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व्यंग्य

मनमोहन सिंह से बातचीत
राजकिशोर


डॉ. मनमोहन सिंह मेरे प्रिय नेता रहे हैं। इसका मूल कारण यह है कि जहाँ दूसरे विद्वान और बुद्धिजीवी विश्वविद्यालयों और सेमिनारों में व्यस्त रहते हैं, मनमोहन सिंह ने, वह भी इस उम्र में, देश की जिम्मेदारी सँभाली है। राजनेता तो प्रायः सभी बुद्धिजीवी कहलाने के लिए लालायित रहते हैं, जिसके कारण उन्हें शक की निगाह से भी देखा जाता है। यह राष्ट्रीय राहत की बात है कि मनमोहन ने उलटे रास्ते पर चलने का फैसला किया, तो किसी की भौंहों पर बल नहीं पड़ा। मैं तो सिफारिश करूँगा कि अमर्त्य सेन को अमेरिका का राष्ट्रपति या ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, ताकि इस बुरे समय में इन देशों की अर्थव्यवस्था में भी सुधार आ सके। लेकिन इन अभागे देशों को सोनिया गांधी जैसा नेतृत्व कहाँ हासिल है। सो, डॉ. मनमोहन सिंह से इंटरव्यू का मौका मिला, तो मैं फूला न समाया। वैसे तो यह बातचीत पूरी तरह व्यक्तिगत थी, पर सूचना का अधिकार कानून के तहत इसे न छिपाए रखने के लिए मैं विवश हूँ।

मेरा पहला सवाल यह था कि मनमोहन सिंह जी, आपने प्रधानमंत्री पद क्यों स्वीकार किया? वे मुस्कराए : 'मजबूरी थी। अगर मैंने इनकार कर दिया होता, तो क्या पता मुझे कोई और पद मिलता या नहीं।'

मैंने आश्वस्त करना चाहा, वित्त मंत्री का पद तो आपके लिए सुरक्षित था ही। उससे आपको कौन रोक सकता था। उनका जवाब था, 'मेरा पूरा कॅरियर गवाह

है...मैंने जो पद त्याग दिया, बाद में उससे ऊँची जगह पर ही गया। वैसे, किसी भी नौकरशाह से पूछ लीजिए, वह यही कहेगा कि प्रमोशन मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।'

मनमोहन सिंह नरसिंह राव के साथ काम कर चुके हैं और अब सोनिया गांधी उनकी नेता हैं। मैंने जानना चाहा, आपको कौन नेता बड़ा लगता है - नरसिंह राव या सोनिया गांधी? वे जरा भी विचलित नहीं हुए। कहा, दोनों की अपनी-अपनी खूबियाँ हैं। मेरे लिए तो एक कमल था, दूसरा गुलाब है।'

अब मैंने जानना चाहा कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में काम करना उन्हें कैसा लग रहा है। मनमोहन सिंह स्पष्टवादी व्यक्ति हैं। बोले, 'बहुत ही अच्छा। वैसे, नरसिंह राव जी के साथ भी काम करना मुझे अच्छा ही लगा था। आपको एक राज की बात बताता हूँ। दरअसल, मुझे किसी के साथ भी काम करने में दिक्कत नहीं आती। जैसे मेरा अर्थशास्त्र फ्री मार्केट का है, वैसे ही मेरा व्यक्तित्व फ्री साइज का है - हर कहीं फिट आ जाता है।'

यह पूछने पर कि सोनिया गांधी से क्या आपके मतभेद नहीं होते, उन्होंने बताया कि 'सवाल ही नहीं उठता। जब मुझे लगता है कि किसी मामले में मेरा मत अलग है, तो मैं तुरन्त अपने को सुधार लेता हूँ। मुझमें किसी प्रकार की कट्टरता नहीं है। मैं शुरू से ही मानता हूँ कि मत मेरे लिए है, मैं मत के लिए नहीं हूँ।' मेरा अगला सवाल था, क्या सोनिया जी भी जरूरत पड़ने पर अपना मत बदल लेती हैं? मनमोहन सिंह ने उत्तर दिया, 'उन्हें ऐसा करने की जरूरत ही क्या है? वे पार्टी और देश की सर्वोच्च नेता हैं, उनका मत ही हम सभी का मत है।'

इस आरोप का खंडन करते हुए कि यह तो साफ-साफ व्यक्ति-पूजा है, मनमोहन सिंह ने स्पष्ट किया, 'सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि सोनिया जी व्यक्ति नहीं, संस्था हैं। कांग्रेस में व्यक्ति-पूजा के लिए कभी स्थान नहीं रहा। हम व्यक्तियों के बजाय विचारों पर ज्यादा जोर देते हैं। श्रीमती सोनिया गांधी भी व्यक्ति नहीं, विचार हैं, जैसे एक जमाने में खादी वस्तु नहीं, विचार थी।'

यह पूछने के बजाय कि राजनीति में आकर आपको कैसा लगता है, ताकि मैं कहीं टीवी एंकर जैसा न लगूँ, मैंने जानना चाहा कि राजनीति में आना ही था, तो क्या वे बहुत देर से नहीं आए? मनमोहन सिंह ने फिर खरेपन के साथ जवाब दिया - 'आ तो मैं बहुत पहले ही जाता, पर मुझे लगता था वहाँ मुझसे भी ज्यादा काबिल लोग हैं, उनके सामने मैं कहाँ टिक पाऊँगा।' और अब? 'अब मुझे लगता है कि राजनीति में काबिलियत की एक ही पहचान है कि आप सत्ता में कितनी उँचाई तक जा सकते हैं। इस दृष्टि से मैंने अपनी काबिलियत थोड़े-से समय में ही साबित कर दी है।' लेकिन अगले चुनाव में कांग्रेस कहीं हार गई तो? मनमोहन सिंह अपनी परिचित शैली में मुसकराए, 'मेरे लिए जॉब्स की कोई कमी नहीं है। यहाँ से हटा तो विश्व बैंक में चला जाऊँगा। सुना है, वे अभी से मुझे विश्व बैंक का अध्यक्ष बनाने पर विचार कर रहे हैं।' यानी आपके विरोधियों का यह आरोप आधारहीन नहीं है कि आपकी सरकार विश्व बैंक की नीतियों पर चल रही है? 'पूरी तरह आधारहीन है। वाशिंगटन में तो अफवाह है कि विश्व बैंक हमारी नीतियों पर चल रहा है।'

अमेरिकी राष्ट्रपति की हाल की भारत यात्रा के सन्दर्भ में मैंने जानना चाहा कि इस आरोप पर आपका क्या कहना है कि आपकी सरकार अमेरिका की ओर झुक रही है। इस पर हमेशा शांत रहने वाले प्रधानमंत्री थोड़ा तमतमा गए, बोले, 'सच तो यह है कि अमेरिका ही भारत की ओर झुक रहा है, हम तो उसके लिए सिर्फ जगह बना रहे हैं, जैसे एक महाशक्ति दूसरी महाशक्ति के लिए जगह बनाती है। क्या एक समय हमने सोवियत संघ के लिए जगह नहीं बनाई थी? यह हमारी मजबूती है कि हम अपने सिद्धान्तों पर दृढ़ रहते हुए किसी के लिए भी जगह बना सकते हैं। हमारी विदेश नीति में किसी तरह की जड़ता नहीं है। हम हवा का रुख देखते हैं और उसके अनुसार अपनी नीतियाँ बनाते हैं। यह अवसरवाद नहीं, अवसर के अनुसार आचरण है। ऐसी विचारगत स्वतंत्रता कितने लोकतांत्रिक देश दिखा सकते हैं?'

अब तक मैं मानसिक रूप से थक चुका था। इसलिए मैंने सोचा कि अंतिम प्रश्न पूछने का क्षण आ गया है। मैंने सवाल किया, क्या आपको कभी ऐसा नहीं लगता कि आपने राजनीति में आकर भूल की है? इसके पहले आप कभी इतने विवादास्पद नहीं रहे। अचानक आप एक के बाद दूसरे विवाद के केन्द्र में आते जा रहे हैं। आपके सहयोगी वामपंथी ही आपके खिलाफ होते जा रहे हैं। क्या आपको इस कीचड़ भरी राजनीति में आकर कभी अफसोस नहीं होता? मनमोहन सिंह दार्शनिक उदासीनता के साथ बोले, 'राजनीति में आकर हर ईमानदार आदमी को यही लगता है कि उससे भूल हो गई है। लेकिन मैंने अपने जीवन में हर चुनौती का डटकर सामना किया है। अगर मैंने अधबीच में राजनीति छोड़ दी, तो मैं और भी बड़ी भूल करूँगा। मैं ईमानदार हो सकता हूँ, पर कायर नहीं हूँ।'

वापस आते समय मैं सोच रहा था कि हमारे बुद्धिजीवी भी क्या चीज हैं! वे जब राजनीति में आते हैं, तो राजनेता भी उनके सामने पानी भरने लगते हैं। क्या इसलिए राजनेता बुद्धिजीवियों से थोड़ा दूर रहना ही पसंद करते हैं?


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