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व्याख्यान

व्यावहारिक जीवन में वेदांत
स्वामी विवेकानंद


व्यावहारिक जीवन में वेदांत

प्रथम भाग

(१० नवंबर, १८९६ ई० को लंदन में दिया हुआ व्याख्यान)

बहुत से लोगों ने मुझसे व्यावहारिक जीवन में वेदांत दर्शन की उपयोगिता पर कुछ बोलने के लिए कहा है। मैं तुम लोगों से पहले ही कह चुका हूँ, सिद्धांत बिल्कुल ठीक होने पर भी उसे कार्यरूप में परिणत करना एक समस्या हो जाती है। यदि उसे कार्य रूप में परिणत नहीं किया जा सकता, तो बौद्धिक व्यायाम के अतिरिक्त उसका और कोई मूल्य नहीं। अतएव वेदांत यदि धर्म के स्थान पर आरूढ़ होना चाहता है, तो उसे संपूर्ण रूप से व्यावहारिक होना चाहिए। हमें अपने जीवन की सभी अवस्थाओं में उसे कार्य रूप में परिणत कर सकना चाहिए। केवल यही नहीं, अपितु आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन के बीच जो एक काल्पनिक भेद है, उसे भी मिट जाना चाहिए; क्योंकि वेदांत एक अखंड वस्तु के संबंध में उपदेश देता है--वेदांत कहता है कि एक ही प्राण सर्वत्र विद्यमान है। धर्म के आदर्शों को संपूर्ण जीवन को आविष्ट करना, हमारे प्रत्येक विचार के भीतर प्रवेश करना और कर्म को अधिकाधिक प्रभावित करना चाहिए। मैं व्यावहारिक पक्ष पर क्रमश: प्रकाश डालूंगा। किंतु ये व्याख्यान भावी व्याख्यानों की उपक्रमणिका के रूप में हैं, अत: पहले हमें वेदांत-सिद्धांत का परिचय प्राप्त करना होगा और यह समझना होगा कि ये सिद्धांत किस प्रकार पर्वतों को गुफाओं और घने जंगलों में से निकलकर कोलाहलपूर्ण नगरों को व्यस्तताओं में भी कार्यान्वित हुए हैं। इन सिद्धांतों में एक विशेषता यह है कि इनमें से अधिकांश निर्जन अरण्यवास के फलस्वरूप प्राप्त नहीं हुए, किंतु जिन व्यक्तियों को हम सबसे अधिक कर्मण्य मानते हैं, वे ही राज-सिंहासन पर बैठने वाले राज-राजर्षि इनके प्रणेता हैं।

श्वेतकेतु आरुणि ऋषि के पुत्र थे। ये ऋषि संभवतः वानप्रस्थी थे। श्वेतकेतु का लालन-पालन वन में ही हुआ; किंतु वे पांचालों के नगर में गए और राजा प्रवाहन जैवलि की राजसभा में उपस्थित हुए। राजा ने उनसे पूछा, "मरते समय प्राणी इस लोक से किस प्रकार गमन करता है, क्या यह तुम जानते हो ?"--"नहीं।" "किस प्रकार यहाँ उसका पुनर्जन्म होता है, जानते हो ?"--"नहीं।" "पितृयान' और 'देवयान' के विषय में कुछ जानते हो ?"--आदि आदि। इस प्रकार राजा ने और भी अनेक प्रश्न किए । श्वेतकेतु किसी भी प्रश्न का उत्तर न दे सका। तब राजा ने कहा, "तुम कुछ नहीं जानते।" बालक ने लौटकर पिता से सब हाल कह सुनाया। पिता ने कहा, "मैं भी इन प्रश्नों का उत्तर नहीं जानता। अगर जानता तो क्या तुम्हें न सिखाता ?" तब वह राजा के पास गया और उनसे इस गुप्त विषय की शिक्षा देने के लिए प्रार्थना की। राजा ने कहा, "यह विद्या--यह ब्रह्मविद्या केवल राजाओं को ही ज्ञात थी, पुरोहितों को इसका कभी ज्ञान न था।" जो हो, इसके बारे में उसने जो कुछ जानना चाहा, वे उसकी शिक्षा देने लगे। इस प्रकार हम अनेक उपनिषदों में यही पाते हैं कि वेदांत दर्शन केवल वन में ध्यान द्वारा ही नहीं जाना गया, किंतु उसके सर्वोत्कृष्ट भिन्न-भिन्न अंश सांसारिक कर्मों में विशेष व्यस्त मनीषी लोगों द्वारा ही चिंतित तथा प्रकाशित किए गए। लाखों मनुष्यों के निरंकुश शासक इन राजाओं की अपेक्षा अधिक कार्यव्यस्त और कौन हो सकता है ? किंतु साथ ही इन शासकों में से कोई कोई गंभीर चिंतक भी थे।

इन सब बातों से यही स्पष्ट होता है कि यह दर्शन व्यावहारिक है। परवर्ती काल की भगवद्गीता को तो शायद तुम लोगों में से बहुतों ने पढ़ा होगा। यह वेदांत दर्शन का एक सर्वोत्तम भाष्यस्वरूप है। कितने आश्चर्य की बात है कि इस उपदेश का केंद्र है संग्राम-स्थल, जहाँ श्री कृष्ण ने अर्जुन को इस दर्शन का उपदेश दिया है और गीता के प्रत्येक पृष्ठ पर जो मत उज्ज्वल रूप से प्रकाशित है, वह है तीव्र कर्मण्यता, किंतु उसी के बीच अनंत शांतभाव। इसी तत्त्व को कर्म-रहस्य कहा गया है और इस अवस्था को पाना ही वेदांत का लक्ष्य है। हम साधारणत: या अकर्म का अर्थ करते हैं निश्चेष्टता, पर यह हमारा आदर्श नहीं हो सकता। यदि यही होता तो हमारे चारों ओर की दीवालें भी परमज्ञानी होतीं, वे भी तो निश्चेष्ट हैं। मिट्टी के ढेले और पेड़ों के तने भी जगत के महातपस्वी गिने जाते, क्योंकि वे भी तो निश्चेष्ट हैं। और यह भी नहीं कि किसी भी तरह कामनायुक्त होकर किए जानेवाले कार्य कर्म कहलाए जा सकते। वेदांत का आदर्श जो प्रकृत कर्म है, वह अनंत शांति के साथ संयुक्त है। किसी भी प्रकार की परिस्थिति में वह स्थिरता कभी नष्ट नहीं होती--चित्त का वह साम्यभाव कभी भंग नहीं होता। हम लोग भी बहुत कुछ देखने-सुनने के बाद यही समझ पाए हैं कि कार्य करने के लिए इस प्रकार की मनोवृत्ति ही सबसे अधिक उपयोगी होती है।

लोगों ने मुझसे यह प्रश्न अनेक बार किया है कि हम कार्य के लिए जो एक प्रकार का आवेग अनुभव करते हैं, यदि वह न रहे तो हम कार्य कैसे करेंगे ? मैं भी बहुत दिन पहले यही सोचता था, किंतु जैसे जैसे मेरी आयु बढ़ रही है, जितना अनुभव बढ़ता जा रहा है, उतना ही मैं देखता हूँ कि यह सत्य नहीं है। कार्य के भीतर आवेग जितना ही कम रहता है, उतना ही उत्कृष्ट वह होता है। हम लोग जितने अधिक शांत होते हैं, उतना ही हम लोगों का आत्मकल्याण होता है और हम काम भी अधिक अच्छी तरह कर पाते हैं। जब हम लोग भावनाओं के अधीन हो जाते हैं, तब अपनी शक्ति का अपव्यय करते हैं, अपने स्नायुसमूह को विकृत कर डालते हैं, मन को चंचल बना डालते हैं, किंतु काम बहुत कम कर पाते हैं। जिस शक्ति का कार्यरूप में परिणत होना उचित था, वह वृथा भावुकता मात्र में पर्यवसित होकर क्षय हो जाती है। जब मन अत्यंत शांत और एकाग्र रहता है, केवल तभी हम लोगों की समस्त शक्ति सत्कार्य में व्यय होती है। यदि तुम जगत के महान कार्यकुशल व्यक्तियों की जीवनी कभी पढ़ो, तो देखोगे कि वे अद्भुत शांत प्रकृति के लोग थे। कोई भी वस्तु उनके चित्त की स्थिरता भंग नहीं कर पाती थी। इसीलिए जो व्यक्ति शीघ्र ही क्रोध, घृणा या किसी अन्य आवेग से अभिभूत हो जाता है, वह कोई काम नहीं कर पाता, अपने को चूर-चूर कर डालता है और कुछ भी व्यावहारिक नहीं कर पाता। केवल शांत, क्षमाशील, स्थिरचित्त व्यक्ति ही सबसे अधिक काम कर पाता है।

वेदांत आदर्श का उपदेश देता है, और आदर्श वास्तविक की अपेक्षा कहीं अधिक उच्च होता है। हम लोगों के जीवन में दो प्रवृत्तियाँ देखी जाती हैं। एक है अपने आदर्श का सामंजस्य जीवन से करना, और दूसरी है जीवन को आदर्श के अनुरूप उच्च बनाना। इन दोनों का भेद भली-भाँति समझ लेना चाहिए--क्योंकि पहली प्रवृत्ति हमारे जीवन का एक प्रमुख प्रलोभन है। मैं सोचता हूँ कि मैं कोई विशेष प्रकार का कार्य कर सकता हूँ--शायद उसका अधिकांश ही बुरा है और उसके पीछे शायद क्रोध, घृणा अथवा स्वार्थपरता का आवेग ही विद्यमान है। अब मानो किसी व्यक्ति ने मुझे किसी विशेष आदर्श के संबंध में उपदेश दिया--निश्चय ही उसका पहला उपदेश यही होगा कि स्वार्थ परता तथा आत्मसुख का त्याग करो। मैं सोचता हूँ कि यह करना तो असंभव है। किंतु यदि किसी एक ऐसे आदर्श के संबंध में उपदेश दिया जो मेरी स्वार्थपरता और निम्न भावों का समर्थन करे, तो मैं उसी समय कह उठता हूँ, 'यही है मेरा आदर्श' और मैं उसी आदर्श का अनुसरण करने के लिए तत्पर हो जाता हूँ। इसी प्रकार 'शास्त्रीय' बात को लेकर लोग आपस में झगड़ते रहते हैं और कहते हैं कि जो मैं समझता हूँ, वही शास्त्रीय है, तथा जो तुम समझते हो वह अशास्त्रीय है। 'व्यवहार्य' (practical) शब्द को लेकर भी ऐसा ही अनर्थ होता रहता है। जिस बात को मैं कार्यरूप में परिणत करने योग्य समझता हूँ, जगत में एकमात्र वही व्यवहार्य है, ऐसी मेरी धारणा होती है। उदाहरणार्थ, यदि मैं एक दुकानदार हूँ, तो सोचता हूँ कि संसार में दुकानदारी ही एकमात्र व्यावहारिक कर्म है। यदि मैं चोर हूँ तो चोरी के बारे में भी यही सोचता हूँ। तुम लोग जानते ही हो कि हम सब इस 'व्यवहार्य' शब्द का प्रयोग केवल उन्हीं कर्मों के लिए करते हैं, जिनकी ओर हमारी प्रवृत्ति है और जो हमसे किए जा सकते हैं। इसी कारण मैं तुम लोगों को यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि यद्यपि वेदांत पूर्ण रूप से व्यवहार्य है, तथापि साधारण अर्थ में नहीं, बल्कि आदर्श के दृष्टिकोण से। वेदांत का आदर्श कितना ही उच्च क्यों न हो, वह किसी असंभव आदर्श को हमारे सामने नहीं रखता; और वास्तव में यही आदर्श ठीक ठीक आदर्श है। एक शब्द में इसका उपदेश है 'तत्त्वमसि'--'तुम्हीं वह ब्रह्म हो' और इसके समुदय उपदेश की अंतिम परिणति यही है।

समस्त बौद्धिक वाद-विवाद और विस्तार के पश्चात् तुम्हें इसमें यही सिद्धांत मिलेगा कि मानवात्मा शुद्ध स्वभाव और सर्वज्ञ है। आत्मा के संबंध में जन्म अथवा मृत्यु की बात करना भी कोरी विडंबना मात्र है। आत्मा का न कभी जन्म होता है, न मृत्यु; मैं मरूँगा अथवा मरने में डर लगता है, यह सब केवल कुसंस्कार मात्र है। और मैं यह कर सकता हूँ, यह नहीं कर सकता, ये सब भी कुसंस्कार हैं। मैं सब कुछ कर सकता हूँ। वेदांत सबसे पहले मनुष्य को अपने ऊपर विश्वास करने के लिए कहता है। जिस प्रकार संसार का कोई कोई धर्म कहता है कि जो व्यक्ति अपने से बाहर सगुण ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार नहीं करता, वह नास्तिक है, उसी प्रकार वेदांत भी कहता है कि जो व्यक्ति अपने आप पर विश्वास नहीं करता, वह नास्तिक है। अपनी आत्मा को महिमा में विश्वास न करने को ही वेदांत में नास्तिकता कहते हैं। बहुत से लोगों के लिए यह एक भीषण विचार है, इसमें कोई संदेह नहीं; और हममें अधिकांश सोचते हैं कि यह कभी प्राप्त नहीं किया जा सकता, किंतु वेदांत दृढ़ रूप से कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति इस सत्य को जीवन में प्रत्यक्ष कर सकता है। इसकी उपलब्धि में स्त्री-पुरुष बालक-बालिका, जाति या लिंग आदि से संबद्ध किसी प्रकार का विभेद बाधक नहीं है क्योंकि--वेदांत दिखा देता है कि वह सत्य पहले से ही सिद्ध है और पहले से ही विद्यमान है।

हममें ब्रह्माण्ड की समूची शक्ति पहले से ही है। हम लोग स्वयं ही अपने नेत्रों पर हाथ रखकर 'अंधकार' 'अंधकार' कहकर चीत्कार करते हैं। जान लो कि तुम्हारे चारों ओर कोई अंधकार नहीं है। हाथ हटाने पर ही तुम देखोगे कि वहाँ प्रकाश पहले से ही वर्तमान था। अंधकार कभी था ही नहीं, दुर्बलता कभी नहीं थी, हम लोग मूर्ख होने के कारण ही चिल्लाते हैं कि हम दुर्बल हैं, मूर्खतावश ही चिल्लाते हैं कि हम अपवित्र हैं। इस प्रकार वेदांत, 'आदर्श को कार्यान्वित किया जा सकता है', केवल यही नहीं कहता, किंतु यह भी कहता है कि वह आदर्श हम लोगों को पहले से ही प्राप्त है; और जिसे हम अब आदर्श कहते हैं वही हमारी प्रकृत सत्ता है--वही हम लोगों का स्वरूप है। और जो कुछ हम देखते हैं, वह संपूर्ण मिथ्या है। जिस क्षण तुम कहते हो, 'मैं मर्त्य क्षुद्र जीव हूँ', तुम झूठ बोलते हो; तुम मानो सम्मोहन के द्वारा अपने को अधम, दुर्बल, अभागा बना डालते हो।

वेदांत पाप स्वीकार नहीं करता, भ्रम स्वीकार करता है। और वेदांत कहता है कि सबसे बड़ा भ्रम है--अपने को दुर्बल, पापी, हतभाग्य कहना यह कहना--कि मुझमें कुछ भी शक्ति नहीं है, मैं यह नहीं कर सकता आदि-आदि। कारण, जब तुम इस प्रकार सोचने लगते हो, तभी तुम मानो बंधन--श्रृंखला में एक कड़ी और जोड़ देते हो, अपनी आत्मा पर सम्मोहन की एक पर्त और जमा देते हो। अतएव जो कोई अपने को दुर्बल समझता है, वह भ्रांत है, जो अपने को अपवित्र मानता है, वह भ्रांत है; वह जगत में एक असत् विचार प्रवाहित करता है। हमें सदा याद रखना चाहिए कि वेदांत में हमारे इस प्रस्तुत सम्मोहित जीवन का--हमारे द्वारा स्वीकृत मिथ्या जीवन का, आदर्श के साथ समझौता कराने की कोई चेष्टा नहीं है। उसका तो परित्याग करने के लिए कहा गया है और ऐसा होने पर ही उसके पीछे जो सत्य-जीवन सदा वर्तमान है, वह प्रकाशित होगा, व्यक्त होगा। यह नहीं कि मनुष्य पहले की अपेक्षा अधिक पवित्र हो जाता है, बात केवल अधिकाधिक अभिव्यक्ति की है। आवरण हटता जाता है और आत्मा की स्वाभाविक पवित्रता प्रकाशित होने लगती है। यह अनंत पवित्रता, मुक्त स्वभाव, प्रेम और ऐश्वर्य पहले से ही हममें हैं।

वेदांत यह भी कहता है कि ऐसा नहीं कि यह केवल वन अथवा पहाड़ी गुफाओं में उपलब्ध हो सकता हो, वरन् हम यह देख ही चुके हैं कि पहले जिन लोगों ने इस सत्यसमूह का आविष्कार किया था, वे वन अथवा पहाड़ी गुफाओं में नहीं रहते थे, साथ ही वे सामान्य मनुष्य भी नहीं थे, वरन् वे लोग ऐसे थे (हम लोगों के इस विश्वास का विशेष कारण है), जो विशेष रूप से कर्मठ जीवन बिताते थे, जिन्हें सैन्य-संचालन करना पड़ता था, जिन्हें सिंहासन पर बैठकर प्रजावर्ग का हानि-लाभ देखना होता था। इसके अतिरिक्त उस समय राजागण ही सर्वेसर्वा थे--आजकल जैसे कठपुतली नहीं। फिर भी वे लोग इन सब तत्त्वों का चिंतन करने तथा उनको जीवन में परिणत करने और मानव जाति को शिक्षा देने का समय निकाल लेते थे। अतएव उनकी अपेक्षा हम लोगों को इन सब तत्त्वों का अनुभव होना तो और भी सहज है, क्योंकि हमारा जीवन उनकी तुलना में अवकाश का जीवन है। हम अपेक्षाकृत सारे समय खाली ही रहते हैं, हमारे पास करने को बहुत कम रहता है, अतः हमारे लिए उस सत्य का साक्षात्कार न कर सकना बड़ी लज्जाजनक बात है। पुरातन सर्वेसर्वा सम्राटों की आवश्यकताओं की तुलना में हमारी आवश्यकताएँ तो कुछ भी नहीं है। कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में अवस्थित विराट सेना के परिचालक अर्जुन की जितनी आवश्यकता थी, हमारी आवश्यकता उसकी तुलना में नगण्य है, तब भी उस युद्ध-कोलाहल के बीच में भी, वे उच्चतम दर्शन को सुनने और उसे कार्यान्वित करने का समय पा सके--इसलिए अपने इस अपेक्षाकृत स्वाधीन आराममय जीवन में हमें उतना कर सकना चाहिए। हम लोग यदि ठीक प्रकार से समय बिताएं, तो हम देखेंगे कि हम जितना सोचते और समझते हैं उसकी अपेक्षा हमारे पास कहीं अधिक समय है। हम लोगों को जितना अवकाश है, उसमें यदि हम सचमुच चाहें, तो एक नहीं पचास आदर्शों का अनुसरण कर सकते हैं, किंतु आदर्श को हमें कभी नीचा नहीं करना चाहिए। हमारे जीवन की सबसे बड़ी विपत्ति की आशंका है ऐसे व्यक्तियों से जो हमारे व्यर्थ अभावों और वासनाओं के लिए अनेक प्रकार के वृथा कारण दिखाते हैं और हम लोग भी यही सोचते हैं कि हम लोगों का इससे बड़ा और कोई आदर्श नहीं हो सकता, किंतु वास्तव में बात ऐसी नहीं है। वेदांत इस प्रकार की शिक्षा कभी नहीं देता। प्रत्यक्ष जीवन को आदर्श के साथ समन्वित करना पड़ेगा--वर्तमान जीवन को अनंत जीवन के साथ एकरूप करना होगा।

कारण, तुम्हें सदा स्मरण रखना होगा कि वेदांत का मूल सिद्धांत यह एकत्व अथवा अखंड भाव है। द्वित्व कहीं नहीं है, दो प्रकार का जीवन अथवा जगत भी नहीं है। तुम देखोगे कि वेद पहले स्वर्गादि के विषय में कहते हैं, किंतु अंत में जब वे अपने दर्शन के उच्चतम आदर्शों पर आते हैं तो वे उन सब बातों को बिल्कुल त्याग देते हैं। एकमात्र जीवन है, एकमात्र जगत है, एकमात्र सत् है। सब कुछ वही एक सत्तामात्र है; भेद केवल परिमाण का है, प्रकार का नहीं। हमारे जीवन में अंतर प्रकारगत नहीं है। वेदांत इस बात को बिल्कुल नहीं मानता कि पशु मनुष्य से पूर्णतया पृथक हैं और उन्हें ईश्वर ने हमारे भोज्यरूप में बनाया है।

कुछ व्यक्तियों ने वैज्ञानिक शोध के निमित्त चीरफाड़ करने के लिए मारे जानेवाले पशुओं की हत्या का विरोध करने के लिए एक संस्था (Antivivisection Society) स्थापित की है। मैंने एक दिन इस सभा के एक सदस्य से पूछा, "भाई, आप भोजन के लिए पशुहत्या को पूर्णतया न्यायसंगत मानते हैं, किंतु वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए दो-एक पशुओं की हत्या के इतने विरुद्ध क्यों हैं ?" उसने उत्तर दिया, "जीवित की चीरफाड़ बहुत बीभत्स कार्य है, किंतु पशु तो हमारे भोजनार्थ ही बनाए गए हैं।" पशु भी तो उसी अखंड' सत्ता के अंशरूप हैं। यदि मनुष्य का जीवन अनंत है, तो पशु-जीवन भी उसी प्रकार है। प्रभेद केवल परिमाणगत है, प्रकारगत नहीं। देखने पर यह अमीबा और मैं एक ही हूँ, अंतर परिमाण का है, और सर्वोच्च जीवन की दृष्टि से देखने पर सारे विभेद मिट जाते हैं। मनुष्य एक तिनके और पौधे में बहुत अंतर देख सकता है, किंतु यदि तुम खूब ऊँचे चढ़कर देखो तो यह तिनका तथा एक बड़ा वृक्ष दोनों ही समान दिखेंगे। इसी प्रकार उस उच्चतम सत्ता के दृष्टिकोण से निम्नतम पशु और उच्चतम मनुष्य सभी समान हैं। और यदि तुम एक ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो, तो तुमको पशुओं से लेकर उच्चतम प्राणी तक समत्व मानना पड़ेगा। जो ईश्वर अपनी मनुष्य-संतान के प्रति पक्षपाती है और पशु नामक अपनी संतान के प्रति निर्दय है, वह तो फिर दानवों से भी अधम हुआ। इस प्रकार के ईश्वर की उपासना करने की अपेक्षा मुझे सैकड़ों बार मरना भी पसंद है। मेरा समस्त जीवन इस प्रकार के ईश्वर के विरुद्ध युद्ध में ही बीतेगा। किंतु ऐसा विभेद है ही नहीं, और जो लोग ऐसा कहते हैं, वे दायित्वहीन और हृदयहीन व्यक्ति हैं; उन्हें सत्य का ज्ञान नहीं है। यहाँ फिर 'व्यावहारिकता' शब्द ग़लत अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। मैं स्वयं एक कट्टर शाकाहारी न भी होऊँ, किंतु मैं उस आदर्श को समझता हूँ। जब मैं मांस खाता हूँ, तब जानता हूँ कि यह ठीक नहीं है। परिस्थितिवश उसे खाने को बाध्य होने पर भी मैं यह जानता हूँ कि यह क्रूरता है। आदर्श नीचा करके अपनी दुर्बलता का समर्थन मुझे नहीं करना चाहिए। आदर्श यही है--मांस न खाया जाए; किसी भी प्राणी का अनिष्ट न किया जाए, क्योंकि पशुगण भी हमारे भाई हैं। यदि उनको अपना भाई मान सकते हो, तो तुम मानव की बंधुता की बात ही क्या, प्राणिमात्र के भातृभाव की ओर बहुत कुछ अग्रसर हो गए। यह तो बच्चों का खेल है। तुम संसार में देखोगे कि इस प्रकार का उपदेश लोग पसंद नहीं करते, क्योंकि उनसे वह प्रस्तुत को छोड़कर आदर्श की ओर जाने के लिए कहता है। किंतु यदि तुम एक ऐसा सिद्धांत उनके सामने रखो, जिससे उनके प्रस्तुत आचरण का समर्थन होता हो, तो वे उसे एकदम व्यावहारिक मान लेंगे।

मनुष्य स्वभाव में पुरातनरक्षण की प्रवृत्ति बहुत होती है। हम लोग आगे एक कदम भी नहीं बढ़ना चाहते। हिम में जम गए व्यक्तियों के संबंध में मैंने जो पढ़ा है, वही मैं मनुष्य जाति के बारे में भी सोचता हूँ। सुना जाता है कि इस अवस्था में आदमी सोना चाहता है। यदि उसे कोई खींचकर उठाना चाहता है तो वह कहता है, 'मुझे सोने दो--बर्फ में सोने से बड़ा आराम मिलता है !'--और उसी दशा में उसकी मृत्यु हो जाती है। हम लोगों का स्वभाव भी ऐसा ही है। हम लोग भी सारे जीवन यही करते रहते हैं--सिर से लेकर पैर तक बर्फ में जमे जा रहे हैं तो भी हम लोग सोना चाहते हैं। अतएव आदर्श अवस्था में पहुंचने के लिए सदा संघर्ष करते रहो, और यदि कोई व्यक्ति आदर्श को तुम्हारे निम्न स्तर पर खींच लाये, यदि कोई तुम्हें ऐसा धर्म सिखाये, जो कि उच्चतम आदर्श की शिक्षा नहीं देता, तो उसकी बात कान में भी न पड़ने दो। मेरे लिए वह नितांत अव्यावहारिक धर्म होगा। किंतु यदि कोई मुझे ऐसा धर्म सिखाये, जो जीवन का सर्वोच्च आदर्श दर्शाता हो तो मैं उसकी बातें सुनने के लिए प्रस्तुत हूँ। जब कभी कोई व्यक्ति भोगपरक दुर्बलताओं और निस्सारताओं की वकालत करे, तो उससे सावधान रहो। एक तो हम अपने को इंद्रियजाल में फंसाकर एकदम निकम्मे बन जाते हैं, उस पर यदि कोई आकर हमें वैसी शिक्षा दे, तो उसका अनुसरण करके हम कुछ भी उन्नति नहीं कर सकेंगे। मैंने ऐसी बातें बहुत देखी हैं, जगत के संबंध में मुझे कुछ ज्ञान है, और मेरा देश ऐसा देश है जहाँ संप्रदाय कुकुरमुत्तों के समान बढ़ते रहते हैं। प्रति वर्ष नए-नए संप्रदाय जन्म लेते हैं। किंतु मैंने यही देखा है कि जो संप्रदाय भोगाकांक्षी मानव का सत्याकांक्षी मानव से समझौता कराने की चेष्टा नहीं करते, वे ही उन्नति करते हैं। जहाँ परमोच्च आदर्शों का झूठी सांसारिक वासनाओं के साथ सामंजस्य करने की--ईश्वर को मनुष्य के स्तर पर खींच लाने की मिथ्या चेष्टा रहती है, वहीं क्षय का आरंभ हो जाता है। मनुष्य को सांसारिक दासता के स्तर पर नहीं घसीट लाना चाहिए, उसे ईश्वर के स्तर तक उठाना चाहिए।

साथ ही इस प्रश्न का एक और पहलू है। हमें दूसरों को घृणा की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। हम सभी उसी एक लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। दुर्बलता और सबलता में केवल परिमाणगत भेद है। प्रकाश और अंधकार में भेद केवल परिमाणगत--पाप और पुण्य के बीच भी भेद केवल परिमाणगत--जीवन और मृत्यु के बीच में भेद केवल परिमाणगत, एक वस्तु का दूसरी वस्तु से भेद केवल परिमाणगत ही है, प्रकारगत नहीं; क्योंकि, वास्तव में सभी वस्तुएँ वही एक अखंड वस्तुमात्र हैं। सब वही एक है, जो अपने को विचार, जीवन, आत्मा या देह के रूप में अभिव्यक्त करता है, और उनमें अंतर केवल परिमाण का है। अतः जो किसी कारणवश हमारे समान उन्नति नहीं कर पाए, उनके प्रति घृणा करने का अधिकार हमें नहीं है। किसी की निंदा मत करो। किसी की सहायता कर सकते हो तो करो, नहीं कर सकते हो तो हाथ पर हाथ रखकर चुपचाप बैठे रहो, उन्हें आशीर्वाद दो, अपने रास्ते जाने दो। गाली देने अथवा निंदा करने से कोई उन्नति नहीं होती। इस प्रकार से कभी कोई कार्य नहीं होता। दूसरे की निंदा करने में हम अपनी शक्ति लगाते हैं। आलोचना और निंदा अपनी शक्ति खर्च करने का निस्सार उपाय है, क्योंकि अंत में हम देखते हैं कि सभी लोग एक ही वस्तु देख रहे हैं, कम-बेश उसी आदर्श की ओर पहुंच रहे हैं और हम लोगों में जो अंतर हैं, वे केवल अभिव्यक्ति के हैं।

'पाप' की बात लो। मैं अभी वेदांत के अनुसार पाप की धारणा तथा इस धारणा की कि मनुष्य पापी है, चर्चा कर रहा था। दोनों वास्तव में एक ही हैं केवल एक सकारात्मक है, दूसरी नकारात्मक है। एक, मनुष्य को उसकी दुर्बलता दिखा देती है और दूसरी, उसकी शक्ति। वेदांत कहता है कि यदि दुर्बलता है, तो कोई चिंता नहीं, हमें तो विकास करना है। जब मनुष्य पहले-पहल जन्मा, तभी उसका रोग क्या है, जान लिया गया। सभी अपना अपना रोग जानते हैं किसी दूसरे को बतलाने की आवश्यकता नहीं होती। सारे समय--हम रोगी हैं--यह सोचते रहने से हम स्वस्थ नहीं हो सकते, उसके लिए औषध आवश्यक है। बाहर की हम सारी चीजें भूल जा सकते हैं, बाह्य जगत के प्रति हम कपटाचारी हो सकते हैं, किंतु अपने मन के अंतराल में हम सब अपनी दुर्बलताओं को जानते हैं। वेदांत कहता है कि फिर भी मनुष्य को सदैव उसकी दुर्बलता की याद कराते रहना अधिक सहायता नहीं करता, उसको बल प्रदान करो, और बल सदैव निर्बलता का चिंतन करते रहने से नहीं प्राप्त होता। दुर्बलता का उपचार सदैव उसका चिंतन करते रहना नहीं है, वरन् बल का चिंतन करना है। मनुष्य में जो शक्ति पहले से ही विद्यमान है, उसे उसकी याद दिला दो। मनुष्य को पापी न बतलाकर वेदांत ठीक उसका विपरीत मार्ग ग्रहण करता है और कहता है, 'तुम पूर्ण और शुद्धस्वरूप हो और जिसे तुम पाप कहते हो, वह तुममें नहीं है।' जिसे तुम 'पाप' कहते थे, वह तुम्हारी आत्माभिव्यक्ति का निम्नतम रूप है; अपनी आत्मा को उच्चतर भाव में प्रकाशित करो। यह एक बात हम सबको सदैव याद रखनी चाहिए और इसे हम सब कर सकते हैं। कभी 'नहीं' मत कहना, 'मैं नहीं कर सकता' यह कभी न कहना, क्योंकि तुम अनंतस्वरूप हो। तुम्हारे स्वरूप की तुलना में देश-काल भी कुछ नहीं हैं। तुम सब कुछ कर सकते हो, तुम सर्वशक्तिमान हो।

ये नीतिशास्त्र के सिद्धांत हैं, अब हमें नीचे उतरकर ब्योरों का निरूपण करना होगा। हमें देखना है कि किस प्रकार यह वेदांत हमारे दैनिक जीवन में, नागरिक जीवन में, ग्राम्य जीवन में, राष्ट्रीय जीवन में, और प्रत्येक राष्ट्र के घरेलू जीवन में परिणत किया जा सकता है। कारण, यदि धर्म मनुष्य को जहाँ भी और जिस स्थिति में भी वह है, सहायता नहीं दे सकता, तो उसकी उपयोगिता अधिक नहीं--तब वह केवल कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के लिए कोरा सिद्धांत होकर रह जाएगा। धर्म यदि मानवता का कल्याण करना चाहता है, तो उसके लिए यह आवश्यक है कि वह मनुष्य की सहायता उसकी प्रत्येक दशा में कर सकने में तत्पर और सक्षम हो--चाहे गुलामी हो या आजादी, घोर पतन हो या अत्यंत पवित्रता, उसे सर्वत्र मानव की सहायता कर सकने में समर्थ होना चाहिए। केवल तभी वेदांत के सिद्धांत अथवा धर्म के आदर्श--उन्हें तुम किसी भी नाम से पुकारो--कृतार्थ हो सकेंगे।

आत्मविश्वास का आदर्श ही हमारी सबसे अधिक सहायता कर सकता है। यदि इस आत्मविश्वास का और भी विस्तृत रूप से प्रचार होता और यह कार्यरूप में परिणत हो जाता, तो मेरा दृढ़ विश्वास है कि जगत में जितना दुःख और अशुभ है, उसका अधिकांश गायब हो जाता। मानव जाति के समग्र इतिहास में सभी महान स्त्री-पुरुषों में यदि कोई महान प्रेरणा सबसे अधिक सशक्त रही है तो वह है यही आत्मविश्वास। वे इस ज्ञान के साथ पैदा हुए थे कि वे महान बनेंगे और वे महान बने भी। मनुष्य कितनी ही अवनति की अवस्था में क्यों न पहुँच जाए, एक समय ऐसा अवश्य आता है, जब वह उससे बेहद आर्त होकर एक ऊर्ध्वगामी मोड़ लेता है और अपने में विश्वास करना सीखता है। किंतु हम लोगों को इसे शुरू से ही जान लेना अच्छा है। हम आत्मविश्वास सीखने के लिए इतने कटु अनुभव क्यों प्राप्त करें ?

मनुष्य मनुष्य के बीच जो भेद है वह केवल आत्मविश्वास की उपस्थिति तथा अभाव के कारण ही है, यह सरलता से ही समझ में आ सकता है। इस आत्मविश्वास के द्वारा सब कुछ हो सकता है। मैंने अपने जीवन में ही इसका अनुभव किया है, अब भी कर रहा हूँ, और जैसे जैसे आयु बढ़ती जा रही है, उतना ही यह विश्वास दृढ़तर होता जा रहा है। जिसमें आत्मविश्वास नहीं है, वही नास्तिक है। प्राचीन धर्मों के अनुसार जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता, वह नास्तिक है। नूतन धर्म कहता है, जो आत्मविश्वास नहीं रखता, वही नास्तिक है। किंतु यह विश्वास केवल इस क्षुद्र 'मैं' को लेकर नहीं है, क्योंकि वेदांत एकत्ववाद की भी शिक्षा देता है। इस विश्वास का अर्थ है--सबके प्रति विश्वास, क्योंकि तुम सभी एक हो। अपने प्रति प्रेम का अर्थ है सब प्राणियों से प्रेम, समस्त पशु पक्षियों से प्रेम, सब वस्तुओं से प्रेम--क्योंकि तुम सब एक हो। यही महान विश्वास जगत को अधिक अच्छा बना सकेगा। यही मेरा विश्वास है। वही सर्वश्रेष्ठ मनुष्य है, जो सचाई के साथ कह सकता है, "मैं अपने संबंध में सब कुछ जानता हूँ।" क्या तुम जानते हो कि तुम्हारी इस देह के भीतर कितनी ऊर्जा, कितनी शक्तियाँ, कितने प्रकार के बल अब भी छिपे पड़े हैं ? मनुष्य में जो है, उस सबका ज्ञान कौन सा वैज्ञानिक प्राप्त कर सकता है ? लाखों वर्षों से मनुष्य पृथ्वी पर है, किंतु अभी तक उसकी शक्ति का पारमाणविक अंश मात्र ही प्रकाशित हुआ है। अतएव तुम कैसे अपने को जबरदस्ती दुर्बल कहते हो ? ऊपर से दिखनेवाली इस पतितावस्था के पीछे क्या संभावना है, क्या तुम यह जानते हो ? तुम्हारे अंदर जो है, उसका थोड़ा सा तुम जानते हो। तुम्हारे पीछे है शक्ति और आनंद का अपार सागर।

आत्मा वा अरे श्रोतव्य: --इस आत्मा के बारे में पहले सुनना चाहिए। दिन-रात श्रवण करो कि तुम्हीं वह आत्मा हो। दिन-रात यही भाव अपने में व्याप्त किए रहो, यहाँ तक कि वह तुम्हारे रक्त के प्रत्येक बूँद में और तुम्हारी नस-नस में समा जाए। संपूर्ण शरीर को इसी एक आदर्श के भाव से पूर्ण कर दो--'मैं अज, अविनाशी, आनंदमय, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान नित्य ज्योतिर्मय आत्मा हूँ'--दिन-रात यही चिंतन करते रहो, जब तक कि यह भाव तुम्हारे जीवन का अविच्छेद्य अंग नहीं बन जाता। इसी का ध्यान करते रहो और इसीसे तुम कर्म करने में समर्थ हो सकोगे। 'हृदय पूर्ण होने पर मुँह बात करता है--हृदय पूर्ण होने पर हाथ भी काम करते हैं।' अतएव इस प्रकार को अवस्था में ही यथार्थ कार्य संपूर्ण हो सकेगा ! अपने को इस आदर्श के भाव से ओतप्रोत कर डालो--जो कुछ करो उसी का चिंतन करते रहो। तब इस विचार-शक्ति के प्रभाव से तुम्हारे संपूर्ण कर्म वृहत्, परिवर्तित और देवभावापन्न हो जाएंगे। अगर 'जड़' शक्तिशाली है, तो 'विचार' सर्वशक्तिमान है। इस विचार से अपने जीवन को प्रेरित कर डालो, स्वयं को अपनी तेजस्विता, सर्वशक्तिमत्ता और गरिमा के भाव से पूर्णतः भर लो। ईश्वरेच्छा से काश कुसंस्कारपूर्ण भाव तुम्हारे अंदर प्रवेश न कर पाते ! ईश्वरकृपा से काश हम लोग इस कुसंस्कार के प्रभाव तथा दुर्बलता और नीचता के भाव से परिवेष्टित न होते ! ईश्वरेच्छा से काश, मनुष्य अपेक्षाकृत सहज उपाय द्वारा उच्चतम, महत्तम सत्यों को प्राप्त कर सकता ! किंतु उसे इन सबमें से होकर ही जाना पड़ता है। जो लोग तुम्हारे पीछे आ रहे हैं, उनके लिए रास्ता अधिक दुर्गम न बनाओ।

कभी कभी इन सत्यों का उपदेश बड़ा भयानक होता है। मैं जानता हूँ, बहुत से लोग ये उपदेश सुनकर भयभीत हो जाते हैं, किंतु जो व्यावहारिक स्तर पर अभ्यास करना चाहते हैं, उनके लिए यही पहला पाठ है। अपने से अथवा किसी दूसरे से कभी यह न कहो कि तुम दुर्बल हो। यदि कर सको तो जगत का कल्याण करो, पर उसका अनिष्ट न करो। अपने अंतरतम से यह समझ लो कि तुम्हारे ये सीमित विचार एवं काल्पनिक पुरुषों के सामने घुटने टेककर तुम्हारा रोना या प्रार्थना करना केवल अंधविश्वास है। मुझे एक ऐसा उदाहरण बताओ, जहाँ बाहर से इन प्रार्थनाओं का उत्तर मिला हो। जो भी उत्तर पाते हो, वह अपने हृदय से ही। तुम जानते हो कि भूत नहीं होते, किंतु अंधकार में जाते ही शरीर कुछ काँप सा जाता है। इसका कारण यह है कि बिल्कुल बचपन से ही हम लोगों के सिर में यह भय घुसा दिया गया है। किंतु समाज के भय से, संसार के कहने-सुनने के भय से, बंधु-बांधवों की घृणा के भय से, अथवा अपने प्रिय कुसंस्कार के नष्ट होने के भय से, यह सब हम दूसरों को न सिखायें। इन सबको जीत लो। धर्म के विषय में विश्व-ब्रह्माण्ड के एकत्व और आत्मविश्वास के अतिरिक्त और क्या शिक्षा आवश्यक है ? शिक्षा केवल इतनी ही देनी है। सहस्रों वर्षों से मनुष्य इसी लक्ष्य की प्राप्ति की चेष्टा करता आ रहा है और अभी भी कर रहा है। अब तुम्हारी बारी है, और सत्य को तुम जानते हो। क्योंकि सब ओर से हम उसीकी शिक्षा पाते हैं। केवल दर्शन और मनोविज्ञान ही नहीं, भौतिक विज्ञान भी उसी की घोषणा करते हैं। आज ऐसा वैज्ञानिक कहाँ है, जो जगत के एकत्व के सत्य को स्वीकार करने से डरता हो ? आज कौन अनेक जगतों की बातें कहने का साहस कर सकता है ? यह सब अंधविश्वास मात्र है। केवल एक ही जीवन है, एक ही जगत है और वही हम लोगों के सामने अनेकवत प्रतीत होता है। यह अनेकता एक स्वप्न सदृश है। स्वप्न देखते समय एक के बाद दूसरा स्वप्न आता है। स्वप्न में जो देखा जाता है, वह सत्य तो नहीं है। एक स्वप्न के बाद दूसरा स्वप्न दिखायी पड़ता है--विभिन्न दृश्य तुम्हारी आँखों के सामने उद्भासित होते रहते हैं। इसी प्रकार यह पंद्रह आने दुःखरूप और एक आना सुखरूप जगत जान पड़ता है। शायद कुछ दिन बाद ही यह पंद्रह आने सुखरूप प्रतीत होगा तब हम इसे स्वर्ग कहेंगे। किंतु साधक को सिद्धावस्था प्राप्त होने पर एक ऐसी अवस्था आती है, जिसमें यह सब अंतर्हित हो जाता है--यह जगत और अपनी आत्मा साक्षात् ब्रह्मरूप अनुभव होती है। अतएव जगत अनेक नहीं हैं, जीवन अनेक नहीं है। यह बहुत्व उस एकत्व की ही अभिव्यक्ति है। केवल वह 'एक' ही अपने को बहुरूप में--जड़, चेतन, मन, विचार अथवा अन्य विविध रूपों में व्यक्त कर रहा है। अतएव हम लोगों का प्रथम कर्तव्य है--इस तत्त्व को अपने को तथा दूसरों को शिक्षा देना।

जगत इस महान आदर्श की घोषणा से प्रतिध्वनित हो--सब कुसंस्कार दूर हों। दुर्बल मनुष्यों को यही सुनाते रहो--लगातार सुनाते रहो--'तुम शुद्धस्वरूप हो, उठो, जाग्रत हो जाओ। हे शक्तिमान, यह नींद तुम्हें शोभा नहीं देती। जागो, उठो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता। तुम अपने को दुर्बल और दुःखी मत समझो। हे सर्वशक्तिमान, उठो, जाग्रत होओ, अपना स्वरूप प्रकाशित करो। तुम अपने को पापी समझते हो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता। तुम अपने को दुर्बल समझते हो, यह तुम्हारे लिए उचित नहीं है।' जगत से यही कहते रहो, अपने से यही कहते रहो--देखो, इसका क्या व्यावहारिक फल होता है, देखो, कैसे बिजली के प्रकाश से सभी वस्तुएँ प्रकाशित हो उठती हैं, और सब कुछ कैसे परिवर्तित हो जाता है। मनुष्य जाति से यह बतलाओ और उसे उसकी शक्ति दिखा दो। तभी हम अपने दैनंदिन जीवन में उसका प्रयोग करना सीख सकेंगे।

जिसे हम विवेक या सदसत् विचार कहते हैं, उसका अपने जीवन के प्रति क्षण में एवं प्रत्येक कार्य में उपयोग करने की क्षमता प्राप्त करने के लिए हमें सत्य की कसौटी जान लेनी चाहिए और वह है पवित्रता तथा एकत्व का ज्ञान। जिससे एकत्व की प्राप्ति हो, वही सत्य है। प्रेम सत्य है; घृणा असत्य है, क्योंकि वह अनेकत्व को जन्म देती है। घृणा ही मनुष्य को मनुष्य से पृथक करती है--अतएव वह गलत और मिथ्या है; यह एक विघटक शक्ति है; वह पृथक करती है--नाश करती है।

प्रेम जोड़ता है, प्रेम एकत्व स्थापित करता है। सभी एक हो जाते हैं--माँ संतान के साथ, परिवार नगर के साथ, संपूर्ण जगत पशु-पक्षियों के साथ एकीभूत हो जाता है, क्योंकि प्रेम ही सत् है, प्रेम ही भगवान् है और यह सभी कुछ उसी एक प्रेम का ही न्यूनाधिक प्रस्फुटन है। प्रभेद केवल मात्रा के तारतम्य में है, किंतु वास्तव में सभी कुछ उसी एक प्रेम की ही अभिव्यक्ति है। अतएव हम लोगों को यह देखना चाहिए कि हमारे कर्म अनेकत्व-विधायक हैं अथवा एकत्व संपादक। यदि वे अनेकत्व-विधायक हैं, तो उनका त्याग करना होगा और यदि वे एकत्व-संपादक हैं, तो उन्हें सत्कर्म समझना चाहिए। इसी प्रकार विचारों के संबंध में भी सोचना चाहिए। देखना चाहिए कि उनसे विघटन या अनेकत्व उत्पन्न होता है या एकत्व, और वे एक आत्मा को दूसरी आत्मा से मिलाकर एक महान शक्ति उत्पन्न करते हैं या नहीं। यदि करते हैं, तो ऐसे विचारों को अंगी कार करना चाहिए अन्यथा उन्हें अपराध मानकर त्याग देना चाहिए।

वेदांत का नीति-शास्त्र किसी अज्ञेय तत्त्व पर आधारित नहीं है, वह किसी अज्ञात तत्त्व का उपदेश नहीं करता, वरन् उपनिषदों की भाषा में, 'जिस ईश्वर की हम एक अज्ञात ईश्वर के रूप में उपासना करते हैं, मैं तुमको उसी का उपदेश कर रहा हूँ।' तुम जो कुछ जानते हो, आत्मा के द्वारा ही जानते हो। देखने से पहले मुझे अपने स्वयं का ज्ञान होता है, उसके बाद कुर्सी का। इस आत्मा में और उसके द्वारा ही इस कुर्सी का ज्ञान होता है। इस आत्मा में और उसके द्वारा ही मुझे तुम्हारा ज्ञान होता है, संपूर्ण जगत का ज्ञान होता है। अतएव आत्मा को अज्ञात कहना केवल प्रलाप है। आत्मा को हटा लेने से संपूर्ण जगत ही विलुप्त हो जाता है। आत्मा के द्वारा ही संपूर्ण ज्ञान होता है--अतएव यही सबसे अधिक ज्ञात है। यही वह 'तुम' हो, जिसको तुम 'मैं' कहते हो। तुम लोग यह सोचकर आश्चर्य करते हो कि मेरा 'मैं' भला तुम्हारा 'मैं' कैसे हो सकता है; तुम्हें आश्चर्य होता है कि यह शांत 'मैं' किस प्रकार अनंत असीमस्वरूप हो सकता है ? किंतु वास्तव में यही बात सत्य है। शांत 'मैं' केवल भ्रम मात्र है, गल्पकथा मात्र है। उस अनंत के ऊपर मानो एक आवरण पड़ा हुआ है और उसका कुछ अंश इस 'मैं' रूप में प्रकाशित हो रहा है, किंतु वास्तव में वह उसी अनंत का अंश है। यथार्थ में असीम कभी ससीम नहीं होता--'ससीम' केवल बात की बात है। अतएव यह आत्मा नर-नारी, बालक-बालिका, यहाँ तक कि पशु-पक्षी सभी को ज्ञात है। उसको बिना जाने हम क्षणमात्र भी जीवित नहीं रह सकते। उस सर्वेश्वर प्रभु को बिना जाने हम लोग एक क्षण भी श्वास-प्रश्वास तक नहीं ले सकते, न गतिशील हो सकते, न अपना अस्तित्व बनाए रख सकते हैं। वेदांत का ईश्वर सब चीज़ों की अपेक्षा अधिक ज्ञात है; वह कल्पनाप्रसूत नहीं हैं।

यदि यह एक व्यावहारिक ईश्वर की शिक्षा नहीं है, तो फिर और किस प्रकार से तुम उसकी शिक्षा दे सकोगे ? जो ईश्वर, सब प्राणियों में विराजमान है, हमारी इंद्रियों से भी अधिक सत्य है, मैं जिसे सम्मुख देख रहा हूँ, उससे भी अधिक ईश्वर और व्यावहारिक कहाँ होगा ? क्योंकि तुम्हीं वह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान ईश्वर हो, और यदि यह कहूँ कि तुम वह नहीं हो, तो मैं झूठ बोलता हूँ। सारे समय में इसकी अनुभूति करूँ या न करूँ, सत्य यही है। वह एक, अखंड वस्तुस्वरूप, सर्व वस्तुओं की एकता, समस्त जीवन और समस्त अस्तित्व का सत्य स्वरूप है।

वेदांत के नीति-शास्त्र के इन सभी विचारों को और भी विस्तृत रूप से कहना पड़ेगा। अतएव थोड़ा सा धैर्य रखना आवश्यक है। पहले ही कह चुका हूँ, हम लोगों को इसका विस्तृत निरूपण करना पड़ेगा--और यह भी देखना है कि किस प्रकार यह आदर्श निम्नतर आदर्शों से क्रमशः विकसित हुआ है, और किस प्रकार पूरा एकत्व का आदर्श धीरे-धीरे विकसित होकर विश्व प्रेम में परिणत हो गया है। खतरों से बचने के लिए इन सब तत्त्वों का अध्ययन आवश्यक है। दुनिया तो धीरे धीरे निम्नतम आदर्श से ऊपर उठने के लिए रुकी नहीं रह सकती; किंतु हमारे ऊँचे सोपान पर चढ़ने का फल ही क्या, यदि हम यह सत्य बाद में आने वाली पीढ़ियों को न दे सकें ? इसलिए इसकी आलोचना हमें विशेष रूप से विस्तारपूर्वक करनी होगी, और प्रथमतः उसके बौद्धिक पक्ष को स्पष्ट करना परम आवश्यक है, यद्यपि हम जानते हैं कि बौद्धिकता का विशेष मूल्य नहीं, हृदय ही सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। हृदय के द्वारा ही भगवत्साक्षात्कार होता है, बुद्धि के द्वारा नहीं। बुद्धि केवल जमादार के समान रास्ता साफ़ कर देती है--वह गौण सहायक है, पुलिस के समान है--किंतु समाज के सुंदर परिचालन के लिए पुलिस की सकारात्मक आवश्यकता नहीं होती। उसका कार्य उपद्रव रोकना और अन्याय निवारण करना है। बुद्धि का कार्य भी इतना ही है। जब बौद्धिक पुस्तकें पढ़ते हो, तब उन पर अधिकार कर लेने पर तुम यही सोचते हो कि 'ईश्वर को धन्यवाद है, मैं उनके बाहर निकल आया।' इसका कारण यह है कि बुद्धि अंधी है, उसकी अपनी गति-शक्ति नहीं है, उसके हाथ-पैर नहीं है। भावना ही वास्तव में कार्य करती है, उसकी गति बिजली अथवा उससे भी अधिक वेगवान पदार्थ की अपेक्षा श्रेष्ठ होती है। अब प्रश्न यह है कि क्या तुम्हारे भावना है ? यदि है तो तुम ईश्वर को देखोगे। आज तुम्हारी जितनी भी भावना है, वही प्रबल होती जाएगी,--देवभावापन्न होती रहेगी, उच्चतम भूमिका में प्रतिष्ठित होगी, और अंततः वह हर वस्तु का अनुभव करेगी, हर वस्तु में एकत्व, स्वयं में तथा हर अन्य वस्तु में ईश्वर का अनुभव करने लगेगी। बुद्धि यह नहीं कर सकती। 'शब्दों के प्रयोग के विभिन्न तरीके, शास्त्र-व्याख्या की विभिन्न शैलियाँ केवल पंडितों के लिए हैं, हमारे लिए नहीं, आत्मा की मुक्ति के लिए नहीं।'

तुम लोगों में से जिन्होंने टॉमस-आ-केम्पिस की 'ईसा-अनुसरण' नामक पुस्तक पढ़ी है, वे जानते हैं कि हर पृष्ठ पर किस प्रकार उन्होंने इस बात पर जोर दिया है। संसार के प्रायः हर संत ने इसी पर जोर दिया है। बुद्धि आवश्यक है, क्योंकि उसके बिना हम अनेक भ्रमों में पड़ जाते हैं और गलतियाँ करते हैं। विचार-शक्ति उसका निवारण करती है, इसके अतिरिक्त बुद्धि की नींव पर और कुछ निर्माण करने की चेष्टा न करना। वह केवल एक गौण सहायक मात्र है, निष्क्रिय है, वास्तविक सहायता भावना से, प्रेम से प्राप्त होती है। तुम क्या किसी दूसरे के लिए हृदय से अनुभव करते हो ? यदि करते हो तो एकत्व के भाव में तुम विकास कर रहे हो। यदि नहीं, तो तुम भूतो न भविष्यति एक बौद्धिक दैत्य भले ही हो, तुम कुछ हो नहीं सकोगे, केवल शुष्क बुद्धि हो और वही बने रहोगे। यदि तुम हृदय से अनुभव करते हो, तो एक भी पुस्तक न पढ़ सकने पर, कोई भाषा न जानने पर भी, तुम ठीक रास्ते पर चल रहे हो। ईश्वर तुम्हारा है।

क्या विश्व के इतिहास में तुम्हें पैग़म्बरों की शक्ति के स्रोत का पता नहीं चला ? बुद्धि में ? उनमें से क्या कोई दर्शन संबधी सुंदर पुस्तक लिखकर छोड़ गया है; अथवा न्याय के कूट विचार लेकर कोई पुस्तक लिख गया है ? किसीने ऐसा नहीं किया। वे केवल कुछ थोड़ी सी बातें कह गए हैं। ईसा की भाँति भावना करो, तुम भी ईसा हो जाओगे; बुद्ध के समान भावना करो, तुम भी बुद्ध बन जाओगे। भावना ही जीवन है, भावना ही बल है, भावना ही तेज है--भावना के बिना कितनी ही बुद्धि क्यों न लगाओ, ईश्वर-प्राप्ति नहीं होगी। बुद्धि चलनशक्ति-शून्य अंग-प्रत्यंग के समान है। जब भावना उसे अनुप्राणित करके गतियुक्त करती है, तभी वह दूसरे के हृदय को स्पर्श करती है। जगत में सदा से ऐसा ही होता आया है, अतएव यह तुम्हें भली भाँति याद रखना चाहिए। वेदांती नीति-शास्त्र में यह एक सर्वाधिक व्यावहारिक बात है, क्योंकि वेदांत कहता है, तुम सब पैगंबर हो--तुम सबको पैगंबर होना ही पड़ेगा। कोई ग्रंथ तुम्हारे कार्यों का प्रमाण नहीं, किंतु तुम्हीं ग्रंथों के प्रमाणस्वरूप हो। कोई पुस्तक सत्य की ही शिक्षा देती है, यह किस प्रकार जानते हो ? क्योंकि तुम सत्य हो और तुम भी ठीक वैसा ही अनुभव करते हो। वेदांत यही शिक्षा देता है। जगत के ईसा और बुद्धगणों का प्रमाण क्या है ? --यही कि हम-तुम भी वैसा ही अनुभव करते हैं। इसी कारण हम-तुम समझते हैं कि ये सब सत्य हैं। हम लोगों की पैगंबर आत्मा ही उन लोगों की पैगंबर आत्मा का प्रमाण है, यहाँ तक कि तुम्हारा ईश्वरत्व ही ईश्वर का भी प्रमाण है। यदि तुम वास्तविक महापुरुष नहीं हो, तो ईश्वर के संबंध में भी कोई बात सत्य नहीं। तुम यदि ईश्वर नहीं हो, तो कोई ईश्वर भी नहीं है और कभी होगा भी नहीं। वेदांत कहता है, इसी आदर्श का अनुसरण करना चाहिए। हम लोगों में से प्रत्येक को पैग़म्बर बनना पड़ेगा--और तुम स्वरूपतः वही हो। बस केवल यह 'जान' लो ? यह कभी न सोचना कि आत्मा के लिए कुछ असंभव है। ऐसा सोचना ही भयानक नास्तिकता है। यदि पाप नामक कोई वस्तु है, तो वह यह कहना है कि मैं दुर्बल हूँ अथवा अन्य कोई दुर्बल है।

व्यावहारिक जीवन में वेदांत

द्वितीय भाग

(१२ नवंबर, १८९६ ई० को लंदन में दिया हुआ व्याख्यान)

मैं छांदोग्य उपनिषद् से, एक बालक को किस प्रकार ज्ञान प्राप्त हुआ, इस संबंध में एक अत्यंत प्राचीन कहानी सुनाता हूँ। यद्यपि यह कहानी अनुत्कृष्ट शैली की है, फिर भी इसमें एक सार तत्त्व निहित है। एक छोटे बालक ने अपनी माता से कहा, "माँ, मैं वेद-शिक्षा पाने के लिये जाना चाहता हूँ, मेरे पिता का नाम और मेरा गोत्र क्या है, बताओ।" उसकी माँ विवाहिता स्त्री नहीं थी, और भारत में अविवाहित स्त्री की संतान जाति वहिष्कृत मानी जाती है--समाज उसे अंगीकार नहीं करता, और उसे वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं होता। अतएव बेचारी माँ ने कहा, "मैंने अनेक व्यक्तियों की सेवा की है, उसी अवस्था में तुम्हारा जन्म हुआ, अतएव मैं तुम्हारे पिता का नाम एवं तुम्हारा गोत्र क्या है, यह नहीं जानती; इतना ही जानती हूँ कि मेरा नाम जबाला है और तुम्हारा सत्यकाम।" बालक एक ऋषि के पास गया और उसने उनसे प्रार्थना की कि वे उसे ब्रह्मचारी शिष्य के रूप में ग्रहण करें। तब उन्होंने उससे पूछा, "तुम्हारे पिता का नाम और तुम्हारा गोत्र क्या है?" बालक ने जो उसकी माँ ने कह था वही दुहराया। यह सुनकर ऋषि ने तुरंत ही कहा, "वत्स, एक ब्राह्मण के अतिरिक्त और कोई अपने संबंध में ऐसा लांछनकारी सत्य नहीं कह सकता था। तुम ब्राह्मण हो, मैं तुम्हें शिक्षा दूंगा। तुम सत्य से विचलित नहीं हुए।" यह कहकर वे उसे अपने निकट रखकर शिक्षा देने लगे।

अब हमें प्राचीन भारत में प्रचलित शिक्षा-पद्धतियों के कुछ दृष्टांत अवगत होंगे। गुरु ने सत्यकाम को चार सौ क्षीण और दुर्बल गायें देकर कहा, "इन्हें लेकर तुम वन में चले जाओ, जब सब गायें एक हजार हो जाएं, तब लौटकर चले आना।" उसने आज्ञा पालन की और वह गायें लेकर वन में चला गया। कई साल बाद इस झुंड में से एक प्रधान वृषभ ने सत्यकाम से कहा, "हम अब एक हजार हो गए हैं, हमें तुम अपने गुरु के पास ले चलो। मैं तुम्हें ब्रह्म के विषय में कुछ शिक्षा दूंगा।" सत्यकाम ने कहा, "कहिए प्रभु।" वृषभ ने कहा, "उत्तर दिशा ब्रह्म का एक अंश है; उसी प्रकार पूर्व दिशा, दक्षिण दिशा, पश्चिम दिशा भी उसके एक एक अंश हैं। चारों दिशाएँ ब्रह्म के चार अंश हैं। अब अग्नि तुम्हें और कुछ शिक्षा देंगे।" उस समय अग्नि की पूजा एक विशिष्ट प्रतीक-रूप में होती थी। प्रत्येक ब्रह्मचारी को अग्नि-चयन करके उसमें आहुति देनी पड़ती थी। अतः अगले दिन सत्यकाम ने अपने गुरु के घर की ओर प्रस्थान किया, और जब संध्या समय वह स्नानादि करके अग्नि में होम कर उसके निकट बैठ गया, तो उसे अग्नि से आती एक वाणी सुनायी पड़ी--"सत्यकाम!" सत्यकाम ने कहा, "प्रभो, आज्ञा!" (तुम लोगों को शायद याद हो कि बाइबिल के प्राचीन व्यवस्थान में भी इसी प्रकार की एक कथा है। सेमुएल ने ऐसी ही एक अद्भुत वाणी सुनी थी)। अग्नि ने कहा, "मैं तुम्हें ब्रह्म के संबंध में कुछ शिक्षा देने आया हूँ। यह पृथ्वी ब्रह्म का एक अंश है, अंतरिक्ष एक अंश है, स्वर्ग एक अंश है, समुद्र एक अंश है।" फिर अग्नि ने कहा, "अब एक पक्षी तुम्हें कुछ शिक्षा देगा।" सत्यकाम ने अपनी यात्रा जारी रखी, और अगले दिन जब वह सांध्य अग्निहोत्र कर चुका था, तब एक हंस उसके निकट आया और बोला, "मैं तुम्हें ब्रह्म के विषय में कुछ शिक्षा दूंगा। हे सत्काम, यह अग्नि जिसकी तुम उपासना करते हो, ब्रह्म का एक अंश है, सूर्य एक अंश है, चंद्र एक अंश है, विद्युत भी एक अंश है।" फिर हंस ने कहा, "अब मद्गू नामक एक पक्षी भी तुम्हें कुछ शिक्षा देगा।" निदान एक दिन यह पक्षी आकर सत्यकाम से बोला, "मैं तुम्हें ब्रह्म के संबंध में कुछ शिक्षा दूंगा। 'प्राण' उसका एक अंश है, चक्षु एक अंश है, श्रवण एक अंश एवं मन एक अंश है।" तदन्तर बालक अपने गुरु के पास पहुँचा, गुरु ने उसे देखते ही कहा, "वत्स, तुम्हारा मुख ब्रह्मवेत्ता के समान चमक रहा है। तुम्हें किसने शिक्षा दी है।" सत्यकाम ने उत्तर दिया "मानवेतर प्राणियों ने, किंतु मैं चाहता हूँ कि आप मुझे उपदेश दें। क्योंकि आप जैसे मनीषियों से मैंने सुन रखा है कि गुरु से प्राप्त ज्ञान ही श्रेयस की ओर ले जाता है।" तब ऋषि ने उसे उसी ज्ञान की शिक्षा दी, जो उसे देवताओं से प्राप्त हो चुका था, "अब कुछ भी शेष नहीं रहा।"

यहाँ यदि हम इन रूपकों को थोड़ी देर के लिए हटा दें कि वृष ने क्या सिखाया, अग्नि ने क्या सिखाया तथा अन्य सबने क्या सिखाया और--केवल केंद्रीय तत्त्व की ओर ध्यान दें, तो हमको तत्कालीन विचारधारा की दिशा का कुछ पता लग सकता है। हमें जिस महान विचार का बीज यहाँ मिलता है, वह यह है कि ये सारी ध्वनियाँ हमारे अंदर ही हैं। इन सत्यों को और अधिक समझने से अंत में हम यही तत्त्व पायेंगे कि यह वाणी वास्तव में हम लोगों के हृदय में से ही उठी है। शिष्य सारे समय यही समझता रहा कि वह सत्य के संबंध में उपदेश सुन रहा है, किंतु उसका ऐसा समझना ठीक नहीं है। उसने इन वाणियों को बाह्य जगत से आती हुई समझा, लेकिन वे सदा उसीके अंदर थीं। और भी एक तत्त्व इससे पाया जाता है, और वह है ब्रह्मज्ञान को व्यावहारिक बनाना। व्यावहारिक जीवन में धर्म से क्या पाया जा सकता है, जगत इस खोज में सदा व्यस्त रहता है। और इन सब कथाओं में हम यह भी पाते हैं कि दिन-प्रतिदिन किस प्रकार यह सत्य व्यवहारोपयोगी बनता जा रहा था। शिष्य को जिन समस्त वस्तुओं के संसर्ग में आना पड़ता है, वे उन्हीं से ब्रह्मोपलब्धि करते हैं। अग्नि, जिसमें वे प्रतिदिन होम करते हैं, उसी में वे ब्रह्म-साक्षात्कार कर रहे हैं। इसी प्रकार परिदृश्यमान् पृथ्वी को वे ब्रह्म के एक अंश रूप में अनुभव कर रहे हैं--इत्यादि-इत्यादि।

इसके बाद एक कहानी इन सत्यकाम के एक शिष्य उपकोशल कमलायन के संबंध में है। यह शिष्य सयत्काम से शिक्षा प्राप्त करने के लिए उनके पास कुछ दिन रहा था। सत्यकाम कार्यवश कहीं बाहर गए। इससे शिष्य को बहुत कष्ट हुआ। जब गुरु-पत्नी ने उसके समीप आकर पूछा, "वत्स, तुम खाते क्यों नहीं ?" तब बालक ने कहा, "मेरा मन कुछ ठीक नहीं है, इसलिए कुछ खाना नहीं चाहता।" इसी समय वह जिस अग्नि में हवन कर रहा था, उसमें से एक आवाज़ आयी, "प्राण ब्रह्म है, सुख ब्रह्म है, आकाश ब्रह्म है, तुम ब्रह्म को जानो।" तब उसने उत्तर दिया, "प्राण ब्रह्म है, यह मैं जानता हूँ, किंतु वे आकाश और सुखस्वरूप हैं, यह मैं नहीं जानता।" तब अग्नि ने समझाया कि आकाश और सुख, इन दो शब्दों का अर्थ वस्तुतः एक ही है, यानी हृदय में निवास करनेवाला चिदाकाश (अथवा विशुद्ध बुद्धि)। इस प्रकार अग्नि ने प्राण और चिदाकाश के रूप में उसे ब्रह्म का उपदेश किया। तदुपरान्त अग्नि ने फिर उपदेश दिया:"यह पृथ्वी, यह अन्न, यह सूर्य जिसकी तुम उपासना करते हो, सब ब्रह्म के ही रूप हैं। जो पुरुष सूर्य में दिखलायी पड़ता है, वह मैं ही हूँ। जो यह जानते हैं और उस ब्रह्म का ध्यान करते हैं, उनके सब पाप नष्ट हो जाते हैं, वे दीर्घ जीवन प्राप्त करते और सुखी होते हैं। जो समस्त दिशाओं में वास करता है, मैं भी वही हूँ। जो इस प्राण में है, इस आकाश में है, स्वर्गसमूह और विद्युत में बसता है, मैं भी वही हूँ।" यहाँ भी हमें व्यवहारोपयोगी धर्म का उदाहरण मिलता है। अग्नि सूर्य, चंद्र आदि जिन जिन वस्तुओं को वे उपासना करते थे, और वह वाणी जिससे वे परिचित थे, उन कथाओं का आधार है, जो उनकी व्याख्या करती है और उन्हें उच्चतर अर्थ प्रदान करती है। यही वेदांत का सच्चा, व्यावहारिक पक्ष है। वेदांत जगत को उड़ा नहीं देता, उसकी व्याख्या करता है। वह व्यक्ति को उड़ा नहीं देता--उसकी व्याख्या करता है। वह व्यक्तित्व को मिटाता नहीं, वरन् वास्तविक व्यक्तित्व का स्वरूप सामने रखकर उसकी व्याख्या कर देता है। वह यह नहीं कहता कि जगत वृथा है और उसका अस्तित्व नहीं है, किंतु कहता है, "जगत क्या है, यह समझो, जिससे वह तुम्हारा कोई अनिष्ट न कर सके।" उस वाणी ने उपकोशल से यह नहीं कहा था कि सूर्य, चंद्र, विद्युत अथवा और कुछ, जिसकी वे उपासना करते थे, वह एकदम भूल है, किंतु यही कहा कि जो चैतन्य सूर्य, चंद्र, विद्युत, अग्नि और पृथ्वी के भीतर है, वही उसके अंदर भी है। अतएव उपकोशल की दृष्टि में सभी मानो रूपांतरित हो गया! जो अग्नि पहले केवल हवन करने की जड़ अग्नि-मात्र थी, उसने एक नया रूप धारण कर लिया और वह ईश्वर हो गई। पृथ्वी ने एक नया रूप धारण कर लिया, प्राण, सूर्य, चंद्र, तारा, विद्युत सभी ने एक नया रूप धारण कर लिया, सब ब्रह्मभावापन्न हो गए और तभी उनका वास्तविक स्वरूप समझ में आया। वेदांत का उद्देश्य ही इन सब वस्तुओं में भगवान् का दर्शन करना है, उनका जो रूप आपाततः प्रतीत होता है, वह न देखकर उनको उनके प्रकृत स्वरूप में जानना है। तदन्तर उपनिषदों में एक दूसरा उपदेश है : 'जो आँखों में चमक रहा है, वह ब्रह्म है; वह रमणीय और ज्योतिर्मय है। वह संपूर्ण जगत में प्रकाशित हो रहा है।' यहाँ भाष्यकार कहता है, पवित्रात्मा पुरुषों की आँखों में जो एक विशेष प्रकार की ज्योति का आविर्भाव होता है, वह वास्तव में अन्तःस्थ सर्वव्यापी आत्मा की ही ज्योति है। वह ज्योति ही ग्रहों, सूर्य-चंद्र और तारों में प्रकाशित हो रही है।

अब मैं तुम लोगों से जन्म-मृत्यु आदि के संबंध में इन प्राचीन उपनिषदों की कुछ अद्भुत कथाएँ कहूँगा। शायद ये तुमको अच्छी लगें। श्वेतकेतु पांचालराज के पास गया। राजा ने उससे पूछा, "क्या तुम जानते हो मृत्यु होने के पश्चात् मनुष्य कहाँ जाते हैं ? क्या जानते हो कि वे किस प्रकार फिर लौट आते हैं ? क्या जानते हो कि परलोक एकदम भर क्यों नहीं जाता?" बालक ने कहा, "नहीं, मैं यह सब नहीं जानता।" उसने अपने पिता से जाकर यही सब प्रश्न पूछे। पिता ने कहा, "इन सब प्रश्नों का ठीक ठीक उत्तर तो मुझे भी मालूम नहीं।" तब वह राजा के पास लौट गया। राजा ने कहा, "यह ज्ञान ब्राह्मणों के पास कभी नहीं रहा, केवल राजागण ही इसे जानते थे, और इसी ज्ञान के बल पर राजागण पृथ्वी पर शासन करते रहे हैं।" वह तब राजा के पास कुछ दिन रहा, क्योंकि राजा ने शिक्षा देने का वचन दिया। राजा ने कहा, "हे गौतम परलोक अग्नि है। सूर्य ईंधन है। धूम्र किरणें हैं। दिन ज्वाला है। चंद्रमा भस्म है। तारागण चिनगारियाँ हैं। इस अग्नि में देवता शृद्धा की आहुति देते हैं, जिससे राजा सोम की उत्पत्ति होती है।" इसी प्रकार वह कहता गया, "तुम्हारी इस क्षुद्र अग्नि में होम करने का कोई प्रयोजन नहीं, संपूर्ण जगत ही वह अग्नि है और दिन-रात उसमें होम हो रहा है। देवता, मनुष्य सभी दिन-रात उसी की उपासना करते हैं। मनुष्य का शरीर ही अग्नि का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है।" हम यहाँ भी देखते हैं कि धर्म को व्यवहार में परिणत किया जा रहा है, ब्रह्म को हर वस्तु में देखा जा रहा है। इन सब रूपकों में यही एक तत्त्व निहित है कि आविष्कृत प्रतीक हितकारी और शुभ हो सकते हैं, किंतु उनसे भी श्रेष्ठ प्रतीक पहले से ही विद्यमान हैं। यदि ईश्वरोपासना करने के लिए प्रतिमा आवश्यक है, तो उससे कहीं श्रेष्ठ मानव-प्रतिमा मौजूद ही है। यदि ईश्वरोपासना के लिए मंदिर निर्माण करना चाहते हो, तो करो, किंतु सोच लो कि उससे भी उच्चतर, उससे भी महान मानव देह रूपी मंदिर तो पहले से ही मौजूद है।

हम लोगों को याद रखना चाहिए कि वेद के दो भाग हैं--कर्मकांड और ज्ञानकांड। उपनिषदों के अभ्युदय-काल में कर्मकांड इतना जटिल और विस्तारपूर्ण हो गया था कि उससे मुक्त होना असंभव सा कार्य हो गया। उपनिषदों में कर्मकांड बिल्कुल छोड़ दिया गया है ऐसा कहा जा सकता है, किंतु धीरे धीरे; और प्रत्येक कर्मकांड के अंदर एक उच्चतर अर्थगाम्भीर्य दिखाने की चेष्टा की गई है। अत्यंत प्राचीन काल में यह सब यज्ञादिक कर्मकांड प्रचलित थे, किंतु उपनिषद् काल में ज्ञानियों का अभ्युदय हुआ। उन लोगों ने क्या किया? आधुनिक सुधारकों के समान उन लोगों ने यज्ञादि के विरुद्ध प्रचार करके उसे एकदम मिथ्या या पाखंड कहकर उड़ा देने की चेष्टा नहीं की, किंतु उन्हीं का उच्चतर तात्पर्य समझाकर लोगों को एक ग्रहण करने योग्य वस्तु दी। उन्होंने कहा, 'अग्नि में हवन करो, बहुत अच्छी बात है, किंतु इस पृथ्वी पर दिन-रात हवन हो रहा है। यह क्षुद्र मंदिर है, ठीक है, किंतु संपूर्ण ब्रह्माण्ड ही हमारा मंदिर है, हम कहीं भी उपासना कर सकते हैं। तुम लोग वेदी बनाते हो--किंतु हम लोगों के मत में, जीवित, चेतन मनुष्य देहरूपी वेदी वर्तमान है और इस मनुष्य देहरूपी वेदी पर की गई पूजा, दूसरी अचेतन, मृत जड़ प्रतीक की पूजा की अपेक्षा श्रेयस्कर है।

अब मैं एक विचित्र सिद्धांत की चर्चा करूँगा।

मैं स्वयं ही इसका अधिकांश नहीं समझता। उपनिषद् का यह अंश मैं पढ़ता हूँ, तुम लोग इसे कुछ समझ सको तो समझो। जो व्यक्ति ध्यान-बल से विशुद्धचित होकर ज्ञानलाभ कर चुका है, वह जब मरता है, तो पहले अर्चि, उसके बाद दिन, फिर क्रमशः शुक्लपक्ष में और उत्तरायण षण्मास में जाता है; वहाँ से संवत्सर, संवत्सर से सूर्यलोक, और सूर्यलोक से चंद्रलोक, तथा चंद्रलोक से विद्युल्लोक में जाता है। वहाँ से एक दिव्य पुरुष उसे ब्रह्मलोक में ले जाते हैं। इसीका नाम देवयान है। जब साधु और ज्ञानियों की मृत्यु होती है, तो वे इसी मार्ग द्वारा जाते हैं। और फिर वापस नहीं आते। इन मास, संवत्सर आदि शब्दों का क्या अर्थ है, यह कोई भी भली भाँति नहीं समझता। सभी अपने अपने मस्तिष्क से कल्पित अर्थ लगाते रहते हैं। बहुत से लोग यह भी कहते हैं कि ये बेकार की बातें हैं। इन चंद्रलोक, सूर्यलोक आदि में जाने का क्या अर्थ है ? और यह दिव्यपुरुष आकर विद्युल्लोक से ब्रह्मलोक में ले जाता है, इसका भी क्या अर्थ है ? हिंदुओं में एक धारणा थी कि चंद्रलोक में जीवन है--इसके बाद हम लोग यह देखेंगे कि किस प्रकार चंद्रलोक से पतित होकर मनुष्य पृथ्वी पर वापस आता है। जो ज्ञान प्राप्त नहीं करते हैं, किंतु इस जीवन में शुभ कर्म कर चुके हैं, वे जब मरते हैं, तो पहले धूम्र में जाते हैं, फिर रात्रि में, तदन्तर कृष्ण-पक्ष, फिर दक्षिणायन षण्मास, और उसके बाद संवत्सर में से होकर वे पितृलोक में चले जाते हैं। वहाँ से आकाश में और फिर वे चंद्रलोक में गमन करते हैं। वहाँ देवताओं के खाद्य रूप होकर देवजन्म ग्रहण करते हैं। जब तक उनका पुण्य क्षय नहीं होता, तब तक वहीं रहते हैं। कर्मफल समाप्त होने पर फिर उन्हें पृथ्वी पर आना पड़ता है। वे पहले आकाश रूप में परिणत होते हैं, फिर वायु रूप में, फिर धूम्र, उसके बाद मेघ आदि के रूप में परिणत होकर अंत में, वृष्टिकण का आश्रय लेकर पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं, वहाँ शस्यक्षेत्र में गिरकर शस्य-रूप में परिणत होकर मनुष्य के खाद्य-रूप में परिगृहीत होते हैं और अंत में उनकी संतानादि बन जाते हैं। जिन लोगों ने खूब सत्कर्म किए थे, वे सवंश में जन्म ग्रहण करते हैं और जिन लोगों ने अत्यंत असत कर्म किए थे, उनका अत्यंत नीच जन्म होता है, यहाँ तक कि उनको कभी कभी पशु जन्म लेना पड़ता है। पशु बार-बार जन्म ग्रहण करते रहते हैं तथा बार- बार मृत्यु के मुँह में पड़ते रहते हैं। इसी कारण पृथ्वी न तो एकदम सूनी होती है और न परिपूर्ण ही।

हम लोग इससे भी कुछ विचार प्राप्त कर सकते हैं और बाद में शायद हम इसको अधिक समझ सकेंगे। अभी हम इसके अर्थ पर कुछ अटकल लगा सकते हैं। स्वर्ग में जाकर जीव फिर से किस प्रकार लौट आते हैं। इससे संबंध रखनेवाला अंश पहले अंश की अपेक्षा कुछ अधिक स्पष्ट प्रतीत होता है, किंतु इन सब उक्तियों का सार तत्त्व यही जान पड़ता है कि ब्रह्मानुभूति के बिना स्वर्गादि प्राप्ति स्थायी नहीं होती। ऐसे व्यक्ति जिन्हें अभी तक ब्रह्मानुभव नहीं हो सका, किंतु इस लोक में सत्कर्म कर चुके हैं और वह कर्म भी सकाम किया गया है, तो मृत्यु होने पर इधर उधर अनेक स्थानों में घूम फिरकर स्वर्ग पहुँचते हैं और हम लोग जिस प्रकार पैदा होते हैं ठीक उसी प्रकार वे भी देवताओं की संतानरूप में पैदा होते हैं, और जितने दिन उनके शुभ कर्मफल की समाप्ति नहीं होती, उतने दिन वे वहाँ रहते हैं। इसीसे वेदांत का एक मूल तत्त्व यह पाया जाता है कि जिसका नाम-रूप है, वही नश्वर है। अतएव स्वर्ग भी नश्वर होगा, क्योंकि उसका भी तो नाम-रूप है, अनंत स्वर्ग स्वविरोधी वाक्य मात्र है, जिस प्रकार यह पृथ्वी अनंत नहीं हो सकती; क्योंकि जिस वस्तु का भी नाम-रूप है, उसी की उत्पत्ति काल में है, स्थिति काल में है, विनाश काल में है। वेदांत का यह स्थिर सिद्धांत है--अतएव अनंत स्वर्ग की धारणा व्यर्थ है।

वेद के संहिता भाग में चिरंतन स्वर्ग का वर्णन है, जिस प्रकार मुसलमान और ईसाइयों के धर्म-ग्रंथों में है। मुसलमानों की स्वर्ग-धारणा और भी स्थूल है। वे लोग कहते हैं, स्वर्ग में बाग-बगीचे हैं, उनके नीचे नदियाँ बह रही हैं। अरबवासियों के रेगिस्तान में जल एक बहुत ही वांछनीय पदार्थ है। इसीलिए मुसलमान सदा जलपूर्ण स्वर्ग की कल्पना करते हैं। मेरा जहाँ जन्म हुआ, वहाँ साल में छ: महीने जल बरसता रहता है। मैं स्वर्ग को कल्पना में शायद शुष्क स्थान सोचूंगा, अंग्रेज भी यह सोचेंगे। संहिता का यह स्वर्ग अनंत है, वहाँ मृत व्यक्ति जाकर रहते हैं। वे लोग वहाँ सुंदर देह पाकर अपने पितृगण के साथ अत्यंत सुख सहित चिरकाल तक रहते हैं, वहाँ उनके माता-पिता, स्त्री-पुत्रादि भी आ मिलते हैं। और वे बहुत कुछ यहीं के समान रहते हैं; हाँ, उनका जीवन अपेक्षाकृत अधिक सुखमय होता है। उन लोगों की स्वर्ग की धारणा भी यही है कि इस जीवन में सुखप्राप्ति में जो सब विघ्न-बाधाएँ हैं, वे सब मिट जाएंगी, केवल इसका जो सुखमय अंश है, वही शेष रहेगा। स्वर्ग की यह धारणा हमें सुखकर भले ही प्रतीत हो, किंतु सुखकर और सत्य ये दोनों पूर्ण रूप से भिन्न वस्तुएँ हैं। वास्तव में चरम सीमा पर पहुंचे बिना सत्य कभी सुखकर नहीं होता। मनुष्य का स्वभाव बड़ा रूढ़िवादी है। मनुष्य कोई विशेष काम करता रहता है तो एक बार उसे शुरू करने पर फिर उसे छोड़ना उसके लिए बहुत कठिन हो जाता है। मन कोई नया विचार नहीं ग्रहण करता, क्योंकि वह बहुत कष्टकर होता है।

उपनिषदों में हमें पूर्वप्रचलित धारणाओं की तुलना में विराट अंतर मिलता है। उपनिषदों में कहा है, यह सब स्वर्ग जहाँ मनुष्य जाकर पितृगण के साथ रहता है, कभी नित्य नहीं हो सकता, क्योंकि नाम-रूपात्मक सभी वस्तुएँ अनित्य हैं। यदि स्वर्ग साकार है, तो काल के अनुसार उस स्वर्ग का अवश्य नाश होगा। हो सकता है, वह लाखों वर्ष रहे, किंतु अंत में ऐसा एक समय अवश्य आएगा कि उसका नाश होगा, और अवश्य होगा। इसी के साथ एक और भी धारणा लोगों के मन में आयी और वह यह कि ये सब आत्माएँ दुबारा इसी पृथ्वी पर लौट आती हैं। स्वर्ग केवल उनके शुभ कर्मों के फलभोग का स्थान मात्र है, फलभोग शेष होने पर वे फिर पृथ्वी पर ही जन्म ग्रहण करती हैं। एक बात इसीसे स्पष्ट प्रतीत होती है कि मनुष्य को अत्यंत प्राचीन काल से ही कार्य-कारण-विज्ञान विदित था। बाद में हम लोग देखेंगे कि हमारे दार्शनिकों ने इसी तत्त्व का वर्णन दर्शन तथा न्याय की भाषा में किया है, किंतु इस स्थान में मानो एक शिशु की अस्पष्ट भाषा में इसे कहा गया है। इन ग्रंथों का पाठ करते समय तुमको लगेगा कि ये सब तत्त्व आंतरिक अनुभूति के फलस्वरूप हैं। यदि तुम यह पूछो कि ये सब कार्य रूप में परिणत हो सकते हैं या नहीं, तो मैं कहूँगा कि पहले ये सब कार्य रूप में परिणत हुए हैं और बाद में दर्शन के रूप में आविर्भूत हुए हैं। तुमने देखा कि ये सब पहले अनुभूत हुए, बाद में लिखे गए। संपूर्ण ब्रह्माण्ड प्राचीन ऋषियों के साथ मानो बातें करता था। पक्षीगण उनसे बोलते, पशुगण भी उनसे बातचीत करते और चंद्र-सूर्य से भी उनका संभाषण होता था। उन्होंने क्रमशः समस्त वस्तुओं का अनुभव किया और वे प्रकृति के अंतस्तल में प्रविष्ट हो गए। उन्होंने सत्य की उपलब्धि चिंतन अथवा तर्क द्वारा, या आजकल की प्रथा के अनुसार दूसरों के विचारों द्वारा रचित ग्रंथों अथवा मैं आज जैसे उन्हीं के एक ग्रंथ को लेकर लंबी चौड़ी वक्तृता दे डालता हूँ, ऐसी वक्तृताओं द्वारा नहीं की थी, वरन् धैर्ययुक्त अनुसंधान और आविष्कार द्वारा की थी। इसकी सारस्वरूप पद्धति थी साधना--और चिरकाल तक वही रहेगी। धर्म सदैव एक व्यावहारिक विज्ञान रहा है; शास्त्र पर निर्भर रहनेवाला धर्म न कोई कभी हुआ है, न होगा। पहले साधना, उसके बाद ज्ञान। जीवगण यहाँ लौट आते हैं, यह धारणा मैं पहले से ही विद्यमान पाता हूँ। जो फल की कामना से कुछ सत्कर्म करते हैं, उन्हें उस सत्कर्म का फल प्राप्त होता है, किंतु यह फल नित्य नहीं होता। कार्य-कारणवाद यहाँ बहुत सुंदर रूप में वर्णित हुआ है, क्योंकि कहा गया है कि कार्य कारण के अनुसार ही होता है। जैसा कारण है, कार्य भी वैसा ही होगा; कारण जब अनित्य है, तो कार्य भी अनित्य है। कारण नित्य होने पर कार्य भी नित्य होगा। किंतु सत्कर्म रूपी ये कारण ससीम हैं, अतएव उनका फल भी कभी असीम नहीं हो सकता।

इस तत्त्व का एक और पहलू देखने से यह भली-भाँति समझ में आ जाएगा कि जिस कारण चिरंतन स्वर्ग नहीं हो सकता, उसी कारण चिरंतन नरक भी नहीं हो सकता। मान लो, मैं एक बहुत दुष्ट आदमी हूँ और समस्त जीवन अन्याय-पूर्ण कर्म करता रहा हूँ, तो भी यह सारा जीवन अनंत जीवन के साथ तुलना करने पर कुछ भी नहीं है। यदि दंड अनंत हो, तो इसका यह अर्थ होगा कि ससीम कारण से असीम फल की उत्पत्ति हुई। इस जीवन के ससीम कार्य रूप कारण द्वारा असीम फल की उत्पत्ति हुई। यह नहीं हो सकता। यदि यह मान लिया जाए कि समस्त जीवनपर्यंत सत्कर्म करते रहने पर अनंत स्वर्ग लाभ होता है, तो भी यह दोष बना रहेगा। किंतु उन लोगों के लिए, जिन्होंने सत्य को जान लिया है, और भी एक तीसरा मार्ग है। मायावरण से बाहर निकलने का यही एकमात्र मार्ग है--'सत्य का अनुभव करना।' और सब उपनिषद्, यह सत्यानुभव किसे कहते हैं, यही समझाते हैं।

अच्छा बुरा कुछ न देखो, सभी वस्तुएँ और सभी कार्य आत्मा से उत्पन्न होते हैं, यही विचार करो। आत्मा सभी में है। यही कहो कि जगत नामक कोई चीज़ नहीं है। बाह्य दृष्टि बंद करो; उसी प्रभु की स्वर्ग और नरक में, मृत्यु और जीवन में सर्वत्र उसी की उपलब्धि करो। मैंने पहले जो तुम्हें पढ़कर सुनाया है, उसमें भी यही भाव है--यह पृथ्वी उसी भगवान् का एक प्रतीक है, आकाश भी भगवान् का एक दूसरा प्रतीक है, इत्यादि-इत्यादि। ये सब ब्रह्म हैं। परंतु यह देखना. पड़ेगा, अनुभव करना पड़ेगा, इस विषय की केवल आलोचना अथवा चिंता करने से कुछ नहीं होगा। मान लो, जब आत्मा ने जगत की प्रत्येक वस्तु का स्वरूप समझ लिया और उसे यह अनुभव होने लगा कि प्रत्येक वस्तु ही ब्रह्ममय है, तब वह स्वर्ग में जाए अथवा नरक में, या अन्यत्र और कहीं चली जाए, तो इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। मैं पृथ्वी पर जन्मूं अथवा स्वर्ग में जाऊँ, इससे कोई अंतर नहीं होता। मेरे लिए ये सब निरर्थक हैं, क्योंकि मेरे लिए सभी स्थान समान हैं, सभी स्थान भगवान् के मंदिर हैं, सभी स्थान पवित्र हैं, कारण स्वर्ग, नरक अथवा अन्यत्र मैं केवल भगवत्सत्ता का ही अनुभव कर रहा हूँ। भला-बुरा अथवा जीवन-मरण मुझे कुछ नहीं दिखायी देते, एकमात्र ब्रह्म का अस्तित्व है। वेदांत-मत में मनुष्य जब ऐसी अनुभूति प्राप्त कर लेता है, तब वह मुक्त हो जाता है और वेदांत कहता है, केवल वही व्यक्ति संसार में रहने योग्य है, दूसरा नहीं। जो व्यक्ति जगत में केवल अशुभ देखता है, वह भला संसार में कैसे वास कर सकता है ? उसका जीवन तो सर्वदा दुःखमय होगा। जो व्यक्ति यहाँ अनेकानेक विघ्न-बाधाओं तथा विपत्तियों को देखता है, मृत्यु देखता है, उसका जीवन तो दुःखमय होगा ही, परंतु जो व्यक्ति प्रत्येक वस्तु में उसी सत्यस्वरूप को देखता है, वही संसार में रहने योग्य है; वही यह कह सकता है कि मैं इस जीवन का उपभोग कर रहा हूँ, मैं इस जीवन में खूब सुखी हूँ। यहाँ मैं यह कह देना चाहता हूँ कि वेद में कहीं भी नरक का उल्लेख नहीं है। वेद के बहुत परवर्ती काल में रचित पुराणों में यह नरक-प्रसंग दिया गया है। वेद में सबसे बड़ा दंड है--पुनर्जन्म अर्थात इस जगत में एक बार और आना, यहाँ एक दूसरा अवसर पाना। हम देखते हैं कि पहले से ही यह निर्गुण भाव चलता आ रहा है। पुरस्कार और दण्ड का भाव बहुत ही जड़भावात्मक है और यह भाव केवल मनुष्य के समान सगुण ईश्वरवाद में ही संभव है--जो ईश्वर हमारे समान एक को प्रेम करते हैं, दूसरे को नहीं। इस प्रकार की ईश्वर-धारणा के साथ ही पुरस्कार और दण्ड का भाव संगत हो सकता है। संहिताओं में ईश्वर का वर्णन इसी प्रकार दिया गया है। वहाँ इस धारणा के साथ भय भी मिला हुआ था, किंतु उपनिषदों में यह भय-भाव बिल्कुल नहीं मिलता; इसके साथ ही उपनिषदों में हम निर्गुण की धारणा पाते हैं--और प्रत्येक दशा में यह निर्गुण की धारणा ही विशेष कठिन होती है। मनुष्य सर्वदा ही सगुण से चिपका रहना चाहता है। बहुत बड़े बड़े विचारक भी, कम से कम संसार जिन्हें बहुत बड़े विचारक मानता है, इस निर्गुण ईश्वर से सहमत नहीं हैं। किंतु देहधारी ईश्वर की कल्पना मुझे अत्यंत हास्यास्पद प्रतीत होती है। उच्चतर भाव कौन सा है--जीवित ईश्वर या मृत ईश्वर ?--जिस ईश्वर को कोई देख नहीं सकता, जान नहीं पाता--अथवा जो ईश्वर हमारे सम्मुख चारों ओर प्रकट एवं ज्ञात है ?

निर्गुण ईश्वर जीवंत ईश्वर है, वह एक तत्त्व मात्र है। सगुण-निर्गुण के बीच में भेद यही है कि सगुण ईश्वर मानवविशेष मात्र है, और निर्गुण ईश्वर है मनुष्य, पशु, देवता तथा कुछ और अधिक जो हम नहीं देख पाते हैं, क्योंकि सगुण निर्गुण के अंतर्गत है और निर्गुण सगुण व्यष्टि, समष्टि एवं उसके अतिरिक्त और भी बहुत कुछ है। 'जिस प्रकार एक ही अग्नि जगत में भिन्न-भिन्न रूप में प्रकाशित होती है, और उसके अतिरिक्त भी अग्नि का अस्तित्व है, इसी प्रकार निर्गुण भी है।' हम जीवित ईश्वर की पूजा करना चाहते हैं। मैंने संपूर्ण जीवन ईश्वर के अतिरिक्त और कुछ नहीं देखा। तुमने भी नहीं देखा। इस कुर्सी को देखने से पहले तुम्हें ईश्वर को देखना पड़ता है, उसके बाद उसी में और उसके माध्यम से कुर्सी को देखना पड़ता है। वह दिन-रात जगत में रहकर प्रतिक्षण 'मैं हूँ' 'मैं हूँ' कह रहा है। जिस क्षण तुम बोलते हो 'मैं हूँ', उसी क्षण तुम उस सत्ता को जान रहे हो। तुम ईश्वर को कहाँ ढूंढ़ने जाओगे, यदि तुम उसे अपने हृदय में, हर प्राणी में नहीं देख पाते ? त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी। त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि , त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः॥ --'तुम स्त्री, तुम पुरुष, तुम कुमार, तुम कुमारी हो, तुम्ही वृद्ध होकर लाठी के सहारे चल रहे हो, तुम्हीं संपूर्ण जगत में भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट हुए हो। तुम्हीं यह सब हो।' कितना अद्भुत 'जीवित ईश्वर' है--संसार में वह ही एक मात्र सत्य है। यह धारणा अनेक लोगों को उस परंपरीण ईश्वर से घोर विरोधात्मक लगती है, जो किसी विशेष स्थान में किसी पर्दे के पीछे छिपा बैठा है, और जिसे कोई कभी नहीं देख सकता। पुरोहित लोग हमें केवल यही आश्वासन देते हैं कि यदि हम लोग उनका अनुसरण करें, उनकी भर्त्सना सुनते रहें, और उनके द्वारा निर्दिष्ट लीक पर चलते रहें, तो मरते समय वे हमें एक मुक्तपत्र देंगे और तब हम ईश्वर-दर्शन कर सकेंगे। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह सारा स्वर्गवाद इस अनर्गल पुरोहित-प्रपंच के विविध रूपों के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

निर्गुणवाद निस्संदेह अनेक चीजें नष्ट कर डालता है; वह पुरोहितों, धर्मसंघों और मन्दिरों के हाथ से सारा व्यवसाय छीन लेता है। भारत में इस समय दुभिक्ष है, किंतु वहाँ ऐसे बहुत से मंदिर हैं, जिनमें से प्रत्येक में एक राजा को भी खरीद लेने योग्य बहुमूल्य रत्नों की राशि सुरक्षित है। यदि पुरोहित लोग इस निर्गुण ब्रह्म की शिक्षा दें, तो उनका व्यवसाय छिन जाएगा। किंतु हमें उसकी शिक्षा निःस्वार्थ भाव से, बिना पुरोहित-प्रपंच के देनी होगी। तुम भी ईश्वर, मैं भी वही--तब कौन किसकी आज्ञा पालन करे ? कौन किसकी उपासना करे ? तुम्हीं ईश्वर के सर्वश्रेष्ठ मंदिर हो; मैं किसी मंदिर, किसी प्रतिमा या किसी बाइबिल की उपासना न कर तुम्हारी ही उपासना करूंगा। लोग इतना परस्पर विरोधी विचार क्यों करते हैं ? लोग कहते हैं, हम ठेठ प्रत्यक्षवादी हैं; ठीक बात है, किंतु तुम्हारी उपासना करने की अपेक्षा और अधिक प्रत्यक्ष क्या हो सकता है ? मैं तुम्हें देख रहा हूँ, तुम्हारा अनुभव कर रहा हूँ और जानता हूँ कि तुम ईश्वर हो। मुसलमान कहते हैं, अल्लाह के सिवाय और कोई ईश्वर नहीं है; किंतु वेदांत कहता है, ऐसा कुछ है ही नहीं जो ईश्वर न हो। यह सुनकर तुममें से बहुतों को भय हो सकता है, किंतु तुम लोग धीरे धीरे यह समझ जाओगे। जीवित ईश्वर तुम लोगों के भीतर रहते हैं, तब भी तुम मंदिर, गिरजाघर आदि बनाते हो और सब प्रकार की काल्पनिक झूठी चीज़ों में विश्वास करते हो। मनुष्य-देह में स्थित मानव-आत्मा ही एकमात्र उपास्य ईश्वर है। पशु भी भगवान् के मंदिर हैं, किंतु मनुष्य ही सर्वश्रेष्ठ मंदिर है--ताजमहल जैसा। यदि मैं उसकी उपासना नहीं कर सका, तो अन्य किसी भी मंदिर से कुछ भी उपकार नहीं होगा। जिस क्षण मैं प्रत्येक मनुष्य-देहरूपी मंदिर में उपविष्ट ईश्वर की उपलब्धि कर सकेंगा, जिस क्षण में प्रत्येक मनुष्य के सम्मुख भक्तिभाव से खड़ा हो सकूँगा और वास्तव में उनमें ईश्वर देख सकूँगा, जिस क्षण मेरे अंदर यह भाव आ जाएगा, उसी क्षण मैं संपूर्ण बंधनों से मुक्त हो जाऊँगा--बाँधनेवाले पदार्थ हट जाएंगे और मैं मुक्त हो जाऊँगा।

यही सबसे अधिक व्यावहारिक उपासना है। मत-मतान्तर से इसका कोई प्रयोजन नहीं। किंतु यह बात कहने से अनेक लोग डर जाते हैं। वे कहते हैं, यह ठीक नहीं है। उनके पितामह जनों ने उन्हें जो यह बतला दिया था कि स्वर्ग के किसी स्थान पर बैठे हुए एक ईश्वर ने किसी व्यक्ति से कहा--मैं ईश्वर हैं, और वे उसीके संबंध में बौद्धिक माथापच्ची किए चले आ रहे हैं। उसी समय से केवल मत-मतांतरों की आलोचना ही चल रही है। उनके मत में यही व्यावहारिक बात है--और हम लोगों का मत व्यावहारिक नहीं है। वेदांत कहता है, सब अपने अपने मार्ग पर चलें, कोई हरज नहीं, किंतु मार्ग ही लक्ष्य नहीं है। किसी स्वर्गस्थ ईश्वर की उपासना करना आदि बुरा नहीं, किंतु ये सब केवल सत्य की दिशा में सोपान मात्र हैं, साध्य सत्य नहीं। ये सब सुंदर एवं शुभ हैं, इनमें कुछ अद्भुत भाव हैं, किंतु वेदांत पग पग पर कहता है, 'बंधु, तुम जिसकी अज्ञात कहकर उपासना करते हो, उसकी उपासना मैं तुम्हारे रूप में करता हूँ। जिसकी उपासना तुम अज्ञात कह कर करते हो और जिसकी खोज विश्व भर में कर रहे हो, वह सदैव तुम्हारे पास ही रहा है। तुम उसीमें जीवित हो, वह जगत का नित्यसाक्षी है।' 'संपूर्ण वेद जिसकी उपासना करते हैं, केवल यही नहीं, जो नित्य 'मैं' में सदा वर्तमान है, वह ही है; उसके होने से ही संपूर्ण ब्रह्माण्ड भी है। वह संपूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रकाश और प्राण है। यदि (वह) 'मैं' तुम्हारे भीतर न हो तो तुम सूर्य को भी न देख पाते, सभी कुछ तुम्हारे लिए अंधकारमय जड़राशि--शून्य के समान प्रतीत होता। वह प्रकाशमान है, इसीलिए तुम जगत को देख पाते हो।'

इस विषय में साधारणतया एक प्रश्न पूछा जाता है और वह यह है कि इस विचार-धारा से बहुत गड़बड़ी हो जाने की संभावना है। हम सभी यह सोचेंगे कि मैं ईश्वर हूँ--जो कुछ मैं सोचता हूँ या करता हूँ वही अच्छा है--क्योंकि ईश्वर को भला पाप क्या ? इसका उत्तर यह है कि पहले यदि इस प्रकार की विपरीत व्याख्यारूप आशंका की संभावना मान भी ली जाए, तब भी क्या यह प्रमाणित किया जा सकता है कि दूसरे पक्ष में भी यही आशंका नहीं उत्पन्न होगी ? लोग अपने से पृथक स्वर्गस्थित ईश्वर की उपासना करते हैं, उससे खूब डरते भी हैं। लोग भय से काँपते रहते हैं और सारा जीवन इसी प्रकार काँपते हुए काट देते हैं। तो क्या दुनिया ऐसा मान लेने पर भी पहले की अपेक्षा अधिक अच्छी हो गई है ? तुम भी दूसरे से यही पूछ रहे थे। विचार करो कि जो ईश्वर को सगुण मानकर उसकी उपासना करते हैं और जो उसे निर्गुण मान कर उसकी उपासना करते हैं. इन दोनों में से किसके संप्रदाय में संसार के बड़े बड़े महापुरुष हो गए हैं ? महान कर्मयोगी--महा चरित्रवान् ! निश्चय ही ऐसे महापुरुष निर्गुण साधकों के बीच ही हुए हैं। भय से तुम नैतिकता के प्रस्फुटन की संभावना कैसे मान सकते हो ? नहीं, कभी नहीं। "जहाँ एक दूसरे को देखता है, जहाँ एक दूसरे को सुनता है, वहीं माया है। जहाँ एक दूसरे को नहीं देखता, एक दूसरे को सुनता नहीं, जहाँ सर्व आत्ममय हो जाता है, वहाँ कौन किसे देखेगा, कौन किसे सुनेगा ?" तब सभी 'वह' अथवा सभी 'मैं' हो जाता है। तब आत्मा पवित्र हो जाती है। तभी--और केवल तभी हम प्रेम किसे कहते हैं, यह समझ सकते हैं। डर से क्या प्रेम हो सकता है ? प्रेम की भित्ति है, स्वाधीनता। स्वाधीनता--मुक्तस्वभाव होने पर ही प्रेम होता है। जब हम लोग वास्तव में जगत को स्नेह करना प्रारंभ करते हैं, तभी विश्वबंधुत्व का अर्थ समझते हैं--अन्यथा नहीं।

इसलिए यह कहना उचित नहीं है कि इस निर्गुण मत से समस्त संसार में भयानक पाप-धारा बह उठेगी, जैसे दूसरे मत से दुनिया कभी अन्याय की ओर गई ही नहीं अथवा वह सारी दुनिया को रक्त से आप्लावित तथा मनुष्य को परस्पर टुकड़े-टुकड़े कर डालनेवाली सांप्रदायिकता की ओर कभी ले ही नहीं गया। वे कहते हैं, मेरा ईश्वर ही सर्वश्रेष्ठ है। इसका प्रमाण ? आओ, हम दोनों लड़ लें--यही प्रमाण है। द्वैतवाद से यही गड़बड़ी सारी दुनिया में फैल गई है। क्षुद्र और संकीर्ण रास्तों में न जाकर प्रशांत उज्ज्वल दिन के प्रकाश में आओ। महान अनंत आत्मा संकीर्ण भावों में कैसे बँधी रह सकती है ? हमारे सम्मुख यह प्रकाशमय ब्रह्माण्ड है, इसकी प्रत्येक वस्तु हमारी है। अपनी बाहें फैलाकर संपूर्ण जगत का प्रेमालिगन करने की चेष्टा करो। यदि कभी ऐसा करने की इच्छा हो, तभी समझो कि तुम्हें ईश्वर का अनुभव हुआ है।

बुद्धदेव के उपदेश का वह अंश तुमको स्मरण होगा कि वे किस प्रकार उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम, ऊपर, नीचे सर्वत्र ही प्रेम की भावना प्रवाहित कर देते थे, यहाँ तक कि चारों ओर वही महान अनंत प्रेम संपूर्ण विश्व में छा जाता था। इसी प्रकार जब तुम लोगों का भी यही भाव होगा, तब तुम्हारा भी यथार्थ व्यक्तित्व प्रकट होगा। तभी संपूर्ण जगत एक व्यक्ति बन जाएगा--क्षुद्र वस्तुओं की ओर फिर मन नहीं जाएगा। इस अनंत सुख के लिए छोटी-छोटी वस्तुओं का परित्याग कर दो। इन सब क्षुद्र सुखों से तुम्हें क्या लाभ होगा ? और वास्तव में तो तुम्हें इन छोटे-छोटे सुखों को भी छोड़ना नहीं पड़ता, कारण, तुम लोगों को याद होगा कि सगुण निर्गुण के अंतर्गत है, जो मैं पहले ही कह चुका हूँ। अतएव ईश्वर सगुण और निर्गुण दोनों ही है। मनुष्य--अनंतस्वरूप निर्गुण मनुष्य भी--अपने को सगुण रूप में, व्यक्ति रूप में देख रहा है। मानो हम अनंतस्वरूप होकर भी अपने को क्षुद्र रूपों में सीमाबद्ध बना डालते हैं। वेदांत कहता है असीमता ही हमारा सच्चा स्वरूप है, वह कभी लुप्त नहीं हो सकती, सदा रहेगी। किंतु हम अपने कर्म द्वारा अपने को सीमाबद्ध कर डालते हैं और उसी ने मानो हमारे गले में श्रृंखला डालकर हमें आबद्ध कर रखा है। श्रृंखला तोड़ डालो और मुक्त हो जाओ। नियम को पैरों तले कुचल डालो। मनुष्य के प्रकृतस्वरूप में कोई विधि नहीं, कोई दैव नहीं, कोई अदृष्ट नहीं। अनंत में विधान या नियम कैसे रह सकते हैं ? स्वाधीनता ही इसका मूलमंत्र है, स्वाधीनता ही इसका स्वरूप है--इसका जन्मसिद्ध अधिकार है। पहले मुक्त बनो, तब फिर जितने व्यक्तित्व रखना चाहो, रखो। तवं हम लोग रंगमंच पर अभिनेताओं के समान अभिनय करेंगे, जैसे अभिनेता भिखारी का अभिनय करता है। उसकी तुलना गलियों में भटकनेवाले वास्तविक भिखारी से करो। यद्यपि दृश्य दोनों ओर एक है, वर्णन करने में भी एक सा है, किंतु दोनों में कितना भेद है ! एक व्यक्ति भिक्षुक का अभिनय कर आनंद ले रहा है, और दूसरा सचमुच दुःख-कष्ट से पीड़ित है। ऐसा भेद क्यों होता है ? कारण, एक मुक्त है और दूसरा बद्ध। अभिनेता जानता है कि उसका यह भिखारीपन सत्य नहीं है, उसने यह केवल अभिनय के लिए स्वीकार किया है, किंतु यथार्थ भिक्षुक जानता है कि यह उसकी चिरपरिचित अवस्था है, एवं उसकी इच्छा हो या न हो, उसे वह कष्ट सहना ही पड़ेगा। उसके लिए यह अभेद्य नियम के समान है और इसीलिए उसे कष्ट उठाना ही पड़ता है। हम जब तक अपने स्वरूप का ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक हम लोग केवल भिक्षुक हैं, प्रकृति के अंतर्गत प्रत्येक वस्तु ने ही हमें दास बना रखा है। हम संपूर्ण जगत में सहायता के लिए चीत्कार करते फिरते हैं--अंत में काल्पनिक सत्ताओं से भी हम सहायता माँगते हैं, पर सहायता कभी नहीं मिलती; तो भी हम सोचते हैं कि इस बार सहायता मिलेगी। इस प्रकार हम सर्वदा आशा लगाए बैठ रहते हैं। बस, इसी बीच एक जीवन रोते, कलपते, आशा की लौ लगाए बीत जाता है, और फिर वही खेल चलने लगता है।

स्वाधीन होओ; किसी दूसरे से कुछ आशा न करो। मैं यह निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि यदि तुम अपने जीवन की अतीत घटनाएँ याद करो, तो देखोगे कि तुम सदैव व्यर्थ ही दूसरों से सहायता पाने की चेष्टा करते रहे, किंतु कभी पा नहीं सके ; जो कुछ सहायता मिली वह तुम्हारे अपने अंदर से ही आयी थी। तुम स्वयं जिसके लिए चेष्टा करते हो, उसे ही फलरूप में पाते हो; तथापि कितना आश्चर्य है कि तुम सदैव ही दूसरे से सहायता की भीख माँगते रहते हो! धनियों की बैठक सदा भरी ही रहती है, किंतु यदि ध्यान दो तो देखोगे, सदा वे ही लोग वहाँ दिखाई नहीं पड़ेंगे। वे लोग सदैव आशा लगाए रहते हैं कि धनियों के पास से कुछ माँगकर लायेंगे, किंतु ऐसा कर नहीं पाते। हमारा जीवन भी उसी प्रकार का है, हम केवल आशाएँ किए चले जा रहे हैं, उनका अंत नहीं। वेदांत कहता है, इसी आशा का परित्याग करो। क्यों आशा करते हो ? तुम्हारे पास सब कुछ है। तुम्हीं सब कुछ हो। तुम आत्मा हो, तुम सम्राटस्वरूप हो, तुम भला किसकी आशा करते हो ? यदि राजा पागल होकर अपने देश में 'राजा कहाँ है, राजा कहाँ है कहकर खोजता फिरे, तो वह कभी राजा को नहीं पा सकता, क्योंकि वह स्वयं ही राजा है। वह अपने राज्य के प्रत्येक ग्राम में, प्रत्येक नगर में--यहाँ तक कि प्रत्येक घर में खोज करे, खूब रोए-चिल्लाए फिर भी राजा का पता नहीं लग सकता; क्योंकि वह व्यक्ति स्वयं ही राजा है। इसी प्रकार हम लोग यदि जान सकें कि हम ईश्वर हैं और इस अन्वेषणरूपी व्यर्थ चेष्टा को छोड़ सकें, तो बहुत ही अच्छा हो। इस प्रकार अपने को ईश्वरस्वरूप जान लेने पर ही हम संतुष्ट और सुखी हो सकते हैं। यह सब पागलों जैसी चेष्टा छोड़कर जगत् रूपी मंच पर एक अभिनेता के समान कार्य करते चलो।

इस प्रकार की अवस्था आने से हम लोगों की संपूर्ण दृष्टि परिवतित हो जाती है। अनंत कारागारस्वरूप न होकर यह जगत खेलने का स्थान बन जाता है। प्रतियोगिता की जगह न बनकर यह भौरों के गुंजन से परिपूर्ण वसन्त काल का रूप धारण कर लेता है। पहले जो जगत नरककुंड जैसा लगता था, वही अब स्वर्ग बन जाता है। बद्ध जीव की दृष्टि में यह एक महायंत्रणा का स्थान है, किंतु मुक्त व्यक्ति की दृष्टि में यही स्वर्ग है; स्वर्ग अन्यत्र नहीं है। एक ही प्राण सर्वत्र विराजित है। पुनर्जन्म आदि जो कुछ है, सब यहीं होता है। देवतागण सब यहीं हैं--वे मनुष्य के आदर्श के अनुसार कल्पित हैं। देवताओं ने मनुष्यों को अपने आदर्श के अनुसार नहीं बनाया, किंतु मनुष्यों ने ही देवताओं की सृष्टि की है। इंद्र, वरुण और संपूर्ण ब्रह्माण्ड के देवता सब यहीं हैं। तुम्ही लोग अपने एक अंश को बाहर प्रक्षिप्त करते हो, किंतु वास्तव में तुम्ही असली वस्तु हो--तुम्ही प्रकृत उपास्य देवता हो। यही वेदांत का मत है और यही यथार्थ में व्यावहारिक है। मुक्त होने पर उन्मत्त होकर समाज त्याग करने और जंगलों अथवा गुफाओं में जाकर मर जाने की आवश्यकता नहीं। तुम जहाँ हो वहीं रहोगे, किंतु भेद इतना ही होगा कि तुम संपूर्ण जगत का रहस्य समझ जाओगे। पहले देखी हुई समस्त वस्तुएँ जैसी की तैसी ही रहेंगी, किंतु उनका एक नवीन अर्थ समझने लगोगे। तुम अभी जगत का स्वरूप नहीं जानते हो; केवल मुक्त होने पर ही इसका स्वरूप जान सकोगे। हम देखेंगे कि यह तथाकथित विधि, दैव या अदृष्ट हम लोगों की प्रकृति का एक अत्यंत क्षुद्र अंश मात्र है। यह हम लोगों की प्रकृति का केवल एक पहलू मात्र है, दूसरी दिशा में मुक्ति सदा विद्यमान रही है और हम लोग शिकारी द्वारा पीछा किए गए खरगोश के समान मिट्टी में अपना सिर छिपाकर अपने को अशुभ से बचाने की चेष्टा करते रहे हैं।

हम भ्रमवश अपना स्वरूप भूलने की चेष्टा करते हैं, किंतु वह एकदम भूला नहीं जा सकता--सदैव ही वह किसी न किसी रूप में हमारे सामने आता ही है। हम जिन देवता, ईश्वर आदि का अनुसंधान करते हैं, बाह्य जगत में स्वाधीनता पाने के लिए हम जो प्राणपण से चेष्टा करते रहते हैं, वह सब और कुछ नहीं--हम लोगों की मुक्त प्रकृति ही मानो किसी न किसी रूप में अपने को प्रकाशित करने का यत्न कर रही है। कहाँ से यह आवाज़ आ रही है, यह जानने में हम लोगों ने भूल की है। हम लोग पहले सोचते हैं, यह आवाज़ अग्नि, सूर्य, चंद्र, तारा अथवा किसी देवता से आती है--अंत में हम लोग देखते हैं कि यह तो हम लोगों के अंदर ही है। यह वही अनंत वाणी अनंत मुक्ति का समाचार देती है। यह संगीत अनंत काल से चला आ रहा है। आत्म-संगीत का कुछ अंश इस नियमाबद्ध ब्रह्माण्ड, इस पृथ्वी के रूप में परिणत हुआ है, किंतु यथार्थतः हम लोग आत्मस्वरूप हैं और चिरकाल तक आत्मस्वरूप ही रहेंगे। एक शब्द में वेदांत का आदर्श है--मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप में जानना, और उसका सन्देश है कि यदि तुम अपने भाई मनुष्य की, व्यक्त ईश्वर की, उपासना नहीं कर सकते तो उस ईश्वर की कल्पना कैसे कर सकोगे, जो अव्यक्त है ?

क्या तुम लोगों को बाइबिल का वह कथन याद नहीं है, "यदि तुम अपने भाई को, जिसे तुम देख रहे हो, प्यार नहीं कर सकते, तो ईश्वर को, जिसे तुमने कभी नहीं देखा, भला कैसे प्यार कर सकोगे ?" यदि तुम ईश्वर को मनुष्य के मुख में नहीं देख सकते, तो उसे मेघ अथवा अन्य किसी मृत जड़ पदार्थ में अथवा अपने मस्तिष्क की कल्पित कथाओं में कैसे देखोगे ? जिस दिन से तुम नर-नारियों में ईश्वर देखने लगोगे, उसी दिन से मैं तुम्हें धार्मिक कहूँगा, और तभी तुम लोग समझोगे कि दाहिने गाल पर थप्पड़ मारने पर मारनेवाले के सामने बायाँ गाल फिराने का क्या अर्थ है। जब तुम मनुष्य को ईश्वररूप में देखोगे, तब सभी वस्तुओं का, यहाँ तक कि यदि तुम्हारे पास बाघ तक आ जाए, तो उसका भी तुम स्वागत करोगे। जो कुछ तुम्हारे पास आता है, वह सब अनंत आनंदमय प्रभु का भिन्न-भिन्न रूप ही है--वे ही हमारे माता, पिता, बंधु और संतान हैं। वे हमारी अपनी आत्मा ही हैं, जो हमारे साथ खेल रही हैं।

जिस तरह इस प्रकार मनुष्य के साथ हमारे सम्बन्धों को ईश्वरभावापन्न बनाया जा सकता है, उसी प्रकार ईश्वर से हमारा संबंध भी इनमें से कोई रूप ले सकता है और हम उसे अपना पिता, माता, मित्र, प्रियतम कुछ भी मान सकते हैं। भगवान् को पिता कहने की अपेक्षा एक और उच्चतर भाव है--उन्हें 'माता कहना। फिर इससे भी एक पवित्रतर भाव है--उन्हें 'सखा' कहना। उसकी अपेक्षा एक और श्रेष्ठ भाव है--उन्हें अपना प्रेमास्पद कहना। प्रेम और प्रेमास्पद में कुछ भेद न देखना ही सर्वोच्च भाव है। तुम लोगों को वह प्राचीन फ़ारसी कहानी याद होगी। एक प्रेमी ने आकर अपने प्रेमास्पद के घर का दरवाजा खट-खटाया। प्रश्न हुआ, "कौन है ?" वह बोला, "मैं"। द्वार नहीं खुला। दुबारा फिर उसने कहा, "मैं आया हूँ", पर द्वार फिर भी न खुला। तीसरी बार वह फिर आया, प्रश्न हुआ, "कौन है ?" तब उसने कहा, "प्रेमास्पद, मैं तुम हूँ", तब द्वार खुल गया। भगवान् और हमारे बीच संबंध भी ठीक ऐसा ही है, वे सब में हैं और वे ही सब कुछ हैं। प्रत्येक नरनारी ही वही प्रत्यक्ष जीवंत आनंदमय एकमात्र ईश्वर है। कौन कहता है, ईश्वर अज्ञात है, कौन कहता है उसे खोजना पड़ेगा ? हमने उसे अनंत काल के लिए पाया है। हम उसीमें अनंत काल तक रहते हैं--वह सर्वत्र अनंत काल के लिए ज्ञात है और वही अनंत काल से उपासित हो रहा है।

एक और बात इसी प्रसंग में जाननी होगी। वेदांत कहता है--दूसरे प्रकार की उपासनाएँ भी भ्रमात्मक नहीं हैं। यह कभी न भूलना चाहिए कि जो अनेक प्रकार के कर्म-काण्ड द्वारा भगवत्-उपासना करते हैं--हम इन कर्मों को चाहे कितना ही अनुपयोगी क्यों न मानें--वे लोग वास्तव में भ्रांत नहीं हैं; क्योंकि लोग सत्य से सत्य की ओर, निम्नतर सत्य से उच्चतर सत्य की ओर आगे बढ़ते हैं। अंधकार कहने से समझना चाहिए, स्वल्प प्रकाश; बुरा कहने से समझना चाहिए, थोड़ा अच्छा; अपवित्रता कहने से समझना चाहिए, स्वल्प पवित्रता। अतएव हमें दूसरों को प्रेम और सहानुभूति की दृष्टि से देखना चाहिए। हम लोग जिस रास्ते पर चल आए हैं, वे भी उसी रास्ते से चल रहे हैं। यदि तुम वास्तव में मुक्त हो, तो तुम्हें अवश्य ही यह समझना चाहिए कि वे भी आगे-पीछे मुक्त होंगे। और जब तुम मुक्त ही हो गए, तो फिर जो अनित्य है, उसे तुम किस प्रकार देख पाओगे ? यदि तुम वास्तव में पवित्र हो, तो तुम्हें अपवित्रता कैसे दिखायी दे सकती है ? क्योंकि जो भीतर है, वही बाहर दीख पड़ता है। हमारे अंदर यदि अपवित्रता न होती तो हम उसे बाहर कभी देख ही न पाते। वेदांत की यह भी एक साधना है। आशा है, हम लोग सभी जीवन में इसको व्यवहार में लाने की चेष्टा करेंगे। इसका अभ्यास करने के लिए सारा जीवन पड़ा है, किंतु इन सब विचारों की आलोचना से हमें यह ज्ञात हुआ है कि अशांति और असंतोष के बदले हम शांति और संतोष के साथ कार्य करें; क्योंकि हमने जान लिया है कि सत्य हमारे अंदर है--वह हमारा जन्मजात अधिकार है। हमारे लिए आवश्यक है, केवल उसको प्रकाशित करना, प्रत्यक्ष बनाना और अनुभव करना।

व्यावहारिक जीवन में वेदांत

तृतीय भाग

(१७ नवंबर, १८९६ ई० को लंदन में दिया हुआ व्याख्यान)

छांदोग्य उपनिषद् में हम पढ़ते हैं कि देवर्षि नारद ने एक समय सनत्कुमार के पास आकर अनेक प्रश्न पूछे, जिनमें एक यह था कि वस्तुएँ जैसी हैं, क्या उसका कारण धर्म है ? सनत्कुमार उन्हें सोपानारोहण न्याय के अनुसार धीरे-धीरे पृथ्वी आदि तत्त्वों से ले जाते हुए अंत में आकाश तत्त्व पर जा पहुँचे। 'आकाश तेज से भी श्रेष्ठ है, कारण, आकाश में ही चंद्र, सूर्य, विद्युत, नक्षत्र आदि सभी कुछ वर्तमान हैं। आकाश में ही हम जीवन धारण करते हैं, आकाश में ही मरते हैं।' अब प्रश्न यह है कि क्या आकाश से भी कुछ श्रेष्ठ है ? सनत्कुमार ने कहा, 'प्राण आकाश से भी श्रेष्ठ है।' वेदांत मत में यह प्राण ही जीवन का मूल तत्त्व है। आकाश के समान यह भी एक सर्वव्यापी तत्त्व है, और हमारे शरीर में अथवा अन्यत्र जो भी गति दिखायी पड़ती है, वह सभी प्राण का कार्य है। प्राण आकाश से भी श्रेष्ठ है। प्राण के द्वारा ही सभी वस्तुएँ जीवित रहती हैं, प्राण माता में, प्राण पिता में, प्राण भगिनी में, प्राण आचार्य में है, और प्राण ही ज्ञाता है।

मैं इसी उपनिषद् में से एक अंश और पढ़ेगा। श्वेतकेतु अपने पिता आरुणि से सत्य के संबंध में प्रश्न करता है। पिता ने उसे अनेक विषयों की शिक्षा देकर अंत में कहा, "इन सब वस्तुओं का जो सूक्ष्म कारण है, उसीसे ये सब बनी हैं, यही सब कुछ है, यही सत्य है, हे श्वेतकेतु, तुम भी वही हो।" तदनन्तर उन्होंने अनेक उदाहरण दिए, "हे श्वेतकेतु, जिस प्रकार मधुमक्षिका विभिन्न पुष्पों से मधु संचय कर एकत्र करती है एवं ये विभिन्न मधुकण जिस प्रकार यह नहीं जानते कि वे किस वृक्ष और किस पुष्प से आए हैं, उसी प्रकार हम सब उसी सत् से आकर भी उसे भूल गए हैं। जो सब का सूक्ष्म सार-तत्त्व है, उसीमें समस्त सत्तावान् पदार्थों की आत्मा है। वही सत् है। वही आत्मा है, और हे श्वेतकेतु, तुम वही हो। जिस प्रकार विभिन्न नदियाँ समुद्र में मिल जाने के बाद नहीं जान पातीं कि वे कभी विभिन्न नदियाँ थीं, वैसे ही हम सब उसी सत्स्वरूप से आकर भी यह नहीं जानते कि हम वही हैं। हे श्वेतकेतु, तुम वही हो।" इस प्रकार पिता ने पुत्र को उपदेश दिया।

संपूर्ण ज्ञान-प्राप्ति के दो मूल सूत्र हैं। एक सूत्र तो यह है कि विशेष को सामान्य से और सामान्य को सर्वव्यापी तत्त्व की पृष्ठभूमि में जानना। दूसरा सूत्र यह है कि यदि किसी वस्तु की व्याख्या करनी हो तो, जहाँ तक हो सके, उसी वस्तु के स्वरूप से उसकी व्याख्या करना। पहले सूत्र के आधार पर हम देखते हैं कि हमारा सारा ज्ञान वास्तव में उच्च से उच्चतर होनेवाला वर्गीकरण मात्र है। जब कोई घटना अकेली घटती है, तो मानो हम असंतुष्ट रहते हैं। जब यह दिखा दिया जाता है कि वही एक घटना बार बार घटती है, तब हम संतुष्ट होते हैं और उसे 'नियम' कहते हैं। जब हम एक पत्थर या सेब को जमीन पर गिरते देखते हैं, तब हम लोग असंतुष्ट रहते हैं। किंतु जब देखते हैं कि सभी सेब गिरते हैं, तो हम उसे गुरुत्वाकर्षण का नियम कहते हैं और संतुष्ट हो जाते हैं। हम विशेष से सामान्य का अनुमान करते हैं।

धर्म का अनुशीलन करने में हमें इसी वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग करना चाहिए। वही सिद्धांत यहाँ भी लागू होता है, और तथ्य यह है कि इसी पद्धति का उपयोग सर्वदा होता आया है। इन उपनिषदों में भी, जिनका अनुवाद मैं तुमको सुनाता रहा हूँ, मुझे विशेष से सामान्य की ओर जाने का सिद्धांत सर्वप्रथम मिलता है। हम इनमें देखते हैं कि किस प्रकार देवगण क्रमशः एक ही तत्त्व में विलीन हो जाते हैं, समग्र विश्व की धारणा में भी ये प्राचीन विचार क्रमशः उच्च से उच्चतर की ओर अग्रसर होते हैं--वे सूक्ष्म तत्त्वों से सूक्ष्मतर तथा अधिक व्यापक तत्त्वों की ओर बढ़ते हैं, इन विशेषों से अंत में एक सर्वव्यापी आकाश तत्त्व प्राप्त कर लेते हैं, और वहाँ से भी आगे बढ़कर वे प्राण नामक सर्वव्यापिनी शक्ति में आ जाते हैं, और इन सभी में सर्वत्र यह सिद्धांत विद्यमान रहता है कि कोई भी वस्तु अन्य सब वस्तुओं से अलग नहीं है। आकाश ही सूक्ष्मतर रूप में प्राण है और प्राण ही स्थूल बनकर आकाश होता है तथा आकाश स्थूल से स्थूलतर हो जाता है, इत्यादि-इत्यादि।

सगुण ईश्वर का सामान्यीकरण भी इसी मूल सूत्र का एक अन्य उदाहरण है। हमने पहले ही देखा है कि सगुण ईश्वर के सामान्य भाव की प्राप्ति किस प्रकार हुई, और उसे संपूर्ण ज्ञान का समष्टि-स्वरूप समझा गया। किंतु उसमें एक शंका उठती है कि यह तो पर्याप्त सामान्यीकरण नहीं हुआ ! हमने प्राकृतिक घटनाओं की एक दिशा, अर्थात ज्ञान की दिशा लेकर यह सामान्यीकरण किया और सगुण ईश्वर तक आ पहुँचे, किंतु शेष प्रकृति तो छूट ही गई। अतएव पहले तो यह सामान्यीकरण ही अपूर्ण हुआ; दूसरे, इसमें एक और भी अधूरापन है, जिसका संबंध दूसरे सूत्र से है। प्रत्येक वस्तु की उसके स्वरूप ही से व्याख्या करनी चाहिए। एक समय लोग सोचते थे कि ज़मीन पर सेब को कोई भूत खींच लेता है, किंतु वास्तव में यह शक्ति गुरुत्वाकर्षण की है। और यद्यपि हम यह जानते हैं कि केवल यही इसकी संपूर्ण व्याख्या नहीं है, पर यह निश्चित है कि यह पहली व्याख्या से श्रेष्ठ है; कारण पहली व्याख्या वस्तु के बाहर एक कारण की स्थापना करती है, और दूसरी उसके स्वभाव से सिद्ध होती है। इस प्रकार हम लोगों के सारे ज्ञान के संबंध में जो व्याख्या वस्तु के स्वभाव से सिद्ध है, वह वैज्ञानिक है और जो व्याख्या वस्तु के बाहर स्थित कारण से सिद्ध होती है, वह अवैज्ञानिक है।

अतः जगत के सृष्टिकर्ता के रूप में सगुण ईश्वर की व्याख्या की भी परीक्षा इस सूत्र से होनी चाहिए। यदि यह ईश्वर प्रकृति के बाहर है और प्रकृति के साथ उसका कोई संबंध नहीं है तथा यदि यह प्रकृति शून्य में से, उस ईश्वर की आज्ञा से बनती है, तब तो यह मत अत्यंत अवैज्ञानिक हुआ, और यह प्रत्येक सगुण ईश्वरवादी धर्म का एक दुर्बल स्थल प्रत्येक युग में रहा है। ये दोनों दोष हमें सामान्यतया एकेश्वरवादी कहे जाने वाले सिद्धांत से मिलते हैं, इसके अनुसार सगुण ईश्वर में मनुष्य के ही सारे गुण--परिमाण में बहुत गुने--होते हैं, इस ईश्वर ने जगत की सृष्टि शन्य से अपने संकल्प द्वारा की, और वह जगत से फिर भी पृथक है। इसीसे ये दो कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं।

हम पहले ही कह चुके हैं कि एक तो यह पर्याप्त सामान्यीकरण नहीं है; दूसरे, यह वस्तु की स्वभावसिद्ध व्याख्या भी नहीं है। यह कार्य को कारण से भिन्न बताता है। किंतु मनुष्य का सारा ज्ञान यही बतलाता है कि कार्य कारण का रूपांतर मात्र है। आधुनिक विज्ञान के संपूर्ण आविष्कार इसी ओर संकेत करते हैं और सर्वत्र स्वीकृत विकासवाद का तात्पर्य भी यही है कि कार्य कारण का रूपांतर मात्र है, कारण का ही पुनर्समायोजन है और कारण ही कार्य का रूप ले लेता है। आधुनिक वैज्ञानिक तो शून्य से सृष्टि-रचना के सिद्धांत की हँसी उड़ाते हैं।

धर्म क्या पूर्वोक्त दोनों परीक्षाओं में सफल हो सकता है ? यदि कोई धार्मिक सिद्धांत इन दो परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो जाए, तो उसीको आधुनिक विचारशील मानस ग्राह्य मान सकेगा। यदि पुरोहित, चर्च अथवा किसी शास्त्र के प्रमाण के बल पर किसी मत में विश्वास करने के लिए कहा जाए, तो आजकल के लोग उसमें विश्वास नहीं कर सकते, इसका फल होगा--घोर अविश्वास। जो बाहर से देखने पर पूर्ण विश्वासी मालूम पड़ते हैं, वे अंदर से देखने पर घोर अविश्वासी निकलते हैं। शेष लोग धर्म को एकदम छोड़ देते हैं, उससे दूर भागते हैं, उसे पुरोहितों का प्रपंच मात्र समझते हैं।

धर्म भी अब एक राष्ट्रीय रूप में अपगत हो गया है। वह हमारे प्राचीन समाज का एक महान उत्तराधिकार है, अतएव उसे रहने दो।' लेकिन आज के मानव के पुरखे उसके प्रति जिस सच्ची आवश्यकता का अनुभव करते थे, वह नष्ट हो गई। लोगों को अब ग्रह बुद्धि-संगत नहीं जान पड़ता। इस प्रकार की सगुण ईश्वर और सृष्टि की धारणा, जिसे हर धर्म में एकेश्वरवाद कहते हैं, अब चल नहीं सकती। भारत में बौद्ध धर्म के प्रभाव से यह अधिक बढ़ा भी नहीं; और इसी विषय में बौद्धों ने प्राचीन काल में अपनी विजय-श्री उपलब्ध की थी। बौद्धों ने यह प्रमाणित कर दिखाया था कि यदि प्रकृति को अनंत शक्तिसंपन्न मान लिया जाए, और यदि प्रकृति अपने अभावों की पूर्ति स्वयं ही कर सकती है, तो प्रकृति के अतीत और भी कुछ है, यह मानना अनावश्यक है। आत्मा के अस्तित्व को मानने का भी कोई प्रयोजन नहीं है।

द्रव्य और गुण के विषय पर प्राचीन काल से ही वाद-विवाद चलता आ रहा है। इस समय भी वही प्राचीन अंधविश्वास चला आ रहा है। मध्यकालीन यूरोप में यहाँ तक कि, मुझे दुःख के साथ कहना पड़ता है, उसके बहुत दिनों बाद भी यही एक विशेष विचारणीय विषय था कि गुण द्रव्याश्रित है अथवा द्रव्य गुणाश्रित ? लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई क्या जड़ पदार्थ नामक द्रव्यविशेष के आश्रित हैं ? और इन गुणों के न रहने पर भी द्रव्य का अस्तित्व रहता है या नहीं ? बौद्ध लोग कहते हैं कि इस प्रकार के किसी द्रव्य का अस्तित्व स्वीकार करने का कोई प्रयोजन नहीं है, केवल इन गुणों का ही अस्तित्व है। इन गुणों के अतिरिक्त तुम और कुछ नहीं देख पाते। अधिकांश आधुनिक अज्ञेयवादियों का भी यही मत है, क्योंकि इसी द्रव्य-गुण-विचार को कुछ और ऊँचा ले जाओ तो यही विवाद व्यावहारिक और पारमार्थिक सत्ता का विवाद बन जाता है। हमारे सम्मुख यह दृश्य जगत--नित्य परिणामशील जगत है और इसीके साथ ऐसी कोई वस्तु है, जिसमें कभी परिणाम नहीं होता। कुछ लोग इन दो सत्ताओं को सत्य मानते हैं। किंतु अन्य लोग अधिक प्रमाण के साथ कहते हैं कि हमें इन दोनों पदार्थों के मानने का कोई अधिकार नही, क्योंकि हम जो कुछ देखते हैं, अनुभव करते हैं अथवा सोचते हैं, वह केवल दृश्य जगत है। दृश्य के अतिरिक्त अन्य किसी भी पदार्थ के मानने का तुम्हें अधिकार नहीं। इस तर्क का उत्तर कोई भी नहीं है। केवल वेदांत का अद्वैतवाद ही हमें इसका उत्तर देता है। यह सत्य है कि एक ही वस्तु का अस्तित्व है और वह या तो पारमार्थिक है, या व्यावहारिक। वह दृश्य के रूप में प्रकाशित होती है। यह कहना ठीक नहीं कि सत्ताएँ दो हैं--एक परिणामशील वस्तु, और उसी के अंदर अपरिणामी वस्तु। वरन् वही एक वस्तु है; जो परिणामशील प्रतीत होती है, लेकिन वास्तव में अपरिणामी है।

हम लोग देह, मन, आत्मा आदि को अनेक मान लेते हैं, किंतु वास्तव में सत्ता एक ही है। वह एक ही वस्तु इन सब विविध रूपों में प्रतीत होती है। अद्वैतवादियों की चिरपरिचित उपमा रज्जु के ही सर्पाकार प्रतीत होने की लो। अन्धेरे से अथवा अन्य किसी कारणवश लोग रस्सी को ही साँप समझ लेते हैं, किंतु ज्ञानोदय होने पर सर्प-भ्रम नष्ट हो जाता है और केवल रस्सी ही दिखायी पड़ती है। इस उदाहरण द्वारा हम यह भली-भाँति समझ सकते हैं कि मन में जब सर्पज्ञान रहता है, तब रज्जुज्ञान नहीं रहता और जब रज्जुज्ञान रहता है, तब सर्पज्ञान नहीं टिकता। जब हम व्यावहारिक सत्ता देखते हैं, तब पारमार्थिक सत्ता नहीं रहती और जब हम उस अपरिणामी पारमार्थिक सत्ता को देखते हैं, तो निश्चय ही फिर व्यावहारिक सत्ता प्रतीत नहीं होती। अब हम प्रत्यक्षवादी और विज्ञानवादी (idealist)--इन दोनों के मत खूब स्पष्ट रूप से समझ रहे हैं। प्रत्यक्षवादी केवल व्यावहारिक सत्ता देखता है और विज्ञानवादी पारमार्थिक सत्ता देखने की चेष्टा करता है। प्रकृत विज्ञानवादियों के लिए, जो अपरिणामी सत्ता का अपरोक्ष ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं, फिर परिणामशील जगत का अस्तित्व नहीं रह जाता। उन्हीं को यह कहने का अधिकार है कि समस्त जगत मिथ्या है और परिणाम नामक कोई चीज नहीं है। किंतु प्रत्यक्षवादी केवल परिणामशील की ओर ही दृष्टि रखते हैं। उनके लिए अपरिणामी सत्ता नाम की कोई वस्तु है ही नहीं, अतएव उन्हें जगत को सत्य कहने का अधिकार है।

इस विचार का फल क्या हुआ ? फल यही हुआ कि ईश्वर के विषय में सगुण धारणा करना ही पर्याप्त नहीं। हम लोगों की और भी उच्चतर धारणा अर्थात निर्गुण की धारणा करनी चाहिए। यही तर्कसंगत सोपान है, जिस पर हम आगे बढ़ सकते हैं। उसके द्वारा सगुण धारणा नष्ट हो जाएगी, ऐसी बात नहीं। हमने यह नहीं प्रमाणित किया कि सगुण ईश्वर नहीं है, वरन् हमने यही दिखाया है कि सगुण की व्याख्या के लिए हमें निर्गुण को स्वीकार करना ही पड़ेगा, क्योंकि निर्गुण सगुण की अपेक्षा अधिक व्यापक-सामान्य है। केवल निर्गुण ही असीम हो सकता है, सगुण ससीम है। इस प्रकार हम सगुण को सुरक्षित रखते हैं, उसे नष्ट नहीं करते। बहुधा हमें यह शंका होती है कि निर्गुण ईश्वर मानने पर सगुण भाव नष्ट हो जाएगा, निर्गुण जीवात्मा मानने पर सगुण जीवात्मा का भाव नष्ट हो जाएगा। किंतु वेदांत से वास्तव में व्यक्ति का विनाश न होकर उसकी सच्ची रक्षा होती है। हम उस अनंत सामान्य से संबंध जोड़े बिना, यह सिद्ध किए बिना कि यह व्यक्ति वस्तुतः अनंत है, व्यक्ति के अस्तित्व को किसी प्रकार भी प्रमाणित नहीं कर सकते। यदि हम व्यक्ति को संपूर्ण जगत से पृथक मानकर सोचने की चेष्टा करें, तो उसकी स्थिति क्षण भर के लिए भी नहीं हो सकती। ऐसी कोई वस्तु कभी हुई ही नहीं।

दूसरी बात यह है कि पूर्वोक्त द्वितीय तत्त्व के फलस्वरूप हम और भी साहसिक और दुर्बोध्य तत्त्व-विचार में पड़ जाते हैं। और वह इससे किंचित भी कम नहीं है कि यदि समस्त वस्तुओं की व्याख्या उनके स्वरूप से की जाए, तो यही निष्कर्ष निकलता है कि वही निर्गुण पुरुष--हमारा सर्वोच्च सामान्य--हम लोगों के अंदर ही है और वास्तव में हम वही हैं। हे श्वेतकेतो, तत्त्वमसि--तुम वही हो। तुम्हीं वह निर्गुण पुरुष हो, तुम्हीं वह ईश्वर हो, जिसे तुम समस्त जगत में ढूँढ़ते फिरे हो, तुम स्वयं हो। किंतु 'तुम' यहाँ 'व्यक्ति' के अर्थ में नहीं, वरन् निर्गुण के अर्थ में प्रयुक्त है। जिस मनुष्य को हम जानते हैं, जिसे हम व्यक्त देख रहे हैं, वह व्यष्टीकृत है, किंतु उसकी वास्तविकता निर्गुण है। इस सगुण को हमें निर्गुण के द्वारा समझना होगा, विशेष को सामान्य के द्वारा जानना होगा। वह निर्गुण सत्ता ही सत्य है--वही मनुष्य की आत्मा है।

इस संबंध में अनेक प्रश्न उठेंगे। मैं क्रमशः उनका उत्तर देने की चेष्टा करूँगा। बहुत सी कठिनाइयाँ भी उठेगी, किंतु उनकी मीमांसा करने के पहले, आओ, हम अद्वैतवाद की स्थिति समझ लेने का प्रयत्न करें। अद्वैतवाद कहता है कि व्यक्त जीवरूप में हम मानो अलग अलग होकर रहते हैं, किंतु वास्तव में हम सब एक ही सत्यस्वरूप हैं, और हम अपने को उससे जितना कम पृथक समझेंगे उतना ही हमारा कल्याण होगा। इसके विपरीत हम लोग इस समष्टि से अपने को जितना अलग समझते हैं, उतना ही दुःखी होते हैं। इसी अद्वैतवादी सिद्धांत से हमें नैतिकता का आधार मिलता है, और मेरा यह दावा है कि और किसी मत से हमें कोई भी नैतिकता नहीं मिलती। हम जानते हैं कि नैतिकता की सबसे पुरानी धारणा यह थी कि किसी पुरुषविशेष अथवा कुछ विशिष्ट पुरुषों की जो इच्छा हो, वही नैतिकता है। अब इसे मानने को कोई भी तैयार नहीं; क्योंकि वह आंशिक व्याख्या मात्र है। हिंदू कहते हैं, अमुक कार्य करना ठीक नहीं, क्योंकि वेदों में उसका निषेध है, किंतु ईसाई वेदों का प्रमाण क्यों मानेंगे ? ईसाई लोग कहते हैं, यह मत करो, वह मत करो, क्योंकि बाइबिल में यह सब करना मना है। जो बाइबिल नहीं मानते, वे इसका अनुसरण करने के लिए बाध्य नहीं हैं। अतः हम लोगों को एक ऐसा तत्त्व खोजना पड़ेगा, जो इन अनेक प्रकार के भावों का समन्वय कर सके। जैसे लाखों व्यक्ति सगुण सृष्टिकर्ता में विश्वास करने को तैयार हैं, वैसे ही इस दुनिया में हजारों ऐसे प्रतिभाशाली व्यक्ति भी हैं, जिन्हें ये सब धारणाएँ पर्याप्त नहीं जान पड़तीं, वे इससे कुछ ऊँची वस्तु चाहते हैं; और जब जब धर्म इन मनीषियों को अपने में समाहित कर सकने की सीमा तक उदार नहीं रहा, तब तब समाज के ये उज्ज्वलतम रत्न धर्म के बाहर ही रहे। और आज प्रधानतः यूरोप में यह जितना स्पष्ट देखा जाता है, उतना और कहीं भी नहीं।

इन प्रतिभाशाली व्यक्तियों को अपने में रखने के लिए धर्म का उदार भावा पन्न होना अत्यंत आवश्यक है। धर्म जो भी दावा करता है, तर्क की कसौटी पर उन सबकी परीक्षा करना आवश्यक है। धर्म यह दावा क्यों करता है कि वह तर्क द्वारा परीक्षित होना नहीं चाहता; यह कोई नहीं बतला सकता। तर्क के मानदंड के बिना किसी भी प्रकार का यथार्थ निर्णय--धर्म के संबंध में भी--नहीं दिया जा सकता। धर्म कुछ वीभत्स करने की आज्ञा दे सकता है। जैसे, इस्लाम मुसलमानों को विधर्मियों की हत्या करने की आज्ञा देता है। कुरान में स्पष्ट लिखा है, 'यदि विधर्मी इस्लाम ग्रहण न करें, तो उन्हें मार डालो। उन्हें तलवार और आग के घाट उतार दो।' अब यदि हम किसी मुसलमान से कहें कि यह ग़लत है, तो वह स्वभावतः पूछेगा, "तुम कैसे जानते हो कि यह अच्छा है या बुरा ? हमारा शास्त्र कहता है कि यह सत्कार्य है।" यदि तुम कहो कि हमारा शास्त्र प्राचीन है, तो बौद्ध लोग कहेंगे कि उनका शास्त्र तुम्हारे से भी पुराना है और हिंदू कहेंगे कि उनका शास्त्र सभी की अपेक्षा प्राचीनतम है। अतएव शास्त्र की दुहाई देने से काम नहीं चल सकता। वह प्रतिमान कहाँ है, जिससे तुम अन्य सबकी तुलना कर सको ? तुम कहोगे, ईसा का 'शैलोपदेश' देखो; मुसलमान कहेंगे, 'कुरान का नीतिशास्त्र' देखो। मुसलमान कहेंगे, इन दोनों में कौन श्रेष्ठ है, इसका निर्णय कौन करेगा, कौन मध्यस्थ बनेगा ? बाइबिल और कुरान में जब विवाद हो, तो यह निश्चय है कि उन दोनों में से तो कोई मध्यस्थ नहीं बन सकता। कोई स्वतंत्र व्यक्ति उनका मध्यस्थ हो तो अच्छा हो। यह कार्य किसी ग्रंथ द्वारा नहीं हो सकता, किसी सार्वभौमिक तत्त्व द्वारा ही हो सकता है। बुद्धि से अधिक सार्वभौमिक पदार्थ और कोई नहीं है। कहा जाता है, बुद्धि पर्याप्त शक्ति-संपन्न नहीं है, इससे सत्य की प्राप्ति में सदैव सहायता नहीं मिलती। प्रायः वह भूलें करती है, अतः हमें किसी न किसी धर्मसंघ की प्रामाणिकता में विश्वास करना चाहिए। ऐसा मुझसे एक बार एक रोमन कैथलिक ने कहा था। किंतु मेरी समझ में यह युक्ति नहीं आयी। मैं कहूँगा कि यदि बुद्धि दुर्बल है, तो पुरोहित-संप्रदाय और भी दुर्बल होंगे। मैं उन लोगों की बात सुनने की अपेक्षा बुद्धि की बात सुनना अधिक पसंद करूँगा, क्योंकि, बुद्धि में चाहे जितना दोष क्यों न हो, उससे कुछ न कुछ सत्यलाभ की संभावना तो है, किंतु दूसरी ओर तो किसी सत्य को पाने की आशा ही नहीं है।

अतएव हम लोगों को बुद्धि का अनुसरण करना चाहिए और उन लोगों से सहानुभूति करना चाहिए, जो बुद्धि का अनुसरण कर किसी विश्वास को अपना नहीं पाते। आप्त वचनों के आधार पर अंधों की तरह बीस लाख देवताओं में विश्वास करने की अपेक्षा बुद्धि का अनुसरण करके नास्तिक होना अच्छा है। हम चाहते हैं उन्नति, विकास और सत्य का साक्षात्कार। किसी मत का अवलंबन करके ही मनुष्य आज तक कभी ऊँचा नहीं उठा। करोड़ों शास्त्र भी हम लोगों को पवित्र करने में सहायता नहीं कर सकते। कर सकने की शक्ति एकमात्र सत्य के साक्षात्कार में है, जो स्वयं हमारे भीतर है, और उसकी प्राप्ति विचार से होती है। मनुष्य विचार करे। मिट्टी का ढेला कभी विचार नहीं कर सकता, वह सदा मिट्टी का ढेला ही रह जाता है। मनुष्य की गरिमा उसकी विचारशीलता के कारण है, पशुओं से हम इसी बात में भिन्न हैं। मैं बुद्धि में विश्वास करता हूँ और बुद्धि का ही अनुसरण करता हूँ। केवल आप्त वचनों में विश्वास करने से क्या अनिष्ट होता है, यह मैं विशेष रूप से देख चुका हूँ, क्योंकि मैं जिस देश में पैदा हुआ हूँ, वहाँ आप्त वचनों में विश्वास करने की पराकाष्ठा है।

हिंदू लोग विश्वास करते हैं कि वेदों से सृष्टि हुई है। उदाहरणार्थ एक गाय है, यह कैसे जाना ? उत्तर है, 'गो' शब्द वेद में है, इसलिए। इसी प्रकार मनुष्य है, यह कैसे जाना ? उत्तर आता है कि वेदों में 'मनुष्य' शब्द आया है। यदि यह शब्द उनमें न होता, तो बाहर मनुष्य भी नहीं होता। वे यही कहते हैं। आप्त वचनों में विश्वास की पराकाष्ठा ! मैंने इसका जिस प्रकार अध्ययन किया है, उस प्रकार इसका अध्ययन नहीं होता। कुछ परम तीक्ष्ण बुद्धि व्यक्तियों ने इसको लेकर कुछ अपूर्व दार्शनिक सिद्धांतों का जाल उसके आसपास बुन डाला है। उन्होंने उसके लिए युक्तियाँ दी हैं और वह एक परिपूर्ण दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित है, और हज़ारों वर्षों से हज़ारों प्रखर बुद्धि विद्वान् इस सिद्धांत की पुष्टि में लगे रहे हैं। आप्त वचनों में विश्वास में जितनी शक्ति है उसमें खतरा भी उतना ही है। वह मनुष्य जाति की उन्नति रोक देता है। और हम लोगों को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि उन्नति करना ही हमारा लक्ष्य है। संपूर्ण आपेक्षिक सत्यानुसंधान में भी सत्य की अपेक्षा हमारे मन की क्रियाशीलता ही अधिक आवश्यक है। वहीं हमारा जीवन है।

अद्वैत मत में यही गुण है कि सभी संभाव्य धार्मिक परिकल्पनाओं में वह सर्वाधिक बुद्धिसंगत है। अन्य सब परिकल्पनाएँ--ईश्वर की आंशिक और सगुण धारणाएँ युक्तियुक्त नहीं हैं। तथापि उसको यह गौरव प्राप्त है कि वह इन आंशिक धारणाओं को बहुतों के लिए आवश्यक स्वीकार करता है। अनेक लोग कहते रहते हैं कि यह सगुणवाद अबौद्धिक है। किंतु वह है बड़ा सांत्वनादायक। लोगों को धर्म तो सांत्वना देनेवाला चाहिए, और हम लोग भी समझ सकते हैं कि उनके लिए इसकी जरूरत है। बहुत कम लोग सत्य का निर्मल प्रकाश सहन कर सकते हैं, उसके अनुसार जीवन बिताना तो बहुत दूर की बात है। अतएव इस सांत्वना देनेवाले धर्म की भी आवश्यकता है; समय आने पर यही बहुतों को उच्चतर धर्मलाभ में सहायता करता है। उन अल्पबुद्धि लोगों के निर्माण के लिए, जिनका विचार-क्षेत्र अत्यंत संकुचित है, और जो विचार-जगत में ऊँची उड़ानें भरने का साहस नहीं कर सकते, ऐसी छोटी-छोटी वस्तुएँ आवश्यक हैं। उन लोगों के लिए छोटे-छोटे देवताओं और प्रतीकों की धारणाएँ उत्तम और उपकारी हैं। किंतु तुम्हें निर्गुणवाद भी समझना होगा, क्योंकि इस निर्गुणवाद के आलोक में ही अन्य सिद्धांतों को समझा जा सकता है। सगुणवाद को ही उदाहरणस्वरूप लो। जॉन स्टुअर्ट मिल ईश्वर का निर्गुणवाद समझते हैं और उसमें विश्वास भी करते हैं--वे कहते हैं, सगुण ईश्वर को प्रमाणित नहीं किया जा सकता, वह असंभव है। मैं इस विषय में उनके साथ एकमत हूँ; फिर भी, मैं कहता हूँ कि मनुष्य-बुद्धि से निर्गुण की जितनी दूर तक धारणा की जा सके, वही सगुण ईश्वर है। और वास्तव में निगुण की इन विभिन्न धारणाओं के सिवा यह जगत है ही क्या ? वह मानो हम लोगों के सामने एक खुली पुस्तक है, और प्रत्येक व्यक्ति अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार उसका पाठ कर रहा है और प्रत्येक को स्वयं ही उसका पाठ करना पड़ता है। सभी मनुष्यों की बुद्धि में कुछ बातें समान हैं; इसीलिए मानवता की बुद्धि को कुछ वस्तुएँ एकरूप सी जान पड़ती हैं। हम तुम दोनों ही एक कुर्सी देख रहे हैं। इससे यह प्रमाणित होता है कि हम दोनों के मन में कोई एक व्यापक घटक है। मान लो, दूसरे प्रकार की इंद्रियोंवाला कोई प्राणी आ जाए, वह हम लोगों की अनुभूत कुर्सी नहीं देखेगा, किंतु जितने लोग एक ही प्रकार संरचित हैं, वे सब उन्हीं वस्तुओं को देखेंगे। अतएव स्वयं यह जगत ही निरपेक्ष अपरिणामी पारमार्थिक सत्ता है, और व्यावहारिक सत्ता केवल उसके देखे हुए विविध रूप हैं। इसका कारण, पहले तो यह है कि व्यावहारिक सत्ता सदा ससीम होती है। हम जानते हैं कि हम जिस भी व्यावहारिक सत्ता को देखते, अनुभव करते अथवा विचार करते हैं, वह हमारे ज्ञान के द्वारा सीमित होती है, और सगुण ईश्वर के संबंध में हमारी जैसी धारणा है, उससे वह ईश्वर भी व्यावहारिक मात्र है। कार्य-कारण भाव केवल व्यावहारिक जगत में ही संभव है और ईश्वर को जब मैं जगत का कारण मानता हूँ, तो अवश्य ही उसे ससीम जैसा मानना पड़ेगा। किंतु फिर भी वह वही निर्गुण ब्रह्म है। हम लोगों ने पहले ही देखा है कि यह जगत भी हमारी बुद्धि द्वारा देखा गया

वही निर्गुण ब्रह्म मात्र है। यथार्थ में जगत वही निर्गुण पुरुष मात्र है और हम लोगों की बुद्धि द्वारा उसको नाम-रूप दिए गए हैं। इस मेज में जितना सत्य है, वह वही सत् है और इस मेज की आकृति तथा जो कुछ अन्य बातें हैं, वे सब समान मानव-बुद्धि द्वारा ऊपर से जोड़ी गई हैं।

उदाहरणस्वरूप गति का विषय लो। व्यावहारिक सत्ता की वह नित्य सहचरी है। किंतु वह सार्वभौमिक, पारमार्थिक सत्ता के विषय में प्रयुक्त नहीं हो सकती। प्रत्येक क्षुद्र कण, जगत के अंतर्गत प्रत्येक परमाणु, सदैव ही परिवर्तनशील तथा गतिशील है, किंतु समष्टि रूप से जगत पदार्थ अपरिणामी है, क्योंकि गति या परिणाम सापेक्षिक पदार्थ मात्र हैं। केवल गतिहीन पदार्थ के साथ तुलना करने पर ही हम गतिशील पदार्थ की बात सोच सकते हैं। गति समझने के लिए दोनों ही पदार्थ आवश्यक हैं। संपूर्ण जगत की समष्टि एक इकाई के रूप में गतिशील नहीं हो सकती। किसके साथ वह गतिशील होगी ? उसमें परिवर्तन होता है, यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि किसकी तुलना में उसका परिणाम हो सकेगा ? अतएव वह समष्टि निरपेक्ष सत्ता ही है, किंतु उसके भीतर का प्रत्येक अणु निरंतर गतिशील और परिवर्तनशील है। वह परिणामी और साथ ही साथ अपरिणामी है, सगुण है और निर्गुण भी है। जगत, गति एवं ईश्वर के संबंध में हम लोगों की यही धारणा है, और तत्त्वमसि का भी यही अर्थ है। इस प्रकार हम देखते हैं कि निर्गुण सगुण को उच्छिन्न करने, निरपेक्ष सापेक्ष को नष्ट करने के स्थान पर, हमारे हृदय और मस्तिष्क को पूर्ण संतोष प्रदान करनेवाली उसकी व्याख्या मात्र करता है। सगुण ईश्वर तथा इस विश्व में जो कुछ है, सब हमारे मन के द्वारा उपलब्ध निर्गुण सत् ही है। अपने मन एवं तुच्छ व्यक्तित्व से रहित होने पर हम उस सत् के साथ एक हो जाएंगे। तस्वमसि का यही अर्थ है। हमें अपना सच्चा स्वरूप--ब्रह्म--जानना है।

ससीम, व्यक्ति मनुष्य अपना उत्पत्ति-स्थल भूल जाता है, और अपने को नितांत पृथक समझने लगता है। व्यष्टीकृत और विभेदीकृत सत्ताओं के रूप में हम अपना स्वरूप भूल जाते हैं। अतः अद्वैतवाद हमें विभेदीकरण को त्याग देने की शिक्षा नहीं देता, वरन् उसके रूप को समझ लेने को कहता है। हम वस्तुतः वही अनंत पुरुष हैं, हमारे व्यक्तित्व जल की उन धाराओं के सदृश हैं, जिनमें वह अनंत सत्ता अपने को अभिव्यक्त कर रही है, और यह समग्र परिवर्तन-समष्टि, जिसे हम 'क्रमविकास' कहते हैं, अपनी अनंत शक्ति को व्यक्त करने में सचेष्ट, आत्मा के द्वारा संपादित होती है। किंतु हम अनंत के इस पार कहीं रुक नहीं सकते; हमारे आनंद और ज्ञान एवं शक्ति को अनंत होना ही है। अनंत सत्ता, अनंत शक्ति, अनंत आनंद हमारे हैं। हम लोगों को उन्हें उपार्जित नहीं करना है, वे सब हममें हैं, हमें तो उन्हें केवल प्रकाशित मात्र करना है।

अद्वैतवाद से यही एक महासत्य प्राप्त होता है और इसको समझना बहुत कठिन है। मैं बचपन से देखता आ रहा हूँ कि सभी दुर्बलता की शिक्षा देते रहे हैं, जन्म से ही मैं सुनता आ रहा हूँ कि मैं दुर्बल हूँ। अब मेरे लिए अपने भीतर निहित शक्ति का ज्ञान कठिन हो गया है, किंतु विश्लेषण और विचार द्वारा अपनी शक्ति का ज्ञान होता है, और फिर मैं उसे प्राप्त कर लेता हूँ। इस संसार में जितना भी ज्ञान है, वह कहाँ से आया ? वह ज्ञान हमारे भीतर ही है। क्या बाहर कोई ज्ञान है ? नहीं। ज्ञान कभी जड़ में नहीं था, वह सदा मनुष्य के भीतर ही था। किसी ने कभी भी ज्ञान की सृष्टि नहीं की। मनुष्य उसको भीतर से बाहर लाता है। वह वहीं वर्तमान है। यह जो एक कोस तक फैला हुआ विशाल वटवृक्ष है, वह सरसों के बीज के अष्टमांश के समान उस छोटे से बीज में ही था। उसी बीज में ऊर्जा की वह विपुल राशि सन्निहित थी। हम जानते हैं कि एक जीवाणु-कोष के भीतर विराट् बुद्धि अप्रकट रूप में विद्यमान है; फिर अनंत शक्ति उसमें क्यों न रह सकेगी ? हम जानते हैं यह सत्य है। विरोधाभासी लगने पर भी यह सत्य है। हम सभी एक जीवाणु कोष से उत्पन्न हुए हैं और हम लोगों में जो कुछ भी शक्ति है, वह उसी में कुंडलीरूप में बैठी थी। तुम लोग यह नहीं कह सकते कि वह खाद्य में से आयी है ; ढेर की ढेर खाद्य सामग्री लेकर एक पर्वत बना डालो, किंतु देखोगे उसमें से कोई शक्ति नहीं निकलती। हम लोगों के भीतर शक्ति पहले से ही अव्यक्त भाव में निहित थी, और वह थी अवश्य। इसी प्रकार मनुष्य की आत्मा के भीतर अनंत शक्ति भरी पड़ी है, मनुष्य को उसका ज्ञान हो या न हो। उसे केवल जानने की ही अपेक्षा है। धीरे धीरे मानो वह अनंत शक्तिमान दैत्य जाग्रत होकर अपनी शक्ति का ज्ञान प्राप्त कर रहा है और जैसे जैसे वह सचेतन होता जाता है, वैसे वैसे एक के बाद एक उसके बंधन टूटते जाते हैं, श्रृंखलाएँ छिन्न-भिन्न होती जाती हैं; और वह दिन अवश्य ही आयगा, जब वह अपनी अनंत शक्ति के पूर्ण ज्ञान के साथ अपने पैरों पर उठ खड़ा होगा। आओ, हम सब लोग उस महिमामयी निष्पत्ति को शीघ्र लाने में सहायता करें।

व्यावहारिक जीवन में वेदांत

चतुर्थ भाग

(१८ नवंबर, १८९६ ई० को लंदन में दिया हुआ व्याख्यान)

हमने अभी तक समष्टि या सामान्य पर ही अधिक विचार किया है। इस प्रातःकाल मैं तुम लोगों के सम्मुख व्यष्टि या विशेष के साथ समष्टि के संबंध पर वेदांत का मत प्रस्तुत करने का प्रयत्न करूँगा। जैसा हम देख चुके हैं, वेदों के दर्शन के द्वैतवादी प्रारम्भिक रूपों में प्रत्येक जीव की एक निर्दिष्ट सीमाविशिष्ट आत्मा स्वीकार की गई है। प्रत्येक जीव में अवस्थित इस विशेष आत्मा के संबंध में अनेक प्रकार के मतवाद प्रचलित हैं। किंतु प्राचीन बौद्धों और प्राचीन वेदांतियों के मध्य ही इस विषय पर प्रमुख विवाद चला। प्राचीन वेदांती एक स्वयं में पूर्ण जीवात्मा मानते थे, और बौद्ध लोग इस प्रकार के जीवात्मा के अस्तित्व को नितांत अस्वीकृत करते थे। जैसा मैंने कल कहा था, यूरोप में भी ठीक ऐसा ही विवाद द्रव्य और गुण पर चल रहा है। एक दल यह मानता है कि गुणों के पीछे द्रव्य रूप कोई वस्तु है जिस पर गुण आधारित हैं और दूसरे दल के मत में द्रव्य को मानने की कोई आवश्यकता नहीं है, गुण स्वयं ही रह सकते हैं। आत्मा के संबंध में सबसे प्राचीन मत 'अहं-सारूप्य'-गत युक्ति के ऊपर स्थापित है। 'अहं-सारूप्य' युक्ति का अर्थ है: कल का 'मैं' ही आज का 'मैं' है और आज का 'मैं' आगामी कल का 'मैं' रहेगा। शरीर में जो भी परिवर्तन हो, मैं विश्वास करता हूँ कि मैं वही 'मैं' हूँ। जान पड़ता है कि जो सीमित, पर स्वयंपूर्ण जीवात्मा मानते थे, उनकी प्रधान युक्ति यही थी।

दूसरी ओर प्राचीन बौद्ध ऐसी जीवात्मा मानने की कोई आवश्यकता नहीं समझते थे। उनकी यह युक्ति थी कि हम केवल इन परिवर्तनों को ही जानते हैं एवं इन परिवर्तनों के अतिरिक्त और कुछ भी जानना हम लोगों के लिए असंभव है। एक अपरिवर्तनीय और अपरिवर्तनशील द्रव्य को स्वीकार करना अनावश्यक है और वास्तव में यदि इस प्रकार की कोई अपरिणामी वस्तु हो भी, तो हम उसे कभी समझ नहीं सकेंगे और न उसे किसी भी तरह प्रत्यक्ष ही कर सकेंगे। आजकल यूरोप में भी एक ओर धर्म और विज्ञानवादियों (idealist) तथा दूसरी ओर आधुनिक प्रत्यक्षवादी (realist), अज्ञेयवादी (agnostic) तथा भाववादी ( positivist) विचारकों में यही विवाद चल रहा है। एक दल का विश्वास है कि कुछ अपरिवर्तनशील पदार्थ है (हर्बर्ट स्पेन्सर इसके नवीनतम प्रतिनिधि हैं) और हमें मानो किसी अपरिणामी पदार्थ का आभास होता है। दूसरे दल के प्रतिनिधि हैं काँते (Comte) के आधुनिक शिष्य तथा आधुनिक अज्ञेयवादी। तुम लोगों में से जिन व्यक्तियों ने कुछ साल पहले फ्रेडरिक हैरिसन और हर्बर्ट स्पेंसर के बीच का वाद-विवाद ध्यानपूर्वक पढ़ा होगा, वे लोग जानते होंगे कि इसमें भी यही कठिनाई मौजूद है। एक पक्ष कहता है कि हम बिना किसी अपरिणामी या अपरिवर्तनशील सत्ता की कल्पना किए परिणाम या परिवर्तन की कल्पना ही नहीं कर सकते। दूसरा पक्ष यह युक्ति पेश करता है कि ऐसा मानने की कोई जरूरत नहीं, हम केवल परिणामशील पदार्थ की ही धारणा कर सकते हैं, और जहाँ तक अपरिणामी सत्ता की बात है, उसे न हम समझ सकते हैं और न अनुभव या प्रत्यक्ष ही कर सकते हैं।

भारत में इस महान समस्या का समाधान अतीव प्राचीन काल में नहीं मिला था, क्योंकि हमने देखा है कि गुणों के पीछे अवस्थित, गुणों से भिन्न पदार्थ की सत्ता कभी प्रमाणित नहीं की जा सकती। केवल यही नहीं, आत्मा के अस्तित्व का 'अहं-सारूप्य'-गत प्रमाण, स्मृति से आत्मा के अस्तित्व संबधी युक्ति--कल जो 'मैं' था, आज भी 'मैं' वही हूँ, क्योंकि मुझे यह स्मरण है, अतएव मैं सतत रहनेवाला 'कुछ' हूँ,--यह युक्ति सिद्ध नहीं की जा सकती। और एक युक्ति का आभास, जो साधारणत: दर्शाया जाता है, वह भी केवल शब्दों का जोड़-तोड़ है। 'मैं जाता हूँ', 'मैं खाता हूँ', 'मैं स्वप्न देखता हूँ', 'मैं सो रहा हूँ', 'मैं चलता हूँ' आदि कितने ही वाक्य लेकर वे कहते हैं कि करना, खाना, जाना, स्वप्न देखना, ये सब विभिन्न परिवर्तन भले ही हों, किंतु उनके बीच में "मैं-पन' नित्य भाव से वर्तमान है और इस प्रकार वे इस सिद्धांत पर पहुँचते हैं कि यह 'मैं' नित्य और स्वयं एक व्यक्ति है तथा ये सब परिवर्तन शरीर के धर्म हैं। यह युक्ति सुनने में खूब उपादेय तथा स्पष्ट जान पड़ती है, किंतु वास्तव में यह केवल शब्दों का खेल है। यह 'मैं' और करना, जाना, स्वप्न देखना आदि लिखने में भले ही अलग लगें, किंतु मन में कोई भी उन्हें अलग नहीं कर सकता।

जब मैं खाता हूँ, तो खाते हुए रूप में अपना विचार करता हूँ। तब खाने की क्रिया के साथ मेरा तादात्म्य हो जाता है। जब मैं दौड़ता रहता हूँ, तब मैं और दौड़ना, ये दो अलग-अलग बातें नहीं होती। अतएव व्यक्तिगत तादात्म्य पर आधारित यह युक्ति कुछ अधिक सबल नहीं जान पड़ती। स्मृतिवाला दूसरा तर्क भी निर्बल है। यदि मेरे अस्तित्व का सारूप्य मुझे अपनी स्मृति द्वारा प्रमाणित करना पड़े, तो अपनी जो सब अवस्थाएँ मैं भूल गया हूँ, उनमें मैं था ही नहीं, यह मानना पड़ेगा। और हम यह भी जानते हैं कि कुछ विशेष अवस्थाओं में अनेक लोग पिछला अपना सब कुछ पूर्ण रूप से भूल जाते हैं। अनेक पागल व्यक्ति अपने को काँच निर्मित अथवा कोई पशु मानते देखे जाते हैं। यदि केवल स्मति पर ही उस व्यक्ति का अस्तित्व निर्भर होता है, तो वह काँच हो गया, यही मानना पड़ेगा। किंतु वास्तव में ऐसा नहीं होता, अतः यह अहं-सारूप्य स्मृति जैसी नगण्य युक्ति पर आधारित नहीं हो सकता। तब क्या निष्कर्ष निकला ? यही कि ससीम तथापि संपूर्ण और अविच्छिन्न तादात्म्य गुण समूह से पृथक रूप में स्थापित नहीं हो सकता। हम ऐसी कोई संकीर्ण सीमाबद्ध सत्ता नहीं सिद्ध कर सकते, जिसके साथ गुणों का एक गुच्छ संयुक्त हो।

दूसरे पक्ष में प्राचीन बौद्धों का यह मत कि गुणसमूह के पीछे अवस्थित किसी वस्तु के विषय में हम न कुछ जानते हैं और न जान सकते हैं, अधिक दृढ़ भित्ति पर स्थापित जान पड़ता है। उनके मतानुसार संवेदनाओं और भावनाओं आदि कुछ गुणों का संघात ही आत्मा है। यह गुणराशि ही आत्मा है और वह निरंतर परिवर्तित होती रहती है।

अद्वैत द्वारा इन दोनों मतों में सामंजस्य होता है। अद्वैतवाद का सिद्धांत यह है कि हम वस्तु को गुण से अलग नहीं मान सकते, यह सत्य है। हम परिणाम और अपरिणाम दोनों को एक साथ नहीं सोच सकते। इस प्रकार सोचना भी असंभव है। किंतु जिसे द्रव्य कहा जाता है, वही गुणस्वरूप है। द्रव्य और गुण पृथक नहीं हैं। अपरिणामी वस्तु ही परिणाम-रूप में प्रतीत होती है : यह अपरिणामी सत्ता परिणामी जगत से पृथक नहीं है। पारमार्थिक सत्ता व्यावहारिक सत्ता से पूर्णतया पृथक वस्तु नहीं है, किंतु यह पारमार्थिक सत्ता ही व्यावहारिक सत्ता बन जाती है। अपरिणामी आत्मा है, और हम जिसे अनुभूति, भाव आदि कहते हैं, केवल ये ही नहीं, अपितु यह शरीर भी एक अन्य दृष्टिकोण से देखी हुई वही आत्मा है। हम लोगों के शरीर हैं, आत्मा हैं आदि, इस प्रकार सोचने का हमें अभ्यास हो गया है, किंतु वास्तव में केवल एक ही सत्ता है।

जब मैं अपने को 'शरीर' सोचता है, तब मैं केवल शरीर हँ; मैं इसके अतिरिक्त और कुछ हूँ, यह कहना बेकार की बात है। जब मैं अपने को आत्मा मानता हूँ, तब देह तो कहीं उड़ जाती है, देहानुभूति ही नहीं रहती। देह-ज्ञान लुप्त हुए बिना कभी आत्मानुभूति होती ही नहीं। गुण की अनुभूति लुप्त न होने तक द्रव्य का अनुभव कभी किसी को नहीं हो सकता।

इसको और अधिक अच्छी तरह समझने के लिए अद्वैतवादियों का रज्जु-सर्प का उदाहरण लिया जा सकता है। जब मनुष्य रस्सी को साँप समझकर भूल करता है, तब उसके लिए रस्सी नहीं रहती और जब वह उसे वास्तविक रस्सी समझता है, तब उसका सर्प-ज्ञान नष्ट हो जाता है और केवल रस्सी ही बच रहती है। अपूर्ण सामग्री के आधार पर विचार करने के कारण हमें द्वित्व या त्रित्व की अनुभूति होती है। ये सब बातें हम पुस्तकों में पढ़ते अथवा सुनते आते हैं, और अंततः हम इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि मानो सचमुच ही हमें आत्मा और देह का द्वैध अनुभव हो रहा है, किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। एक समय में या तो केवल देह का ही अनुभव होता है या आत्मा का ही। इसको प्रमाणित करने के लिए किसी युक्ति की जरूरत नहीं। अपने मन से ही तुम इसका सत्यापन कर सकते हो।

तुम अपने को आत्मा या कुछ देहरहित मानकर सोचने का प्रयत्न करो, तो प्रतीत होगा कि यह असंभव सा है, और जो इने-गिने लोग इसमें सफल होते हैं, वे देखेंगे कि जब वे अपने को आत्मस्वरूप अनुभव करते हैं, तब उन्हें देह ज्ञान नहीं रहता। तुमने ऐसे व्यक्तियों के विषय में सुना होगा और शायद देखा भी होगा, जो कभी कभी प्रखर ध्यान, आत्मसम्मोहन, हिस्टीरिया या मादक द्रव्यों के प्रभाव से विशेष अवस्था में आ जाते हैं। उन लोगों की इन अनुभूतियों से तुमको पता चलेगा कि जब वे भीतर ही भीतर अनुभव कर रहे थे, तब उनका बाह्य ज्ञान एकदम लुप्त हो गया था, बिल्कुल नहीं रह गया था। इसी से जान पड़ता है कि अस्तित्व एक ही है, दो नहीं। वह एक ही अनेक रूपों में जान पड़ता है और इन्हीं सारे रूपों से कार्य-कारण का संबंध उत्पन्न होता है। कार्य-कारण-संबंध का अर्थ है परिणाम, एक का दूसरे में बदल जाना। समय समय पर मानो कारण अंतर्हित हो जाता है, केवल उसके बदले कार्य रह जाता है। यदि आत्मा देह का कारण है, तो मानो कुछ देर के लिए वह अंतर्हित हो जाती है और उसके बदले देह रह जाती है, और जब शरीर अंतर्हित हो जाता है, तो आत्मा अवशिष्ट रहती है। इस मत से बौद्धों का मत खण्डित हो जाता है। बौद्ध आत्मा और शरीर--इन दोनों को पृथक मानने के अनुमान के विरुद्ध तर्क करते थे। अब अद्वैतवाद के द्वारा इस द्वैतभाव को मिटाने और द्रव्य तथा गुण एक ही वस्तु के विभिन्न रूप हैं, यह प्रदर्शित करने से उनका मत भी खंडित हो गया।

हम लोगों ने यह भी देखा कि अपरिणामित्व केवल समष्टि के संबंध में ही सत्य हो सकता है, व्यष्टि के संबंध में नहीं। परिणाम और गति, इन भावों के साथ व्यष्टि की धारणा जड़ित है। हर ससीम विषय को हम जान और समझ सकते हैं, क्योंकि वह परिणामी होती है। किंतु पूर्ण का अपरिणामी होना अनिवार्य है, क्योंकि उसके अतिरिक्त अन्य कुछ है ही नहीं, जिसके संदर्भ में उसमें कोई परि वर्तन हो सके। परिणाम केवल दूसरे किसी अल्पपरिणामी अथवा पूर्ण रूप से अपरिणामी पदार्थ के साथ तुलना करने पर ही जाना जा सकता है।

अतएव अद्वैतवाद के अनुसार, सर्वव्यापी अपरिणामी अमर आत्मा के अस्तित्व का विषय' भी यथासंभव प्रमाणित किया जा सकता है। व्यष्टि के सिद्ध करने के बारे में ही कठिनाई होगी। तो फिर हमारे सब प्राचीन द्वैतवादी सिद्धांतों का, जिनका हमारे ऊपर इतना प्रबल प्रभाव है, और ससीम, क्षुद्र, व्यक्तिगत आत्मा में उन विश्वासों का क्या होगा, जिनमें होकर हम सबको गुजरना होता है।

हमने देखा कि समष्टि भाव से हम लोग अमर हैं, किंतु समस्या यही है कि हम क्षुद्र व्यक्ति के रूप में भी अमर होने के इच्छुक हैं, इसका क्या अर्थ है ? हमने देखा कि हम अनंत हैं, और वही हमारा यथार्थ व्यक्तित्व है। किंतु हम इन क्षुद्र आत्माओं को व्यक्ति बनाना चाहते हैं। उस क्षुद्र व्यक्तित्व का क्या होगा ? कितु दैनंदिन जीवन में हम देखते हैं कि उनका व्यक्तित्व है, किंतु वह व्यक्तित्व है निरंतर विकासशील। वे एक हैं, और फिर भी एक नहीं हैं। कल का 'मैं' आज का 'मैं है भी, और साथ ही नहीं भी है, क्योंकि वह थोड़ा परिवर्तित हो जाता है। इस द्वैतभावात्मक धारणा अर्थात समस्त परिणाम के भीतर कुछ ऐसा है जो परिवर्तित नहीं होता--इस मत के परित्याग, और नितांत आधुनिक भाव अर्थात विकासवाद को स्वीकार करने से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यह 'मैं' एक सतत परिवर्तनशील और विकसनशील सत्ता है।

यदि यह सत्य है कि मनुष्य मांसल जन्तुविशेष (mollusc) का परिणाम मात्र है, तो वह जन्तु और मनुष्य एक ही पदार्थ हुए, भेद केवल यही हुआ कि मनुष्य उस जन्तुविशेष का बहु-परिणामात्मक विकास मात्र है। वही क्रमश: विकसित होते होते अनंत की ओर जा रहा है और अब उसने मनुष्य का रूप धारण किया है। इसलिए सीमाबद्ध जीवात्मा को ऐसा व्यक्ति कहा जा सकता है, जो क्रमशः पूर्ण व्यक्तित्व की ओर अग्रसर हो रहा है। पूर्ण व्यक्तित्व तभी प्राप्त होगा, जब वह अनंत में पहुँचेगा, किंतु इस अवस्था में पहुँचने से पहले ही उसके व्यक्तित्व का लगातार परिणाम हो रहा है और साथ ही साथ विकास भी। अद्वैत वेदांत का प्रधान वैशिष्ट्य है--पूर्ववर्ती मतों में सामंजस्य स्थापित करना। उससे दर्शन को अनेक अवसरों पर बहुत लाभ भी हुआ, पर कभी कभी उसने हानि भी पहुँचायी। जिसे आज आप विकासवाद कहते हैं, अर्थात विकास शनैः शनैः क्रमबद्ध होता है--इस सिद्धांत को हमारे प्राचीन दार्शनिक जानते थे और इसीकी सहायता से बे समस्त पूर्ववर्ती दर्शनों का सामंजस्य करने में सफल हुए। अतएव पूर्ववर्ती कोई भी मत परित्यक्त' नहीं हुआ। बौद्धमत का दोष यह था कि उसमें विकास वाद का ज्ञान नहीं था और न उसको समझने की क्षमता। अतएव उन्होंने आदर्श में पहुँचने की पूर्ववर्ती सीढ़ियों के साथ अपने मत का सामंजस्य करने का कोई प्रयत्न नहीं किया, वरन् उन्हें निरर्थक और अनिष्टकारी कहकर उनका परित्याग कर दिया।

धर्म की यह प्रवृत्ति अत्यंत अनिष्टकारक है। किसी व्यक्ति को एक नूतन और श्रेष्ठतर भाव मिला, तो वह अपने पुराने भावों के प्रति यह निर्णय कर लेता है कि वे सब अनावश्यक तथा हानिकारक थे। वह यह कभी नहीं सोचता कि उसकी आज की दृष्टि से वे कितने ही निरर्थक क्यों न हों, एक समय वह भी तो था, जब वे ही उसके लिए उपयोगी और उसकी वर्तमान अवस्था तक उसे पहुँचाने के लिए आवश्यक थे। हममें से प्रत्येक को उसी प्रकार से आत्म-विकास करना पड़ेगा, पहले स्थूल भावों को अपनाना होगा, और उनसे लाभान्वित होकर एक उच्चतर मानदंड तक पहुँचना होगा। इसलिए अद्वैतवाद प्राचीनतम मतों से मित्र भाव रखता है। द्वैतवाद तथा अपने पूर्वगामी अन्य मतों को अद्वैतवाद एक संरक्षक की दृष्टि से नहीं, वरन् यह मान कर अंगीकार कर लेता है कि वे भी एक ही सत्य की सच्ची अभिव्यक्तियाँ हैं और अद्वैतवाद जिन सिद्धांतों पर पहुंचा है, वे भी उन्हीं सिद्धांतों पर पहुँचाते हैं।

अतएव मनुष्य को जिन सब सीढ़ियों पर चढ़कर ऊपर जाना है, उनके प्रति कठोर वचन न कहकर उनको आशीर्वाद देते हुए उनकी रक्षा करनी चाहिए। इसीलिए वेदांत में इन द्वैतवादी सिद्धांतों की उचित रक्षा की गई है, उनका परि त्याग नहीं किया गया, और इसीलिए ससीम, व्यक्तितायुक्त, किंतु फिर भी अपने में पूर्ण आत्मा की परिकल्पना ने वेदांत में स्थान पाया है।

द्वैत मत के अनुसार मृत्यु होने के पश्चात् मनुष्य अन्यान्य लोकों में जाता है इत्यादि, ये सब भाव अद्वैतवाद में संपूर्ण रूप से रक्षित हैं। क्योंकि अद्वैत में विकास की प्रक्रिया स्वीकार करने पर, इन विविध सिद्धांतों को अपना उचित स्थान मिल जाता है, वे सत्य के आंशिक वर्णन मात्र हैं।

द्वैतवाद की दृष्टि से इस जगत को केवल भौतिक द्रव्य या शक्ति की सृष्टि के रूप में ही देखा जा सकता है, उसे किसी विशेष इच्छा-शक्ति की क्रीड़ा के रूप में ही सोचा जा सकता है और उस इच्छा-शक्ति को जगत से पृथक ही सोचना संभव है। इस दृष्टि से मनुष्य अपने को आत्मा और देह दोनों की समष्टि के रूप में सोच सकता है और यह आत्मा ससीम होने पर भी स्वयं में पूर्ण है। इस प्रकार के व्यक्ति की अमरत्व और भावी जीवन की धारणाएँ उसकी आत्मा संबधी धारणाओं के अनुसार ही होती हैं। वेदांत में इन सब अवस्थाओं को सुरक्षित रखा गया है और इसलिए द्वैतवाद की कुछ लोकप्रिय धारणाओं का परिचय तुमको देना आवश्यक है।

इस मत के अनुसार हमारा यह शरीर तो है ही, इस स्थूल शरीर के पीछे एक सूक्ष्म शरीर है। यह सूक्ष्म शरीर भी भौतिक है, किंतु अत्यंत सूक्ष्म भौतिक द्रव्य से बना है। वह हमारे संपूर्ण कर्मों और संस्कारों का आलय है। कर्म और संस्कार दृश्य रूप में व्यक्त होने के लिए प्रस्तुत रहते हैं। हमारा प्रत्येक विचार और प्रत्येक कार्य कुछ समय बाद सूक्ष्म रूप धारण कर लेता है, मानो बीज बन जाता है, सूक्ष्म शरीर में अव्यक्त रूप से रहता है, और कुछ समय बाद आविर्भूत होकर अपना फल देता है। कर्म-फलों का यही समूह मनुष्य के जीवन को निर्धारित करता है। वह अपना जीवन स्वयं ही बनाता है। मनुष्य अपने लिए जिन नियमों की रचना करता है, उनके अतिरिक्त वह और किसी भी नियम से बद्ध नहीं है। हमारे विचार, शब्द और कर्म हमारे शुभ या अशुभ बंधन-जाल के सूत हैं। एक बार किसी शक्ति को चलायमान कर देने पर उसका पूर्ण फल हमें भोगना पड़ता है। यही कर्मविधान है। इस सूक्ष्म शरीर के पीछे जीव या मनुष्य की व्यष्टिगत आत्मा है। इस जीवात्मा के रूप और आकार को लेकर अनेक वाद-विवाद हुए हैं। किसी के मत में वह अणु जैसा लघु है, तो किसी के मत में वह इतना लघु नहीं है, और दूसरों के मत में बहुत बड़ा है, आदि। यह जीव उस विश्वव्याप्त द्रव्य का एक अंश है, और वह शाश्वत है। वह अनादि और अनंत है। अपना प्रकृतस्वरूप, पवित्रता को प्रकाशित करने के लिए वह अनेक प्रकार की देहों में से होकर आगे बढ़ रहा है। जो कर्म इस प्रकाश की अभिव्यक्ति में बाधा उपस्थित करता है, उसे असत् कर्म कहते हैं। ऐसा ही विचारों के संबंध में भी है, और जिस कार्य अथवा विचार द्वारा उसके स्वरूप प्रकाशन में सहायता मिलती है, उसे सत्कार्य अथवा सद्विचार कहते हैं। किंतु भारत के निम्नतम द्वैतवादी और अत्यंत उन्नत अद्वैतवादी सभी का यह सामान्य मत है कि आत्मा की समस्त शक्ति और संभावना उसी के भीतर है--वे किसी बाह्य स्रोत से नहीं आतीं। वे आत्मा में ही अव्यक्त रूप से रहती हैं, और जीवन का सारा कार्य केवल उनके उस अव्यक्त शक्ति-समूह को व्यक्त करना मात्र है।

वे पुनर्जन्म के सिद्धांत को भी मानते हैं, जिसके अनुसार इस देह के नष्ट होने पर जीव फिर एक देह धारण करेगा और उस देह के नाश होने पर फिर एक दूसरी देह, तथा इसी प्रकार आगे भी क्रम चलता रहेगा। जीवात्मा इसी पृथ्वी पर जन्म ले अथवा अन्य किसी लोक में, किंतु इसी पृथ्वी को श्रेष्ठतर बताया गया है, क्योंकि उनके मत में हमारे संपूर्ण प्रयोजन की सिद्धि के लिए यह पृथ्वी ही सर्वश्रेष्ठ है। अन्यान्य लोकों में दुःख-कष्ट यद्यपि बहुत कम अवश्य हैं, किंतु इसी कारण वहाँ उच्चतम विचार करने के लिए अवसर ही नहीं मिलता। इस जगत में घोर दुःख भी है और कुछ सुख भी। अतएव जीव को मोह-निद्रा यहाँ कभी न कभी टूटती ही है, कभी न कभी उसकी इच्छा मुक्ति पाने की होती ही है। किंतु जैसे इस लोक में बहुत धनी व्यक्ति के लिए उच्चतर वस्तुओं पर विचार करने का संयोग अल्पतम ही होता है, ठीक उसी प्रकार जीव यदि स्वर्ग में जाता है, तो उसकी भी आत्मोन्नति की संभावना बहुत कम हो जाती है। कारण यह है कि उसकी दशा यहाँ के धनी व्यक्ति की भाँति हो जाती है, वरन् यहाँ की अपेक्षा और भी अधिक प्रखर। उसको वहाँ जो सूक्ष्म देह प्राप्त होती है, वह रोगमुक्त होती है, उसमें कोई खाने पीने की आवश्यकता नहीं रह जाती और सब कामनाएँ भी पूर्ण होती रहती हैं। जीव वहाँ सुख पर सुख भोगता है, परंतु इसीलिए वह अपना स्वरूप बिल्कुल भूल जाता है। फिर भी कुछ उच्चतर लोक ऐसे भी हैं, जहाँ सब भोगों के रहते हुए भी और आगे विकास कर सकना संभव है। कुछ द्वैतवादी उच्चतम स्वर्ग को ही चरम लक्ष्य मानते हैं--उनके मतानुसार जीवात्माएँ वहाँ जाकर चिरकाल तक भगवान् के साथ रहती हैं। वे वहाँ दिव्य देह प्राप्त करती हैं--उन्हें रोग, शोक, मृत्यु अथवा अन्य कोई अशुभ नहीं सताता। उनकी सब कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। समय समय पर उनमें से कोई कोई पृथ्वी पर आकर, देह धारण कर मनुष्य को ईश्वर के मार्ग का उपदेश देती हैं, और जगत के सभी महान उपदेशक ऐसे व्यक्ति ही हैं। वे पहले ही मुक्त होकर भगवान् के साथ उच्चतम लोक में वास करते हैं, किंतु दुखांत मनुष्यों के प्रति उनकी इतनी प्रीति और अनुकंपा होती है कि वे यहाँ आकर पुनः देह धारण कर लोगों को स्वर्ग-पथ के संबंध में उपदेश देते हैं।

अद्वैतवाद की इस मान्यता से तो हम परिचित हैं कि यह हमारा चरम लक्ष्य कभी नहीं हो सकता। हमारा लक्ष्य होना चाहिए संपूर्ण विदेह मुक्ति। आदर्श कभी ससीम नहीं हो सकता। अनंत से घट कर और कुछ भी हमारा चरम लक्ष्य नहीं हो सकता, किंतु देह तो कभी अनंत नहीं होती। यह होना असंभव है, क्योंकि ससीमता से शरीर की उत्पत्ति है। विचार अनंत नहीं हो सकता, क्योंकि विचार भी ससीम से उत्पन्न होता है। अद्वैतवादी कहता है, हमें देह और विचार के परे जाना होगा। और हमने अद्वैतवादियों की यह धारणा भी देखी है कि मुक्ति कोई प्राप्त करने की वस्तु नहीं है, वह तो सदा तुम्हारी अपनी है। केवल हम लोग उसे भूल जाते हैं और उसे अस्वीकार करते हैं। पूर्णता हमें प्राप्त करना नहीं है, वह तो सदैव ही हमारे भीतर वर्तमान है। यह अमरत्व, यह आनंद हमें अर्जित करना नहीं है, वह तो सदा से ही हमें प्राप्त है।

यदि तुम साहस के साथ यह कह सको कि 'मैं मुक्त हूँ', तो इसी क्षण तुम मुक्त हो। यदि तुम कहो 'मैं बद्ध हूँ', तो तुम बद्ध ही रहोगे। जो हो, द्वैतवादियों के विभिन्न मत मैंने तुमको बता दिए हैं, इनमें से तुम जिसे चाहो, ग्रहण करो।

वेदांत की यह बात समझना बहुत कठिन है और लोग सदा इस पर विवाद करते रहते हैं। सबसे अधिक मुश्किल तो यही है कि जो किसी एक मत को ले लेता है, वह दूसरे मत को बिल्कुल अस्वीकार कर उस मतावलंबी के साथ वाद-विवाद करने में प्रवृत्त हो जाता है। तुम्हारे लिए जो उपयुक्त हो, उसे तुम ग्रहण करो, और दूसरे को जो उपयुक्त लगे, उसे वह ग्रहण करने दो। यदि तुम अपने इस क्षुद्र व्यक्तित्व को, इस ससीम मानवत्व को रखने के लिए इतने इच्छुक हो, तो उसे अनायास ही रख सकते हो, तुम्हारी सभी वासनाएँ रह सकती हैं और तुम उनमें संतुष्ट भी रह सकते हो। यदि मनुष्य भाव में रहने का आनंद तुम्हें इतना सुंदर और मधुर लगता है. तो तुम जितने दिन इच्छा हो, उसको रख सकते हो, क्योंकि तुम जानते हो कि तुम्हीं अपने भाग्य के निर्माता हो। जबरदस्ती तुमसे कोई कुछ भी नहीं करा सकता। तुम्हारी जब तक इच्छा हो, मनुष्य बने रहो, कोई भी तुम्हें रोक नहीं सकता। यदि देवता होने की इच्छा करो, तो देवता हो जाओगे। असल बात यह है। किंतु कुछ लोग ऐसे हैं, जो देवता भी नहीं बनना चाहते। उनसे यह कहने का तुम्हारा क्या अधिकार है कि यह बड़ी भयंकर बात है ? तुम्हें सौ रुपये खो जाने से दुःख हो सकता है, किंतु ऐसे भी अनेक लोग हैं, जिनका यदि सर्वस्व नष्ट हो जाए, तो भी उन्हें किंचित कष्ट नहीं होगा। ऐसे लोग प्राचीन काल में भी थे और आज भी हैं। तुम उन्हें अपने आदर्श के पैमाने से क्यों नापते हो ? तुम अपने इन क्षुद्र सीमित भावों से चिपके रहो, ये लौकिक विचार तुम्हारे सर्वोच्च आदर्श बने रहें। जैसा चाहोगे वैसा ही पाओगे। किंतु ऐसे अनेक व्यक्ति हैं, जिन्हें सत्य का दर्शन हुआ है--वे इन सीमाओं में संतुष्ट नहीं रह सकते, वे इनके परे जाना चाहते हैं। जगत और उसका संपूर्ण भोग उन्हें गोखुर से अधिक नहीं जान पड़ता। तुम उन्हें अपने विचारों में क्यों फँसाकर रखना चाहते हो ? इस प्रवृत्ति को बिल्कुल छोड़ना पड़ेगा। प्रत्येक को उसका स्थान दो।

बहुत दिन पहले मैंने पत्रों में एक समाचार पढ़ा था। कुछ जहाज [1] प्रशांत महासागर के एक द्वीपपुंज के निकट तूफ़ान में फंस गए। सचित्र लंदन समाचार (Illustrated London News) पत्रिका में इस घटना का एक चित्र भी आया था। तूफान में केवल एक ब्रिटिश जहाज को छोड़कर अन्य सब भग्न होकर डूब गए। वह ब्रिटिश जहाज तूफान पार कर चला आया। चित्र में यह दिखाया है कि जहाज डूबे जा रहे हैं, उनके डूबते हुए यात्री डेक के ऊपर खड़े होकर तूफान के मध्य बच जानेवाले यात्रियों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। इसी प्रकार हमें वीर, उदार होना चाहिए। दूसरों को नीचे खींचकर अपनी भूमि पर मत लाओ। लोग मूर्ख के समान एक और मत की पुष्टि किया करते हैं कि यदि हमारा यह क्षुद्र व्यक्तित्व चला जाएगा, तो जगत में किसी प्रकार की नीतिपरायणता नहीं रहेगी, मनुष्य जाति की आशा उच्छिन्न हो जाएगी। मानो जो ऐसा कहते हैं, वे समग्र मानव जाति के लिए सदा प्राणोत्सर्ग ही करने के लिए तैयार हैं ! ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे ! यदि हर देश में केवल दो सौ नर-नारी देश के सच्चे हितैषी हों, तो पाँच दिन में सत्ययुग आ सकता है। हम जानते हैं कि हम मनुष्य जाति के उपकार के लिए किस प्रकार आत्मोत्सर्ग करना चाहते हैं ! ये सब लंबी-चौड़ी बातें हैं--और कुछ नहीं। विश्व के इतिहास से यह स्पष्ट है कि जिन्होंने अपने इस क्षुद्र व्यक्तित्व को एकदम भुला दिया था, वे ही मानव जाति के सर्वोत्तम हितैषी हैं, और स्त्री या पुरुष जितना ही अधिक अपने संबंध में सोचते हैं, वे दूसरों के लिए उतना ही कम कर पाते हैं। उनमें से एक में निःस्वार्थपरता है और दूसरों में स्वार्थपरता। इन छोटे छोटे भोग-सुखों में आसक्त रहना और उनकी निरंतरता तथा पुनरावृत्ति चाहना घोर स्वार्थ है। ऐसी मनोवृत्ति सत्यानुराग अथवा दूसरों के प्रति दयालु भाव के कारण नहीं होती--इसकी उत्पत्ति का एकमात्र कारण है घोर स्वार्थपरता। दूसरे किसी की ओर दृष्टि न रखकर केवल अपनी ही भोगवृत्ति के भाव से इसका जन्म होता है++++। कम से कम मुझे तो यही जान पड़ता है। संसार में मैं प्राचीन पैगंबरों और महात्माओं के समान चरित्रबलशाली व्यक्ति और देखना चाहता हूँ--वे एक क्षुद्र पशु तक के उपकारार्थ सौ सौ जीवन त्यागने के लिए तैयार थे। नीति और परोपकार की क्या बात करते हो ? यह तो आजकल की बेकार की बातें हैं।

मैं गौतम बुद्ध के समान नैतिकतायुक्त लोग देखना चाहता हूँ। वे सगुण ईश्वर अथवा व्यक्तिगत आत्मा में विश्वास नहीं करते थे, उस विषय में कभी प्रश्न ही नहीं करते थे, उस विषय में पूर्ण अज्ञेयवादी थे, किंतु जो सबके लिए अपने प्राण तक देने को प्रस्तुत थे--आजन्म दूसरों का उपकार करने में रत रहते तथा सदैव इसी चिंता में मग्न रहते थे कि दूसरों का उपकार किस प्रकार हो। उनके जीवन-चरित लिखनेवालों ने ठीक ही कहा है कि उन्होंने 'बहुजनहिताय बहुजन सुखाय' जन्म ग्रहण किया था। वे अपनी निजी मुक्ति के लिए वन में तप करने नहीं गए। दुनिया जली जा रही है--और इसे बचाने का कोई उपाय मुझे खोज निकालना चाहिए। उनके समस्त जीवन में यही एक चिंता थी कि जगत में इतना दुःख क्यों है ? तुम लोग क्या यह समझते हो कि हम सब उनके समान नैतिकतापरायण हैं ?

मनुष्य जितना ही स्वार्थी होता है, उतना ही अनैतिक भी होता है। यही बात जातियों के संबंध में सत्य है। स्वयं अपने से ही विजड़ित रहनेवाली जाति ही समग्न संसार में सबसे अधिक क्रूर और पातकी सिद्ध हुई है। अरब के पैगंबर द्वारा प्रवर्तित धर्म से बढ़कर द्वैतवाद से चिपकनेवाला कोई दूसरा धर्म आज तक नहीं हुआ, और इतना रक्त बहानेवाला तथा दूसरों के प्रति इतना निर्मम धर्म भी कोई दूसरा नहीं हुआ। कुरान का यह आदेश है कि जो मनुष्य इन शिक्षाओं को न माने, उसको मार डालना चाहिए; उसकी हत्या कर डालना ही उस पर दया करना है ! और सुंदर हरों तथा सभी प्रकार के भोगों से युक्त स्वर्ग को प्राप्त करने का सबसे विश्वस्त रास्ता है, काफिरों की हत्या करना। ऐसे कुविश्वासों के फलस्वरूप जितना रक्तपात हुआ है, उसकी कल्पना कर लो !

ईसा मसीह ने जिस धर्म का प्रचार किया, उसमें ऐसी भद्दी बातें नहीं थीं। विशुद्ध ईसाई धर्म और वेदांत धर्म में बहुत कम अंतर है। उन्होंने अद्वैतवाद का भी प्रचार किया और जनसाधारण को संतुष्ट रखने के लिए, उसे उच्चतम आदर्श की धारणा कराने के लिए सोपान रूप से द्वैतवाद के आदर्श की भी शिक्षा दी। जिन्होंने 'मेरे स्वर्गस्थ पिता' कहकर प्रार्थना करने का उपदेश दिया था, उन्होंने यह भी कहा था 'मैं और मेरे पिता एक हैं।' वे यह भी जानते थे कि इस स्वर्गस्थ पितारूप द्वैतभाव की उपासना करते करते ही अभेद बुद्धि आ जाती है। उस समय ईसाई धर्म केवल प्रेम और आशीर्वादपूर्ण था, किंतु उसमें जैसे ही असंस्कार आ घुसे, वह च्युत होकर अरब के पैगंबर के धर्म के स्तर पर आ टिका। यह जो क्षुद्र 'मैं' के लिए मारकाट, 'मैं' के प्रति घोर आसक्ति, और केवल इसी जीवन में नहीं बल्कि मृत्यु के बाद भी इस क्षुद्र 'मैं' तथा इस क्षुद्र व्यक्तित्व को ही लेकर रहने की इच्छा, यह सब असंस्कार ही तो है। वे इसी को निःस्वार्थपरता और नैतिकता की आधारशिला कहते हैं। यही अगर नैतिकता की आधारशिला हो, तो भगवान् हमारी रक्षा करें! और आश्चर्य की बात यह है कि जिन सब नर-नारियों से हम अधिक ज्ञान की अपेक्षा करते हैं, उन्हें यह डर लगता है कि इस क्षुद्र 'मैं' के मिटने पर सारी नैतिकता बिल्कुल नष्ट हो जाएगी। यह कहने से कि इस क्षुद्र 'मैं' के विनाश पर ही यथार्थ नैतिकता अव लंबित है, इनका कलेजा मुंह में आ जाता है। सब प्रकार की नीति, शुभ तथा मंगल का मूलमंत्र 'मैं' नहीं, 'तुम' है। स्वर्ग और नरक हैं या नहीं, आत्मा है या नहीं, कोई अनश्वर सत्ता है या नहीं, इसकी चिंता कौन करता है ? हमारे सामने यह संसार है और वह दुःख से पूर्ण है। बुद्ध के समान इस संसार सागर में गोता लगाकर या तो इस संसार के दुःख को दूर करो या इस प्रयत्न में प्राण त्याग दो। अपने को भूल जाओ; आस्तिक हो या नास्तिक, अज्ञेयवादी ही हो या वेदांती, ईसाई हो या मुसलमान--प्रत्येक के लिए यही प्रथम पाठ है। और जो पाठ सबको स्पष्ट है, वह है तुच्छ अहं का उन्मूलन और वास्तविक आत्मा का विकास।

दो शक्तियाँ सदा समानांतर रेखाओं में एक दूसरे के साथ कार्य कर रही हैं। एक कहती है "मैं" और दूसरी कहती है "मैं नहीं"। उनकी अभिव्यक्ति केवल मनुष्यों में ही नहीं, किंतु पशुओं में भी देखी जाती है--केवल पशुओं में ही नहीं क्षुद्रतम कीटाणुओं में भी। नर-रक्त की प्यासी लपलपाती जीभवाली बाधिन भी अपने बच्चे की रक्षा के लिए जान देने को प्रस्तुत रहती है। अत्यंत बुरा आदमी, जो अनायास ही अपने भाई का गला काट सकता है--वह भी भूख से मरती हुई अपनी स्त्री तथा बाल-बच्चों के लिए अपने प्राण निस्संकोच दे देता है। सृष्टि के भीतर ये दोनों शक्तियाँ पास पास ही काम कर रही हैं--जहाँ एक शक्ति देखोगे, वहाँ दूसरी भी दीख पड़ेगी। एक स्वार्थपरता है, और दूसरी निःस्वार्थपरता। एक है ग्रहण, दूसरी त्याग। एक लेती है, दूसरी देती है। क्षुद्रतम प्राणी से लेकर उच्चतम प्राणी तक समस्त ब्रह्मांड इन्हीं दोनों शक्तियों का लीलाक्षेत्र है। इसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं--यह स्वतः प्रमाण है।

समाज के एक अंश के लोगों को जगत के समस्त क्रियाकलाप और विकास को इन दो में से केवल एक--प्रतियोगिता और संघर्ष--घटक पर आधारित कर देने का क्या अधिकार है ? विश्व के सारे व्यापारों को राग-द्वेष, युद्ध, प्रतियोगिता और संघर्ष पर अधिष्ठित मानने का उन्हें क्या अधिकार है ? उनके अस्तित्व को हम अस्वीकार नहीं करते। किंतु उन्हें दूसरी शक्ति की क्रिया को बिल्कुल न मानने का क्या अधिकार है ? क्या, कोई मनुष्य यह अस्वीकार कर सकता है कि यह प्रेम, अहंशून्यता अथवा त्याग ही जगत की एकमात्र धनात्मक शक्ति है ? दूसरी शक्ति इस प्रेम-शक्ति का ही असम्यक् प्रयोग है, प्रेम से ही प्रतिद्वन्द्विता की उत्पत्ति होती है, प्रेम ही प्रतियोगिता का मूल है। निःस्वार्थपरता ही अशुभ की माता है। शुभ ही अशुभ का जनक है, और अशुभ का परिणाम भी शुभ के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। एक व्यक्ति जो दूसरे की हत्या करता है, वह भी प्रायः अपने पुत्रादि के प्रति स्नेह की प्रेरणा से ही, एवं उनके लालन-पालन के लिए उसका प्रेम संसार के अन्य लाखों व्यक्तियों से हटकर केवल अपने शिशु में सीमित हो जाता है, किंतु ससीम हो या असीम, वह मूलतः है प्रेम ही।

अतएव समग्र जगत की परिचालक, जगत में एक मात्र प्रकृत और जीवंत शक्ति वही एक अद्भुत वस्तु है--वह किसी भी आकार में व्यक्त क्यों न हो, और वह है प्रेम, निःस्वार्थपरता तथा त्याग। इसीलिए वेदांत अद्वैत पर जोर देता है। हम भी इसी व्याख्या पर आग्रह कर रहे हैं, क्योंकि हम जगत के दो कारण स्वीकार नहीं कर सकते। यहाँ यदि हम यह स्वीकार कर लें कि वही एक अपूर्व सुंदर प्रेम सीमित होकर ही असत् रूप में प्रतीत होता है, तो एक ही प्रेमशक्ति द्वारा संपूर्ण जगत की व्याख्या हो जाती है। नहीं तो हमें जगत के दो कारण मानने पड़ेंगे--एक शुभ, दूसरा अशुभ--एक प्रेम, दूसरा घृणा। इन दोनों सिद्धांतों के बीच में कौन अधिक न्याय--संगत है ? --निश्चय ही शक्ति को माननेवाला सिद्धांत।

मैं अब ऐसी बातों की चर्चा करूँगा जो संभवतः द्वैतवाद से संबंध नहीं रखतीं। मैं द्वैतवाद की इस आलोचना में और अधिक समय नहीं दूंगा। मेरा उद्देश्य यहाँ यह दिखलाना है कि नैतिकता और निःस्वार्थपरता के उच्चतम आदर्श उच्चतम दार्शनिक धारणा के साथ असंगत नहीं हैं, नैतिकता और नीतिशास्त्र की उपलब्धि के लिए तुमको अपनी दार्शनिक धारणा को नीचा नहीं करना पड़ता, वरन् नैतिकता और नीतिशास्त्र को ठोस आधार देने के लिए तुमको उच्चतम दार्शनिक और वैज्ञानिक धारणाएँ स्वीकार करनी होंगी। मनुष्य का ज्ञान मनुष्य के मंगल का विरोधी नहीं है, वरन् जीवन के प्रत्येक विभाग में ज्ञान हमारी रक्षा करता है। ज्ञान ही उपासना है। हम जितना जान सकें, उसी में हमारा मंगल है। वेदांती कहते हैं, इस समस्त प्रतीयमान अशुभ का कारण है--असीम का सीमाबद्ध हो जाना। जो प्रेम सीमाबद्ध होकर क्षुद्र--भावापन्न हो जाता है तथा अशुभ प्रतीत होता है, वही फिर अपनी चरमावस्था में स्वयं को ईश्वर रूप में प्रकाशित करता है। वेदांत यह भी कहता है कि इस आपात-प्रतीयमान् संपूर्ण अशुभ का कारण हमारे भीतर ही है। किसी लोकोत्तर पुरुष को दोष न दो, न निराश या विषण्ण होओ, न यह सोचो कि तुम गर्त के बीच में पड़े हो और जब तक कोई दूसरा आकर तुम्हारी सहायता नहीं करता, तब तक तम इससे निकल नहीं सकते। वेदांत कहता है, दूसरे की सहायता से हमारा कुछ नहीं हो सकता। हम रेशम के कीड़े के समान हैं। अपने ही शरीर से अपने आप जाल बनाकर उसी में आबद्ध हो गए हैं। किंतु यह बद्धभाव चिरकाल के लिए नहीं है। हम लोग उससे तितली के समान बाहर निकलकर मुक्त हो जाएंगे। हम लोग अपने चारों ओर इस कर्मजाल को लगा देते हैं और अज्ञानवश सोचने लगते हैं कि हम बद्ध हैं और सहायता के लिए रोते-चिल्लाते हैं। किंतु बाहर से कोई सहायता नहीं मिलती, सहायता मिलती है भीतर से। दुनिया के सारे देवताओं के पास तुम रो सकते हो, मैं भी बहुत वर्ष इसी तरह रोता रहा, अंत में देखा कि मुझे सहायता मिल रही है, किंतु यह सहायता भीतर से मिली। भ्रांतिवश इतने दिन तक जो अनेक प्रकार के काम करता रहा, उस भ्रांति को मुझे दूर करना पड़ा। यही एकमात्र उपाय है। मैंने स्वयं अपने को जिस जाल में फँसा रखा है, वह मुझे ही काटना पड़ेगा और उसे काटने की शक्ति भी मुझमें ही है। इस विषय में निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि मेरे जीवन को सदसत् कोई भी प्रवृत्ति व्यर्थ नहीं गई--मैं उसी अतीत शुभाशुभ दोनों प्रकार के कर्मों का समष्टिस्वरूप हूँ। मैंने जीवन में बहुत सी भूलें की हैं, किंतु इनको किए बिना आज जो मैं हूँ वह कभी न होता। मैं अब अपने जीवन से अत्यंत संतुष्ट हूँ। पर मेरे कहने का यह मतलब नहीं कि तुम घर जाकर चाहे जितना अन्याय करते रहो। मेरी बात का ग़लत मतलब न समझ लेना। मेरे कहने का अभिप्राय यही है कि कुछ भूल-चूक हो गई है, इसलिए एकदम हाथ पर हाथ रखकर मत बैठे रहो, किंतु यह समझ रखो कि अंत में फल सबका शुभ ही होता है। इसके विपरीत और कुछ कभी नहीं हो सकता, क्योंकि शिवत्व और विशुद्धत्व हमारा स्वाभाविक धर्म है। उसका किसी भी प्रकार नाश नहीं हो सकता। हम लोगों का यथार्थ स्वरूप सदा ही एकरूप रहता है।

हमें जो समझ लेना है, वह यह है कि जिन्हें हम भूलें या अशुभ कहते हैं, वह हम दुर्बल होने के कारण करते हैं, और हम दुर्बल अज्ञानी होने के कारण हैं। मैं पाप शब्द के बजाए भूल शब्द का प्रयोग अधिक उपयुक्त समझता हूँ। पाप शब्द यद्यपि मूलतः एक बड़ा अच्छा शब्द था, किंतु अब उसमें जो व्यंजना आ गई है, उससे मुझे भय लगता है। हमें किसने अज्ञानी बनाया है ? स्वयं हमने। हम लोग स्वयं अपनी आँखों पर हाथ रखकर 'अँधेरा, अँधेरा' चिल्लाते हैं। हाथ हटा लो और प्रकाश हो जाएगा; देखोगे कि मानव की प्रकाशस्वरूप आत्मा के रूप में प्रकाश सदा विद्यमान रहता है। तुम्हारे आधुनिक वैज्ञानिक क्या कहते हैं, यह क्यों नहीं देखते ? इस विकास का क्या कारण है ?-वासना-इच्छा। पशु कुछ करना चाहता है, किंतु परिवेश को अनुकूल नहीं पाता, और इसलिए वह एक नूतन शरीर धारण कर लेता है। तुम निम्नतम जीवाणु अमीबा से विकसित हुए हो। अपनी इच्छा-शक्ति का प्रयोग करते रहो, और भी अधिक उन्नत हो जाओगे। इच्छा सर्वशक्तिमान है। तुम कहोगे, यदि इच्छा सर्वशक्तिमान है, तो मैं हर बात क्यों नहीं कर पाता ? उत्तर यह है कि तुम जब ऐसी बातें करते हो, उस समय केवल अपने क्षुद्र 'मैं' की ओर देखते हो। सोचकर देखो, तुम क्षुद्र जीवाणु से इतने बड़े मनुष्य हो गए। किसने तुम्हें मनुष्य बनाया ? तुम्हारी अपनी इच्छा-शक्ति ने ही। यह इच्छा-शक्ति सर्वशक्तिमान है--तुम क्या यह अस्वीकार कर सकते हो ? जिसने तुम्हें इतना उन्नत बना दिया, वह तुम्हें और भी अधिक उन्नत कर सकती है। तुमको आवश्यकता है चरित्र की और इच्छा-शक्ति को सबल बनाने की।

अतएव यदि मैं तुम्हें यह उपदेश दूँ कि तुम्हारी प्रकृति असत् है, और यह कहूँ कि तुमने कुछ भूलें की हैं, इसलिए अब तुम अपना जीवन केवल पश्चात्ताप करने तथा रोने-धोने में ही बिताओ, तो इससे तुम्हारा कुछ भी उपकार न होगा, वरन् उससे और भी दुर्बल हो जाओगे। ऐसा करना तुम्हें सत्पथ के बजाए असत्पथ दिखाना होगा। यदि हजारों साल इस कमरे में अँधेरा रहे और तुम कमरे में आकर हाय ! बड़ा अँधेरा है ! बड़ा अँधेरा है !' कह कहकर रोते रहो, तो क्या अँधेरा चला जाएगा ? कभी नहीं। एक दियासलाई जलाते ही कमरा प्रकाशित हो उठेगा। अतएव जीवन भर 'मैंने बहुत दोष किए हैं, मैंने बहुत अन्याय किया है', यह सोचने से क्या तुम्हारा कुछ भी उपकार हो सकेगा ? हममें बहुत से दोष हैं, यह किसी को बतलाना नहीं पड़ता। ज्ञानाग्नि प्रज्जवलित करो, एक क्षण में सब अशुभ चला जाएगा। अपने प्रकृतस्वरूप को पहचानो, प्रकृत 'मैं' को--उसी ज्योतिर्मय उज्ज्वल, नित्यशुद्ध 'मैं' को, प्रकाशित करो--प्रत्येक व्यक्ति में उसी आत्मा को जगाओ। मैं चाहता हूं कि सभी व्यक्ति ऐसी दशा में आ जाएं कि अति जघन्य पुरुष को भी देखकर उसकी बाह्य दुर्बलताओं की ओर वे दृष्टिपात न करें, बल्कि उसके हृदय में रहनेवाले भगवान् को देख सकें। और उसकी निंदा न कर, यह कह सकें, 'हे स्वप्रकाशक, ज्योतिर्मय, उठो! हे सदाशुद्धस्वरूप उठो! हे अज, अविनाशी, सर्वशक्तिमान, उठो! आत्मस्वरूप प्रकाशित करो। तुम जिन क्षुद्र भावों में आबद्ध पड़े हो, वे तुम्हें सोहते नहीं।' अद्वैतवाद इसी श्रेष्ठतम प्रार्थना का उपदेश देता है। निजस्वरूप स्मरण, सदा उसी अंतस्थ ईश्वर का स्मरण, उसी को सदा अनंत, सर्वशक्तिमान, सदाशिव, निष्काम कहकर उसका स्मरण--यही एकमात्र प्रार्थना है। यह क्षुद्र 'मैं' उसमें नहीं रहता, क्षुद्र बंधन उसे नहीं बाँध सकते। और वह अकाम है, इसीलिए अभय और ओजस्वरूप है, क्योंकि कामना तथा स्वार्थ से ही भय की उत्पत्ति होती है। जिसे अपने लिए कोई कामना नहीं, वह किससे डरेगा ? कौन सी वस्तु उसे डरा सकती है ? क्या उसे मृत्यु डरा सकती है ? अशुभ, विपत्ति डरा सकती है ? कभी नहीं। अतएव यदि हम अद्वैतवादी हैं, तो हमें यह मानना होगा कि हमारा 'मैं-पन' इसी क्षण से मृत है। फिर मैं स्त्री हूँ या पुरुष हूँ, अमुक अमुक हूँ, यह सब भाव नहीं रह जाता, ये अंधविश्वास मात्र थे, और शेष रहता है वही नित्य शुद्ध, नित्य ओजस्वरूप, सर्वशक्तिमान सर्वज्ञस्वरूप, और तब हमारा सारा भय चला जाता है। कौन इस सर्वव्यापी 'मैं' का अनिष्ट कर सकता है ? इस प्रकार हमारी संपूर्ण दुर्बलता चली जाती है। तब दूसरों में भी उसी शक्ति को उद्दीप्त करना हमारा एकमात्र कार्य हो जाता है। हम देखते हैं, वे भी यही आत्मास्वरूप हैं, किंतु वे यह जानते नहीं। अतएव हमें उन्हें सिखाना होगा--उनके इस अनंतस्वरूप के प्रकाशनार्थ हमें उनकी सहायता करनी पड़ेगी। मैं देखता हूँ कि जगत में इसी के प्रचार की सबसे अधिक आवश्यकता है। ये सब मत अत्यंत पुराने हैं, बहुतेरे पर्वतों से भी पुराने। सभी सत्य सनातन हैं। सत्य व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति नहीं है। कोई भी जाति, कोई भी व्यक्ति उसे अपनी सम्पत्ति कहने का दावा नहीं कर सकता। सत्य ही सब आत्माओं का यथार्थस्वरूप है। किसी भी व्यक्तिविशेष का उस पर विशेष अधिकार नहीं है। किंतु हमें उसे व्यावहारिक और सरल बनाना होगा, (क्योंकि उच्चतम सत्य अत्यंत सहज और सरल होते हैं। जिससे वह समाज के हर रंध्र में व्याप्त हो जाए, उच्चतम मस्तिष्क से लेकर अत्यंत साधारण मन द्वारा भी समझा जा सके, तथा आबाल--वृद्ध--वनिता सभी उसे जान सकें। ये न्याय के कूट विचार, दार्शनिक मीमांसाएँ, ये सब मतवाद और क्रिया--कांड--इन सबने किसी समय भले ही उपकार किया हो, किंतु आओ, हम सब आज से--इसी क्षण से धर्म को सहज बनाने की चेष्टा करें और उस सत्ययुग के पुनरागमन में सहायता करें, जव प्रत्येक व्यक्ति उपासक होगा और उसका अंतस्थ सत्य ही उसकी उपासना का विषय होगा।



[1] प्रशांत महासागर के समोआ द्वोपपुज के पास ब्रिटिश जहाज 'कैलिओपी' ओर अमेरिका के कुछ युद्ध जहाज।


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