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निबंध

हर घर तिरंगा : राष्ट्रीयता का महाघोष

राहुल मिश्र


हम अपनी स्वाधीनता के पचहत्तर वर्ष की यात्रा पूरी करके अमृत महोत्सव मना रहे हैं। वर्ष 2022 में स्वाधीनता की 75वीं वर्षगाँठ मनाने की तैयारी पूरे देश भर में बड़े उत्साह के साथ की गई है। वर्ष-भर के आयोजनों की लंबी शृंखला है, जो क्रमशः चल रही है। इस कड़ी का एक बड़ा भाग देश की स्वाधीनता के लिए सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले क्रांतिकारियों, सेनानियों, महान विभूतियों और साथ ही उन प्रतीकों का स्मरण करने के लिए समर्पित है, जिनके प्रयासों से आज हम अपने भारतदेश की स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के साक्षी बन रहे हैं। ऐसे प्रतीकों में हमारा राष्ट्रीय ध्वज सर्वोपरि है। देश के स्वाधीनता आंदोलन में अनेक क्रांतिकारियों के मन में देशभक्ति के भावों को भरने वाला राष्ट्रीय ध्वज अमृत महोत्सव के पुनीत पर्व में विशेष स्थान रखता है। हमारी वैश्विक पहचान आज हमारे इस ध्वज से ही है। इन्हीं भावों को केंद्र में रखकर भारत के अमृत महोत्सव के पर्व में 'हर घर तिरंगा' अभियान की संकल्पना की गई है।

भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 02 अगस्त से 'हर घर तिरंगा' अभियान के लिए समस्त देशवासियों का आह्वान किया गया। इस अभियान के प्रारंभ होने के पहले से ही जनसमुदाय में उत्साह और उल्लास की अपरिमित मात्रा को हम अगस्त के महीने की शुरुआत से ही देख रहे हैं। 02 अगस्त, 2022 को 'हर घर तिरंगा' अभियान की औपचारिक घोषणा के साथ ही देश के विभिन्न स्थानों में; चाहे वे सरकारी कार्यालय हों, या निजी कंपनियों के कार्यालय, या फिर लोगों के घर ही क्यों न हों... हर जगह तिरंगा पूरे जोश के साथ लहराता दिखाई देने लगा। 'हर घर तिरंगा' अभियान केवल एक अभियान-मात्र नहीं, वरन् आमजन की भावनाओं का, देशभक्ति का प्रकटीकरण कहा जा सकता है।

अतीत की गहराई में उतरकर देखें, तो देशभक्ति के भावों को भरने वाले तिरंगे से जुड़ी अनेक स्मृतियाँ देश के स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ी हुईं हैं। अनेक क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए तिरंगा अपरिमित जोश भरने वाला राष्ट्रीयता का प्रतीक रहा है। इतना ही नहीं, युवाओं और बालकों के मन में भी तिरंगा जोश और ऊर्जा का संचार करता रहा है। स्वाधीनता आंदोलन के समय इसी तिरंगे के नीचे देश की स्वाधीनता के दीवाने अपने प्राणों की बलि देने का संकल्प लेते थे। 'शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले... ' जैसी कालजयी रचना करने वाले हिंदी के जाने-माने कवि और स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी जगदंबा प्रसाद मिश्र 'हितैषी' की इसी कविता से कुछ पंक्तियों का उल्लेख करते हुए उस दौर के सेनानियों के मनोभावों को यहाँ देखना प्रासंगिक होगा। हितैषी जी लिखते हैं-

जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हरगिज़,

न जाने बाद मुर्दन मैं कहाँ औ तू कहाँ होगा ।

वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है,

सुना है आज मक़तल में हमारा इम्तिहाँ होगा ।

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा ।

कभी वह दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे,

जब अपनी ही ज़मीं होगी और अपना आसमाँ होगा ।

ये मनोभाव उस समय हर युवा, वृद्ध और यहाँ तक कि बच्चों के मन में भरे हुए थे। देश को स्वतंत्र देखने की सभी की अदम्य लालसा ऐसी थी, जिसे प्राणों की कीमत चुकाकर भी पूरा करने से कोई पीछे हटने वाला नहीं था। ऐसे साहसी क्रांतिकारियों के लिए यह तिरंगा एक ध्वज-मात्र नहीं, वरन् भारत की आन-बान-शान का प्रतीक था। इसके लिए जान देने से भी पीछे हटने को कोई तैयार नहीं था। तिरंगा धरती को छू न जाए, इसके लिए जिन लोगों ने अपने प्राणों की बलि दी है, उन्हें स्मरण करने का यह पर्व है, यह अभियान है।

'हर घर तिरंगा' अभियान की बात करते हुए एक अत्यंत मार्मिक, चर्चित, महत्त्वपूर्ण और भावपूर्ण प्रसंग का उल्लेख करना यहाँ आवश्यक होगा। जिस समय देश की स्वाधीनता का आंदोलन चल रहा था, उस समय युवाओं के साथ ही किशोरवय के बालकों का अदम्य साहस देखते बनता था। 08 अगस्त, 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ हो चुका था। देशभर में अंग्रेजों को बड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा था। जगह-जगह आंदोलन चल रहे थे। इन्हीं दिनों बिहार विभूति कहे जाने वाले अनुग्रह नारायण सिंह (अनुग्रह बाबू) भी पटना में बंदी बना लिए गए। अनुग्रह बाबू को पटना में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के प्रयास में बंदी बनाया गया था। अंग्रेजों के द्वारा उन्हें बंदी बनाया जाना यह सिद्ध करता है, कि किस प्रकार अंग्रेजों की नींदें हमारे तिरंगे ने उड़ा रखीं थीं। अनुग्रह बाबू को बंदी बनाए जाने पर तीखी प्रतिक्रिया हुई।

11 अगस्त, 1942 को किशोरवय के सात युवक तिरंगा फहराने के लिए निकल पड़े। देवीपद चौधरी, उमाकांत प्रसाद सिन्हा, रामानंद सिंह, सतीश प्रसाद झा, राजेंद्र सिंह, रामगोविंद सिंह और जगत्पति कुमार ने यह तय किया, कि वे पटना के सचिवालय भवन में तिरंगा फहराकर ही दम लेंगे। उन दिनों पटना का सचिवालय भवन बिहार प्रांत की अंग्रेज सरकार का मुख्य भवन होता था और उसमें तिरंगा फहराने का मतलब अंग्रेज सरकार को उसकी नाक के नीचे ही चुनौती देना था। इन युवाओं की उम्र अधिक नहीं थी। सभी दस से पंद्रह वर्ष की आयु के थे और माध्यमिक-उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं के विद्यार्थी थे। ये एकसाथ निकल पड़े, तिरंगे को हाथ में थामे हुए अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने का जज्बा अपने मन में भरकर...। इन युवाओं के नेतृत्वकर्ता थे- देवीपद चौधरी। ये युवा जब तिरंगा हाथ में थामे हुए पटना सचिवालय पहुँचे, तब अंग्रेज अधिकारी और पुलिसबल तुरंत सक्रिय हो उठे। पुलिस बल ने उन्हें रोका, लेकिन वे नहीं रुके। उस समय पटना के जिलाधिकारी डब्ल्यू जी. आर्थर ने क्रांतिकारी युवाओं को रोकने के लिए गोली चलाने के आदेश दे दिए। तत्कालीन पुलिस आयुक्त शील्ड ब्यान ने गोली चलवा दी। तत्कालीन अविभाजित बंगाल के जमालपुर के रहने वाले देवीपद चौधरी पुलिस की गोली से घायल होकर गिर पड़े। देवीपद चौधरी को गिरते देख पटना के दशरथा गाँव के निवासी रामगोविंद सिंह आगे बढ़े और तिरंगा थाम लिया। रामगोविंद सिंह के आगे बढ़ते ही पुलिस ने फिर गोली चलाई। पटना निवासी रामानंद सिंह ने आगे बढ़कर पुनः तिरंगा थाम लिया और आगे चल पड़े। पुलिस ने गोली चला दी। तिरंगा गिरने ना पाए, यह सोचकर सारण जनपद के दिघवारा निवासी राजेंद्र सिंह ने तिरंगा थाम लिया और आगे बढ़ चले। जब उन पर भी पुलिस ने गोली चला दी, तो पाँचवें साथी औरंगाबाद के खराठी गाँव के रहने वाले जगत्पति कुमार ने तिरंगा थाम लिया। जगत्पति कुमार पर पुलिस ने तीन गोलियाँ चलाईं। उनका पैर, हाथ और छाती घायल हो गई। इसके बाद भी वे रुके नहीं। बुरी तरह से घायल होकर लड़खड़ाते जगत्पति कुमार से छठे साथी सतीश झा ने तिरंगे को ले लिया, और गिरने नहीं दिया। भागलपुर (बाँका) के बरापुरा गाँव निवासी सतीश झा तिरंगे को लेकर जैसे ही आगे बढ़ने लगे, पुलिस ने उन पर भी गोलियाँ चला दीं। सतीश झा के हाथ से तिरंगा उमाकांत सिंह ने ले लिया और गोलियों से छलनी होते हुए भी तिरंगे को सचिवालय के गुंबद पर फहरा दिया। उमाकांत सिंह पटना के बी.एन. कॉलेज के विद्यार्थी थे। सचिवालय गुंबद पर तिरंगा फहराकर उमाकांत सिंह भी वीरगति को प्राप्त हो गए। इन सातों सपूतों ने भारत की आन-बान-शान के प्रतीक तिरंगे के सम्मान के लिए अपने प्राणों की बलि चढ़ा दी।

देश की स्वतंत्रता के बाद बिहार के पहले राज्यपाल श्री जयरामदास दौलतराम और तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिन्हा ने इन क्रांतिकारियों की स्मृति में स्मारक के निर्माण की आधारशिला रखी। सन् 1967 में भारतीय डाक एवं तार विभाग ने भारतमाता के इन सात वीर सपूतों की स्मृति को सँजोते हुए एक डाक टिकट जारी किया। इस डाक टिकट में सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का नामोल्लेख है, और साथ ही तिरंगा फहराने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाते सात सपूत चित्रित किए गए हैं।

'हर घर तिरंगा' अभियान में आज जिस तिरंगे को फहराने के लिए हम पूरी तरह से स्वतंत्र हैं, और हमारे सामने जीवन का कोई संकट नहीं है, पुलिस की गोली और लाठी-डंडों से लगाकर बंदी बनाए जाने का भय भी हमारे सामने नहीं है, तब हमें बिहार के उन सात किशोरवय युवाओं के अदम्य साहस को स्मरण कर लेना चाहिए। उन्होंने इसी तिरंगे के लिए अपने प्राणों की परवाह नहीं की। आज जिन लोगों को यह स्वाधीनता बहुत सस्ती लगती है, उन लोगों के लिए यह एक उदाहरण है, एक सीख है। भारत का स्वतंत्रता संग्राम ऐसे असंख्य मार्मिक प्रसंगों से भरा पड़ा है। बिहार के सात सपूतों के परिजनों ने किस वेदना को सहा होगा, यह कल्पना से परे है। ऐसे अनेक युवाओं ने अपने भविष्य की चिंता किए बिना, अपने परिवार की चिंता किए बिना अपने प्राणों को भारतमाता के लिए न्योछावर कर दिया। हमारी स्वतंत्रता हमारे लिए पुरखों के दिए हुए बलिदानों का स्मरण कराती है।

प्रसंगवश कहना समीचीन होगा, कि जिस समय 'हर घर तिरंगा' अभियान का उद्घोष हुआ और असंख्य भारतवासी इस अभियान के साथ जुड़कर अपने वीर बलिदानी पूर्वजों का स्मरण करने में आत्मगौरव की अनुभूति करने लगे, देशभक्ति के असीम भाव की निर्झरिणी में गहरे उतरकर अपने पुरखों के प्रति कृतज्ञ होने लगे, उस समय देश के अंदर चंद ऐसे भी लोग दिखाई देते हैं, जिन्हें तिरंगे में भारत के वीर सपूतों का बलिदान नहीं, राजनीति दिखाई देती है। ऐसे चंद लोगों ने सोशल नेटवर्किंग के अनेक पटलों में व्यंग्य के माध्यम से अपने मन के विष का वमन किया है। देश की असंख्य जनता को ऐसे लोगों का परिचय देना यहाँ आवश्यक नहीं लगता है। भारत का बहुसंख्य समाज ऐसे लोगों को भली भाँति पहचानता भी है, और उन्हें हाशिये में समेटने का हुनर भी जानता है।

उत्तर से लगाकर दक्षिण तक और पूरब से लगाकर पश्चिम तक देश के कोने-कोने में; नगरों-महानगरों से लगाकर गाँवों-कस्बों तक 'हर घर तिरंगा' अभियान देश का गौरवगान करते हुए स्वतंत्रता के लिए बलिदान देने वाले वीर सपूतों के प्रति भारतीयों की श्रद्धा को प्रकट कर रहा है। विदेशों में बसे भारतवंशियों ने भी इस अभियान में सहभागिता की है। इसके साथ ही लोगों ने सोशल नेटवर्किंग के विभिन्न पटलों पर.... फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप आदि पर लहराते हुए तिरंगे के चित्र साझा किए हैं। सारी दुनिया को एक गाँव में बदल देने वाले सोशल नेटवर्क में..., विश्वव्यापी अंतर्जाल (www) में हमारा तिरंगा पूरे गर्व के साथ लहरा रहा है। लोग स्वप्रेरणा के साथ इस अभियान के भागीदार बन रहे हैं। विश्व में भारतीयों का एक बड़ा प्रतिशत सोशल नेटवर्किंग प्लेटफार्म्स पर सक्रिय है, और यह सक्रियता आज तिरंगा फहराते हुए एक अलग संदेश सारी दुनिया को दे रही है। भारत की एकता व अखंडता विश्व-पटल पर हमारी शक्ति और सामर्थ्य का गौरवगान कर रही है।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्यामलाल गुप्त 'पार्षद' को 'झंडा गीत' के रचयिता के रूप में जाना जाता है। पार्षद जी का जन्म कानपुर के नरवल गाँव में हुआ था। उनके द्वारा रचित एकमात्र पुस्तक है- झंडा ऊँचा रहे हमारा। इस पुस्तिका का एक ही गीत उनकी ख्याति का माध्यम बना। इस झंडा गीत की कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा , / झंडा ऊँचा रहे हमारा।

सदा शक्ति बरसाने वाला , / प्रेम सुधा सरसाने वाला,

वीरों को हरषाने वाला , / मातृभूमि का तन-मन सारा।। झंडा...।

इस झंडे के नीचे निर्भय , / लें स्वराज्य यह अविचल निश्चय,

बोलें भारत माता की जय , / स्वतंत्रता हो ध्येय हमारा।। झंडा...।

पार्षद जी का लिखा यह गीत सन् 1924 में प्रकाशित हुआ था, और सन् 1925 में यह हिंदी की प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्रिका प्रताप में छपा था। यह गीत अपने सौ वर्ष पूरे करने जा रहा है। इन सौ वर्षों में कोई भी पीढ़ी ऐसी नहीं होगी, जिसके मन में इस गीत ने जोश न भरा हो। विद्यालयों में पढ़ने वाले छोटे-छोटे बच्चे आज भी जब इस गीत को एक स्वर में गाते हैं, तो भारत की नई पीढ़ी में पनपते देशभक्ति के भाव देखकर मन हर्षित हो उठता है। हर घर तिरंगा अभियान के साथ इस गीत का मेल भारत की स्वाधीनता की 75वीं वर्षगाँठ पर देखते ही बनता है। तिरंगा को लेकर निकलती फेरियों में यह गीत पूरे जोश के साथ गाया जाता है।

'हर घर तिरंगा' अभियान में अंतर्निहित स्वदेशी का भाव और विचार भी दृष्टव्य है। तिरंगा बनाने के लिए खादी का कपड़ा उपयोग में लाया जाता है। ग्रामोत्थान की अनेक योजनाओं के अंतर्गत खादी के वस्त्र तैयार करने के उपक्रम संचालित किए जाते हैं। देश भर में हर घर तिरंगा अभियान के अंतर्गत खादी की बुनाई व कताई और हस्तनिर्मित कपड़ा तैयार करना, फिर तिरंगा बनाना व विक्रय करना एक ऐसी लंबी प्रक्रिया को बताता है, जिसके पीछे भारत के ग्रामोत्थान एवं ग्रामीण कुटीर उद्योगों को सबल-सशक्त करने की संकल्पना दिखाई देती है। इस तरह से यह अभियान जाने-अनजाने ही भारत के गाँवों के असंख्य लोगों को आर्थिक सक्षमता प्रदान करने में योगदान देने वाला भी है।

'हर घर तिरंगा' अभियान हर भारतीय की आन-बान-शान से जुड़ा वह अभियान है, जिसके पीछे हम अपनी एकता के भाव को, एकात्मता के भाव को, वैश्विक पटल पर अपनी समृद्ध-सशक्त लोकतांत्रिक परंपरा को, विश्व पटल पर समृद्ध और सशक्त होते भारत देश के भाव को देख पाते हैं। यह अलग विषय है, कि कुछ नकारात्मक मानसिकता वाले लोग इसके पीछे अपनी राजनीति की कुत्सित चालों को चलने के प्रयास करते हैं, इस पुनीत अभियान की आलोचना करते हैं, लेकिन भारतदेश का असंख्य जनसमुदाय अपनी स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मनाते हुए, गर्व के साथ तिरंगा लहराते-फहराते हुए ऐसे देशविरोधी मानसिकता के पोषक जनों की बुद्धि-शुद्धि की कामना करते हुए दिखाई देता है, उन्हें सबक सिखाते दिखता है।


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