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वैचारिकी

कर्मयोग
स्वामी विवेकानंद


कर्म का चरित्र पर प्रभाव

' हरेक अपने क्षेत्र में महान् है '

कर्म का रहस्य

कर्तव्य क्या है ?

हम स्वयं अपना उपकार करते हैं , संसार का नहीं

अनासक्ति ही पूर्ण आत्मत्याग है

मुक्ति

कर्मयोग का आदर्श

 

कर्म का चरित्र पर प्रभाव

कर्म शब्द 'कृ' धातु से निकला है; 'कृ' धातु का अर्थ है करना। जो कुछ किया जाता है, वही कर्म है। इस शब्द का पारिभाषिक अर्थ 'कर्मफल' भी होता है। दार्शनिक दृष्टि से इसका अर्थ कभी-कभार वे फल होते हैं, जिनका कारण हमारे पूर्व कर्म रहते हैं। परंतु कर्मयोग में 'कर्म' शब्द से हमारा आशय केवल 'कार्य' ही है। मानव जाति का चरम लक्ष्य ज्ञानलाभ है। प्राच्य दर्शनशास्त्र हमारे सम्मुख एकमात्र यही लक्ष्य रखता है। मनुष्य का अंतिम लक्ष्य सुख नहीं, वरन् ज्ञान है। सुख और आनंद विनाशशील है। अत: सुख को चरम लक्ष्य मान लेना भूल है, संसार में सब दु:खों का मूल यही है कि मनुष्य मूर्खतावश सुख को ही अपना आदर्श समझ लेता है। पर कुछ समय के बाद मनुष्य को यह बोध होता है कि जिसकी ओर वह जा रहा है, वह सुख नहीं, वरन् ज्ञान है, तथा सुख और दु:ख दोनों ही महान् शिक्षक हैं, और जितनी शिक्षा उसे शुभ से मिलती है, उतनी ही अशुभ से भी। सुख और दु:ख आत्मा के सम्मुख होकर जाने में उसके ऊपर अनेक प्रकार के चित्र अंकित कर जाते हैं। और इन संस्कारों को समष्टि के फल को ही मानव का 'चरित्र' कहा जाता है। यदि तुम किसी मनुष्य का चरित्र देखो, तो प्रतीत होगा कि वास्तव में वह उसकी मानसिक प्रवृत्तियों एवं मानसिक झुकाव की समष्टि ही है। तुम यह भी देखोगे कि उसके चरित्र-गठन में सुख और दु:ख, दोनों ही समान रूप से उपादानस्वरूप हैं। चरित्र को एक विशिष्ट ढाँचे में ढालने में शुभ और अशुभ, दोनों का समान अंश रहता है, और कभी-कभी तो दु:ख सुख से भी बड़ा शिक्षक हो जाता है। यदि हम संसार के महापुरुषों के चरित्र का अध्ययन करें तो मैं कह सकता हूँ कि अधिकांश दृष्टांतों में हम यही देखेंगे कि सुख की अपेक्षा दु:ख ने तथा संपत्ति की अपेक्षा दारिद्रय ने ही उन्हें अधिक शिक्षा दी है एवं प्रशंसा की अपेक्षा आघातों ने ही उनकी अंत:स्थ अग्नि को अधिक प्रस्फुरित किया है।

अब, यह ज्ञान मनुष्य में अंतनिर्हित है। कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता, सब अंदर ही है। हम जो कहते हैं कि मनुष्य 'जानता' है, उसे ठीक-ठीक मनोवैज्ञानिक भाषा में व्यक्त करने पर हमें कहना चाहिए कि वह 'आविष्कार करता' है। मनुष्य जो कुछ 'सीखता' है, वह वास्तव में 'आविष्कार करना' ही है। 'आविष्कार' का अर्थ है- मनुष्य का अपनी अनंत ज्ञानस्वरूप आत्मा के ऊपर से आवरण को हटा लेना। हम कहते हैं कि न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का आविष्कार किया। तो क्या वह आविष्कार कहीं एक कोने में बैठा हुआ न्यूटन की प्रतीक्षा कर रहा था? वह उसके मन में ही था। समय आया और उसने उसे ढूँढ निकाला। संसार ने जो कुछ ज्ञान लाभ किया है, वह मन से ही निकाला है। विश्व का असीम पुस्तकालय तुम्हारे मन में ही विद्यमान है। बाहय् जगत् तो तुम्हें अपने मन के अध्ययन में लगाने के लिए उद्दीपक तथा अवसर मात्र है; परंतु सारे समय तुम्हारे अध्ययन का विषय तुम्हारा मन ही रहता है। सेब के गिरने ने न्यूटन को उद्दीपक प्रदान किया और उसने अपने मन का अध्ययन किया। उसने अपने मन में पूर्व से स्थित विचार-श्रंखला की कड़ियों को एक बार फिर से विन्यस्त किया तथा उनमें एक नई कड़ी का आविष्कार किया। उसी को हम गुरुत्वाकर्षण का नियम कहते हैं। यह न तो सेब में था और न पृथ्वी के केंद्र में स्थित किसी अन्य वस्तु में। अतएव समस्त ज्ञान, चाहे वह व्यावहारिक हो अथवा परमार्थिक, मनुष्य के मन में ही निहित है। बहुधा यह प्रकाशित न होकर ढका रहता है, और जब आवरण धीरे-धीरे हटता जाता है, तो हम कहते हैं कि 'हमें ज्ञान हो रहा है'। ज्यों-ज्यों इस आविष्कारण की क्रिया बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों हमारे ज्ञान की वृद्धि होती जाती है। जिस मनुष्य पर से यह आवरण उठता जा रहा है, वह अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक ज्ञानी है, और जिस मनुष्य पर यह आवरण तह पर तह पड़ा है, वह अज्ञानी है। जिस मनुष्य पर से यह आवरण बिल्कुल चला जाता है, वह सर्वज्ञ पुरुष कहलाता है। अतीत में कितने ही सर्वज्ञ हो चुके हैं और मेरा विश्वास है कि अब भी बहुत से होंगे तथा आगामी युगों में भी ऐसे असंख्य पुरुष जन्म लेंगे। जिस प्रकार एक चकमक पत्थर के टुकड़े में अग्नि निहित रहती है, उसी प्रकार मनुष्य के मन में ज्ञान रहता है। उद्दीपक घर्षण का कार्य करके उसको प्रकाशित कर देता है। ठीक ऐसा ही हमारी समस्त भावनाओं और कार्यों के संबंध में भी है। यदि हम शांत होकर स्वयं का अध्ययन करें, तो प्रतीत होगा कि हमारा हँसना-रोना, सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद, हमारी शुभ कामनाएँ एवं शाप, स्तुति और निंदा, ये सब हमारे मन के ऊपर अनेक घात-प्रतिघातों के फल-स्वरूप उत्पन्न हुए हैं। और हम जो कुछ हैं, इसी के फ़ल हैं। ये सब घात-प्रतिघात मिलकर 'कर्म' कहलाते हैं। आत्मा की आभ्यंतरिक अग्नि तथा उसकी अपनी शक्ति एवं ज्ञान को बाहर प्रकट करने के लिए जो मानसिक अथवा भौतिक घात उस पर पहुँचाये जाते हैं, वे ही कर्म हैं। यहाँ कर्म शब्द का उपयोग व्यापक रूप में किया गया है। इस प्रकार, हम सब प्रतिक्षण ही कर्म करते रहते हैं। मैं तुमसे बातचीत कर रहा हूँ- यह कर्म है; तुम सुन रहे हो- यह भी कर्म है; हमारा साँस लेना, चलना आदि भी कर्म हैं; जो कुछ हम करते हैं, वह शारीरिक हो अथवा मानसिक, सब कर्म ही है; और हमारे ऊपर वह अपने चिन्ह अंकित कर जाता है।

कुछ कार्य ऐसे भी होते है, जो अनेक छोटे छोटे कर्मों की समष्टि जैसे होते हैं। उदाहरणार्थ, यदि हम समुद्र के किनारे खड़े हों और लहरों को किनारे से टकराते हुए सुनें, तो ऐसा मालूम होता है कि एक बड़ी भारी आवाज़ हो रही है। परंतु हम जानते हैं कि एक बड़ी लहर असंख्य छोटी-छोटी लहरों से बनी है। और यद्यपि प्रत्येक छोटी लहर अपना शब्द करती है, परंतु फिर भी वह हमें सुन नहीं पड़ता। पर ज्यों ही ये सब शब्द आपस में मिलकर एक हो जाते हैं, त्यों ही हमें बड़ी आवाज़ सुनायी देती है। इसी प्रकार हृदय की प्रत्येक धड़कन कार्य है। कई कार्य ऐसे होते हैं, जिनका हम अनुभव करते हैं, वे हमें इंद्रियग्राहय हो जाते हैं, पर वे अनेक छोटे-छोटे कार्यों की समष्टि होते हैं। यदि तुम सचमुच किसी मनुष्य के चरित्र को जाँचना चाहते हो, तो उसके बड़े कार्यों पर से उसकी जाँच मत करो। हर एक मूर्ख किसी विशेष अवसर पर बहादुर बन सकता है। मनुष्य के अत्यंत साधारण कार्यों की जाँच करो, और असल में वे ही ऐसी बातें हैं, जिनसे तुम्हें एक महान् पुरुष के वास्तविक चरित्र का पता लग सकता है। आकस्मिक अवसर तो छोटे से छोटे मनुष्य को भी किसी न किसी प्रकार का बड़प्पन दे देते हैं। परंतु वास्तव में महान् तो वही है, जिसका चरित्र सदैव और सब अवस्थाओं में महान् तथा एकसम रहता है।

मनुष्य का जिन शक्तियों के साथ संपर्क होता है, उन सबमें कर्म की शक्ति सबसे अधिक प्रबल होती है, जो मनुष्य के चरित्र पर प्रभाव डालती है। मनुष्य एक प्रकार का केंद्र जैसा है, वह संसार की समस्त शक्तियों को अपनी ओर खींचता है, तथा इस केंद्र में उन सबको संयुक्त कर उन्हें फिर एक बड़ी तरंग के रूप में बाहर भेजता है। यह केंद्र ही 'वास्तविक' मानव है-सर्वशक्तिमान तथा सर्वज्ञ, और यह समस्त विश्व को अपनी ओर खींच रहा है। शुभ-अशुभ, सुख-दु:ख सब उसकी ओर दौड़े जा रहे हैं, और उससे लिपटे जा रहे हैं। और वह उन सबमें से प्रवृत्ति की उस प्रबल धारा को बनाता है, जिसे चरित्र कहते हैं, और उसे बाहर प्रेषित करता है। जिस प्रकार किसी चीज़ को अपनी ओर खींच लेने की उसमें शक्ति है, उसी प्रकार उसे बाहर भेजने की भी शक्ति उसमें है।

संसार में हम जो सब कार्य-कलाप देखते हैं, मानव-समाज में जो सब गति हो रही है, हमारे चारों ओर जो कुछ हो रहा है, वह सब मन की ही अभिव्यक्ति है-मनुष्य की इच्छा-शक्ति का ही प्रकाश है। कलें, यंत्र, नगर, जहाज, युद्धपोत आदि सभी मनुष्य की इच्छा-शक्ति के विकास मात्र हैं। मनुष्य की यह इच्छा-शक्ति चरित्र से उत्पन्न होती है और यह चरित्र कर्मों से गठित होता है। अतएव, जैसा कर्म होता हैं, इच्छा-शक्ति की अभिव्यक्ति भी वैसी हो होती है। संसार में प्रबल इच्छा-शक्तिसंपन्न जितने महापुरुष हुए हैं, वे सभी धुरंधर कर्मी दिग्गज आत्मा थे। उनकी इच्छा-शक्ति ऐसी जबरदस्त थी कि वे संसार को भी उलट-पुलट सकते थे। और यह शक्ति उन्हें युग-युगांतर तक निरंतर कर्म करते रहने से प्राप्त हुई थी। एक बुद्ध या ईसा मसीह की सी प्रबल इच्छा-शक्ति एक जन्म में प्राप्त नहीं की जा सकती, क्योंकि हमें ज्ञात है कि उनके पिता कौन थे। हम नहीं हम सकते कि उनके पिता के मुँह से मनुष्य-जाति के कल्याण के लिए शायद कभी एक शब्द भी निकला हो। जोसेफ (ईसा मसीह के पिता) के समान तो लाखों और करोड़ों बढ़ई हो गए और आज भी हैं; बुद्ध के पिता के सदृश लाखों छोटे छोटे राजा हो चुके हैं। अत: यदि यह बात केवल आनुवांशिक संक्रमण के ही कारण हुई हो, तो इसकी व्याख्या कैसे कर सकते हो कि इस छोटे से राजा ने, जिसकी आज्ञा का पालन शायद उसके स्वयं के नौकर भी नहीं करते थे, एक ऐसा पुत्र उत्पन्न किया, जिसकी उपासना लगभग आधा संसार करता है? इसी प्रकार, उस बढ़ई तथा संसार में लाखों लोगों द्वारा ईश्वर के समान पूजे जानेवाले उसके पुत्र के बीच जो अंतर है, उसकी क्या व्याख्या हो सकती है? आनुवांशिक सिद्धांत के द्वारा तो इसका स्पष्टीकरण नहीं हो सकता। बुद्ध और ईसा इस संसार में जिस महा संकल्प का संचार कर गए, वह कहाँ से आया? इतनी शक्ति का संचय कैसे हुआ? अवश्य ही वह युग-युगांतरों से उस स्थान में रही होगी, और क्रमश: बढ़ते बढ़ते अंत में बुद्ध तथा ईसा के रूप में उसका विस्फोट समाज पर हुआ और तब से वह आज तक प्रवाहित हो रही है।

यह सब कर्म द्वारा ही निर्धारित होता है। यह सनातन नियम है कि जब तक कोई मनुष्य किसी वस्तु का उपार्जन न करे, तब तक वह उसे प्राप्त नहीं हो सकती। संभव है, कभी-कभीहम इस बात को न मानें, परंतु आगे चलकर हमें इसका दृढ़ विश्वास हो जाता है। एक मनुष्य चाहे समस्त जीवन भर धनी होने के लिए एड़ी-चोटी का पसीना एक करता रहे, हजारों मनुष्यों को धोखा दे, परंतु अंत में वह देखता है कि वह संपत्तिशील होने का अधिकारी नहीं था, तब जीवन उसके लिए दु:खमय और कंटकित बन जाता है। हम अपने भौतिक सुखों के लिए भिन्न-भिन्न चीज़ों को भले ही इकट्ठा करते जाएं, परंतु जिसका उपार्जन हम करते हैं, वही हमारा होता है। एक मूर्ख संसार भर की सारी पुस्तकें मोल लेकर भले ही अपने पुस्तकालय में रख ले, परंतु वह केवल उन्हीं को पढ़ सकेगा, जिनको पढ़ने का वह अधिकारी होगा, और यह अधिकार कर्म द्वारा ही प्राप्त होता है। हम किसके अधिकारी हैं, हम अपने भीतर क्या-क्या ग्रहण कर सकते हैं, इस सबका निर्णय कर्म द्वारा ही होता है। अपनी वर्तमान अवस्था के जिम्मेदार हमीं हैं, और जो कुछ हम होना चाहें, उसकी शक्ति भी हमीं में है। यदि हमारी वर्तमान अवस्था हमारे ही पूर्व कर्मों का फल है, तो यह निश्चित है कि जो कुछ हम भविष्य में होना चाहते हैं, वह हमारे वर्तमान कर्मों द्वारा ही निर्धारित किया जा सकता है। अतएव यह जान लेना आवश्यक है कि कर्म किस प्रकार किए जाएं। संभव है, तुम कहो, "कर्म करने की शैली जानने से क्या लाभ? संसार में प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी प्रकार से तो काम करता ही रहता है।" परंतु यह भी ध्यान रखना चाहिए कि शक्तियों का निरर्थक क्षय भी कोई चीज़ होती है। गीता का कथन है, 'कर्मयोग का अर्थ है-कुशलता से अर्थात् वैज्ञानिक प्रणाली से कर्म करना।' कर्मानुष्ठान की विधि ठीक ठीक जानने से मनुष्य को श्रेष्ठतम फल प्राप्त हो सकता है। यह स्मरण-रखना चाहिए कि समस्त कर्मों का उद्देश्य है, मन के भीतर पहले से ही स्थित शक्ति को प्रकट कर देना-आत्मा को जागृत कर देना। प्रत्येक मनुष्य के भीतर शक्ति और पूर्ण ज्ञान विद्यमान है। भिन्न-भिन्न कर्म इस महान् शक्तियों को जागृत करने तथा बाहर प्रकट कर देने के लिए आघात सदृश हैं।

मनुष्य विविध प्रेरणाओं से कार्य किया करता है, क्योंकि बिना प्रेरणा या हेतु के कार्य नहीं हो सकता। कुछ लोग यश चाहते हैं, और वे यश के लिए काम करते हैं। दूसरे पैसा चाहते हैं, और वे पैसे के लिए काम करते हैं। फिर कोई अधिकार प्राप्त करना चाहते हैं, और वे अधिकार के लिए काम करते हैं। कुछ और स्वर्ग पाना चाहते हैं, और वे उसी के लिए प्रयत्न करते हैं। फिर कुछ लोग मरने के बाद अपना नाम छोड़ जाने के इच्छुक होते हैं, जैसे चीन देश में। वहाँ मृत्यु के बाद ही उसे उपाधि दी जाती है; विचार करके देखने पर यह प्रथा हमारे यहाँ की अपेक्षा अच्छी ही कही जा सकती है। वहाँ जब कोई विशेष श्रेष्ठ कार्य करता है, तो उसके दिवंगत पिता या पितामह को एक अभिजात उपाधि प्रदान कर दी जाती है। कुछ लोग इसी के निमित्त काम करते हैं। इस्लाम धर्म के कुछ संप्रदायों के अनुयायी इस बात के लिए आजन्म काम करते रहते हैं कि मृत्यु के बाद उनका एक बड़ा मकबरा बने। मैं कुछ ऐसे संप्रदायों को जानता हूँ, जिनमें बच्चे के पैदा होते ही उसके लिए एक मकबरा बना दिया जाता है, और यही उन लोगों के अनुसार मनुष्य का सबसे महत्वपूर्ण काम होता है। जिसका मकबरा जितना बड़ा और सुंदर होता है, वह उतना ही अधिक सुखी समझा जाता है। कुछ लोग प्रायश्चित के रूप में कर्म किया करते हैं, अर्थात् अपने जीवन भर अनेक प्रकार के दुष्ट कर्म कर चुकने के बाद एक मंदिर बनवा देते हैं अथवा पुरोहितों को कुछ धन दे देते हैं, जिससे वे उनको खरीदकर प्रसन्न कर लें और उनसे स्वर्ग का टिकट खरीद लें! वे सोचते हैं कि इस पुण्य से रास्ता साफ़ हो गया, अब हम अपने पापों के बावजूद निर्विघ्न चले जाएंगे। कार्य की विविध प्रेरणाओं में से कुछ ये हैं; कार्य के निमित्त ही कार्य। प्रत्येक देश में कुछ ऐसे नर-रत्न होते हैं, जो केवल कर्म के लिए ही कर्म करते हैं। वे नाम-यश अथवा स्वर्ग की भी परवाह नहीं करते। वे केवल इसलिए कर्म करते हैं कि उससे कुछ कल्याण होगा, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो और भी उच्चतर उद्देश्य लेकर गरीबों के प्रति भलाई तथा मनुष्य-जाति की सहायता करने के लिए अग्रसर होते हैं, क्योंकि वे शुभ में विश्वास करते हैं और उससे प्रेम करते हैं। नाम तथा यश के लिए किया गया कार्य बहुधा शीघ्र फलित नहीं होता। ये चीजें हमें उस समय प्राप्त होती हैं, जब हम वृद्ध हो जाते हैं और जिंदगी कि आखिरी घड़ियाँ गिनते रहते हैं। यदि कोई मनुष्य नि:स्वार्थ भाव से कार्य करे, तो क्या उसे कोई फलप्राप्ति नहीं होती? असल में तभी तो उसे सर्वोच्च फल की प्राप्ति होती है। और सच पूछा जाए, तो नि:स्वार्थता अधिक फलदायी होती है, केवल लोगों में इसका अभ्यास करने का धैर्य नहीं होता। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह अधिक लाभदायक है। प्रेम, सत्य तथा नि:स्वार्थता नैतिकता संबंधी आलंकारिक वर्णन मात्र नहीं हैं, वरन् शक्ति की महान् अभिव्यक्ति होने के कारण वे हमारे सर्वोच्च आदर्श हैं, पहली बात यह है कि यदि कोई मनुष्य पाँच दिन, उतना क्यों, पाँच मिनट भी बिना भविष्य का चिंतन किए, बिना स्वर्ग, नरक या अन्य किसी के संबंध में सोचे, नि:स्वार्थता से काम कर सकता है, तो उसमें एक महान् आत्मा बन सकने की क्षमता है। यद्यपि इसे कार्यरूप में परिणत करना कठिन है, फिर भी अपने हृदय के अंतस्थल से हम इसका महत्व समझते हैं और जानते हैं कि इससे क्या मंगल होता है। यह प्रचंड निग्रह शक्ति की महत्तम अभिव्यक्ति है। अन्य सब बहिर्मुखी कर्मों की अपेक्षा यह आत्म-निग्रह शक्ति की कहीं बड़ी अभिव्यक्ति है। एक चार घोड़ोंवाली गाड़ी पहाड़ी के उतार पर बड़ी आसानी से बिना रोके आ सकती है, अथवा सईस घोड़ों को रोक सकता है। किंतु अधिक शक्ति की अभिव्यक्ति घोड़ों को छोड़ देने में है, अथवा उन्हें रोकने में? एक तोप का गोला हवा में काफ़ी दूर तक चला जाता है और फिर गिर पड़ता है। परंतु दूसरा दीवार से टकराकर रुक जाने से उतनी दूर नहीं जा सकता, पर उस टकराने से विपुल ताप की उत्पत्ति होती है। इसी प्रकार, मन की सारी बहिर्मुखी गति किसी स्वार्थपूर्ण उद्देश्य की ओर दौड़ती रहने से छिन्न-भिन्न होकर बिखर जाती है; वह फिर तुम्हारे पास शक्ति लौटकर नहीं लाती। परंतु यदि उसका संमय किया जाए, तो उससे शक्ति की वृद्धि होती है। इस आत्मसंमय से महान् इच्छा-शक्ति का प्रादुर्भाव होता है; वह बुद्ध या ईसा जैसे चरित्र का निर्माण करता है। मूर्खो को इस रहस्य का पता नहीं रहता, परंतु फिर भी वे मनुष्य-जाति पर शासन करने के इच्छुक रहते हैं। एक मूर्ख भी यदि कर्म करे और प्रतीक्षा करे, तो समस्त संसार पर शासन कर सकता है। यदि वह कुछ वर्ष तक प्रतीक्षा करे तथा अपने इस मूर्खता-जन्य जगत्-शासन के भाव को संयत कर ले, तो इस भाव के समूल नष्ट होते ही वह संसार में एक शक्ति बन जाएगा। परंतु जिस प्रकार कुछ पशु अपने से दो-चार क़दम आगे कुछ नहीं देख सकते, इसी प्रकार हममें से अधिकांश लोग दो-चार वर्ष के आगे भविष्य नहीं देख सकते। हमारा संसार मानो एक क्षुद्र परिधि सा होता है, हम सब उसी में आबद्ध रहते हैं। उसके परे देखने का धैर्य हममें नहीं रहता और इसीलिए हम दुष्ट और अनैतिक हो जाते हैं। यह हमारी कमजोरी है-शक्तिहीनता है।

अत्यंत निम्नतम कर्मों को भी तिरस्कार की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। जो मनुष्य कोई श्रेष्ठ आदर्श नहीं जनता, उसे स्वार्थदृष्टि से ही-नाम-यश के लिए ही-काम करने को। परंतु प्रत्येक मनुष्य को उच्चतर ध्येयों की ओर बढ़ने तथा उन्हें समझने का प्रयत्न करते रहना चाहिए। 'हमें कर्म करने का ही अधिकार है, कर्मफल में हमारा कोई अधिकार नहीं।' [1] कर्मफलों को एक ओर रहने दो, उनकी चिंता हमें क्यों हो? यदि तुम किसी मनुष्य की सहायता करना चाहते हो, तो इस बात की कभी चिंता न करो कि उसका व्यवहार तुम्हारे प्रति कैसा होना चाहिए। यदि तुम एक श्रेष्ठ एवं उत्तम कार्य करना चाहते हो, तो यह सोचने का कष्ट मत करो कि उसका फल क्या होगा।

अब कर्म के इस आदर्श के संबंध में एक कठिन प्रश्न उठता है। कर्मयोगी के लिए सतत कर्मशीलता आवश्यक है; हमें सदैव कर्म करते रहना चाहिए। बिना कार्य के हम एक क्षण भी नहीं रह सकते। तो विश्राम के विषय में क्या कहा जा सकता है? यहाँ इस जीवन-संग्राम का एक पक्ष है कर्म, जिसके तीव्र भँवर में फँसे हम लोग चक्कर काट रहे हैं। दूसरा पक्ष है शांति का-निवृत्तिमुखी त्याग का। चारों ओर सब शांत, पूर्ण है, किसी प्रकार का कोलाहल और दिखावा नहीं, केवल प्रकृति अपने प्राणियों, पुष्पों और पर्वतों के साथ विद्यमान है। पर इन दोनों में कोई भी पूर्ण आदर्श चित्र नहीं है। यदि किसी एकांतवासी व्यक्ति को संसार के चक्र में घसीट लाया जाए, तो वह उससे उसी प्रकार ध्वस्त हो जाएगा, जिस प्रकार समुद्र की गहराई में रहने वाली एक विशेष प्रकार की मछली पानी की सतह पर लाए जाते ही टुकड़े टुकड़े हो जाती है; क्योंकि सतह पर पानी का वह दबाव नहीं है, जिसके कारण वह जीवित रहती थी। इसी प्रकार एक एस मनुष्य, जो सांसरिक तथा सामाजिक जीवन के कोलाहल का अभ्यस्त रहा है, यदि किसी नीरव स्थान में ले आया जाए, तो क्या वह आराम से रह सकेगा? कदापि नहीं। उसे क्लेश होगा और संभव है, उसका मस्तिष्क ही फिर जाए। आदर्श पुरुष तो वे हैं, जो परम शांति एवं निस्तब्धता के बीच भी तीव्र कर्म का तथा प्रबल कर्मशीलता के बीच भी मरुस्थल की शांति एवं निस्तब्धता का अनुभव करते हैं। उन्होंने संयम का रहस्य जान लिया है-अपने ऊपर विजय प्राप्त कर चुके हैं। किसी बड़े शहर की भरी हुई सड़कों के बीच से जाने पर भी उनका मन उसी प्रकार शांत रहता है, मानो वे किसी नि:शब्द गुफा में हों और फिर भी उनका मन सारे समय कर्म में तीव्र रूप से लगा रहता है। यही कर्मयोग का आदर्श है, और यदि तुमने यह प्राप्त कर लिया है, तो तुम्हें वास्तव में कर्म का रहस्य ज्ञात हो गया।

परंतु हमें आरंभ से ही आरंभ करना पड़ेगा, जो कार्य हमारे सामने आयें, उन्हें हम हाथ में लें और शनै: शनै: हम अपने को प्रतिदिन नि:स्वार्थ बनाने का प्रयत्न करें। हमें कर्म करते रहना चाहिए तथा यह पता लगाना चाहिए कि उस कार्य के पीछे हमारी प्रेरक शक्ति क्या है। ऐसा होने पर हम देखेंगे कि आरंभिक वर्षो में प्राय: हमारी सभी कार्यो का हेतु स्वार्थपूर्ण रहता है। किंतु धीरे- धीरे यह स्वार्थपरायणता अध्यवसाय से नष्ट हो जाएगी, और अंत में वह समय आ जाएगा, जब हम वास्तव में स्वार्थ से रहित होकर कार्य करने के योग्य हो सकेंगे। हम सभी यह आशा कर सकते हैं कि जीवन-पथ में संघर्ष करते करते किसी न किसी दिन वह समय अवश्य ही आएगा, जब हम पूर्ण रूप से नि:स्वार्थ बन जाएंगे; और ज्यों ही हम उस अवस्था को प्राप्त कर लेंगे, हमारी समस्त शक्तियां केंद्रीभूत हो जायेगी तथा हमारा आभ्यंतरिक ज्ञान प्रकट हो जाएगा।

'हरेक अपने क्षेत्र में महान् है'

सांख्य मत के अनुसार प्रकृति-सत्व, रज तथा तम-इन तीन शक्तियों से निर्मित है। भौतिक जगत् में इन तीन शक्तियों की अभिव्यक्ति साम्यावस्था, क्रियाशीलता तथा जड़ता के रूप में दिखायी पड़ती है। तम की अभिव्यक्ति अंधकार अथवा कर्मशून्यता के रूप में होती है, रज की कर्मशीलता अर्थात् आकर्षण एवं विकर्षण के रूप में, और सत्त्व इन दोनों की साम्यावस्था है।

प्रत्येक व्यक्ति में ये तीन शक्तियां होती है। कभी-कभी तमोगुण प्रबल होता है, तब हम सुस्त हो जाते हैं, हिल-डुल तक नहीं सकते और कुछ विशिष्ट भावनाओं अथवा जड़ता से ही आबद्ध होकर निष्क्रिय हो जाते हैं। फिर कभी-कभी कर्मशीलता का प्राबल्य होता है; और कभी-कभी इन दोनों के सामंजस्य सत्व की प्रबलता होती है। फिर, भिन्न-भिन्न मनुष्यों में इन गुणों में से कोई एक सबसे प्रबल होता है। एक मनुष्य में निष्क्रियता, सुस्ती और आलस्य के गुण प्रबल रहते हैं; दूसरे में क्रियाशीलता, उत्साह एवं शक्ति के, और तीसरे में हम शक्ति, मृदुता एवं माधुर्य का भाव देखते हैं, जो पूर्वोक्त दोनों गुणों अर्थात् सक्रियता एवं निष्क्रियता का सामंजस्य होता है। इस प्रकार संपूर्ण सृष्टि में- पशुओं, वृक्षों और मनुष्यों में- हमें इन विभिन्न शक्तियों की न्यूनाधिक मात्रा में, वैशिष्टपूर्ण अभिव्यक्ति दिखायी देती है।

कर्मयोग का संबंध मुख्यत: इन तीन शक्तियों से है। उनके स्वरूप के विषय में तथा उनका उपयोग कैसे करना चाहिए, यह बतलाकर कर्मयोग हमें अपना कार्य अच्छी तरह से करने की शिक्षा देता है। मानव-समाज एक श्रेणीबद्ध संगठन है। हम सभी जानते हैं कि सदाचार तथा कर्तव्य किसे कहते हैं; परंतु फिर भी हम देखते हैं कि भिन्न भी देशों में सदाचार के संबंध में अलग अलग धारणाएँ हैं। एक देश में जो बात सदाचार मनी जाती है, दूसरे देश में वही नितांत दुराचार समझी जा सकती है। उदाहरणार्थ, एक देश में चचेरे भाई-बहिन आपस में विवाह कर सकते हैं, परंतु दूसरे देश में यही बात अत्यंत अनैतिक मानी जाती है। किसी देश में लोग अपनी साली से विवाह कर सकते हैं, परंतु यही बात दूसरे देश में अनैतिक समझी जाती है। फिर कहीं-कहीं लोग एक ही बार विवाह कर सकते हैं और कहीं-कहीं कई बार, इत्यादि-इत्यादि। इसी प्रकार, सदाचार की अन्यान्य बातों के संबंध में भी विभिन्न देशों के मानदंड बहुत भिन्न होते हैं। फिर भी हमारी यह धारणा है कि सदाचार का एक सार्वभौमिक मानदंड अवश्य है।

यही बात कर्तव्य के विषय में भी है। भिन्न-भिन्न जातियों में कर्तव्य की धारणा भिन्न होती है। किसी देश में यदि किए व्यक्ति कुछ विशिष्ट कार्य नहीं करता, तो लोग उस पर दोषारोपण करते हैं; परंतु अन्य किसी देश में यदि वह व्यक्ति वही कार्य करता है, तो वहाँ के लोग कहते हैं, कि उसने ठीक नहीं किया। फिर भी हम जानते हैं कि कर्तव्य का एक सार्वभौमिक आदर्श अवश्य है। इसी प्रकार, समाज का एक वर्ग सोचता है कि कुछ विशिष्ट बातें ही कर्तव्य हैं; परंतु दूसरे वर्ग का विचार बिल्कुल विपरीत होता है और वह उन कार्यों को करना पातक समझेगा। अब हमारे सम्मुख दो मार्ग खुले हैं। एक अज्ञानी का, जो सोचता है कि सत्य का मार्ग केवल एक ही है तथा शेष सब गलत हैं; और दूसरा ज्ञानी का, जो यह मानता है कि हमारी मानसिक दशा तथा परिस्थिति के अनुसार कर्तव्य तथा सदाचार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। अतएव जानने योग्य प्रधान बात यह है कि कर्तव्य तथा सदाचार के विभिन्न स्तर होते है, और जीवन की एक अवस्था के, एक परिस्थिति के कर्तव्य दूसरी परिस्थिति के कर्तव्य नहीं हो सकते।

उदाहरणार्थ, सब महापुरुषों का उपदेश है कि 'अशुभ का प्रतिरोध न करो', अप्रतिरोध ही सर्वोच्च नैतिक आदर्श है। हम जानते हैं कि यदि हममें कुछ लोग इस सूत्र को पूर्णत: चरितार्थ करने लगें, तो समाज का सारा संघटन ही छिन्न-भिन्न हो जायेगा। दुष्ट लोग हमारी जान और माल पर हाथ मारने और मनमानी करने लगेंगे। यदि इस प्रकार का 'अप्रतिरोध-धर्म' एक दिन भी आचरण में लाया जाए, तो बड़ी गड़बड़ी मच जाएगी। परंतु फिर भी अपने हृदय के अंतस्तल से हम 'अशुभ का प्रतिरोध न करो' उपदेश की सत्यता अनुभव करते रहते हैं। हमें वह सर्वोच्च आदर्श प्रतीत होता है; परंतु केवल इसी मत का प्रचार करना अधिकांश मानवता की भर्त्सना करना होगा। इतना ही नहीं, बल्कि इसके द्वारा मनुष्यों को सदा यही अनुभव होने लगेगा कि वे अन्याय ही कर रहे हैं। उनके हृदय में प्रत्येक कार्य के बारे में संकल्प-विकल्प सा होने लगेगा, उनका मन दुर्बल हो जाएगा तथा अन्य किसी दुर्गुण की अपेक्षा यह सतत आत्म-धिक्कार उनमें अधिक दुर्गुणों को उत्पन्न कर देगा। जो व्यक्ति अपने प्रति घृणा करने लगा ही, उसके पतन का द्वार खुल चुका है, और यही बात राष्ट्र के संबंध में भी सत्य है।

हमारा पहला कर्तव्य यह है कि अपने प्रति घृणा न करें; क्योंकि आगे बढ़ने के लिए यह आवश्यक है कि पहले हम स्वयं में विश्वास रखें और फिर ईश्वर में। जिसे स्वयं में विश्वास नहीं, उसे ईश्वर में कभी भी विश्वास नहीं हो सकता। अत-एव हमारे लिए जो एकमात्र रास्ता रह जाता है, वह यह कि हम समझ लें कि कर्तव्य तथा सदाचार की धारणा विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। यह बात नहीं कि जो मनुष्य अशुभ का प्रतिरोध कर रहा है, वह कुछ ऐसा करता है, जो सदा और स्वभावत: अन्यायपूर्ण है, वरन् जिस भिन्न परिस्थितियों में वह है, उसमें अशुभ का प्रतिरोध करना ही उसका कर्तव्य हो सकता है।

संभव है, भगवद्गीता का द्वितीय अध्याय पढ़कर तुम पाश्चात्य देशवालों में से बहुतों को आश्चर्य हुआ हो, क्योंकि वहाँ शत्रुओं के मित्र एवं संबंधी होने के कारण अर्जुन के उनसे युद्ध करने से अस्वीकार करने तथा अप्रतिरोध को प्रेम का सर्वोच्च आदर्श मानने पर श्री कृष्ण ने अर्जुन को ढोंगी तथा डरपोक कहा है। इस महान् सत्य को हम सबको अवगत कर लेना चाहिए कि सभी विषयों में दोनों चरम अवस्थाएँ एक सदृश होती हैं। चरम 'अस्ति' और चरम 'नास्ति', दोनों सदैव एक समान होते हैं। उदाहरणार्थ, प्रकाश का स्पंदन यदि अत्यंत मंद होता है, तो हम उसे नहीं देख सकते ; और इसी प्रकार जब वह अत्यंत तीव्र होता है, तब भी हम उसे देखने में असमर्थ होते हैं। 'ध्वनि' के संबंध में भी ठीक ऐसा ही है। न तो उसके तार-स्वर के बहुत निम्न होने पर हम उसे सुन सकते हैं और न उसके बहुत उच्च होने पर। इसी प्रकार का भेद 'प्रतिरोध' तथा 'अप्रतिरोध' में है। एक मनुष्य इसलिए प्रतिरोध नहीं करता कि वह कमजोर है, सुस्त है, असमर्थ है; दूसरी ओर एक दूसरा मनुष्य है, जो यह जानता है कि यदि वह चाहे, तो जबर्दस्त प्रतिरोध कर सकता है, परंतु फिर भी यह केवल अप्रतिरोध ही नहीं करता, वरन् अपने शत्रुओं के प्रति शुभकामनाएँ भी प्रकट करता है। अत: वह मनुष्य जो दुर्बलता के कारण प्रतिरोध नहीं करता, पापग्रस्त होता है और इसलिए अप्रतिरोध से कोई लाभ नहीं उठा सकता; परंतु दूसरा मनुष्य यदि प्रतिरोध करे, तो वह भी पाप का भागी होता है। बुद्ध ने जो अपना राज वैभव तथा सिंहासन छोड़ दिया, उसे हम सच्चा त्याग कह सकते हैं; परंतु एक भिखारी के संबंध में त्याग का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि उसके पास तो त्याग करने को कुछ है ही नहीं। अतएव जब हम 'अप्रतिरोध' तथा 'आदर्श प्रेम' कि बात करते हैं, तब यह विशेष रूप से ध्यान रखना आवश्यक है कि हम किस विषय की ओर लक्ष्य कर रहे हैं। हमें पहले यह अच्छी तरह सोच लेना चाहिए कि हममें प्रतिरोध की शक्ति है भी या नहीं। तब फिर शक्तिशाली होते हुए भी यदि हम प्रतिरोध न करें, तो वास्तव में हम एक महान् कार्य करते है; परंतु यदि हम प्रतिरोध कर ही न सकते हों, और फिर भी भ्रमवश यही सोचते रहें कि हम उच्च प्रेम की प्रेरणा से ही यह कार्य कर रहे हैं, तो यह पहले के ठीक विपरीत ही होगा। अपने विपक्ष में शक्तिशाली सेना को खड़ी देखकर अर्जुन कायर हो गया; उसके 'प्रेम' ने उसे अपने देश तथा राजा के प्रति अपने कर्तव्य को विस्मृत करा दिया। इसीलिए तो भगवान् श्रीकृष्ण ने उससे कहा कि तुम ढोंगी है, 'एक ज्ञानी के सदृश तू बातें तो करता है, परंतु तेरे कर्म कायरों जैसे हैं। इसलिए तू उठ, खड़ा हो और युद्ध कर।'

यह है कर्मयोग का केंद्रीय भाव। कर्मयोगी वही है, जो समझता है कि सर्वोच्च आदर्श 'अप्रतिरोध' है, जो जनता है कि यह अप्रतिरोध ही मनुष्य कि अपनी शक्ति की उच्चतम अभिव्यक्ति है और जो यह भी जानता है कि जिसे हम 'अन्याय का प्रतिरोध' कहते हैं, वह इस अप्रतिरोध कि उच्चतम शक्ति की प्राप्त के मार्ग में केवल एक सीढ़ी मात्र है। इस सर्वोच्च आदर्श को प्राप्त करने के पहले अन्याय का प्रतिकार करना मनुष्य का कर्तव्य है। पहले वह कार्य करे, युद्ध कर, यथाशक्ति प्रतिद्वंद्विता करे। जब उसमें प्रतिरोध की शक्ति आ जाएगी, तभी 'अप्रतिरोध उसके लिए एक गुणस्वरूप होगा।

अपने देश में एक बार एक व्यक्ति के साथ मेरी मुलाक़ात हुई। मैं पहले से ही जानता था कि वह आलसी और बुद्धिहीन है। न वह कुछ जानता था और न उसे कुछ जानने की स्पृहा थी, वह पशुवत् अपना जीवन व्यतीत करता था। उसने मुझसे प्रश्न किया, "भगवान् की प्राप्ति के लिये मुझे क्या करना चाहिए? मैं किस प्रकार मुक्त हो सकूँगा?" मैंने उससे पूछा, "क्या तुम झूठ बोल सकते हो?" उसने उत्तर दिया, "नहीं।" मैंने कहा, "तब तुम पहले झूठ बोलना सीखो। पशुवत् अथवा काष्ठ के सदृश जड़वत् जीवनयापन करने की अपेक्षा झूठ बोलना कहीं अच्छा है; तुम अकर्मण्य हो। निश्चय ही तुम उस सर्वोच्च निष्क्रिय अवस्था तक पहुँचे नहीं, जो सब कर्मों से परे और फार्म शांतिपूर्ण होती है। और तो और, तुम इतने जड़भावापन्न हो कि एक बुरा कार्य करने की भी तुममें शक्ति नहीं!" अवश्य, इतने तामसिक पुरुष बहुधा नहीं होते, और सच पूछो, तो मैं उससे हँसी ही कर रहा था। पर मेरा मतलब यह था कि संपूर्ण निष्क्रिय अवस्था व शांतभाव प्राप्त करने के लिए मनुष्य को कर्मशीलता में से होकर जाना होगा।

निष्क्रियता का हर प्रकार से त्याग करना चाहिए। क्रियाशीलता का अर्थ है 'प्रतिरोध'। मानसिक तथा शारीरिक समस्त दोषों का प्रतिरोध करो, और जब तुम इस प्रतिरोध में सफल होगे, तभी शांति प्राप्त होगी। यह कहना बड़ा सरल है कि 'किसी से घृणा मत करो, किसी अशुभ का प्रतिरोध मत करो', परंतु हम जानते हैं कि इसे कार्यरूप में परिणत करना क्या है। जब सारे समाज की आँखें हमारी ओर लगी हों, तो हम अप्रतिरोध का प्रदर्शन भले ही करें, परंतु हमारे हृदय में वह सदैव कुरेदती रहती है। अप्रतिरोध का शांतिजन्य अभाव हमें निरंतर खलता रहता है; हमें ऐसा लगता है कि प्रतिरोध करना ही अच्छा है। यदि तुम्हें धन की इच्छा है और साथ ही तुम्हें यह भी मालूम है कि जो मनुष्य धन का इच्छुक है, उसे संसार दुष्ट कहता है, तो संभव है, तुम धन प्राप्त करने के लिये प्राणपण से चेष्टा करने का साहस न करो, परंतु फिर भी तुम्हारा मन दिन-रात धन के पीछे ही पीछे दौड़ता रहेगा। पर यह तो सरासर मिथ्याचार है और इससे कोई लाभ नहीं होता। संसार में कूद पडो और जब तुम इसके समस्त सुख और दु:ख भोग लोगे, तभी त्याग आएगा-तभी शांति प्राप्त होगी। अतएव प्रभुत्व-लाभ की अथवा अन्य जो कुछ तुम्हारी वासना हो, वह सब पहले पूरी कर लो; और जब तुम्हारी सारी वासनाएँ पूर्ण हो जाएंगी, तब एक समय ऐसा आएगा, जब तुम्हें यह मालूम हो जाएगा कि वे सब चीजें बहुत छोटी हैं। परंतु जब तक तुम्हारी वह वासना तृप्त नहीं होती, जब तक तुम उस कर्मशीलता में से होकर नहीं जा चुकते, तब तक तुम्हारे लिए उस शांतभाव एवं आत्मसमर्पण तक पहुँचना नितांत असंभव है। इस अनुद्वेग और त्याग का प्रचारगत हजारों वर्षों से होता आया है-प्रत्येक व्यक्ति इसके बारे में बचपन से सुनता आया है, परंतु फिर भी आज संसार में हमें ऐसे बहुत हम लोग दिखायी देते हैं, जो वास्तव में उस स्थिति तक पहुँच सके हों। मैंने लगभग आधे संसार का भ्रमण कर डाला हैं, परंतु मुझे शायद ऐसे बीस भी व्यक्ति नहीं मिले, जो वास्तव में शांत तथा अप्रतिरोध प्रकृति वाले हों।

प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपना आदर्श लेकर उसे चरितार्थ करने का प्रयत्न करे। दूसरों के ऐसे आदर्शों को लेकर चलाने की अपेक्षा, जिनको वह पूरा ही नहीं कर सकता, अपने ही आदर्श का अनुसरण करना सफलता का अधिक निश्चित मार्ग है। उदाहरणार्थ, यदि हम एक छोटे बच्चे से एकदम बीस मिल चलने को कह दें, तो या तो वह बेचारा मर जाएगा, या यदि हजार में से एकाध रेंगता-रेंगता कहीं पहुँचा भी, तो वह अधमरा हो जाएगा। बस, हम भी संसार के साथ ऐसा ही करने का प्रयत्न करते हैं। किसी समाज के सब स्त्री-पुरुष न एक मन के होते हैं, न एक ही योग्यता के और न एक ही शक्ति के। अतएव, उनमें से प्रत्येक का आदर्श भी भिन्न-भिन्न होना चाहिए; और इन आदर्शो में से एक का भी उपहास करने का हमें कोई अधिकार नहीं। अपने आदर्श को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक को जितना हो सके, यत्न करने दो। फिर यह भी ठीक नहीं कि मैं तुम्हारे अथवा तुम मेरे आदर्श द्वारा जाँचे जाओ। सेब के पेड़ की तुलना ओक से नहीं होनी चाहिए और न ओक की सेब से। सेब के पेड़ का विचार करने के लिए सेब का मापक ही लेना होगा, और ओक के लिए उसका अपना मापक।

बहुत्व में एकत्व ही सृष्टि का विधान है। प्रत्येक स्त्री-पुरुष में व्यक्तिगत रूप से कितना भी भेद क्यों न हो, उन सबकी पृष्ठभूमि में एकत्व विद्यमान है। स्त्री-पुरुषों के भिन्न-भिन्न चरित्र एवं वर्ग सृष्टि की स्वाभाविक विविधता मात्र हैं। अतएव एक ही आदर्श द्वारा सबकी जाँच करना अथवा सबके सामने एक ही आदर्श रखना किसी भी प्रकार उचित नहीं है। ऐसा करने से केवल एक अस्वाभाविक संघर्ष उत्पन्न हो जाता है और फल यह होता है कि मनुष्य स्वयं से ही घृणा करने लगता है तथा धार्मिक एवं उच्च बनने से रुक जाता है। हमारा कर्तव्य तो यह है कि हम प्रत्येक को उसके अपने उच्चतम आदर्श को प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करें, तथा उस आदर्श को सत्य के जितना निकटवर्ती हो सके, लाने की चेष्टा करें।

हम देखते हैं कि हिंदू नीतिशास्त्र में यह तत्व बहुत प्राचीन काल से ही स्वीकार किया जा चुका है; और हिंदुओं के धर्मशास्त्र तथा नीति संबंधी पुस्तकों में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ तथा संन्यास, इन सब विभिन्न आश्रमों के लिए भिन्न-भिन्न विधियों का वर्णन है।

हिंदू शास्त्रों के अनुसार के अनुसार सार्वभौम मानवता के साधारण कर्तव्यों के अतिरिक्त प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कुछ विशेष कर्तव्य होते हैं। एक हिंदू अपना जीवन छात्रावस्था से आरंभ करता है; उसके बाद वह विवाह करके गृहस्थ हो जाता है; वृद्धवस्था में गृहस्थाश्रम से अवकाश ग्रहण करता है; और अंत में वह संसार को त्यागकर संन्यासी हो जाता है। जीवन के इस आश्रमों से भिन्न-भिन्न कर्तव्य संबद्ध हैं। वास्तव में इस आश्रमों में से कोई किसी से श्रेष्ठ नहीं है; एक गृहस्थ का जीवन भी उतना ही श्रेष्ठ है, जितना एक ब्रह्मचारी का, जिसने अपना जीवन धर्म-कार्य के लिए उत्सर्ग कर दिया है। सड़क का भंगी भी उतना ही उच्च तथा श्रेष्ठ है, जितना कि एक सिंहासनारूढ़ राजा। थोड़ी देर के लिए उसे गद्दी पर से उतार दो और उसे मेहतर का काम दो, फिर देखो, वह कैसे काम करता है इसी प्रकार उस मेहतर को राजा बना दो; देखो, वह कैसे राज्य चलाता है। यह कहना व्यर्थ है कि 'गृहस्थ से संन्यासी श्रेष्ठ है।' संसार को छोड़कर, स्वच्छंद और शांत जीवन में रहकर ईश्वरोपासना करने की अपेक्षा संसार में रहते हुए ईश्वर की उपासना करना बहुत कठिन है। आज तो भारत में जीवन के ये चार आश्रम घटकर केवल दो ही रह गए हैं-गृहस्थ एवं संन्यास। गृहस्थ विवाह करता है और नागरिक बनकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है; तथा संन्यासी अपनी समस्त शक्तियों को केवल ईश्वरोपासना एवं धर्मोपदेश में लगा देता है। मैं अब महानिर्वाण-तंत्र से गृहस्थ के कर्तव्य संबंधी कुछ श्लोक उद्धृत करता हूँ। उनमें तुम देखोगे कि किसी व्यक्ति के लिए गृहस्थ होकर अपने सब कर्तव्यों का उचित रूप से पालन करना कितना कठिन है:

ब्रह्मनिष्ठो गृहस्थः स्यात् ब्रह्मज्ञानपरायण :

यद्यत्कर्म प्रकुर्वीत तद्ब्रह्मणि समर्पयेत्॥

गृहस्थ को ब्रह्मनिष्ठ होना चाहिए तथा ब्रह्मज्ञान का लाभ ही उसके जीवन का चरम लक्ष्य होना चाहिए। परंतु फिर भी उसे निरंतर सब कर्म करते रहना चाहिए-अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए; और अपने समस्त कर्मों के फलों को ईश्वर के चरणों में अर्पण कर देना चाहिए।

कर्म करके कर्मफल की आकांक्षा न करना, किसी मनुष्य की सहायता करके उससे किसी प्रकार की कृतज्ञता की आशा न रखना, कोई सत्कर्म करके भी इस बात की ओर नजर तक न देना कि वह हमें यश और कीर्ति देगा अथवा नहीं, इस संसार में सबसे कठिन बात है। संसार जब तारीफ करने लगता है, तब एक निहायत बुज़दिल भी बहादुर बन जाता है। समाज के समर्थन तथा प्रशंसा से एक मूर्ख भी वीरोचित कार्य कर सकता है; परंतु अपने आसपास के लोगों की निंदा-स्तुति की बिल्कुल परवाह न करते हुए सर्वदा सत्कार्य में लगे रहना वास्तव में सबसे बड़ा त्याग है।

न मिथ्याभाषणम् कुर्यांत् न च शाठ्यं समाचरेत्।

देवतातिथिपूजासु गृहस्थो निरतो भवेत् ॥

गृहस्थ का प्रधान कर्तव्य जीविकोपार्जन करना है, परंतु उसे ध्यान रखना चाहिए कि वह झूठ बोलकर, दूसरों को धोखा देकर तथा चोरी करके ऐसा न करे, और उसे यह भी याद रखना चाहिए कि उसका जीवन ईश्वर-सेवा तथा गरीबों के लिए ही है।

मातरं पितरंचैव साक्षात् प्रत्यक्षदेवताम्।

मत्वा गृही निषेवेत सदा सर्वप्रयत्नत :

यह समझकर कि माता और पिता ईश्वर के साक्षात् रूप हैं, गृहस्थ को चाहिए कि वह उन्हें सदैव सब प्रकार से प्रसन्न रखे।

तुष्टायां मातरि शिवे तुष्टे पितरि पार्वति।

तव प्रीतिर्भवेददेवि परब्रह्म प्रसीदति॥

यदि उसके माता-पिता प्रसन्न रहते हैं, तो ईश्वर उसके प्रति प्रसन्न होते हैं।

औद्धत्यं परिहासं च तर्जनं परिभाषणम्।

पित्रोरप्रे न कुर्वोत यदीच्छेदात्मनो हितम्॥

मातरं पितरं वीक्ष्य नत्वोत्तिष्ठेत् ससंभूमः।

विनाज्ञया नोपविशेत् संस्थितः पितृशासने॥

अपने माता-पिता के सम्मुख औद्धत्य, परिहास, चंचलता अथवा क्रोध प्रकट न करे। वह पुत्र वास्तव में श्रेष्ठ है, जो अपने माता-पिता के प्रति एक भी कटु शब्द नहीं कहता। माता-पिता के दर्शन कर उसे चाहिए कि वह उन्हें आदर-पूर्वक प्रणाम करे। उनके आने पर वह खड़ा हो जाए और तब तक वे उससे बैठने को न कहें, तब तक न बैठे

मातरं पितरं पुत्रम् दारानतिथिसोदरान्।

हित्वा ग्रही न भुञ्जीयात् प्राणौ : कण्ठगतैरपि॥

वञ्चयित्वागुरुन् बन्धून् यो भुड् क्ते स्वोदरम्भरि :

इहैव लोके गर्ह्योअसौ परत्र नारकी भवेत्॥

जो गृहस्थ अपने माता, पिता, बच्चों, स्त्री तथा अतिथि को बिना भोजन कराये स्वयं कर लेता है, वह पाप का भागी होता है।

जनन्या वर्धितो देहो जनकेन प्रयोजित :

स्वजनै : शिक्षित : प्रीत्यसोअधमस्तान् परित्यजेत्॥

एषमर्थे महेशनि कृत्वा कष्टशतान्यपि।

प्रीणयेत् सततं शक्त्या धर्मो ह्यषे सनातन :

पिता-माता द्वारा ही यह शरीर उत्पन्न हुआ है, अतएव उन्हें प्रसन्न करने के लिए मनुष्य को हजार-हजार कष्ट भी सहने चाहिए।

न भार्या ताडयेत् क्वापि मातृवत् पालयेत् सदा।

न त्यजेत् घोरकष्टेअपि यदि साध्वी पतिव्रता॥

स्थितेषु स्वीयदारेषु स्त्रीयमान्यां न संस्पृशेत्।

दुष्टेन चेतसा विद्वान् अन्यथा नारकी भवेत्॥

विरले शयनं वासं त्यजेत् प्राज्ञ : परस्त्रिया।

अयु क्तभाषणञ्चैव स्त्रियं शौर्यम् न दर्शयेत्॥

धनेन वाससा प्रेम्णा श्रद्धयामृतभाषाणे :

सततं तोषयेत् दारान् नाप्रियं क्वचिदाचरेत्॥

 

यस्मिन्नरे महेशानि तुष्टा भार्या पतिव्रता।

सर्वो धर्म : कृतस्तेन भवतीप्रिय एव स :

इसी प्रकार मनुष्य का अपनी स्त्री के प्रति भी कर्तव्य है। गृहस्थ को अपनी स्त्री को कभी घुड़कना न चाहिए और उसका मातृवत् पालन करना चाहिए। यदि उसकी स्त्री साध्वी और पतिव्रता है, तो वह घोर कष्ट में भी उसका त्याग न करें। जो मनुष्य अपनी स्त्री के अतिरिक्त किसी दूसरी स्त्री का कलुषित मन से चिंतन करता है, वह घोर नरक में जाता है। ज्ञानी मनुष्य को चाहिए कि वह परस्त्री के साथ निर्जन में शयन या वास न करे। स्त्रियों के सम्मुख अनुचित वाक्य न कहे, और न 'मैंने यह किया, वह किया' आदि कहकर अपने मुख से अपनी बड़ाई ही करे। अपनी स्त्री को धन, वस्त्र, प्रेम, श्रद्धा एवं अमृततुल्य वाक्य द्वारा प्रसन्न रखे और उसे किसी प्रकार क्षुब्ध न करे। हे पार्वती, जो पुरुष अपनी पतिव्रता स्त्री का प्रेमभाजन बनने में सफल होता है, उसे समझो कि अपने स्वधर्म के आचरण में सफलता मिल गयी। ऐसा व्यक्ति तुम्हारा प्रिय होता है।

चतुर्वर्षावधि सुतान् लालयेत् पलायेत् सदा।

तत : षोडशपर्यन्तं गुणान् दिद्याञ्च शिक्षयेत्॥

विंशत्यब्दाधिकान् पुत्रान् प्रेरयेत् गृहकर्मसु।

ततस्तांस्तुलभावेन मत्वा स्नेहं प्रदर्शयेत्॥

कन्याप्येवं पालनीया शिक्षणीयातियत्नत :

देया वराय विदुषे धनरत्नसमन्विता॥

पुत्र-कन्या के प्रति गृहस्थ के निम्नलिखित कर्तव्य है:

चार वर्ष की अवस्था तक पुत्रों का खूब लाड़-प्यार करना चाहिए, फिर सोलह वर्ष की अवस्था तक उन्हें नानाविध सद्गुणों और विद्याओं की शिक्षा देनी चाहिए। जब वे बीस वर्ष हो जाएं, तो उन्हें किसी गृह-कर्म में लगा देना चाहिए। तब पिता को चाहिए कि उन्हें अपनी बराबरी का समझकर उनके प्रति स्नेह-प्रदर्शन करे। ठीक इसी तरह कन्याओं का भी लालन-पालन करना चाहिए; उनकी शिक्षा बहुत ध्यानपूर्वक होनी चाहिए, और जब उनका विवाह हो, तो पिता को उन्हें धन-आभूषणादि देना चाहिए।

एवं क्रमेण भ्रातृश्च स्वसृभातृसुतानपि।

ज्ञातीन् मित्राणि भृत्यान्श्च पालयेत्तोषयेद् गृही ॥

तत : स्वधर्मनिरतानेकग्रामनिवासिन :

अभ्यागतानुदासीनान् गृहस्थ : परिपालयेत्॥

यद्येवं नाचरेद्देवि गृहस्थो विभवे सति।

पशुरेव स विज्ञेय : स पापी लोकगर्हित :

इसी प्रकार गृहस्थ को अपने भाई-बहिन, भतीजे, भांजे तथा अन्य सगे-संबंधी मित्र एवं नौकरों का भी पालन करना चाहिए ओर उन्हें संतुष्ट रखना चाहिए। फिर गृहस्थ को यह भी चाहिए कि वह स्वधर्मरत अपने ग्राम-वासियों, अभ्यागतों ओर उदासीनों का पालन करे। हे देवि, धनसंपन्न होते हुए भी जो गृहस्थ अपने कुटुंबियों तथा निर्धनों की सहायता नहीं करता, वह निंदनीय और पापी है, उसे तो पशुतुल्य ही समझना चाहिए।

निद्रालस्यं देहयत्नम् केशविन्यासमेव च।

आसक्तिमशने वस्त्रे नातिरिक्तं समाचरेत्॥

युक्ताहारो युक्तनिद्रो मितवाड् मितमैथुन :

स्वच्छो नम्र : शुचिर्दक्षो युक्त : स्यात् सर्वकर्मसु॥

गृहस्थ को अत्यंत निद्रा, आलस्य, देह की सेवा, केश-विन्यास तथा भोजन-वस्त्र में आसक्ति का त्याग करना चाहिए। उसे आहार, निद्रा, भाषण, मैथुन इत्यादि सब बातें परिमित रूप से करनी चाहिए। उसे अकपट, नम्र, बाह्याभ्यांतर शौच-संपन्न, निरालस्य और उद्योगशील होना चाहिए।

शूर : शत्रों विनीत : स्यात् बान्धवे गुरुसन्निधौ।।

गृहस्थ को अपने शत्रु के सामने शूर होना चाहिए और गुरु और बंधुजनों के समक्ष नम्र।

शत्रु के सम्मुख शूरता प्रकट करके उसे उस पर शासन करना चाहिए। यह गृहस्थ का आवश्यक कर्तव्य है। गृहस्थ को घर में कोने में बैठकर रोना और 'अहिंसा परमो धर्म:' कहकर खाली बकवास न करना चाहिए। यदि वह शत्रु के सम्मुख वीरता नहीं दिखाता है, तो वह अपने कर्तव्य की अवहेलना करता है। किंतु अपने बंधु-बांधव, आत्मीय-स्वजन एवं गुरु के निकट उसे गौ के समान शांत एवं निरीह भाव अवलंबन करना चाहिए।

जुगुप्सितान् न मन्येत नावमन्येत मानिन :

निंदित असत् व्यक्ति को वह सम्मान न दे और न सम्माननीय व्यक्ति का अनादर करे।

असत् व्यक्ति के प्रति सम्मान प्रदर्शित करना गृहस्थ का कर्तव्य नहीं है, क्योंकि ऐसा करने से वह असद् विषय को आश्रय देता है। और यदि सम्मान योग्य व्यक्ति को वह सम्मान नहीं देता है, तो भी बड़ा अन्याय करता है।

सौहार्द व्यवहाररांश्च प्रवृत्ति प्रकृति नृणाम्।

सहवासेन तर्केश्च विदित्वा विश्वसेत्तत :

एक साथ रहकर, विशेष निरीक्षण के द्वारा वह पहले मनुष्य का स्नेह, व्यवहार, प्रवृत्ति और प्रकृति जान ले, फिर उस पर विश्वास करे।

ऐरे-गैरे जिस किसी भी व्यक्ति के साथ वह मित्रता न कर बैठे। जिसके साथ उसे मित्रता करने की इच्छा हो, उसके कार्य-कलाप तथा अन्य लोगों के साथ उसके व्यवहार की वह पहले भली-भाँति जाँच कर ले, और फिर उससे मित्रता करे।

स्वीय यश : पौरुषम् च गुप्तये कथितं च यत्।

कृतं यदुपकाराय धर्मज्ञो न प्रकाशयेत्॥

धर्मज्ञ गृही व्यक्ति को चाहिए कि वह अपना यश, पौरुष, दूसरों की बतायी हुई गुप्त बात तथा दूसरों के प्रति उसने जो कुछ उपहार किया है, इन सबका वर्णन सर्वसाधारण के सम्मुख न करे।

उसे अपने वैभव अथवा अभाव आदि की भी बात नहीं करना चाहिए। उसे अपने धन पर गर्व करना उचित नहीं। ऐसे विषय वह गुप्त ही रखें। यही उसका धर्म है। यह केवल सांसरिक अभिज्ञता नहीं है, यदि कोई मनुष्य ऐसा नहीं करता, तो वह दुर्नीतिपरायण कहा जा सकता है।

गृहस्थ सारे समाज की नींव सदृश है; वही मुख्य धन उपार्जन करनेवाला होता है। निर्धन, दुर्बल, स्त्री-बच्चे आदि जो कार्य करने योग्य नहीं हैं, वे सब गृहस्थ के ऊपर ही निर्भर रहते हैं। अतएव गृहस्थ को कुछ कर्तव्य करने पड़ते हैं। और ये कर्तव्य ऐसे होने चाहिए कि उनका साधन करते-करते वह अपने हृदय में शक्ति का विकास अनुभव करे और ऐसा न सोचे कि वह अपने आदर्शनुसार कार्य नहीं कर रहा है। इसी कारण -

जुगुप्सितप्रवृतौ च निश्चितेअपि पराजये।

गुरुणा लघुना चापि यशस्वी न विवादयेत्॥

यदि उसने कोई अन्याय अथवा निंदनीय कार्य कर डाला है, तो उसे दूसरों के सम्मुख प्रकट नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार यदि वह ऐसी किसी बात में लगा है, जिसमें वह अपनी असफलता निश्चित मानता है, तो उसे उसकी भी चर्चा नहीं करना चाहिए। इस प्रकार आत्मदोष प्रकट करने से कोई लाभ तो होता नहीं, बल्कि उलटा इसके द्वारा मनुष्य हतोत्साहित हो जाता है, और इस प्रकार उसके कर्तव्य-कर्मों में बाधा पड़ती है।

विद्याधनयशोधर्मान् यतमान उपार्जयेत्।

व्यसनं चासतां संगं मिथ्याद्रोहं परित्यजेत्। . . ५८॥

उसे चाहिए कि वह यत्नपूर्वक विद्या, धन, यश और धर्म का उपार्जन करे तथा व्यसन (द्यूत-कीड़ा आदि), कुसंग, मिथ्याभाषण एवं परद्रोह का परित्याग करे।

उसे सबसे पहले ज्ञानलाभ के लिए चेष्टा करनी चाहिए। फिर उसे धनोपार्जन के लिए भी यत्न करना चाहिए। यही उसका कर्तव्य है, और यदि वह अपने इस कर्तव्य को नहीं करता, तो उसकी गणना मनुष्यों में नहीं। जो गृहस्थ धनोपार्जन की चेष्टा नहीं करता, वह दुर्नीतिपरायण है। यदि यह आलस्यभाव से जीवनयापन करता है और उसी में संतुष्ट रहता है, तो वह असत्-प्रकृतिवाला है; क्योंकि उसके ऊपर अनेकों व्यक्ति निर्भर रहते हैं। यदि वह यथेष्ट धन उपार्जन करता है, तो उससे सैकड़ों का पालन पोषण होता है।

यदि तुम्हारे इस शहर में सैकड़ों लोगों ने धनी बनने की चेष्टा न की होती, तो यह सभ्यता, ये अनाथाश्रम और ये हवेलियाँ कहाँ से आतीं?

ऐसी दशा में धनोपार्जन करना कोई अन्याय नहीं है, क्योंकि यह धन वितरण के लिए ही होता है। गृहस्थ ही समाज-जीवन का केंद्र है। उसके लिए धन कमाना तथा उसका सत्कर्मों में व्यय करना ही उपासना है। जिस प्रकार एक संन्यासी को अपनी कुटी में बैठकर की हुई उपासना उसके मुक्ति-लाभ में सहायक होती है, उसी प्रकार एक गृहस्थ की भी सदुपाय तथा सदुउद्देश्य से धनी होने की चेष्टा उसके मुक्ति-लाभ में सहायक होती है; क्योंकि इन दोनों में ही हम, ईश्वर तथा जो कुछ ईश्वर का है, उस सबके प्रति भक्ति से उत्पन्न हुए आत्मसमर्पण एवं आत्मत्याग का ही प्रकाश पाते हैं; भेद है केवल प्रकाश के रूप भर में।

उसे सभी प्रकार यश अर्जन की चेष्टा करनी चाहिए। जुआ खेलना, दुष्ट व्यक्तियों का संग, असत्य भाषण तथा दूसरों को कष्ट पहुँचना - उसे कभी नहीं करना चाहिए।

बहुधा देखा जाता है कि लोग ऐसे कार्यों में प्रवृत हो जाते हैं, जो उनकी शक्ति के बाहर होते हैं। इसका फल यही होता है कि उन्हें फिर अपनी उद्देश्य-सिद्धि के लिए दूसरों को धोखा देना पड़ता है। फिर सभी बातों में इस 'समय' की ओर विशेष दृष्टि रखनी चाहिए। एक समय जिसमें असफलता हुई है, संभव है, उसी में दूसरे समय पूरी सफलता प्राप्त हो जाए।

सत्यं मृदु प्रियं धीरो वाक्यं हितकरं वदेत्।

आत्मोत्कर्ष तथा निन्दां परेषां परिवर्जयेत्॥

धीर गृहस्थ को सत्य, मृदु, प्रिय तथा हितकर वचन बोलने चाहिए। वह अपने उत्कर्ष की चर्चा न करे और दूसरों की निंदा करना छोड़ दे।

जलाशयाश्च वृक्षाश्च विश्रामगृहध्वनि।

सेतु : प्रतिष्ठितो येन तेन लोकत्रयं जितम्॥

जो व्यक्ति सब लोगों की सुविधा के लिए जलाशय खुदवाता है, सड़कों पर वृक्ष लगता है, धर्मशालाएँ तथा सेतु-निर्माण करता है, वह बड़े बड़े योगियों को जो पद प्राप्त होता है, उसी की ओर अग्रसर होता रहता है।

यह कर्मयोग का एक अंग है-क्रियाशीलता, गृहस्थ का कर्तव्य। आगे चल-कर उक्त तंत्र-ग्रंथ में एक और श्लोक आया है :

न विभेति रणाद् यो वै संग्रामेऽप्यपराङमुखः।

धर्मयुद्धो मृतो वापि तेन लोकत्रयं जितम्॥

जो मनुष्य युद्ध में नहीं डरता, पीठ नहीं दिखाता और जो धर्मयुद्ध में मृत्यु को प्राप्त होता है, वह तीनों लोकों को जीत लेता है।

यदि स्वदेश अथवा स्वधर्म के लिए युद्ध करते करते मनुष्य की मृत्यु ही जाए, तो योगीजन जिस पद को ध्यान द्वारा पाते हैं, वही पद उस मनुष्य को भी मिलता है। इससे यह स्पष्ट है कि जो एक मनुष्य का कर्तव्य है, वह दूसरे मनुष्य का कर्तव्य नहीं भी हो सकता; परंतु साथ ही, शास्त्र किसी के भी कर्तव्य की हीन अथवा उन्नत नहीं कहते। हर कर्तव्य का एक अपना स्थान होता है, और हम जिस अवस्था में हों, उसी के अनुरूप कर्तव्य हमें करना चाहिए।

इस सबसे हमें एक भाव यह मिलता है कि दुर्बलता मात्र हेय है। हमारे दर्शन, धर्म अथवा कर्म के अंतर्गत यह भाव मुझे पसंद है। यदि तुम वेदों को पढ़ो, तो देखोगे कि उसमें 'नाभयेत्' 'अभी:' अर्थात् किसी से भी डरना नहीं चाहिए-यह बात बार-बार दुहरायी गयी है। भय दुर्बलता का चिन्ह है। इसलिए संसार के उपहास अथवा व्यंग की ओर तनिक भी ध्यान न देकर मनुष्य को अपना कर्तव्य करते रहना चाहिए।

यदि कोई मनुष्य ईश्वरोपासना के निमित्त संसार से विरक्त हो जाए, तो उसे यह नहीं समझना चाहिए कि जो लोग संसार में रहकर संसार के हित के लिए कार्य करते हैं, वे ईश्वर की उपासना नहीं करते; और न अपने स्त्री-बच्चों के लिए संसार में रहनेवाले गृहस्थों को ही यह सोचना चाहिए कि जिन लोगों ने संसार का त्याग कर दिया है, वे आलसी और निकम्मे हैं। अपने अपने स्थान में सभी बड़े हैं। इस बात को मैं एक दृष्टांत द्वारा स्पष्ट करूँगा।

एक राजा अपने राज्य में जब कभी कोई संन्यासी आते, तो उनसे सदैव एक प्रश्न पूछा करता था- "संसार का त्याग कर जो संन्यास ग्रहण करता है, वह श्रेष्ठ है, अथवा संसार में रहकर जो गृहस्थ के समस्त कर्तव्यों को करता जाता है, वह श्रेष्ठ है?" अनेक विद्वान् लोगों ने उसके इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयत्न किया। कुछ लोगों ने कहा कि संन्यासी श्रेष्ठ है। यह सुनकर राजा ने उनसे वह बात सिद्ध करने को कहा। जब वे सिद्ध न करे, तो राजा ने उन्हें विवाह करके गृहस्थ हो जाने की आज्ञा दी। कुछ और लोग आये और उन्होंने कहा, "स्वधर्मपरायण गृहस्थ ही श्रेष्ठ है।" राजा ने उनसे भी उनकी बात के लिए प्रमाण मांगा। पर वे जब प्रमाण न दे सके, तो राजा ने उन्हें भी गृहस्थ हो जाने की आज्ञा दी।

अंत में एक तरुण संन्यासी आये। राजा ने उनसे भी उसी प्रकार प्रश्न किया। संन्यासी ने कहा, "हे राजन् अपने अपने स्थान में दोनों ही श्रेष्ठ है, कोई भी कम नहीं है।" राजा ने उसका प्रमाण माँगा। संन्यासी ने उत्तर दिया, "हाँ, मैं इसे सिद्ध कर दूँगा, परंतु आपको मेरे साथ आना होगा और कुछ दिन मेरे ही समान जीवन व्यतीत करना होगा। तभी मैं आपको अपनी बात का प्रमाण दे सकूंगा।" राजा ने संन्यासी की बात स्वीकार कर ली और वह उनके पीछे पीछे जाने लगा। वह उन संन्यासी के साथ अपनी राज्य की सीमा को पार कर अनेक देशों में से होता हुआ एक बड़े राज्य में आ पहुँचा। उस राज्य की राजधानी में एक बड़ा उत्सव मनाया जा रहा था। राजा और संन्यासी ने संगीत और नगाड़ों के शब्द सुने तथा डौडी पीटने वालों की आवाज़ भी। लोग सड़कों पर सुसज्जित होकर कतारों में खड़े थे। उसी समय कोई एक विशेष घोषणा की जा रही थी। उपर्युक्त राजा तथा संन्यासी भी यह सब देखने के लिए खड़े हो गए। घोषणा करने वाले ने चिल्लाकर कहा, "इस देश की राजकुमारी का स्वयंवर होने वाला है।"

राजकुमारियों का अपने लिए इस प्रकार पति चुनना भारत में एक पुरानी प्रथा थी। अपने भावी पति के संबंध में प्रत्येक राजकुमारी के अलग-अलग विचार होते थे। कोई अत्यंत विद्वान, कोई अत्यंत धनवान, आदि-आदि। अड़ोस-पड़ोस के राज्यों के राजकुमार सुंदर से सुंदर ढंग से अपने को सजाकर राजकुमारी के सम्मुख उपस्थित होते थे। कभी-कभी उन राजकुमारों के भी भाट होते थे, जो उनके गुणों का गान करते तथा यह दर्शाते थे कि उन्हीं का वरण किया जाए। राजकुमारी को एक सजे हुए सिंहासन पर बैठाकर आलीशान ढंग से सभा के चारों ओर ले जाया जाता था। वह उन सबके सामने जाती तथा उनका गुणगान सुनती। यदि उसे कोई राजकुमार नापसंद होता, तो वह अपने वाहकों से कहती, "आगे बढ़ो", और उसके पश्चात् उस नापसंद राजकुमार का कोई ख्याल तक न किया जाता था। यदि राजकुमारी किसी राजकुमार से प्रसन्न हो जाती, तो वह उसके गले में वरमाला डाल देती और वह राजकुमार उसका पति हो जाता था।

जिस देश में यह राजा और संन्यासी आये हुए थे, उस देश में इसी प्रकार का एक स्वयंवर हो रहा था। यह राजकुमारी संसार में अद्वितीय सुंदरी थी और उसका भावी पति ही उसके पिता के बाद उसके राज्य का उत्तराधिकारी होने वाला था। इस राजकुमारी का विचार एक अत्यंत सुंदर पुरुष से विवाह करने का था, परंतु उसे योग्य व्यक्ति मिलता ही न था। कई बार उसके लिए स्वयंवर रचे गए, पर राजकुमारी को अपने मन का पति न मिला। इस बार का स्वयंवर सबके भव्य था; अन्य सभी अवसरों की अपेक्षा इस बार अधिक लोग आये थे। राजकुमारी रत्नजटित सिंहासन पर बैठकर आयी और उसके वाहक उसे एक राजकुमार के सामने से दूसरे के सामने ले गए परंतु उसने किसी की ओर देखा तक नहीं। सभी लोग निराश हो गए और सोचने लगे कि क्या अन्य अवसरों की भाँति इस बार का स्वयंवर भी असफल ही रहेगा। इतने ही में वहाँ एक दूसरा तरुण संन्यासी आ पहुँचा। वह इतना सुंदर था कि मानो सूर्यदेव ही आकाश छोड़कर स्वयं पृथ्वी पर उतर आये हों। वह आकर सभा के एक ओर खड़ा हो गया और जो कुछ हो रहा था, उसे देखने लगा। राजकुमारी का सिंहासन उसके समीप आया, और ज्यों ही उसने उस सुंदर संन्यासी को देखा, त्यों ही वह रुक गयी और उसके गले में वरमाला डाल दी। तरुण संन्यासी ने एकदम माला को रोक लिया और यह कहते हुए 'छि:, छि:, यह क्या है?' उसे फेंक दिया। उसने कहा, "मैं संन्यासी हूँ, मुझे विवाह से क्या प्रयोजन?" उसे देश के राजा ने सोचा कि शायद निर्धन होने के कारण यह राजकुमारी से विवाह करने का साहस नहीं कर रहा है। अतएव उसने उससे कहा, "देखो, मेरी कन्या के साथ तुम्हें मेरा आधा राज्य अभी मिल जाएगा, और संपूर्ण राज्य मेरी मृत्यु के बाद!" और यह कहकर उसने संन्यासी के गले में फिर माला डाल दी। उस युवा संन्यासी ने माला फिर निकालकर फेंक दी और कहा, "छि:, यह सब क्या झंझट है, मुझे विवाह से क्या मतलब?" और यह कहकर वह तुरंत सभा छोड़कर चला गया।

इधर राजकुमारी इस युवा पर इतनी मोहित हो गयी कि उसने कह दिया, "मैं इसी मनुष्य से विवाह करूँगी, नहीं तो प्राण त्याग दूँगी।" और राजकुमारी संन्यासी के पीछे पीछे उसे लौटा लाने के लिए चल पड़ी। इस अवसर पर हमारे पहले संन्यासी ने, जो राजा को यहाँ लाये थे, राजा से कहा, "राजन्, चलिए, इन दोनों के पीछे पीछे हम लोग भी चलें।" निदान, वे उनके पीछे पीछे पर्याप्त अंतर रखते हुए चलने लगे। वह युवा संन्यासी, जिसने राजकुमारी से विवाह करने से इंकार कर दिया था, कई मील निकाल गया और अंत में एक जंगल में घुस गया। उसके पीछे राजकुमारी थी, और उन दोनों के पीछे ये दोनों। तरुण संन्यासी उस बन से भली भाँति परिचित था तथा वहाँ के सारे जटिल रास्तों का उसे ज्ञान था। वह एकदम एक रास्ते में घुस गया और अदृश्य हो गया। राजकुमारी उसे फिर देख न सकी। उसे काफी देर ढूंढने के बाद अंत में वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गयी और रोने लगी, क्योंकि उसे बाहर निकालने का मार्ग नहीं मालूम था। इतने में यह राजा और संन्यासी उसके पास आए और उससे कहा, "रोओ मत, तुम्हें इस जंगल के बाहर निकाल ले चलेंगे, परंतु अब बहुत अँधेरा हो गया है, जिससे रास्ता ढूँढना सहज नहीं। यहीं एक बड़ा पेड़ है, आओ, इसी के नीचे हम सब विश्राम करें और सवेरा होते ही हम तुम्हें मार्ग बता देंगे।"

अब, उस पेड़ की एक डाली पर एक छोटी चिड़िया, उसकी पत्नी तथा उसके तीन बच्चे रहते थे। उस चिड़िया ने पेड़ के नीचे इन लोगों को देखा और अपनी पत्नी से कहा, "देखो, हमारे यहाँ ये लोग अतिथि हैं, जाड़े का मौसम है, हम लोग क्या करें? हमारे पास आग तो है नहीं।" यह कहकर वह उड़ गया और एक जलती हुई लकड़ी का टुकड़ा अपनी चोंच में दबा लाया और उसे अतिथियों के सामने गिरा दिया। उन्होंने उस लकड़ी में लगा लगाकर खूब आग तैयार कर ली; परंतु चिड़िया को फिर भी संतोष न हुआ। उसने अपनी स्त्री से फिर कहा, "बताओ, अब हमें क्या करना चाहिए? ये लोग भूखे हैं, और इन्हें खिलाने के लिए हमारे पास कुछ भी नहीं है। हम लोग गृहस्थ हैं और हमारा धर्म है कि जो कोई हमारे घर आये, उसे हम भोजन करायें। जो कुछ मेरी शक्ति में है, मुझे अवश्य करना करना चाहिए; मैं उन्हें अपना यह शरीर ही दे दूँगा।" ऐसा कहकर वह आग में कूद पड़ा और भून गया। अतिथियों ने उसे आग में गिरते देखा, उसे बचाने का यत्न भी किया, परंतु बचा न सके। उस चिड़िया की स्त्री ने अपने पति का सुकृत्य देखा और अपने मन में कहा, "ये तो तीन लोग हैं, उनके भोजन के लिए केवल एक ही चिड़िया पर्याप्त नहीं। पत्नी के रूप में मेरा यह कर्तव्य है की अपने पति के परिश्रमों को मैं व्यर्थ न जाने दूँ। वे मेरा भी शरीर लें।" और ऐसा कहकर वह भी आग में गिर गयी और भुन गयी।

इसके बाद जब उन तीन छोटे बच्चों ने देखा कि उन अतिथियों के लिए इतना तो पर्याप्त न होगा, तो उन्होंने आपस में कहा, "हमारे माता-पिता से जो कुछ बन पड़ा, उन्होंने किया, परंतु फिर भी उतना पूरा न पड़ेगा। अब हमारा धर्म है कि हम उनके कार्य को पूरा करें-हमें भी अपने शरीर दे देने चाहिए।" और यह कहकर वे सब आग में कूद पड़े।

यह सब देखकर ये तीनों लोग बहुत चकित हुए। इन चिड़ियों को वे खा ही कैसे सकते थे। रात को बिना वे भोजन किए ही रहे। प्रात:काल राजा तथा संन्यासी ने राजकुमारी को जंगल का मार्ग दिखला दिया, और वह अपने पिता के घर वापस चली गयी।

तब संन्यासी ने राजा से कहा, "देखिए राजन्, आपको अब ज्ञात हो गया कि हरेक अपने क्षेत्र में महान् है। यदि आप संसार में रहना चाहते हैं, तो इन चिड़ियों के समान रहिए, दूसरों के लिए अपना जीवन दे देने को सदैव तत्पर रहिए। और यदि आप संसार छोड़ना चाहते हैं, तो उस युवा संन्यासी के समान होइए, जिसके लिए वह परम सुंदरी स्त्री और एक राज्य भी तृणवत् था। यदि गृहस्थ होना चाहते हैं, तो दूसरों के हित के लिए अपना जीवन अर्पित कर देने के लिए तैयार रहिए। और यदि आपको संन्यास-जीवन की इच्छा है, तो सौंदर्य, धन तथा अधिकार की ओर आँख तक न उठाइए। हरेक अपने क्षेत्र में महान् है, परंतु एक का कर्तव्य दूसरे का कर्तव्य नहीं हो सकता।"

 

 

कर्म का रहस्य

दूसरों की शारीरिक आवश्यकताओं की निवारण करके उनकी भौतिक सहायता करना महान् कर्म अवश्य है परंतु अभाव की मात्रा जितनी अधिक रहती है तथा सहायता जितनी दूर तक अपना अवसर कर सकती है, उसी मात्रा में वह उच्चतर होती है। यदि एक मनुष्य के अभाव एक घंटे के लिए हटाये जा सकें, तो यह उसकी सहायता अवश्य है, और यदि एक साल के लिए हटाये जा सकें तो यह उससे भी अधिक सहायता है; पर यदि उसके अभाव सदा के लिए दूर कर दिये जाएं, तो सचमुच वह उसके लिए सबसे अधिक सहायता होगी। केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही ऐसा है, जो हमारे दु:खों को सदा के लिए नष्ट कर दे सकता है; अन्य किसी प्रकार के ज्ञान से आवश्यकताओं की पूर्ति केवल अल्प समय के लिए ही होती है। केवल आध्यात्मिक ज्ञान द्वारा ही हमारी दैन्य-क्लेशों का सदा के लिए अंत हो सकता है। अतएव किसी मनुष्य की आध्यात्मिक सहायता करना ही उसकी सबसे बड़ी सहायता करना है। जो मनुष्य को परमार्थिक ज्ञान दे सकता है, वही मानव समाज का सबसे बड़ा हितैषी है। हम देखते भी हैं कि जिन व्यक्तियों ने मनुष्य की आध्यात्मिक सहायता की है, वे ही वास्तव में सबसे अधिक शक्तिसंपन्न थे। कारण यह है की अध्यात्मिकता ही हमारे जीवन के समस्त कृत्यों का सच्चा आधार है। आध्यात्मिक शक्तिसंपन्न पुरुष यदि चाहे तो, हर विषय से सक्षम हो सकता है। और जब तक मनुष्य में आध्यात्मिक बल नहीं आता, तब तक उसकी भौतिक आवश्यकताएँ भी भली भाँति तृप्त नहीं हो सकतीं। आध्यात्मिक सहायता से नीचे है-बौद्धिक सहायता। यह ज्ञान-दान भोजन तथा वस्त्र के दान से कहीं श्रेष्ठ है; इतना ही नहीं, वरन् प्राणदान से भी उच्च है, क्योंकि ज्ञान ही मनुष्य का प्रकृत जीवन है। अज्ञान ही मृत्यु है, और ज्ञान जीवन। यदि जीवन अंधकारमय है और अज्ञान तथा क्लेश में बीतता है, तो ऐसे जीवन का मूल्य बहुत ही कम है। ज्ञान-दान से नीचे है शारीरिक सहायता। अतएव दूसरों की सहायता का प्रश्न उपस्थित होने पर हमें इस भ्रांत धारणा से सदा बचे रहने का प्रयत्न करना चाहिए कि शारीरिक सहायता ही एकमात्र सहायता है। वास्तव में शारीरिक सहायता तो सब सहायताओं में केवल अंतिम ही नहीं, वरन् निम्नतम श्रेणी की भी है, क्योंकि इसके द्वारा चिर तृप्ति नहीं हो सकती। भूखे रहने से जो कष्ट होता है, उसका परिहार भोजन कर लेने से ही हो जाता है, परंतु वह भूख पुन: लौट आती है। हमारे क्लेशों का अंत तो केवल तभी हो सकता है, जब हम तृप्त होकर सब प्रकार के अभावों से परे हो जाएं। तब क्षुधा हमें पीड़ित नहीं कर सकती और न कोई क्लेश अथवा दु:ख ही हमें विचलित कर सकता है। अतएव, जो सहायता हमें आध्यात्मिक बल देती है, वह सर्व श्रेष्ठ है; उससे नीचे है बौद्धिक सहायता; और उसके बाद है शारीरिक सहायता।

केवल शारीरिक सहायता द्वारा ही संसार के दु:खों से छुटकारा नहीं हो सकता। जब तक मनुष्य का स्वभाव ही परिवर्तित नहीं हो जाता, तब तक ये शारीरिक आवश्यकताएँ सदा बनी ही रहेंगी और फलस्वरूप क्लेशों का अनुभव भी सदैव होता रहेगा। कितनी भी शारीरिक सहायता उनका पूर्ण उपचार नहीं कर सकती। इस समस्या का केवल एक ही समाधान है और वह है मानव जाति को पवित्र कर देना। अपने चारों ओर हम जो अशुभ तथा तथा क्लेश देखते हैं, उन सबका केवल एक ही मूल कारण है-अज्ञान। मनुष्य को ज्ञानालोक दो, उसे पवित्र और आध्यात्मिक बलसंपन्न करो और शिक्षित बनाओ, तभी संसार से दु:ख का अंत हो जाएगा, अन्यथा नहीं। देश के प्रत्येक घर को हम सदावर्त में भले ही परिणत कर दें, देश को अस्पतालों से भले ही भर दें, परंतु जब तक मनुष्य का चरित्र परिवर्तित नहीं होता, तब तक दु:ख-क्लेश बना ही रहेगा।

भगवद्गीता में हम बार-बार पढ़ते हैं कि हमें निरंतर कर्म करते रहना चाहिए। कर्म स्वभावत: ही शुभ-अशुभ से निर्मित होता है। हम ऐसा कोई भी कर्म नहीं कर सकते, जिससे कहीं कुछ शुभ न हो; और ऐसा भी कोई कर्म नहीं है, जिससे कहीं न कहीं कुछ अशुभ न हो। प्रत्येक कर्म अनिवार्य रूप से गुणदोष से मिश्रित रहता है। परंतु फिर भी हमें सतत कर्म करते रहने का ही आदेश है। शुभ और अशुभ, दोनों के अपने अलग अलग परिणाम होंगे, वे भी कर्म की उत्पत्ति करेंगे। शुभ कर्मों का फल शुभ होगा और अशुभ कर्मों का फल अशुभ। परंतु शुभ और अशुभ, दोनों ही आत्मा के लिए बंधनस्वरूप हैं। इस संबंध में गीता का कथन है कि यदि हम अपने कर्मों में आसक्त न हों, तो हमारी आत्मा पर किसी प्रकार का बंधन नहीं पड़ सकता। अब हम यह देखेंगे कि 'कर्मों में अनासक्ति' का तात्पर्य क्या है।

गीता का केंद्रीय भाव यह है: निरंतर कर्म करते रहो, परंतु उसमें आसक्त मत होओ। संस्कार प्राय: मनुष्य की जन्मजात-प्रवृत्ति होता है। यदि मन को तालाब मान लिया जाए, तो उसमें उठने वाली प्रत्येक लहर, प्रत्येक तरंग जब शांत हो जाती है, तो वास्तव में वह बिल्कुल नष्ट नहीं हो जाती, वरन् चित्त में एक प्रकार का चिन्ह छोड़ जाती है तथा ऐसी संभावना का निर्माण कर जाती है, जिससे वह फिर उठ सके। इस चिन्ह तथा इस लहर के फिर से उठने की संभावना को मिलाकर हम 'संस्कार' कह सकते हैं। हमारा प्रत्येक कार्य, हमारा प्रत्येक अंग-संचालन, हमारा प्रत्येक विचार हमारे चित्त पर इसी प्रकार का एक संस्कार छोड़ जाता है; और यद्यपि ये संस्कार ऊपरी दृष्टि से स्पष्ट न हों, तथापि ये अवचेतन रूप से अंदर ही अंदर कार्य करने में पर्याप्त समर्थ होते हैं। हम प्रति मुहूर्त जो कुछ होते हैं, वह इन संस्कारों के समुदाय द्वारा ही नियमित होता है। मैं इस मुहूर्त जो कुछ हूँ, वह मेरे अतीत जीवन के समस्त संस्कारों का प्रभाव है। यथार्थत: इसे ही 'चरित्र' कहते हैं, और प्रत्येक मनुष्य का चरित्र इन संस्कारों की समष्टि द्वारा ही नियमित होता है। यदि शुभ संस्कारों का प्राबल्य रहे, तो मनुष्य का चरित्र अच्छा होता है, और यदि अशुभ संस्कारों का, तो बुरा। यदि एक मनुष्य निरंतर बुरे शब्द सुनता रहे, बुरे विचार सोचता रहे, बुरे कर्म करता रहे, तो उसका मन भी बुरे संस्कारों से पूर्ण हो जाएगा और बिना उसके जाने ही वे संस्कार उसके समस्त विचारों तथा कार्यों पर अपना प्रभाव डालते रहेंगे। वास्तव में ये बुरे संस्कार निरंतर अपना कार्य करते रहते हैं। अतएव बुरे संस्कार-संपन्न होने के कारण उस व्यक्ति के कार्य भी बुरे होंगे-वह एक बुरा आदमी बन जाएगा,-वह इससे बच नहीं सकता। इन संस्कारों की समष्टि उसमें दुष्कर्म करने की प्रबल प्रवृत्ति उत्पन्न कर देगी। वह इन संस्कारों के हाथ एक यंत्र सा होकर रह जाएगा, वे उसे बलपूर्वक दुष्कर्म करने के लिए बाध्य करेंगे। इसी प्रकार यदि एक मनुष्य अच्छे विचार रखे और सत्कार्य करे, तो उसके इन संस्कारों का प्रभाव भी अच्छा ही होगा तथा उसकी इच्छा न होते हुए भी वे उसे सत्कार्य करने के लिए प्रवृत करेंगे। जब मनुष्य इतने सत्कार्य एवं सत् चिंतन कर चुकता है कि उसकी इच्छा न होते हुए भी उसमें सत्कार्य करने की एक अनिवार्य प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है, तब फिर यदि वह दुष्कर्म करना भी चाहे, तो इन सब संस्कारों की समष्टि रूप से उसका मन उसे ऐसा करने से तुरंत रोक देगा; इतना ही नहीं, वरन् उसके ये संस्कार उसे मार्ग पर से हटा देंगे। तब वह अपने सत्संस्कारों के हाथ एक कठपुतली जैसा हो जाएगा। जब ऐसी स्थिति हो जाती है, तभी उस मनुष्य का चरित्र स्थिर कहलाता है।

जिस प्रकार कछुआ अपने सिर और पैरों को खोल के अंदर समेट लेता है, और तब उसे चाहे हम मार ही क्यों न डालें, उसके टुकड़े टुकड़े ही क्यों न कर डालें, पर वह बाहर नहीं निकलता, इसी प्रकार जिस मनुष्य ने अपने मन एवं इंद्रियों को वश में कर लिया है, उसका चरित्र भी सदैव स्थिर रहता है। वह अपनी आभ्यंतरिक शक्तियों को वश में रखता है और उसकी इच्छा के विरुद्ध संसार की कोई भी वस्तु उन्हें बहिर्मुख होने के लिए विवश नहीं कर सकती। मन के ऊपर इस प्रकार सद्विचारों एवं सुसंस्कारों का निरंतर प्रभाव पड़ते रहने से सत्कार्य करने की प्रवृत्ति प्रबल हो जाती है और इसके फलस्वरूप हम इंद्रियों (कर्मेंद्रिय तथा ज्ञानेंद्रियों दोनों) को वशीभूत करने में समर्थ होते हैं। तभी हमारा चरित्र स्थिर होता है, तभी हम सत्य-लाभ के अधिकारी हो सकते हैं। ऐसा ही मनुष्य सदैव निरापद रहता है, उससे किसी भी प्रकार भी बुराई नहीं हो सकती। उसको तुम कैसे भी लोगों के साथ रख दो, उसके लिए कोई खतरा नहीं रहता। इन शुभ संस्कारों से संपन्न होने की अपेक्षा एक और भी अधिक उच्चतर अवस्था है और वह है-मुक्ति लाभ की इच्छा। तुम्हें यह स्मरण रखना चाहिए कि सभी योगों का ध्येय आत्मा की मुक्ति है, और प्रत्येक योग समान रूप से उसी ध्येय की ओर ले जाता है। बुद्ध ने ध्यान से तथा ईसा ने प्रार्थना द्वारा जिस अवस्था की प्राप्ति की थी, मनुष्य केवल कर्म द्वारा भी उस अवस्था को प्राप्त कर सकता है। बुद्ध ज्ञानी थे और ईसा भक्त, पर वे दोनों एक ही लक्ष्य पर पहुँचे थे। यहाँ कठिनाई है। मुक्ति का अर्थ है, संपूर्ण स्वाधीनता-शुभ और अशुभ, दोनों प्रकार के बंधनों से छुटकारा पा जाना। इसे समझना जरा कठिन है। लोहे की जंज़ीर भी एक जंज़ीर है, और सोने की जंज़ीर भी एक जंज़ीर ही है। यदि हमारी अँगुली में एक काँटा चुभ जाए, तो उसे निकालने के लिए हम एक दूसरा काँटा काम में लाते हैं, परंतु जब वह निकल जाता है, तो हम दोनों को ही फेंक देते हैं। हमें फिर दूसरे काँटे को रखने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती, क्योंकि दोनों आखिर काँटे ही तो हैं। इसी प्रकार कुसंस्कारों का नाश शुभ संस्कारों द्वारा करना चाहिए और मन के अशुभ विचारों को शुभ विचारों द्वारा दूर करते रहना चाहिए, जब तक कि समस्त अशुभ विचार लगभग नष्ट न हो जाएं अथवा पराजित न हो जाएं या वशीभूत होकर मन में कहीं एक कोने में न पड़े रह जाएं। परंतु उसके उपरान्त शुभ संस्कारों पर भी विजय प्राप्त करना आवश्यक है। तभी जो 'आसक्त' था, वह 'अनासक्त' हो जाता है। कर्म करो, अवश्य करो, पर उस कर्म अथवा विचार को अपने मन के ऊपर कोई गहरा प्रभाव न डालने दो। लहरें आयें और जाएं मांसपेशियों और मस्तिष्क से बड़े-बड़े कार्य होते रहें, पर वे आत्मा पर किसी प्रकार का गहरा प्रभाव न डालने पायें।

अब प्रश्न यह है कि यह कैसे हो सकता है? हम देखते हैं कि हम जिस किसी कर्म में लिप्त हो जाते हैं, उसका संस्कार हमारे मन में रह जाता है। दिन भर में मैं सैकड़ों आदमियों से मिला, और उन्हीं में एक ऐसे व्यक्ति से भी मिला, जिससे मुझे प्रेम है। तब यदि रात को सोते समय मैं उन सब लोगों को स्मरण करने का प्रयत्न करूँ, तो देखूँगा कि मेरे सम्मुख केवल उसी व्यक्ति का चेहरा आता है, जिसे मैं प्रेम करता हूँ, भले ही उसे मैंने केवल एक ही मिनट के लिए देखा हो। उसके अतिरिक्त अन्य सब व्यक्ति अंतर्हित हो जाते हैं। ऐसा क्यों? इसलिए कि इस व्यक्ति के प्रति मेरी विशेष आसक्ति ने मेरे मन पर अन्य सभी की अपेक्षा एक अधिक गहरा प्रभाव डाल दिया था। शरीर-विज्ञान की दृष्टि से तो सभी व्यक्तियों का प्रभाव एक सा ही हुआ था। प्रत्येक व्यक्ति का चेहरा नेत्रपट पर उतार आया था और मस्तिष्क में उसके चित्र भी बन गए थे। परंतु फिर भी मन पर इस सबका प्रभाव एक समान नहीं पड़ा। संभवत: अधिकांश व्यक्तियों के चेहरे एकदम नये थे, जिनके बारे में मैंने पहले कभी विचार भी न किया होगा; परंतु वह एक चेहरा, जिसकी मुझे केवल एक झलक ही मिली थी, भीतर तक समा गया! शायद इस चेहरे का चित्र मेरे मन में वर्षों से रहा हो और मैं उसके बारे में सैकड़ों बातें जानता होऊँ; अत: उसकी इस एक झलक ने ही मेरे मन में उन सैकड़ों सोती हुई स्मृतियों को जगा दिया। और इसीलिए शेष अन्य सब चेहरों को देखने के समवेत फलस्वरूप मन में जितना संस्कार पड़ा, उसकी अपेक्षा सैकड़ों गुना अधिक इस संस्कार को आवृति होते रहने के कारण मन पर उसका इतना प्रबल प्रभाव पड़ा।

अतएव अनासक्त होओ; कार्य होते रहने दो-मस्तिष्क के केंद्र अपना अपना कार्य कराते रहें; निरंतर कार्य करते रहो, परंतु एक लहर को भी अपने मन पर प्रभाव मत डालने दो। संसार में इस प्रकार कर्म करो, मानो तुम एक विदेशी पथिक हो, पर्यटक हो। कर्म तो निरंतर करते रहो, परंतु अपने को बंधन में मत डालो; बंधन भीषण है। संसार हमारी निवासभूमि नहीं है; यह तो उन सोपानों में से एक है, जिनमें से होकर हम जा रहे हैं। सांख्य दर्शन के उस महावाक्य को मत भूलो, 'समस्त प्रकृति आत्मा के लिए है, आत्मा प्रकृति के लिए नहीं।' प्रकृति के अस्तित्व का प्रयोजन आत्मा की शिक्षा के निमित्त ही है, इसका और कोई अर्थ नहीं। उसका अस्तित्व इसीलिए है कि आत्मा को ज्ञान-लाभ हो तथा ज्ञान द्वारा आत्मा अपने को मुक्त कर ले। यदि हम यह यह बात निरंतर ध्यान में रखें, तो हम प्रकृति में कभी आसक्त न होंगे; हमें यह ज्ञान हो जाएगा कि प्रकृति हमारे लिए एक पुस्तक सदृश है, जिसका हमें अध्ययन करना है; और जब हमें उससे आवश्यक ज्ञान प्राप्त हो जाएगा, तो फिर वह पुस्तक हमारे लिए किसी काम की नहीं रहेगी। परंतु विपरीत हो यह रहा कि हम अपने को प्रकृति में ही मिला दे रहे हैं; यह सोच रहे हैं कि आत्मा प्रकृति के लिए है, आत्मा शरीर के लिए है; और जैसी कि एक कहावत है, हम सोचते हैं, 'मनुष्य खाने के लिए ही जीवित रहता है, न कि जीवित रहने के लिए खाता है'; और यह भूल हम निरंतर करते रहते हैं। प्रकृति को ही 'अहम्' मानकर हम प्रकृति में आसक्त बने रहते हैं। और ज्यों ही इस आसक्ति का प्रादुर्भाव होता है, त्यों ही आत्मा पर प्रबल संस्कार का निर्माण हो जाता है, जो हमें बंधन में डाल देता है और जिसके कारण हम मुक्त भाव से कार्य न करके दास की तरह कार्य करते रहते हैं।

इस शिक्षा का समस्त सार यही ही कि तुम्हें एक 'स्वामी' के समान कार्य करना चाहिए, न कि एक 'दास' की तरह। कर्म तो निरंतर करते रहो, परंतु एक दास के समान मत करो। सब लोग किस प्रकार कर्म कर रहे हैं, क्या यह तुम नहीं देखते? इच्छा होने पर भी कोई आराम नहीं ले सकता! ९९ प्रतिशत लोग तो दासों की तरह कार्य करते रहते हैं, और उसका फल होता है दु:ख; ये सब कार्य स्वार्थपूर्ण होते हैं। मुक्त भाव से कर्म करो! प्रेमसाहित कर्म करो! 'प्रेम' शब्द का यथार्थ अर्थ समझना बहुत कठिन है। बिना स्वाधीनता के प्रेम आ ही नहीं सकता। दास में सच्चा प्रेम होना संभव नहीं। यदि तुम एक ग़ुलाम मोल ले लो और उसे जंज़ीरों से बाँधकर उससे अपने लिए काम कराओ, तो वह कष्ट उठाकर किसी प्रकार काम करेगा अवश्य, पर उसमें किसी प्रकार का प्रेम नहीं रहेगा। इसी तरह जब हम संसार के लिए दासवत् कर्म करते हैं, तो उसके प्रति हमारा प्रेम नहीं रहता और इसलिए वह सच्चा कर्म नहीं हो सकता। हम अपने बंधु-बांधवों के लिए जो कर्म करते हैं, यहाँ तक कि हम अपने स्वयं के लिए भी जो कर्म करते हैं, उसके बारे में भी ठीक यही बात है। स्वार्थ के लिए किया गया कार्य दास का कार्य है। और कोई कार्य स्वार्थ के लिए है अथवा नहीं, इसकी पहचान यह है कि प्रेम के साथ किया हुआ प्रत्येक कार्य आनंददायक होता है। सच्चे प्रेम के साथ किया हुआ कोई भी कार्य ऐसा नहीं है, जिसके फलस्वरूप शांति और आनंद न प्राप्त हो। यथार्थ सत्, यथार्थ ज्ञान और यथार्थ प्रेम-ये तीनों सदा के लिए परस्पर संबद्ध हैं। वस्तुत: ये एक ही में तीन हैं। जहाँ एक रहता है, वहाँ शेष दो भी अवश्य रहते हैं। ये उस अद्वितीय सच्चिदानंद के ही तीन पक्ष हैं। जब वह सत्ता सापेक्ष रूप में प्रतीत होती है, तो हम उसे विश्व के रूप में देखते हैं। वह ज्ञान भी सांसरिक वस्तुविषयक ज्ञान के रूप में परिणत हो जाता है, तथा वह आनंद मानव-हृदय में विद्यमान समस्त यथार्थ प्रेम की नींव हो जाता है। अतएव सच्चे प्रेम से प्रेमी अथवा उसके प्रेम-पात्र को कभी कष्ट नहीं पहुँच सकता। उदाहरणार्थ, मान लो, एक पुरुष किसी स्त्री से प्रेम करता है। वह चाहता है कि वह स्त्री केवल उसी के पास रहे; अन्य पुरुषों के प्रति उस स्त्री के प्रत्येक व्यवहार से उसमें ईर्ष्या का उद्रेक होता है। वह चाहता है कि वह स्त्री उसी के पास बैठे, उसी के पास खड़ी रहे तथा उसी की इच्छानुसार खाये-पिये और चले-फिरे। वह स्वयं उस स्त्री का ग़ुलाम हो गया है, और चाहता है कि वह स्त्री भी उसी ग़ुलाम होकर रहे। यह तो प्रेम नहीं है। यह तो ग़ुलामी का एक प्रकार का विकृत भाव है, जो ऊपर से प्रेम जैसा दिखायी देता है। यह प्रेम नहीं हो सकता, क्योंकि यह क्लेशदायक है; यदि वह स्त्री उस मनुष्य की इच्छानुसार न चले, तो उससे उस मनुष्य को कष्ट होता है। वास्तव में सच्चे प्रेम की प्रतिक्रिया दु:खप्रद तो होती ही नहीं। उससे तो केवल आनंद ही होता है। और यदि उससे ऐसा न होता हो, तो समझ लेना चाहिए कि वह प्रेम नहीं है, बल्कि वह और ही कोई चीज़ है, जिसे हम भ्रमवश प्रेम कहते हैं। जब तुम अपने पति, अपनी स्त्री, अपने बच्चों, यहाँ तक कि समस्त विश्व को इस प्रकार प्रेम करने में सफल हो सको कि उससे किसी भी प्रकार दु:ख, ईर्ष्या अथवा स्वार्थपरता रूप कोई प्रतिक्रिया न हो, केवल तभी तुम सम्यक् रूप से अनासक्त होने की अवस्था में पहुँच सकोगे।

कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "हे अर्जुन, यदि मैं कर्म करने से एक क्षण के लिए भी रुक जाऊँ, तो सारा विश्व ही नष्ट हो जाए। मुझे कर्म से किसी भी प्रकार का लाभ नहीं; मैं ही जगत् का एकमात्र प्रभु हूँ-फिर भी मैं कर्म क्यों करता हूँ?-इसलिए कि मुझे संसार से प्रेम है।" ईश्वर अनासक्त है। क्यों?-इसलिए कि वह सच्चा प्रेमी है। उस सच्चे प्रेम से ही हम अनासक्त हो सकते हैं। जहाँ कहीं सांसरिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति है, वहाँ जान लेना चाहिए कि वह केवल भौतिक आकर्षण है-केवल कुछ जड़ कणों का दूसरे कुछ जड़ कणों के प्रति आकर्षण हो रहा है-मानो कोई एक चीज़ दो वस्तुओं को लगातार निकटतर खींचे ला रही है; और यदि वे दोनों वस्तुएँ काफ़ी निकट नहीं का सकतीं, तो फिर कष्ट उत्पन्न होता है। परंतु जहाँ 'सच्चा' प्रेम है, वहाँ भौतिक आकर्षण बिल्कुल नहीं करता। ऐसे प्रेमी चाहे सहस्त्रों योजन दूरी पर ज्यों न रहें, उनका प्रेम सदैव वैसा ही रहता है; वह प्रेम कभी नष्ट नहीं होता, उससे कभी कोई क्लेशदायक प्रतिक्रिया नहीं होती।

इस प्रकार की अनासक्ति प्राप्त करना लगभग सारे जीवन भर का कार्य है परंतु इसका लाभ होते ही हमें अपनी प्रेम-साधना का लक्ष्य प्राप्त हो जाता है और हम मुक्त हो जाते हैं। तब हम प्रकृति के बंधन से छूट जाते हैं और उसके असली स्वरूप को जान लेते हैं। फिर वह हमें बंधन में नहीं डाल सकती तब हम बिल्कुल स्वाधीन हो जाते हैं और कर्म के फलाफल की ओर ध्यान ही नहीं देते। फिर कौन परवाह करता है कि कर्मफल क्या होगा?

अपने बच्चों को तुम जो देते हो, तो क्या उसके बदले में उनसे कुछ माँगते हो? यह तो तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम उनके लिए काम करो, और बस, वहीं पर बात समाप्त हो जाती है। इसी प्रकार, किसी दूसरे पुरुष, किसी नगर अथवा देश के लिए तुम जो कुछ करो, उसके प्रति भी वैसा ही भाव रखो; उनसे किसी प्रकार के प्रतिदान की आशा न रखो। यदि तुम सदैव ऐसा ही भाव रख सको कि तुम केवल दाता ही हो, जो कुछ तुम देते हो, उससे तुम किसी प्रकार के प्रतिदान की आशा नहीं रखते, तो उस कर्म से तुम्हें किसी प्रकार की आसक्ति नहीं होगी। आसक्ति तभी आती है, जब हम प्रतिदान की आशा रखते हैं।

यदि दासवत् कार्य करने से स्वार्थपरता और आसक्ति उत्पन्न होती है, तो अपने मन का स्वामी बनकर कार्य करने से अनासक्ति से उत्पन्न आनंद का लाभ होता है। हम बहुधा अधिकार और न्याय की बातें किया करते हैं, परंतु वे सब केवल बच्चों की बातों के समान हैं। मनुष्य के चरित्र का नियमन करने वाली दो चीजें होती हैं बल और दया। बल का प्रयोग करना सदैव स्वार्थपरतावश ही होता है। बहुधा सभी स्त्री-पुरुष अपनी शक्ति एवं सुविधा का यथासंभव उपभोग करने का प्रयत्न करते हैं। दया दैवी संपत्ति है। भले बनने के लिए हमें दयायुक्त होना चाहिए; यहाँ तक कि न्याय और अधिकार भी दया पर ही प्रतिष्ठित होने चाहिए। कर्मफल की लालसा तो हमारी आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग में बाधक है; इतना ही नहीं, अंत में उससे क्लेश भी उत्पन्न होता है। दया और नि:स्वार्थपरता को कार्यरूप में परिणत करने का एक और उपाय है-और वह है, कर्मों को उपासनारूप मानना, यदि हम सगुण ईश्वर में विश्वास रखते हों। यहाँ हम अपने समस्त कर्मों के फल ईश्वर को ही समर्पित कर देते है,-और इस प्रकार उनकी उपासना करते हुए हमें इस बात का कोई अधिकार नहीं रह जाता कि हम अपने किए हुए कर्मों के प्रतिदान में मानव जाति से कुछ अपेक्षा करें। प्रभु स्वयं निरंतर कार्य करते रहते हैं और वे सारी आसक्ति से परे हैं। जिस प्रकार जल कलम के पत्ते को नहीं भिगो सकता, उसी प्रकार कोई भी कर्म फलासक्ति उत्पन्न करके नि:स्वार्थी पुरुष को बंधन में नहीं डाल सकता। अहं-शून्य और अनासक्त पुरुष की जनपूर्ण और पापपूर्ण नगर के बीच ही क्यों न रहे, पर पाप उसे स्पर्श तक न कर सकेगा।

निम्नलिखित कहानी संपूर्ण स्वार्थ त्याग का एक दृष्टांत है : कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद पाँचों पांडवों ने एक बड़ा भारी यज्ञ किया। उसमें निर्धनों को बहुत सा दान दिया गया। सभी लोगों ने उस यज्ञ की महत्ता एवं ऐश्वर्य पर आश्चर्य प्रकट किया और कहा कि ऐसा यज्ञ संसार में इसके पहले कभी नहीं हुआ था। यज्ञ के बाद उस स्थान पर एक छोटा सा नेवला आया। नेवले का आधा शरीर सुनहला था और शेष आधा भूरा। वह नेवला उस यज्ञ भूमि की मिट्टी पर लौटने लगा। थोड़ी देर बाद उसने दर्शकों से कहा, "तुम सब झूठे हो। यह कोई यज्ञ नहीं है।" लोगों ने कहा, "क्या! तुम कहते क्या हो! यह कोई यज्ञ ही नहीं है? तुम जानते हो, इस यज्ञ में कितना धन खर्च हुआ है, गरीबों को कितने हीरे-जवाहरात बाँटे गए हैं, जिससे वे सब के सब धनी और खुशहाल हो गए हैं? यह तो इतना बड़ा यज्ञ था कि ऐसा शायद ही किसी मनुष्य ने किया हो।" परंतु नेवले ने कहा, "सुनो, एक छोटे से गाँव में एक निर्धन ब्राह्मण रहता था, साथ भी उसकी स्त्री, पुत्र और पुत्र-वधू। वे लोग बड़े ग़रीब थे। पूजा-पाठ से उन्हें जो कुछ मिलता, उसी पर उनका निर्वाह होता था। एक बार उस गाँव में तीन साल तक अकाल पड़ा, जिससे उस बेचारे ब्राह्मण के दु:ख-कष्ट की पराकाष्ठा हो गयी। एक बार तो, सारे कुटुम्ब को पाँच दिन तक उपवास करना पड़ा। छठवें दिन वह ब्राह्मण भाग्यवश कहीं से थोड़ा सा जौ का आटा ले आया। उस आटे के चार भाग परिवार के चारों सदस्यों के लिए किए गए। उन्होंने उसकी रोटी बनायी और ज्यों ही वे उसे खाने बैठे कि किसी ने दरवाजा खटखटाया। पिता ने उठकर दरवाजा खोला, तो देखते हैं कि बाहर एक अतिथि खड़ा है। भारत में अतिथि बड़ा पवित्र माना जाता है। वह तो उस समय के लिए 'नारायण' ही समझा जाता है और उसके साथ तद्रूप व्यवहार भी किया जाता है। अतएव उस गरीब ब्राह्मण ने कहा, 'महाराज, पधारिए, आपका स्वागत है।' और उसने अतिथि के सामने अपना भाग रख दिया। अतिथि उसे जल्दी ही खा गया और बोला, 'अरे, अपने तो मुझे और भी मार डाला। मैं दस दिन का भूखा हूँ और भोजन के इस छोटे टुकड़े ने तो मेरी भूख और भी बढ़ा दी।' तब स्त्री ने अपने पति से कहा, 'आप मेरा भी भाग दे दीजिए।' पति ने कहा, 'नहीं,ऐसा नहीं होगा।' परंतु स्त्री अपनी बात पर अड़ी रही और कहा, 'यह बेचारा गरीब भूखा है, हमारे यहाँ आया है। गृहस्थ की हैसियत से हमारा यह धर्म है कि हम उसे भोजन करायें। यह देखकर कि आप उसे अधिक नहीं दे सकते, पत्नी के नाते मेरा यह कर्तव्य है कि मैं उसे अपना भी भाग दे दूँ।' ऐसा कह उसने भी अपना भाग अतिथि को दे दिया। अतिथि ने वह भी खा लिया और कहा, 'मैं तो भूख से अभी भी जल रहा हूँ।' तब लड़के ने कहा, 'आप मेरा भाग भी ले लीजिए, क्योंकि पुत्र का यह धर्म है कि वह पिता के कर्तव्यों को पूरा करने में उन्हें सहायता दे।' अतिथि ने वह भी खा लिया, परंतु फिर भी उसकी तृप्ति नहीं हुई। अतएव बहू ने भी उसे अपना भाग दे दिया। अब यह पर्याप्त हो गया और अतिथि ने उनको आशीर्वाद दे विदा ली। उसी रात वे चारों बेचारे भूख से पीड़ित हो मर गए। उस आटे के कुछ कण इधर-उधर ज़मीन पर बिखर गए थे, और जब मैंने उन पर लोट लगायी, तो मेरा आधा शरीर सुनहला हो गया, जैसा कि तुम अभी देख ही रहे हो। उस समय से मैं संसार भर में भ्रमण कर रहा हूँ और चाहता हूँ कि किसी दूसरी जगह भी मुझे ऐसा ही यज्ञ देखने को मिले; परंतु वैसा यज्ञ मुझे कहीं देखने को नहीं मिला। मेरा शेष आधा शरीर किसी दूसरी जगह सुनहला न हो सका। इसीलिए तो कहता हूँ कि यह कोई यज्ञ ही नहीं है।"

दान का यह भाव भारत से धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है; महापुरुषों की संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही है। जब बचपन में मैंने अंग्रेज़ी पढ़ना आरंभ किया था, उस समय मैंने एक अंग्रेज़ी की कहानी की पुस्तक पढ़ी, जिसमें एक ऐसे कर्तव्यपरायण बालक का वर्णन था, जिसने काम करके जो कुछ उपार्जन किया था, उसका कुछ भाग अपनी वृद्ध माता को दे दिया था। उस बालक के इस कृत्य की प्रशंसा पुस्तक के तीन-चार पृष्ठों में गायी गयी थी। परंतु इसमें कौन सा असाधारणत्व है? कोई भी हिंदू बालक उस कहानी की नीति-शिक्षा को नहीं समझ सकता! और मुझे भी उसका महत्त्व आज ही समझ में आ रहा है, जब मैं इस पश्चिमी रिवाज़ को सुनता तथा देखता हूँ कि यहाँ प्रत्येक मनुष्य अपने अपने लिए ही है। इस देश में ऐसे भी लोग अनेक हैं, जो सब कुछ अपने ही लिए रख लेते हैं-उनके पिता, माता, स्त्री और बच्चों की फिर चाहे जैसी दशा क्यों न हो। एक गृहस्थ का ऐसा आदर्श तो कदापि और कहीं भी नहीं होना चाहिए।

अब तुमने देखा, कर्मयोग का अर्थ क्या है। उसका अर्थ है-मौत के मुँह में भी जाकर बिना तर्क-वितर्क किए सबकी सहायता करना। भले ही तुम लाखों बार ठगे जाओ, पर मुँह से एक बात तक न निकालो; और तुम जो कुछ भले कार्य कर रहे हो, उनके संबंध में सोचो तक नहीं। निर्धन के प्रति किए गए उपकार पर गर्व मत करो और न उससे कृतज्ञता की ही आशा रखो; बल्कि उलटे तुम्हीं उसके कृतज्ञ होओ-यह सोचकर कि उसने तुम्हें दान देने का अवसर दिया है। अतएव यह स्पष्ट है कि यह आदर्श संन्यासी होने की अपेक्षा एक आदर्श गृहस्थ होना अधिक कठिन है। यथार्थ कर्ममय जीवन, यथार्थ त्यागमय जीवन की अपेक्षा यदि अधिक कठिन नहीं, तो कम से कम उसके बराबर कठिन तो अवश्य है।

कर्तव्य क्या है ?

कर्मयोग का तत्व समझने के लिए यह जान लेना आवश्यक है कि कर्तव्य क्या है। यदि मुझे कोई काम करना है, तो पहेल मुझे यह जान लेना चाहिए कि वह मेरा कर्तव्य हैं, और तभी मैं उसे कर सकता हूँ। विभिन्न जतियों में, विभिन्न देशों में इस कर्तव्य के संबंध में भिन्न-भिन्न धारणाएँ हैं। मुसलमान कहता है कि जो कुछ कुरान-शरीफ़ में लिखा है, वही मेरा कर्तव्य है; इसी प्रकार हिंदू कहता है कि जो कुछ मेरे वेदों में लिखा है, वही मेरा कर्तव्य हैं; फिर एक ईसाई की दृष्टि में जो कुछ उसकी बाइबिल में लिखा है, वही उसका कर्तव्य है। इससे हमें स्पष्ट दीख पड़ता है कि जीवन में अवस्था, ऐतिहासिक काल एवं जाति के भेद से कर्तव्य के संबंध में धारणाएँ भी बहुविध होती हैं। अन्यान्य सार्वभौमिक भावसूचक शब्दों की तरह 'कर्तव्य' शब्द की भी ठीक-ठीक व्याख्या करना दुरूह है। व्यावहारिक जीवन में उसकी परिणति तथा उसके फलाफलों द्वारा ही हमें उसके संबंध में कुछ धारणा हो सकती है। जब हमारे सामने कुछ बातें घटती हैं, तो हम सब लोगों में उस संबंध में एक विशेष रूप से कार्य करने की स्वाभाविक अथवा प्रशिक्षित प्रवृत्ति उदित होती जाती है और इस प्रवृत्ति के उदित होने पर मन उस घटना के संबंध में सोचने लगता है। कभी तो वह यह सोचता है कि इस प्रकार की स्थिति में इसी तरह कार्य करना उचित है, फिर किसी दूसरे समय उसी प्रकार की स्थिति होने पर भी पूर्वोक्त रूप से कार्य करना अनुचित प्रतीत होता है। कर्तव्य के संबंध में सर्वत्र साधारण धारणा यही देखी जाती है कि हर एक सत्पुरुष अपने विवेक के आदेशानुसार कर्म किया करता है। परंतु वह क्या है, जिससे एक कर्म 'कर्तव्य' बन जाता है? एक ईसाई के सामने गो-मांस का एक टुकड़ा रहने पर भी यदि वह अपनी प्राण-रक्षा के लिए उसे नहीं खाता अथवा किसी दूसरे मनुष्य के प्राण बचाने के लिए वह मांस नहीं दे देता, तो उसे निश्चय ही ऐसा लगेगा कि उसने अपना कर्तव्य नहीं किया। परंतु इस अवस्था में यदि एक हिंदू स्वयं वह गो-मांस का टुकड़ा खा ले अथवा किसी दूसरे हिंदू को दे दे, तो अवश्य उसे भी ठीक उसी प्रकार यह लगेगा कि उसने अपना कर्तव्य नहीं दिया। हिंदू जाति की शिक्षा तथा संस्कार ही ऐसे हैं, जिनके कारण उसके हृदय में ऐसे भाव जागृत हो जाते हैं। पिछली शताब्दी में भारतवर्ष में डाकुओं का एक कुख्यात दल था, जिन्हें ठग कहते थे। वे किसी मनुष्य को मार डालना तथा उसका धन छीन लेना अपना कर्तव्य समझते थे। वे जितने अधिक मनुष्यों को मारने में समर्थ होते, उतना ही अपने को श्रेष्ठ समझते थे। साधारणतया यदि एक मनुष्य सड़क पर जाकर किसी दूसरे मनुष्य को बंदूक से मार डाले, तो निश्चय ही उसे यह सोचकर दु:ख होगा कि कर्तव्य-भ्रष्ट हो उसने अनुचित कार्य कर डाला है। परंतु यदि वही मनुष्य एक फ़ौज में सिपाही की हैसियत से एक नहीं, बल्कि बीसों आदमियों को भी मार डाले, तो उसे यह सोचकर अवश्य प्रसन्नता होगी कि उसने अपना कर्तव्य बहुत सुंदर ढंग से निबाहा। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि केवल किसी कार्य विशेष से कर्तव्य निर्धारित नहीं होता। कर्तव्य की कोई वस्तुनिष्ठ परिभाषा कर सकना नितांत असंभव है। किंतु कर्तव्य का एक आत्मनिष्ठ पक्ष भी होता है। यदि किसी कर्म द्वारा हम ईश्वर की ओर बढ़ते हैं, तो वह शुभ कर्म है और वह हमारा कर्तव्य है; परंतु जिस कर्म द्वारा हम नीचे गिरते हैं, वह अशुभ है, और वह हमारा कर्तव्य नहीं। आत्मनिष्ठ दृष्टिकोण से देखने पर हमें यह प्रतीत होता है कि कुछ कार्य ऐसे होते हैं, जो हमें उन्नत बनाते हैं, और दूसरे ऐसे, जो हमें नीचे ले जाते हैं और पशुवत् बना देते हैं। किंतु विभिन्न व्यक्तियों में कौन सा कार्य किस तरह का भाव उत्पन्न करेगा, यह निश्चित रूप से बताना असंभव है। सभी युगों में समस्त संप्रदायों और देशों के मनुष्यों द्वारा मान्य यदि कर्तव्य का कोई एक सार्वभौमिक भाव रहा है, तो वह है- परोपकार : पुण्याय पापाय परपीडनम्। -अर्थात् परोपकार ही पुण्य है, और दूसरों को दु:ख पहुँचाना ही पाप है।

भगवद्गीता में जन्म तथा जीवन की विविध अवस्थाओं के अनुसार कर्तव्यों का बारंबार उल्लेख हुआ है। जीवन के विभिन्न कर्तव्यों के प्रति मनुष्य का जो मानसिक और नैतिक दृष्टिकोण रहता है, वह अनेक अंशों में उसके जन्म और उनकी अवस्था द्वारा नियमित होता है। इसलिए जिस समाज में समाज में हमारा जन्म हुआ हो, उसके आदर्शों और व्यवहार के अनुरुप उदात्त एवं उन्नत बनाने वाले कार्य करना ही हमारा कर्तव्य है। परंतु यह विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि सभी देशों और समाजों में एक ही प्रकार के आदर्श एवं आचरण प्रचलित नहीं हैं। इस विषय में हमारी अज्ञता ही एक जाति की दूसरी के प्रति घृणा का मुख्य कारण है। एक अमेरिका निवासी समझता है कि उसके देश की प्रथाएँ ही सर्वोत्कृष्ट है, अतएव जो कोई उसकी प्रथाओं के अनुसार व्यवहार नहीं करता, वह दुष्ट है। इसी प्रकार एक हिंदू सोचता है कि केवल उसी के रीति-रिवाज़ ही ठीक और संसार भर में सर्वोत्तम हैं, और जो उनका पालन नहीं करता, वह महादुष्ट है। हम सहज ही इस भ्रम में पड़ जाते हैं, और ऐसा होना बहुत स्वाभाविक भी है। परंतु यह बहुत अहितकर है; संसार में परस्पर के प्रति सहानुभूति के अभाव एवं पारस्परिक घृणा का यह प्रधान कारण है। मुझे स्मरण है, जब मैं इस देश में आया और जब मैं शिकागो-महामेला में से जा रहा था, तो किसी आदमी ने पीछ से मेरा साफ़ा खींच लिया। मैंने पीछे घूमकर देखा, तो अत्यंत संभ्रांत लगते एक सज्जन दिखायी पड़े। मैंने उनसे बातचीत की, और जब उन्हें यह मालूम हुआ कि मैं अंग्रेजी भी जनता हूँ, तो वे बहुत शर्मिंदा हुए। इसी प्रकार, उसी सम्मेलन में एक दूसरे अवसर पर एक मनुष्य ने मुझे धक्का दे दिया; पीछे घूमकर जब मैंने उससे कारण पूछा, तो वह भी बहुत लज्जित हुआ और हकला-हकलाकर मुझसे माफ़ी माँगते हुए कहने लगा, "आप ऐसी पोशाक क्यों पहनते हैं?" इन लोगों की सहानुभूति बस अपनी ही भाषा और वेषभूषा तक सीमित थी। शक्तिशाली जातियाँ कमज़ोर जतियों पर जो अत्याचार करती हैं, उसका अधिकांश इसी दुर्भावना के कारण होता है। मानव मात्र के प्रति मानव का जो बंधु भाव रहता है, उसको यह सोख लेता है। संभव है, वह मनुष्य, जिसने मुझसे मेरी पोशाक के बारे में पूछा था तथा जो मेरे साथ मेरी पोशाक के कारण ही दुर्व्यवहार करना चाहता था, एक भला आदमी रहा हो, एक संतान वत्सल पिता और एक सभ्य नागरिक रहा हो; परंतु उसकी स्वाभाविक सहृदयता का अंत बस उसी समय हो गया, जब उसने मुझ जैसे एक व्यक्ति को दूसरे वेश में देखा। सभी देशों में विदेशियों का शोषण होता है, क्योंकि वे यह नहीं जानते कि परदेश में अपने को कैसे बचायें। और इस प्रकार वे उन देशवासियों के प्रति अपने देश मे भ्रांत धारणाएँ साथ ले जाते हैं। मल्लाह, सिपाही और व्यापारी दूसरे देशों में ऐसे अद्भुत व्यवहार किया करते हैं, जैसे अपने देश में करना वे स्वप्न में भी नहीं सोच सकेंगे। शायद यही कारण है कि चीनी लोग यूरोप और अमेरिकावासियों को 'विदेशी शैतान' कहा करते हैं पर यदि उन्हें पश्चिम देश की सज्जनता तथा उसकी नम्रता का भी अनुभव हुआ होता, तो वे शायद ऐसा न कहते।

अतएव हमें जो बात विशेष रूप से ध्यान में रखनी चाहिए, वह यह है कि हम दूसरे के कर्तव्यों को उसकी दृष्टि से देखें, दूसरों के रीति-रिवाजों को अपने रीति-रिवाज़ के मापदंड से न जाँचे। मैं विश्व भर के लिए मापदंड नहीं हूँ। हमीं को संसार के साथ मिल-जुलकर चलना होगा, न कि संसार को हमारे साथ। इस प्रकार हम देखते हैं कि देश-काल-पात्र के अनुसार हमारे कर्तव्य कितने बादल जाते हैं और सबसे श्रेष्ठ कर्म तो यह है कि जिस विशिष्ट समय पर हमारा जो कर्तव्य हो, उसी को हम भली-भाँति निबाहें। पहले तो हमें जन्म प्राप्त कर्तव्य को करना चाहिए; और उसे कर चुकने के बाद, समाज और जीवन में हमारी स्थिति के अनुसार जो कर्तव्य हो, उसे संपन्न करना चाहिए। मानव-स्वभाव की एक विशेष कमजोरी यह है कि वह स्वयं अपनी ओर कभी नज़र नहीं डालता। वह तो सोचता है कि मैं भी राजा के सिंहासन पर बैठने के योग्य हूँ। और यदि मान लिया जाए कि वह है भी, तो सबसे पहले उसे यह दिखा देना चाहिए कि वह अपनी वर्तमान स्थिति का कर्तव्य भली भाँति कर चुका है; ऐसा होने पर उसके सामने उच्चतर कर्तव्य आयेंगे। जब संसार में हम लगन से काम शुरू करते हैं, तो प्रकृति हमें चारों ओर से धक्के देने लगती है और शीघ्र ही हमें इस योग्य बना देती है कि हम अपनी स्थिति प्राप्त कर सकें। जो जिस पद के योग्य नहीं है, वह दीर्घकाल तक उसमें रहकर सबको संतुष्ट नहीं कर सकता। अतएव प्रकृति के विधान के विरुद्ध बड़बड़ाना व्यर्थ है। यदि कोई मनुष्य छोटा कार्य करे, तो उसी कारण वह छोटा नहीं कहा जा सकता। कर्तव्य के केवल ऊपरी रूप से ही मनुष्य की उच्चता या नीचता का निर्णय करना उचित नहीं, देखना तो यह चाहिए कि वह अपना कर्तव्य किस भाव और ढंग से करता है।

आगे चलकर हम देखेंगे कि कर्तव्य की यह धारणा भी परिवर्तित हो जाती है, और यह भी देखेंगे कि सबसे श्रेष्ठ कार्य तो तभी होता है, जब उसके पीछे किसी प्रकार के स्वार्थ की प्रेरणा नहीं होती। फिर भी यह स्मरण रखना चाहिए कि कर्तव्य ज्ञान से किया हुआ कर्म ही हमें कर्तव्य-ज्ञान से अतीत कर्म की ओर ले जाता है। और तब कर्म उपासना में परिणत हो जाता है-इतना ही नहीं, वरन् उस समय कर्म का अनुष्ठान केवल कर्म के लिए ही होता है। फिर हमें प्रतीत होगा कि कर्तव्य का दर्शन, चाहे वह नैतिकता पर अधिष्ठित हो अथवा प्रेम पर, वही हैं, जो अन्य किसी योग का-जिसका उद्देश्य है, 'निम्न अहं' को क्रमश: घटाते-घटाते बिल्कुल नष्ट कर देना, जिससे अंत में 'उच्च अहं' प्रकाशित हो जाए, तथा निम्न स्तर में अपनी शक्तियों का क्षय होने से रोकना, जिससे आत्मा अधिकाधिक उच्च भूमि में प्रकाशमान हो सके। यह कार्य नीच वासनाओं के उदय होने पर, कर्तव्य की कठोर आवश्यकता के अनुसार, उनका निग्रह करने से किया जा सकता है। जाने या अनजाने में सारी समाज-संस्था इस प्रकार संगठित हुई है कि कर्म और अनुभूति के क्षेत्र में स्वार्थ को धीरे-धीरे कम करते हुए, हम मनुष्य के वास्तविक स्वरूप के अनंत विकास का पथ खोल देते हैं।

कर्तव्य का पालन शायद ही कभी मधुर होता हो। कर्तव्य-चक्र तभी हलका और आसानी से चलता हैं, जब उसके पहियों में प्रेमरूपी चिकनाई लगी होती है, अन्यथा वह एक अविराम घर्षण मात्र है। यदि ऐसा न हो, तो माता-पिता अपने बच्चों के प्रति, बच्चे अपने माता-पिता के प्रति, पति अपनी पत्नी के प्रति तथा पत्नी अपने पति के प्रति अपना अपना कर्तव्य कैसे निभा सकें? क्या इस घर्षण के उदाहरण हमें अपने दैनिक जीवन में सदैव दिखायी नहीं देते? कर्तव्य-पालन की मधुरता प्रेम में ही है, और प्रेम का विकास केवल स्वतंत्रता में होता है। परंतु सोचो तो सही, इंद्रियों का, क्रोध का, ईर्ष्या का तथा मनुष्य के जीवन में प्रतिदिन होनेवाली अन्य सैकड़ों छोटी छोटी बातों का ग़ुलाम होकर रहना क्या स्वतंत्रता है? अपने जीवन के इन सब क्षुद्र संघर्षों में सहिष्णुता धारण करना ही स्वतंत्रता की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। स्त्रियाँ स्वयं अपने चिड़चिड़े एवं ईर्ष्यापूर्ण स्वभाव की ग़ुलाम होकर अपने पतियों को दोष दिया करती हैं। वे दावा करती हैं कि हम स्वाधीन हैं; परंतु वे नहीं जानतीं कि ऐसा करने से वे स्वयं को निरी ग़ुलाम सिद्ध कर रही हैं। और यही हाल उन पतियों का भी है जो सदैव अपनी स्त्रियों में दोष देखा करते हैं।

पवित्रता ही स्त्री और पुरुष का सर्वप्रथम धर्म है। ऐसा उदाहरण शायद ही कहीं हो कि एक पुरुष-वह चाहे जितना भी पथ-भ्रष्ट क्यों न हो गया हो-अपनी नम्र, प्रेमपूर्ण तथा पतिव्रता स्त्री द्वारा ठीक रास्ते पर न लाया जा सके। संसार अभी भी उतना गिरा नहीं है। हम बहुधा संसार में बहुत से निर्दय पतियों तथा पुरुषों के भ्रष्टाचरण के बारे में सुनते रहते हैं; परंतु क्या यह बात सच नहीं है कि संसार में उतनी ही निर्दय तथा भ्रष्ट स्त्रियाँ भी हैं? यदि सभी स्त्रियाँ इतनी शुद्ध और पवित्र होतीं, जितना कि वे दावा करती हैं, तो मुझे पूरा विश्वास है कि समस्त संसार में एक भी अपवित्र पुरुष न रह जाता। ऐसा कौन सा पाशविक भाव हैं, जिसे पवित्रता और सतीत्व पराजित नहीं कर सकता? एक शुद्ध पतिव्रता स्त्री, जो अपने पति को छोडकर अन्य सब पुरुषों को पुत्रवत् समझती है तथा उनके प्रति माता का भाव रखती है, धीरे-धीरे अपनी पवित्रता की शक्ति में इतनी उन्नत हो जाएगी कि एक अत्यंत पाशविक प्रवृत्तिवाला मनुष्य भी उसके सान्निध्य में पवित्र वातावरण का अनुभव करेगा। इसी प्रकार प्रत्येक पति को, अपनी स्त्री को छोड़कर अन्य सब स्त्रियों को अपनी माता, बहन अथवा पुत्री के समान देखना चाहिए। विशेषकर उस मनुष्य को, जो धर्म का प्रचारक होना चाहता है, यह आवश्यक है कि वह प्रत्येक स्त्री को मातृवत् देखे और उसके साथ सदैव तद्नुरूप व्यवहार करे।

मातृपद ही संसार में सबसे श्रेष्ठ पद है, क्योंकि यही एक ऐसी स्थिति है, जहाँ नि:स्वार्थता की महत्तम शिक्षा प्राप्त की जा सकती है। केवल भगवत् प्रेम ही माता के प्रेम से उच्च है, अन्य सब तो निम्न श्रेणी के हैं। माता का कर्तव्य है कि पहले वह अपने बच्चों की सोचे, फिर अपने लिए; परंतु उसके बजाए यदि माता-पिता सर्वदा पहले अपने ही बारे में सोचें, तो फल यह होगा कि उनमें तथा उनके बच्चों में वही संबंध स्थापित हो जाएगा, जो चिड़ियों तथा उनके बच्चों में होता है। चिड़ियों के बच्चे जब उड़ने योग्य हो जाते हैं, तो अपने माँ-बाप को पहचानते तक नहीं। वास्तव में वह पुरुष धन्य है, जो स्त्री को ईश्वर के मातृभाव की प्रतिमूर्ति समझता है; और वह स्त्री भी धन्य है, जो पुरुष को ईश्वर के पितृभाव की प्रतिमूर्ति मानती है ; तथा वे बच्चे भी धन्य हैं, जो अपने माता-पिता को भगवान् का ही रूप मानते हैं।

हमारी उन्नति का एकमात्र उपाय यह है कि हम पहले वह कर्तव्य करें, जो हमारे हाथ में है। और इस प्रकार धीरे-धीरे शक्ति-संचय करते हुए क्रमश: हम सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं।

एक तरुण संन्यासी वन में गया। वहाँ उसने दीर्घकाल तक ध्यान-भजन तथा योगाभ्यास किया। अनेक वर्षो की कठिन तपस्या के बाद एक दिन जब वह एक वृक्ष के नीचे बैठा था, तो उसके ऊपर वृक्ष से कुछ सुखी पत्तियाँ आ गिरीं। उसने ऊपर निगाह उठायी, तो देखा कि एक कौआ और एक बगुला पेड़ पर लड़ रहे हैं। यह देखकर संन्यासी को बहुत क्रोध आया। उसने कहा, "यह क्या! तुम्हारा इतना साहस कि तुम ये सुखी पत्तियाँ मेरे सिर पर फेंको?" इन शब्दों के साथ संन्यासी की कुद्ध आँखों से आग की एक ज्वाला सी निकली, और वे बेचारी दोनों चिड़ियाँ उससे जलकर भस्म हो गयीं। अपने में यह शक्ति देखकर वह संन्यासी बड़ा खुश हुआ; उसने सोचा, 'वाह, अब तो मैं दृष्टि मात्र से कौए-बगुले को भस्म कर सकता हूँ।' कुछ समय बाद भिक्षा के लिए वह एक गाँव को गया। गाँव में जाकर वह एक दरवाजे पर खड़ा हुआ और पुकारा, "माँ कुछ भिक्षा मिले।" भीतर से आवाज़ आयी, "थोड़ा रुको, मेरे बेटे।" संन्यासी ने मन में सोचा, "अरे दुष्टा, तेरा इतना साहस कि तू मुझ से प्रतीक्षा कराये! अब भी तू मेरी शक्ति नहीं जानती?" संन्यासी ऐसा सोच ही रहा था कि भीतर से फिर एक आवाज़ आयी, "बेटा, अपने को बड़ा मत समझ। यहाँ न तो कोई कौआ है और न बगुला।" यह सुनकर संन्यासी को बड़ा आश्चर्य हुआ। बहुत देर तक खड़े रहने के बाद अंत में घर में से एक स्त्री निकली और उसे देखकर संन्यासी उसके चरणों पर गिर पड़ा और बोला, "माँ तुम्हें यह सब कैसे मालूम हुआ?" स्त्री ने उत्तर दिया, "बेटा, न तो मैं तुम्हारा योग जानती हूँ और न तुम्हारी तपस्या। मैं तो एक साधारण स्त्री हूँ। मैंने तुम्हें इसलिए थोड़ी देर रोका था कि मेरे पति-देव बीमार हैं और मैं उनकी सेवा-शुश्रूषा में संलग्न थी। यही मेरा कर्तव्य है। सारे जीवन भर मैं इसी बात का यत्न करती रही हूँ कि मैं अपना कर्तव्य पूर्ण रूप से निबाहूँ। जब मैं अविवाहित थी, तब मैंने अपने माता-पिता के प्रति पुत्री का कर्तव्य किया और अब जब मेरा विवाह हो गया है, तो मैं अपने पतिदेव के प्रति पत्नी का कर्तव्य करती हूँ। बस, यही मेरा योगाभ्यास है। अपना कर्तव्य करने से ही मेरे दिव्य चक्षु खुल गए हैं, जिससे मैंने तुम्हारे विचारों को जान लिया और मुझे इस बात का भी पता चल गया कि तुमने वन में क्या किया है। यदि तुम्हें इससे भी कुछ उच्चतर तत्त्व जानने की इच्छा है, तो अमुक नगर के बाजार में जाओ, वहाँ तुम्हें एक व्याध मिलेगा। वह तुम्हें कुछ ऐसी बातें बतलायेगा जिन्हें सुनकर तुम बड़े प्रसन्न होगे।" संन्यासी ने विचार किया, "भला मैं उस शहर में उस व्याध के पास क्यों जाऊँ?" परंतु उसने अभी जो घटना देखी, उसे सोचकर उसकी आँखे कुछ खुल गयीं। अतएव वह उस शहर में गया। जब वह शहर के नज़दीक आया, तो उसने दूर से एक बड़े मोटे व्याध को बाजार में बैठे हुए और बड़े-बड़े छूरों से मांस काटते हुए देखा। वह लोगों से अपना सौदा कर रहा था। संन्यासी ने मन ही मन सोचा, "हरे! हरे! क्या यही वह व्यक्ति है, जिससे मुझे शिक्षा मिलेगी? दिखता तो यह शैतान का अवतार है!" इतने में व्याध ने संन्यासी की ओर देखा और कहा, "महाराज, क्या उस स्त्री ने आपको मेरे पास भेजा है? कृपया बैठ जाइए। मैं ज़रा अपना काम समाप्त कर लूँ।" संन्यासी ने सोचा, 'यहाँ मुझे क्या मिलेगा?' खैर, वह बैठ गया। इधर व्याध अपना काम लगातार करता रहा और जब वह अपना काम पूरा कर चुका, तो उसने अपनाए रुपये-पैसे समेटे और संन्यासी से कहा, "चलिए महाराज, घर चलिए।" घर पहुँचकर व्याध ने उसे आसन दिया और कहा, "आप यहाँ थोड़ा ठहरिए।" व्याध अपने घर में चला गया। उसने अपने वृद्ध माता-पिता को स्नान कराया, उन्हें भोजन कराया और उन्हें प्रसन्न करने के लिए जो कुछ कर सकता था, किया। उसके बाद वह उस संन्यासी के पास आया और कहा, "महाराज, आप मेरे पास आये हैं। अब बताइए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?" संन्यासी ने उससे आत्मा तथा परमात्मा संबंधी कुछ प्रश्न किए और उनके उत्तर में व्याध ने उसे जो उपदेश दिया, वही महाभारत में 'व्याध-गाता' के नाम से प्रसिद्ध हैं। व्याध-गीता में हमें वेदान्त दर्शन की एक पराकाष्ठा के दर्शन होते हैं। जब व्याध अपना उपदेश समाप्त कर चुका, तो संन्यासी को बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने कहा, "फिर आप इस शरीर में क्यों हैं? इतने ज्ञानी होते हुए भी आप व्याध-शरीर में क्यों हैं, इतना गंदा और घिनौना कार्य क्यों करते हैं।" व्याध ने उत्तर दिया, "वत्स, कोई भी कर्तव्य गंदा नहीं है। कोई भी कर्तव्य अपवित्र नहीं है। मेरे जन्म ने मुझे इस परिस्थिति में रख दिया। बचपन से ही मैंने यह व्यापार सीखा है, मैं अनासक्त हूँ और अपना कर्तव्य उत्तम रूप से किए जाता हूँ। मैं गृहस्थ के नाते अपना कर्तव्य करता हूँ और अपने माता-पिता को प्रसन्न रखने के लिए जो कुछ मुझसे बन पड़ता है, करता हूँ। न तो मैं तुम्हारा योग जानता हूँ और न मैं कभी संन्यासी ही हुआ। संसार छोडकर मैं कभी वन में नहीं गया। परंतु फिर भी जो कुछ तुमने मुझसे सुना तथा देखा, वह सब मुझे अनासक्त भाव से अपनी अवस्था के अनुरूप कर्तव्य का पालन करने से ही प्राप्त हुआ है।"

भारतवर्ष में एक बहुत बड़े महात्मा [2] हैं। अपने जीवन में मैंने जीतने महा अद्भुत पुरुष देखे, उनमें से वे एक हैं। वे विचित्र व्यक्ति हैं, कभी किसी को उपदेश नहीं देते; यदि तुम उनसे कोई प्रश्न पुछो भी, तो भी वे उसका उत्तर नहीं देते। गुरु का पद ग्रहण करने में वे बड़े संकुचित होते हैं। यदि तुम उनसे आज एक प्रश्न पूछो और उसके बाद कुछ दिन प्रतीक्षा करो, तो किसी दिन अपनी बातचीत में वे उस प्रश्न को उठाकर उस पर बड़ा सुंदर प्रकाश डालते हैं। उन्होंने मुझे एक बार कर्म का रहस्य बताया था। उन्होंने कहा, "साधन और सिद्धि को एकरूप समझो।" अर्थात् साधना-काल में साधन में ही मन-प्राण अर्पण कर कार्य करो, क्योंकि उसकी चरम अवस्था का नाम ही सिद्धि है। जब तुम कोई कर्म करो, तब अन्य किसी बात का विचार ही मत करो। उसे एक उपासना के-बड़ी से बड़ी उपासना के रूप में करो, और उस समय उसमें अपना सारा तन-मन लगा दो। यही बात हमने उपर्युक्त कथा में भी देखी है। ब्याध एवं वह स्त्री-दोनों ने अपना अपना कर्तव्य बड़ी प्रसन्नता से तथा तन्मनस्क होकर किया और उसका फल यह हुआ कि उन्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ। इससे हमें यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि जीवन की किसी भी अवस्था में, कर्मफल में बिना आसक्ति रखे यदि कर्तव्य उचित रूप से किया जाए, तो उससे हमें आत्मा की पूर्णता का सर्वोच्च अनुभव प्राप्त होता है।

कर्मफल में आसक्ति रखने वाला व्यक्ति अपने भाग्य में आये हुए कर्तव्य पर भिनभिनाता है। अनासक्त पुरुष को सब कर्तव्य समरूप से शुभ हैं। उसके लिए तो वे कर्तव्य स्वार्थपरता तथा इंद्रियग्रस्त परायणता को नष्ट करके आत्मा को मुक्त कर देने के लिए शक्तिशाली साधन हैं। हम सब अपने को बहुत बड़ा मानते हैं। प्रकृति ही सदैव कड़े नियम से हमारे कर्मों के अनुसार उचित कर्मफल का विधान करती है। और इसलिए अपनी ओर से चाहे हम किसी कर्तव्य को स्वीकार करने के लिए भले ही अनिच्छुक हों, फिर भी वास्तव में हमारे कर्मफल के अनुसार ही हमारे कर्तव्य निर्दिष्ट होंगे। स्पर्धा से ईर्ष्या उत्पन्न होती है और उससे हृदय को कोमलता नष्ट हो जाती है। भिनभिनाते रहने वाले पुरुष के लिए सभी कर्तव्य निरास होते हैं। उसे कभी किसी चीज से संतोष नहीं होता और फलस्वरूप उसका जीवन दूभर हो उठना और असफल हो जाना स्वाभाविक है। हमें चाहिए कि हम काम करते रहे; जो कुछ भी हमारा कर्तव्य हो, उसे करते रहें, अपना कंधा सदैव काम से भिड़ाये रखें। तभी अवश्य हमें प्रकाश की उपलब्धि होगी।

हम स्वयं अपना उपकार करते हैं , संसार का नहीं

यह विचार करने के पहले कि कर्तव्यनिष्ठा हमें आध्यात्मिक उन्नति में किस प्रकार सहायता पहुँचती है, मैं तुम लोगों को संक्षेप में यह भी बता देना चाहता हूँ कि भारत में जिसे हम कर्म कहते हैं, उसका एक दूसरा पक्ष क्या है। प्रत्येक धर्म के तीन विभाग होते हैं। प्रथम दार्शनिक, दूसरा पौराणिक और तीसरा कर्मकांड। दार्शनिक भाग तो वास्तव में प्रत्येक धर्म का सार है। महापुरुषों की कम या अधिक काल्पनिक जीवनी तथा अलौकिक विषय संबंधी कथाओं एवं आख्यायिकाओं द्वारा पौराणिक भाग इस दार्शनिक भाग की व्याख्या करता है। कर्मकांड इस दर्शन को और भी स्थूल रूप देता है, जिससे वह सर्वसाधारण की समझ में आ सके। वास्तव में अनुष्ठान दर्शन का ही एक स्थूलतर रूप है। यह अनुष्ठान ही कर्म है। प्रत्येक धर्म में इसकी आवश्यकता है, क्योंकि जब तक हम आध्यात्मिक जीवन में बहुत उन्नत न हो जाएं, तब तक सूक्ष्म आध्यात्मिक तत्वों को समझ नहीं सकते। मनुष्य को अपने मन में यह मान लेना सरल है कि वह कोई भी बात समझ सकता है। परंतु जब वह उसे कार्य में लाने की चेष्टा करता है, तो उसे मालूम होता है कि सूक्ष्म भावों को ठीक-ठीक समझना तथा उन्हें हृदयंगम करना बड़ा ही कठिन है। इसीलिए प्रतीक विशेष रूप से सहायक होते हैं, और उनके द्वारा सूक्ष्म विषयों को समझने की जो प्रणाली है, उसे हम किसी भी प्रकार त्याग नहीं सकते। स्मरणातीत काल से ही प्रतीकों का प्रयोग प्रत्येक धर्म में होता रहा है। एक दृष्टि से हम प्रतीक से बिना किसी बात को सोच ही नहीं सकते। स्वयं शब्द हमारे विचारों के प्रतीक ही है। संसार की प्रत्येक वस्तु प्रतीक के रूप में देखी जा सकती है। सारा संसार ही प्रतीक है और उसके पीछे मूल तत्त्व रूप में ईश्वर विराजमान है। इस प्रकार का प्रतीक केवल मनुष्य द्वारा उत्पन्न किया हुआ ही नहीं है। और न ऐसा है कि एक धर्म के कुछ अनुयायियों ने बैठकर कुछ प्रतीकों की कल्पना कर डाली है। धर्म के प्रतीकों की उत्पत्ति स्वाभाविक रूप से होती है। नहीं तो ऐसा क्यों है कि प्राय: सभी मनुष्यों के मन में कुछ विशेष प्रतीक कुछ विशिष्ट भावों से सदा संबद्ध रहते हैं? कुछ प्रतीक तो सभी जगह पाये जाते हैं। तुममें से अनेकों की यह धारणा है कि क्रास का चिन्ह सर्वप्रथम ईसाई धर्म के साथ प्रचलित हुआ; परंतु वास्तव में तो वह ईसाई धर्म के बहुत पहले से, मूसा के भी जन्म के पहले, वेदों के आविर्भाव के भी पहले, यहाँ तक कि मानवीय कार्य-कलापों का किसी प्रकार का इतिहास लिपिबद्ध होने के भी पहले से विद्यमान था। ऐजटेकों तथा फ़िनिशिन्स जातियों में भी क्रास के विद्यमान होने का प्रमाण मिलता है। प्राय: प्रत्येक जाति में इसका अस्तित्व था। इतना ही नहीं, बल्कि ऐसा भी प्रतीत होता है कि क्रास पर लटके हुए महापुरुष का प्रतीक भी लगभग प्रत्येक जाति में प्रचलित था। सारे संसार में भृत्य भी एक महान् प्रतीक माना जया है। फिर सबसे अधिक प्रचलित स्वास्तिक का भी प्रतीक है। एक समय ऐसी धारणा थी कि बौद्ध इसे अपने साथ साथ सारे संसार भर में ले गए; परंतु पता चलता है कि बौद्ध धर्म के सदियों पहले कई जातियों में इसका प्रचार था। प्राचीन बेबिलोन तथा मिस्र देश में भी यह पाया जाता था। इस सबसे क्या प्रकट होता है? यही कि ये सब प्रतीक रूढ़िजन्य मात्र नहीं हो सकते। इनका कोई न कोई विशेष कारण अवश्य रहा होगा, उनमें तथा मानवीय मन में कोई स्वाभाविक संबंध रहा होगा। भाषा भी कोई रूढ़िजन्य वस्तु नहीं है, ऐसी बात नहीं कि कुछ लोगों ने यह तय कर लिया कि कुछ विशेष भाव कुछ विशेष शब्दों द्वारा प्रकट किए जाएं और बस, भाषा की उत्पत्ति हो गयी। कोई भी भाव अपने आनुषंगिक शब्द बिना और कोई शब्द आपने आनुषंगिक भाव बिना कभी रहा नहीं। शब्द और भाव स्वभावत: अविच्छेद्य हैं। भावों को प्रकट करने के लिए शब्द-प्रतीक अथवा वर्ण-प्रतीक हो सकते हैं। गूँगों और बहरों को शब्द-प्रतीक से भिन्न किसी दूसरे प्रतीक की सहायता लेनी पड़ती है। मन में उठने वाले प्रत्येक विचार का एक अन्य समानुरूपी भी होता है, और वह है-आकृति। इसे संस्कृत दर्शन में 'नाम-रूप' कहते हैं। जिस प्रकार कृत्रिम उपायों द्वारा एक भाषा नहीं उत्पन्न की जा सकती, उसी प्रकार कृत्रिम उपायों से प्रतीक-विधान का निर्माण भी नहीं किया जा सकता। संसार में कर्मकाण्डीय प्रतीकों में हमें मानव जाति के धार्मिक विचारों की एक अभिव्यक्ति मिलती है। यह कह देना बहुत सरल है कि अनुष्ठानों, मंदिरों तथा अन्य बाह्य आडंबरों की कोई आवश्यकता नहीं, और यह बात तो आजकल बच्चे तक कहा करते हैं। परंतु सरलतापूर्वक यह कोई भी देख सकता है कि लोग मंदिर में जाकर पुजा करते हैं, वे उन लोगों की अपेक्षा, जो ऐसा नहीं करते, कई बातों में कहीं भिन्न होते हैं। भिन्न-भिन्न धर्मों के साथ जो विशिष्ट मंदिर, अनुष्ठान और अन्य स्थूल क्रिया-कलाप जड़े हुए हैं, वे उन उन धर्मावलम्बियों के मन में उन सब भावों को जागृत कर देते हैं, जिनके कि ये मंदिर-अनुष्ठानादि स्थूल प्रतीकस्वरूप हैं। अतएव अनुष्ठानों एवं प्रतीकों को एकदम उड़ा देना उचित नहीं। इन सब विषयों का अध्ययन एवं अभ्यास स्वभावत: कर्मयोग का ही एक अंग है।

इस कर्मविज्ञान के और भी कई पहलू हैं। इनमें से एक है-'विचार' तथा 'शब्द' के संबंध को जानना एवं यह भी ज्ञान प्राप्त करना कि शब्द-शक्ति से क्या प्राप्त किया जा सकता है। प्रत्येक धर्म शब्द की शक्ति को मानता है; यहाँ तक कि किसी किसी धर्म को तो यह धारणा है कि समस्त सृष्टि 'शब्द' से ही निकली है। ईश्वर के संकल्प का बाह्य आकार 'शब्द' है और चूंकि ईश्वर ने सृष्टि-रचना के पूर्व संकल्प एवं इच्छा की थी, इसलिए सृष्टि 'शब्द' से ही निकली है। हमारे इस भौतिकतापरायण जीवन के कोलाहल में हमारी नाड़ियों में भी जड़ता आ गयी है। ज्यों-ज्यों हम बूढ़े होते जाते हैं और संसार को ठोकरें खाते जाते हैं, त्यों-त्यों हममें अधिकाधिक जड़ता आती-जाती है और फलस्वरूप हम उन घटनाओं की भी उपेक्षा कर देते हैं, जो हमारे चारों ओर निरंतर घटित होती रहती हैं। कभी-कभी मनुष्य की प्रकृति अपनी सत्ता को प्रतिष्ठापित करना चाहती है और हम इन साधारण घटनाओं का रहस्य जानने का यत्न करने लगते हैं तथा उनपर आश्चर्य करते हैं। इस प्रकार आश्चर्यचकित होना ही ज्ञान-लाभ की पहली सीढ़ी है। 'शब्द' के उच्च दार्शनिक तथा धार्मिक महत्त्व के अतिरिक्त हमारे इस जीवन-नाटक में शब्द-प्रतीकों का विशेष स्थान है। मैं तुमसे बातचीत कर रहा हूँ। तुम्हें स्पर्श नहीं कर रहा हूँ। पर मेरे शब्द द्वारा उत्पन्न वायु के स्पंदन तुम्हारे कान में जाकर तुम्हारे कर्ण-स्नायुओं को स्पर्श करते हैं और उससे तुम्हारे मन में प्रभाव उत्पन्न करते हैं। इसे तुम रोक नहीं सकते। भला सोचो तो, इससे अधिक आश्चर्यजनक बात और क्या हो सकती है? एक मनुष्य दूसरे को बेवकूफ़ कह देता है और बस, इतने से ही वह दूसरा मनुष्य उठ खड़ा होता है और अपनी मुट्ठी बाँधकर उसकी नाक पर एक घूँसा जमा देता है। देखो तो, शब्द में कितनी शक्ति है! एक स्त्री बिलख-बिलखकर रो रही है; इतने में एक दूसरी स्त्री आ जाती है और वह उससे कुछ सांत्वना के शब्द कहती है। प्रभाव यह होता है कि वह रोती हुई स्त्री उठ बैठती है, उसका दु:ख दूर हो जाता है और वह मुस्कराने भी लगती है। देखो तो, शब्द में कितनी शक्ति है! उच्च दर्शन में जिस प्रकार शब्द-शक्ति का परिचय मिलता है, उसी प्रकार साधारण जीवन में भी। इस शक्ति के संबंध में विशेष विचार और अनुसंधान न करते हुए ही हम रात-दिन इस शक्ति का उपयोग कर रहे हैं। इस शक्ति के स्वरूप को जानना तथा इसका उत्तम रूप से उपयोग करना भी कर्मयोग का एक अंग है।

दूसरों के प्रति हमारे कर्तव्य का अर्थ है-दूसरों की सहायता करना, संसार का भला करना। हम संसार का भला क्यों करे? इसलिए कि देखने में तो हम संसार का उपकार करते हैं, परंतु असल में हम अपना ही उपकार करते हैं। हमें सदैव संसार का उपकार करने की चेष्टा करनी चाहिए, और कार्य करने में यही हमारा सर्वोच्च उद्देश्य होना चाहिए। परंतु यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए, तो प्रतीत होगा कि इस संसार को हमारी सहायता की बिल्कुल आवश्यकता नहीं। यह संसार इसलिए नहीं बना कि हम अथवा तुम आकर इसकी सहायता करें। एक बार मैंने एक उपदेश पढ़ा था, वह इस प्रकार था-'यह सुंदर संसार बड़ा अच्छा है, क्योंकि इसमें हमें दूसरों की सहायता करने के लिए समय तथा अवसर मिलता है।' ऊपर से तो यह भाव सचमुच सुंदर है, परंतु यह कहना कि संसार को हमारी सहायता की आवश्यकता है, क्या घोर ईश-निंदा नहीं है? यह सच है कि संसार में दु:ख-कष्ट बहुत है, और इसलिए लोगों की सहायता करना हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ कार्य है; परंतु आगे चलकर हम देखेंगे कि दूसरों कि सहायता करने का अर्थ है, अपनी ही सहायता करना। मुझे स्मरण है, एक बार जब में छोटा था, तो मेरे पास कुछ सफेद चूहे थे। वे चूहे एक छोटे से संदूक में रखे गए थे और उस संदूक के भीतर उनके लिए छोटे-छोटे चक्के थे। जब चूहे उन चक्कों को पार करना चाहते, तो वे चक्के वहीं के वहीं घूमते रहते, और वे बेचारे कभी बाहर नहीं निकल पाते। बस, यही हाल संसार का तथा संसार के प्रति हमारी सहायता का है। उपकार केवल इतना ही होता है कि हमें नैतिक शिक्षा मिलती है। यह संसार न तो अच्छा है, न बुरा। प्रत्येक मनुष्य अपने लिए अपना अपना संसार बना लेता है। यदि एक अंधा संसार के बारे में सोचता है, तो वह उसके समक्ष या तो मुलायम या कड़ा प्रतीत होगा, अथवा शीत या उष्ण। हम सुख या दु:ख की समष्टि मात्र हैं, यह हमने अपने जीवन में सैकड़ों बार अनुभव किया है। बहुधा नौजवान आशावादी होते हैं, और वृद्ध निराशावादी। तरुण के सामने तभी उसका सारा जीवन पड़ा है। परंतु वृद्ध की केवल यही शिकायत रहती है कि उसका समय निकाल गया; कितनी ही अपूर्ण इच्छाएँ उसके हृदय में मचलती रहती हैं, जिन्हें पूर्ण करने की शक्ति उसमें आज नहीं। परंतु हैं, दोनों ही मूर्ख। हमारी मानसिक स्थिति के अनुसार ही हमें यह संसार भला या बुरा प्रतीत होता है। स्वयं यह न तो भला है, न बुरा। अग्नि स्वयं न अच्छी है, न बुरी। जब यह हमें गरम रखती है, तो हम कहते हैं, "यह कितनी सुंदर है!" परंतु जब इससे हमारी अँगुली जल जाती है, तो इसे हम दोष देते हैं। परंतु फिर भी स्वयं न तो यह अच्छी है, न बुरी। जैसा हम इसका उपयोग करते हैं, तदनुरूप यह अच्छी या बुरी बन जाती है। यही हाल इस संसार का भी है। संसार स्वयं पूर्ण है। पूर्ण होने का अर्थ यह है कि उसमें अपने सब प्रयोजनों को पूर्ण करने की क्षमता है। हमें यह निश्चित जान लेना चाहिए कि हमारे बिना भी यह संसार बड़े मज़े से चलता जाएगा; हमें इसकी सहायता करने के लिए माथापच्ची करने की आवश्यकता नहीं।

परंतु फिर भी हमें सदैव परोपकार करते ही रहना चाहिए। यदि हम सदैव यह ध्यान रखें कि दूसरों की सहायता करना एक सौभाग्य है, तो परोपकार करने की इच्छा हमारी सर्वोत्कृष्ट प्रेरणा है। एक दाता के ऊँचे आसन पर खड़े होकर और अपने हाथ में दो पैसे लेकर यह मत कहो, "ऐ भिखारी, ले, यह मैं तुझे देता हूँ।" परंतु तुम स्वयं इस बात के लिए कृतज्ञ होओ कि तुम्हें वह निर्धन व्यक्ति मिला, जिसे दान देकर तुमने स्वयं अपना उपकार किया। धन्य पानेवाला नहीं होता, देनेवाला होता है। इस बात के लिए कृतज्ञ होओ कि इस संसार में तुम्हें अपनी दयालुता का प्रयोग करने और इस प्रकार पवित्र एवं पूर्ण होने का अवसर प्राप्त हुआ। समस्त भले कार्य हमें शुद्ध बनने तथा पूर्ण होने में सहायता करते हैं। और सच पूछो तो हम अधिक से अधिक कर ही कितना सकते हैं? या तो एक अस्पताल बनवा देते हैं, सड़कें बनवा देते हैं या सदावर्त खुलवा देते हैं, बस, इतना ही तो? हम गरीबों के लिए एक कोष खोल देते हैं, दस-बीस लाख डालर इकट्ठा कर लेते हैं। उसमें से पाँच लाख का एक अस्पताल बनवा देते हैं, पाँच लाख नाच-तमाशे, शैंपेन पीने में फूँक देते हैं, और शेष का आधा कर्मचारी लूट लेते हैं, बाक़ी जो बचता है, वह किसी तरह ग़रीबों तक पहुँचता है! परंतु उतने से हुआ क्या? प्रचंड तूफ़ान का एक झोंका तो तुम्हारी इन सारी इमारतों को पाँच मिनट में नष्ट कर दे सकता है-फिर तुम क्या करोगे? ज्वालामुखी का एक विस्फोट तो तुम्हारी तमाम सड़कों, अस्पतालों, नगरों और इमारतों को धूल में मिला दे सकता है। अतएव इस प्रकार की संसार की सहायता की सहायता करने की खोखली बातों को हमें छोड़ देना चाहिए। यह संसार की सहायता का भूखा है और न मेरी। परंतु फिर भी हमें निरंतर कार्य करते रहना चाहिए, निरंतर परोपरकर करते रहना चाहिए। क्यों?-इसलिए कि इसमें हमारा ही भला है। यही एक साधन है, जिससे हम पूर्ण बन सकते हैं। यदि हमने किसी भिखारी को कुछ दिया ही, तो वास्तव में वह हमारे प्रति एक सेंट का भी ऋणी नहीं है, हमीं उसके ऋणी हैं, हम पर उसका आभार है, क्योंकि उसने हमें इस बात का अवसर दिया कि हम अपनी दया का प्रयोग उस पर कर सकें। यह सोचना निरी भूल है कि हमने संसार का भला किया, अथवा कर सकते हैं, या यह कि हमने अमुक अमुक व्यक्तियों की सहायता की। यह निरी मूर्खता का विचार है; और मूर्खता के विचारों से दु:ख उत्पन्न होता है। हम कभी-कभी सोचते हैं कि हमने अमुक मनुष्य की सहायता की और इसलिए आशा करते हैं कि वह हमें धन्यवाद दे; पर जब वह हमें धन्यवाद नहीं देता, तो उससे हमें दु:ख होता है। हम जो कुछ करें, उसके बदले में किसी भी बात की आशा क्यों रखें? बल्कि उलटे हमें उसी मनुष्य के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए, जिसकी हम सहायता करते हैं-उसे साक्षात् नारायण मानना चाहिए। मनुष्य की सहायता द्वारा ईश्वर की उपासना करना क्या हमारा परम सौभाग्य नहीं है? यदि हम वास्तव में अनासक्त हैं, तो यह वृथा प्रत्याशाजनित कष्ट क्यों होना चाहिए? अनासक्त होने पार तो हम प्रसन्नतापूर्वक संसार में भलाई कर सकते हैं। अनासक्ति से किए हुए कार्य से कभी दु:ख अथवा अशांति नहीं आयेगी। वैसे तो संसार में अनंत काल तक सुख-दु:ख का चक्र चलता ही रहेगा।

एक ग़रीब आदमी को कुछ रुपये की जरूरत पड़ी। उसे कहीं से यह मालूम हो गया कि यदि वह किसी भूत को अपनेवश में कर ले, तो वह उससे जो चाहे, मँगवा सकता है। निदान उसे एक भूत ढूँढ़ने की सूझी। वह किसी ऐसे आदमी को ढूँढ़ने लगा, जिससे उसे एक भूत मिल जाए। ढूँढ़ते ढूँढ़ते उसे एक साधु मिले। इन साधु के पास बड़ी शक्तियाँ थीं और उसने उनसे सहायता की याचना की। साधु ने उससे पूछा, "तुम भूत का क्या करोगे?" उसने उत्तर दिया, "महाराज, मैं भूत इसलिए चाहता हूँ कि वह मेरा काम कर दे। कृपा कर मुझे उसको प्राप्त करने का ढंग बता दीजिए। मुझे उसकी बड़ी जरूरत है।" साधु बोले, "देखो, तुम इस झमेले में मत पड़ो, अपने घर लौट जाओ।" दूसरे दिन वह आदमी साधु के पास फिर गया और बहुत रोने-गाने लगा। उसने कहा, "महाराज, मुझे एक भूत दे ही दीजिए न। मुझे बड़ी आवश्यकता है।" अंत में साधु कुछ चिढ़ से गए और उन्होंने कहा, "अच्छा, लो, यह मंत्र लो, इसका जप करने से एक भूत प्रकट होगा और फिर उससे तुम जो काम कहोगे, वही करेगा; परंतु देखो, होशियार रहना। ये बड़े भयंकर प्राणी होते हैं। उसे निरंतर काम में लगाये रखना। यदि कभी वह खाली रहा, तो तुम्हारी जान ही ले लेगा।" तब उस मनुष्य ने कहा, "यह कौन कठिन बात है? मैं तो उसे इतना काम दे दूँ कि उसके जीवन भर खत्म न हो।" इसके बाद वह आदमी एक वन में चला गया और मंत्र का जप करने लगा। कुछ देर तक जप करने के बाद उसके सामने विकराल दाँतोंवाला एक बड़ा भयंकर भूत प्रकट हुआ। भूत ने कहा, "देखो, मैं भूत हूँ। तुम्हारे मंत्र ने मुझे जीत लिया है। परंतु देखो, तुम्हें मुझको निरंतर काम में लगाये रखना होगा, क्योंकि ज्यों ही मुझे थोड़ा सा भी अवकाश मिला कि मैं तुम्हारी जान ले लूँगा।" आदमी बोला, "ठीक है, जाओ, मेरे लिए एक महल तैयार करो।" भूत ने जवाब दिया, "लो, हो गया, महल तैयार है।" आदमी ने कहा, "जाओ, मेरे लिए धन ले आओ।" भूत बोला, "लो, धन भी तैयार है।" फिर आदमी ने कहा, "यह जंगल काट डालो और यहाँ एक शहर बसा दो।" भूत बोला, लो, "यह भी हो गया। अब और क्या करूँ, बतलाओ?" अब तो वह आदमी बड़ा घबड़ाने लगा; उसने मन में सोचा, "अब तो मेरे पास कोई काम नहीं है, जो मैं इससे करने को कहूँ। यह तो प्रत्येक काम क्षण भर में ही कर डालता है।" भूत इधर गरजकर बोला, "देखो, मुझे जल्दी कुछ काम करने को दो, नहीं तो मैं तुम्हें खा जाऊँगा।" बेचारा आदमी अब कोई काम सोच ही न सका और मारे भय के थर-थर काँपने लगा। अब तो वह बेतहाशा भागा और भागते-भागते उन्हीं साधु के पास पहुँचा और वहाँ जाकर गिड़गिड़ाने लगा, "महाराज, रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए, मेरे जान बचाइए।" साधु ने पूछा, "कहो, क्या हुआ?" उस मनुष्य ने उत्तर दिया, "अब मैं क्या करूँ? अब तो मेरे पास उस भूत को देने के लिए कोई भी काम शेष नहीं है। मैं उससे जो कुछ भी करने को कहता हूँ, वह क्षण भर में ही कर डालता है, और जब उसके पास कोई काम नहीं रह जाता, तो मुझे खा डालने की धमकी देता है।" इतने में ही वह भूत वहाँ आ पहुँचा, और कहने लगा, "अब तो मैं तुम्हें खा जाऊँगा।" और सचमुच वह उसे खा जाता! आदमी मारे डर के काँपने लगा और उसने साधु से अपने प्राणों की भिक्षा माँगी। साधु ने कहा, "अच्छा, मैं तुम्हें रास्ता बताता हूँ। देखो, उस कुत्ते की पूँछ टेढ़ी है, अपनी तलवार निकालो और यह पूँछ काटकर इस भूत को दे दो और उससे कहो कि इसे सीधी कर दे।" आदमी ने झट से कुत्ते की पूँछ काट ली और उसे भूत को देकर कहा, "लो, इसे सीधी करके मुझे दो"। भूत ने पूँछ ले ली और उसे बड़ी सावधानी से सीधी की, पर ज्यों ही उसने उसको सीधी करके छोड़ दिया, त्यों ही वह फिर टेढ़ी हो गयी। भूत ने दुबारा कोशिश की, परंतु ज्यों ही उसने छोड़ दी, त्यों ही वह फिर टेढ़ी हो गयी। उसने तीसरी बार फिर प्रयत्न किया, परंतु वह फिर टेढ़ी की टेढ़ी हो गयी। इस प्रकार वह कई दिनों तक प्रयत्न करता रहा, यहाँ तक कि वह तक थक गया और बोला, "मुझे ऐसा कष्ट तो अपने जीवन भर में कभी नहीं हुआ। मैं एक बड़ा पुराना भूत हूँ, ऐसी मुसीबत में मैं कभी नहीं पड़ा।" अब तो वह भूत उस आदमी से कहने लगा; "आओ भाई, हम-तुम समझौता कर लें। तुम मुझे छोड़ दो, और मैंने अब तक तुम्हें जो कुछ दिया है, वह सब अपने पास ही रखे रहो। मैं वादा करता हूँ, अब आगे तुम्हें किसी प्रकार का कष्ट न दूँगा।" यह सुन वह आदमी बड़ा खुश हुआ और बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उसने इस समझौते को स्वीकार कर लिया।

हमारा यह संसार भी बस कुत्ते की उस टेढ़ी पूँछ के ही समान है; सैकड़ों वर्ष से लोग इसे सीधा करने का प्रयत्न कर रहे हैं, परंतु ज्यों ही वे इसे छोड़ देते हैं, त्यों ही यह टेढ़ा का टेढ़ा हो जाता है। इसके अतिरिक्त और क्या हो सकता है? मनुष्य पहले यह जान ले कि आसक्तिरहित होकर उसे किस प्रकार कर्म करना चाहिए, तभी वह दुराग्रह और मतांधता से परे हो सकता है। जब हमें यह ज्ञात हो जाएगा कि संसार कुत्ते की टेढ़ी दुम की तरह है और कभी भी सीधा नहीं हो सकता, तब हम दुराग्रही नहीं होंगे। यदि संसार में यह दुराग्रह, यह कट्टरता न होती, तो अब तक यह बहुत उन्नति कर लेता। यह सोचना भूल है कि धर्मांधता द्वारा मानव-जाति की उन्नति हो सकती है? बल्कि उल्टे, यह तो हमें पीछे हटाने वाली शक्ति है, जिससे घृणा और क्रोध उत्पन्न होकर मनुष्य एक दूसरे से लड़ने-भिड़ने लगते हैं और सहानुभूतिशून्य हो जाते हैं। हम सोचते हैं कि जो कुछ हमारे पास है अथवा जो कुछ हम करते हैं, वही संसार में सर्वश्रेष्ठ है, और जो कुछ हम नहीं करते अथवा जो कुछ हमारे पास नहीं है, वह एक कौड़ी मूल्य का भी नहीं। अतएव जब कभी तुममें दुराग्रह का यह भाव आये, तो सदैव कुत्ते की टेढ़ी पूँछ का दृष्टांत स्मरण कर लिया करो। तुम्हें अपने आपको संसार के बारे में चिंतित बना लेने की कोई आवश्यकता नहीं-तुम्हारी सहायता के बिना भी यह चलता ही रहेगा। जब तुम दुराग्रह और मतांधता से परे हो जाओगे, तभी तुम अच्छी तरह कार्य कर सकोगे। जो ठंडे मस्तिष्क वाला और शांत है, जो उत्तम ढंग से विचार करके कार्य करता है, जिसके स्नायु सहज ही उत्तेजित नहीं हो उठते तथा जो अत्यंत प्रेम और सहानुभूति संपन्न है, केवल वही व्यक्ति संसार में महान् कार्य कर सकता है और इस तरह उससे अपना भी कल्याण कर सकता है। दुराग्रही व्यक्ति मूर्ख और सहानुभूतिशून्य होता है। वह न तो कभी संसार को सीधा कर सकता है और न स्वयं ही शुद्ध एवं पूर्ण हो सकता है।

इस प्रकार आज के व्याख्यान का सारांश यह है : सर्वप्रथम हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि हमीं संसार के ऋणी हैं, संसार हमारा ऋणी नहीं। यह तो हमारा सौभाग्य है कि हमें संसार में कुछ कार्य करने का अवसर मिलता है। संसार की सहायता करने से हम वास्तव में स्वयं अपना ही कल्याण कराते हैं। दूसरी बात यह है कि इस विश्व का अधिष्ठाता एक ईश्वर है। यह बात सच नहीं कि यह संसार पिछड़ रहा है और इसे तुम्हारी अथवा मेरी सहायता की आवश्यकता है। ईश्वर सर्वत्र विराजमान है। वह अविनाशी सतत क्रियाशील और जागृत है। जब सारा विश्व सोता है, तब भी वह जागता रहता है। वह निरंतर कार्य में लगा हुआ है। संसार के समस्त परिवर्तन और विकार उसी के कार्य हैं। तीसरी बात यह है कि हमें किसी से घृणा नहीं करनी चाहिए। यह संसार सदैव ही शुभ और अशुभ का मिश्रण-स्वरूप रहेगा। हमारा कर्तव्य है कि हम दुर्बल के प्रति सहानुभूति रखें और एक अन्यायी के प्रति भी प्रेम रखें। यह संसार तो चरित्र-गठन के लिए एक विशाल नैतिक व्यायामशाला है। इससे हम सभी को अभ्यासरूपी कसरत करनी पड़ती है, जिससे हम आध्यात्मिक बल से अधिकाधिक बलवान बनते रहें। चौथी बात यह है कि हममें किसी प्रकार का भी दुराग्रह नहीं होना चाहिए, क्योंकि दुराग्रह प्रेम का विरोधी है। बहुधा दुराग्रहियों को तुम यह गाल बजाते सुनोगे, "हमें पापी से घृणा नहीं है, हमें तो घृणा पाप से है।" परंतु यदि कोई मुझे एक ऐसा मनुष्य दिखा दे, जो सचमुच पाप और पापी में भेद कर सकता हो, तो ऐसे मनुष्य को देखने के लिए मैं कितनी भी दूर जाने की तैयारी हूँ, ऐसा कहना सरल है। यदि हम द्रव्य और उसके गुण में भली-भाँति भेद कर सकें, तो हम पूर्ण हो जाएं। पर इसे व्यवहार में लाना इतना सरल नहीं। हम जीतने ही शांतचित्त होंगे और हमारे स्नायु जीतने संतुलित रहेंगे, हम उतने ही अधिक प्रेमसंपन्न होंगे और हमारा कार्य भी उतना ही अधिक उत्तम होगा।

अनासक्ति ही पूर्ण आत्मत्याग है

जिस प्रकार हमारा प्रत्येक कार्य हमारी प्रतिक्रिया के रूप में फिर वापस आ जाता है, उसी प्रकार हमारे कार्य दूसरे व्यक्तियों पर तथा उनके कार्य हमारे ऊपर अपना प्रभाव डाल सकते हैं। शायद तुम सबने एक तथ्य के रूप में ऐसा देखा होगा कि जब मनुष्य कोई बुरे कार्य करता है, तो क्रमश: वह अधिकाधिक बुरा बनता जाता है, और इसी प्रकार जब वह अच्छे कार्य करने लगता है, तो दिनोंदिन सबल होता जाता है और उसकी प्रवृत्ति सदैव सत्कार्य करने की ओर झुकती जाती है। कर्म के प्रभाव के तीव्र होते जाने की व्याख्या केवल एक ही प्रकार से हो सकती है, और वह यह कि हम एक दूसरे मन पर क्रिया-प्रतिक्रिया कर सकते हैं। इसे स्पष्ट करने के लिए हम भौतिक विज्ञान से एक दृष्टांत ले सकते हैं। जब मैं कोई कार्य करता हूँ, तो कहा जा सकता है कि मेरा मन एक विशिष्ट प्रकार की कंपनावस्था में होता है; उस समय अन्य जितने मन उस प्रकार की अवस्था में होंगे, उनकी प्रवृत्ति यह होगी कि वे मेरे से प्रभावित हो जाएं। यदि एक कमरे में भिन्न-भिन्न वाद्य-यंत्र एक सुर में बाँध दिये जाएं, तो तुम सबने देखा होगा कि एक को छेड़ने से अन्य सभी की प्रवृत्ति उसी प्रकार का सुर निकालने की होने लगती है। इसी प्रकार जो जो मन एक सुर में बँधे हैं उन सबके ऊपर एक विशेष विचार का समान प्रभाव पड़ेगा। हाँ, यह सत्य है कि विचार का मन पर यह प्रभाव दूरी अथवा अन्य कारणों से न्यूनाधिक अवश्य हो जायेगा, परंतु मन पर प्रभाव होने की संभावना सदैव बनी रहेगी। मान लो, मैं एक बुरा कार्य कर रहा हूँ। उस समय मेरे मन में एक विशेष प्रकार का कंपन होगा और संसार के अन्य सब मन, जो उसी प्रकार की स्थिति में हैं, संभवत: मेरे मन के कंपन से प्रभावित हो जाएंगे। इसी प्रकार, जब मैं कोई अच्छा कार्य करता हूँ, तो मेरे मन में एक दूसरे प्रकार का कंपन होता है, और उस प्रकार के कंपनशील सारे मन पर मेरे मन के प्रभाव पड़ने की संभावना रहती है। एक मन का दूसरे मन पर यह प्रभाव तनाव की न्यूनाधिक शक्ति के अनुसार कम या अधिक हुआ करता है।

इस उपमा को यदि हम कुछ और आगे ले जाएं, तो कह सकते हैं कि जिस प्रकार कभी-कभी आलोक-तरंगों को किसी गंतव्य वस्तु तक पहुँचने में लाखों वर्ष लग जाते हैं, उसी प्रकार विचार-तरंगें भी किसी ऐसे पदार्थ को पहुँचने तक, जिसके साथ वे तदाकार होकर स्पंदित हो सकें, कभी-कभी सैकड़ों वर्ष तक लग सकते हैं। अतएव यह नितांत संभव है कि हमारा यह वायुमंडल अच्छी और बुरी, दोनों प्रकार की विचार-तरंगों से व्याप्त हो। प्रत्येक मस्तिष्क से निकला हुआ प्रत्येक विचार योग्य आधार प्राप्त हो जाने तक मानो इसी प्रकार भ्रमण करता रहता है। और जो मन इस प्रकार के आवेगों को ग्रहण करने के लिए अपने को उन्मुक्त किए हुए हैं, वह तुरंत ही उन्हें अपना लेगा। अतएव जब कोई मनुष्य कोई दुष्कर्म करता है, तो वह अपने मन को किसी एक विशिष्ट सुर में ले आता है; और उसी सुर की जितनी भी तरंगें पहले से ही आकाश में अवस्थित हैं, वे सब उसके मन में घुस जाने की चेष्टा करती हैं। यही कारण है कि एक दुष्कर्मी साधारणत: अधिकाधिक दुष्कर्म करता जाता है। उसके कर्म क्रमश: प्रबलतर होते जाते हैं। यही बात सत्कर्म करनेवाले के लिए भी घटती है; वह अपने को वातावरण की समस्त शुभ-तरंगों को ग्रहण करने के लिए मानो खोल देता है और इस प्रकार उसके सत्कर्म अधिकाधिक शक्ति संपन्न होते जाते हैं। अतएव हम देखते हैं कि दुष्कर्म करने में हमे दो प्रकार का भय है। पहला तो यह कि हम अपने को चारों ओर की अशुभ-तरंगों के लिए खोल देते हैं; और दूसरा यह कि हम स्वयं ऐसी अशुभ-तरंग का निर्माण कर देते हैं, जिसका प्रभाव दूसरों पर पड़ता है, फिर चाहे वह सैकड़ों वर्ष बाद ही क्यों न हो। दुष्कर्म द्वारा हम केवल अपना ही नहीं, वरन् दूसरों का भी अहित करते हैं, और सत्कर्म द्वारा हम अपना तथा दूसरों का भी भला करते हैं। मनुष्य की अन्य शक्तियों के समान ये शुभ और अशुभ शक्तियाँ भी बाहर से बल संचित करती हैं।

कर्मयोग के अनुसार, बिना फल उत्पन्न किए कोई भी कर्म नष्ट नहीं हो सकता। प्रकृति की कोई भी शक्ति उसे फल उत्पन्न करने से रोक नहीं सकती। यदि मैं कोई बुरा कर्म करूँ, तो उसका फल मुझे भोगना ही पड़ेगा; विश्व में ऐसी कोई शक्ति नहीं, जो इसे रोक सके। इसी प्रकार, यदि मैं कोई सत्कार्य करूँ, तो विश्व में ऐसी कोई शक्ति नहीं, जो उसके शुभ को रोक सके। कारण से कार्य होता ही है; इसे कोई भी रोक नहीं सकता। अब हमारे सामने कर्मयोग के संबंध में एक सूक्ष्म एवं गंभीर प्रश्न उपस्थित होता है। हमारे सत् और असत् कर्म आपस में घनिष्ठ रूप से संबद्ध हैं; इन दोनों के बीच हम निश्चित रूप से एक रेखा खींचकर यह नहीं बता सकते कि अमुक कार्य नितांत शुभ है और अमुक अशुभ। ऐसा कोई भी कर्म नहीं है, जो एक ही समय शुभ और अशुभ, दोनों फल न उत्पन्न करे। यही देखो, मैं तुम लोगों से बात कर रहा हूँ; संभवत: तुमसे से कुछ लोग सोचते होंगे कि मैं एक भला कार्य कर रहा हूँ परंतु साथ ही साथ शायद मैं हवा में रहने वाले असंख्य छोटे छोटे कीटाणुओं को भी नष्ट करता जा रहा हूँ। और इस प्रकार एक दृष्टि से मैं पूरा भी कर रहा हूँ। हमारे निकट के लोगों पर, जिन्हें हम जानते हैं, यदि किसी कार्य का प्रभाव शुभ पड़ता है, हम उसे शुभ कार्य कहते हैं। उदाहरणार्थ, तुम लोग मेरे इस व्याख्यान को अच्छा कहोगे, परंतु वे कीटाणु ऐसा कभी न कहेंगे। कीटाणुओं को तुम नहीं देख रहे हो, पर अपने आपको देख रहे हो। मेरी वक्तृता का जो प्रभाव तुम पर पड़ता है, वह तुम स्पष्ट देख सकते हो, किंतु उसका प्रभाव उन कीटाणुओं पर कैसा पड़ता है, यह तुम नहीं जानते। इसी प्रकार यदि हम अपने असत् कर्मों का भी विश्लेषण करें, तो हमें ज्ञात होगा कि संभवत: उनसे भी कहीं न कहीं किसी न किसी प्रकार का शुभ फल हुआ है। जो शुभ कारणों में भी कुछ न कुछ अशुभ तथा अशुभ कर्मों में भी कुछ न कुछ शुभ देखता है, वास्तव में उसी ने कर्म का रहस्य समझा है।

इससे क्या निष्कर्ष निकलता है?-यही कि हम चाहे जितना भी प्रयत्न क्यों न करें, ऐसा कोई कर्म नहीं हो सकता, जो संपूर्णत: पवित्र हो अथवा संपूर्णत: अपवित्र, यदि 'पवित्रता' या 'अपवित्रता' से हमारा तात्पर्य है, अहिंसा या हिंसा। बिना दूसरों को हानि पहुँचाए हम साँस तक नहीं ले सकते। अपने भोजन का प्रत्येक ग्रास हम किसी दूसरे के मुँह से छीनकर खाते हैं। यहाँ तक कि हमारा अस्तित्व भी दूसरे प्राणियों के जीवन को विनष्ट करके संभव होता है। चाहे मनुष्य हो, पशु हो अथवा कीटाणु, किसी न किसी को हटाकर ही हम अपना अस्तित्व स्थिर रखते हैं। ऐसी दशा में यह स्वाभाविक ही है कि कर्म द्वारा पूर्णता कभी नहीं प्राप्त हो सकती। हम भले ही अनंत काल तक कर्म करते रहें, परंतु इस जटिल संसार-व्यूह से कभी छुटकारा नहीं पा सकते। हम चाहे निरंतर कार्य करते रहें, परंतु कर्मफलों में इस शुभ और अशुभ के अपरिहार्य साहचर्य का अंत नहीं होगा।

दूसरी विचारणीय बात है-कर्म का क्या उद्देश्य है? हम देखते हैं कि प्रत्येक देश के अधिकांश व्यक्तियों की यह धारणा है कि एक समय ऐसा आएगा, जब यह संसार पूर्णता को प्राप्त हो जाएगा; तब यहाँ न तो किसी प्रकार का रोग रहेगा, न शोक, न दुष्टता, न मृत्यु। वैसे तो यह एक बड़ा सुंदर विचार है और एक अज्ञानी को उदात्त बनाने और प्रोत्साहन देने के लिए बहुत ही अच्छी प्रेरक शक्ति है; परंतु यदि हम क्षण भर भी ध्यानपूर्वक सोचें, तो हमें सहज ही ज्ञात हो जाएगा कि ऐसा कभी नहीं हो सकता। और यह हो भी कैसे सकता है, जब हम जानते हैं कि शुभ और अशुभ एक ही सिक्के के चित और पट हैं? ऐसा भी कहीं हो सकता है कि शुभ हो और उसके अशुभ न हो? तब फिर पूर्णता का अर्थ क्या है? सच पूछा जाए, तो 'पूर्ण जीवन' शब्द ही स्वविरोधात्मक है। जीवन तो हमारे एवं प्रत्येक बाह्य प्रकृति से संघर्ष करते रहते हैं, और यदि उसमें हमारी हार हो जाए, तो हमारा जीवन-दीप ही बुझ जाता है। आहार और हवा के लिए निरंतर चेष्टा का नाम ही है जीवन। यदि हमें भोजन या हवा न मिले, तो हमारी मृत्यु हो जाती है। जीवन कोई आसानी से चलाने वाली सरल चीज़ नहीं है-यह तो एक प्रकार का सम्मिश्रित व्यापार है। बहिर्जगत् और अंतर्जगत् का घोर संघर्ष ही जीवन कहलाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि जब यह संघर्ष समाप्त हो जाएगा, तो जीवन का भी अंत हो जाएगा।

आदर्श सुख का अर्थ है-इस संघर्ष का अंत हो जाना। परंतु तब तो जीवन का भी अंत हो जाएगा; क्योंकि संघर्ष का अंत तभी हो सकता है, जब स्वयं जीवन का ही अंत हो जाए। हम यह देख ही चुके हैं कि संसार का उपकार करना अपना ही उपकार करना है। दूसरों के प्रति निरंतर शुभ कराते रहने से हम स्वयं को भूलने का प्रयत्न करते रहते हैं। और यह आत्मविस्मृति ही एक बहुत बड़ी शिक्षा है, जो हमें जीवन में सीखनी है। मनुष्य मूर्खतावश सोचता है कि वह अपने को सुखी बना सकता है, परंतु वर्षों के घोर संघर्ष के बाद उसकी आँखें खुलती हैं और वह यह अनुभव करता है कि वास्तविक सुख तो स्वार्थपरता को नष्ट कर देने में है, और सिवा अपने उसे और कोई सुखी नहीं बना सकता। परोपकार का प्रत्येक कार्य, सहानुभूति का प्रत्येक विचार, दूसरों की सहायतार्थ किया गया प्रत्येक कर्म, प्रत्येक शुभ कार्य हमारे क्षुद्र अहंभाव को प्रतिभाव घटाता रहता है और हममें यह भावना उत्पन्न करता है कि हम न्यूनतम और तुच्छतम हैं; और इसीलिए ये सब कार्य श्रेष्ठ हैं। ज्ञान, भक्ति और कर्म, तीनों इस बिंदु पर मिलते हैं। सर्वोच्च आदर्श है-चिरंतन और संपूर्ण आत्मत्याग, जिसमें किसी प्रकार का 'मैं' नहीं, केवल 'तू' ही 'तू' है। हमारे जाने या बिना जाने, कर्मयोग हमें इसी लक्ष्य की ओर ले जाता है। संभव है, एक धर्मप्रचारक निर्गुण ईश्वर की बात सुनकर दहल उठे। उसका शायद यही दृढ़ मत हो कि ईश्वर सगुण है, और वह अपने निजत्व, अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व को-इस व्यक्तित्व के बारे में उसकी धारणा चाहे जैसी भी हो-कायम रखने का इच्छुक हो; परंतु यदि उसके नीतिविषयक विचार वास्तव में शुद्ध हैं, तो उनका आधार सर्वोच्च आत्मत्याग के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। यह संपूर्ण आत्मत्याग ही सारी नैतिकता की नींव है। मनुष्य, पशु, देवता सबके लिए यही एक मूल भाव है, जो समस्त नैतिक विधानों में व्याप्त है।

इस संसार में हमें कई प्रकार के मनुष्य मिलेंगे। प्रथम तो देव-मानव, जो पूर्ण आत्मत्यागी होते हैं, अपने जीवन की भी बाज़ी लगाकर दूसरों का भला करते हैं। ये सर्वश्रेष्ठ पुरुष हैं। यदि किसी देश में ऐसे सौ मनुष्य भी हों, तो उस देश को फिर किसी बात की चिंता नहीं। परंतु खेद है, ऐसे लोग बहुत-बहुत कम हैं! दूसरे वे साधु-प्रकृति मनुष्य हैं, जो दूसरों की भलाई तब तक करते हैं, जब तक उनकी स्वयं की कोई हानि न हो; और तीसरे वे आसुरी प्रकृति के लोग हैं, जो अपनी भलाई के लिए दूसरों की हानि तक करने में नहीं हिचकते। एक संस्कृत कवि ने चौथी श्रेणी भी बतायी है, जिसको हम कोई नाम नहीं दे सकते। ये लोग ऐसे होते हैं कि अकारण ही दूसरों का अनिष्ट केवल अनिष्ट करने के लिए ही करते रहते हैं जिस प्रकार सर्वोच्च स्तर पर साधु-महात्मागण भला करने के लिए ही दूसरों का भला करते रहते हैं, उसी प्रकार सबसे बुरा करते रहते हैं। ऐसा करने से उन्हें कोई लाभ नहीं होता-यह तो उनकी प्रकृति ही है।

संस्कृत में दो शब्द हैं-प्रवृत्ति और निवृत्ति। प्रवृत्ति का अर्थ है-किसी वस्तु की ओर प्रवर्तन या गमन, और निवृत्ति का अर्थ है-किसी वस्तु से निवर्तन या प्रत्यागमन। 'किसी वस्तु की ओर प्रवर्तन' का ही अर्थ है, हमारा यह संसार-यह 'मैं' और 'मेरा'। इस 'मैं' को धन-संपत्ति, प्रभुत्व, नाम-यश द्वारा सर्वदा बढ़ाने का यत्न करना, जो कुछ मिले, उसी को पकड़ रखना, सारे समय सभी वस्तुओं को इस 'मैं'-रूपी केंद्र में ही संग्रहीत करना-इसी का नाम है 'प्रवृत्ति'। यह प्रवृत्ति ही मनुष्य मात्र का स्वाभाविक भाव है-चहुँ ओर से जो कुछ मिले, उसे लेना और सबको एक केंद्र में एकत्र करते जाना। और वह केंद्र है, उसका अपना मधुर 'अंह'। जब यह वृत्ति घटाने लगती है, जब निवृत्ति का उदय होता है, तभी नैतिकता और धर्म का आरंभ होता है। 'प्रवृत्ति' और 'निवृत्ति', दोनों ही कर्मस्वरूप हैं। एक असत् कर्म है और दूसरा सत्। निवृत्ति ही सारी नैतिकता एवं सारे धर्म की नींव है; और इसकी पूर्णता ही संपूर्ण 'आत्मत्याग' है, जिसके प्राप्त हो जाने पर मनुष्य दूसरों के लिए अपना शरीर, मन, यहाँ तक कि अपना सर्वस्व निछावर कर देता है। तभी मनुष्य को कर्मयोग में सिद्धि प्राप्त होती है। सत्कार्यों का यही सर्वोच्च फल है। किसी मनुष्य ने चाहे एक भी दर्शनशास्त्र न पढ़ा हो, किसी प्रकार के ईश्वर में विश्वास न किया हो और न करता हो, चाहे उसने अपने जीवन भर में एक बार भी प्रार्थना न की हो, परंतु केवल सत्कार्यों की शक्ति द्वारा उस अवस्था में पहुँच गया है, जहाँ वह दूसरों के लिए अपना जीवन और सब कुछ उत्सर्ग करने को तैयार रहता है, तो हमें समझना चाहिए कि वह उसी लक्ष्य को पहुँच गया है, जहाँ भक्त अपनी उपासना द्वारा तथा दार्शनिक अपने ज्ञान द्वारा पहुँचता है। इस प्रकार तुम देखते हो कि ज्ञानी,कर्मी और भक्त, तीनों एक ही स्थान पर पहुँचते हैं; और वह स्थान है-आत्मत्याग। लोगों के दर्शन और धर्म में कितना ही भेद क्यों न हो, जो व्यक्ति अपना जीवन दूसरों के लिए अर्पित करने को उद्यत रहता है, उसके प्रति समग्र मानवता श्रद्धा और भक्ति से नत हो जाती है। यहाँ किसी प्रकार के मत या संप्रदाय का प्रश्न नहीं-यहाँ तक कि वे लोग भी, जो धर्म संबंधी समस्त विचारों के विरुद्ध हैं, जब इस प्रकार का संपूर्ण आत्मत्यागपूर्ण कोई कार्य देखते हैं, तो उसके प्रति श्रद्धानत हुए बिना नहीं रह सकते। क्या तुमने यह नहीं देखा, एक कट्टर मतांध ईसाई भी जब एडविन आर्नल्ड के 'एशिया की ज्योति' (Light of Asia) नामक ग्रंथ को पढ़ता है, तो वह भी उस बुद्ध के प्रति किस प्रकार श्रद्धानत हो जाता है, जिन्होंने अन्य किसी भी बात का प्रचार नहीं किया, आत्मत्याग के अतिरिक्त जिन्होंने अन्य किसी भी बात का प्रचार नहीं किया? इसका कारण केवल यह है कि मतांध व्यक्ति यह नहीं जानता कि उसका स्वयं का जीवन-लक्ष्य और उन लोगों का जीवन-लक्ष्य, जिन्हें वह अपना विरोधी समझता है, बिल्कुल एक ही है। एक उपासक अपना हृदय में निरंतर ईश्वरी भाव एवं साधु भाव रखते हुए अंत में उसी एक स्थान पर पहुँचता है और कहता है, "प्रभो, तेरी इच्छा पूर्ण हो।" वह अपने निमित्त कुछ भी बचा नहीं रखता। यही आत्मत्याग है। एक ज्ञानी भी अपने ज्ञान द्वारा देखता है कि उसका यह तथाकथित भासमान 'अंह' केवल एक भ्रम है; और इस तरह वह उसे बिना किसी हिचकिचाहट के त्याग देता है। यह भी आत्मत्याग के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। अतएव हम देखते हैं कि कर्म, भक्ति और ज्ञान, तीनों यहाँ पर आकार मिल जाते हैं। प्राचीन काल के बड़े बड़े धर्मप्रचारकों ने जब हमें यह सिखाया था कि 'ईश्वर जगत से भिन्न है, जगत् से परे है,' तो असल में उसका मर्म यही था। जगत् एक चीज़ है और ईश्वर दूसरी; और यह भेद बिल्कुल सत्य है। जगत् से उनका तात्पर्य है स्वार्थपरता। स्वार्थशून्यता ही ईश्वर है। एक मनुष्य चाहे रत्नजड़ित सिंहासन पर आसीन हो, सोने के महल में रहता हो, परंतु यदि वह पूर्ण रूप से स्वार्थरहित है, तो वह ब्रह्म में ही स्थित है। परंतु एक दूसरा मनुष्य चाहे झोपड़ी में ही क्यों न रहता हो चिथड़े क्यों न पहनता हो, सर्वथा दीन-हीन ही क्यों न हो, पर यदि वह स्वार्थी है, तो हम कहेंगे कि वह संसार में घोर रूप से डूबा हुआ है।

हाँ, तो हम यह कह रहे थे बिना कुछ बुरा किए हम न तो भला कर सकते हैं और न बिना कुछ भला किए बुरा ही। तो अब प्रश्न यह है कि यह जानते हुए हम किस प्रकार कर्म करें? अत: इस संसार में अनेक ऐसे भी संप्रदाय हुए हैं, जिन्होंने अद्भुत अनर्गलतापूर्वक यह शिक्षा दी कि धीरे-धीरे आत्महत्या कर लेना ही इस संसार से निस्तार पाने का एकमात्र उपाय है, क्योंकि, मनुष्य यदि जीवित रहता है, तो अनेक छोटे-छोटे जंतुओं और पौधों का नाश करके, अथवा अन्य किसी न किसी का कुछ न कुछ अनिष्ट करके ही। इसीलिए उनके मतानुसार इस संसारचक्र से छूटने का एकमात्र उपाय है मृत्यु! जैनियों ने अपने सर्वोच्च आदर्श के रूप में इसी का प्रचार किया है। यह शिक्षा बड़ी तर्कसंगत प्रतीत होती है। परंतु इसका यथार्थ समाधान गीता में मिलता है। और वह है अनासक्ति-अपने जीवन के समस्त कार्य करते हुए भी किसी में आसक्त न होना। यह जान लो कि संसार में होते हुए भी तुम संसार से नितांत पृथक् हो और यहाँ तुम जो भी कर रहे हो, वह अपने लिए नहीं है। यदि कोई कार्य तुम अपने लिए करोगे, तो उसका फल तुम्हें ही भोगना पड़ेगा। यदि वह सत्कार्य है, तो तुम्हें उसका अच्छा फल मिलेगा और यदि बुरा है, तो बुरा। परंतु कोई भी कार्य हो, यदि तुम वह अपने लिए नहीं कराते, तो उसका प्रभाव तुम पर नहीं पड़ेगा। इस भाव को स्पष्ट करने के लिए हमारे शास्त्रों में बड़े सुंदर ढंग से कहा है, 'यदि किसी में यह बोध रहे कि मैं इसे अपने लिए बिल्कुल नहीं कर रहा हूँ, तो फिर वह चाहे समस्त संसार की हत्या ही क्यों न करे डाले (अथवा स्वयं ही क्यों न हत हो जाए), वास्तव में वह न तो हत्या करता है और न हत ही होता है।' इसीलिए कर्मयोग हमें शिक्षा देता है, 'संसार को मत छोड़ो, संसार में ही रहो; जितना चाहो, सांसारिक भाव ग्रहण करो। परंतु यदि यह अपने ही भोग के निमित्त हो, तो फिर तुम्हारा कर्म करना व्यर्थ है।' तुम्हारा लक्ष्य भोग नहीं होना चाहिए। पहले अंहभाव को नष्ट कर डालो, और फिर समस्त संसार को आत्मस्वरूप देखो, जैसा प्राचीन ईसाई कहा करते थे-'उस बूढ़े आदमी को मरना ही चाहिए।' इस बूढ़े आदमी का अर्थ है, यह स्वार्थपरक भाव कि यह संसार हमारे ही भोग के लिए बना है। अज्ञ माता-पिता अपने बच्चे को यह प्रार्थना करने की शिक्षा देते हैं, "हे प्रभो, तूने यह सूर्य और चंद्रमा मेरे लिए ही बनाए हैं," मानो उस ईश्वर को सिवाय इसके कि वह इन बच्चों के लिए यह सब पैदा करता रहे और कोई काम ही न था! अपने बच्चों को ऐसी मूर्खतापूर्ण शिक्षा मत दो। फिर एक दूसरे प्रकार के भी मूर्ख लोग हैं, जो हमें सिखाते हैं कि ये सब जानवर हमारे मारने-खाने के लिए ही बनाए गए हैं और यह सारा संसार मनुष्य के भोग के लिए है। यह सब निरी मूर्खता है। एक शेर भी कह सकता है कि मनुष्य कि उत्पत्ति मेरे ही लिए हुई है और ईश्वर से प्रार्थना कर सकता है, "हे प्रभो, मनुष्य कितना दुष्ट है कि वह अपने को मेरे सामने उपस्थित नहीं कर देता, जिससे मैं उसे खा जाऊँ। देखिए, मनुष्य आपका नियम भंग कर रहा है।" यदि संसार की उत्पत्ति हमारे लिए हुई है, तो हम भी संसार के लिए ही पैदा किए गए हैं। यह बड़ी कुत्सित धारणा है कि यह संसार हमारे भोग के लिए ही बनाया गया है और इसी भयानक धारणा से हम बद्ध रहते हैं। वास्तव में यह संसार हमारे लिए नहीं है। प्रतिवर्ष लाखों लोग इसमें से बाहर चले जाते हैं, परंतु उधर संसार की कोई नज़र तक नहीं। लाखों फिर आ जाते हैं। संसार जैसे हमारे लिए है, वैसे ही हम भी संसार के लिए हैं।

अतएव ठीक ढंग से कर्म करने ले लिए यह आवश्यक है कि पहले हम आसक्ति का भाव त्याग दें। दूसरी बात यह कि हमें स्वयं झंझट में उलझ नहीं जाना चाहिए। अपने को एक साक्षी के समान रखो और अपना काम करते रहो। मेरे गुरुदेव कहा कराते थे, "अपने बच्चों के प्रति वही भावना रखो, जो एक धाय की होती है।" वह तुम्हारे बच्चे को गोद में लेती है, उसे खिलाती है और उसको इस प्रकार प्यार करती है, मानो वह उसी का बच्चा हो। पर ज्यों ही तुम उसे काम से अलग कर देते हो, त्यों ही वह अपना बोरा-बिस्तर समेट तुरंत घर छोड़ने को तैयार हो जाती है। उन बच्चों के प्रति उसका जो इतना प्रेम था, उसे वह बिल्कुल भूल जाती है। एक साधारण धाय को तुम्हारे बच्चों को छोड़कर दूसरे के बच्चों को लेने में तनिक भी दु:ख न होगा। तुम भी अपने बच्चों के प्रति यही भाव धारण करो। तुम्हीं उनकी धाय हो,-और यदि तुम्हारा ईश्वर में विश्वास है, तो विश्वास करो कि ये सब चीजें, जिन्हें तुम अपनी समझते हो, वास्तव में ईश्वर की हैं। अत्यंत दुर्बलता कभी-कभी बड़ी साधुता और सबलता का रूप धारण कर लेती है। यह सोचना कि मेरे ऊपर कोई निर्भर है तथा मैं किसी का भला कर सकता हूँ, अत्यंत दुर्बलता का चिन्ह है। यह अंहकार ही समस्त आसक्ति की जड़ है, और इस आसक्ति से ही समस्त दु:खों को उत्पत्ति होती है। हमें अपने मन को यह भली-भाँति समझा देना चाहिए कि इस संसार में हमारे ऊपर कोई भी निर्भर नहीं है। एक भिखारी भी हमारे दान पर निर्भर नहीं। किसी भी जीव को हमारी दया की आवश्यकता नहीं, संसार का कोई भी प्राणी हमारी सहायता का भूखा नहीं। सबकी सहायता प्रकृति से होती है। यदि हममें से लाखों लोग न भा रहें, तो भी उन्हें सहायता मिलती रहेगी। तुम्हारे-हमारे न रहने से प्रकृति के द्वार बंद न हो जाएंगे। दूसरों की सहायता करके हम जो स्वयं शिक्षा लाभ कर रहे हैं, यही तो हमारे-तुम्हारे लिए परम सौभाग्य की बात है। जीवन में सीखने योग्य यही सबसे बड़ी बात है। जब हम पूर्ण रूप से इसे सीख लेंगे, तो हम फिर कभी दु:खी न होंगे; तब हम समाज में कहीं भी जाकर उठ-बैठ सकते हैं, इससे हमारी कोई हानि न होगी। तुम्हारे चाहे पति हों, चाहे पत्नियाँ हों, तुम्हारे दल के दल नौकर हों, बड़ा भारी राज्य हो पर यदि इस तत्त्व को हृदय में रखकर कार्य करते हो कि यह संसार मेरे भोग के लिए नहीं है और इसे मेरी सहायता की किंचित् आवश्यकता नहीं, तो यह सब रहने पर भी तुम्हारी कोई हानि नहीं होगी। हो सकता है, इसी साल तुम्हारे कई मित्रों का निधन हो गया हो। तो क्या भला संसार उनके फिर वापस आने ले लिए रुका हुआ है? क्या उसकी धारा रुक गयी है? नहीं, ऐसा नहीं हुआ। यह तो जारी ही है। अतएव अपने मन से यह विचार निकाल दो कि तुम्हें इस संसार के लिए कुछ करना है। संसार को तुम्हारी सहायता की तनिक भी आवश्यकता नहीं। मनुष्य का यह सोचना निरी मूर्खता है कि वह संसार की सहायता के लिए पैदा हुआ है। यह केवल अंहकार है, निरी स्वार्थपरता है, जो धर्म का आड़ में हमारे सामने आती है। जब तुम्हारे मन में, इतना ही नहीं, बल्कि तुम्हारी नाड़ियों और मांसपेशियों तक में यह शिक्षा भली भाँति भिद जाएगी कि संसार तुम्हारे अथवा अन्य किसी के ऊपर निर्भर नहीं है, तो कर्म से तुम्हें फिर किसी प्रकार की दु:खरूपी प्रतिक्रिया न होगी। यदि तुम किसी मनुष्य को कुछ दे दो और उससे किसी प्रकार की आशा न करो, यहाँ तक कि उससे कृतज्ञता प्रकाशन की भी इच्छा न करो, तो यदि वह मनुष्य कृतघ्न भी हो, तो भी उसकी कृतघ्नता का कोई प्रभाव तुम्हारे ऊपर न पड़ेगा, क्योंकि तुमने तो कभी किसी बात की आशा ही नहीं की थी और न यही सोचा था कि तुम्हें उससे बदले में कुछ पाने का अधिकार है। तुमने तो उसे वही दिया, जो उसका प्राप्य था। उसे वह चीज़ अपने कर्म से ही मिली, और अपने कर्म से ही तुम उसके दाता बने। यदि तुम किसी को कोई चीज़ दो, तो उसके लिए तुम्हें घमंड क्यों होना चाहिए? तुम तो केवल उस धन अथवा दान के वाहक मात्र हो, और संसार अपने कर्मों द्वारा उसे पाने का अधिकारी है। फिर तुम्हें अभिमान क्यों हो? जो कुछ तुम संसार को देते ही, वह आखिर है ही कितना? जब तुममें अनासक्ति का भाव आ जाएगा, तब फिर तुम्हारे लिए न तो कुछ अच्छा रह जाएगा, न बुरा। वह तो केवल स्वार्थपरता ही है, जिसके कारण तुम्हें अच्छाई या बुराई दिख रही है। यह समझना बहुत कठिन है, परंतु धीरे-धीरे समझ सकोगे कि संसार की कोई भी वस्तु तुम्हारे ऊपर तब तक अपना प्रभाव नहीं डाल सकती, जब तक कि तुम स्वयं ही उसे अपना प्रभाव न डालने दो। मनुष्य की आत्मा के ऊपर किसी शक्ति का प्रभाव नहीं पड़ सकता, जब तक कि वह मनुष्य स्वयं अपने को गिराकर मूर्ख न बना ले तथा उस शक्ति के वश में न हो जाए। अतएव आसक्ति के द्वारा तुम किसी भी प्रकार की शक्ति पर विजय प्राप्त कर सकते हो और उसे अपने ऊपर प्रभाव डालने से रोक सकते हो। यह कह देना बड़ा सरल है कि जब तक तुम किसी चीज़ को अपने ऊपर प्रभाव न डालने दो, तब तक वह तुम्हारा कुछ नहीं कर सकती। परंतु जो सचमुच अपने ऊपर किसी का प्रभाव नहीं पड़ने देता, तथा बहिर्जगत् के प्रभावों से जो न सुखी होता है, न दु:खी-उसका लक्षण क्या है? वह लक्षण यह कि सुख अथवा दु:ख में उस मनुष्य का मन सदा एक सा रहता है, सभी अवस्थाओं में उसकी मनोदशा समान रहती है।

भारतवर्ष में व्यास नामक एक महापुरुष थे। ये बहुत बड़े ऋषि थे और वेदांतसूत्र के प्रणेता के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनके पिता ने पूर्णत्व प्राप्त करने का बहुत यत्न किया था, परंतु वे असफल रहे। उनके पितामह तथा प्रपितामह ने भी पूर्णत्व-प्राप्ति के लिए बहुत चेष्टा की थी, किंतु वे भी सफल काम न हो सके थे। स्वयं व्यासदेव भी पूर्ण से सफल न हो सके; परंतु उनके पुत्र शुकदेव जन्म से ही सिद्ध थे। व्यासदेव अपने पुत्र को तत्त्वज्ञान की शिक्षा देने लगे। और स्वयं यथाशक्ति शिक्षा देने के बाद उन्होंने शुकदेव को राजा जनक की राजसभा में भेज दिया। जनक एक बहुत बड़े राजा थे और विदेह नाम से प्रसिद्ध थे। 'विदेह' का अर्थ है, 'शरीर से पृथक्'। यद्यपि वे राजा थे, फिर भी उन्हें इस बात का तनिक भी भान न था कि वे शरीर हैं। उन्हें तो सदा यही ध्यान रहता था कि वे आत्मा हैं। बालक शुक उनके पास शिक्षा ग्रहण के लिए भेजे गए। इधर राजा को यह मालूम था कि व्यास मुनि का पुत्र उनके पास तत्वज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने आ रहा है, और इसलिए उन्होंने पहले से ही कुछ प्रबंध कर रखा था। जब बालक राजमहल के द्वार पर आया, तो संतरियों ने उसकी ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। उन्होंने बाद में उसे बैठने ले लिए एक आसन भर दे दिया। इस आसन पर वह बालक लगातार तीन दिन बैठा रहा; न तो कोई उससे कुछ बोला और न किसी ने यही पूछा कि वह कौन है और कहाँ से आया है। बालक शुक इतने बड़े ऋषि के पुत्र थे, उनके पिता का देश भर में सम्मान था और ये स्वयं भी प्रतिष्ठित थे, परंतु फिर भी उन नीच संतरियों ने उन पर कोई ध्यान न दिया। इसके बाद अचानक राजा के मंत्री तथा बड़े राज्यधिकारी वहाँ पर आये और उन्होंने उनका अत्यंत सम्मान के साथ स्वागत किया। वे उन्हें अंदर एक सुशोभित गृह में लिवा ले गए, इत्रों से स्नान कराया, सुंदर वस्त्र पहनाये और आठ दिन तक उन्हें सब प्रकार के विलास में रखा। परंतु शुकदेव के प्रशांत चेहरे पर तनिक भी अंतर न हुआ। बालक शुक आज भी विलासों के बीच वैसे ही थे, जैसे कि उस दिन, जब वे महल के द्वार पर बैठे हुए थे। इसके बाद उन्हें राजा के सम्मुख लाया गया। राजा सिंहासन पर बैठे थे, और वहाँ नाच-गाना तथा अन्य आमोद-प्रमोद हो रहे थे। राजा ने बालक शुक के हाथ में लबालब दूध से भरा हुआ एक प्याला दिया और उनसे कहा, "इसे लेकर इस दरबार की सात बार प्रदक्षिणा कर आओ, पर देखो, एक बूँद भी दूध न गिरे।" बालक शुक ने दूध का प्याला ले लिया और संगीत की ध्वनि एवं अनेक सुंदरियों के बीच प्रदक्षिणा करने को उठे। राजा की आज्ञानुसार वे सात बार चक्कर लगा आये, परंतु दूध की एक बूँद भी न गिरी। बालक शुक का अपने मन पर ऐसा संयम था कि बिना उनकी इच्छा के संसार की कोई भी वस्तु उन्हें आकृष्ट नहीं कर सकती थी। प्रदक्षिणा कर चुकने के बाद जब वे दूध का प्याला लेकर राजा के सम्मुख उपस्थित हुए, तो उन्होंने कहा, "वत्स, जो कुछ तुम्हारे पिता ने तुम्हें सिखाया है तथा जो कुछ तुमने स्वयं सीखा है, उसकी पुनरावृत्ति मात्र मैं कर सकता हूँ। तुमने 'सत्य' को जान लिया है, अपने घर वापस जाओ।"

अत एव हमने देखा कि जिस मनुष्य ने स्वयं पर अधिकार प्राप्त कर लिया है, उसके ऊपर बाहर की कोई भी चीज़ अपना प्रभाव नहीं डाल सकती, उसके लिए किसी प्रकार की दासता शेष नहीं रह जाती। उसका मन स्वतंत्र हो जाता है। और केवल ऐसा ही पुरुष संसार में रहने योग्य है। बहुधा हम देखते हैं कि लोगों की संसार के संबंध में दो प्रकार की धारणाएँ होती हैं कुछ लोग निराशावादी होते हैं। वे कहते हैं, "संसार कैसा भयानक है, कैसा दुष्ट है!" दूसरे लोग आशावादी होते हैं और कहते हैं, "अहा! संसार कितना सुंदर है, कितना अद्भुत है!" जिन लोगों ने अपने मन पर विजय नहीं प्राप्त की है, उनके लिए यह संसार या तो बुराइयों से भरा है, या अधिक से अधिक, अच्छाइयों और बुराइयों का एक मिश्रण है। परंतु यदि हम अपने मन पर विजय प्राप्त कर लें, तो यही संसार सुखमय हो जाता है। फिर हमारे ऊपर किसी भी बात के अच्छे या बुरे भाव का असर न होगा-हमें सब कुछ यथास्थान और सामंजस्यपूर्ण दिखलायी पड़ेगा। देखा जाता है, जो लोग आरंभ में संसार को नरककुंड समझते हैं, वे ही यदि आत्मसंयम की साधना में सफल हो जाते हैं, तो इस संसार को ही स्वर्ग समझने लगते हैं। यदि हम सच्चे कर्मयोगी हैं और इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए अपने को प्रशिक्षित करना चाहते हैं,तो हम चाहे जिस अवस्था से आरंभ करें, यह निश्चित है कि हमें अंत में पूर्ण आत्मत्याग का लाभ होगा ही। और ज्यों ही इस कल्पित 'अहं' का नाश हो जाएगा, त्यों ही वही संसार, जो हमें पहले अमंगल से भरा प्रतीत होता था, अब स्वर्गस्वरूप और परमानंद से पूर्ण प्रतीत होने लगेगा। यहाँ की हवा तक बदलकर मधुमय हो जाएगी और प्रत्येक व्यक्ति भला प्रतीत होने लगेगा। यही है कर्मयोग की चरम गति, और यही है उसकी पूर्णता या सिद्धि।

हमारे भिन्न-भिन्न योग आपस में विरोधी नहीं हैं। प्रत्येक अंत में हमें एक ही स्थान में ले जाता है और पूर्णत्व की प्राप्ति करा देता है। पर प्रत्येक का दृढ़ अभ्यास आवश्यक है। सारा रहस्य अभ्यास में ही है। पहले श्रवण करो, फिर मनन करो और फिर अभ्यास करो। यह बात प्रत्येक योग के संबंध में सत्य है। पहले तुम इसके बारे में सुनो और समझो कि इसका मर्म क्या है। यदि कुछ बातें आरंभ में स्पष्ट न हो, तो निरंतर श्रवण एवं मनन से वे स्पष्ट हो जाती हैं। सब बातों को एकदम समझ लेना बड़ा कठिन है। फिर भी, उनकी व्याख्या आखिर तुम्हीं में तो है। वास्तव में कभी कोई व्यक्ति किसी दूसरे को नहीं सिखाता, हममें से प्रत्येक को अपने आपको सिखाना होगा। बाहर के गुरु को केवल उद्दीपक मात्र हैं, जो हमारे अंत:स्थ गुरु को सब विषयों का मर्म समझने के लिए उद्बोधित कर देते हैं। तब बहुत सी बातें हमारी स्वयं की विचार-शक्ति से स्पष्ट हो जाती है और उनका अनुभव हम अपनी ही आत्मा में करने लगते हैं; और यह अनुभूति ही हमारी प्रबल इच्छा-शक्ति में परिणत हो जाती है। पहले वह भावना होती है, फिर इच्छा, और इस इच्छा-शक्ति से कर्म करने की वह प्रचंड शक्ति पैदा होती है, जो तुम्हारी प्रत्येक नस, प्रत्येक शिरा और प्रत्येक पेशी में प्रवाहित होकर तुम्हारे संपूर्ण शरीर को इस निष्काम कर्मयोग का एक यंत्र बना देती है और इसके फलस्वरूप हमें अपना वांछित पूर्ण आत्मत्याग एवं परम नि:स्वार्थता प्राप्त हो जाती है। यह उपलब्धि किसी प्रकार के मत, सिद्धांत या विश्वास पर निर्भर नहीं है। चाहे ईसाई हो, यहूदी अथवा जेंटाइल-इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। प्रश्न तो यह है कि क्या तुम नि:स्वार्थ हो? यदि तुम हो, तो चाहे तुमने एक भी धार्मिक ग्रंथ का अध्ययन न किया हो, चाहे तुम किसी भी गिरजा या मंदिर में न गए हो, फिर भी तुम पूर्णता को प्राप्त कर लोगे। हमारा प्रत्येक योग बिना किसी दूसरे योग की सहायता के भी मनुष्य को पूर्ण बना देने में समर्थ है, क्योकि उन सबका लक्ष्य एक ही है। कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग-सभी मोक्ष-लाभ के लिए सीधे और स्वतंत्र उपाय हो सकते हैं। सांख्ययोगों पृथक् बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता: 'केवल अज्ञ ही कहते हैं कि कर्म और ज्ञान भिन्न-भिन्न हैं, ज्ञानी नहीं।' [3] ज्ञानी यह जानता है कि यद्यपि ऊपर से योग एक दूसरे से विभिन्न प्रतीत होते हैं , अंत में वे मानवीय पूर्णता के एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं।

 

मुक्ति

हम पहले कह चुके हैं कि 'कर्म' शब्द 'कार्य' के अतिरिक्त कार्य-कारणवाद को भी सूचित करता है। कोई कार्य, कोई विचार, जो फल उत्पन्न करता है, 'कर्म' कहलाता है। इसलिए कर्म के नियम का अर्थ है, कार्य-कारण-संबंध का नियम, कारण और कार्य का ध्रुव अनुक्रम। यदि कारण रहे, तो उसका फल भी अवश्य होगा, इसका व्यक्तिक्रम कभी हो नहीं सकता। भारतीय दर्शन के अनुसार यह 'कर्म-विधान' समस्त जगत् पर लागू है। हम जो कुछ देखते हैं, अनुभव करते हैं अथवा जो कुछ कर्म करते हैं, वह एक ओर तो पूर्व कर्म का फल है और दूसरी ओर वही कारण होकर अपना फल उत्पन्न करता है। इसके साथ ही साथ हमें यह भी समझ लेना आवश्यक है कि 'नियम' शब्द का अर्थ क्या है। इसका अर्थ है-घटना-श्रृंखलाओं की पुनरावर्तन की प्रवृत्ति। जब हम देखते हैं कि एक घटना के बाद कोई दूसरी घटना होती है अथवा दो घटनाएँ साथ ही साथ होती हैं, तब हम इस अनुक्रम या सह-अस्तित्व के पुन:घटित होने की अपेक्षा करते हैं। हमारे वेश के प्राचीन नैयायिक इसे 'व्याप्ति' कहते हैं। उनके मतानुसार नियम संबंधी हमारी समस्त धारणाएँ साहचर्य के आधार पर होती हैं। एक घटना-श्रृंखला अपरिवर्तनीय क्रम से हमारे मन से कुछ वस्तुएँ गूँथ जाती है, जिससे हम जब कभी किसी विषय का प्रत्यक्ष करते हैं, तो वह तुरंत मन के अंतर्गत कुछ अन्य तथ्यों से संबद्ध हो जाता है। कोई एक भाव अथवा, हमारे मनोविज्ञान के अनुसार, चित्त में उत्पन्न कोई एक तरंग सदैव उसी प्रकार की अनेक तरंगो को उत्पन्न कर देती है। यही मनोविज्ञान की साहचर्य की धारणा है और कारणता इसी 'व्याप्ति' नमक योगविधान का एक पहलू मात्र है। अंतर्जगत् तथा बाह्म जगत् दोनों में 'नियम-तत्त्व' अथवा नियम की कल्पना एक ही हैं, और वह है-यह अपेक्षा करना कि एक घटना के बाद एक दूसरी विशिष्ट घटना होगी और इस अनुक्रम की पुनरावृत्ति होती रहेगी। यदि ऐसा हो, तो फिर वास्तव में प्रकृति में नियम का अस्तित्व ही नहीं है। वस्तुत: यह कहना भूल होगी कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण है अथवा पृथ्वी के किसी स्थान में कोई वस्तुगत नियम विद्यमान है। हमारा मन जिस प्रणाली अथवा विधि से कुछ घटना-श्रृंखला की धारणा करता है, उसी को हम नियम कहते हैं, और यह हमारे मन में ही स्थित है। एक दूसरे के बाद अथवा एक ही साथ घटित होने वाली घटनाएँ, तथा उसके पश्चात् उनकी नियमित पुनरावृत्ति में विश्वास-जिससे हमारा मन संपूर्ण श्रृंखला की प्रणाली को ग्रहण करने में समर्थ होता है-नियम कहते हैं।

अब प्रश्न यह है कि नियम के सर्वव्यापी होने का क्या अर्थ है। हमारा जगत् अनंत सत्ता का वह अंश है, जो हमारे देश के मनोवैज्ञानिकों के शब्दों में, 'देश-काल-निमित्त' (और यूरोपीय मनोविज्ञान जिन्हें इनके वाचक अंग्रेजी शब्दों में स्पेस-टाइम-काज़ैलिटी कहता है) द्वारा सीमाबद्ध है। इससे यह निश्चित है कि नियम केवल इस सीमाबद्ध जगत् में ही संभव है, इसके परे कोई नियम संभव नहीं। जब कभी हम जगत की चर्चा कराते हैं, तो उससे हमारा अभिप्राय होता है, सत्ता का केवल वह अंश, जो हमारे मन द्वारा सीमाबद्ध है, केवल यह इंद्रियगोचर जगत् जिसे हम देख, सुन और अनुभव कर सकते हैं, स्पर्श कर सकते है, जिसे विचार और कल्पना में ला सकते हैं; केवल यही नियमों के अधीन है, पर इसके बाहर और कहीं नियम का प्रभाव नहीं, क्योंकि हमारे मन और इंद्रियग्रस्त गोचर संसार से परे कार्य-कारण-भाव की पहुँच हो ही नहीं सकती। जो कुछ हमारे मन और इंद्रियों के अतीत हैं, वह कार्य-कारण के नियम द्वारा बद्ध नहीं है; क्योंकि इंद्रियातीत क्षेत्र में मन का संबंध या योग नहीं हो सकता, और इस प्रकार के विचार-साहचर्य के बिना कार्य-कारण-संबंध भी नहीं हो सकता। जब यह सत् नाम-रूप के साँचे में ढल जाता है, तभी यह कार्य-कारण-नियम का पालन करता है, और तब यह 'नियम' के अधीन कहा जाता है, क्योंकि सभी नियमों का मूल है यही कार्य-कारण संबंध। अतएव इससे यह स्पष्ट है कि 'स्वाधीन इच्छा' नामक कोई चीज़ नहीं हो सकती। 'स्वाधीन इच्छा', यह शब्द-प्रयोग ही स्वविरोधी है; क्योंकि इच्छा क्या है, यह हम जानते है; और जो कुछ हम जानते हैं, सब इस जगत् के ही अंतर्गत है; तथा जो कुछ हमारे इस जगत् के अंतर्गत है, वह सभी देश-काल-निमित्त के साँचे में ढला हुआ है। अतएव, जो कुछ हम जानते हैं, या जान सकते हैं, वह सभी कुछ कार्य-कारण-नियम के अधीन है; और जो कुछ कार्य-कारण-नियमाधीन होता है, वह क्या कभी स्वाधीन हो सकता है? उसके ऊपर अन्यान्य वस्तुएँ अपना कार्य करती हैं, और वह स्वयं भी एक समय कारण बन जाता है। बस, इसी प्रकार सब चल रहा है। परंतु वह जो इच्छा के रूप में परिणत हो जाता है, जो पहले इच्छा के रूप में नहीं था, परंतु बाद में देश-काल-निमित्त के साँचे में पड़ने से जो मानवीय इच्छा हो गया, वह अवश्य स्वाधीन है; और इस देश-काल-निमित्त के साँचे से जब यह इच्छा मुक्त हो जाएगी, तो वह पुन: स्वतंत्र हो जाएगा। स्वाधीनता या मुक्तावस्था से वह आता है, आकर इस बंधनरूपी साँचे में पड़ जाता है और फिर उससे निकलकर पुन: स्वाधीन हो जाता है।

प्रश्न पूछा गया था कि यह जगत् कहाँ से आया है, किसमें अवस्थित है और फिर किसमें इसका लय हो जाता है? इसका उत्तर दिया गया कि मुक्तावस्था से इसकी उत्पत्ति होती है, बंधन में इसकी अवस्थिति है और मुक्ति में ही इसका लय होता है। अतएव जब हम यह कहते हैं कि मनुष्य, अपनी अभिव्यक्ति करने वाले उस असीम सत्ता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, तो उससे हमारा तात्पर्य यही होता है कि अनंत सत्ता का एक अत्यंत क्षुद्र अंश ही मनुष्य है। यह शरीर तथा यह मन, जो हमें दिखाई देता है, समग्र का एक अंश मात्र है- अनंत पुरुष का केवल एक बिंदु मात्र। यह सारा ब्रह्मांड उसी अनंत पुरुष का एक कण मात्र है, और हमारे समस्त नियम, हमारे सारे बंधन, हमारा आनंद, विषाद, सुख, हमारी आशा-आकांशा, सभी केवल इस क्षुद्र जगत् के अंतर्गत हैं, हमारी प्रगति और विगति सभी इस क्षुद्र जगत् के अंतर्गत है। अतएव तुमने देखा, इस जगत् के- इस मन:कल्पित जगत् के चिरकाल तक रहने की आशा करना और स्वर्ग जाने की अभिलाषा करना कैसी नासमझी है। स्वर्ग हमारे इस परिचित जगत् की पुनरावृति ही तो है। तुम यह स्पष्ट देख सकते हो कि इस अखिल अनंत सत्ता को अपने इस शांत जगत् के समान बना लेना कितनी बचकानी और असंभव इच्छा है? अतएव यदि कोई मनुष्य यह कहे कि जो वस्तु अभी उसके पास है, वह उसे बारंबार प्राप्त होती रहेगी अथवा, जैसा कि मैं कभी-कभी कहा करता हूँ, यदि वह 'आराम वाले धर्म' की इच्छा करे, तो तुम यह निश्चित जान लो कि वह इतना गिर चुका है कि वह अपनी वर्तमान अवस्था से अधिक उच्च और कुछ कल्पना ही नहीं कर सकता-वह अपनी क्षुद्र वर्तमान परिस्थिति के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। वह अपने अनंत स्वरूप को भूल चुका हैं, और उसकी नारी भावनाएँ क्षुद्र सुख, दु:ख और ईर्ष्या आदि ही में आबद्ध हैं। इस शांत जगत् को ही वह अनंत मान लेता है; और केवल इतना ही नहीं, वह इस मूर्खता को किसी भी प्रकार छोड़ना नहीं चाहता। वह इस जीवन प्यास, तृष्णा से-जिसे बौद्ध तन्हा या तिस्सा कहते हैं-चिपका रहता है। प्राण भले ही जायें, पर वह यह तृष्णा कभी न छोड़ेगा! हमारे इस छोटे से ज्ञात संसार के बाहर और भी असंख्य प्रकार के सुख, प्राणी, विधि-विधान, उन्नति और कार्य-कारण-संबंध विद्यमान हो सकते हैं। और अंतत: वे सब भी तो हमारी अनंत प्रकृति के केवल एक अंश मात्र ही हैं।

मुक्ति-लाभ करने के लिए हमें इस विश्व की सीमाओं के परे जाना होगा; मुक्ति यहाँ प्राप्त नहीं हो सकती। पूर्ण साम्यावस्था का लाभ, अथवा ईसाई जिसे 'बुद्धि से अतीत शांति' कहते हैं, उसकी प्राप्ति इस जगत् में नहीं हो सकती, और न स्वर्ग में अथवा न किसी ऐसे स्थान में जहाँ हमारे मन और विचार जा सकते हैं, जहाँ हम इंद्रियों द्वारा किसी प्रकार का अनुभव प्राप्त कर सकते हैं अथवा जहाँ हमारी कल्पना-शक्ति काम कर सकती है। इस प्रकार के किसी भी स्थान में हमें मुक्ति नहीं प्राप्त हो सकती, क्योंकि ऐसे सब स्थान निश्चित ही हमारे जगत् के अंतर्गत होंगे, और यह जगत् देश, काल और निमित्त के बंधनों से जकड़ा हुआ है। संभव है, कुछ ऐसे भी स्थान हों, जो हमारी इस पृथ्वी की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म हों, जहाँ के सुख-भोग यहाँ से अधिक उत्कट हों, परंतु वे स्थान भी तो हमारे विश्व के ही अंतर्गत होंगे, और इसी कारण नियमों की सीमा के भीतर होंगे। अतएव हमें इस विश्व के परे जाना होगा। और वास्तव में सच्चा धर्म तो तभी आरंभ होता है, जब इस क्षुद्र जगत् का अंत हो जाता है। तब इन छोटे छोटे सुख-दु:खों और ज्ञान का अंत हो जाता है और सच्चा धर्म आरंभ होता है। जब तक हम जीवन के प्रति इस तृष्णा को नहीं छोड़ते, इन क्षणभंगुर शांत विषयों के प्रति अपनी प्रबल आसक्ति का त्याग नहीं करते, तब तक इस जगत् से अ