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व्यंग्य

प्रेम में और उसके बाद
राजकिशोर


प्रेम में :

प्रिय समर, वह दिन कितना उजला, कितना पवित्र और कितना सार्थक था जब तुमसे मेरी पहली मुलाकात हुई थी। मुझे इसका एहसास तक नहीं था कि मेरे आँगन में दूधिया चाँद उतरने वाला है। मैं तो किताब बदलने पुस्तकालय गई हुई थी। पुस्तकालय के कैंपस में चाय की दुकान पर अपने दोस्तों से घिरे तुम बड़ी सुरीली आवाज में गा रहे थे - बीती विभावरी जाग री। मेरे अस्तित्व का कण-कण भावों के इस रिमझिम में भीग उठा। मुझे क्या पता था कि यह आह्वान मेरे ही लिए है। हाँ, तुमसे मिलने के पहले मैं सोई हुई थी, मूर्च्छित थी, मुझे कुछ पता नहीं था कि जीवन क्या है, प्यार क्या है, खुशी क्या है, दर्द क्या है, कोई रात-रात भर जागते हुए कैसे सपने देखता है, उन सपनों को साकार करने के लिए कैसे अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता है। समर, मैं अपने को दुनिया की सबसे सौभाग्यशाली लड़की मानती हूँ कि मुझे तुम्हारे जैसा जीवन साथी मिला।

तुम सुंदर हो, आकर्षक हो, भीड़ में सबसे अलग दिखाई देते हो। ऐसे व्यक्तित्व पर सभी लड़कियाँ जान देने को तैयार रहती हैं। पर मैं उनमें नहीं हूँ। मैं तो तुम्हारे मानवीय गुणों पर, तुम्हारे नैतिक सरोकारों पर जान देती हूँ। ओह! तुम हर तरह से असामान्य हो। दूसरों के लिए कष्ट उठाने में हमेशा आगे रहते हो। अपना-पराया, सभी की मदद करते हो। किसी के साथ तुम अन्याय नहीं कर सकते। गीत-संगीत में तुम्हारा मन बहुत रमता है, पर तुम्हारा अध्ययन कितना विशाल है! उस दिन जब तुम कबीर की प्रासंगिकता पर बोल रहे थे, मैं तुम्हारी विचारशीलता पर मुग्ध हो उठी थी। उसी क्षण मैंने तय कर लिया था कि एमफिल पूरा करने के बाद कबीर पर ही पीएच.डी. करूँगी। सुनो, मैं अभी से कहे देती हूँ, पीएच.डी. का विषय तुम्हें ही सेलेक्ट करना होगा और रिसर्च में भी पूरी सहायता करनी होगी। मेरे सनम, तुम्हारी मदद के बगैर मैं अब एक कदम भी नहीं चल सकती।

प्रिय समर, अब तुम्हीं मेरे गुरु हो। जहाँ बैठने को कहोगे, वहाँ बैठूँगी। जिधर चलने को कहोगे, उधर चलूँगी। तुम्हारी आँखों से देखूँगी, तुम्हारे कानों से सुनूँगी। तुम्हारे प्रेम के अलावा दुनिया में मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। ईश्वर ने हम दोनों को एक-दूसरे के लिए बनाया है। किसी वजह से कभी तुम मुझसे विरक्त हो गए या तुम्हें मुझसे दूर चले जाना पड़ा, तब भी, विश्वास रखो, ये आँखें तुम्हारा इंतजार करती रहेंगी, तब तक इंतजार करती रहेंगी, जब तब वे सदा के लिए मुँद नहीं जातीं। हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हारी, सूर्या।

प्रेम के बाद :

समीर, मैंने 'प्रिय समीर' लिखने की कोशिश की, पर कलम ने साथ नहीं दिया। मेरी तरह, अब वह भी झूठ में जीना नहीं चाहती। ओह! तुम्हारे प्रेम में पड़ कर मैंने कितना बड़ा धोखा खाया। अब तो सारी मानवता से मेरा विश्वास उठ चुका है। मैंने तो तुम्हें अपना पूरा जीवन दे दिया था, कितनी आस्था के साथ तुम्हारे पास आई थी। पर तुमने क्या किया? मेरी आस्था को, मेरी भावनाओं को फूल की तरह मसल डाला। मुझे क्या पता था कि तुम्हारे नैतिक मुखौटे के पीछे कितना क्रूर पिशाच छिपा हुआ है। तुमने मुझे बरबाद कर दिया।

जिस दिन मुझे पता चला कि तुम दरअसल मुझसे नहीं, रोहिणी से प्रेम करते हो, मुझे यकीन ही नहीं हुआ। लेकिन यकीन कैसे न करती, जब मैंने देखा कि रोहिणी की नोटबुक में तुमने अपने हाथ से करेक्शन किए थे। उसी विषय पर मैंने भी निबंध प्रतियोगिता के लिए लेख लिखा था। तुमने उसे बड़े मन से सँवारा भी था। पर पुरस्कार मिला रोहिणी को। अब तो मुझे पूरा विश्वास है कि तुमने उसके लेख में करेक्शन ही नहीं किए थे, बल्कि उसे दुबारा लिख ही दिया था। रोहिणी इससे इनकार करती है। उसने अपनी वह नोटबुक भी दिखाई, जिसमें तुमने संपादन किया था। पर मैंने उसे पढ़ा तक नहीं। जब सर्वनाश हो ही चुका है, तो उसकी जन्मपत्री क्या देखना!

तुमने कहा कि रोहिणी तुम्हारी मित्र है, और कुछ नहीं। तुमने मित्रतावश ही उसका लेख देख दिया था। तुम झूठे हो, कमीने हो। पिछले एक महीने से मैंने जब भी तुम्हें फोन किया, दस में आठ बार तुम्हारा फोन बिजी मिला। जरूर तुम उस कुतिया से बात कर रहे होगे। तुम्हारा कहना है कि तुम जो नाटक डायरेक्ट कर रहे हो, उसी के सिलसिले में तुम्हें बहुत-से लोगों से बातचीत करनी पड़ रही है। हाँ, हाँ, जिंदगी तुम्हारे लिए नाटक ही है। इस नाटक में मेरे लिए कोई रोल नहीं है। मैंने कितनी बार कहा कि इस नाटक की हीरोइन का रोल मुझे दे दो, पर तुम नहीं माने। तुमने कहा कि सूर्या, तुममें अभिनय की प्रतिभा नहीं है, तुम्हें इस बखेड़े में नहीं पड़ना चाहिए। जरूर! मुझमें अब तुम्हें क्यों कुछ दिखाई देगा? सारी प्रतिभा तो रुखसाना में है, जिसे तुमने मेन रोल दे दिया है। जाओ, रोहिणी, रुखसाना वगैरह-वगैरह के पीछे दुम हिलाते रहो।

और कबीर? कबीर से तो मुझे नफरत ही हो गई है। वह भी तुम्हारे जैसा ही लफंगा होगा। बनता था संत और बीवी-बच्चों से चिपटा रहता था। जरूर उसकी कई माशूकाएँ होंगी। सभी प्रगतिशील ऐसे ही होते हैं। तुम भी ऐसे ही प्रगतिशील हो। अच्छा हुआ कि मैंने तुम्हें नजदीक आने नहीं दिया। नहीं तो मेरा शरीर भी कलुषित हो जाता। पर यह मत समझो कि तुम किसी और के साथ सुखी रहोगे। जो एक का नहीं, वह किसी का भी नहीं। जिन लपटों में मैं जल रही हूँ, उन्हीं लपटों में तुम भी जलोगे। आज से तुम्हारी कोई नहीं, सू.


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