने जीवन में किसी न किसी से प्रेरित होता है। ऐसे लोगों से प्रेरणा लीजिए जो जीवन को जिंदा-दिली और खुशहाली से जीना जानते हैं। हर व्यक्ति के भीतर कुछ न कुछ अच्छाईयां जरूर होती हैं। कोई व्यक्ति व्यवस्थित होता है तो कोई धैर्यवान, कोई सकारात्मक सोच रखता है तो कोई जागरूक होता है, आप उन गुणों व अच्छाइयों से प्रेरित होकर अपने भीतर भी सकारात्मक भाव पैदा करें।

लक्ष्य निर्धारित करें

अगर आपका लक्ष्य निर्धारित हो तो आपको निराशा या विफलता का मुँह देखना नहीं पड़ता। आपको क्या काम करना है, कैसा घर बनाना है? यह निर्धारित करना आवश्यक है। साथ ही उसका विकल्प भी तैयार रखना जरूरी होता है। लक्ष्य स्पष्ट हो तो उसे पाना आसान हो जाता है। अस्पष्ट लक्ष्य रखने वाले ऐसा ही सोचते हैं कि मैं इंजीनियर नहीं बना तो डॉक्टर बनूंगा वरना संगीतज्ञ बन जाऊंगा और वह भी न बना तो दुकान खोल लूंगा। इससे वे किसी भी लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाते।

आदर्श बनें

अपने व्यक्तित्व को ऐसा बनाएं कि दूसरे आपको अपना आदर्श मानें। जब आप कठिन परिस्थितियों में भी अपना मानसिक संतुलन बनाए रखेंगे, हर हाल में प्रसन्न रहेंगे, दूसरों के सुख-दुःख में उनकी मदद करने को हमेशा तत्पर रहेंगे तो आप किसी आदर्श व्यक्ति से कम नहीं होंगे। सोचिए, आखिर आप अपने माता या पिता या गुरु को अपना आदर्श क्यों मानते हैं? उनमें जरूर ऐसे गुण होंगे जो हर किसी को प्रभावित करते होंगे। तो क्यों न आप भी दूसरों के लिए आदर्श बनें।

विजेता बनें

विजेता बनने के लिए आप अपना सुनिश्चित लक्ष्य सामने रखें, लेकिन अगर सफलता हासिल न हो तो निराश न हों। दोबारा दोगुने उत्साह के साथ उसके लिए जुट जाएं। विजय और पराजय जीवन में लगी ही रहती है। असफलता मिलने पर निराश होकर न बैठ जाएं। खुद को समझाएं, बार-बार कहें कि हम होंगे कामयाब एक दिन।

सहज बनें

जो लोग सहज जीवन जीते हैं, उन्हें कभी भी नकारात्मक विचार नहीं घेरते। बनावटी जीवन जीने से बेहतर होगा कि वास्तविकता में जिएं। इससे कभी भी आपको समस्याओं का सामना कम करना पड़ेगा। घर-परिवार से लेकर व्यावसायिक जीवन तक सहजता जरूरी है। असहजता न सिर्फ आपकी सफलता के मार्ग में बाधक होती है बल्कि आपके इस व्यवहार से दूसरे भी परेशान होकर किनारा कर लेते हैं।

 

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सफलता के लिए संघर्ष

 

' संघर्षों से समस्याओं का समाधान नहीं होता , परंतु व्यक्तिगत असफलता के लिए विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष अवश्य करना चाहिए। '

- अटल बिहारी वाजपेयी

जैसे आप अपने धन का सदुपयोग करते हैं, वैसे ही समय का भी करें। क्या आप जानते हैं कि सत्तर वर्ष का जीवन कैसे बिताया जाता है? औसतन, पच्चीस वर्ष सोने में, आठ वर्ष पढ़ाई-लिखाई में, छह वर्ष आराम और बीमारी में, सात वर्ष छुट्टियों और मौज-मस्ती में, पांच वर्ष दैनिक यात्रा में, चार वर्ष खाने में और तीन वर्ष अस्थाई कामों में, यानी इन सबकी तैयारी में इसके बाद प्रभावी कार्य के लिए केवल बारह वर्ष बचते हैं।

एक अमेरिकी करोडपति चार्ल्स स्कवैब ने 1936 में अपने एक सलाहकार को 25 हजार डॉलर दिए और उससे कोई अनमोल सलाह मागी। सलाहकार ने कहा, ' अपने दिन की शरुआत उन कार्यों की सूची से कर जो आवश्यक हैं और बहुत - से मामूली कामों में से कुछ अत्यंत महत्त्वपूर्ण कामों को वरीयता दें। ' उस सलाहकार ने चार्ल्स स्कवैब को जो सूची दी उसके महत्वपूर्ण बिंदु यहां आपको ये बिंदु पंसद आते हैं? क्या आपने इन्ह अपने जीवन में अपना रखा है?

  • निर्णय न ले पाना महंगा है, बहुत ही महंगा।
  • विफलताओं से सीखिए, लेकिन उनसे व्याकुल मत होइए।
  • खाली बोरी कभी भी सीधी खड़ी नहीं हो सकती।
  • जो झिझकता है, वह हारता है।

· एक समझदार आदमी तब बोलता है। जब दूसरे अपनी बात पूर्ण कर चुके होते हैं।

· एक खुले बटुए की अपेक्षा एक खुला दिमाग ज्यादा धन-दौलत इकट्ठा करता है।

· आपको साधारण काम करते समय अधिक चौकन्ना रहने की जरूरत है।

· छोटी-छोटी नगण्य बातों से बड़े और प्रभावशाली निष्कर्ष निकालना ही जीवन की कला है।

· अगर आप एक बार में सफल न हों, तो एक बार फिर प्रयास करें, उसके बाद कुछ और कोशिशें करें।

  • कोई भी जन्म से बुद्धिमान नहीं होता, लेकिन सीखने से बुद्धिमान बन जाता है।

· केवल मशीनरी ही पुरानी नहीं हो जातीं। दिमाग को भी पुराना पड़ने। से बचाने की जरूरत है।

· अगर आप आज भी इतने कोमल हैं कि आपको स्वयं पर लज्जा होती है तो आप ईश्वर का धन्यवाद अदा कीजिए और उससे कहिए कि वह आपको ऐसा ही रखे।

· अगर आप अपने दिमाग को इन तीन बातों: काम करने, बचत करने और सीखने के लिए तैयार कर लेते हैं, तो आप इस दुनिया में उन्नति कर सकते हैं।

  • प्रभाव एक बचत खाता है, जिसे आप जितना कम इस्तेमाल करते हैं, उतना ही ज्यादा आप उसे पाते हैं।

· अपनी सफलताओं से सीखें ताकि आप उन्हें दोहरा सकें, अपनी विफलताओं से सीखें ताकि आप उन्हें दोबारा न कर सकें।

· इस बात पर विचार करते रहिए कि सर्वश्रेष्ठ भी श्रेष्ठ बन सकता है और श्रेष्ठ बन सकता है सर्वश्रेष्ठ।

  • अपने मूल सिद्धांतों की समीक्षा करते रहिए।

· सही काम करने के लिए आपको सही देखना होगा और सही ही अनुभव करना होगा।

ऐसे प्रयास करें कि असफलता असंभव हो जाए

· आने वाले कल में ही जीवन का सबसे बड़ा रोमांच है।

· मशीनों को काम करना चाहिए। इंसानों का कार्य सोचना और निर्णय लेना है।

· कनेक्शन न होने पर अधिकतर तार बेजान हो जाते हैं।

· सफलता, विफलता के विपरीत नहीं है। एक धावक चाहे आखिर में ही लक्ष्य पर क्यों न पहुंचे, अगर वह अपना रिकार्ड भी तोड़ता है तो वह सफल है।

· ज्यादातर लोग दूसरों की अपेक्षा अपने लिए अधिक सम्मान की आशा करते हैं।

  • ईर्ष्या और कुछ नहीं अपना ही दिल जलाती है।

· अगर संकेत मिल जाएं तो एक बड़ा कदम उठाने से घबराएं नहीं, क्योंकि आप एक चौड़ी खाई को दो छोटी छलांगों में पार नहीं कर सकते।

· बेकार की चीजों को भूल जाने की कोशिश कीजिए। हर चीज को याद रखने का मतलब है अपने दिमाग को एक कूड़ेदान बनाना।

  • छोटी-छोटी बातों में समय मत गंवाइए।

· जब तक आप हर रोज अपने काम से नहीं जूझते तब तक आप अपने काम को संतोषजनक ढंग से नहीं कर सकते।

जब कभी आप हताश हों , तो माथे पर हाथ धरकर बैठे नहीं , कुछ प्रयास करें।

· क्रोध, प्रतिशोध की भावना की तरह, एक ऐसा पेय है जिसे ठंडा ही लिया जाए तो बेहतर है। धीमी आवाज में थोड़ी-सी नाराजगी भी चमत्कार कर सकती है। यह काम मुश्किल तो है, पर असंभव नहीं।

  • किसी के पीछे मत चलिए, लेकिन सीखिए सबसे।

· प्रबंधन रुकावटों की वह श्रृंखला है जो बाधाओं से घिरी है। बाधाओं को कम करना सीखिए।

  • जिसके पास अच्छे मित्र हैं, उसे दर्पण की जरूरत नहीं होती।

· यदि आप पहाड़ों को हिलाना चाहते हैं तो पहले पत्थरों को हिलाना सीखिए।

• शंकाओं और सुझाओं से आपको कभी हानि नहीं होती। उनको सहजता से ग्रहण करें।

• सलाह को एक सैंडविच की तरह लें, उसकी दो स्लाइस को दो शंकाएं समझें।

• जब दूसरों को बदलना असंभव हो, तो स्वयं में परिवर्तन लाएं।

· हम समय बचाने के लिए काम जल्दी निपटा लेते हैं और बचे हुए समय का हम क्या करते हैं?.... हम उसे व्यर्थ नष्ट कर देते हैं।

  • अपने बारे में सोचने से पहले तीन मिनट लें।

• हारने वाले जो काम नहीं करना चाहते, विजेता उन्हीं कामों को करने की प्रवृत्ति रखते हैं।

• एक आदमी इस बात से दुःखी नहीं होता कि क्या होगा, बल्कि इस बात से दु:खी होता है कि क्या हो गया।

· कभी भी यह मत कहिए कि आपके पास समय नहीं है. आपके पास भी हर दिन उतने ही घंटे हैं जितने कि संसार के सभी महापुरुषों और अत्यंत सफल व्यक्तियों के पास थे।

· अगर मेरे पास एक पेड़ काटने के लिए आठ घंटे है तो मैं छह घंटे अपनी कुल्हाड़ी तेज करने में लगाऊंगा। तो आपके मन में उठी जीतने की इच्छा भी किसी काम की नहीं। अगर आपमें तैयारी करने की इच्छा नहीं है। गगनचुंबी इमारतों को बनाने में तो सिर्फ एक साल लगता है, लेकिन योजना बनाने में कई साल लग जाते हैं।

• घिसी-पिटी बातें थके-हारे लोगों के लिए हैं। हमारे जीवन का रूप वही होता है, जो हमारे विचार उसे देते हैं।

• अक्लमंद काम करने से पहले सोचता है और मूर्ख काम करने के बाद।

• हमारा हर विचार हमारा भविष्य बना रहा है।

· अच्छे के लिए बदलाव हमेशा सोच में बदलाव से शुरू होता है। आपका दिमाग जहां जाता है। शक्ति भी वहीं बहती है।

· आप क्या चाहते हैं? अगर यह स्पष्ट हैं तो उसे पाने के लिए आपमें उतनी ही ज्यादा शक्ति आ जाती है।

 

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लक्ष्यों की प्राप्ति कैसे करें ?

 

' चलना आरंभ कीजिए , लक्ष्य मिल ही जायेगा। '

- विनोबा भावे

इतिहास उन्हें ही याद रखता है जो असंभव लक्ष्य निर्धारित करते हैं और उन्हें प्राप्त करते हैं। अतः हर व्यक्ति के मन में लक्ष्य निर्धारित करने व उसे प्राप्त करने की कामना होती है। लेकिन यह देखने में आता है कि प्रायः हम अपने निर्धारित लक्ष्यों से भटक जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें क्या करना चाहिए।

लक्ष्य पहचानें

अपने जीवन अथवा किसी कार्य विशेष से आप क्या प्राप्त करना चाहते हैं, अगर एक बार आपके सामने यह बात स्पष्ट हो जाए तो आपका लक्ष्य अपने आप स्पष्ट हो जाएगा।

लक्ष्य को हमेशा याद रखें

अगर एक बार लक्ष्य निर्धारित हो जाए तो हमेशा उसे याद करते . रहें, ताकि वह आपकी कार्यसूची में उपयुक्त स्थान पाता रहे।

रूपरेखा तैयार करें

लक्ष्य तक पहुंचने के लिए किन-किन बातों की आवश्यकता होगी, इसकी एक रूपरेखा तैयार कर लें। इसके साथ ही आप अधिकाधिक जानकारी एकत्र करें, ताकि रूपरेखा में कोई खामी न हो।

 

योजनाबद्ध तरीके से कार्य करें

लक्ष्य प्राप्ति के लिए उठाया गया हर कदम सुनियोजित और व्यवस्थित होना चाहिए, ताकि आप अपने लक्ष्य जल्द से जल्द प्राप्त कर पाएं। इसके लिए आप एक योजना बनाएं व उसके अनुरूप कार्य करना आरंभ करें। हर काम को छोटे-बड़े हिस्सों में बांट लें तथा हर हिस्से पर स्वतंत्र रूप से एक के बाद एक काम करें। ऐसा करने से कठिन से कठिन कार्य आसान प्रतीत होगा।

कार्यों का मूल्यांकन करें

अपने प्रत्येक कार्य पर विचार करें और इस बात का मूल्यांकन करने का प्रयास करें कि इसमें आप कितने सफल हुए हैं।

खुद की सराहना करें

अपनी हर उपलब्धि पर, चाहे वह छोटी से छोटी क्यों न हो, खुद की सराहना अवश्य करें। इसके आपके अंदर आत्मविश्वास का संचार होगा और आप अगला कार्य ज्यादा बेहतर ढंग से कर पायेंगे।

इन बातों के अलावा खुद को हमेशा यह समझाते रहें कि सफलता प्राप्त करना कठिन जरूर है लेकिन असंभव नहीं। जीवन में उतार-चढ़ावं आते-जाते रहते हैं, परंतु वे हर बार कुछ न कुछ सीख देते हैं। याद रखें- ' असफलता ही सफलता की दहलीज़ है।'

 

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सफलता को टिकाऊ कैसे बनाएं

 

' सदाचारी , श्रद्धावान , परिश्रमी और ईर्ष्यारहित व्यक्ति

की सफलता स्थायी होती है तथा सदा जीवित रखती है। '

- मनुस्मृति

 

लोग सफल तो होना चाहते हैं, लेकिन उसके स्थायित्व को लेकर कम ही लोग मेहनत करते हैं। क्या सफलता का स्थायित्व अच्छे गुणों और मेहनत की कमाई पर निर्भर करता है? क्या गलत तरीकों से पाई सफलता बाद में पश्चाताप कराती है और फिर इंसान ठहर जाता है। सफलता को टिकाऊ बनाने का मंत्र कम ही लोगों को पता होता है क्योंकि यह प्रेरणा की कम, स्व-अनुभव की बात ज्यादा है। इसके पीछे कई कारण और तर्क भी गिनाए जाते हैं। हर व्यक्ति अपनी योग्यता और परिस्थितियों के अनुसार इन्हें अनुभव भी करता है, लेकिन फिर भी चाहकर सफल नहीं हो पाता।

1. वैज्ञानिक विश्लेषण

वैज्ञानिक अपने अध्ययन से कहते हैं कि हर सफल व्यक्ति जब सफलता का स्वाद चख लेता है, तो उसकी पहली प्रतिक्रिया खुद को भूल जाने की होती है। इसका कारण यह है कि उसे ध्यान रहता है कि वह कभी एक साधारण असफल व्यक्ति था और आगे भी वैसा ही बना रह सकता है। इसके पीछे इसकी सोच और सोच के पीछे कुछ रसायनों का भी हाथ होता है, जो उसके शरीर से स्रावित होते हैं। अमरीका की जार्ज वाशिगंटन यूनिवर्सिटी के मस्तिष्क विज्ञानी डॉ. रिचर्ड रेस्तेक का विश्लेषण है कि हर सफल और असफल व्यक्ति के शरीर में उत्तेजना का अलग-अलग ढंग होता है। यह उत्तेजना हार्मोंस और तंत्रिका तंत्र के कारण होती है। डा. रिचर्ड कहते हैं कि मस्तिष्क में स्थित हाइपोथेलेमस और किडनी के ऊपरी भाग में उपस्थित एड्रीनलिन ग्रंथि शरीर की सभी गतिविधियों के साथ-साथ सोच और विचारों को नियंत्रित करते हैं। एक सफल व्यक्ति उसकी सोच से संचालित होता है, और ठीक ऐसा ही असफल व्यक्ति के साथ होता है। सफल बनने के बाद वह सफलता को जीता है, लेकिन धीरे-धीरे सफलता का स्तर कम होता जाता है। इस स्थिति से वही व्यक्ति उबर सकता है जो नए लक्ष्य बनाता है और उसके अनुसार प्रयास करता है। इसे समझने के लिए मैं यहाँ एक उदाहरण देता हूँ।

प्राचीन भारत में बिना सुविधाओं, बिना संदर्भो और धन अभाव के बावजूद ऐसी खोजें और अविष्कार हुए जिन पर दुनिया गर्व महसूस करती है। लेकिन, आधुनिक काल में ऐसी सफलता गिने-चुने लोगों को ही मिली। आर्यभट्ट, चरक सुश्रुत, पतंजलि जैसे विद्वानों के कार्य आज भी उपयोगी हैं। इसे सफलता के वैज्ञानिक विश्लेषण से जोड़कर देखा जाए तो एक निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि उन आदि विद्वानों की सोच और शरीर इस ढंग से सधा हुआ था कि वे उससे टिकाऊ सफलता पाते थे। इसके पीछे सुविधाएं नहीं मस्तिष्क की उर्वरता थी जो उन्हें महान काम करने के लिए प्रेरित करती थी। यह सब प्राकृतिक ढंग से सद्प्रयासों द्वारा होता था, लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं है। इसलिए सफलता के स्थायित्व का प्रतिशत भी उसी अनुपात में कम है। ऐसे में जो समाधान निकलता है वह यही है कि - मस्तिष्क की क्षमता और सफलता का प्रतिशत बढ़ाने के लिए संयमित जीवनशैली सबसे उपयुक्त है। यह हमारे प्राचीन भारतीय मनीषियों द्वारा जांचा - परखा अनुभव भी है। यदि आपको सफल बनना है या बने रहना है तो अपनी जीवनशैली को संयमित कर शरीर को साधिए, आपको टिकाऊ सफलता मिलेगी।

2. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

मनोवैज्ञानिक विश्लेषण सफलता को स्थायी बनाने के लिए पूरी तरह से सोच को जिम्मेदार मानता है। मशहूर मनोवैज्ञानिक और मोटिवेशनल गुरु व मशहूर किताब'साइकोलॉजी ऑफ विनिंग' के लेखक डॉ. डेनिस वेटली का अनुभव है कि सोच और प्रयासों का सामंजस्य ही किसी सफल व्यक्ति को आगे भी सफल बने रहने की गारंटी देता है।

वेटली कहते हैं कि चैंपियन जन्म से ही चैंपियन होते हैं, लेकिन वे भी अपने पूर्वाग्रहों, प्रदर्शन और प्रतिक्रियाओं से अधूरे रह जाते हैं। हारने वाले लोग भी हारने के लिए जन्म नहीं लेते। वे अपने वातावरण और, निर्णयों पर अपनी प्रतिक्रियाओं के कारण उसी रूप में स्वचालित होते हैं। मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है कि सफलता का नियंत्रित विश्वास एक ऐसी विशेषता है, जो हर विजेता की पहचान होती है। अगर आपकी सफलता बाहरी लोगों पर निर्भर करती है तो आप स्थायी चिंता का शिकार बनेंगे। सच्चाई यह है कि आप कभी भी लंबे समय तक जीत नहीं सकते, जब तक कि आपकी सफलता का विश्वास अच्छे प्रदर्शन पर निर्भर नहीं करता। यह सच है कि प्रतिभा, सुंदरता और अन्य विशेषताएं सभी को समान रूप से नहीं मिलती लेकिन प्रयास करने की छूट सबको होती है।

वेटली की बात को समर्थन स्थायी सफलता के मनोविज्ञान को दो पीढ़ियों की तुलना करके भी दिया जा सकता है। चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य को लें या आज के दौर के मशहूर शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान को, सफलता का स्थायित्व दूसरी पीढ़ी तक आते-आते बिखरता देखा गया। सम्राट चंद्रगुप्त के उत्तराधिकारी भी पिता की सफलता को स्थायी नहीं रख पाए और बिस्मिल्लाह ख़ान का सगा उत्तराधिकारी भी कोई बड़ा संगीतज्ञ नहीं हुआ। मनोवैज्ञानिक रूप से ऐसा शायद इसलिए है कि सफलता का विराट रूप ही उसके स्थायित्व के लिए नकारात्मक बन जाता है।

इसका अर्थ है कि इसका समाधान पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थायित्व परिवेश और परवरिश पर निर्भर करता है। सफल व्यक्ति के बच्चे सफल तभी बन सकते हैं, जबकि परिवार में सफलता को योग्यता और समझदारी से प्राप्त हुआ समझा जाए। सफलता पाने का संघर्ष एक-दो पीढ़ी तक चलता है। तीसरी पीढ़ी चाहे तो उसे स्थायी परंपरा बना सकती है। परिवार विशेषज्ञ भी कहते हैं कि उन परिवारों के बच्चे ज्यादा सफल होते हैं, जहां एकजुटता और रिश्तों में समर्पण का भाव होता है।

अपने ही देश में इसके कई उदाहरण राजनीति, फिल्म उद्योग और कला के क्षेत्र में सफल माता-पिता की संतानों के भी बहुत सफल होने से समझे जा सकते हैं। चाहें तो आप डॉ० हरिवंशराय बच्चन के पुत्र अमिताभ बच्चन और पौत्र अभिषेक का दृष्टांत लें अथवा अंबानियों, गोदरेजों, बिरलाओं की परंपरा देखें। यह बात अलग है कि राजनीतिज्ञों के परिजनों के आगे आने पर लोगों को आपत्ति ज़रूर होती है।

3. स्व विश्लेषण

कहा जाता है कि कामयाबी नेक इंसान की नेक कोशिशों का परिणाम होती है। नेकनीयत और ईमानदारी को सफलता की पहली सीढ़ी भी कहा जाता है। नैतिक गुण व्यक्ति को सफलता का सही पात्र और उपभोगकर्ता बनाते हैं। अच्छे नैतिक गुण मिलकर जिस चरित्र की रचना करते हैं, वह सफलता के लिए ही बना होता है। सफलता यदि नैतिक गुणों की बुनियाद पर खड़ी होती है तो उसमें स्थायित्व अपने आप आ जाता है। नैतिकता को आधार बनाते हुए किए गए एक सर्वेक्षण में सामने आया है कि सफलता को केवल वे 50 फीसदी लोग ही आगे बढ़ा पाते हैं, जिनका चरित्र बेदाग होता है। निष्कर्षों में यह भी पाया गया कि दागदार लोग भी सफल होते हैं, लेकिन एक दौर के बाद उनकी सफलता की चमक खो जाती है। वे खुद को अपराधी महसूस करने लगते हैं और पश्चात्ताप से पीडित रहते हैं। महान विद्वान आचार्य चाणक्य ने भी अपने ग्रंथ अर्थशास्त्र में सफलता के लिए चारित्रिक गुणों की जरूरत बताते हुए कहा है कि 'सफलता पाना सबके हाथ में है , लेकिन उसे बनाए रखमा चरित्रवान के हाथ में ही है। ठीक वैसे ही जैसे घोर को मिला खजाना उसे चोर ही बनाए रखता है जबकि ईमानदार आदमी को मिला खजाना उसे धनवान बना देता है।

इस तथ्य को इस उदाहरण से समझे - रामेश्वरम जैसे छोटे से कस्बे के एक अत्यंत निर्धन परिवार के बेटे का महान वैज्ञानिक और देश का राष्ट्रपति बनना चारित्रिक गुणों की बेहतरीन मिसाल है। डा. .पी. जे. अब्दुल कलाम के संदर्भ में कहा जा सकता है कि नैतिक गुण ही इंसान को श्रेष्ठ बना सकते हैं। नैतिक गुणों को ताक पर रखकर सफलता पाने वालों की तो कोई कमी नहीं है, लेकिन वे क्षणिक पुंज होते हैं, जबकि चरित्रवान होते हैं, चमकते सूरज।

इसका अर्थ है कि ज्यादातर लोग सफलता के लिए संघर्ष के रास्ते में चरित्र को अनुपयोगी मानते हैं, लेकिन यह अकाट्य सत्य है कि इंसानी चरित्र ही उसकी सफलता की पहचान है। यदि आपका चरित्र अच्छा है तो आपको मेहनत करने में कोई शर्म नहीं आएगी। इसका मतलब यह भी है कि आपको योग्य बनने से कोई नहीं रोक सकता, और जब आप योग्य बन गए, तो सफलता पाना और उसे बनाए रखना कोई मुश्किल काम नहीं।

4. आर्थिक विश्लेषण

बीसवीं सदी के मशहूर ब्रिटिश लेखक और चिंतक जार्ज बनाई शॉ ने अपनी किताब 'द ईटेशनल थॉट' में एक जगह लिखा है, ' निश्चित रूप से दुनिया में पैसा सबसे महत्वपूर्ण है और हर सफल व्यक्ति की आवाज से बोलता है , लेकिन इसमें संदेह है कि यह आवाज कभी बूढ़ी न हो। ' इसी तरह गोस्वामी तुलसीदास ने भी साधक को साधन और साध्य से ऊपर बताते हुए कहा है कि, सफलता साधक की साधना में होती है , सापन में नहीं। हालांकि इससे भी इनकार नहीं कि सफलता की सोच के रास्ते में पहला कांटा आर्थिक संकट का चुभता है, लेकिन यदि लक्ष्य निश्चित हो और कर्ता को अपने ऊपर भरोसा हो तो अर्थ संकट का समाधान हो जाता है। दुनिया में ऐसे सैकड़ों उदाहरणों से किताबें भरी पड़ी हैं जो बताती हैं कि सफलता के दरवाजे की कुंजी धनवान के नहीं, जुझारू इंसान के हाथ पहले लगती है। सफलता की सीढ़ियां धन के ढेर पर जाकर खत्म होती है, ऐसा प्रचार