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संवाद संग्रह

वार्ता एवं संलाप
स्वामी विवेकानंद


(श्री प्रियनाथ सिन्हा द्वारा आलिखित)

(गुरुगृहवास की प्रथा--आधुनिक विश्वविद्यालय शिक्षा-प्रणाली--श्रद्धा का अभाव हमारा भी राष्ट्रीय इतिहास है--पाश्चात्य विज्ञानयुक्त वेदांत--तथाकथित उच्च शिक्षा--यांत्रिक शिक्षा की आवश्यकता--सत्यकाम की कथा--मात्र पुस्तकीय ज्ञान और त्यागियों के निरीक्षण में शिक्षाभ्यास--श्री रामकृष्ण और पंडित-समुदाय--ऐसे मठ की स्थापना जिसमें साधु अध्यापन कार्य करें बच्चों के लिए पाठ्य पुस्तकें बाल-विवाह बंद करो--अविवाहित ग्रेजुएटों को जापान भेजने का विचार--जापान की उन्नति का रहस्य-यूरोप और एशिया की कला--कला और उपयोगिता--वेषभूषा की प्रणालियाँ अन्न का प्रश्न और गरीबी)

बेलूड़ मठ के निर्माण के दो वर्ष बाद की बात है। सभी स्वामी अब वहीं रहने लगे थे। इन्हीं दिनों में एक दिन सवेरे अपने गुरुदेव के दर्शन करने वहाँ गया हुआ था। मुझे देखकर स्वामी जी मुसकराये और बोले--"आज तो यहीं रहोगे न?"

"अवश्य", मैंने कहा और इधर-उधर की कुछ बातें करने के बाद मैंने पूछा--"महाराज, बच्चों की शिक्षा-पद्धति कैसी होनी चाहिए ?"

स्वामी जी--गुरुगृहवास--गुरु के साथ रहना।

प्रश्न--कैसे?

स्वामी जी--जैसे प्राचीन काल में होता था। किंतु आज की शिक्षा में पाश्चात्य विज्ञान का भी समावेश होना चाहिए। दोनों ही आवश्यक हैं।

प्रश्न--पर आज की विश्वविद्यालय की शिक्षा में क्या दोष है ?

स्वामी जी--इसमें दोष ही दोष भरे हैं। यह 'बाबू' पैदा करने की मशीन के सिवाय कुछ नहीं है। अगर इतना ही होता, तब भी ठीक था, पर नहीं--इस शिक्षा से लोग किस प्रकार श्रद्धा और विश्वास रहित होते जा रहे हैं। वे कहते हैं कि गीता तो एक प्रक्षिप्त अंश है और वेद देहाती गीत मात्र हैं। वे भारत के बाहर के देशों तथा विषयों के संबंध में तो हर बात जानना चाहते हैं, पर यदि उनसे कोई अपने पूर्वजों के नाम पूछे तो चौदह पीढ़ी तो दूर रही, सात पीढ़ी तक भी नहीं बता सकते।

प्रश्न--पर इससे क्या हुआ? वे अपने पूर्वजों के नाम नहीं जानते तो क्या हानि है ?

स्वामी जी--नहीं, ऐसा मत सोचो। जिस राष्ट्र का कोई अपना इतिहास नहीं है, वह इस संसार में अत्यंत ही हीन और नगण्य है। क्या तुम सोचते हो कि कोई व्यक्ति जिसे सदैव इस बात का विश्वास और अभिमान है कि वह उच्च कुल में उत्पन्न हुआ है, कभी दुश्चरित्र हो सकेगा? ऐसा क्यों होता है ? उसमें जो आत्मविश्वास और स्वाभिमान का भाव है, वह सदैव उसके विचार और कार्य को इतना नियंत्रित रखता है कि ऐसा व्यक्ति सन्मार्ग से च्युत होने की अपेक्षा हँसते हँसते मृत्यु का आलिंगन कर लेगा। इसी तरह राष्ट्र का गौरवमय अतीत राष्ट्र को नियंत्रण में रखता है, और उसका अधःपतन नहीं होने देता। पर मैं जानता हूँ, तुम कहोगे कि हमारा ऐसा कोई अतीत--कोई इतिहास ही नहीं है; जो तुम्हारी तरह सोचते हैं, उन्हीं के लिए हमारे राष्ट्र का कोई इतिहास नहीं है; और तुम्हारे विश्वविद्यालयों के उन तथाकथित विद्वानों के लिए नहीं है--और उन लोगों के लिए नहीं है जो कि पाश्चात्य देशों का एक चक्कर मारकर, यूरोपीय वेशभूषा से सुसज्जित हो भारत लौट आते हैं और बड़बड़ाने लगते हैं--हमारे पास कुछ नहीं है--हम तो बस जंगली हैं। हाँ, यह सच है कि दूसरे देशों का जैसा इतिहास है वैसा हमारा नहीं है, पर इसका यह अर्थ तो नहीं होता कि हमारा कोई इतिहास ही नहीं है। जैसे हम भात खाते हैं और अंग्रेज लोग भात नहीं खाते--तो इससे क्या तुम यह निर्णय कर लोगे कि अंग्रेज भूखे मरते हैं और कुछ दिनों में नष्ट हो जाएंगे। अपने देश में, अपनी जलवायु के अनुकूल जो सरलता से वे उत्पन्न या प्राप्त कर लेते हैं, वही खाकर वे पनपते और पुष्ट होते हैं। इसी तरह हमारे लिए जैसा आवश्यक है, वैसा हमारा भी अपना इतिहास है। और अपनी आँखें बंद कर लेने और चिल्लाने से कि हमारा कोई इतिहास ही नहीं है, वह क्या नष्ट हो जाएगा ? जिनके पास देखने के लिए आँखें हैं, वे जानते हैं कि हमारा इतिहास कितना उज्ज्वल है, और वह देश को किस प्रकार जीवित रख रहा है। किंतु आज उस इतिहास को फिर से लिखने की आवश्यकता है। पाश्चात्य शिक्षा से हमारे युवकों की बदली हुई विचारधारा और बुद्धि को सामने रखकर, आज उस गौरवमय इतिहास को फिर से लिखना होगा, जिससे पाश्चात्य सम्यता से चकित और चकाचौंध में भ्रमित हमारे युवक उसे समझ सकें।

प्रश्न--यह किस प्रकार करना होगा?

स्वामी जी--यह एक बहुत बड़ा विषय है। इस पर कभी और चर्चा करेंगे।' उसके लिए, पहले हमें गुरुगृहवास और उस जैसी अन्य शिक्षाप्रणालियों को पुनर्जीवित करना होगा। आज हमें आवश्यकता है वेदांतयुक्त पाश्चात्य विज्ञान की, ब्रह्मचर्य के आदर्श, और श्रद्धा तथा आत्मविश्वास की। दूसरी बात जिसकी आवश्यकता है, वह है उस शिक्षापद्धति का निर्मूलन, जो मार मारकर गधों को घोड़ा बनाना चाहती है।

प्रश्न--इससे आपका क्या मतलब है ?

स्वामी जी--देखो, कोई भी किसीको कुछ नहीं सिखा सकता। जो शिक्षक यह समझता है कि वह कुछ सिखा रहा है, सारा गुड़ गोबर कर देता है। वेदांत का सिद्धांत है कि मनुष्य के अंतर में ज्ञान का समस्त भण्डार निहित है-एक अबोध शिशु में भी--केवल उसको जाग्रत कर देने की आवश्यकता है, और यही आचार्य का काम है। हमें बच्चों के लिए बस इतना ही करना है कि वे अपने हाथ-पैर, आँख-कान का समुचित उपयोग करना भर सीख लें और फिर सब आसान है। पर इस सबका मूल है धर्म--वही मुख्य है। धर्म तो भात के समान है, शेष सब वस्तुएँ कढ़ी और चटनी जैसी हैं। केवल कढ़ी और चटनी खाने से अपथ्य हो जाता है, और केवल भात खाने से भी। हमारे शिक्षा शास्त्री हमारे बच्चों को केवल तोता बना रहे हैं, और रटा रटाकर उनके मस्तिष्क में कई विषय ठूंसते जा रहे हैं। यदि एक दृष्टि से देखा जाए, तो तुम्हें वाइसराय [1] का कृतज्ञ होना चाहिए कि उन्होंने विश्वविद्यालयी शिक्षा में सुधार करने का प्रस्ताव किया है। इससे उच्च शिक्षा करीब करीब बंद ही हो जाएगी, और देश को कम से कम कुछ साँस लेने और विचार करने का समय तो मिलेगा। वाह ! ग्रेजुएट बनने के लिए क्या दौड़धूप, क्या अहमहमिका लगी है, और कुछ दिन बाद फिर ठंडी पड़ जाती है। और आखिर में वे सीखते क्या हैं--बस यही कि हमारा धर्म, आचार-विचार और रीति-रिवाज़ सब खराब हैं, और पाश्चात्यों की सब बातें अच्छी हैं ! इस तरह हम महानाश को निमंत्रित कर रहे हैं। आखिर इस उच्च शिक्षा के रहने या न रहने से क्या बनता-बिगड़ता है ? यह कहीं ज्यादा अच्छा होगा कि यह उच्च शिक्षा प्राप्त कर नौकरी के लिए दफ्तरों की खाक छानने के बजाए लोग थोड़ी सी यांत्रिक शिक्षा प्राप्त करें जिससे काम-धंधे से लगकर अपना पेट तो पाल सकेंगे।

प्रश्न--हाँ, मारवाड़ी इस बात में होशियार हैं। वे नौकरी नहीं करते, और कोई न कोई व्यापार में लग जाते हैं।

स्वामी जी--बकवास है ! वे देश को रसातल में पहुँचा रहे हैं। वे अपने स्वार्थ को भी नहीं समझते। उनसे तुम लोग कहीं ज्यादा अच्छे हो, क्योंकि तुम्हारा ध्यान कल-कारखानों से वस्तुओं के निर्माण की ओर है। मारवाड़ी लोग अपने व्यापार में जो पैसा लगाते हैं और जिससे उन्हें थोड़ा-बहुत मुनाफ़ा होता है, उससे तो ज्यादातर विदेशियों की ही जेब भरते हैं। यही पैसा अगर वे कुछ कल-कारखानों को खोलने में लगायें, तो देश की भी भलाई होगी और उनका भी मुनाफा बढ़ेगा। केवल काबुली लोगही नौकरी की परवाह नहीं करते। उनकी नस-नस में स्वतंत्रता की भावना भरी है। उनसे जरा नौकरी कर लेने की बात तो कह दो, फिर देखो क्या होता है।

प्रश्न--पर, महाराज, यदि उच्च शिक्षा बंद हो गई, तो लोग फिर पहले जैसे ही मूर्ख बने रहेंगे?

स्वामी जी--क्या मूर्खताभरी बात कहते हो? क्या कभी सिंह भी सियार बन सकता है ? तुम्हारे कहने का क्या मतलब है? क्या कभी यह संभव है कि सृष्टि के आदि काल से जिस देश की संतान अखिल विश्व को शिक्षा देती आ रही है, केवल इसीलिए मूर्ख बन जाएगी कि लॉर्ड कर्जन उच्च शिक्षा बंद कर रहे हैं।

प्रश्न--पर जरा सोचिये तो कि हमारे देशवासी अंग्रेजों के आगमन के पूर्व क्या थे और अब क्या हो गए हैं ?

स्वामी जी--भौतिक शास्त्रों का अध्ययन, और दैनिक उपयोग की वस्तुओं का यंत्रों द्वारा उत्पादन-क्या यही उच्च शिक्षा का अर्थ है ? उच्च शिक्षा का उद्देश्य है--जीवन की समस्याओं को सुलझाना--और आज का सभ्य संसार आज भी इन्हीं समस्याओं पर गहन चिंतन कर रहा है, किंतु हमारे देश में सहस्रों वर्ष पूर्व ही ये गुत्थियाँ सुलझा ली गयीं।

प्रश्न--पर आपका वेदांत भी तो लुप्तप्राय हो रहा था ?

स्वामी जी--संभव है। काल के प्रवाह में, कभी कभी ऐसा भास होता है कि वेदांत का महान प्रकाश अब बुझा, अब बुझा, और जब ऐसी स्थिति आती है, तब भगवान् मानव देह धारण कर पृथ्वी पर आते हैं और फिर धर्म में पुनः वार्ता एवं संलाप एक ऐसी शक्ति, ऐसे जीवन का संचार हो जाता है कि वह फिर एकाध युग तक अदम्य उत्साह से आगे बढ़ता जाता है। आज वही शक्ति और जीवन उसमें फिर आ गया है।

प्रश्न--पर, महाराज, इसका क्या प्रमाण है कि भारत ने ही शेष संसार को शिक्षित किया है?

स्वामी जी--संसार का इतिहास ही इसका साक्षी है। उचित शोध करने पर यही पाया जाता है कि विश्व में ज्ञान की जो विविध शाखाएँ हैं, जो शास्त्र और उदात्त आत्मोन्नतिमूलक विचार हैं--उनका उद्गम भारत से ही हुआ।

स्वामी जी का मुख एक अलौकिक आभा से दीप्त हो गया और वे बड़े उत्साह से इस विषय पर बड़ी देर तक बोलते रहे। उस समय उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं था, और बहुत ज्यादा गर्मी से उनका गला सूख रहा था, उन्हें बार बार प्यास लग रही थी और वे पानी पीते जाते थे। अंत में उन्होंने कहा, "सिंगी, कृपया मेरे लिए बरफ़ के पानी का एक गिलास मँगाओ! मैं फिर तुमको सब अच्छी तरह समझा दूँगा।" पानी पीकर वे फिर बोलने लगे।

स्वामी जी--समझे न, आज आवश्यकता है-विदेशी नियंत्रण हटाकर, हमारे विविध शास्त्रों, विद्याओं का अध्ययन हो, और साथ साथ अंग्रेजी भाषा और पाश्चात्य विज्ञान भी सीखा जाए। हमें उद्योग-धंधों की उन्नति के लिए यांत्रिक-शिक्षा भी प्राप्त करनी होगी, जिससे देश के युवक नौकरी ढूंढ़ने के बजाए अपनी जीविका के लिए समुचित धनोपार्जन भी कर सकें, और दुर्दिन के लिए कुछ बचा भी सकें।

प्रश्न--टोल (संस्कृत पाठशालाओं) के बारे में आपका क्या कहना है ?

स्वामी जी--क्या तुमने उपनिषदों की कथाएँ नहीं पढ़ी हैं ? मैं अभी एक कथा सुनाता हूँ। ब्रह्मचारी सत्यकाम गुरु के पास अध्ययन के लिए गया। गुरु ने उसे गायें चराने जंगल में भेज दिया। गायें चराते-चराते कई मास व्यतीत हो गए। गायों की संख्या भी दुगुनी हो गई। तब सत्यकाम ने आश्रम लौट चलने का विचार किया। मार्ग में एक वृषभ, अग्नि तथा कुछ अन्य प्राणियों ने सत्यकाम को ब्रह्मज्ञान का उपदेश दिया। जब शिष्य आश्रम में गुरु को प्रणाम करने पहुँचा, तो गुरु ने उसे देखते ही जान लिया कि उसने ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लिया है। इस कथा का सार यही है कि सच्ची शिक्षा सर्वदा प्रकृति के संपर्क में रहने से ही प्राप्त होती है। ज्ञान इसी प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। पंडितों के टोल और पाठशालाओं में पढ़कर तो तुम जीवन भर मानवीय बंदर बने रहते हो। बाल्यावस्था से ही जाज्वल्यमान, उज्ज्वल चरित्रयुक्त किसी तपस्वी महापुरुष के सहवास में रहना चाहिए, जिससे कि उच्चतम ज्ञान का जीवित आदर्श सदा दृष्टि के समक्ष रहे। केवल पढ़ लेने भर से कि मिथ्या भाषण पाप है--कोई लाभ नहीं।

हर एक को पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन करने का व्रत लेना चाहिए, तभी हृदय में श्रद्धा और भक्ति का उदय होगा। नहीं तो, जिसमें श्रद्धा और भक्ति नहीं, वह मिथ्या क्यों नहीं बोलेगा? हमारे देश में अध्यापन का महान कार्य सदैव निःस्पृह और त्यागी पुरुषों ने ही किया है। कालांतर में पंडितों ने, ज्ञान और विद्याओं पर एकाधिपत्य कर, उन्हें पाठशालाओं की चहारदीवारी में बंद कर दिया और इस तरह देश का अधःपतन होना शुरू हुआ। जब तक अध्यापन कार्य त्यागी पुरुषों ने किया, तब तक भारत समृद्ध बना रहा।

प्रश्न--महाराज, आपका क्या अर्थ है ? दूसरे देशों में तो संन्यासी नहीं हैं, पर देखिए, उनकी ज्ञान-गरिमा से आज भारत उनके चरण चूम रहा है ?

स्वामी जी--मेरे मित्र, व्यर्थ की बातें मत करो। मैं जो कहता हूँ उस पर ध्यान दो। जब तक इस देश में अध्यापन और शिक्षा का भार, त्यागी और निःस्पृह पुरुष वहन नहीं करेंगे, तब तक भारत को दूसरे देशों के तलवे चाटने पड़ेंगे। तुम नहीं जानते, किस तरह एक निरक्षर युवक ने अपनी निस्पृहता और त्याग के प्रभाव से तुम्हारे बड़े बड़े दिग्गज पंडितों के छक्के छुड़ा दिए ? एक बार दक्षिणेश्वर के मंदिर में पुजारी से विष्णु-प्रतिमा का पैर टूट गया। पंडितों की एक सभा हुई और उन्होंने अपने पुराने पोथे और ग्रंथ देखकर निर्णय दिया कि खंडित मूर्ति का पूजन शास्त्र-विरुद्ध है, और नयी मूर्ति की प्रस्थापना की जाए। इस पर काफ़ी वादविवाद और शोरगुल मचा। अंत में श्री रामकृष्ण बुलाये गए। उन्होंने सब कुछ सुनकर पूछा--"क्या पति पंगु हो जाए, तो पत्नी उसे त्याग देगी?" फिर क्या हुआ? पंडितों ने यह तर्क सुना तो मुँह से शब्द नहीं निकला, मूक हो गए और इस सरल कथन के सामने उनके शास्त्र और भाष्य एक ओर धरे के धरे रह गए। यदि पंडितों की शिक्षा प्रणाली ठीक थी, तो श्री रामकृष्ण क्यों अवतार धारण करते और क्यों पुस्तकीय ज्ञान का उपहास करते ? उनके साथ जिस नूतन जीवन-शक्ति का आविर्भाव हुआ, उससे जब हमारी शिक्षा ओतप्रोत हो जाएगी, तब ही सफलता प्राप्त होगी।

प्रश्न--पर यह कहना सरल है, करना कठिन।

स्वामी जी--यदि यह कार्य सरल होता, तो श्री रामकृष्ण को अवतार धारण करने की आवश्यकता न पड़ती। अब जो करना है, वह यह कि नगर-नगर और ग्राम-ग्राम में एक मठ की स्थापना की जाए। क्या तुम यह कर सकते हो? अधिक नहीं तो, कुछ तो करो ही। कलकत्ते के बीच में एक बड़ा मठ स्थापित करो। एक सुशिक्षित साधु उसका अध्यक्ष रहे और उसके निरीक्षण में दो संन्यासी विज्ञान एवं अन्य विषयों का अध्यापन करें।

प्रश्न--आपको ऐसे संन्यासी कहाँ मिलेंगे?

स्वामी जी--हमें ऐसे संन्यासियों का निर्माण करना होगा। इसीलिए मैं कहता हूँ कि कुछ ऐसे युवकों की आवश्यकता है, जिनके हृदय में देशभक्ति और त्याग की भावना प्रज्वलित हो। एक त्यागी पुरुष जितना शीघ्र किसी विषय पर अधिकार प्राप्त कर लेता है, उतना अन्य कोई नहीं कर सकता।

कुछ समय बाद स्वामी जी बोले--"सिंगी, हमारे इस देश में इतना अधिक काम करना है कि मेरे और तुम्हारे जैसे सहस्र सहस्र लोगों की आवश्यकता है। केवल बात करने से क्या हो सकता है ? देखो, देश कितनी विपन्न और दयनीय स्थिति को प्राप्त हो गया है ! इस समय कुछ करो! बच्चों के लिए उपयोगी एक पुस्तक तक तो इस देश में नहीं है !"

प्रश्न--क्यों, ईश्वरचंद्र विद्यासागर की इतनी सारी किताबें तो हैं ?.

मेरे ऐसा कहते ही स्वामी जी खिलखिलाकर हँस पड़े और कहने लगे--हाँ, उनमें यही पढ़ते हो न--'ईश्वर निराकार चैतन्य स्वरूप', 'सुबल अति सुबोध बालक' (सुबल बहुत बुद्धिमान बालक है) आदि-आदि, पर इससे काम नहीं चलने का। हमें बंगाली और साथ-साथ अंग्रेजी में कुछ ऐसी पुस्तकों का प्रकाशन करना चाहिए, जिनमें बहुत ही सरल और सीधी भाषा में रामायण, महाभारत और उपनिषदों की कथाओं का संग्रह हो, और फिर ये पुस्तकें बालकों को पढ़ने के लिए दी जाएं।

ग्यारह बज रहे थे। आकाश में बादल घिर आए थे और ठंडी हवा चलने लगी थी। वर्षा होने की संभावना से स्वामी जी प्रसन्न हो उठे। उन्होंने उठकर कहा, "सिंगी, चलो गंगा तट पर चलें।" हम दोनों चल पड़े। मार्ग में स्वामी जी ने कालिदास के मेघदूत के कई श्लोक सुनाये। पर उनकी विचार-धारा का अंतरप्रवाह एक ही था--भारत का हित। वे बोल उठे--"सिंगी, देखो, तुम एक काम कर सकते हो? क्या कुछ दिनों तक हमारे लड़कों के विवाह बंद नहीं कर सकते?"

मैंने कहा--"महाराज, यह कैसे होगा, जब बाबू लोग विवाहों को सस्ता बनाने के सारे प्रयत्न कर रहे हैं ?"

स्वामी जी--तुम इसकी चिंता न करो; काल का प्रवाह कौन बदल सकता है ! इस प्रकार के सब आंदोलन व्यर्थ हैं। कुछ दिन शोरगुल रहेगा, फिर सब शांत हो जाएंगे। विवाह-शादियाँ जितनी ज्यादा खर्चीली होती जाएंगी, उतना ही देश का भला होगा। परीक्षाएँ पास करने और फिर विवाह करने के लिए कितनी भगदड़, कितनी दौड़धूप हो रही है ! ऐसा लगता है, कोई कुंआरा नहीं बचेगा; पर अगले वर्ष फिर वही हाल होता है।

कुछ क्षण स्वामी जी शांत रहे। फिर बोले, "यदि मुझे कुछ अविवाहित ग्रेजुएट मिल जाएं, तो मैं उन्हें जापान भेजकर यांत्रिक शिक्षा दिलाने का प्रबंध कर दूँगा, जिससे कि जब वे स्वदेश लौटें, तो अपने ज्ञान से भारत का कुछ हित कर सकें। कितना अच्छा होगा!"

प्रश्न--महाराज, इंग्लैंड की अपेक्षा जापान जाना क्या हमारे लिए ज्यादा लाभदायक होगा?

स्वामी जी--अवश्य ! मेरे मत में हमारे शिक्षित और धनी व्यक्ति यदि जापान जाएं और वहाँ का हालचाल देखें, तो उनकी आँखें खुल जाएंगी।

प्रश्न--वह कैसे?

स्वामी जी--जापान में तुम पाओंगे कि उन्होंने दूसरों से जो सीखा है, उसे आत्मसात् कर अपना बना लिया है, पचा लिया है। हमने जो विदेशियों से सीखा, उसे हम पचा नहीं पाए। उन्होंने यूरोपवासियों की हर चीज ग्रहण की, पर वे जापानी ही बने रहे, यूरोपीय नहीं बने; पर हमारे यहाँ तो पाश्चात्य ढंग से रहने का एक संक्रामक रोग पैदा हो गया है।

मैंने कहा--महाराज, मैंने कुछ जापानी चित्रकला के नमूने देखे हैं, उनकी कला की प्रशंसा किए बिना नहीं रहा जाता। और उनकी प्रेरणा का स्रोत उनकी अपनी संस्कृति है (वे अनुकरण के परे हैं)।

स्वामी जी--बिल्कुल ठीक है। आज जापान एक महान राष्ट्र है, और इसका कारण हैं उनकी कला। देखते नहीं, हमारे समान वे भी एशियावासी हैं और यद्यपि आज हम अपना सर्वस्व खो बैठे हैं, फिर भी जो कुछ हमारे पास अवशेष है, वही विश्व को चकित कर देने के लिए काफी है। एशिया की आत्मा ही कलात्मक है--एशिया का हृदय चिरकाल से कला की क्रीडास्थली रहा है। एशियावासी कला-शून्य वस्तु का कभी उपयोग ही नहीं करता--उसके उपयोग की हर वस्तु कला से शोभित है। तुम नहीं जानते, हमारे यहाँ कला हमारे धार्मिक जीवन का एक अंग बन गई है ? हमारे देश में कोई युवती तीज-त्यौहार, पर्व-उत्सव के दिन यदि घर के आँगन और भीत पर चावल के पीठा से सुंदर चित्र बनाना जानती है, तो उसको कितनी प्रशंसा होती है ! श्री रामकृष्ण स्वयं कितने महान कलाकार थे!

प्रश्न--अंग्रेजों की कला भी अच्छी है; क्या नहीं है?

स्वामी जी--तुम कितने जड़ मूर्ख हो! पर तुम्हें दोष देने से क्या लाभ, जब कि सर्वसाधारण की यही धारणा है! अफसोस ! आज देश की यह दशा हो गई है ! आज हम अपने सोने को तो पीतल समझ बैठे हैं, और दूसरों का पीतल हमारे लिए सोना बन गया है! यह हमारी आधुनिक शिक्षा का जादू है! देखो, यूरोपीय जब से एशिया के संपर्क में आए हैं, तब से कहीं उन्होंने अपने जीवन को कलामय बनाने का प्रयत्न शुरू किया !

मैं--महाराज, यदि कोई आपकी बात सुनेगा तो कहेगा कि आप निराशावादी हो रहे हैं।

स्वामी जी--स्वाभाविक है ! जो जड़ हो गए हैं, वे और क्या सोच सकेंगे? उफ़! कोई मेरी आँखों से देखे ! उनकी इमारतें देखो, वे कितनी साधारण, कितनी अर्थशून्य हैं! इन विशाल सरकारी इमारतों को देखो, क्या इनका बाह्यस्वरूप देखकर कुछ अनुमान लगाया जा सकता है कि ये किस भाव, किस आदर्श की प्रतीक हैं ?--नहीं, क्योंकि ये सब प्रतीक-शून्य हैं। पाश्चात्यों का पहनावा ही लो--उनके तंग कोट, सीधे पैंट शरीर पर इतने तंग और चिपके होते हैं कि बिल्कुल भद्दे मालूम देते हैं; नहीं ? पर हम लोग, पता नहीं, उसमें क्या सुंदरता देखते हैं ? जिसे देखो, कोट-पतलून डाँटे है। इस देश का भ्रमण तो करो, और यदि देखने के लिए आँखें हैं और समझने के लिए बुद्धि है तो देखो--इस देश के प्राचीन भग्नावशेषों को देखो--उनके देखने भर से ही मालूम होता है, उनमें कितने भाव भरे हैं, कितनी कला भरी है। उनका जलपात्र है--काँच का गिलास, पर हमारा है धातु-निर्मित लोटा--दोनों में कौन कलापूर्ण है ? तुमने देहातों में किसानों के घर देखे हैं ?

मैं--जी हाँ, अवश्य।

स्वामी जी--उनमें क्या देखा?

मेरी समझ में नहीं आया क्या कहूँ। फिर भी मैंने उत्तर दिया--"महाराज, वे अत्यंत साफ-सुथरे होते है और रोज़ उनका आँगन लीपा-पोता जाता है।"

स्वामी जी--क्या तुमने उनके अन्न-भंडार देखे? उनमें कितनी कला है ! उनकी मिट्टी की दीवालों पर भी कितने प्रकार के चित्र बने होते हैं! और जरा पाश्चात्य देशों में जाकर देखो, निम्न वर्ग के लोग किस तरह रहते हैं। तब तुम्हें मालूम होगा कि दोनों में कितना महान अंतर है। उनका आदर्श है उपयोगिता: हमारा है कला। पश्चिम का निवासी हर एक वस्तु में उपयोगिता ढूँढ़ता है, और हम कला। पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त कर हमने कलापूर्ण लोटा तो फेंक दिया और उसके स्थान में, हमारे घरों में विदेशी तामचीनी के गिलास विराजमान हो गए हैं। हमने इस उपयोगितावाद के आदर्श को इस सीमा तक अपना लिया है कि अब वह हास्यास्पद लगने लगा है! अब हमें उपयोगिता और कला के समन्वय की आवश्यकता है। जापान यह समन्वय लाने में जल्दी सफल हो गया और उसने अभूतपूर्व प्रगति कर ली। अब जापान पाश्चात्य देशों को भी सिखाने की क्षमता रखता है।

प्रश्न--विश्व में किस राष्ट्र की वेशभूषा सर्वोत्तम है ?

स्वामी जी--आर्यों की। यूरोपवासी भी इसे स्वीकार करते हैं। आर्यों के परिधान की पटलियाँ किस कलापूर्ण ढंग से लटकती हैं। अधिकांश देशों के राज वस्त्र, आर्यों की वेशभूषा की ही नकल हैं, उनमें भी आर्यों के समान ही पटलियाँ बनाकर लटकाने का यत्न किया जाता है; और इन राजवस्त्रों में तथा उन देशों की सर्वसाधारण की वेशभूषा में बहुत अंतर है। सिंगी, तुम भी ये भद्दे यूरोपीय कमीज पहनना छोड़ दो।

प्रश्न--क्यों, महाराज?

स्वामी जी--इसलिए कि पाश्चात्य लोग इनका केवल अंतर्परिधान के रूप में ही उपयोग करते हैं। वे उसे सदैव कोट और जैकेट के नीचे ही पहनते हैं, केवल कमीज़ कभी नहीं पहनते। पर हम बंगाली कितनी भूल कर रहे हैं। जिसे देखो कोट, पतलून, कमीज़ धारण करने में गर्व का अनुभव करता है--जैसे हमारा कोई राष्ट्रीय, प्राचीन वेश ही न हो, जैसे वेशभूषा के संबंध में कोई नियम ही न हो, कोई विधि-परिपाटी या प्रणाली ही न हो और जिसकी जो मर्जी आवे और जो दिखे, वही कपड़े पहन ले ! हमारे यहाँ, नीच जाति का छुआ हुआ अन्न यदि कोई खा लेता है, तो उसे जात बाहर कर देते हैं। यदि यही नियम परकीय वेशभूषा धारण करने को लगाया जाए, तो कितना अच्छा होगा! अपनी प्राचीन भारतीय वेशभूषा क्यों नहीं धारण की जाती? इस यूरोपीय कोट-कमीज के पहनने में कौन सी शान है? क्या अर्थ है ?

अब वर्षा होने लगी, और भोजन-वेलासूचक घंटी भी बज गई थी। इसलिए सबके साथ हम भी प्रसाद ग्रहण करने गए। भोजन करते करते स्वामी जी बोले--"भोजन ऐसा रहे कि परिमाण में कम, पर पुष्टिकारक हो। पेट को ढेर सारे भात से ढूंस देना ही आलस्य का मूल है।" कुछ देर बाद वे फिर बोले--"जापानियों को देखो, वे दिन में दो-तीन बार दाल के साथ भात खाते हैं। वे कई बार भोजन करते हैं, पर हर समय खाते थोड़ा थोड़ा ही हैं। शरीर से तगड़े लोग भी एक बार में खाते कम ही हैं, अधिक बार भले ही खा लें। उनमें जो घर के अच्छे होते हैं, वे प्रतिदिन मांस भी खाते हैं। पर हम दिन में दो बार, गले तक को पेट भात से भर लेते हैं और हमारी सारी शक्ति उस भात को पचाने में ही समाप्त हो जाती है।

प्रश्न--क्या हम गरीब बंगालियों के लिए मांस खाना संभव है ?

स्वामी जी--क्यों नहीं? थोड़ा थोड़ा तो खा ही सकते हैं। एक दिन में पाव भर काफ़ी है। हमारा सबसे बड़ा दोष है--आलस, और यही हमारी गुलामी का कारण है। मान लो किसी की नौकरी छूट गई, या घर में जो दो-तीन आदमी कमाने वाले थे, उनमें से कोई मर गया, तो लोग क्या करते हैं ? वे या तो बच्चों का दूध बंद कर देते हैं या दिन में एक बार खाते हैं और कभी शाम को भात ही खाकर सो जाते हैं !

प्रश्न--पर ऐसी परिस्थिति में और कर ही क्या सकते हैं ?

स्वामी जी--पर वे ज़्यादा मेहनत कर, थोड़ा सा और कमा लेने का प्रयत्न क्यों नहीं करते, जिससे कम से कम दो बार भोजन तो मिल जाए? पर नहीं--मेहनत कौन करे, उन्हें अड्डों पर जाकर गप्पें लगाने तथा समय नष्ट करने की आदत जो पड़ गई है! यदि लोग केवल कभी इतना ही जान पायें कि वे समय का कितना नाश और दुरुपयोग कर रहे हैं, तो इस देश की कायापलट हो जाए!

(गीता-गायक भगवान् श्री कृष्ण का चित्र--गीता में कर्म

का अर्थ--अहंकार और आत्मसमर्पण--बुरे भले की समस्या--

निष्ठा का मूल्य--मूर्तिपूजा का उद्गम--तांत्रिकवाद--योगों

का समन्वय--नारी के प्रति आदर-भाव)

स्वामी जी की द्वितीय अमेरिका-यात्रा (१८९९) के लिए तैयारियाँ की जा रही थीं। वे अपने एक मित्र से मिलने कलकत्ता गए हुये थे और लौटते समय कुछ क्षण बागबाजार में बलराम बाबू के घर रुक गए थे। बेलूड़ मठ तक साथ चलने के लिए उन्होंने अपने एक अन्य मित्र को बुलवा भेजा। उनके आने पर स्वामी जी का और उनका इस प्रकार वार्तालाप हुआ--

स्वामी जी--आज एक मजेदार बात हुई। मैं एक मित्र के घर गया था। उन्होंने एक चित्र बनवाया था--विषय था कुरुक्षेत्र में अर्जुन-कृष्ण संवाद। श्री कृष्ण रथ में खड़े हैं, हाथ में रास है, और अर्जुन को गीता का उपदेश कर रहे हैं। उन्होंने मुझे चित्र दिखाकर मेरी सम्मति माँगी। मैंने कहा, ठीक ही है। किंतु जब वे न माने, तो उन्हें मुझे, अपना सच्चा मत बताना पड़ा कि उस चित्र में मुझे प्रशंसा योग्य कुछ नहीं दिखायी पड़ा। प्रथम तो श्री कृष्ण के युग का रथ आज के स्तूपाकार वाहनों के समान नहीं होता था और दूसरे श्री कृष्ण की आकृति में भावाभिव्यक्ति का नितांत अभाव है।

प्रश्न--क्या उस युग के रथ स्तूपाकार नहीं होते थे?

स्वामी जी--क्या तुम नहीं जानते कि बौद्ध युग के बाद इस देश की हर बात में एक प्रकार की अव्यवस्था सी आ गई। प्राचीन राजागण स्तूपाकार रथों में कभी युद्ध नहीं करते थे। राजस्थान में आज भी कुछ रथ हैं, जो उन प्राचीन रथों से कुछ मिलते-जुलते हैं। यूनान की पौराणिक कथाओं में वर्णित रथों के तुमने चित्र देखे हैं ? उनमें दो चाक होते हैं और उन पर पीछे से चढ़ा जाता है। हमारे रथ भी ऐसे ही थे। यदि चित्र के इन गौण अंगों का ही अंकन सही नहीं हुआ, तो चित्र बनाने से क्या लाभ? ऐतिहासिक चित्र तभी उच्च कोटि का होगा, जब उचित अध्ययन और गवेषणा के पश्चात्, वस्तु का वैसा ही चित्रण किया जाए, जैसी वह उस युग में थी। यदि चित्र में यथार्थता नहीं है, तो उसका कोई मूल्य नहीं। आजकल, हमारे जो युवक चित्रकला के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, वे साधारण तया ऐसे होते हैं, जिन्हें विद्याध्ययन में कोई सफलता नहीं मिली और जिनसे घर वाले भी निकम्मा समझकर निराश हो गए हैं। इन व्यक्तियों से आप कैसे कला कृति की आशा कर सकते हैं ? सुंदर चित्र बनाने के लिए भी उतनी ही प्रतिभा लगती है, जितनी कि एक श्रेष्ठ रूपक लिखने में।

प्रश्न--तो फिर इस चित्र में श्री कृष्ण का चित्रण कैसा होना चाहिए था ?

स्वामी जी--श्री कृष्ण का चित्रण वैसा ही होना चाहिए, जैसे वे थे--गीता के मूर्तस्वरूप। उस समय वे किंकर्तव्यविमूढ़, मोहग्रस्त और कार्पण्यदोषोपहत अर्जुन को धर्म का उपदेश कर रहे थे, इसलिए श्री कृष्ण की छबि से गीता का मूल तत्त्व अभिव्यक्त होना चाहिए।

कहते कहते स्वामी जी ने अपनी मुद्रा और भावभंगिमा वैसी ही बना ली, जिस तरह श्री कृष्ण की चित्र में होनी चाहिए और बोले--"देखो, श्री कृष्ण ने घोड़ों की रास इस प्रकार पकड़ रखी है--रास इतनी तनी है कि घोड़े अपने पिछले फैरों पर उठ गए हैं, उनके अगले पैर हवा में उठे हैं, और मुँह खुल गए हैं। इससे श्री कृष्ण की छबि में उनकी महान कर्मशीलता प्रकट होती है। उनका मित्र, प्रथितयश योद्धा दोनों सेनाओं के बीच में, धनुषबाण एक ओर फेंक, रथ में 'कायर की भाँति शिथिल और शोकमग्न होकर बैठ गया है--और श्री कृष्ण, एक हाथ में चाबुक लिये और दूसरे हाथ से रास खीचे अर्जुन की ओर थोड़ा सा मुड़ गए हैं--उनका शिशु-सरल मुख अपार्थिव-स्वर्गीय प्रेम और सहानुभूति से दीप्त हो उठा है--और वे अपने अनन्य सखा को गीता का सन्देश सुना रहे हैं। अब बताओ, गीता-गायक के इस प्रकार के चित्र से मन में कैसे भाव जाग्रत होंगे?

मित्र--ऐसे चित्र से श्री कृष्ण कर्मरत स्थितप्रज्ञ-महान कर्मयोगी मालूम होंगे।

स्वामी जी--हाँ, बिल्कुल ठीक है। शरीर का एक एक अंग कार्यरत है और फिर भी मुख पर नील गगन की गंभीर शांति और प्रसन्नता व्याप्त है। यही तो गीता का मूल तत्त्व है--सब परिस्थितियों में शांत और स्थिर, अनुद्विग्न रहते हुए-शरीर, मन और आत्मा ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देना।

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।

स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत॥

(गीता, ४।१८)

अर्थात 'कर्म करते हुए भी जिसका मन शांत है, और जब कोई बाह्य चेष्टा नहीं हो रही है, तब भी जिसमें ब्रह्म-चिंतन रूपी महान कर्म की धारा सतत बह रही है-वही मनुष्यों में बुद्धिमान् है, वही योगी है, वही कर्म-कुशल है।'

इसी समय, जो व्यक्ति नाव का प्रबंध करने गया था, वह लौट आया और उसने सूचना दी कि नाव तैयार है। इसलिए स्वामी जी ने अपने मित्र से कहा "चलो अब मठ चलें। तुम घर पर तो कहकर आए ही होगे कि मेरे साथ मठ तक जा रहे हो।"

नौका तक जाते जाते उनका वार्तालाप चलता ही रहा।

स्वामी जी--फल की चिंता त्यागकर, मन और आत्मा को प्रभु के चरणारविंद में लगाकर, कर्म करना--अनंत कर्म करना--गीता के इस निष्काम कर्म योग का संदेश हर एक तक पहुँचना चाहिए।

प्रश्न--क्या यही कर्मयोग है ?

स्वामी जी--हाँ, यही कर्मयोग है--पर बिना साधना के कोई कर्मयोगी नहीं बन सकता। चारों योगों का मधुर समन्वय जब तक नहीं हो पाता तब तक किस प्रकार मन और आत्मा प्रभु में तल्लीन हो सकेंगी।

प्रश्न--साधारणतया यह धारणा हो गई है कि गीता में कम से केवल वैदिक यज्ञों और धार्मिक अनुष्ठानों से ही तात्पर्य है और किसी अन्य प्रकार का कर्म निरर्थक है।

स्वामी जी--यह ठीक है, पर इस परिभाषा को विस्तृत करना होगा। तुम्हारी हर चेष्टा, एक एक साँस और मन में प्रतिक्षण उठनेवाले एक एक विचार के लिए कौन उत्तरदायी है ? क्या तुम स्वयं नहीं?

मित्र--हूँ भी और नहीं भी हूँ। मेरे पास इसका कोई संतोषप्रद उत्तर नहीं है। सच तो यह है कि मनुष्य केवल निमित्त मात्र है, कर्म तो ईश्वर कराते हैं। और जब उनकी इच्छा और प्रेरणा से ये शुभाशुभ कर्म होते हैं, तो मैं उनके लिए कैसे उत्तरदायी हो सकता हूँ।

स्वामी जी--ठीक है, पर यह सिद्धावस्था प्राप्त हो जाने पर ही कहा जा सकता है। जब कर्म से मन और चित्त शुद्ध हो जाता है और इसकी प्रतीति हो जाती है कि सारे काम ईश्वर ही करा रहे हैं--तभी ऐसा कहने का अधिकार प्राप्त होता है, नहीं तो यह कोरी बकवास और प्रलाप ही है।

प्रश्न--क्यों? यदि किसीकी तर्क से यह निश्चित धारणा हो गई हो कि सब काम ईश्वर ही करा रहे हैं तो?

स्वामी जी--जिस क्षण यह दृढ़ धारणा हो जाती है, उस क्षण में किए गए कार्य को यह उक्ति लागू की जा सकती है। पर ऐसी धारणा क्षण भर ही टिकती है--ज्यादा नहीं। अच्छा, जरा मनन करके तो देखो कि अपने दैनिक जीवन में ऐसे कितने काम हैं, जिनके संबंध में यह कहा जा सकता है कि ये काम मैं--स्वयं--अहं भाव से नहीं कर रहा हूँ ? कब तक मनुष्य को इस बात की स्मृति रहती है कि ईश्वर ही ये सब कार्य-कलाप करवा रहे हैं ? किंतु इस प्रकार सतत चिंतन, मनन और अध्यवसाय से, धीरे धीरे एक अवस्था आ जाती है, जब अहं भाव नष्ट हो जाता है, और उसके स्थान में प्रभु की स्थापना हो जाती है। तब तुम यह कह सकोगे कि अंतर्यामी प्रभु ही मुझसे ये सब काम करा रहे हैं। किंतु, मित्र, यदि हृदय में अहंकार भरा हुआ है, तो वहाँ ईश्वर के लिए स्थान ही कहाँ रह पाता है ? तब हृदय में ईश्वर रह ही नहीं सकते।

प्रश्न--पर दुष्कर्म की प्रेरणा भी तो ईश्वर ही देते हैं ?

स्वामी जी--नहीं, कभी नहीं। इस तरह सोचना प्रभु का तिरस्कार है। ईश्वर दुष्कर्म में किसीको प्रेरित नहीं करते--दुष्कर्म का कारण तो मनुष्य की आत्मतुष्टि की इच्छा है। यदि कोई ऐसा कहे कि ईश्वर सव कर्म कराते हैं, और स्वेच्छा पूर्वक दुष्कर्म करता जाए, तो उसका नाश अवश्यम्भावी है। यही तो आत्मप्रवंचना का मूल है। क्या तुम्हें कभी कोई सत्कर्म करने पर प्रसन्नता नहीं होती? और फिर तुम उस सत्कार्य करने का श्रेय अपने को देने लगते हो--कहते हो यह मैंने किया, मैंने। यह मानवी स्वभाव है--मनुष्य' ऐसा कहे बिना नहीं रहेगा। किंतु यह कितना अनुचित है कि अच्छे काम का श्रेय तो मनुष्य स्वयं ले ले और बुरे काम का दोष ईश्वर के सिर पर मढ़ दे। यह एक खतरनाक तर्क है--और जिन्होंने वेदांत और गीता पढ़ ली, पर उसका मर्म नहीं समझा, वे ही इस तरह की बात करते हैं। कभी ऐसा नहीं सोचना चाहिए, बल्कि यह मानना चाहिए कि हमारे भले काम तो भगवान् की प्रेरणा से हुए और बुरे काम के लिए हम स्वयं उत्तरदायी हैं। इससे परमात्मा में श्रद्धा और विश्वास जाग्रत होगा, और पग पग पर उनकी असीम कृपा का अनुभव होने लगेगा। सच तो यह है कि 'अहं' का निर्माण करनेवाले हम ही हैं, कोई और नहीं। यही सदसद्विवेक है, यही वेदांत है। किंतु आत्म सिद्धि और साक्षात्कार के बिना कोई यह बात नहीं समझ पाता। इसलिए साधक को इस द्वैत की भावना से ही प्रारंभ में अपनी साधना शुरू करनी चाहिए कि हमारे अच्छे काम तो परमेश्वर हमसे करवाते हैं, और बुरे काम स्वयं प्रेरित हैं। चित्त-शुद्धि का यह सबसे सरल मार्ग है। इसीलिए वैष्णवों में यह द्वैत-भाव इतना दृढ़ दिखायी पड़ता है। प्रारंभ में ही अद्वैत-भाव प्राप्त कर लेना दुष्कर है। किंतु धीरे-धीरे द्वैत की भावना अद्वैत की ओर ले जाती है।

ढोंग और आत्मप्रवंचना बहुत खतरनाक है। अगर जानबूझ कर कोई अपने को धोखा नहीं दे रहा है, और किसीको यह दृढ़ विश्वास हो गया है कि नीच से नीच कृत्य भी ईश्वर की इच्छा और प्रेरणा से ही होता है, तो मेरा यह विश्वास है कि उस व्यक्ति से कोई नीच काम भविष्य में नहीं होगा। शीघ्र ही उसके मन के सब विकार नष्ट हो जाएंगे। हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों के प्रणेता यह बात अच्छी तरह समझते थे। और मैं तो सोचता हूँ, तांत्रिक पद्धति की पूजा हमारे देश में बौद्ध-धर्म के अवनति-काल में शुरू हुई, जब कि बौद्धों के अत्याचारों से त्रस्त होकर लोग छिप छिप कर वैदिक यज्ञानुष्ठान करने लगे। दो दो महीनों तक लगातार यज्ञ करने का अब उन्हें कोई अवसर ही नहीं मिल पाता था, इसलिए वे मिट्टी की मूर्ति बनाकर, उसकी रातोंरात पूजा कर लेते और फिर पानी में उसे विसर्जित कर देते, जिससे पूजा का कोई चिह्न सवेरे शेष न रह जाए। मनुष्य को एक मूर्त--पार्थिव प्रतीक चाहिए, उसके बिना उसके हृदय को संतोष नहीं मिलता। इसलिए हर घर में यह रात की पूजा शुरू हो गई। फिर मनुष्यों की प्रवृत्तियाँ भी कुछ इंद्रिय सुखभोग की ओर उन्मुख हो गई थीं। श्री रामकृष्ण कहा करते थे कि कुछ लोग घर में भंगी के दरवाजे से आते हैं। इसलिए जब उस युग के धर्माचार्यों ने देखा कि कुछ लोग अपनी दुष्ट प्रवृत्तियों और दुष्ट स्वभाव के कारण धर्म-विमुख हो गए हैं, धार्मिक क्रिया-कलापों और यज्ञानुष्ठानों में भाग नहीं लेते हैं, तो उन्हें धीरे धीरे, क्रम से धर्म और सदाचार के मार्ग पर लाने के लिए, उन्होंने इस तान्त्रिक पूजा-प्रणाली का आविष्कार किया।

प्रश्न--जब वे तान्त्रिक पूजा में होनेवाले नीच कर्म धर्मसम्मत और अच्छा समझकर करने लगे, तो इससे उनकी दुष्प्रवृत्तियाँ कैसे नष्ट हो सकती थीं।

स्वामी जी--नहीं, अब उनकी वे प्रवृत्तियाँ विपरीत दिशा में अग्रसर हो गयीं--अब उनके आचरण का लक्ष्य ईश्वर-प्राप्ति हो गया।

प्रश्न--पर क्या वास्तव में यह संभव है ?

स्वामी जी--क्यों नहीं? ईश्वर-प्राप्ति के लक्ष्य से किए गए किसी भी काम का फल शुभ ही होता है। लक्ष्य अच्छा रहे--फिर एक ही बात है। और बताओ, उनके सफल होने में क्या बाधा हो सकती है ?

प्रश्न--किंतु इस तरह की साधना करनेवाले अधिकांश मांस-मदिरा आदि प्रलोभनों में फँस जाते हैं।

स्वामी जी--हाँ, और इसीलिए भगवान् श्री रामकृष्ण देव को आना पड़ा। इस प्रकार की तांत्रिक साधना के दिन अब बीत गए। उन्होंने भी तांत्रिक साधनाएँ की, पर उस तरह नहीं। जहाँ मदिरापान का विधान होता, वहाँ वे उसकी केवल एक बूंद से अपने ललाट का स्पर्श करा देते। तांत्रिक साधना में फिसलने का बहुत ज़्यादा डर है। इसीलिए तो मैं कहता हूँ, इस प्रांत में तांत्रिक साधनाओं की अब इति होनी चाहिए। अब हमें इन साधनाओं से आगे बढ़कर, वेदों का अध्ययन करना चाहिए। चारों योगों के एक मधुर समन्वय का अभ्यास करना चाहिए और ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण करना चाहिए।

प्रश्न--चारों योगों के समन्वय से आपका क्या तात्पर्य है ?

स्वामी जी--सत् और असत् का विवेक, विकारशून्यता और भक्ति, कर्म और ध्यानयोग का अभ्यास--और इसके साथ साथ स्त्रियों के प्रति आदरभाव होना चाहिए।

प्रश्न--स्त्रियों के प्रति आदर किस तरह प्रकट किया जाए?

स्वामी जी--स्त्रियाँ आदि-शक्ति जगन्माता की प्रतीक हैं। जिस दिन से हम माँ की सच्ची पूजा करने लगेंगे, और हर एक व्यक्ति माँ के लिए अपना बलिदान दे देगा, उसी दिन से भारत का यथार्थ में भला होने लगेगा और वह समृद्धि के मार्ग पर अग्रसर होता जाएगा।

प्रश्न--स्वामी जी, आपके बाल्यकाल में जब हम आपसे विवाह कर लेने को कहते, तो आप कहा करते थे कि 'मैं विवाह नहीं करूँगा, और तुम लोग देखोगे कि मैं क्या बनता हूँ।' आपने अपना कथन सत्य कर दिखाया।

स्वामी जी--हाँ बंधु ! तुम्हें तो मालूम ही है, उन दिनों मेरे पास खाने को भी नहीं था, और साथ ही मुझे कठिन परिश्रम भी करना पड़ता था। ओह कितना कठोर श्रम था वह ! आज अमेरिकावालों ने प्रेम से मुझे यह अच्छा सा बिस्तर दे दिया है, और खाने को भी मिल ही जाता है। पर मेरे लिए शारीरिक सुखों का विधान नहीं है, तथा गद्दे पर लेटने से तो मेरी बीमारी बढ़ जाती है, और मेरा दम घुटने लगता है। पलंग से उतरकर फिर जब मैं ज़मीन पर सोता हूँ, तब मुझे आराम मिलता है।

(राजदरबारों का शैक्षणिक महत्त्व -- स्वतंत्रता और अनुशासन -- स्वामी विवेकानन्द की उदारहृदयता -- सभ्यता की कसौटी)

हमारे वार्तालाप या संगीत आदि सामूहिक कार्यकलापों में आत्मनियंत्रण और संयम का शोचनीय अभाव पद पद पर दृष्टिगोचर होता है। हर एक व्यक्ति अपने को हो सबसे आगे रखना चाहता है। रेलवे स्टेशनों और बंदरगाहों पर जो धक्का-मुक्की और ठेलम-ठेल होती है, वह भी इसी का उदाहरण है। स्वामी जी के एक मित्र की एक दिन मठ में उनसे इस विषय पर बातचीत हुई। स्वामी जी ने कहा, "देखो, अपने यहाँ एक कहावत है--'यदि लड़के की पढ़ने में रुचि नहीं है, तो उसे सभा (राजदरबार) में भेज दो।' सभा का तात्पर्य यहाँ सामाजिक गोष्ठियों और भेटों से नहीं है, जो समय समय पर लोगों के घरों में होती रहती है। सभा का तात्पर्य राजसभाओं और दरबारों से है। जब बंगाल स्वतंत्र था, तो सुबह शाम राजाओं के दरबार लगा करते थे। वहाँ प्रातःकाल राज्य के सभी महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर चर्चा होती थी और उन दिनों कोई समाचारपत्र न होने से, राजा राज धानी के प्रमुख व्यक्तियों से बातचीत कर जनता और राज्य-संबधी समस्त जानकारी प्राप्त करते थे। सभी प्रमुख व्यक्तियों को इन सभाओं में उपस्थित रहना पड़ता था; क्योंकि यदि वे अनुपस्थित रहते, तो राजा इस संबंध में पूछताछ करते। इस प्रकार के दरबार अपने ही देश में नहीं, सभी देशों में सभ्यता और संस्कृति के केंद्र रहे हैं। आजकल, पश्चिम भारत, विशेषतः राजस्थान, इस विषय में बंगाल से कहीं अधिक अच्छा है; क्योंकि वहाँ आज भी हमें इन प्राचीन दरबारों की झलक दिखायी पड़ती है।"

प्रश्न--तो महाराज, क्या हमारे अपने राजा न रहने से, हमारी जनता के आचार-विचार और सभ्यता लुप्त हो गई है ?

स्वामी जी--इस अधःपतन का मूल हमारी स्वार्थ-वृत्ति है। जहाज में चढ़ना हो तो सब यही देखते हैं कि अपनी जान सलामत रहे; संगीत या आमोद-प्रमोद के अन्य कार्यक्रमों में प्रत्येक व्यक्ति आत्मप्रदर्शन करने के प्रयत्न में रहता है। यह सब हमारी इस स्वार्थमयी मनोदशा की ही अभिव्यक्ति है। आत्मत्याग और संयम का अभ्यास ही इसे मिटा सकेगा। यह अभिभावकों और माता-पिता का दोष है कि वे अपने बच्चों को शिष्टाचार की भी शिक्षा नहीं दे सकते। आत्मत्याग ही यथार्थ में सभ्यता की नींव है।

दूसरी ओर हम देखते हैं कि माता-पिता का आवश्यकता से अधिक शासन होने से, हमारे बच्चों को उचित विकास का अवसर नहीं मिल पाता। कुछ माता-पिता संगीत को अनुचित समझते हैं। किंतु जब उनका पुत्र कोई अच्छा सा गीत सुन लेता है, और उसे सीख लेने की उसमें लगन पैदा हो जाती है, तो उसे कोई अड्डा ढूँढ़ना पड़ता है। हम धूम्रपान को अत्यंत गर्हित समझते हैं--तो लड़कों के लिए घर के नौकरों के साथ छिप-छिप कर बीड़ी सिगरेट पीने के सिवाय कोई चारा नहीं रह जाता। हर एक व्यक्ति की असंख्य वृत्तियाँ होती हैं--जिनकी तुष्टि के लिए उसे उचित अवसर और सुविधाएँ चाहिए। पर हमारे देश में वे दी नहीं जातीं। इसलिए यदि हमें यह स्थिति बदलनी है, तो पहले माता-पिता और पालकों को शिक्षित करना होगा। कितनी शोचनीय और दयनीय दशा है हमारी ! अभी तो अपनी सभ्यता का ही हम पर्याप्त विकास नहीं कर पाए, इस पर भी हमारे शिक्षित बाबू लोग चाहते हैं कि अंग्रेज शासन व्यवस्था उन्हें सौंप दे ! मुझे तो हँसी भी आती है और रोना भी। पहले तो हममें वह क्षात्र-भाव ही कहाँ है, जो हर व्यक्ति को आत्मनियंत्रण, संयम, सेवा और आज्ञापालन सिखलाता है। क्षात्रभाव--वीरता, आत्मतुष्टि और प्रभुत्व में नहीं, आत्मत्याग में है। हमें दूसरों के हृदय और जीवन पर अधिकार पाने के पहले, आदेश मिलने पर आगे बढ़कर अपने जीवन की बलि देने के लिए तैयार रहना चाहिए, पहले अपनी बलि देनी चाहिए।

श्री रामकृष्ण के किसी भक्त ने एक बार अपनी एक पुस्तक में, श्री रामकृष्ण को प्रभु का अवतार न माननेवालों की बहुत कटु आलोचना की। स्वामी जी ने उसे बुलाकर इस प्रकार आड़े हाथों लिया--

'तुम्हें इस प्रकार, दूसरों के लिए अपशब्द लिखने का क्या अधिकार था ? यदि उनका तुम्हारे प्रभु में विश्वास नहीं है, तो क्या हुआ? क्या हमने कोई पन्थ चलाया है ? क्या हम रामकृष्णपन्थी हैं, जो, उन सबको अपना दुश्मन समझने लगें जो उनको नहीं पूजते ? अपने इस संकुचित धार्मिक ओछेपन से तुमने श्री रामकृष्ण को छोटा कर दिया है। यदि तुम्हारे प्रभु स्वयं भगवान् ही हैं, तो तुम्हें ऐसा समझना चाहिए कि कोई किसी भी नाम से उन्हें क्यों न पुकारे, वह उनकी ही अर्चना करना है। और दूसरों को अपशब्द कहनेवाले तुम होते कौन हो? क्या तुम सोचते हो कि उनकी निंदा और कटु आलोचना करने से, वे तुम्हारी बात मानने लगेंगे? कैसी मूर्खता है ! दूसरों का हृदय तुम तभी जीत पाओगे, जब तुम उनके लिए अपना बलिदान कर दोगे; नहीं तो वे तुम्हारी बात क्यों सुनेंगे?"

फिर प्रकृतिस्थ होकर स्वामी जी ने कातर स्वर में कहा--"मित्र, क्या कोई, जब तक स्वयं वीर न हो, ईश्वर के प्रति विश्वास और आत्मसमर्पण कर सकता है ? मनुष्य जब तक वीर और महान नहीं बनता, तब तक उसके हृदय का द्वेष और ईर्ष्या कैसे मिट सकती है ? और जब तक हृदय में द्वेष और ईर्ष्या है, तब तक कोई यथार्थ में सभ्य कैसे बन सकता है ? इस देश में वह कठोर पौरुष, वह वीरत्व और महानता की भावना ही कहाँ है ? कहीं भी नहीं। मेरी आँखें उसे ढूंढ़ती रहती हैं--और अब तक मुझे उसका एक--केवल एक ही उदाहरण दिख पाया।"

प्रश्न--आपको वह भावना किसमें दिखी, स्वामी जी?

स्वामी जी--मुझे केवल गिरीश बाबू [2] में सच्ची आत्मसमर्पण की भावना--प्रभु के सेवक होने की सच्ची भावना--दिखती है। और वे इस प्रकार आत्मत्याग के लिए सदैव तत्पर रहते थे, इसीलिए क्या श्री रामकृष्ण ने उनका सब भार अपने पर नहीं ले लिया? प्रभु के प्रति आत्मसमर्पण की कितनी अनन्य भावना है ! मुझे उनके समान दूसरा कोई नहीं दिखा। और उन्हीं से मैंने आत्मसमर्पण का पाठ पढ़ा है।

ऐसा कहते हुए स्वामी जी ने उनके आदर में अपने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

(प्राच्य और पाश्चात्य संगीत)

सन् १८९८ ई की जुलाई में स्वामी जी नीलाम्बर बाबू के उद्यान में स्थित बेलूड़ मठ में निवास कर रहे थे। एक दिन संध्या समय, अपने शिष्यों सहित ध्यान समाप्त कर, स्वामी जी एक कमरे में आकर बैठ गए। बाहर जोरों से वर्षा हो रही थी और ठंडी हवा चल रही थी। स्वामी जी ने सब दरवाजे बंद कर लिये और तानपुरे पर एक गीत गाया। गीत समाप्त होने पर, संगीत पर चर्चा छिड़ गई। स्वामी शिवानन्द जी ने पूछा, "पाश्चात्य संगीत कैसा होता है ?"

स्वामी जी--पाश्चात्य संगीत बहुत उत्कृष्ट है। उसमें गीतमाधुरी, लय उस चरम सीमा को प्राप्त हो चुकी है, जो हमारे संगीत में नहीं है। यह और बात है कि हमारे अनभ्यस्त कानों को पाश्चात्य संगीत रुचिकर प्रतीत नहीं होता, और हम सोचते हैं कि वे सियारों के समान चिल्लाते हैं। पहले मेरा भी यही ख्याल था, पर जब मैंने उनके संगीत को ध्यानपूर्वक सुनना शुरू किया और उस शास्त्र का अध्ययन किया, तो प्रशंसा किए बिना नहीं रह सका। सभी कलाओं का यही हाल है। किसी उत्कृष्ट चित्र पर एक दृष्टि डालकर हम यह नहीं समझ सकते कि उसका सौंदर्य कहाँ छिपा है। जब तक चित्रकला में निपुणता प्राप्त न हो, तब तक किसी कलाकृति का मर्म समझना कठिन है। हमारा संगीत केवल कीर्तन और ध्रुपद में ही शुद्ध रूप में जीवित है। शेष सब इसलामी संगीतकला के अनुकरण से दूषित हो गया है। क्या आप सोचते हैं कि टप्पा को नाक में गाते हुए, बिजली के समान एक सुर से दूसरे सुर पर दौड़ना कोई उत्कृष्ट संगीत है! नहीं? जब तक प्रत्येक सुर--हर एक स्तर पर पूरा नहीं गाया जाता, उत्कृष्ट संगीत की सृष्टि नहीं हो सकती। प्रकृति का अनुकरण कर, चित्रकला चाहे जितनी कलामय बनायी जा सकती है। इसी प्रकार संगीत में भी शास्त्र का अनुकरण कर, जितनी चाहे उतनी दक्षता प्रदर्शित की जा सकती है, और ऐसा संगीत कानों को प्रिय ही लगेगा। भारत में आकर मुसलमानों ने यहाँ की राग-रागनियों को अपनाया तो अवश्य, पर टप्पा-गीतों पर उन्होंने अपने संगीत की इतनी गहरी छाप मारी कि यहाँ का संगीत नष्ट हो गया।

प्रश्न--ऐसा कैसे महाराज! टप्पा तो सबको अच्छा लगता है।

स्वामी जी--हाँ, कुछ लोगों को झींगुरों की झंकार भी अच्छी लगती है। सन्थाल भी अपने संगीत को सर्वोत्कृष्ट मानते हैं। तुम्हारी समझ में यह नहीं आ रहा है कि जब एक स्वर दूसरे स्वर के पीछे इतनी द्रुतगति से आता है, तो केवल संगीत की सुषमा ही नष्ट नहीं होती, वरन् एक प्रकार का बेसुरापन पैदा हो जाता है। सातों सुरों के भिन्न-भिन्न प्रकार के संयोगों को भिन्न भिन्न राग-रागिनियों का नाम दिया गया है। पर टप्पे में, उल्टी ही बात है। यहाँ तो एक राग से दूसरे राग की ओर दौड़ है, एक नयी धुन बनायी जाती है और फिर अलाप में आवाज ऊँची उठाकर उसमें कंप लाया जाता है। भला इसमें कोई राग कैसे शुद्ध और पूर्ण बना रह सकता है ? फिर, यदि केवल प्रभावोत्पादन के लिए ही, लघु-गुरु अलापों का इतना प्रचुर उपयोग किया जाए, तो संगीत की काव्यात्मकता तो बिल्कुल नष्ट हो जाती है। जब से टप्पे का प्रचार हुआ तब से भाव व्यक्त करने के लिए गीतों का गाया जाना तो बिल्कुल ही बंद हो गया। अब, फिर रंगमंच की प्रगति के साथ, शद्ध संगीत का शनैः शनैः जीर्णोद्धार होने लगा है, पर अब भी राग-रागिनियों की अवहेलना ही हो रही है। जो ध्रुपद गाने में दक्ष हैं, उन्हें तो टप्पा कर्कश ही लगता है। पर हमारे संगीत में सुरों का आरोहावरोह बहुत सुंदर बन पड़ता है। फ्रांसवालों ने संगीत के इस गुण को पहचाना है और अपने संगीत में अपनाने का प्रयत्न किया है। उनको देखकर, यूरोप भर में इसका अनुकरण होने लगा।

प्रश्न--महाराज, उनका संगीत तो अधिकतर वीररस जाग्रत करनेवाला है और हमारे संगीत में इसका नितांत अभाव जान पड़ता है।

स्वामी जी--नहीं, हमारे संगीत में भी यह विशेषता है। वीररस के संगीत में भी लय की बहुत आवश्यकता होती है। हमारे संगीत में लय का अभाव है, इसलिए हमारा वीररस का संगीत इतना प्रबल नहीं है। हमारा संगीत धीरे धीरे उन्नत हो रहा था। किंतु मुसलमानों ने आकर उसे इस तरह विकृत कर दिया कि उसकी प्रगति कुंठित हो गई। पाश्चात्यों का संगीत बहुत अधिक उन्नत है। उनके संगीत में करुण और वीररस दोनों की प्रचुरता है। हमारे तूंबे से बने हुए प्राचीन वाद्यों में कोई प्रगति ही नहीं हुई।

प्रश्न--कौन-कौन से राग वीररस प्रधान हैं ?

स्वामी--जी हर एक राग वीररस प्रधान बन सकता है, यदि उसमें लय हो, और वाद्य भी तदनुकूल साज लिए जाएं। कुछ रागिनियाँ भी वीररस प्रधान बन सकती हैं।

भोजन का समय हो गया था, इसलिए चर्चा समाप्त कर दी गई। तदुपरांत स्वामी जी कलकत्ता से आए हुए अतिथियों के सोने की व्यवस्था के बारे में पूछताछ कर अपने शयन-कक्ष में चले गए।

(जाति और गुण के आधार पर वर्णभेद--पश्चिम में

ब्राह्मण और क्षत्रिय--बंगाल में कुलगुरुप्रथा)

स्वामी जी उन दिनों कलकत्ते में बलराम बसु के यहाँ ठहरे हुए थे। एक दिन मैं भेंट करने पहुंच गया। जापान और अमेरिका पर बड़ी देर तक चर्चा होती रही। मैंने पूछा--"स्वामी जी, पश्चिम के देशों में आपके कितने शिष्य हैं ?"

स्वामी जी--बहुत से हैं।

प्रश्न--दो तीन हजार ?

स्वामी जी--शायद अधिक।

प्रश्न--क्या आपने उनको मंत्र-दीक्षा दी है ?

स्वामी जी --हाँ।

प्रश्न--आपने उन्हें प्रणव का उच्चारण करने की अनुमति दे दी?

स्वामी जी--हाँ।

प्रश्न--आपने कैसे अनुमति दी, महाराज ? शास्त्र तो कहते हैं कि शूद्रों को तथा अ-ब्राह्मणों को इसका अधिकार ही नहीं है। और फिर पाश्चात्य लोग तो म्लेच्छ हैं !

स्वामी जी--तुमने यह कैसे जाना कि जिन्हें मैंने दीक्षित किया, वे ब्राह्मण नहीं हैं ?

मैं--आपको भारत के बाहर, यवन और म्लेच्छ देश में ब्राह्मण कहाँ से मिलते ?

स्वामी जी--मेरे सब शिष्य ब्राह्मण हैं। मैं स्वीकार करता हूँ कि अ-ब्राह्मणों को प्रणव का अधिकार नहीं है। पर ब्राह्मण का पुत्र सर्वदा ब्राह्मण ही नहीं होता, यद्यपि उसके ब्राह्मण होने की संभावना अवश्य रहती है। क्या तुमने नहीं सुना, बाग़बाज़ार के अघोर चक्रवर्ती का भतीजा भंगी बन गया और भंगी का सब काम करता है ? वह क्या ब्राह्मण का पुत्र नहीं था ?

जाति से ब्राह्मण होना और गुणों से ब्राह्मण होना--ये दो भिन्न बातें हैं। भारत में ब्राह्मण कुल में जन्म लेने से ही कोई ब्राह्मण कहलाने लगता है, पर पश्चिम में यदि कोई ब्राह्मगगुण से युक्त हो, तो उसे ब्राह्मण ही मानना चाहिए। जिस प्रकार सत्त्व, रज, तम तीन गुण हैं, उसी प्रकार ऐसे गुण हैं जिनसे युक्त होने पर, मनुष्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र होता है। दुर्भाग्यवश आज इस देश में क्षात्र एवं ब्राह्मण गुणों का ह्रास हो रहा है, पर पश्चिम के देशों में लोग क्षत्रियत्व तक पहुँच चुके हैं, और क्षत्रियत्व से एक सीढ़ी आगे ही तो ब्राह्मणत्व है। उनमें से कई लोगों ने तो ब्राह्मण कहलाने की योग्यता भी प्राप्त कर ली है।

प्रश्न--तो जो स्वभाव से सात्त्विक हैं, वे ही आपके अनुसार ब्राह्मण हैं?

स्वामी जी--बिल्कुल। जैसे हर एक व्यक्ति में सत्त्व, रज और तम, तीनों गुण न्यूनाधिक अंश में वर्तमान हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण एवं क्षत्रिय आदि के गुण भी सब मनुष्यों में जन्मजात ही न्यूनाधिक मात्रा में विद्यमान रहते हैं। समय-समय पर उनमें से एक न एक गुण अधिक प्रबल होकर, उनके कार्यकलापों में प्रकट होता रहता है। आप मनुष्य का दैनिक जीवनक्रम लें--जब वह अर्थ-प्राप्ति के लिए किसी की सेवा करता है, तो वह शूद्र होता है; जब वह स्वयं अपने लाभ के लिए कोई क्रय-विक्रय करता है, तो उसकी वैश्य संज्ञा हो जाती है; जब वह अन्याय के विरुद्ध अस्त्र उठाता है, तो उसमें क्षात्रभाव सर्वोपरि होता है; और जब वह ईश्वर चिंतन में लगता है, भगवान् का कीर्तन करता है, तो ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर लेता है। यह स्पष्ट है कि मनुष्य के लिए एक जाति से दूसरी जाति में चला जाना संभव है। यदि नहीं, तो विश्वामित्र ब्राह्मण कैसे बन सके, और परशुराम क्षत्रिय कैसे बन सके ?

प्रश्न--आप जो कहते हैं, सही है, पर हमारे पंडित और कुलगुरु हमें ऐसी शिक्षा क्यों नहीं देते ?

स्वामी जी--यही तो हमारे देश का महान दुर्भाग्य है। पर इस बात को अभी रहने दो।

स्वामी जी ने इसके पश्चात् पाश्चात्यों की व्यवहारवादिता की बहुत प्रशंसा की और बताया कि वे धर्म-साधना में भी कितनी व्यावहारिकता प्रकट करते हैं।

मैं--सच है महाराज, मैंने भी सुना है कि वे जब धर्म-साधन करने लगते हैं तो उनकी आध्यात्मिक और मानसिक शक्तियाँ बहुत शीघ्र जाग्रत होने लगती हैं। अभी कुछ दिन हुए, स्वामी सारदानन्द जी के पास उनके एक पाश्चात्य शिष्य का पत्र आया, जिससे ज्ञात हुआ कि चार ही मास की साधना से उसकी कितनी अधिक आध्यात्मिक प्रगति हो गई है।

स्वामी जी--देखा न। अब तुम समझे कि पश्चिम में ब्राह्मण हैं या नहीं? इस देश में भी ब्राह्मण हैं, पर वे अपने अत्याचारों से देश को शनैः शनैः महानाश के महागर्त में ले जा रहे हैं, और उनका ब्राह्मणत्व नष्टप्राय हो गया है। आज भी गुरु शिष्य को मंत्र-दीक्षा देता है, पर यह उसका व्यवसाय बन गया है। और आजकल गुरु-शिष्य संबंध भी तो कितना विचित्र हो गया है ! कदाचित् गुरु के घर में खाने को दाने भी नहीं रहते, और गुरु-पत्नी उसको यह बात बताती है और कहती है.--"अजी, अपने किसी किसी यजमान के यहाँ एक बार फिर हो आओ। सारे दिन चौसर खेलने से तो पेट भरेगा नहीं।" और गुरु जी जवाब देते हैं--"अच्छा, अच्छा सुन लिया। अब चुप भी तो रहो। कल मुझे याद दिलाना। अभी-अभी मैंने सुना है कि अपने एक यजमान की अच्छी कमायी हुई है। उनके यहाँ बहुत दिन से नहीं गया हूँ। कल चला जाऊँगा।" यह तो है आपके पुरोहितों और कुलगुरुओं की दशा! पाश्चात्य देशों में पुरोहितों और पंडितों का ऐसा पतन नहीं हुआ है। वहाँ के धर्मगुरु अपने से कहीं अच्छे हैं।

(संस्मृतियाँ--भारत के दुभिक्षों की समस्या और आत्मोत्सर्गी कार्यकर्ता--पूर्व और पश्चिम--यह सत्त्व है या तमस--भिक्षुओं का राष्ट्र--'आदान-प्रदान' की नीति--किसी के दोषों के विषय में सीधे उससे कहिए, उसके गुणों की प्रशंसा दूसरों के सम्मुख कीजिए--हर व्यक्ति विवेकानन्द बन सकता है--अखंड ब्रह्मचर्य ही शक्ति का रहस्य है--समाधि और कर्म)

स्वामी जी के घर के पास हम लोगों का घर था। एक मुहल्ले के लड़के होने के कारण हम लोगों ने बचपन में उनके साथ कितने खेल खेले हैं। बचपन से उनके ऊपर मेरी कुछ विशेष आस्था थी। यह मेरा पक्का विश्वास था कि वे एक बहुत बड़े आदमी होंगे। उनके संन्यासी हो जाने पर तो यही बात मन में आयी थी--हाय, इतने बड़े शक्तिमान पुरुष का जीवन व्यर्थ ही गया।

उसके बाद वे अमेरिका गए। शिकागो की धर्मसभा तथा अमेरिका के अन्यान्य स्थानों में उन्होंने जो व्याख्यान दिए, उनका विवरण संवादपत्रों में पढ़ा। सोचा, आग कभी भी कपड़े से ढाँकी नहीं जा सकती। इतने दिनों के बाद स्वामी जी की वह शक्ति प्रज्जवलित हो उठी है। बचपन का वही पुष्प इतने दिनों बाद विकसित हुआ है।

एक दिन सुना, वे भारत वापस आ गए हैं और मद्रास में ज्वलन्त, ओजस्वी व्याख्यान दे रहे हैं। उन व्याख्यानों को पढ़कर सोचा, हिंदू धर्म के भीतर ऐसी वस्तु है !--और इस प्रकार सरलता से धर्म बोधगम्य हो सकता है ! इनकी कैसी अद्भुत शक्ति है ! ये क्या मनुष्य हैं, या देवता?

उनके कलकत्ते में आने पर उत्साह का ज्वार आ गया, और हम लोग शीलबाबू के गंगा-तटवर्ती काशीपुर बगीचे में उनको पहुँचाने गए। कुछ दिनों के बाद राजा राधाकान्त देव के बंगले में एक विराट् सभा हुई जिसमें 'कलकत्ते के लड़के ने स्वागत अभिनन्दन के उत्तर में एक स्फूर्तिदायक व्याख्यान दिया। कलकत्ते ने उन्हें प्रथम बार सुना, और ठगा सा रह गया। उन दिनों की बातें सभी जानते हैं।

स्वामी जी कलकत्ते में जब से आए, तब से उनके साथ एक बार अकेले में मिलने और जी खोलकर बचपन के समान दो-चार बातें करने के लिए मन अत्यंत व्याकुल हो उठा। किंतु सभी समय लोगों की भीड़ रहती थी। बहुत लोगों के साथ निरंतर वर्तालाप चलता रहता था। सुविधानुसार कोई समय नहीं मिल पाता था। इसी बीच एक दिन उनके साथ बगीचे में गंगा जी के तट पर घूमता चला गया। वे भी बचपन के साथी को पाकर पहले के समान बातचीत करने लगे। दो ही चार बातें हुई होंगी कि एक पर एक बुलावा आने लगा कि बहुत से संभ्रांत व्यक्ति उनके दर्शन के लिए आए हैं। इस बार स्वामी जी ने थोड़ा खीझकर कहा, "अरे भाई, ज़रा छुट्टी दो, बचपन के इस साथी के साथ दो-चार बातें तो कर लूं, थोड़ी खुली हवा खा लूं। जो लोग आए हैं, उन्हें स्नेहपूर्वक बिठाओ, तंबाकू आदि दो, और प्रतीक्षा करने के लिए प्रार्थना करो।"

बुलाने के लिए जो आया था, उसके चले जाने पर मैंने स्वामी जी से पूछा, "स्वामी जी, तुम तो साधु हो। तुम्हारे स्वागत के लिए हम लोगों ने जो रुपया एकत्र किया, उसके बारे में मैंने सोचा था कि तुम दुर्भिक्ष का समाचार सुनकर कलकत्ता पहुँचने से पहले हम लोगों को तार कर दोगे कि मेरे स्वागत में एक भी पैसा खर्च न करके कुल का कुल दुर्भिक्ष-निवारण फंड में चंदा दे दो'; किंतु तुमने वैसा तो नहीं किया; इसका क्या कारण है ?"

स्वामी जी ने कहा, "हाँ मेरी इच्छा ही थी कि मेरे लिए खूब धूम-धाम हो। बात क्या है, जानता है ? थोड़ी धूम-धाम हुए बिना उनके (भगवान् श्री राम-कृष्ण के) नाम से लोग कैसे परिचित होंगे, और उनसे प्रेरित कैसे होंगे? इतना स्वागत-सम्मान क्या मेरे लिए किया गया है ? नहीं, यह तो उन्हीं के नाम का जय-जयकार हुआ है। उनके बारे में जानने की लोगों के मन में कितनी इच्छा जाग्रत हुई है। अब लोग उन्हें क्रमशः जानेंगे, तभी तो देश का मंगल होगा। जो देश के मंगल के लिए आए हैं, उनको जाने बिना देश का मंगल किस प्रकार होगा? उनको ठीक-ठीक जान लेने से मनुष्य' तैयार होंगे। और 'मनुष्य' यदि तैयार हो गए, तो दुभिक्ष आदि को दूर करना फिर कितनी देर की बात है? मेरी यह इच्छा ही हुई थी कि लोग मेरे लिए इस प्रकार की विराट् सभा का आयोजन करें, खूब धूम-धाम हो; यह सब इसीलिए कि लोग भगवान् श्री रामकृष्ण को मानें; नहीं तो मुझे अपने लिए इतनी धूम-धाम की क्या आवश्यकता थी? तुम लोगों के घर जाकर जो एक साथ खेलता था, उसकी अपेक्षा क्या मैं आज कोई बड़ा आदमी हो गया हूँ! मैं तो उस समय जो था, वही आज भी हूँ। तू ही बता न, क्या मुझमें कोई परिवर्तन देखता है ?"

मैंने मुख से कहा, "नहीं, वैसा तो कोई परिवर्तन नहीं देखता।" परंतु मन में हुआ--तुम साक्षात् देवता हो गए हो।

स्वामी जी कहने लगे, "दुर्भिक्ष तो हमारे देश का चिरंतन सहचर हो गया है। और अब तो वह एक प्रकार की घातक व्याधि हो रहा है। किसी दूसरे देश में क्या दुर्भिक्ष का प्रकोप इतनी जल्दी जल्दी होता है ? नहीं, क्योंकि उन देशों में मनुष्य' हैं। हमारे देश के मनुष्य तो एकदम जड़ हो गए हैं। उनको (श्री रामकृष्ण को) देखकर, उनको (श्री रामकृष्ण को) जानकर मनुष्य स्वार्थ-त्याग करना सीखें, तब उनमें दुर्भिक्ष दूर करने की ठीक ठीक चेष्टा हो सकेगी। तू देखेगा, मैं क्रमशः वह चेष्टा भी करूँगा।"

मैं--वह तो बड़ा अच्छा होगा। तब तो तुम यहाँ खूब भाषण आदि दोगे ? ऐसा न होने से उनके नाम का प्रचार किस तरह होगा?

स्वामी जी--तू पागल हुआ है क्या रे! उनके नाम के प्रचार में क्या कुछ बाकी है ? भाषण से इस देश में कुछ भी न होगा। हमारे शिक्षित भाई लोग सुनेंगे, वाह-वाह करेंगे, ताली पीटेंगे, बस और उसके बाद घर जाकर भात के साथ सब हजम कर जाएंगे ! पुराने जंग खाए लोहे पर हथौड़ी पीटने से क्या होगा?--वह तो टूटकर चूर चूर हो जाएगा। उसको पहले आग में लाल करना होगा, तब कहीं हथौड़ी से पीटकर उसकी कोई वस्तु बनायी जा सकेगी। इस देश में ज्वलन्त जीवंत उदाहरण दिखाये बिना कुछ भी न होगा। अनेक लड़कों की आवश्यकता है, जो सब कुछ छोड़-छाड़कर देश के लिए जीवनोत्सर्ग करें। पहले उनका जीवन निर्माण करना होगा, तब कहीं काम होगा।

मैं--अच्छा, स्वामी जी, मुझे यह बात हमेशा एक पहेली लगती रही है कि तुम्हारे अपने देश के लोग अपने धर्म को न समझ सकने के कारण, कोई ईसाई, कोई मुसलमान, तो कोई और कुछ हो रहा है। उन लोगों के लिए बिना कुछ किए तुम अमेरिका और इंग्लैंड में धर्म सिखाने गए! यह कैसी बात है ?

स्वामी जो--बात क्या है, जानता है ? तेरे देश के लोगों में यथार्थ धर्म ग्रहण करने की और उसके आचरण की शक्ति कहाँ ? है केवल यह अहंकार कि हम लोग बड़े सत्त्वगुणी हैं। तुम लोग किसी समय भले ही सात्त्विक थे, किंतु इस समय तो तुम लोगों का भारी पतन हो गया है। सत्त्व से पतित होने पर मनुष्य एकदम तम में ही आ जाता है। तुम लोग वहीं आ गए हो। तुम लोग सोचते हो कि जो हलचल नहीं करता, घर के भीतर बैठकर हरि-कीर्तन करता है, अपने सामने दूसरों पर हजार अत्याचार होते देखकर भी चुप रहता है, वही सत्त्वगुणी है। परंतु ऐसा नहीं है, उसे तो महा तमोगुण ने घेर रखा है। जिस देश के लोग भरपेट खाना नहीं पाते, वहाँ धर्म होगा कहाँ से जिस देश के लोगों के मन से भोग की कोई वासना ही नहीं मिटी, उन्हें निवृत्ति होगी कहाँ से? इसलिए पहले मनुष्य जिससे पेटभर खाना पा सके और कुछ भोग विलास कर सके, उसी का उपाय करो; तव धीरे-धीरे यथार्थ वैराग्य आने पर धर्म-लाभ हो सकेगा। विलायत और अमेरिका के लोग पूर्ण रजोगुणी हैं, संसार के सभी प्रकार के भोगों को भोग चुके हैं। उसके ऊपर फिर ईसाई धर्म श्रद्धा और अंधविश्वास का धर्म होने के कारण हमारे पौराणिक धर्म की कोटि का है। शिक्षा और संस्कृति का विस्तार होने से अब पश्चिम के लोगों को उससे शांति नहीं मिल रही है। वे जिस अवस्था में हैं, उसमें उनको एक धक्का दे देने से ही वे लोग सत्व गुण में पहुँच जाएंगे। और एक बात पूछता हूँ, आज एक गोरे मुँहवाला आकर तुम्हारे धर्म पर जो कुछ कहेगा, उसे तुम लोग जितना मानोगे, उतना क्या किसी एक फटा-पुराना कपड़ा पहने हुए संन्यासी का कहा मानोगे?

मैं--महाराज, एन० एन० घोष [3] भी ठीक इसी प्रकार की बातें कहते थे।

स्वामी जी--हाँ, वहाँ के मेरे शिष्यगण जब तैयार होकर यहाँ आएंगे और तुम लोगों से कहेंगे, 'तुम लोग क्या कर रहे हो, तुम्हारा धर्म-कर्म और रीति-नीति किस बात में कम है; देखो, हम लोग तुम्हारे धर्म को ही सर्वश्रेष्ठ समझते हैं, तब देखेगा, उस बात को लोग दल के दल सुनेंगे। उन लोगों के द्वारा इस देश का विशेष भला होगा। ऐसा न समझना कि वे लोग धर्म-गुरु होकर इस देश में आएंगे। भौतिक अवस्था को समुन्नत बनानेवाले विज्ञान आदि व्यावहारिक शास्त्रों में वे लोग तुम्हारे गुरु होंगे, और धर्म-विषय में इस देश के लोग उनके गुरु होंगे। धर्म-विषय में भारत के साथ समस्त जगत का गुरु-शिष्य संबंध चिरकाल तक रहेगा।

मैं--स्वामी जी, वह किस प्रकार संभव है ? हम लोगों से वे जिस प्रकार घृणा करते हैं, उसे देखते हुए तो यह कभी भी संभव नहीं मालूम होता कि वे हम लोगों का उपकार कभी भी निःस्वार्थ भाव से करेंगे।

स्वामी जी--उन्हें तुम लोगों से घृणा करने के लिए बहुत से कारण मिलते हैं, इसलिए वे तुम लोगों से घृणा करते हैं। एक तो तुम लोग विजित हो, उसके ऊपर तुम लोगों के समान भिखमंगों की जाति संसार में और कहीं भी नहीं है। नीच जाति के लोगों से ही हमारी जनता बनी है, युग-युग से ऊँची जातिवालों के अत्याचार से, उठते-बैठते ठोकरें खाकर एकदम वे मनुष्यत्व खो बैठे हैं और पेशेवर भिखमंगों जैसे हो गए हैं। उनसे ऊपर श्रेणी के लोग दो-एक पृष्ठ अंग्रेजी पढ़कर, हाथ में अर्जी लेकर सभी आफिसों के चक्कर काटा करते हैं। बीस रुपये की एक नौकरी खाली होने पर पाँच सौ बी० ए०, एम० ए० प्रार्थना-पत्र देते हैं। और वह कलंकी प्रार्थना-पत्र भी कैसा! 'घर में खाना नहीं है; स्त्री-बच्चे खाना नहीं पाते, साहब ! दो रोटी खाने को दो, नहीं तो गया!' और नौकरी मिली भी तो दासता के शिखर पर पहुँच जाते हैं। असल में ये ही तो हुए निम्न श्रेणी के लोग ! तुम लोगों के उच्च-शिक्षित बड़े बड़े (?) आदमी दल बाँधकर 'हाय, भारत गया! हे अंग्रेज! तुम लोग हमारे आदमियों को नौकरी दो, दुर्भिक्ष दूर करो', इत्यादि दिन-रात केवल दो- दो' करके महाकोलाहल मचाते रहते हैं। सभी बातों की टेक है--'अंग्रेज हमें दो !' अरे भाई, और कितना देंगे? रेलगाड़ी दी है, तारयंत्र दिया है, राज्य की सुश्रृंखलता दी है, डाकुओं के दलों को प्रायः विनष्ट कर दिया है, विज्ञान की शिक्षा दी है, और क्या देंगे? निःस्वार्थ भाव से क्या कोई देता है ? अच्छा जी, उन्होंने तो इतना दिया है, तुम लोगों ने क्या दिया है ?

मैं--हम लोगों के पास देने को है ही क्या, महाराज? राज्य का कर देते हैं।

स्वामी जी--वाह खूब! वह भी तुम लोग स्वयं देते हो, ठोकर मारकर वसूल करते हैं--और वे राज्य की रक्षा जो करते हैं। तुम्हें उन लोगों ने जो इतना दिया है, उसके बदले में उन्हें तुम लोग क्या देते हो? बोलो। तुम लोगों के पास तो देने की ऐसी वस्तु है, जो उनके पास भी नहीं है। तुम लोग विलायत जाते हो, और वह भी भिखारी होकर--कहते हो, 'विद्या दो, विद्या दो।' कोई वहाँ जाकर उनके धर्म की गर्व के साथ कुछ प्रशंसा करके लौट आता है, और इसमें अपनी बड़ी बहादुरी समझता है। क्यों, तुम्हारे पास देने के लिए क्या कुछ भी नहीं है ? अरे, तुम्हारे पास अमूल्य रत्न है; यदि दे सको, तो धर्म दो, मनोविज्ञान दो। संपूर्ण जगत का इतिहास पढ़ देख, जितने भी उच्च भाव हैं, वे सब पहले भारत में ही उठे हैं। चिरकाल से भारत का जन-समाज भाव की खान रहा है; नए-नए भाव उत्पन्न कर समस्त संसार में उसने भाव-वितरण किया है। आज अंग्रेज भारत में आए हैं उन्हीं उच्च उच्च भावों को ग्रहण करने के लिए, उसी वेदांत-ज्ञान के लिए, उसी सनातन धर्म के गंभीर रहस्य के लिए। तुम लोग उनसे जो पाते हो, उसके विनिमय में उन्हें अपने इन सब अमूल्य रत्नों को दो। तुम लोगों के इस भिखारी नाम को मिटाने के लिए ही ठाकुर (श्री रामकृष्ण) मुझे उनके देश में ले गए थे। केवल भीख माँगने लिए विलायत जाना ठीक नहीं। तुम्हें चिरकाल तक कौन भिक्षा देगा, और भला देगा भी क्यों ? क्या हरदम कोई दिया ही करता है? कंगाल के समान केवल हाथ सामने फैलाना संसार का नियम नहीं है। जगत का नियम है--आदान और प्रदान। इस नियम को जो लोग, जो जाति, जो देश नहीं मानेगा, उसका कल्याण नहीं होगा। हम लोगों को भी उस नियम का पालन करना चाहिए। इसीलिए मैं अमेरिका गया था। उन लोगों के भीतर इस समय इतनी अधिक मात्रा में धर्म-पिपासा है कि मेरे सदृश लोग यदि हजारों की संख्या में भी वहाँ जाएं, तो भी उन्हें स्थान मिलेगा। वे बहुत दिनों से तुम लोगों को धन रत्न दे रहे हैं, तुम लोग अब उन्हें अमूल्य रत्न दो। देखोगे, घणा के स्थान में श्रद्धा-भक्ति मिलेगी, और तुम्हारे देश का वे स्वयं ही उपकार करेंगे। वे वीरजाति हैं, उपकार नहीं भूलते।

मैं--महाराज, उस देश में तो तुमने हम लोगों के कितने ही गुण बखाने हैं; हम लोगों की धर्मप्राणता के कितने ही उदाहरण दिए हैं। और अभी तुम कहते हो कि हम लोग महातमोगुणी हो गए हैं। उस पर फिर ऋषियों के सनातन धर्मरूपी धन के वितरण का अधिकारी तुम हमीं लोगों को बताते हो--यह कैसी बात है ?

स्वामी जी--तू कहता क्या है, क्या तुम लोगों के दोषों को देश देश में फैलाता फिरूं या तुम्हारे जो गुण हैं, उन्हीं को गाऊँ ? जिसका जो दोष हो, वह उसी से कहना अच्छा है, पर दूसरी जगह उसके गुणों का ढोल पीटना ही अच्छा है। ठाकुर कहा करते थे कि खराब आदमी को यदि 'अच्छा है, अच्छा है' कहा जाए, तो वह अच्छा हो जाता है; और अच्छे आदमी को खराब है, खराब है' कहा जाए, तो वह खराब हो जाता है। उन लोगों के दोषों की बात उनके सामने अच्छी तरह प्रकट कर आया हूँ। इस देश से जितने आदमी आज तक उस देश में गए हैं, वे सब उन लोगों का गुण-गान और हम लोगों के दोषों का प्रचार ही करके आए हैं। इसीलिए उन्होंने हम लोगों से घृणा करनी सीखी है। यही कारण है कि मैंने तुम लोगों के गुणों को और उनके दोषों को उन्हें दिखलाया है। तुम लोग चाहे कितना भी तमोगुणी क्यों न हो जाओ, परंतु पुरातन ऋषियों का भाव तुम्हारे अंदर कुछ न कुछ विद्यमान है ही। तो भी, कोई एकदम विलायत जाए, और धर्मोपदेष्टा हो जाए, यह संभव नहीं है। पहले एकांत में बैठकर धर्म-जीवन को अच्छी तरह गढ़ लेना होगा, पूर्ण रूप से त्यागी होना होगा और अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा। तुम लोगों के भीतर तमोगुण आ गया है--तो उससे क्या हुआ? उसका नाश क्या नहीं हो सकता? एक ही बार में हो सकता है। इस तमोगुण का नाश करने के लिए ही तो भगवान् श्री रामकृष्ण देव अवतरित हुए थे।

मैं--परंतु, स्वामी जी, तुम्हारे समान होने की आकांक्षा कौन कर सकता है ?

स्वामी जी--तुम लोग सोचते हो, मेरे बाद शायद और कोई विवेकानंद नहीं होगा। अरे, ये जो नशाखोर लोग आकर कंसर्ट (गाना-बजाना) करके चले गए, जिनसे तुम लोग इतनी घृणा करते हो, जिन्हें तुम लोग अत्यंत तुच्छ समझते हो, ठाकुर की इच्छा होने पर उनमें से हर एक व्यक्ति विवेकानन्द हो सकता है। आवश्यकता होने पर विवेकानन्द का अभाव न रहेगा। कहाँ से कोटि-कोटि विवेकानन्द आकर उपस्थित हो जाएंगे, यह कौन जानता है ? यह विवेकानन्द का काम नहीं है रे; यह तो उनका काम है--ठाकुर का, स्वयं प्रभु का। एक गवर्नर जनरल के जाने के बाद उसके स्थान पर दूसरा आएगा ही। तुम लोग चाहे कितने ही तमोगुणी क्यों न रहो, मन और वाणी को एक करके उनकी शरण में जाने पर सभी अंधकार (तमोगुण) दूर हो जाएगा। अभी उस रोग को हटानेवाले वैद्यराज जो आए हैं ! उनका नाम लेकर कार्य में लग जाने पर वे स्वयं ही सब कुछ कर लेंगे। तब यही तमोगुण सत्त्व गुण में परिवर्तित हो जाएगा।

मैं--कुछ भी कहो, परंतु इस बात पर विश्वास नहीं होता। तुम्हारे समान अध्यात्म दर्शन पर भाषण देने की क्षमता किसमें होगी?

स्वामी जी--तू जानता नहीं। वह क्षमता सभी में आ सकती है। भगवान् के लिए बारह वर्ष तक अखंड ब्रह्मचर्य धारण करने से वह क्षमता आ जाती है। मैंने इस प्रकार के ब्रह्मचर्य का पालन किया है, इसीलिए मेरे मस्तिष्क का पर्दा खुल गया है। यही कारण है कि अब मुझे दर्शन सदृश जटिल विषय पर भाषण देने के लिए सोचना नहीं पड़ता। सोच, कल मुझे वक्तृता देनी है; जो वक्तृता मै दूँगा, उसकी तस्वीर आज रात में एक पर एक आँख के सामने से गुजरने लगती है। दूसरे दिन भाषण में वही सब बोलता हूँ। सो देखा तूने, यह शक्ति मेरी अपनी नहीं है। जो कोई भी अभ्यास करेगा, उसे यह शक्ति मिलेगी। तू कर, तुझे भी मिलेगी। हमारे शास्त्रों में ऐसा नहीं कहा गया है कि यह शक्ति अमुक को मिलेगी तथा अमुक को नहीं।।

मैं--महाराज, तुम्हें याद है, उस समय तुमने संन्यास नहीं लिया था, एक दिन हम लोग

. . . के घर में बैठे हुए थे; तुम हम लोगों को समाधि की क्रिया समझाने की चेष्टा कर रहे थे। जब मैंने यह कहकर कि कलिकाल में यह सब होना असंभव है, तुम्हारी बात को उड़ा देने की चेष्टा की थी, तो तुमने जोर देकर कहा था, 'तू समाधि देखना चाहता है, या समाधिस्थ होना चाहता है ? मुझे तो समाधि होती है। और मैं तुझे भी समाधिस्थ कर दे सकता हूँ।' तुम्हारे इस वाक्य के पूरा होते ही कोई एक अपरिचित व्यक्ति आ गया था। और फिर हम लोगों की इस विषय में कोई चर्चा नहीं हो पायी थी।

स्वामी जी--हाँ, याद है।

तब मैंने अपने को समाधिस्थ कर देने के लिए स्वामी जी से विशेष रूप से आग्रह किया। इस पर वह बोले, "देख, पिछले कुछ वर्षों से लगातार वक्तृता देते और काम करते रहने के कारण मेरे भीतर रजोगुण काफी बढ़ गया है। इसलिए वह शक्ति इस समय दबी हुई है। कुछ दिन सब कार्यों को छोड़कर हिमालय में जाकर रहने दे, फिर से उस शक्ति का उदय हो जाएगा।"

इसके एक-दो दिन बाद स्वामी जी के दर्शन करने के लिए मैं अपने घर से चला ही था कि इसी समय दो मित्र आकर उपस्थित हुए, और उन्होंने कहा कि वे भी स्वामी जी के दर्शन करना चाहते हैं तथा प्राणायाम के विषय में कुछ पूछना चाहते हैं। उन लोगों को साथ ले मैं काशीपुर के बगीचे में आ उपस्थित हुआ। देखा, स्वामी जी हाथ मुंह धोकर बाहर आ रहे हैं। सुना था कि खाली हाथ देवता या साधु के दर्शन करने नहीं जाना चाहिए, इसलिए हम लोग कुछ फल और मिष्ठान्न साथ में ले गए थे। वे ज्यों ही बाहर आए, हम लोगों ने उन वस्तुओं को उन्हें अर्पित किया। स्वामी जी ने उन्हें लेकर अपने माथे से लगाया, और हमारे प्रणाम करने के पहले ही हम लोगों को प्रणाम किया। मेरे साथ आए हुए मित्रों में से एक स्वामी जी के सहपाठी थे। उनको पहचान लेने पर विशेष आनंद के साथ उनसे कुशलक्षेम पूछने लगे। बाद में हम लोगों को अपने पास बिठाया। हम लोग जहाँ बैठे, वहाँ पर और भी बहुत से लोग उपस्थित थे। सभी स्वामी जी की मधुर वार्ता सुनने आए थे। अन्यान्य लोगों के एक-दो प्रश्न का उत्तर देकर कथा-प्रसंग में स्वामी जी स्वयमेव प्राणायाम की बात समझाने लगे। मनोविज्ञान से ही जड़विज्ञान की उत्पत्ति है, यह बात विज्ञान की सहायता से पहले समझाकर फिर प्राणायाम क्या है, यह समझाने लगे। इसके पहले हम लोगों में से कई उनकी 'राजयोग' नामक पुस्तक को अच्छी तरह पढ़ चुके थे। किंतु आज उनके समीप प्राणायाम के संबंध में जिन बातों को सुना, उससे मन में हुआ कि उनके भीतर जितना है, उसका अत्यल्प अंश ही उस पुस्तक में लिपिबद्ध हुआ है। तब समझ सका कि उनकी ये सब बातें केवल पोथी-विद्या नहीं है। बिना सत्य का साक्षात्कार किए धर्मशास्त्र के जटिल प्रश्नों की विज्ञान की सहायता से भी इस प्रकार विशद मीमांसा करना किसी अन्य प्रकार संभव नहीं।

उस दिन हम लोगे स्वामी जी के पास साढ़े तीन बजे गए थे। उनकी प्राणायाम विषयक बार्ता साढ़े सात बजे तक चलती रही। फिर सभा विसर्जन होने के बाद जब हम लोग बाहर आए, तो मेरे दोनों साथी मुझसे पूछने लगे, "स्वामी जी हम लोगों के मन में निहित प्रश्नों को कैसे जान सके? तुमने क्या पहले से ही उन्हें इन प्रश्नों को बतला दिया था?"

इस घटना के कुछ दिन बाद, एक दिन बागबाजार के परलोकवासी प्रियनाथ मुखोपाध्याय के घर में गिरीश बाबू, अतुल बाबू, स्वामी ब्रह्मानन्द, योगानन्द एवं और भी एक-दो मित्रों के समक्ष मैंने स्वामी जी से पूछा, "स्वामी जी, उस दिन मेरे साथ जो दो व्यक्ति तुम्हारे दर्शन करने के लिए आए थे, दे तुम्हारे भारत में वापस आने से पहले ही तुम्हारा 'राजयोग' पढ़ चुके थे, और उन्होंने कह रखा था कि यदि तुम्हारे साथ उनका कभी साक्षात्कार होगा, तो वे तुमसे प्राणायाम के विषय में कुछ प्रश्न पूछेगे। किंतु उस दिन उन लोगों के कुछ भी पूछने के पहले ही तुमने उनके अन्तःकरण के संदेहों को स्वयं ही उठाकर जो मीमांसा की, इस पर वे मुझसे पूछने लगे कि कहीं मैंने तुमसे उनके प्रश्नों को पहले से ही तो नहीं कह रखा था।"

स्वामी जी ने कहा, "उस देश में भी बहुधा ऐसी घटना होने पर बहुत से लोग मुझसे पूछा करते थे कि आप मेरे अन्तःकरण के प्रश्नों को कैसे समझ लेते हैं ? वह शक्ति मुझमें उतनी नहीं है। ठाकुर में तो वह प्रायः चौबीसों घंटे विद्यमान रहती थी।"

इस प्रसंग में अतुल बाबू ने पूछा, "तुम राजयोग में कहते हो कि पूर्वजन्म की सभी बातें जानी जा सकती हैं। तो क्या तुम अपनी बातें जान सकते हो?"

स्वामी जी--हाँ, जान सकता हूँ।

अतुल बाबू--क्या क्या जान सकते हो, बतलाने में कोई हर्ज है ?

स्वामी जी--जान सकता हूँ, और जानता भी हूँ, किंतु इस संबंध में अधिक नहीं कहूँगा।

[संस्मरण]

नरेन्द्रनाथ (स्वामी विवेकानन्द) हेदो तालाब के पास जनरल असेम्बली कॉलेज में पढ़ते हैं। एफ० ए० वहीं से पास किया है। उनके असंख्य गुणों के कारण बहुत से सहपाठी उनमें अत्यंत अनुरक्त हैं। वे उनका गाना सुनना इतना आनंदप्रद मानते हैं कि अवकाश पाते ही नरेन्द्र के घर पर उपस्थित हो जाते हैं। वहाँ बैठकर एक बार नरेन्द्र की तर्क-युक्ति या गाना-बजाना आरंभ होते ही समय कैसे निकल जाता है , वे समझ नहीं पाते।

नरेन्द्र इस समय अपने पिता के घर केवल दो बार भोजन करने के लिए जाते हैं और शेष समय समीप में ही रामतनु बसु की गली में अपनी नानी के घर में रहकर अध्ययन करते हैं। अध्ययन के लिए ही वे यहाँ रहते हों, ऐसी बात नहीं; नरेन्द्र एकांत में रहना अधिक पसंद करते हैं। उनके घर में बहुत से लोग हैं, खूब हल्ला-गुल्ला होता रहता है। इससे रात में जप-ध्यान में बड़ी बाधा पहुंचती है। नानी के घर पर अधिक लोग नहीं हैं। एक-दो जो हैं भी, उनसे नरेन्द्र को किसी प्रकार की विघ्न-बाधा नहीं होती। कच्चे-बच्चे, जिनके द्वारा ही अधिक शोर-गुल होता है, यहाँ एक भी नहीं हैं। नरेन्द्र जिस कमरे में रहते हैं, वह घर के बाहर की ओर दुमंजिले में है। कमरे के सामने ही ऊपर जाने की सीढ़ी है। भीतरी कमरों के साथ आने-जाने का कोई संबंध नहीं है। अतएव उनके मित्र, जिनकी जब इच्छा होती है, आकर उपस्थित हो जाते हैं। नरेन्द्र ने अपने इस अपूर्व छोटे घर का नाम 'तंग' रखा है। किसी को साथ लेकर जब वहाँ जाना होता है, तो कहते हैं, "चलो, तंग में चलें।" कमरा बिल्कुल छोटा है, चौड़ाई उसकी चार हाथ होगी और लंबाई कोई उससे दुगुनी। कमरे के अंदर 'कैनवस' की एक खाट है, उस पर एक छोटा सा मैला तकिया रखा है। ज़मीन पर एक फटी चटाई बिछी है। एक कोने में एक तंबूरा है। उसी के पास एक सितार और एक तबला है। तबला कभी चटाई के ऊपर पड़ा रहता है, कभी खटिया के नीचे, और कभी उसके ऊपर ! आले में, खटिया के ऊपर, चटाई के ऊपर पढ़ने की पुस्तकें इधर-उधर बिखरी रहती हैं। एक ओर दीवाल में डोरी बँधी हुई है, उस पर पहनने के कपड़े और एक चादर लटक रही है। कमरे में एक-दो टूटी-फूटी शीशियाँ भी पड़ी हुई हैं; इससे मालूम होता है, हाल में उनका स्वास्थ्य कुछ खराब था। नरेन्द्र इच्छा करते ही अपने घर से साफ तकिया, सुंदर बिस्तर और अच्छी-अच्छी चीजें लाकर तथा एक-दो चित्र टाँगकर कमरे को अच्छी तरह सजा सकते हैं। परंतु वे ऐसा नहीं करते। इसका एकमात्र कारण यह है कि उस ओर उनका तनिक भी ध्यान नहीं है। घर में उनका डेरा डालनेवालों के समान भाव है। कहने का अभिप्राय यही कि किसी भी विषय में आत्मतृप्ति की वासना उनमें बचपन से नहीं देखी जाती थी।

नरेन्द्र आज मन लगाकर पढ़ रहे थे। इसी समय किसी मित्र का आगमन हुआ। लगभग ग्यारह बजे होंगे। भोजन करके नरेन्द्र पढ़ रहे थे। मित्र ने आकर नरेन्द्र से कहा, "भाई, रात में पढ़ लेना, अभी ज़रा एक-दो गाने तो सुना दो।"

उसी समय नरेन्द्र ने पुस्तक बंद कर उसे एक ओर खिसका दिया। तानपूरे के तारों को सँभालकर, उन्हें स्वर में बाँधकर गाना गाने से पहले उन्होंने अपने मित्र से कहा, "अच्छा, तू तबला उठा।"

मित्र ने कहा, "भाई, मैं तो बजाना जानता नहीं। स्कूल में मेज का तख्ता बजा लेता हूं, तो क्या तुम्हारे साथ तबला भी बजा सकूँगा?"

तब नरेन्द्र ने स्वयं थोड़ा सा बजाकर दिखला दिया और कहा "अच्छी तरह से देख ले। अवश्य बजा सकेगा। क्यों नहीं बजा सकेगा? कोई कठिन काम तो है नहीं। इस तरह बस ठेका दिए जा, हो गया।" साथ ही साथ बजाने के बोल भी बतला दिए। मित्र एक-दो बार चेष्टा करने बाद किसी तरह ठेका देने लगा। गाना प्रारंभ हुआ। तान-लय में उन्मत्त होकर और दूसरों को उन्मत्त बनाकर नरेन्द्र के हृदयस्पर्शी स्वर में टप्पा, ढप, खयाल, ध्रुपद, बांग्ला, हिंदी और संस्कृत गानों का प्रवाह चलने लगा। किसी नवीन ठेके के समय नरेन्द्र इतनी सरलता से बोल के साथ ठेका बतला देते कि उन्होंने अपने मित्र द्वारा इस तरह कव्वाली, एकताला, आडाठेका, मध्यमान, यहाँ तक कि सुरफाँक ताल भी बजवा लिया। नरेन्द्र के पास गानों की कमी नहीं थी। हिन्दी गाना प्रारंभ होने पर नरेन्द्र पहले उसका अर्थ समझा देते थे और उसके अंतनिर्हित भावों के साथ स्वर-लय का अपूर्व ऐक्य दिखलाकर मित्र को मुग्ध कर देते थे। दिन कहाँ से होकर कहाँ निकल गया, कुछ ज्ञात नहीं हुआ। संध्या आयी। घर का नौकर एक टिमटिमाता हुआ दिया रख गया। धीरे-धीरे रात के दस बज गए, तब कहीं दोनों मित्रों को होश आया। वे परस्पर विदा हुए, नरेन्द्र अपने पिता के घर भोजन करने के लिए चले गए और मित्र ने अपने घर की ओर प्रस्थान किया।

इस प्रकार नरेन्द्र की पढ़ाई में न जाने कितनी बाधाएं आती रहती थीं, गिनी नहीं जा सकतीं। नरेन्द्र के साथ इस समय जिनकी भी घनिष्ठता प्राप्त हुई है, वे अपनी आँखों से यह सब देख चुके हैं परंतु बाधा कितनी ही क्यों न पहुंचे, नरेन्द्र सर्वथा निर्विकार रहते थे।

नरेन्द्र बहुत दिनों से श्री रामकृष्ण देव के पास नहीं गए थे। इसलिए वे स्वयं एक दिन सवेरे रामलाल के साथ कलकत्ते में नरेन्द्र के 'तंग' में आए। उस दिन सवेरे नरेन्द्र के कमरे में दो सहपाठी हरिदास चट्टोपाध्याय और दाशरथि सान्याल बैठे थे। ये लोग कभी पढ़ते थे, तो कभी वार्तालाप करते थे। इसी समय बहिर पर 'नरेन, नरेन' शब्द सुनायी पड़ा। स्वर सुनते ही नरेन्द्र हड़बड़ाकर तेज़ी से नीचे पहुँचे। उनके मित्रों ने भी समझ लिया कि श्री रामकृष्ण देव आए हैं. इसी लिए नरेन्द्र इतने अस्त-व्यस्त होकर उन्हें अभ्यर्थनापूर्वक लाने के लिए गए हैं। मित्रों ने देखा, बीच सीढ़ी पर दोनों का परस्पर साक्षात्कार हुआ। श्री रामकृष्ण नरेन्द्र को देखते ही अश्रुपूर्ण लोचनों से गद्गद स्वर में कहने लगे, "तू इतने दिनों तक आया क्यों नहीं, तू इतने दिनों तक आया क्यों नहीं?" बार बार इस तरह कहते कहते कमरे में आकर बैठे, बाद में अंगौछे में बँध हुए संदेश को खोलकर नरेन्द्र को 'खा, खा' कहकर खिलाने लगे। वे जब कभी नरेन्द्र को देखने आते, तो कुछ न कुछ अति उत्तम खाद्य वस्तु उनके लिए अवश्य बाँधकर ले आते थे; बीच बीच में लोगों के द्वारा भी भेज देते थे। नरेन्द्र अकेले खानेवाले तो थे नहीं, उनमें से कुछ संदेश लेकर पहले अपने मित्रों को दिए, फिर स्वयं खाया। श्री रामकृष्ण उसके बाद बोले, "अरे, तेरा गाना तो बहुत दिनों से नहीं सुना, जरा गाना तो गा।" उसी समय तानपूरा लेकर, उसका कान ऐंठ, स्वर बाँधकर नरेन्द्र ने गाना प्रारंभ किया--

(भैरवी-एकताला)

जागो माँ कुलकुंडलिनी ,

(तुमि) ब्रह्मानन्दस्वरूपिणी , ( तुमि नित्यानन्दस्वरूपिणी) ,

प्रसुप्त-भुजगाकारा आधारपद्मवासिनी।

त्रिकोणे ज्वले कृशानु , तापिता होइलो तनु ,

मूलाधार त्यज शिवे स्वयंभू-शिव-वेष्टिनी।।

गच्छ सुषुम्नारि पथ , स्वाधिष्ठाने होओ उदित ,

मणिपुर अनाहत विशुद्धाज्ञा संचारिणी।

शिर्रास सहस्रदले, परम शिवेते मिले,

क्रीड़ा करो कुतूहले, सच्चिदानन्ददायिनी। [4]

ज्यों ही गाना आरंभ हुआ, श्री रामकृष्ण भी भावस्थ होने लगे। गाने के स्तर स्तर में उनका मन ऊपर उठने लगा, आँखें अपलक हो गयीं, अंग स्पंदनहीन हो गए, मुख ने अलौकिक भाव धारण किया, और धीरे-धीरे संगमर्मर की मूर्ति के समान निस्पंद हो वे निर्विकल्प समाधि में लीन हो गए। नरेंद्र के मित्रों ने इसके पहले किसी मनुष्य को इस प्रकार भावस्थ नहीं देखा था। वे श्री रामकृष्ण की यह अवस्था देखकर मन में सोचने लगे--मालूम होता है, शरीर में किसी प्रकार की वेदना सहसा उत्पन्न हो गई है, इसलिए वे संज्ञा-शून्य हो गए हैं। वे बहुत डरे। दाशरथि तो जल्दी जल्दी पानी लाकर उनके मुख पर छींटा देने का प्रयत्न करने लगे। यह देखकर नरेन्द्र उनको रोककर कहने लगे, "उसकी कोई आवश्यकता नहीं। वे संज्ञा-शून्य नहीं हुए हैं, वे भावस्थ हुए हैं ! फिर से गाना सुनते सुनते वे चेतना-युक्त हो जाएंगे।" नरेन्द्र ने इस बार श्यामा-विषयक गाना प्रारंभ किया। उन्होंने, 'एक बार तेमनि तेमनि तेमनि करे नाचो माँ श्यामा' इस प्रकार के बहुत से श्यामा-विषयक गाने गाए। कृष्ण संबधी भी बहुत से गाए। गाना सुनते सुनते श्री रामकृष्ण कभी भावाविष्ट हो जाते थे और कभी स्वाभाविक अवस्था प्राप्त कर लेते थे। नरेन्द्र बहुत देर तक गाना गाते रहे। अंत में गाना समाप्त होने पर श्री रामकृष्ण देव बोले "दक्षिणेश्वर चलेगा? कितने दिनों से नहीं गया है। चल न, फिर अभी लौट आना।" नरेन्द्र उसी समय तैयार हो गए। पुस्तक आदि उसी तरह पड़ी रहीं। केवल तानपूरे को यत्नपूर्वक रखकर उन्होंने श्री गुरुदेव के साथ दक्षिणेश्वर प्रस्थान किया। मित्र भी अपने अपने घर की ओर रवाना हुए।

नरेन्द्रनाथ के पढ़ने-लिखने में इस तरह के बहुत से विघ्न आते रहते थे, यह उनके बहुत से मित्रों ने देखा है। पर किसी को साहस नहीं होता था कि इस विषय में उनसे कुछ कहें। एक दिन उक्त हरिदास चट्टोपाध्याय ने यह सोचकर कि श्री रामकृष्ण देव के साथ नरेन्द्र का समय व्यर्थ नष्ट होता है, उनके प्रति इशारा करते हुए कहा, "भाई, धर्म के प्रति तुम्हारा जैसा आवेग है, इससे जान पड़ता है, तुम निश्चय ही निकट भविष्य में उत्कृष्ट गुरु प्राप्त करोगे।" नरेंद्र खूब अच्छी तरह समझ गए कि मेरा मित्र श्री रामकृष्ण को एक साधारण व्यक्ति समझकर ही इस तरह कह रहा है। नरेन्द्र अपने मित्र के कथन से मर्माहत हुए, किंतु उन्होंने किसी प्रकार का प्रतिवाद नहीं किया। किसी दूसरे मित्र के साथ एक दिन बातचीत के सिलसिले में कह दिया, "भाई, हरिदास मेरे गुरुदेव को सामान्य मानता है। सो जैसा भी हो :

यद्यपि मेरा गुरु कलवार-घर जाए।

तथापि मेरा गुरु है नित्यानन्द राय।"

इस प्रसंग के बहुत दिनों के बाद लेखक के समीप हरिदास ने इस संबंध में कहा था, "भाई, उस समय क्या हम लोग श्री रामकृष्ण देव को पहचान सके थे ? भाग्यवश नरेन्द्र ने उन्हें पहचान लिया था और हम लोग दुर्भाग्यवश कुछ भी उस समय नहीं समझ सके थे।"

हरिदास इस प्रकार अत्यधिक दुःख प्रकाशित करते और उनकी आँखें भर आतीं।

बी० ए० की परीक्षा के लिए रुपया जमा करने का समय आया। सभी ने अपनी अपनी कॉलेज-फ़ीस और परीक्षा-फीस जमा कर दी। हरिदास की अवस्था ठीक नहीं थी। फिर उस पर उन्हें एक वर्ष की कॉलेज-फीस भी देनी थी। उस समय जनरल असेम्बली में इसी तरह उधार-खाता पर पढ़ाई-लिखाई चला करती थी। परीक्षा के समय कॉलेज के अधिकारी संपूर्ण फ़ीस वसूल कर लेते थे। जो लोग संपूर्ण फ़ीस देने में बिल्कुल असमर्थ होते थे, उन लोगों में से कुछ को थोड़ी-थोड़ी और कुछ को संपूर्ण फ़ीस की माफ़ी मिल जाती थी। यह सब छूट-छाट करने का अधिकार राजकुमार नामक एक वृद्ध क्लर्क को था। राजकुमार सीधे-सादे मनुष्य थे, केवल थोड़ी सी नशा की लत थी, किंतु गरीब विद्यार्थियों के प्रति वे बड़े दयालु थे। उनकी दया के बल पर बहुत से असमर्थ छात्र बिना फीस दिए ही पढ़ लेते थे। फीस के संबंध में राजकुमार के ऊपर संचालकों का प्रगाढ़ विश्वास था। राजकुमार स्वयं निर्णय करके किसी को आधी फीस और किसी को संपूर्ण फीस माफ कर भर्ती कर लेते थे। राजकुमार जो कुछ करते थे, संचालक लोग उसी को मंजूर कर लेते थे। इसलिए छात्रों में राजकुमार का खूब सम्मान था। सभी उस बूढ़े को बहुत चाहते थे। राजकुमार भी लड़कों के जौहरी थे। कौन कैसा लड़का है, इस बात को वे अच्छी तरह जानते थे। नरेन्द्र के असमर्थ मित्र हरिदास चट्टोपाध्याय ने येनकेन प्रकारेण परीक्षा की फ़ीस के रुपये तो जुटा लिये, किंतु कॉलेज को साल भर की फीस के रुपये नहीं जमा कर पाए। इस बात को एक दिन उन्होंने नरेन्द्र से कहा। नरेन्द्र ने उन्हें आश्वासन दिया, 'तू चिंता न कर, परीक्षा में बैठने के लिए निश्चिंत होकर प्रस्तुत रह। मैं राजकुमार से कहकर सब ठीक करा दूँगा। तेरी मासिक फीस माफ करा दूँगा। केवल परीक्षा की फीस का प्रबंध तुझे करना होगा।'

मित्र ने उत्तर दिया, 'भाई, परीक्षा-फीस का तो प्रबंध कर चुका हूँ। मासिक फीस माफ हो जाने पर सब झंझट मिट जाएगा।'

नरेन्द्र ने कहा, "तब चिंता किस बात की? अब सब ठीक हो जाएगा।" एक-दो दिन के बाद वे दोनों मित्र राजकुमार के कमरे के सामने टहल रहे थे, इसी समय वहाँ पर और भी बहुत से छात्र आ उपस्थित हुए। बाद में राजकुमार आए। बहुत से लड़कों को एकत्र देखकर एक बार सभी से बकाया मासिक फीस का तकाजा किया। इस बार का तकाजा कुछ जोरदार था; क्योंकि राजकुमार ने चेतावनी दी थी, "जो छात्र अमुक दिन के भीतर मासिक फ़ीस के रुपये नहीं जमा करेंगे, वे परीक्षा में नहीं लिये जाएंगे।" छात्र राजकुमार को घेरकर अपनी अपनी दुःखग था सुनाने लगे, और बकाया फ़ीस माफ़ करने के लिए प्रार्थना करने लगे। बहुत से अच्छे लड़के राजकुमार के प्रिय पात्र थे। किसी लड़के के बारे में जब उन्हें कुछ निर्णय करना होता था, तो राजकुमार अधिकतर उन्हीं की सलाह लेते थे। नरेन्द्र उनमें से एक थे। नरेन्द्र अच्छी तरह जानते थे कि उनके अनुरोध को राजकुमार कभी न टालेंगे। राजकुमार के सिर के बाल गंगा-जमुनी रंग के थे, मूंछ भी वैसी थी; केवल उसके ऊपर दोनों ओर तंबाकू के दाग़ थे। उन्हें कभी भी चपकन या कुरते में बटन लगाने की फुरसत नहीं मिलती थी, कंधे पर चादर जहाजी मोटे रस्से के समान बल खाये रहती थी। राजकुमार जाकर अपनी कुरसी के हत्थे पर चादर बांधकर उस पर बैठ गए। बस त्यों ही लड़कों ने खन्-खन् शब्द के साथ रुपया जमा करना आरंभ कर दिया। राजकुमार के चारों ओर खूब भीड़ थी। नरेन्द्र भीड़ को चीरकर राजकुमार के पास गए और कहने लगे, "महाशय, देखिए, अमुक छात्र मासिक फीस नहीं दे सकेगा। इसलिए आप कृपा करके उसे माफ कर दीजिए। वह यदि परीक्षा में भेजा जाएगा, तो अच्छी तरह पास होगा। और यदि नहीं भेजा गया, तो उसका सारा परिश्रम मिट्टी में मिल जाएगा।"

राजकुमार नाक-मुंह सिकोडकर कहने लगे, "तुम्हें मुखिया बनकर सिफारिश करने की आवश्यकता नहीं है, तुम जाओ, अपना काम करो, हमारी बातों में मत उलझो। यदि वह मासिक फीस नहीं देगा, तो मैं उसे परीक्षा में नहीं भेजूंगा।"

नरेन्द्र इस व्यवहार से खिन्न हो लौट आए। उनके मित्र के सिर पर तो जैसे वज्राघात हो गया; वे अत्यंत विषण्ण हो नरेन्द्र के साथ चुपचाप क्लॉस की ओर चले, किंतु नरेन्द्र पीछे हटनेवाले व्यक्ति नहीं थे। वे अपने मित्र को चिंतित देखकर उससे एकांत में कहने लगे, "तू हताश क्यों हो रहा है? वह बुड्ढा इसी तरह मुँहफट जवाब दे देता है। मैं कहता हूँ, तेरे लिए कोई उपाय कर दूँगा, तू निश्चिंत रह। जैसे भी होगा, तेरे लिए कुछ न कुछ उपाय अवश्य करूँगा। तू इतना ही तो चाहता है न कि परीक्षा में बैठने को मिल जाए, बस हो गया। चिंता क्यों करता है, सत्य कहता हूँ, तेरे लिए कोई उपाय अवश्य करूँगा, इसे मेरी प्रतिज्ञा समझ।"

मित्र की आँखों से अंधकार दूर हो गया, पुनः आशा की किरण दिखने लगी। मित्र ने सोचा, नरेन्द्र बड़े आदमी का लड़का है, पिता वकील हैं, उसको गाना सिखाने के लिए वेतन देकर शिक्षक रखते हैं; हो सकता है, नरेन्द्र अपने पिता से कहकर अपने इस असमर्थ मित्र के लिए कोई उपाय कर दे, इसीलिए तो उसे इतना आत्मविश्वास है। बकाया फीस न देने पर राजकुमार यदि परीक्षा देने के लिए नहीं भेजेंगे, तो नरेन्द्र अवश्य ही रुपयों का प्रबंध कर देगा। मित्र इस प्रकार सोच-विचारकर निश्चिंत हो गए। इधर नरेन्द्र कॉलेज से घर आकर हेदो तालाब के किनारे थोड़ी देर तक घूमकर घर की ओर लौटे। किंतु घर न जाकर सिमुलिया बाजार के सामने टहलने लगे, और बीच बीच में उत्सुक नेत्रों से हेदो तालाब की ओर देखने लगे। बाजार से थोड़ी दूर पश्चिम जाकर दक्षिण में एक गली है, गली के मोड़ के ऊपर ही नशाखोरों का एक बड़ा अड्डा है। उस अड्डे में जाकर नरेन्द्र ने उसके मालिक से धीरे से कुछ पूछा। मालिक ने मुँह से बिना कुछ बोले गर्दन हिलाकर 'नहीं' कह दिया। नरेन्द्र पुनः हेदो तालाब की ओर दो-चार कदम बढ़कर बग़ल की ओर एक गली के भीतर जाकर कुछ ठहर गए। संध्या का अंधकार चारों ओर से घिर आया, एक दूसरे का मुंह नहीं दिखायी देता था। इसी समय उस गली में राजकुमार आकर उपस्थित हुए। बस नरेन्द्रनाथ उनका रास्ता रोककर खड़े हो गए। नरेन्द्रनाथ के खड़े होने का ढंग देखकर ही राजकुमार का मुंह सूख गया। अपने भाव को दबाकर वे बोले, "क्यों दत्त, यहाँ कैसे?"

नरेन्द्र गंभीर स्वर में कहने लगे, "और क्या, बस आप ही के लिए खड़ा हूँ। देखिए महाशय, मैं अच्छी तरह जानता हूँ---हरिदास की अवस्था बिल्कुल खराब है. वह रुपया नहीं दे सकता। किंतु आपको उसे परीक्षा में भेजना ही होगा, नहीं तो मैं नहीं छोड़गा। यदि आप मेरी बात न मानेंगे, तो मैं भी कॉलेज में आपकी सभी बातें खोल दूँगा, आपका कॉलेज में रहना मुश्किल कर दूँगा। आपने जब इतने लड़कों की फीस माफ कर दी, तो फिर उस बेचारे की फीस क्यों न माफ करेंगे?"

दृढ़-प्रतिज्ञ नरेन्द्रनाथ के मुख का भाव देखकर राजकुमार का मुँह सूख गया। जल्दी से स्नेहपूर्वक नरेन्द्र की गर्दन पर अपना हाथ रखकर बोले, "बाबा, क्रोध क्यों करते हो? तुम जो कहोगे, वही होगा, वही होगा। भला तुम कहो, और मैं उसे न करूं?"

नरेन्द्र ने जरा विरक्ति प्रदर्शन करते हुए कहा, "तो फिर सवेरे आपने मेरी बात को एकदम क्यों उड़ा दिया था?"

राजकुमार ने उत्तर दिया, "अरे भाई, तुम जानते नहीं, तुम्हारी देखादेखी फिर सब लड़के जब यही हठ करने लगते, तो मैं किस किसको माफ करता, भाई ! मैं तो उस समय एक विषम विपत्ति में पड़ जाता। ऐसी बात तो अलग में कहनी होती है। तुम ठहरे लड़के, इन बातों को अभी नहीं समझते, किसके सामने क्या कहना चाहिए। तुम निश्चिंत रहो। मासिक फीस के रुपए माफ हो जाएंगे। पर परीक्षा की फीस के रुपए तो माफ नहीं होते, उतना तो देगा न?"

नरेन्द्र ने कहा, "उतने का उपाय हो सकता है, किंतु मासिक फीस आपको छोड़नी ही होगी, वह एक पैसा भी न दे सकेगा।"

"अच्छा, अच्छा, वैसा ही होगा," यह कहकर राजकुमार अड्डे के आसपास टहलने लगे। जब नरेन्द्र चले गए, तो वे अड्डे के भीतर घुसे।

नरेन्द्र बूढ़े की भाव-भंगी देखकर जाते जाते मुंह पर कपड़ा रखकर खिलखिलाकर हँसने लगे। सहपाठी बंधु का मकान नरेन्द्र के घर से दूर नहीं था, वे चोरबागान में भुवनमोहन सरकार की गली में रहते थे। दूसरे दिन सवेरे नरेन्द्र मित्र के स्थान पर सूर्योदय के पहले ही पहुँच गए और उनके कमरे के दरवाजे को खटखटाते हुए उन्होंने गाना प्रारंभ किया:

(भैरव -- झॅपताल)

अनुपम-महिमा पूर्णब्रह्म करो ध्यान ,

निरमल पवित्र उषाकाले।

भानु नव तार सेई प्रेम मुख-छाया

देखो एइ उदयगिरि शुभ्र भाले॥

मघु समीरण बहिछे एइ जे शुभदिने ,

ताँर गुण गान करि अमृत ढाले ,

मिलिये , सबे जाइ चलो भगवत-निकतने

प्रेम उपहार लये हृदय-थाले।

(भावार्थ)

अनुपम महिमाशाली पूर्ण परब्रह्म का करो ध्यान ,

निर्मल पवित्र उषाकाल में।

नवीन भानु उसके प्रेमयुक्त मुख की छाया है ,

उसे उदयगिरि के शुभ्र भाल पर देखो।।

इस शुभ घड़ी में मधु समीरण बह रहा है ,

वह उसका गुण-गान कर अमृत-सिंचन कर रहा है ,

चलो , सभी मिलकर भगवत्-निकेतन में जायें

हृदय-थाल में प्रेम-उपहार लेकर ॥

नरेन्द्र का मधुर कंठ-स्वर सुनकर सहपाठियों ने शैया छोड़कर जल्दी से दरवाजा खोल दिया। नरेन्द्र ने कहा, "अरे मौज कर, खुशी मना, तेरा काम सिद्ध हो गया, तुझे अब मासिक फीस नहीं देनी होगी।" यह कहकर वे शाम की समस्त घटना---राजकुमार को भय दिखाना, भय के मारे उनके मुंह के रंग का फीका पड़ जाना, और उसके बाद उनका प्रतिदिन इधर-उधर नजर घुमाकर, लोगों की आँखें बचाकर चट से गली के अड्डे में प्रवेश करना इत्यादि---नकल करके बतलाने लगे। यह सुनकर सभी ठहाका मारकर हँसने लगे।

परीक्षा को अब बहुत दिन नहीं थे; शायद महीना भर भी शेष नहीं था। विशालकाय इंग्लैंड के इतिहास (Green's History of England) को नरेन्द्रनाथ ने एक बार भी नहीं पढ़ा था। परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए नरेन्द्रनाथ की कोई विशेष चेष्टा उनके सहपाठी नहीं देखते थे। बीच-बीच में यद्यपि नरेन्द्र चोरबागान में अपने पूर्वोक्त मित्रों के स्थान पर पढ़ने के लिए जाते थे, किंतु वहाँ जाने पर उनका अधिक समय बातचीत या गाना गाने में ही बीतता था। नरेन्द्र अपने मामा के यहाँ जिस छोटे कमरे में रहते थे, उसके उत्तर की ओर दूसरी मंजिल में एक बड़ा कमरा था, इस कमरे के पश्चिम में एक चोर-कोठरी थी। इस बड़े कमरे के भीतर से उसमें प्रवेश करने का केवल एक दरवाजा था। वह इतना छोटा था कि उसमें प्रवेश करते समय पेट के बल जाना पड़ता था। उस कोठरी में दक्षिण की ओर एक छोटी सी खिड़की थी। इसी समय की बात है, एक दिन उनके कोई मित्र उनके यहाँ जाकर 'नरेन, नरेन' कहकर पुकारने लगे। नरेन्द्र ने उत्तर दिया; परंतु मित्र ने घर में चारों ओर खोजकर जब उनको नहीं देखा, तो बड़े चकित हए। उसी समय नरेन्द्र ने कहा, "इस चोर-कोठरी के भीतर हूँ।" उसी जगह से मित्र के साथ वार्तालाप हुआ। बाद में मित्र को पता चला कि दो दिन से नरेन्द्र इसी कोठरी में बैठकर इंग्लैंड का इतिहास पढ़ रहे हैं। संकल्प करके बैठे हैं कि एक ही बैठक में इंग्लैंड का इतिहास समाप्त करके ही कोठरी से बाहर निकलूंगा। नरेन्द्र ने संकल्पानुसार ही किया। तीन दिन में इस विशाल पुस्तक को पूर्ण रूप से हृदयंगम करके वे कोठरी के बाहर निकले। परीक्षा का दिन आया, परंतु नरेन्द्र में किसी प्रकार का उद्वेग या परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए किसी प्रकार की उत्कंठा नहीं देखी गई।

आज परीक्षा का पहला दिवस है, सूर्योदय से पहले ही उठकर नरेन्द्र शैया त्यागकर इधर-उधर टहलते-टहलते चोरबागान में हरिदास और दाशरथि के मकान पर उपस्थित हुए। वे दोनों इस समय भी सोए थे। उनके कमरे के दरवाजे पर आकर उन्होंने उच्च स्वर में गाना प्रारंभ किया:

(भैरवी-झँपताल)

महासिंहासने बसि शुनिछो हे विश्वपितः ,

तोमारि रचित छन्द महान विश्वेर गीत।

मार मृत्तिका होये , क्षुद्र एइ कण्ठ लिये ,

आमिओ दुयारे तव होयेछि हे उपनीत।

किछु नाहि चाहि देव , केवल दर्शन मागि ,

तोमारे शुनाबो गीत , एसेछि ताहारि लागि ;

गाहे यथा रवि शशी , सेइ सभामाझे बसि ,

एकान्ते गाहिते चाहे एइ भकतेर चित।

(भावार्थ)

महासिंहासन पर बैठ सुनते हो हे विश्वपिता ,

अपने रचित छंद महान विश्व का गोत।

मर्त्य को मत्तिका होकर , क्षुद्र यह कण्ठ लेकर ,

मैं भी तुम्हारे द्वार पर उपनीत हुआ हूँ।

कुछ नहीं चाहता देव , केवल दर्शन माँगता हूँ ,

तुम्हें सुनाने को गीत , आया हूँ तुम्हारे पास ;

गाते हैं जैसे रवि शशि , उसी सभा के बीच में बैठ ,

एकांत में गाना चाहता है इस भक्त का चित्त॥

नरेन्द्र की मधुर आवाज़ सुनकर मित्रों ने जल्दी से उठकर दरवाजा खोला और देखा, प्रसन्नमुख नरेन्द्र हाथ में एक पुस्तक लिए खड़े होकर गाना गा रहे हैं। हो सकेगा तो थोड़ा पढ़ेंगे, इस विचार से वे मित्र के कमरे पर उपस्थित हुए थे, किंतु कमरे के दरवाजे पर खड़े होकर गाना आरंभ कर जिस भावोच्छ्वास की धारा में बहने लगे, उससे निकलकर पढ़ना-पढ़ाना कुछ भी उस दिन न हो सका। नौ बजे तक 'आमरा जे शिशु अति', 'अचल धन गहन गुण गाओ ताहारि' आदि गाना और वार्तालाप का प्रवाह चलता रहा। बगल की कोठरी में नरेन्द्र के और एक सहपाठी रहते थे। नरेन्द्र का गाना जब प्रारंभ हुआ, तो वे भी गोष्ठी में शामिल हुए, किंतु थोड़ी देर गाना सुनने के बाद उन्हें परीक्षा की याद आयी। उन्होंने गान-गोष्ठी छोड़कर जाने के समय बंधु-भाव से नरेन्द्र को परीक्षा की बात का स्मरण करा दिया। नरेन्द्र थोड़ा हँस भर दिया, किंतु गाने का प्रवाह नहीं रुका। यह देख सहपाठी मित्र वहाँ से उठ गए। एक दूसरे मित्र ने आश्चर्यान्वित होकर पूछा, "नरेन्द्र, परीक्षा के दिन कहीं तो एक-आध कठिन विषय, जो अच्छी तरह तैयार न हो, ठीक कर लेना चाहिए, परंतु देखता हूँ तुम्हारा तो सभी कुछ विपरीत है; तुम तो बड़ी मौज़ कर रहे हो!"

नरेन्द्र ने उत्तर दिया, "हाँ, वही तो कर रहा हूँ, दिमाग साफ रखता हूँ, मस्तिष्क को ज़रा विश्राम देना चाहिए, नहीं तो इन दो घंटों में जो कुछ हम अपने दिमाग में ढूंसने का प्रयत्न करेंगे, वह किए -कराये को भी बिगाड़ देगा। इतने दिन तक पढ़-पढ़कर जो नहीं हुआ, वह क्या अब एक-दो घंटे में हो जाएगा ? हो नहीं सकता। परीक्षा के दिन प्रातःकाल केवल मौज़ करना चाहिए। मौज़ करके शरीर और मन को ज़रा शांति देनी चाहिए। घोड़ा जब छूटकर आता है, तो मालिश आदि करके उसे ताज़ा करना होता है। दिमाग़ को भी ठीक उसी तरह करना पड़ता है।"

(श्री सुरेन्द्रनाथ सेन की व्यक्तिगत डायरी से)

शनिवार, २२ जनवरी, १८९८ ई०

(भारत में श्रद्धा-भक्ति का ह्रास, उसकी आवश्यकता--हमें कैसे व्यक्तियों

की आवश्यकता है--सच्चा समाज-सुधार)

मैं प्रातःकाल ही बलराम बाबू के घर पहुँच गया। स्वामी जी यहाँ ठहरे हुए थे। उनका कमरा श्रोताओं से भरा था। स्वामी जी कह रहे थे--"आज हमें श्रद्धा की आवश्यकता है, आत्मविश्वास की आवश्यकता है। बल ही जीवन, और निर्बलता ही मृत्यु है--'हम आत्मा हैं--अजर, अमर, मुक्त, और शुद्ध। फिर हमसे पाप कार्य कैसे संभव है ? असंभव।' इस प्रकार की दृढ़ निष्ठा होनी चाहिए। इस प्रकार का अडिग विश्वास हमें मनुष्य बना देता है, देवता बना देता है। पर आज हम श्रद्धाहीन हो गए हैं और इसीलिए हमारा तथा देश का पतन हो रहा है।"

प्रश्न--हम श्रद्धाहीन कैसे बन गए?

स्वामी जी--बचपन से हमारी शिक्षा ही ऐसी रही है। उसमें निषेध और नकार का ही प्राबल्य है। हमने यही तो सीखा है कि हम नगण्य हैं, नाचीज हैं। कभी भी हमें यह नहीं बताया गया कि हमारे देश में भी महान पुरुषों का जन्म हुआ है। हमें एक भी तो अच्छी बात नहीं सिखायी जाती। हमें अपने हाथ पैर चलाना तक तो नहीं आता! हमें इंग्लैंड के पूर्वजों की तो एक एक घटना और तिथि याद हो जाती है, पर, दुःख है, अपने देश के अतीत से हम अनभिज्ञ रहते हैं। हम केवल निर्बलता का पाठ पढ़ते हैं। पराजित राष्ट्र होने से, हमें अब यह विश्वास हो गया है कि हम शक्तिहीन और हर बात में परावलंबी हैं। अतः श्रद्धा नष्ट न हो तो क्या हो ? अब हमें पुनः एक बार वह सच्ची श्रद्धा का भाव जाग्रत करना होगा, हमारे सोये हुए आत्मविश्वास को जगाना होगा, तभी आज देश के सामने जो समस्याएँ हैं, उनका समाधान स्वयं हमारे द्वारा हो सकेगा।

प्रश्न--यह क्या कभी संभव होगा? केवल श्रद्धा से ही हमारे समाज के असंख्य दोष कैसे दूर होंगे? देश में जो बुराइयाँ और कुरीतियाँ हैं, उन्हें दूर करने के लिए काँग्रेस तथा देशभक्त संस्थाएँ प्रचार और आंदोलन कर रही हैं तथा अंग्रेज सरकार से प्रार्थना भी कर रही हैं। क्या इससे अच्छा भी अन्य कोई मार्ग है ? श्रद्धा का इन सब बातों से क्या संबंध है ?

स्वामी जी--पहले यह बतलाओ कि समाज के दोष दूर करने की आवश्यकता तुम को है या सरकार को? यदि तुमको आवश्यकता है, तो क्या सरकार उन्हें दूर करेगी या तुमको स्वयं ही उन्हें दूर करना होगा?

प्रश्न--पर यह तो सरकार का कर्तव्य है कि प्रजा की आवश्यकताएँ समझे और उन्हें पूरी करे। यदि हम हर एक वस्तु के लिए राजा का मुँह नहीं ताकें, तो और किसका ताकें ?

स्वामी जी--भिखमंगों की माँगें कभी पूरी नहीं होतीं। माना कि सरकार तुमको तुम्हारी आवश्यकता की वस्तुएँ देने को एक बार राजी भी हो जाए, पर प्राप्त होने पर उन्हें सुरक्षित और सँभालकर रखनेवाले मनुष्य कहाँ हैं ? इसलिए पहले आदमी--'मनुष्य' उत्पन्न करो। हमें अभी 'मनुष्यों' की आवश्यकता है, और बिना श्रद्धा के मनुष्य कैसे बन सकते हैं ?

प्रश्न--पर बहुसंख्यक लोगों का मत ऐसा नहीं है।

स्वामी जी--जिसे तुम बहुसंख्या कहते हो, वह मूर्खों की और साधारण बुद्धिवालों की बहुसंख्या है। सभी देशों में, जिनके पास विचार करने के लिए मस्तिष्क है, ऐसे व्यक्ति कम होते हैं। ये ही कुछ मेधावी और विचारशील व्यक्ति सर्वत्र अग्रणी होते हैं, और बहुसंख्या सदैव उनका अनुसरण करती है। यही अच्छा भी है, क्योंकि जब तक नेताओं के बताए हुए मार्ग पर बहुसंख्या चलती रहती है, तब तक सब काम ठीक चलता रहता है। जो सोचते हैं कि वे इतने ऊँचे हैं कि किसी के सामने सिर झुकाना उनकी शान के खिलाफ है, वे बेवकूफ हैं, मूर्ख हैं। ऐसे व्यक्ति, अपनी दुर्बुद्धि से अपना विनाश कर लेते हैं। तुम समाज-सुधार की बातें करते हो? पर तुम करते क्या हो? तुम्हारे समाज-सुधार का मतलब होता है विधवा-विवाह, या स्त्री-स्वातंत्र्य, या ऐसी ही कोई और बात। ऐसा नहीं है क्या? और यह भी कुछ जातियों तक ही सीमित रहता है। इस तरह के सुधार की योजना से कुछ लोगों का अवश्य भला होता है, पर समूची जाति या राष्ट्र को इससे क्या लाभ? यह तो सुधार नहीं, एक प्रकार का स्वार्थ ही है--अपने घर को झाड़ बुहार कर साफ़ रखना, और दूसरों के घर ढहने देना !

प्रश्न--तो आपका तात्पर्य यह है कि समाज-सुधार की कोई आवश्यकता ही नहीं?

स्वामी जी--यह कौन कहता है ? अवश्य समाज-सुधार की आवश्यकता है, पर जिसे आप समाज-सुधार कहते हैं, उससे सर्वसाधारण जनता--भारत की कोटि कोटि जनता का क्या हित होगा? विधवा-विवाह, स्त्री-स्वातंत्र्य आदि जिन सुधारों के लिए तुम चिल्ला रहे हो, उनकी भारत की बहुसंख्यक जनता को आवश्यकता ही नहीं है, उनमें विधवा-विवाह की प्रथा भी है और स्त्रियों को स्वतंत्रता भी प्राप्त है। इसलिए वे इन बातों को सुधार ही नहीं मानते। मेरा तात्पर्य यह है कि ये सब दोष हममें श्रद्धा के अभाव से ही घुस आए हैं, और दिन प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे हैं। पर मैं यह चाहता हूँ कि रोग समूल नष्ट किया जाए। रोग के कारण जड़ से नष्ट किए जायें, रोग दबाया न जाए, नहीं तो वह फिर बढ़ जाएगा। सुधार अवश्य हो; कौन इतना मूढ़ है, जो यह नहीं मानता? उदाहरण के लिए, हमें अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित करना चाहिए, क्योंकि इसके बिना जाति की शारीरिक निर्बलता दिन प्रतिदिन बढ़ रही है।

उस रोज सूर्यग्रहण था; इसलिए जो महाशय स्वामी जी से ये प्रश्न कर रहे थे, बोले--"अब मैं गंगास्नान के लिए जाऊँगा। फिर कभी सेवा में उपस्थित होऊँगा।" और प्रणाम कर चले गए।

रविवार, २३ जनवरी, १९१८ ई०

( ज्ञानयोग और भक्तियोग का समन्वय--ईश्वर अशुभ में भी है और शुभ में भी--उपयोग के प्रकार से ही वस्तु भली बुरी बनती है--कर्म--सृष्टि--ईश्वर--माया )

संध्या का समय था। बलराम बाबू के घर, रामकृष्ण मिशन की साप्ताहिक बैठक हो रही थी। मठ से स्वामी तुरीयानन्द, स्वामी योगानन्द, स्वामी प्रेमानन्द एवं अन्य लोग भी आए हुए थे। स्वामी जी बरामदे में पूर्व की ओर विराजमान थे, और चारों ओर बरामदे में लोग भरे थे। जब जब स्वामी जी कलकत्ता आते, इसी तरह लोग जुट जाते थे।

सभा में उपस्थित कई लोगों ने यह सुन रखा था कि स्वामी जी बहुत अच्छा गाते हैं, इसलिए वे स्वामी जी से कोई भजन सुनने के इच्छुक थे। यह जानकर मास्टर महाशय [5] ने स्वामी जी के समीप बैठे कुछ सज्जनों के कान में कहा कि स्वामी जी से गाने का आग्रह करो। स्वामी जी ने उनका आशय ताड़ लिया और वे मुस्कुराकर बोले--"मास्टर महाशय, यह आपस में क्या कानाफूसी चल रही है, जरा जोर से बोलो।" मास्टर महाशय के प्रार्थना करने पर, स्वामी जी ने अपने सुरीले कंठ से यह गीत गाया--'प्यारी श्यामा माँ को प्यार से हृदय में बिठा लो।' ऐसा प्रतीत होता था मानो वीणा बज रही हो। भजन समाप्त होने पर वे मास्टर महाशय से कहने लगे, "अब तो खुश हो न। पर अब और नहीं गाऊँगा। नहीं तो मैं भावावेश में आकर, गीत की मादकता में डूब जाऊँगा। और पश्चिम में व्याख्यान देते देते मेरा गला भी तो अब खराब हो गया है। मेरी आवाज़ बहुत कांपने लगी है।"

फिर स्वामी जी ने एक ब्रह्मचारी को मुक्ति पर कुछ कहने का आदेश दिया। ब्रह्मचारी ने खड़े होकर कुछ देर तक भाषण दिया। उसके बाद अन्य ब्रह्मचारी भी बोले। फिर स्वामी जी ने प्रवचन के विषय पर श्रोताओं से विचार विनिमय करने के लिए कहा और अपने एक गृहस्थ शिष्य को आरंभ करने का आदेश दिया। जब वे अद्वैत और ज्ञान को भक्ति और द्वैत से श्रेष्ठ बताने लगे, तो बीच में ही किसी श्रोता ने प्रतिवाद किया। जब वे दोनों अपने अपने पक्षों का मंडन करने लगे, तो एक अच्छा खासा वाग्युद्ध आरंभ हो गया। स्वामी जी कुछ देर तक तो सुनते रहे, पर जब उन्होंने देखा कि दोनों आवेश में आ रहे हैं, तो उन्हें शांत करते हुए बोले :

"तुम लोग विवाद में इतना आवेश लाकर सब मजा किरकिरा कर देते हो। सुनो, श्री रामकृष्ण देव कहते थे कि विशुद्ध ज्ञान और भक्ति में कोई अंतर नहीं है। भक्तियोग में परमेश्वर को 'प्रेममय' माना गया है। परमेश्वर के पूर्ण प्रेममय होने से, कोई यह नहीं कह सकता कि मैं परमेश्वर से प्रेम करता हूँ। परमेश्वर से परे किसी प्रेम का अस्तित्व नहीं है। भक्त के हृदय में जो ईश्वर-प्रेम है--वह प्रेम भी तो परमेश्वर ही है। इसी प्रकार जो भी इच्छाएँ हैं, आकर्षण हैं, वृत्तियाँ हैं, वे भी ईश्वर के ही रूप हैं। चोर चोरी करता है, वेश्या अपना शरीर बेचती है, माँ अपने बच्चे को प्यार करती है,--इन सब भावनाओं और वृत्तियों में भी ईश्वर ही है। एक ग्रह न दूसरे ग्रहपुंज को आकृष्ट करता है, उसमें भी ईश्वर ही है। सर्वत्र वही है। ज्ञानयोग के अनुसार भी वह सर्वत्र विद्यमान है। इसलिए ज्ञान और भक्ति में विरोध कहाँ है ? वे तो एक ही विषय का प्रतिपादन करते हैं। जब भावावस्था को प्राप्त होकर कोई ब्रह्मानंद में डूब जाता है, या समाधिस्थ हो जाता है, तब उसका द्वैत-भाव नष्ट हो जाता है, तब भक्त और भगवान् एक हो जाते हैं, भक्तियोग के ग्रंथों में भक्ति के पाँच विविध प्रकार बताए गए हैं, और किसी भी एक से भगवत्प्राप्ति संभव है। इनमें एक छठा प्रकार और जोड़ा जा सकता है, वह है--'परमेश्वर और मैं एक हूँ--इस अद्वैतभाव का ध्यान।' इस प्रकार भक्तिमार्गों, अद्वैतियों को भी भक्तिमार्गी ही मान ले सकते हैं, अंतर इतना ही है कि ये अद्वैतमार्गी भक्त हैं। जब तक हम मायापाश से मुक्त नहीं होते, तब तक द्वैत का भाव अवश्य बना रहेगा। देश-काल-निमित्त या नाम रूप ही माया है। जब कोई इस माया से मुक्त हो जाता है, तो उसे जीव-ब्रह्म की एकता का अनुभव हो जाता है--तब न द्वैत होता है और न अद्वैत--उसके लिए सब एक हो जाता है। ज्ञानी और भक्त में केवल साधना की प्राथमिक अवस्था में ही अंतर प्रतीत होता है--एक परमेश्वर को अपने बाहर देखता है और दूसरा अपने अंतर में ! एक बात और है। श्री रामकृष्ण देव कहा करते थे कि भक्ति की एक और अवस्था भी है, जिसे परा-भक्ति कहते हैं--वह है मुक्त होने पर, अद्वैत-भाव की प्राप्ति हो जाने पर परमेश्वर के प्रेम में विभोर हो जाना। यह कुछ विरोधोक्ति सा प्रतीत होगा, और यह प्रश्न उठ सकता है कि मुक्ति प्राप्त होने पर भक्ति की क्या आवश्यकता है ? इसका केवल यही उत्तर है कि जो मुक्त है, जो स्वतन्त्र है, वह सब नियमों से परे है। उसके विषय में यह प्रश्न ही नहीं उठता कि उसने ऐसा ही क्यों किया और वैसा क्यों नहीं किया। मुक्त हो जाने पर भी भक्ति के माधुर्य का रसास्वादन करने के लिए कुछ लोग उसको अपनाए रहते हैं।

प्रश्न--महाराज, माँ की ममता में ईश्वर रह सकता है, पर यह जरा विचित्र सा लगता है कि चोर और वेश्या की पापवृत्ति में भी ईश्वर है। इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वर जगत के सत्कार्यों का जितना कारण है, उतना ही पाप का भी है।

स्वामी जी--यह दृष्टि केवल परम सिद्धावस्था तक पहुँच जाने पर ही प्राप्त होती है, तभी ऐसा लगता है कि जहाँ भी प्रेम या आकर्षण है, वहीं ईश्वर है। पर अपने जीवन में ऐसी दृष्टि प्राप्त करने के लिए उस अवस्था को प्राप्त होना आवश्यक है।

प्रश्न--फिर भी यह तो स्वीकार करना ही होगा कि पाप में भी ईश्वर ही है।

स्वामी जी--देखो, यथार्थ में न तो कोई चीज़ भली है और न बुरी। यह तो केवल एक परिपाटी है कि हम किसी चीज़ को भली या बुरी कह देते हैं। एक चीज़ को हम बुरी कह देते हैं, तो किसी अन्य अवसर पर उसे भली कहने लगते हैं। कोई वस्तु अच्छी है या बुरी, यह उसके उपयोग पर निर्भर रहता है। उदाहरण के लिए इस दीप-ज्योति को ही लो। इसके प्रकाश में हम पढ़ते हैं और कई अन्य उपयोगी काम भी करते हैं। यह उसके उपयोग का एक प्रकार है। अच्छा, अब यदि उसमें कोई अपनी अंगुली रखे, तो वह जल जाएगा। यह उसके उपयोग का दूसरा प्रकार है। इस तरह, कोई वस्तु जिस प्रकार उपयोग में लायी जाती है, उसीसे उसके भले-बुरे का निर्णय होता है। इसी तरह से सद्गुण और दुर्गुण, पाप और पुण्य हैं। हमारी मानसिक एवं शारीरिक प्रवृत्तियों का उचित उपयोग ही पुण्य है, और उनका अनुचित उपयोग एवं ह्रास ही पाप है।

इस तरह कई प्रश्नोत्तर हुए। फिर किसी ने कहा--"नक्षत्र-तारा-ग्रह मण्डलों के परस्पर आकर्षण में भी ईश्वर है-यह सिद्धांत सच हो या न हो, पर यह विचार अवश्य अत्यंत कवित्वमय है, इसमें कोई संदेह नहीं।"

स्वामी जी--नहीं महाशय', यह कल्पना की उड़ान नहीं। ज्ञान-प्राप्ति होने पर इस महान सत्य का आप स्वयं दर्शन कर सकते हैं।

इस प्रसंग में स्वामी जी ने आगे जो कहा, उसका आशय मैं यह समझा--जड़ और चेतन यद्यपि भिन्न मालूम होते हैं, तथापि वे एक ही तत्त्व के दो रूप हैं। इसी प्रकार बाह्य और अंतर्जगत् में जो भिन्न भिन्न शक्तियाँ क्रियाशील हैं, वे भी एक ही महाशक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं। हम एक पदार्थ को जड़ मानने लगते हैं, क्योंकि उसमें निहित आत्म तत्त्व कुछ कम मात्रा में प्रकट हुआ है और जहाँ वह कुछ अधिक मात्रा में प्रकट हुआ है, उसे हम जीव मानने लगते हैं। ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो सर्वथा जड़ हो और सदा जड़ ही बनी रहेगी। जड़ जगत में जो शक्ति आकर्षण या गुरुत्वाकर्षण के रूप में प्रकट होती है, आध्यात्मिक साधना के उच्चतर स्तरों में उसी के सूक्ष्मरूप प्रेम आदि में अनुभूत होते हैं।

प्रश्न--वस्तुविशेष के उपयोग पर अवलंबित यह अच्छे-बुरे का अंतर भी क्यों होना चाहिए? मनुष्य में अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति ही क्यों होनी चाहिए?

स्वामी जी--यह प्रवृत्ति कर्मों के फलस्वरूप होती है। मनुष्य जो है, जैसा है उसका कारण वह स्वयं ही है। इसीको दूसरे शब्दों में इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पाने, और उनका उचित उपयोग करने का सामर्थ्य प्राप्त है।

प्रश्न--यदि ये प्रवृत्तियाँ कर्मों के फलस्वरूप हैं, यह मान भी लिया जाए, तो भी उनका आदि तो अवश्य ही होगा, और आदि में ये बुरी प्रवृत्तियाँ अच्छी या बुरी क्यों हुई?

स्वामी जी--आप यह कैसे जानते हैं कि इनका आदि है ? सृष्टि अनादि है-यह वेदवाक्य है। जब तक ईश्वर है, तब तक सृष्टि भी है।

प्रश्न--महाराज, तो यह माया क्यों है और यह आयी कहाँ से?

स्वामी जी--ईश्वर के संबंध में 'क्यों' का प्रश्न करना गलत है। जो अपूर्ण है, जिसमें अभाव और कामनाएँ हैं, उसी के संबंध में क्यों का प्रश्न किया जा सकता है। जो निष्काम है, जो पूर्ण है--एक है--उसके संबंध में क्यों? कैसा? माया कहाँ से आयी ?'--ऐसे प्रश्न नहीं पूछे जा सकते। देश-काल-निमित्त ही माया है। तुम, मैं और हम सब माया में हैं तथा तुम माया में रहते हुए यह प्रश्न कर रहे हो कि माया के परे क्या है ! जब तक माया में हो, तब तक यह कैसे कह सकते हो?

इसके पश्चात् फिर कई प्रश्नोत्तर हुए। तदनंतर मिल, हेमिल्टन, हरबर्ट स्पेंसर प्रभृति पाश्चात्य पंडितों के दर्शनशास्त्र पर चर्चा हुई और स्वामी जी ने सरलता से सब समझाया। सबको स्वामी जी के पाश्चात्य-दर्शन के अगाध ज्ञान और तत्काल उत्तर दे सकने की क्षमता पर बड़ा आश्चर्य हुआ।

इसके बाद विविध प्रश्नों पर चर्चा हुई और सभा विजित हो गई।

१०

सोमवार, २४ जनवरी, १८९८ ई०

(एक वर्ण की उपजातियों में अंतर्विवाह--बालविवाह के विरोध में--भारत को कैसी शिक्षा की आवश्यकता है--ब्रह्मचर्य)

गत शनिवार के दिन जिन महाशय ने स्वामी जी से प्रश्न किए थे, वे आज फिर आए। उन्होंने अंतर्विवाह का विषय छेड़ा और पूछा--"भिन्न-भिन्न राष्ट्रीय जातियों में अंतर्विवाह कैसे प्रारंभ किया जाए?"

स्वामी जी--मैं भिन्न धर्मावलंबी जातियों में अंतर्विवाह करने के पक्ष में नहीं हूँ। कम से कम आज तो उससे समाज के बंधन बहुत ढीले पड़ जाएंगे और कई अनिष्ट होने की आशंका है। मैं तो अभी केवल सम-धर्मानुयायियों के ही परस्पर अंतर्विवाह का समर्थन करता हूँ।

प्रश्न--तो भी, इससे कई जटिलताएँ उत्पन्न होंगी, जैसे कि-मेरी पुत्री बंगाल में जन्मी और वहीं उसका लालन-पालन हुआ और मैं उसकी किसी मराठी या मद्रासी से शादी कर दूं, तो न वह अपने पति की भाषा समझेगी और न उसका पति उसकी भाषा समझेगा। और फिर उनके रहन-सहन, उनके रीति-रिवाज़ में भी बहुत अंतर है। इस तरह की कई अड़चनें हैं, और फिर समाज तो एक तूफान खड़ा कर देगा।

स्वामी जी--अभी वह समय बहुत दूर है, जब इस प्रकार के विवाह संभव हो सकेंगे। और आज तो ऐसे विवाहों को एकदम प्रारंभ कर देने का कोई औचित्य भी नहीं प्रतीत होता! काम करने का एक गुप्त रहस्य यह है कि न्यूनतम अवरोध की दिशा में चलो। इसलिए प्रारंभ में अपनी ही जाति की उपजातियों में अंतर्विवाह शुरू होने चाहिए। बंगाल के कायस्थों का ही उदाहरण लो। उनमें कई उपजातियाँ हैं--जैसे उत्तरराढ़ी, दक्षिणराढ़ी, बंगज आदि, और उनमें परस्पर विवाह नहीं होते। अब, 'दक्षिणराढ़ी' और 'उत्तरराढ़ियों' में परस्पर विवाह संबंध शुरू करने चाहिए, और यदि यह अभी संभव नहीं है, तो बंगजों और दक्षिणराढ़ियों के विवाह ही शुरू हों। इस तरह आज जो चीज़ विद्यमान है, उसीमें यथासाध्य सुधार करें। आखिर सुधार सब कुछ उखाड़ फेंकने में ही तो नहीं है न!

प्रश्न--अच्छा, यही सही, पर इससे लाभ क्या होगा?

स्वामी जी--क्या तुम नहीं देखते कि शादियों से, एक ही उपजाति तक विवाह-संबंध सीमित होने से, हमारे समाज में एक ऐसी स्थिति आ गई है कि प्रकारांतर से निकट के कुटुंबियों और भ्रातृव्यों में ही विवाह हो रहे हैं, और इससे हमारे समाज की शरीर-संपदा का ह्रास हो रहा है, तथा परिणामस्वरूप सभी तरह की बीमारियाँ और बुराइयाँ उसमें घुस रही हैं ? एक सीमित संख्या के व्यक्तियों में परिभ्रमण करते करते रक्त दूषित हो गया है और जन्म से ही नवजात शिशुओं को वंशगत रोग प्राप्त हो जाते हैं। इस प्रकार की निर्बल संतति रोग के कीटाणुओं के आक्रमण का अवरोध करने में नितांत असमर्थ होती है। विवाहों की परिधि विस्तृत करने पर ही हम अपनी संतति में नए और ताजे खून का संचार कर पायेंगे, जिससे उसकी आजकल के विविध रोगों और तज्जन्य अन्य व्याधियों से रक्षा हो सके।

प्रश्न--महाराज, आपका बाल-विवाह के संबंध में क्या मत है ?

स्वामी जी--बंगाल के शिक्षित वर्ग में बालविवाह की प्रथा धीरे धीरे नष्ट हो रही है। लड़कियों का विवाह भी पहले की अपेक्षा एक दो वर्ष अधिक उम्र होने पर ही होने लगा है। किंतु इसका कारण समाजसुधार की भावना नहीं, अर्थाभाव है। किसी भी कारण से क्यों न हो, विवाह की उम्र और भी अधिक हो जानी चाहिए। पर बेचारा बाप करे क्या ? ज्यों ही लड़की जरा बड़ी होती है, माँ से लेकर अन्य सभी स्त्रियाँ और पड़ोसिनें यही एक रट लगाने लगती हैं कि वर की खोज की जाए, और जब तक वर नहीं मिल जाता, तब तक बेचारे बाप को चैन नहीं लेने देतीं। और तुम्हारे पाखंडी पंडों-पुरोहितों के विषय में तो जो कहा जाए, वही थोड़ा है। आजकल कोई उनकी सुनता नहीं, फिर भी वे अपने आप नेता बन बैठते हैं। सरकार ने कानून बनाकर, १२ वर्ष की कन्या से विवाह दंडनीय कर दिया, तो ये सब धर्मगुरु चिल्लाने लगे कि धर्म नष्ट हो गया, मानो बारह-तेरह वर्ष की कन्या के माँ बनने में ही धर्म रह गया हो! इसीलिए सरकार भी यही सोचेगी कि वाह! क्या धर्म है इन लोगों का! और ये आंदोलन कर राजनीतिक अधिकारों की माँग करते हैं !

प्रश्न--तो आपके मत से, लड़के-लड़कियों का विवाह ज्यादा उम्र पर ही होना चाहिए ?

स्वामी जी--अवश्य। पर साथ साथ उन्हें अच्छी शिक्षा भी दी जाए, नहीं तो भ्रष्टाचार और व्यभिचार बढ़ने की आशंका है। शिक्षा से मेरा तात्पर्य आधुनिक प्रणाली की शिक्षा से नहीं, वरन् ऐसी शिक्षा से है जो भावात्मक हो तथा जिससे स्वाभिमान और श्रद्धा के भाव जागे। केवल किताबें पढ़ा देने से कोई लाभ नहीं। हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है, जिससे चरित्र-निर्माण हो, मानसिक शक्ति बढ़े, बुद्धि विकसित हो, और देश के युवक अपने पैरों पर खड़े होना सीखें।

प्रश्न--हमारे नारी-समाज में भी कई सुधारों की आवश्यकता है।

स्वामी जी--इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त होने पर स्त्रियाँ अपनी समस्याएँ स्वयं ही हल कर लेंगी। अब तक तो उन्होंने केवल असहाय अवस्था में दूसरों पर आश्रित हो जीवन यापन करना, और थोड़ी सी भी अनिष्ट या संकट की आशंका होने पर आँसू बहाना ही सीखा है। पर अब दूसरी बातों के साथ साथ उन्हें बहादुर भी बनना चाहिए। आज के जमाने में उनके लिए आत्मरक्षा करना सीखना भी बहुत जरूरी हो गया है। देखो झाँसी की रानी कैसी महान थीं !

प्रश्न--आप जैसा बता रहे हैं, यह एक नयी बात है, और मुझे मालूम पड़ता है कि वैसी शिक्षा की व्यवस्था होने में काफ़ी समय लगेगा।

स्वामी जी--फिर भी, हमें यथाशक्ति प्रयत्न तो करना होगा। हमें सिर्फ स्त्रियों को ही यह शिक्षा नहीं देनी है, वरन् अपने को भी शिक्षित करना है। केवल पुत्र-जन्म से ही पितृत्व प्राप्त नहीं हो जाता, साथ साथ गुरु कर्तव्य भार भी अपने, कंधों पर वहन करना पड़ता है। अब स्त्री-शिक्षा कैसी हो : प्रथम तो--हिंदू स्त्री के लिए सतीत्व का अर्थ समझना सरल ही है, क्योंकि यह उसकी विरासत है, परंपरागत संपत्ति है। इसलिए सर्वप्रथम, यह ज्वलंत आदर्श भारतीय नारी के हृदय में सर्वोपरि रहे, जिससे वे इतनी दृढ़चरित्र बन जाएं कि चाहे विवाहित हों या कुमारी, जीवन की हर अवस्था में, अपने सतीत्व से तिल भर भी डिगने की अपेक्षा, जीवन की निडर होकर आहुति दे दें। अपने आदर्श की रक्षा के लिए अपने जीवन की भी बलि दे देना--यह क्या कम वीरता है ? आज के यग की आवश्यकताएँ देखते हुए, मुझे तो यह अत्यंत आवश्यक प्रतीत होता है कि कुछ महिलाएँ संन्यस्त जीवन के आदर्शों का पालन करने के लिए शिक्षित की जाये, जिससे कि वे आजन्म कौमार्य व्रत धारण करें। आदि काल से जिनकी नस नस में सतीव्रत भरा है, उन भारतीय महिलाओं के लिए इसमें कोई कठिनता नहीं है। साथ साथ, महिलाओं को विज्ञान एवं अन्य विषय, जिनसे कि केवल उनका ही नहीं, अन्य लोगों का भी हित हो, सिखाए जाएं। यह जानकर कि परोपकार के लिए यह करना है, भारतीय नारी प्रसन्नता से और सरलतापूर्वक कोई भी विषय सीख लेगी। हमारी मातृभूमि के उत्थान के लिए आज उसे ऐसे ही पुण्यसंकल्प, पवित्रात्मा ब्रह्मचारियों तथा ब्रह्मचारिणियों की आवश्यकता है।

प्रश्न--इससे देश का किस तरह भला होगा?

स्वामी जी--उनके आचरण तथा सर्वसाधारण के लिए राष्ट्रीय आदर्श उपस्थित करने के उनके प्रयत्नों से, लोगों के विचारों और आशा-आकांक्षाओं में एक क्रांतिकारी परिवर्तन होगा। आज क्या स्थिति है ? माँ-बाप, येनकेन प्रकारेण, अपनी कन्या का विवाह निपटा देना चाहते हैं-चाहे वह ९ वर्ष की हो या १० वर्ष की ! और यदि तेरह वर्ष की अवस्था में ही उसको संतान हो जाती है, तो समूचे परिवार के लिए महोत्सव हो जाता है ! यदि इन विचारों का प्रवाह बदल दिया जाए, तो पुरातन श्रद्धा के पुनरागमन की कुछ आशा हो सकती है। और जो ब्रह्मचर्यपूर्वक जीवन यापन करेंगी, उनका तो कहना ही क्या-उनकी स्वयं में कितनी महान श्रद्धा और कितना विश्वास होगा! और उनसे कितना हित और कल्याण होगा!

अब प्रश्नकर्ता ने प्रणाम कर स्वामी जी से जाने की आज्ञा माँगी ! स्वामी जी ने उन्हें कभी-कभी आते रहने के लिए कहा। उन्होंने कहा, "अवश्य महाराज, अवश्य आऊँगा! मैंने आपसे ऐसी ऐसी बातें सुनी हैं जो और कोई नहीं कह सकता। मेरा बहुत कल्याण हुआ है।" रात हो चली थी, इसलिए मैं भी घर चला आया।

११

सोमवार, २४ जनवरी, १८९८ ई०

( मधुर भाव--प्रेम--नाम कीर्तन--ज्ञानयुक्त भक्ति--एक अद्भुत स्वप्न )

तीसरे पहर मैं फिर स्वामी जी के पास आया। उनके चारों ओर काफ़ी लोग बैठे थे। मधुर भाव पर चर्चा हो रही थी। ईश्वर को पतिरूप में भजना-जैसा कि चैतन्य संप्रदाय में प्रचलित है--मधुर भाव कहलाता है। स्वामी जी की उक्तियों से कभी कभी हँसी के फौव्वारे छूट जाते। इसी बीच कोई बोला--"चैतन्य महाप्रभु की जीवनलीला में हास्यास्पद ऐसा क्या है ? क्या तुम सोचते हो कि चैतन्य महाप्रभु महात्मा नहीं थे और उनका जीवन सर्वभूतहिताय नहीं था?"

स्वामी जी--कौन हो तुम ? तो महाशय जी, मैं क्या फिर तुम्हारी हँसी उड़ाऊँ ? तुम तो केवल इसमें हँसी ही देखते हो? पर महाशय, तुम्हें यह नहीं दिखता कि चैतन्य महाप्रभु के ज्वलंत आदर्श--कामिनीकांचन त्याग--के साँचे में अपने को ढालने के लिए मैंने आजीवन संघर्ष किया है, और जनसाधारण में वही आदर्श की भावना लूंस-ठूस कर भर देने का प्रयत्न कर रहा हूँ! चैतन्य महाप्रभु तो महान त्यागी थे, उनका कामिनी और इंद्रियभोग से क्या नाता? पर बाद में, उनके अनुयायियों ने स्त्रियों को भी अपने संप्रदाय में सम्मिलित कर लिया, चैतन्य के नाम पर अंधाधुंध उनके संपर्क में रहे, और इस तरह उनके महान आदर्शों को मिट्टी में मिला दिया। प्रेम का जो आदर्श चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन में प्रकट किया था, उसमें तो अहंभाव और वासना का लवलेश भी नहीं था; वह काम-विहीन प्रेम सर्वसाधारण के लिए कैसे सुलभ हो सकता था? किंतु उनके परवर्ती वैष्णव गुरुओं ने, चैतन्य महाप्रभु के जीवन के त्याग एवं निःस्पृहता के आदर्शों की ओर दुर्लक्ष्य कर, सर्वसाधारण में उनके प्रेम के आदर्श का ही प्रचार किया। परिणाम यह हुआ कि सर्वसाधारण उस स्वर्गीय प्रेम के तत्त्व को नहीं समझ पाया, और उस प्रेम को स्त्री-पुरुष के निकृष्टतम स्वरूप के प्रेम का रूप प्राप्त हो गया।

प्रश्न--पर महाराज, उन्होंने तो हरि के नाम का उपदेश चांडालों तक को दिया था; इसलिए सर्वसाधारण को उनके उपदेशों का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए ?

स्वामी जी--मैं उनके उपदेशों की नहीं, उनके प्रेम के महान आदर्श--राधा प्रेम की चर्चा कर रहा हूँ--जिसमें वे रात-दिन मस्त रहते थे और अपने को राधा का ही स्वरूप समझे रहते थे।

प्रश्न--यह सर्वसाधारण के लिए क्यों वजित है ?

स्वामी जी--इस देश पर उसका क्या परिणाम हुआ, यह तो देखो। उस प्रेमभाव का सर्वसाधारण में प्रचार किए जाने से सारा राष्ट्र स्त्रैण, स्त्रियों की एक जाति हो गया है। सारा उड़ीसा कायरों का देश बन गया है, और बंगाल--इस राधाप्रेम के पीछे इन चार सौ वर्षों में अपना सत्व ही खो बैठा है। लोगों को बस रोना और आँसू बहाना मात्र आता है, यही उनका राष्ट्रीय गुण बन गया है। उनके साहित्य को देखो, जो कि राष्ट्र के विचारों और भावों का दर्पण होता है। इन चार सौ वर्षों के बंगाली साहित्य का ध्रुवपद यही कराहना और आँसू बहाना ही तो है। इन चार सौ वर्षों में वीररस का एक काव्य तक तो नहीं रचा गया।

प्रश्न--तो उस प्रेम के अधिकारी फिर कौन हैं ?।

स्वामी जी--जब तक हृदय में वासना के लिए तिलमात्र भी स्थान है, तब तक वह प्रेम संभव नहीं। केवल महान त्यागी, निःस्पृह और संन्यस्त व्यक्ति, केवल जो मानवों में अतिमानव हैं,--केवल उन्हें ही उस स्वर्गीय प्रेम का अधिकार है। यदि वह प्रेम का उच्चतम आदर्श सर्वसाधारण में प्रचलित कर दिया जाए, तो वह प्रकारांतर से मनुष्य के हृदय में प्रबल सांसारिक प्रेम को ही उद्दीप्त करेगा--क्योंकि ईश्वर का प्रियाभाव से ध्यान करते करते साधारण मनुष्य अधिकांश समय अपनी ही प्रिया के ध्यान में खोया रहेगा और इसका परिणाम क्या होगा--यह स्पष्ट है।

प्रश्न--तो क्या गृहस्थों के लिए इस प्रेममार्ग से, ईश्वर को पति या प्रियतम मानकर, प्रियाभाव से आराधना कर, भगवत्प्राप्ति असंभव है ?

स्वामी जी--कुछ अपवाद छोड़कर साधारण गृहस्थों के लिए निस्सन्देह यह असंभव है। और फिर इस कठिन मार्ग पर ही इतना बल क्यों? मधुर भाव के अतिरिक्त क्या अन्य कोई भाव या संबंध नहीं हैं, जिनके द्वारा भगवत्पूजा की जा सके ? अन्य चारों मार्गों का अनुकरण कर, ईश्वर का नाम हृदय से स्मरण करो। पहले हृदय के द्वार तो खुलने दो, शेष सब अपने आप ही आ जाएगा। लेकिन यह वात अच्छी तरह से समझ लो कि जब तक काम-वासना है, तब तक उस प्रेम का आविर्भाव नहीं होगा। पहले अपनी इंद्रियासक्ति, भोगों की लालसा का ही त्याग क्यों न करो? तुम कहोंगे-'यह कैसे संभव है, मैं तो गृहस्थ हूँ।' फालतू बकवास है यह सब। गृहस्थ होने के माने यह तो नहीं है कि कोई मूर्तिमन्त वासना बन जाए या आजन्म वैवाहिक सुख का उपभोग करता रहे ? और फिर मनुष्य के लिए यह कितना लज्जास्पद है कि वह स्वयं को स्त्री समझने लगे, जिससे कि मधुर भाव का आचरण कर सके !

प्रश्न--ठीक है महाराज! नाम-कीर्तन अत्यंत सहायक है और उसमें बहुत आनंद भी आता है। धर्मग्रंथ भी यही कहते हैं और महाप्रभु चैतन्य ने भी जनता को यही उपदेश दिया। जब मृदंग बजने लगता है, तो हृदय आनंद से उछलने लगता है और आदमी नाचने लगता है।

स्वामी जी--यह ठीक है, पर यह मत समझना कि कीर्तन का अर्थ केवल नाचना ही है। कीर्तन का अर्थ है, जैसे भी संभव हो--ईश्वर का गुणगान। वैष्णवों का भावावेश में आकर नाचने लगना, और मस्त हो जाना--निस्संदेह अत्यंत मनोहारी है, पर उसमे एक खतरा भी है, जिससे अपने को बचाना चाहिए। वह खतरा है उसकी प्रतिक्रिया में। एक ओर तो भावनाएँ उच्चतम शिखर तक पहुँच जाती हैं, नयनों से अश्रुप्रवाह शुरू हो जाता है, और फिर शरीर मस्ती में झूमने लगता है, पर दूसरी ओर ज्यों ही संकीर्तन समाप्त होता है, भावनाओं की इन प्रबल लहरों का उतनी ही शीघ्रता से पतन होता है। समुद्र में लहरें जितनी ऊपर उठती हैं, उतनी ही नीचे गिरती हैं। उस अवस्था में प्रतिक्रिया का आघात सह लेना सरल नहीं है। जब तक सदसद् विवेक-बुद्धि का विकास नहीं हो जाता, साधारणतया व्यक्ति ऐसी अवस्था में वासना इत्यादि दुर्बलताओं का शिकार बन जाता है। अमेरिका में भी यही बात मेरे देखने में आयी। अनेक लोग गिरजाघर जाते हैं, भक्तिपूर्वक प्रार्थना करते हैं, तन्मय होकर गाते हैं, धर्मोपदेश सुनते-सुनते रोने भी लगते हैं, पर प्रार्थना समाप्त होने पर ज्यों ही गिरजा के बाहर आते हैं, इसकी प्रतिक्रिया आरंभ हो जाती है और वे इंद्रिय-सुखों के शिकार हो जाते हैं।

प्रश्न--महाराज, कृपा कर अब यह बताइये कि चैतन्य महाप्रभु के कौन से विचार योग्य समझकर हम ग्रहण करें, जिससे कि हमसे कोई भूल न हो?

स्वामी जी--ईश्वर की ज्ञान-मिश्रित भक्ति से आराधना करो। भक्ति के साथ विवेक का लोप न हो। इसके अतिरिक्त महाप्रभु से उनकी सहृदयता, प्राणि मात्र के लिए उनकी प्रेममय दया, ईश्वर के लिए उनका उत्कट प्रेम सीखो,और उनकी नि स्पृहता को अपने जीवन का लक्ष्य बनाओ।

अब प्रश्नकर्ता ने दोनों हाथ जोड़कर स्वामी जी से कहा--"महाराज, मुझे क्षमा करें। अब मैं समझ गया कि आपका कहना ठीक है। वैष्णवों के मधुर भाव की जब आप आरंभ में मजाक में टीका कर रहे थे, तब मुझे आपका यह दृष्टिकोण मालूम नहीं था, इसीलिए मैंने आपत्ति की थी।"

स्वामी जी--देखो, यदि टीका-टिप्पणी करनी है, तो ईश्वर और उसके प्यारों की टीका-टिप्पणी करना ही अच्छा है। यदि तुम मुझे अपशब्द कहते हो, तो मुझे भी शायद तुम पर क्रोध आ जाए और मैं तुम्हें अपशब्द कहूँ तो तुम भी प्रतिकार करोगे ही। नहीं क्या? पर ईश्वर या ईश्वरीय पुरुष कभी बुरे का बदला बुरे से नहीं लेते।

वे महाशय स्वामी जी को प्रणाम कर चले गए। मैंने यह पहले ही बता दिया है कि जब स्वामी जी कलकत्ता में आते थे, तो इस प्रकार की गोष्ठियाँ रोज ही हुआ करती थीं। प्रातःकाल से रात्रि के ८-९ बजे तक हर घड़ी दर्शकों तथा श्रोताओं का ताँता ही लगा रहता, इससे उनका भोजन कभी समय पर नहीं हो पाता। इसलिए कई लोगों ने स्वामी जी को सलाह दी कि वे आगंतुकों से निश्चित समय पर ही भेंट किया करें। किंतु स्वामी जी का हृदय तो प्रेम का सागर था, सदैव दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहता था, और लोगों में धर्म के लिए जिज्ञासा और पिपासा देखकर तो उनमें करुणा उमड़ पड़ती थी। इसलिए अस्वस्थ रहने पर भी उन्होंने ऐसी कोई सलाह नहीं मानी। उनका तो बस यही एक जवाब होता था--"वे अपने घरों से चलकर यहाँ तक आने में इतना कष्ट उठाते हैं तो क्या मैं सिर्फ अपना स्वास्थ्य बिगड़ जाने की थोड़ी सी आशंका से ही उनसे दो शब्द भी न बोलू? यह कैसे संभव है ?"

करीब चार बजे चर्चा समाप्त हुई। मंडली विसर्जित हो गई थी। केवल कुछ ही सज्जन बैठे रहे, जिनसे स्वामी जी इंग्लैंड और अमेरिका आदि के संबंध में बातचीत करते रहे थे। इसी वार्तालाप के मध्य उन्होंने कहा--"इंग्लैंड से लौटते समय मैंने एक अद्भुत स्वप्न देखा था। जब हमारा जहाज भूमध्यसागर में चल रहा था, स्वप्नावस्था में मैंने देखा कि ऋषितुल्य कोई वृद्ध व्यक्ति मेरे पास आकर खड़ा हो गया और बोला--तुम आओ, हमको पुनः प्रतिष्ठित कर दो। मैं थेरापुत्तस के प्राचीन पन्थ का अनुयायी हूँ, जो प्राचीन भारतीय ऋषियों की शिक्षाओं पर आधारित है। जिस सत्य और जिन आदर्शों का हमने प्रचार किया, ईसाई लोग उनका ईसा मसीह द्वारा प्रचलित किया जाना बताते हैं, पर सच तो यह है कि ईसा मसीह नाम का कोई व्यक्ति कभी जन्मा ही नहीं। इस बात को सिद्ध करने के लिए यदि यहाँ खोदाई की जाए, तो कई प्रमाण मिल सकेंगे।" मैंने पूछा--"कौन सी जगह खुदाई करने पर वे अवशेष और प्रमाण मिलेंगे?" उस श्वेतकेशी वृद्ध ने तुर्की के पास का एक स्थान बताकर कहा--'वहाँ'। इतने में ही मैं जाग गया और तत्काल भागकर डेक पर मैंने जहाज के कप्तान से पूछा कि जहाज इस समय कहाँ है ? जहाज के कप्तान ने हाथ से दिखाते हुए कहा--"देखो, वह तुर्किस्तान है और वह क्रीट द्वीप है।"

क्या यह एक स्वप्न मात्र ही था या उस स्वप्न में कोई सत्य छिपा था? कौन जानता है!

११

(श्री सुरेन्द्रनाथ दास गुप्त द्वारा आलिखित)

(सदैव मृत्यु का ध्यान रखो, हृदय में स्वयं ही नवजीवन प्रस्फुटित होने लगेगा--दूसरों के लिए काम करो--ईश्वर ही अंतिम सहारा है)

एक दिन, विभिन्न विद्यालयों के अपने कुछ मित्रों के साथ मैं स्वामी जी का दर्शन करने बेलूड़ मठ गया। हम उनके पास बैठ गए। कई विषयों पर चर्चा हो रही थी। उनसे कोई भी प्रश्न पूछे जाते ही, वे उसका संतोषप्रद उत्तर दे देते। तभी उन्होंने एकाएक हमारी ओर संकेत करते हुए कहा--"तुम सब पाश्चात्य तत्त्वज्ञान और दर्शनशास्त्र की विभिन्न शाखाओं का अध्ययन कर रहे हो और अनेक राष्ट्रों तथा देशों के संबंध में ज्ञान प्राप्त कर रहे हो; क्या तुम बता सकते हो कि जीवन का सबसे महान सत्य क्या है?"

हम सोचने लगे, पर नहीं समझ पाए कि स्वामी जी हमसे क्या उत्तर चाहते थे। जब कोई भी उत्तर नहीं दे पाया, तो स्वामी जी अपनी स्फूर्तिदायिनी वाणी में बोले:

"देखो, हम सबकी मृत्यु अवश्यंभावी है। यह सदैव याद रखो तो अंतरात्मा स्वयं ही जाग्रत हो जाएगी। तभी जीवन से क्षुद्रता का लोप हो सकेगा, काम में व्यावहारिकता आ पाएगी और जो भी तुम्हारे निकट आएंगे, उन्हें लगेगा कि तुमसे उन्हें कुछ प्रेरणा प्राप्त हुई है।"

फिर मुझमें और स्वामी जी में निम्नलिखित बातचीत हुई :

मैं--पर स्वामी जी, क्या मृत्यु के विचार मात्र से हृदय निराशा में नहीं डूब जाएगा और आत्मा निर्बल नहीं बन जाएगी?

स्वामी जी--ठीक है। आरंभ में तो यही होगा। हृदय भग्न हो जाएगा, और मन पर निराशा और दैन्य छा जाएगा। पर अपनी भावना में अटल रहो, कुछ दिन व्यतीत हो जाने दो और तब देखो। तब तुम्हें मालूम होगा कि हृदय में एक नूतन शक्ति का संचार हो रहा है, मृत्यु का निरंतर चिंतन तुम्हें एक नव जीवन प्रदान कर रहा है, और प्रतिक्षण तुम्हारे सामने संसार की नश्वरता और मिथ्यापन का चित्र उपस्थित कर, तुम्हें अधिकाधिक विचारशील बना रहा है। थोड़ी प्रतीक्षा करो, कुछ दिन, मास, वर्ष व्यतीत हो जाने दो और तुम देखोगे कि अंतरात्मा सुप्त केसरी के समान जागकर खड़ी हो रही है, अंतर की क्षुद्र शक्ति महान शक्ति में परिवर्तित हो रही है। सदैव मृत्यु का मनन करो, फिर तुम्हें मेरे एक एक शब्द की सत्यता विदित हो जाएगी। शब्दों में और अधिक मैं क्या कहूँ !

मेरा एक मित्र धीमी आवाज़ में स्वामी जी की प्रशंसा कर रहा था।

स्वामी जी--मेरी प्रशंसा मत करो। इस दुनिया में हमारी प्रशंसा और निंदा का कोई मूल्य नहीं है। ये तो केवल झूले के समान मनुष्य को झोंके दिलाती रहती हैं। मुझे काफी प्रशंसा मिली, कटु आलोचना की बौछार भी मैंने सही है, पर उनकी याद से क्या लाभ! हर एक व्यक्ति निरपेक्ष भाव से अपना कर्तव्य करता रहे। जब अंतिम घड़ी आयगी, तो निंदा और प्रशंसा मेरे लिए, तुम्हारे लिए, और सबके लिए समान हो जाएगी। हम सब यहाँ काम करने आए हैं, और जब पुकार होगी, तब सब कुछ छोड़कर चल देना होगा।

मैं--स्वामी जी, हम सब कितने नगण्य हैं !

स्वामी जी--सच ! तुमने बिल्कुल ठीक कहा! कोटि कोटि सौरमंडलों से युक्त इस ब्रह्माण्ड की कल्पना करो और सोचो कि कौन अनंत अज्ञेय शक्ति उन्हें परिचालित कर, उस 'अज्ञात एक' के चरणों का स्पर्श कराने खींचे ले जा रही है--और हम कितने क्षुद्र और नगण्य हैं ! तो फिर इस जीवन में दुष्ट और क्षुद्र संकल्पों से मन को दूषित करने का अवसर ही कहाँ है ? दलबंदी करने और परस्पर वैमनस्य बढ़ाने से हमें यहाँ क्या लाभ होनेवाला है ? मेरा कहना मानो--जब तुम विद्यालय से आओ, तो प्राणपण से दूसरों की सेवा में जुट जाओ। मुझ पर विश्वास करो, तब तुम्हें त्रिभुवन की संपत्ति प्राप्त कर लेने से भी अधिक आनंद होगा। जैसे-जैसे तुम सेवामार्ग में अग्रसर होते जाओगे, ज्ञान के मार्ग में भी तुम्हारी प्रगति होती जाएगी।

मैं--पर हम सव इतने अधिक ग़रीब हैं, स्वामी जी !

स्वामी जी--गरीबी के इन विचारों को छोड़ो। किस दृष्टि से तुम ग़रीब हो ? क्या तुम्हें इस बात का दुःख है कि सोने के लिए मुलायम गद्दे नहीं हैं और बुलाते ही हाजिर होनेवाले नौकर-चाकर नहीं हैं ? उससे क्या होता है ? तुम नहीं जानते, यदि तुम रात-दिन दूसरों की सेवा में अपना खून-पसीना एक कर दो तो जीवन में तुम्हारे लिए असंभव और असाध्य कुछ नहीं रहेगा। और फिर तुम देखोगे तुम्हारी आँखों के सामने जीवन की प्रकाशमान सरिता का दूसरा छोर अनंत असीम फैला है, मृत्यु का आवरण हट गया है, और तुम अमरों के अद्भुत रम्य देश के अधिकारी बन गए हो!

मैं--ओह, आपके समक्ष बैठकर, आपकी जीवनदायिनी वाणी सुनने में कितना आनंद है, स्वामी जी!

स्वामी जी--देखो, भारत का परिभ्रमण करते करते कई महात्माओं से मेरी भेंट हुई, कई ऐसे हृदय पाए जिनमें दया और प्रेम का सागर लहरें मार रहा है--उनके चरणों में बैठकर मुझे प्रतीत होता था कि मेरे हृदय में शक्ति की अनंत धारा प्रवाहित होने लगी है। आज जो थोड़े शब्द मैं तुम लोगों के सामने बोल रहा हूँ, वे उन महात्माओं के सान्निध्य से प्राप्त उस प्रबल धारा के किंचित् सीकर मात्र हैं। यह मत सोचो कि मुझमें स्वयं में कोई महत्ता है।

मैं--पर स्वामी जी, हम तो आपको इसी भाव से देखते हैं कि आपको भगवत्प्राप्ति हो गई है।

ये शब्द मेरे मुख से निकले ही थे कि उनके प्रकाशमान नेत्र अश्रुप्लावित हो गए (आज भी वह दृश्य मेरी आँखों के सामने घूम जाता है); उनके हृदय से प्रेम उमड़ा आ रहा था, और उन्होंने धीरे-धीरे कोमल मृदु वाणी में कहा--"उन पुण्य-चरणों में ही ज्ञानी के ज्ञान की पूर्णता समायी है ! उन्हीं पुनीत चरणों में प्रेमियों के प्यार की पूर्णता समायी है ! मुझे बताओ, उन श्री चरणों के सिवाय भवताप से दग्ध जीव और कहाँ शरण पायेंगे !"

कुछ क्षण बाद वे फिर बोले, "हन्त ! मनुष्य कितने मूर्ख हैं जो अपना जीवन कलह में बिता देते हैं। पर कब तक वे अज्ञानी बने रहेंगे? अनंत योनियों में भ्रमण करने के बाद जीवन-चक्र के संध्याकाल में माँ की गोद में सबको आना ही होगा!" [6]

१३

इतिहास का प्रतिशोध

(श्रीमती राइट द्वारा आलिखित)

(१८९३ के अगस्त मास के अंत में स्वामी विवेकानन्द एनिसववाम में प्रो० जे० एच० राइट के मकान पर ठहरे। न्यू इंग्लैंड के इस शांत ग्राम में स्वामी जी को देखकर वहाँ के निवासियों को इतना आश्चर्य हुआ कि तुरंत लोगों में इस बात की अटकलबाजी होने लगी कि आखिर यह भव्य और आकर्षक व्यक्ति है कौन ? यह कहाँ से आया? पहले वे इस निश्चय पर पहुँचे कि यह भारत का कोई ब्राह्मण होगा, किंतु उसका व्यवहार उनकी धारणाओं से पूर्णरूपेण मेल नहीं खाता था।)

यह ऐसी बात थी, जिसका समाधान आवश्यक था और वे एक मत होकर भोजन के पश्चात् इस विचित्र नवागंतुक के प्रवचन को सुनने के लिए उस कुटीर की ओर चले।

"अभी कल की बात है," उन्होंने अपनी संगीतमय ध्वनि में कहा, "ठीक, सिर्फ कल की-चार सौ वर्ष से अधिक पूर्व नहीं।" फिर उन्होंने एक धीर जाति और उत्पीड़ित राष्ट्र के ऊपर की गई निर्दयता और दमन की कहानियाँ सुनायीं, और भविष्य में आनेवाले निर्णय को!

"ओह, अंग्रेज," उन्होंने कहा, "केवल कुछ समय पूर्व वे बर्बर थे. . . स्त्रियों के शरीर पर कीड़े रेंगते थे. . .और अपने शरीर की घिनौनी दुर्गंध छिपाने के लिए वे सुगंध लगाती थीं. . . अत्यंत वीभत्स ! अब भी वे केवल उस बर्बरता से बाहर निकल भर रहे हैं।"

"अनर्गल !" उन क्षुब्ध श्रोताओं में से एक ने कहा, "यह तो कम से कम पाँच सौ वर्ष पहले की बात है।"

"और क्या मैंने नहीं कहा ज़रा देर पहले ? मनुष्य की आत्मा की प्राचीनता को दृष्टि में रखने पर इन कुछ सौ वर्षों की क्या गिनती है ?" तब स्वर में एक विनम्र और औचित्यपूर्ण परिवर्तन करते हुए उन्होंने कहा, "वे नितांत बर्बर हैं।" "भयानक शीत और उनके उत्तरी जलवायु जन्य अभावों और कष्टों ने उन्हें जंगली बना डाला है," उन्होंने कुछ अधिक भावना के साथ तेज़ी से कहा "वे केवल मार डालने की बात सोचते हैं-उनका धर्म कहाँ है? वे उस पवित्र पुरुष का नाम लेते हैं, वे अपने मनुष्य भाइयों से प्रेम करने का दावा करते हैं, वे सभ्य बनते हैं--ईसाई धर्म के द्वारा।--नहीं, यह तो उनकी भूख है, जिसने उन्हें सभ्य बनाया है। उनके ईश्वर ने नहीं। मानव-प्रेम तो केवल उनकी जिह्वा पर है, उनके हृदय में और कुछ नहीं, केवल बुराई और हर प्रकार की हिंसा ही हिंसा है। 'मेरे भाई, मैं तुमको प्यार करता हूँ, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ।'. . . और निरंतर वे उसका गला काटते रहते हैं। उनके हाथ खून से लाल हैं !". . .तब कुछ और धीरे बोलते हुए उनका मधुर कंठ गंभीर होता गया, और अंततः घंटा-निनाद के सदृश ध्वनित हो उठा, "किंतु उन्हें ईश्वर के दंड का भागी बनना पड़ेगा। 'प्रभु कहते हैं कि प्रतिशोध मेरा है, मैं उसे चुकाऊँगा' और विनाश आ रहा है। तुम्हारे ईसाई कितने हैं ? दुनिया के एक तिहाई भी नहीं। उन कोटि-कोटि चीनियों को देखो। वे ईश्वर का प्रतिशोध हैं, 'जो तुम्हारे ऊपर उद्दीप्त हो उठेगा। हूणों, का एक और आक्रमण होगा।' कुछ बुदबुदाते हुए उन्होंने कहा, "वे समस्त यूरोप को पदाक्रांत कर देंगे, वे एक भी ईट साबित नहीं छोड़ेंगे। पुरुष, स्त्रियाँ और बच्चे सभी चल बसेंगे और अंध युग फिर आएंगे।" उनके स्वर में वर्णनातीत वेदना और करुणा थी। तत्पश्चात् अचानक उदासीनतापूर्वक अपने युग-द्रष्टा को अलग करते हुए उन्होंने कहा, "मुझे--मुझे कोई चिंता नहीं है ! दुनिया इससे और अच्छी होकर निकलेगी, किंतु यह सब आ रहा है। ईश्वर का प्रतिशोध, वह शीघ्र आ रहा है।"

"शीघ्र?" उन सब लोगों ने पूछा।

"इसके होने में एक हजार वर्ष भी न लगेंगे"

लोगों ने निश्चिन्तता की साँस ली। यह सब अभी निकट नहीं लगा।

वे कहते गए, "ईश्वर प्रतिशोध अवश्य लेगा। तुम्हें यह बात धर्म और राजनीति में भले ही न दिखायी पड़े, किंतु इतिहास में अवश्य ही दृष्टिगत होगी और जैसा होता रहा है, वैसा ही होगा। यदि तुम लोगों को पीसोगे तो तुम्हें भी भुगतना पड़ेगा। भारत में हम लोग ईश्वर के प्रतिशोध को भोग रहे हैं। इन चीजों को देखो। उन लोगों ने अपने निजी लाभ के लिए गरीबों को पीसा, उन्होंने उनकी कातर ध्वनि नहीं सुनी, जब जनता रोटी के लिए पुकार रही थी, तब वे सोने और चाँदी के पात्रों में खाते थे और (इसके बाद ही) मुसलमानों ने वध और हत्या करते हुए आक्रमण किया : वध और हत्या करते हुए उन्हें पराभूत कर दिया। वर्षों तक भारत बार-बार पराजित होता रहा और उन सबके अंत में तथा सबसे बुरे, अंग्रेज आए। तुम भारत में देखो, हिंदुओं ने क्या छोड़ा? चारों ओर आश्चर्यजनक मंदिर। मुसलमानों ने क्या छोड़ा? भव्य भवन। अंग्रेजों ने क्या छोड़ा? शराब की टूटी बोतलों के टीलों के अतिरिक्त और कुछ नहीं। ईश्वर ने मेरे देशवासियों के ऊपर दया नहीं की, क्योंकि स्वयं उनमें दया नहीं थी। अपनी निष्ठुरता से उन्होंने जनता को नीचे गिराया और जब उन्हें उनकी आवश्यकता पड़ी, तब उस जनता में उनकी सहायता करने के निमित्त कुछ शेष ही नहीं रह गया था। मनुष्य को ईश्वर के प्रतिशोध में भले ही विश्वास न हो सके, किंतु, वह इतिहास के प्रतिशोध को कदापि अस्वीकार नहीं कर सकता। यही अंग्रेजों के ऊपर भी बीतेगा। वे हमारी गरदन पर सवार हैं, उन्होंने अपने सुख-भोगों के लिए हमारे रक्त की अंतिम बूंद भी चूस ली है। हमारी करोड़ों की संपत्ति अपहरण कर ले गए, जबकि गाँवों और प्रांतों में हमारी जनता भूखों मर रही थी। अब उनके ऊपर चीनियों के प्रतिशोध की बौछार होगी। यदि आज चीनी उठे और अंग्रेज़ों को समुद्र में डुबो दें, जिसके कि वे पात्र हैं, तो यह न्याय के अतिरिक्त और कुछ न होगा।"

इसके पश्चात् अपने कथन को समाप्त करके स्वामी जी चुप हो गए। धीमे स्वर में उनके संबंध में लोगों की बड़बड़ाहट शुरू हो गई। वे बाहर से उदासीन से सुनते रहे। कभी-कभी वे ऊपर छत की ओर दृष्टि-निक्षेप करते और धीरे धीरे 'शिव'! 'शिव' ! दुहराते थे। वह छोटा सा एकत्र समुदाय इस अद्भुत व्यक्ति के शांत धरातल से निकलकर प्रवाहित लावा के समान उद्गारों द्वारा प्रकम्पित और उद्वेलित होकर विचलित मन विदा हुआ।

वे कई दिन ठहरे (वस्तुतः केवल एक लंबे सप्ताहांत भर). . .सदैव उनके प्रवचन सजीव उदाहरणों और सुंदर कथाओं से परिपूर्ण रहते थे।. . .

उन्होंने एक व्यक्ति की सुंदर कहानी सुनायी, जिसकी पत्नी उसके कष्टों के लिए उसे ही दोषी ठहराया करती, दूसरों की सफलता को देखकर उसे कोसती, और उसकी समस्त असफलताओं का कारण उसे ही बताया करती थी। उसने अपने पति से कहा, "तुमने इतने वर्षों से ईश्वर की सेवा की है, उसके निमित्त तुम्हारे ईश्वर ने तुम्हारे लिए क्या यही किया है ?" तब उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, "क्या मैं धर्म का व्यापारी हूँ ? पर्वत को देखो। वह मेरे लिए क्या करता है और मैंने उसके लिए क्या किया है ? तो भी मुझे उससे प्रेम है, क्योंकि मेरी रचना ही सुंदरता से प्रेम करने के लिए हुई है। इसी प्रकार मैं ईश्वर से प्रेम करता हूँ।". . .एक दूसरी कहानी उन्होंने एक राजा की सुनायी, जिसने एक ऋषि को एक भेंट देने की इच्छा प्रकट की। ऋषि ने अस्वीकार कर दिया, किंतु राजा ने आग्रह किया और साथ चलने की प्रार्थना की। जब वे महल में आए, तो ऋषि ने राजा को (ईश्वर से) प्रार्थना करते हुए सुना। राजा ने ईश्वर से धन, शक्ति एवं दीर्घायु की याचना की। ऋषि ने आश्चर्य से सुना और अंत में अपना आसन उठाकर चल देने को तत्पर हुए। उसी समय राजा ने अपनी प्रार्थना समाप्त कर आँखें खोली और उन्हें देखा। उसने पूछा, "आप क्यों जा रहे हैं ? आपने अपनी भेंट के लिए नहीं कहा।" ऋषि ने कहा, "मैं एक भिखारी से याचना करूँ ?"

जब किसी ने उनसे कहा कि ईसाई धर्म एक उद्धारक शक्ति है, तब उन्होंने अपने बड़े बड़े श्यामल नेत्रों से उसकी ओर देखा और कहा, "यदि ईसाई धर्म उद्धारक शक्ति है, तो उसने अबीसीनियावासियों का उद्धार क्यों नहीं किया ?"

अक्सर उनके मुंह से ये शब्द निकलते, "वे इस संन्यासी के साथ यह करने का साहस नहीं कर पायेंगे।" कभी कभी वे अपनी यह महान आकांक्षा भी व्यक्त किया करते थे कि अंग्रेज सरकार उनको पकड़कर गोली मार भी दे, "यह उनके ताबूत की पहली कील होगी।" वे अपने शुभ्र दाँतों को किंचित् झलकाते हुए कहते, "और मेरी मृत्यु इस भूमि पर एक भीषण आग के समान फैल जाएगी।". . . .

उनकी आदर्श वीरांगना भारतीय विद्रोह की वह भयानक (?) रानी थी, जिसने स्वयं ही अपनी सेना का संचालन किया था। उन्होंने बताया कि बहुत से विद्रोही अपने को छिपाने के लिए साधु हो गए थे; और इसीलिए साधुओं के विचार बड़े खतरनाक होते थे। उन्हीं में से एक (विद्रोही) था, जो अपने चार पुत्रों को खोकर भी उनके संबंध में संयत होकर बात कर सकता था, किंतु जब कभी वह रानी का नाम लेता, तो रोने लगता। उसके मुख पर आँसुओं की धारा प्रवाहित हो जाती। वे कहते, "वह स्त्री देवी थी। जब हार गई, तो अपनी तलवार के घाट उतर गई और एक पुरुष की भाँति मरी।" भारतीय विद्रोह का कोई दूसरा पक्ष भी था, इस बात में जब आप कभी विश्वास ही न कर सकें, तो उसके इस दूसरे पक्ष की बात सुनना तथा यह आश्वस्त किया जाना कि संभवतः हिंदू एक स्त्री की हत्या न करेगा, बड़ा विचित्र लगता था।. . .

१४

धर्म, सभ्यता और चमत्कार

('दी अपील-आभालांस' में प्रकाशित)

'ला सै लेट अकादमी' [7] की बैठक में, जो कि मेमफ़िस प्रवास में उनका घर था, बैठे हुए उन्होंने कहा, "मैं संन्यासी हूँ, पुरोहित नहीं। अपने देश में मैं जगह-जगह घूमता हूँ, जिन गाँवों और शहरों से होकर निकलता हूँ, वहाँ के लोगों को उपदेश देता हूँ। अपने भरण-पोषण के लिए मैं उनके ऊपर निर्भर हैं, क्योंकि मुझे पैसा स्पर्श करने की आज्ञा नहीं है।"

एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा, "मैं बंगाल में उत्पन्न हुआ था और मैंने अपनी इच्छा से संन्यासी और ब्रह्मचारी का जीवन स्वीकार किया। मेरे जन्म पर मेरे पिता ने मेरी जन्म-पत्री बनवायी थी, किंतु उन्होंने मुझे कभी नहीं बताया कि उसमें क्या था। अपने पिता की मृत्यु के कुछ दिन बाद जब मैं अपने घर गया, मैंने अपनी माँ के पास रखे हुए कागजों में वह पत्री देखी। उससे मैंने जाना कि मेरे भाग्य में पृथ्वी पर विचरण करना लिखा था।"

वक्ता के स्वर में एक करुणा थी और श्रोता-समूह में से एक सहानुभूति की ध्वनि सुनायी पड़ी। विवेकानन्द अपने सिगार की राख झाड़ते हुए थोड़े काल के लिए चुप हो गए।

तभी किसी ने पूछा :

"यदि आपका धर्म, जो कुछ आप दावा करते हैं वैसा ही है, यदि वही सच्चा धर्म है, तो क्या कारण है कि आपके देशवासी जितने सभ्य हैं, उससे अधिक सभ्य नहीं हो सके ? उसने दुनिया के राष्ट्रों के बीच उनको ऊँचा क्यों नहीं उठा दिया?"

"क्योंकि वह किसी भी धर्म का क्षेत्र नहीं है," हिंदू ने गंभीरतापूर्वक उत्तर दिया। "मेरे देशवासी दुनिया में सबसे अधिक, या किसी भी जाति के समतुल्य, नैतिक हैं। वे अपने मानव-भाइयों के अधिकारों के प्रति, मूक पशुओं तक के प्रति, कहीं अधिक ध्यान देते हैं। परंतु वे भौतिकवादी नहीं हैं। किसी भी धर्म ने कभी किसी राष्ट्र या जाति के विचार या प्रेरणा को आगे नहीं बढ़ाया। वास्तव में इतिहास में कभी भी कोई ऐसी महान सफलता नहीं प्राप्त की गई, जिसको धर्म ने बाधा नहीं पहुँचायी हो। आपके स्तुत्य ईसाई धर्म ने भी अपने को इसका अपवाद नहीं सिद्ध किया। आपके डारविन, मिल, ह्यूम आदि को आपके धर्माधिकारियों का समर्थन नहीं प्राप्त था। तब इसके लिए मेरे धर्म की आलोचना क्यों?"

"मैं उस धर्म को एक कानी कौड़ी भी नहीं देना चाहँगा, जो मानव जाति के भौतिक जीवन और आध्यात्मिक दशा दोनों के उत्थान के लिए सचेष्ट न हो।" उस समूह के एक व्यक्ति ने कहा, "और इसी कारण मैं आपके वक्तव्यों की सत्यता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूँ। ईसाई धर्म ने कॉलेजों और अस्पतालों की स्थापना की और पतितों को उठाया है। उसने दलितों का उत्थान किया और अपने अनुयायियों को जीवन बसर करने में मदद की।"

"कुछ हद तक आप ठीक कहते हैं," संन्यासी ने शांत भाव से उत्तर दिया, "फिर भी इससे यह सिद्ध नहीं हो जाता कि ये सीधे आपके ईसाई धर्म के परिणाम हैं। पश्चिम में अनेक कारण विद्यमान रहे हैं, और ये सब उन्हीं के परिणाम हैं।"

"धर्म का प्रयोग मनुष्य के आध्यात्मिक पक्ष के विकास करने में होना चाहिए। विज्ञान, कला, दार्शनिक अनुसंधान सभी का जीवन में अलग-अलग कार्य हैं। किंतु यदि तुम इनका मिश्रण करना चाहो, तो तुम उनकी व्यक्तिगत विशेषताओं को नष्ट कर दोगे, जैसे अंतत: कुछ दिनों में तुम लोग धर्म से आध्यात्मिकता को बिल्कुल ही निकाल बाहर करोगे। तुम अमेरिकन लोग किसकी उपासना करते हो? डालर की। स्वर्ण के पीछे पागल होकर भागते हुए तुम अध्यात्म को भूल रहे हो और अंततः तुम भौतिकतापरायण बन गए हो। तुम्हारे उपदेशक और गिरजाघर भी इसी सर्वव्यापी लालसा से कलुषित हैं। अपनी जाति के इतिहास में एक भी ऐसा व्यक्ति बताओ, जिसने वैसा आध्यात्मिक जीवन बिताया हो, जैसा हमारे देश में लोगों ने बिताया और जिनके कि मैं नाम गिना सकता हूँ। ऐसे लोग कहाँ हैं, जो मृत्यु के आने पर कह सकते हों, ओ बंधु मृत्यु, मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ।' तुम्हारा धर्म तुम्हें फ़ेरिस-चक्रों और आइफ़ेल-मीनारों के निर्माण में मदद देता है, पर क्या वह तुम्हारे आंतरिक जीवन के विकास में भी तुम्हारी सहायता करता है ?"

संन्यासी गंभीरतापूर्वक बोल रहे थे और उनका मधुर तथा सुनियंत्रित स्वर उस कमरे में छाये हुए धुंधलेपन से छनकर आ रहा था : कुछ विषादपूर्ण और कुछ आरोपयुक्त। छः हजार वर्ष पुराने इतिहासवाले देश के इस नवागंतुक के द्वारा की गई उन्नीसवीं शताब्दी के अमेरिका की समालोचना में कुछ अलौकिकता सी थी।

"किंतु अध्यात्म की साधना में आप वर्तमान की माँगों के प्रति आखें बंद कर लेते हैं," किसी ने कहा। "आपका सिद्धांत मनुष्य को जीवित रहने में सहायता नहीं देता।"

"वह उन्हें मरने में सहायता देता है," उत्तर था।

"हम वर्तमान के प्रति विश्वस्त हैं।"

"आप किसी चीज़ के प्रति विश्वस्त नहीं हैं।"

"आदर्श धर्म का लक्ष्य व्यक्ति को जीवित रखने के साथ साथ उसे मरने के लिए सहायता प्रदान करना होना चाहिए।"

"ठीक ऐसा ही है," हिंदू ने शीघ्रता से कहा, "और ठीक इसी को प्राप्त करने का प्रयत्न हम कर रहे हैं। मेरा विश्वास है कि हिंदू धर्म ने भौतिक मूल्य चुकाकर अपने साधकों में अध्यात्म का विकास किया है, और मैं सोचता हूँ कि पश्चिमी दुनिया में सत्य इसके विपरीत है। मेरा विश्वास है कि पश्चिम के भौतिकवाद और पूर्व के अध्यात्मवाद के समन्वय से बहुत कुछ किया जा सकता है। यह हो सकता है कि इस प्रयत्न में हिंदू धर्म अपने वैशिष्ट्य को बहुत कुछ खो देगा।"

"जो कुछ आप करने की आशा करते हैं, क्या उससे भारत की समस्त सामाजिक व्यवस्था में क्रांति न करनी होगी?

"हाँ, शायद, फिर भी धर्म अक्षुण्ण बना रहेगा।"

अब बातचीत का रुख हिंदुओं की उपासना-विधि की ओर बदला, और विवेकानन्द ने इस विषय पर बहुत सी बातें बतलायीं। भारत में तथा अन्यत्र सभी जगह अज्ञेयवादी और नास्तिक हैं। ब्रह्म के अनुयायियों के जीवन में 'अनुभूति' एक आवश्यक वस्तु है। श्रद्धा आवश्यक नहीं है। थियोसाफ़ी एक ऐसा विषय है, जिसमें विवेकानन्द की गति नहीं है। वह अलग अध्ययन का विषय है। विवेकानन्द कभी मैडम ब्लावट्स्की से नहीं मिले, किंतु अमेरिकन थियोसाफ़िस्ट सोसायटी के कर्नल ऑलकट से उनकी भेंट हुई है। वे एनी बेसेंट से भी परिचित हैं। भारत के फकीरों, प्रसिद्ध मदारियों अथवा जादूगरों, जिनके प्रसिद्ध चमत्कार विश्व-विश्रुत हैं, की चर्चा करते हुए विवेकानन्द ने कुछ ऐसी घटनाएँ सुनायीं, जो उन्होंने स्वयं देखी थीं और जो विश्वास से परे थीं।

जब इस विषय पर प्रश्न पूछे गए, उन्होंने कहा, "पाँच मास पूर्व और इस देश के लिए भारत से प्रस्थान करने के ठीक एक मास पूर्व मुझे पच्चीस व्यक्तियों के दल के साथ देश के भीतर स्थित एक नगर में कुछ समय तक ठहरना पड़ा। वहाँ पर हमने इन भ्रमणशील जादूगरों में से एक के आश्चर्यजनक चमत्कारों के विषय में सुना और उसे अपने सामने बुलाया। उसने हमें बताया कि हम जिस किसी वस्तु की इच्छा करें, वह उसे उपस्थित कर देगा। हमने उसके कहने के अनुसार उसके वस्त्रों को उतारा, यहाँ तक कि वह बिल्कुल नग्न हो गया और उसे कमरे के एक कोने में बैठा दिया। मैंने अपने यात्रा के कंबल को उसके ऊपर डाल दिया और तब हमने उससे अपने वादे के अनुसार कार्य करने को कहा। उसने पूछा कि आप लोग क्या चाहते हैं ? मैंने कैलिफोर्निया के (?) अंगूरों का एक गुच्छा देने के लिए कहा और तुरंत उस व्यक्ति ने उन्हें कंबल के नीचे से बाहर निकाला। संतरे और दूसरे फल निकाले और अंत में गरम भात की बड़ी-बड़ी थालियाँ।"

अपनी वक्तृता जारी रखते हुए संन्यासी ने कहा, मेरा एक 'छठवीं इंद्रिय' और मानसिक विद्या (telepathy) में विश्वास है।" उन्होंने फकीरों के चमत्कारों की व्याख्या नहीं की, केवल यही कहा कि वे अत्यंत आश्चर्यजनक थे। मूर्तिपूजा के विषय में चर्चा हुई और संन्यासी ने बताया कि केवल प्रतीक के रूप में ही मूर्ति हमारे धर्म का अंग है।

"आप किसकी उपासना करते हैं ?" संन्यासी ने पूछा, "ईश्वर के संबंध में आपकी क्या धारणा है?"

"आत्मा", एक महिला ने धीरे से कहा।

"आत्मा क्या है ? तुम प्राटेस्टेण्ट लोग बाइबिल के शब्दों की अथवा उनके परे किसी और चीज की उपासना करते हो? हम लोग प्रतिमा द्वारा ईश्वर की उपासना करते हैं।"

"अर्थात, आप विषय को वस्तु द्वारा प्राप्त करते हैं," नवागंतुक की बातों को ध्यान से सुननेवाले एक सज्जन ने कहा।

"हाँ, ठीक यही", संन्यासी ने आभारपूर्वक कहा।

विवेकानन्द उसी स्वर में आगे बात करते रहे और हिंदू के भाषण का समय समीप होने के कारण इस' गोष्ठी का अंत हुआ।

१५

धार्मिक समन्वय

('डिट्राएट, फ्री प्रेस', फरवरी १४, १८९४ ई० में प्रकाशित)

स्वामी जी का शरीर मँझले कद का है। वे अपनी जाति के लोगों में सामान्य रूप से पाए जानेवाले श्याम वर्ण के हैं। वे व्यवहार में मृदु, क्रियाओं में सजग और प्रत्येक शब्द, क्रिया और भंगिमा में अतीव शिष्ट हैं। किंतु उनके व्यक्तित्व का सर्वाधिक प्रभावशाली अंग उनकी आँखें हैं, जिनमें महान तेज है। स्वभावतः वार्तालाप धर्म के विषय पर चलता रहा। तब स्वामी जी ने अन्य अनेक उल्लेखनीय बातों के मध्य कहा :

"मैं धर्म और संप्रदाय में अंतर मानता हूँ। धर्म समस्त प्रचलित संप्रदायों को यह मानकर स्वीकार करता है कि वे एक ही लक्ष्य की प्राप्ति के निमित्त एक ही प्रकार के प्रयास हैं। संप्रदाय कुछ विरोधी और संघर्षात्मक होता है। भिन्न भिन्न संप्रदाय इसलिए हैं, क्योंकि भिन्न-भिन्न जातियाँ हैं और संप्रदाय अपने को समाज-विशेष के अनुकूल बनाकर, जनता जो चाहती है, उसे वह प्रदान करता है। चूंकि दुनिया बौद्धिक, आध्यात्मिक एवं भौतिक दृष्टि से अनंत प्रकार से भिन्न प्रकृतिवाले मनुष्यों से बनी हुई है, इसलिए ये लोग महान और मंगलमय नैतिक विधान के अस्तित्व में उस प्रकार का विश्वास ग्रहण करते हैं, जो उनके लिए सबसे अधिक उपयुक्त होता है। धर्म इन विश्वासों (संप्रदायों) को मान्यता प्रदान करता है और इनमें एक दिव्य तत्त्व निहित होने के कारण इनके विविध रूपों से उसे प्रसन्नता होती है। विभिन्न मार्गों द्वारा एक ही लक्ष्य पर पहुँचा जाता है, किंतु संभव है, मेरा मार्ग मेरे पश्चिमी पड़ोसी की प्रकृति के अनुकूल न हो और उसी प्रकार, हो सकता है कि उसका मार्ग मेरी प्रकृति और दार्शनिक चिंतन पद्धति के अनुरूप न हो। मेरा धर्म हिंदू धर्म है; वह बौद्धों का विश्वास नहीं है, जो हिंदू धर्म के अंतर्गत एक संप्रदाय है। हम कभी धर्म-प्रचार कार्य नहीं अपनाते। हम अपने धर्म के सिद्धांत दूसरों के ऊपर लादने की चेष्टा नहीं करते। हमारे धर्म के आधारभूत सिद्धांत इसका वर्जन करते हैं। न हम उन प्रचारकों के विरुद्ध कुछ कहते हैं, तुम जिन्हें इस देश से कहीं भेजते हो। हम सब विश्व के अंतरतम में उनके प्रवेश करने का स्वागत करते हैं। बहुत से लोग हमारे पास आते हैं, किंतु हम उनके (पाने के लिए संघर्ष नहीं करते हैं। दूसरों की विचारधारा का अपनी जैसी बनाने की चेष्टा में तत्पर रहनेवाले धर्मप्रचारक हमारे पास नहीं हैं। बिना हमारे किसी प्रयत्न के हिंदू धर्म के अनेक रूप दूर-दूर तक फैल रहे हैं और इन अभिव्यक्तियों ने 'ईसाई-विज्ञान', थियोसाफ़ी और एडविन अर्नाल्ड के 'लाइट आफ एशिया' ('एशिया का प्रकाश') का रूप लिया है। हमारा धर्म अधिकांश धर्मों से पुराना है और ईसाई मत--मैं इसे इसकी संघर्षात्मक विशेषताओं के कारण धर्म नहीं कहता--यह सीधे हिंदू धर्म से प्रादुर्भूत हुआ है। यह उसकी शाखाओं में से एक बड़ी शाखा है। कैथोलिक मत अपने सभी रूप हमसे प्राप्त करता है, पाप स्वीकार-पीठिका, संतों में विश्वास आदि। एक कैथोलिक पादरी को, जिसने इस पूर्ण साम्य को देखा था और कैथोलिक मत के स्रोत का तथ्य स्वीकार किया था, पदच्युत कर दिया गया था। क्योंकि उसने जो कुछ निरूपित किया था और जिसके ऊपर उसे पूर्ण विश्वास था, उसका विवेचन करते हुए एक ग्रंथ प्रकाशित कराने का दुस्साहस किया था।

"आप अपने धर्म में अज्ञेयवादी को स्थान देते हैं ?" प्रश्न किया गया।

"जी हाँ, दार्शनिक अज्ञेयवादी को और जिन्हें आप नास्तिक कहते हैं, उन्हें भी। जब बुद्ध से, जिन्हें हम संत मानते हैं, उनके किसी अनुयायी ने पूछा, 'क्या ईश्वर है ?' उन्होंने उत्तर दिया : ईश्वर। मैंने ईश्वर की बात कब कही है ? मैं कहता हूँ, 'भले बनो और भलाई करो।' हम लोगों में से बहुत से लोग दार्शनिक अज्ञेयवादी हैं, जो प्रकृति की प्रत्येक वस्तु में अंतर्निहित महान नैतिक नियम तथा अंतिम पूर्णता में विश्वास करते हैं। सभी मनुष्यों द्वारा स्वीकृत सभी मत महान भविष्य में अंतर्निहित आत्मा की अनंतता को अनुभव करने के लिए मानवता के प्रयत्न मात्र हैं।"

"क्या प्रचार-कार्य का अवलंबन लेना आपके धर्म की मर्यादा के विरुद्ध है ?"

इसके उत्तर के लिए पूर्व के इस पर्यटक ने एक छोटी सी पुस्तक खोली और अन्यान्य प्रसिद्ध राजाज्ञाओं में से एक राजाज्ञा का हवाला दिया। उन्होंने कहा, "यह ईसा के दो सौ वर्ष पूर्व लिखी गई थी। मेरे पास उस प्रश्न का यह सबसे अच्छा उत्तर है।"

उन्होंने अत्यंत स्पष्ट एवं सुंदर स्वर में उसे पढ़ा : 'देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी महाराज सभी संप्रदायों का आदर करते हैं, संन्यासियों और गृहस्थों दोनों का। वे भोजन और दूसरे उपहार देकर उन्हें तुष्ट करते हैं। किंतु वे मूलभूत नैतिक गुणों के उत्थान की अपेक्षा उपहारों और सम्मानों को कम महत्त्व देते हैं। यह सत्य है कि विभिन्न संप्रदायों में मौलिक गुणों का अस्तित्त्व भिन्न भिन्न रूपों में है, किंतु उनमें एक सामान्य आधार विद्यमान है, जैसे शील तथा वाणी में संयम तथा नैतिकता। इस प्रकार किसीको अपने संप्रदाय की प्रशंसा और दूसरे की निंदा न करनी चाहिए, वरन् प्रत्येक अवसर पर उन्हें यथायोग्य सम्मान प्रदान करना चाहिए। ऐसा करने से दूसरों की सेवा करता हुआ वह अपने ही संप्रदाय की भलाई करता है। इसके विपरीत करने से वह अपने संप्रदाय की सेवा नहीं करता और दूसरों का अपकार करता है। जो मनुष्य अपने संप्रदाय के प्रति मोह के कारण, उसके उत्थान के उद्देश्य से प्रेरित होकर दूसरों की निंदा करता है, वह बस अपने ही संप्रदाय पर कुठाराघात करता है। इसलिए केवल मैत्री ही प्रशंसनीय है, ताकि सभी लोग एक दूसरे के विश्वासों के प्रति सहिष्णु हों और सहिष्णु होना पसंद करें। इसी उद्देश्य के निमित्त यह राजाज्ञा लिखी गई है। सभी लोगों को, चाहे वे जिस दशा में हों, प्रत्येक को मूलभूत नैतिक सिद्धांतों के उत्थान के लिए और सभी दूसरे संप्रदायों के प्रति पारस्परिक आदर-भाव रखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इसी उद्देश्य के लिए धर्म-मंत्रियों, निरीक्षकों और अन्य सभी अधिकारियों को कार्य करना चाहिए।"

इस प्रभावशाली उद्धरण को पढ़कर स्वामी विवेकानन्द ने कहा कि उसी बुद्धिमान राजा ने, जिसने यह राजाज्ञा खुदवायी थी, युद्ध करने से मना किया था, क्योंकि इसकी विभीषिकाएँ सभी महान सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों के प्रतिकूल होती हैं। उन्होंने कहा, "इसी कारण भारत ने भौतिक पक्ष में हानि उठायी है। जहाँ पाशविक शक्ति और रक्तपात ने दूसरे राष्ट्रों को आगे बढ़ाया है, भारत ने इस प्रकार के पाशविक प्रदर्शन का प्रत्याख्यान किया है और योग्यतम की विजय के नियम के अनुसार, जो राष्ट्रों और व्यक्तियों दोनों के लिए लागू होता है, वह भौतिक अर्थ में दुनिया की एक शक्ति के रूप में बहुत पीछे रह गया है।"

"किंतु शांतिप्रिय भारत में व्याप्त इस भावना को क्या महान युद्ध-प्रिय पश्चिमी देशों मंन पाना असंभव न होगा; जहाँ उन्नीसवीं शताब्दी की अति व्यावहारिक आवश्यकताओं के विकास के लिए इतनी अधिक शक्ति की आवश्यकता है ?"

वे तेजस्वी आँखें चमक उठी और उस पूर्वीय बंधु के मुख पर एक हास की रेखा दौड़ गई।

"क्या कोई अपने में सिंह की शक्ति और मेमने के भोलेपन का समन्वय नहीं कर सकता?" उन्होंने पूछा।

इसी क्रम में उन्होंने कहा कि संभवतः भविष्य में पूर्व और पश्चिम का समन्वय होने को है, एक ऐसा समन्वय जिसके परिणाम अद्भुत होंगे। पश्चिमी राष्ट्रों की प्रकृति को प्रशंसा का पात्र बनानेवाला उनका एक गुण है, और वह है स्त्रियों के प्रति अत्यंत आदरभाव तथा उनके साथ सहृदयतापूर्ण व्यवहार।

महाप्रयाण के समय बुद्ध के द्वारा कथित शब्दों में उन्होंने कहा, "अपने निर्वाण के लिए स्वयं साधना करो। मैं तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता। तुम्हारी सहायता कोई नहीं कर सकता। अपनी सहायता अपने आप करो।" सौमनस्य और शांति हो, कलह न हो, यही उनका आदर्श-वाक्य है।

विभिन्न मतवादों की दोषान्वेषण की प्रवृत्ति के संबंध में उन्होंने हाल में जो कहानी कही वह निम्नलिखित है:

"एक कुएँ में एक मेढक रहता था। वह वहाँ बहुत दिनों से रहता था। वहीं पैदा हुआ और वहीं बड़ा हुआ। फिर भी एक छोटा, नन्हा सा मेढक था। निस्संदेह वहाँ पर विकासवादी नहीं थे, जो हमें बताते कि मेढक की आँखें थीं या नहीं थीं। किंतु अपनी कहानी के लिए हम लोग यह मान लेंगे कि उसकी आँखें थीं और वह प्रत्येक दिन इस गति से जल में रहनेवाले सभी कीड़ों तथा कीटाणुओं से उसे साफ़ करता था, जो आधुनिक जीवाणुविज्ञान शास्त्री के लिए गौरव की बात होगी। इस प्रकार रहते हुए वह कुछ चिकना और मोटा हो गया--शायद इतना जैसा मैं। अच्छा, एक दिन एक अन्य मेढक जो समुद्र में रहता था आया और कुएँ में गिर पड़ा।

"तुम कहाँ से आए हो?"

"समुद्र से।"

"समुद्र ? वह कितना बड़ा है ? क्या वह मेरे कुएँ के बराबर है ?" और उसने कुएँ के एक किनारे से दूसरे किनारे तक छलाँग मारी।

"मेरे मित्र, समुद्र के मेढक ने कहा, 'तुम अपने छोटे से कुएँ से समुद्र की तुलना कैसे करते हो?'

"तब मेढक ने दूसरी छलाँग मारी और पूछा, 'क्या तुम्हारा समुद्र इतना बड़ा है?'

" 'समुद्र से अपने कुएँ की तुलना करके तुम कैसी मूर्खता की बात कर रहे हो।'

"कुएँ के मेढक ने कहा, 'अच्छा, तब मेरे कुएँ से बड़ी कोई चीज नहीं हो सकती। यह झूठा है, इसे बाहर निकालो।'

"यही कठिनाई सदा से चली आ रही है।

"मैं हिंदू हूँ। मैं अपने छोटे से कुएँ में बैठा हूँ और सोचता हूँ कि मेरा कुआँ ही दुनिया है। ईसाई अपने छोटे से कुएँ में बैठा है और वह कुआँ उसकी दुनिया है। मुसलमान अपने कुएँ में बैठा है और उसीको संपूर्ण दुनिया समझता है। मैं तुम अमेरिकनों को धन्यवाद देता हूँ कि तुम हमारी इस अपनी छोटी दुनिया की दीवारों को तोड़ने का प्रयत्न कर रहे हो और आशा करता हूँ कि भविष्य में प्रभु तुमको इस उद्देश्य की पूर्ति में सहायता प्रदान करेंगे।"

१६

पतिता नारियाँ

('डिट्राएट ट्रिब्यून', मार्च १७, १८९४ ई० में प्रकाशित)

"लालुन विश्व के सबसे प्राचीन पेशे की सदस्या है। लिलिथ उसकी प्रपितामही थी और यह ईव के पहले की बात है, जो प्रत्येक को विदित है। पश्चिम में लोग लालुन के पेशे के संबंध में बहुत सी कठोर बातें कहते हैं, भाषण लिखते हैं और नयी उम्र के लोगों में अपने भाषण बाँटते हैं, जिससे कि नैतिकता की रक्षा हो सके। पूर्व में जहाँ यह पेशा मातृक है, माँ से पुत्री को मिलनेवाला, वहाँ न तो कोई भाषण लिखता है और न ध्यान देता है।"--रुडयर्ड किपलिंग

इस वाक्य के पूर्व जो वाक्य दिए गए हैं, वे उस कहानी के अनुच्छेद हैं, जो भारत में लिखी गई थी। वे रुडयर्ड किपलिंग द्वारा लिखे गए थे तथा भारत के संबंध में जो कुछ भी हमें निश्चित रूप से मालूम होता है, वह उन्हीं के माध्यम से। उसमें से अपवादस्वरूप केवल ये बातें हैं कि भारत में हमारे किसानों के साथ प्रतियोगिता करने योग्य गेहूँ उत्पन्न किया जाता है, वहाँ लोग दो सेंट प्रतिदिन की मजदूरी पर काम करते हैं और वहाँ स्त्रियाँ अपने बच्चों को अपने देश की पवित्र नदी गंगा में फेंक देती हैं।

किंतु जब से विवेकानन्द इस देश में आए, उन्होंने भारतीय स्त्रियों के अपने बच्चों को घड़ियाल के मुंह में डाल देने की कहानियों का भंडाफोड़ किया है। वे कहते हैं कि अमेरिका आने के पूर्व उन्होंने रुडयर्ड किपलिंग के बारे में कभी नहीं सुना था और भारत में लालुन जैसे पेशे की बात करना उचित नहीं समझा जाता, जिससे कि किपलिंग ने अपनी एक सबसे अधिक मनोरंजक और शिक्षाप्रद कहानी गढ़ी है।

कल विवेकानन्द ने कहा था, "भारत में हम इन बातों पर विचार नहीं करते। उन अभागिन नारियों के संबंध में कोई बात भी नहीं करता। भारत में जब कोई स्त्री दुराचारिणी पायी जाती है, तो उसे जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता है। उसके बाद कोई उसका स्पर्श या उससे वार्तालाप नहीं कर सकता। यदि वह घर के भीतर जाती है, तो उस स्थान की दरियों और दीवारों को धोया जाता है। कोई उससे संबंध नहीं रखता। भारतीय समाज में कोई ऐसी स्त्री नहीं है, जो सदाचारिणी न हो। वहाँ इस देश जैसी बात बिल्कुल नहीं है। यहाँ आपके समाज में अच्छी और बुरी स्त्रियाँ साथ साथ रहती हैं। परंतु भारत में एक बार स्त्री गिरती है, तो वह सदा के लिए बहिष्कृत हो जाती है, वह और उसके बच्चे, पुत्र और पुत्रियाँ। मैं मानता हूँ कि यह भयावह स्थिति है, किंतु इससे समाज शुद्ध रहता है।"

"पुरुषों के संबंध में क्या होता है", प्रश्न किया गया। "क्या वही नियम उनके संबंध में लागू होता है ? क्या दुराचारी सिद्ध होने पर पुरुष भी बहिष्कृत होता है ?"

"जी नहीं, उनकी बात बिल्कुल भिन्न है। शायद उनके लिए भी यही बात होती यदि वे पकड़े जा सकते। किंतु पुरुष बाहर निकलते हैं। वे एक स्थान से दूसरे स्थान को जा सकते हैं। उनके रहस्य को जानना संभव नहीं है। स्त्रियाँ घर के भीतर रहती हैं। यदि उनसे कोई चूक होती है, तो वह निश्चित रूप से प्रकट हो जाती है। जब उनकी बात मालूम होती है, तब वे अलग कर दी जाती हैं। कोई चीज उन्हें बचा नहीं सकती। कभी कभी ऐसा कठिन अवसर आता है, जबकि पिता को अपनी पुत्री अथवा पति को पत्नी को छोड़ देना पड़ता है। किंतु यदि वे उनको नहीं छोड़ते, तो उनके साथ उन्हें भी बहिष्कृत होना पड़ेगा। इस देश में बिल्कुल दूसरी ही बात है। वहाँ स्त्रियाँ इस प्रकार बाहर निकलकर संपर्क नहीं स्थापित करतीं, जिस प्रकार यहाँ वे करती हैं। यह भयावह अवश्य है, किंतु यह समाज को शुद्ध करता है।

"मैं सोचता हूँ कि व्यभिचार आपके देश का एक बड़ा पाप है। ऐसा होना अवश्यम्भावी है, क्योंकि यहाँ इतनी अधिक विलासिता है। एक गरीब लड़की एक नयी टोपी के लिए अपने को बेच सकती है। जहाँ इतनी अधिक विलासिता है, वहाँ ऐसा ही होगा।"

मिस्टर किपलिंग 'लालुन' और उसके पेशे के संबंध में कहते हैं :

"लालुन का असली पति, क्योंकि पूर्व में लालुन के पेशेवाली स्त्रियों के भी पति होते हैं, एक बड़ा 'जज्यूब' वृक्ष था। उसकी माँ ने, जिसने एक अंजीर से विवाह किया था, लालुन के विवाह में दस हजार रुपये खर्च किए, पाँच हजार रुपये गरीबों को दान के रूप में वितरित किए ; और उसे माँ के संप्रदाय के सैतालीस पुरोहितों ने आशीर्वाद दिया। यह देश की एक प्रथा थी।"

भारत में जब कोई स्त्री अपने पति के प्रति विश्वासघात करती है, तब वह अपनी जाति खो देती है, पर अपने नागरिक और धार्मिक अधिकार नहीं खोती। वह संपत्ति की स्वामिनी हो सकती है और मंदिरों के द्वार उसके लिए तब भी खुले रहते हैं।

विवेकानन्द ने कहा, "हाँ, एक पतिता स्त्री का विवाह नहीं होता। वह उन लोगों के अतिरिक्त, जो उसी की तरह बहिष्कृत हैं और किसी से विवाह नहीं कर सकती। इसलिए वह वृक्ष और कभी कभी तलवार को वरण करती है। कभी-कभी ये स्त्रियाँ बड़ी धनी और दानशीला बन जाती हैं, किंतु वे अपनी जाति को फिर नहीं पा सकतीं। भीतर के नगरों में जहाँ लोग अब भी प्राचीन परम्पराओं का पालन करते हैं, वह बग्धी पर बैठकर नहीं जा सकती, चाहे वह कितनी ही धनी क्यों न हो। अधिक से अधिक उसे बैलगाड़ी में बैठने दिया जा सकता है। भारत में उसे अपनी एक निजी पोशाक पहननी पड़ती है, जिससे कि उसे पहचाना जा सके। लोग इन्हें बाहर निकलते देखते हैं, परंतु कोई इनसे बोलता नहीं। इन स्त्रियों में अधिकांश नगरों में हैं। इनमें से बहुत यहूदी भी हैं, किंतु उन्हें शहर के भिन्न भाग में रहना पड़ता है। वे सब अलग रहती हैं। यह एक विशेष बात है कि जैसी भी पतिता वे हैं और जितनी भी दुष्टा उनमें से कुछ हैं, वे किसी भी ईसाई को प्रेमी स्वीकार नहीं कर सकतीं। वे न तो उसका स्पर्श करेंगी, न उसके साथ भोजन करेंगी क्योंकि वे उन्हें 'सर्वभक्षी क्रूर' कहती हैं। वे उन्हें ऐसा इसलिए कहती हैं, क्योंकि वे सब कुछ खाते हैं। क्या आप जानते हैं कि भारत की वह बीमारी, वह अकथनीय बीमारी क्या है ? उसे 'बदफरिंगम' कहते हैं, जिसका अर्थ है 'ईसाई बीमारी'। यह ईसाइयों के ही द्वारा भारत में लायी गई।"

"क्या भारत में इस प्रश्न को हल करने के लिए कोई प्रयत्न किया गया है ? क्या यह अमेरिका की भाँति ही एक सर्वसाधारण की समस्या है ?"

"नहीं, भारत में बहुत कम कार्य किया गया है। स्त्री धर्म-प्रचारकों के लिए एक बहुत बड़ा क्षेत्र है, यदि वे भारत की वेश्याओं को परिवर्तित कर सकें। लोग भारत में कुछ नहीं कर रहे हैं--बहुत कम। एक वैष्णव-संप्रदाय है, जो इन स्त्रियों के पुनरुद्धार की चेष्टा करता है। यह एक धार्मिक संप्रदाय है। मैं सोचता हूँ कि समस्त वेश्याओं में से ९० प्रतिशत (?) इस संप्रदाय की हैं। यह संप्रदाय जाति में विश्वास नहीं करता। वे प्रत्येक जगह बिना जाति के विचार के जाते हैं। कुछ मंदिर हैं, जैसे कि जगन्नाथ का मंदिर, जहाँ जाति-पांति नहीं है। जो कोई उस शहर में जाता है, वहाँ रहते हुए वह अपनी जाति अलग रख देता है, क्योंकि वह पवित्र भूमि है और वहाँ प्रत्येक वस्तु पवित्र मानी जाती है। वह जब वहाँ से बाहर जाता है, तब उसे पुनः धारण कर लेता है, क्योंकि जाति केवल लोकाचार है। तुम समझ लो कि कुछ जातियाँ इतनी विशिष्टता रखती हैं कि वे अपने द्वारा पकाये हुए भोजन के अतिरिक्त और कुछ न खाएंगी। वे अपनी जातिवालों के अतिरिक्त किसीको स्पर्श न करेंगी। किंतु शहरों में सब लोग साथ रहते हैं। भारत में यही एक संप्रदाय है, जो धर्म-दीक्षा देता है। वह प्रत्येक को अपने संप्रदाय का सदस्य बना लेता है। वे हिमालय में जाकर वहाँ के जंगली लोगों को धर्म-दीक्षित करते हैं। शायद तुम्हें नहीं मालूम कि भारत में जंगली लोग बसते हैं। हाँ, हैं। वे हिमालय की तराई में रहते हैं।"

"क्या कोई ऐसा संस्कार होता है, जिसके द्वारा स्त्री को भ्रष्टा घोषित किया जाता है ? कोई सामाजिक प्रक्रिया?" विवेकानन्द से पूछा गया।

"नहीं, यह कोई सामाजिक प्रक्रिया नहीं है। यह केवल प्रथा है। कभी कोई औपचारिक संस्कार होता है और कभी नहीं भी। वे उन्हें केवल जातिच्युत वर्ग का बना देते हैं। जब किसी स्त्री के ऊपर संदेह किया जाता है, तो लोग एकत्र होते हैं और उसके मामले पर विचार करते हैं। यदि यह निर्णय किया जाता है कि वह अपराधिनी है, तो जाति के सभी सदस्यों को सूचना भेज दी जाती है और वह बहिष्कृत कर दी जाती है।

उन्होंने कहा, "याद रखिए, मेरे कहने का यह आशय नहीं है कि यह समस्या का कोई हल है। प्रथा अत्यंत कठोर है। लेकिन आपके पास समस्या का कोई हल भी नहीं है। यह भयावह बात है। यह पश्चिमी दुनिया की एक बड़ी भारी बुराई है।"



[1] भारत के तत्कालीन वाइसराय लार्ड कर्जन ने विश्वविद्यालयी शिक्षा के स्तर को उच्च करने के उद्देश्य से उसे इतना महंगा बना देना चाहा था कि वह मध्यम वर्ग के लड़कों को पहुँच के लगभग बाहर हो जाती।

[2] श्री रामकृष्ण देव के गृही शिष्य तथा सुप्रसिद्ध बंगीय नाट्यकार श्री गिरिशचंद्र घोष

[3] कलकत्ते के एक लब्धप्रतिष्ठ बैरिस्टर, पत्रकार और शिक्षाशास्त्री।

[4] ओ माँ कुल-कुंडलिनी, जागो! तुम नित्यानन्द-स्वरूपिणी हो, ब्रह्मा नन्द-स्वरूपिणी हो; ऐ मूलाधार-पन में बसनेवाली माँ, तुम सर्प के समान सोयो हुई हो। त्रितापरूपी अग्नि से, ओ माँ, मेरा तन-मन जला जा रहा है। ऐस्वयंभू शिव की सहचरी शिवे, मूलाधार को छोड़, स्वाधिष्ठान में उदित होकर सुषुम्ना के पथ से ऊपर उठो। फिर माँ, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा चक्रों में से होते हुए मस्तक में सहस्रार में पहुँचकर परमशिव के साथ युक्त हो जाओ और हे. सच्चिदानन्ददायिनी, वहाँ पर आनन्द के साथ क्रीड़ा करो!

[5] श्री महेन्द्रनाथ गुप्त (श्री 'म'); श्री रामकृष्ण देव के गृही शिष्य तथा 'श्री रामकृष्ण-वचनामृत' के रचयिता।

[6] यहाँ तक 'वार्ता एवं संलाप', रामकृष्ण मठ एवं मिशन के (बंगाली) मुखपत्र 'उदबोधन में शिष्यों द्वारा लिखित सामग्री से अनूदित है। स०

[7] जनवरी २१, १८९४ ई०


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हिंदी समय में स्वामी विवेकानंद की रचनाएँ