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व्यंग्य

कल्याण सिंह की अंतरात्मा
राजकिशोर


संवाददाताओं को संबोधित करने के बाद कल्याण सिंह घर लौटे, तो सीधे बेडरूम में गए। वहाँ उनकी अंतरात्मा उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। कल्याण को देखते ही वह उनकी ओर लपकी जैसे कोई लंबे समय से विरह की मारी युवती अपने प्रिय की वापसी पर उसकी ओर लपकती है। हालाँकि कल्याण सिंह की अंतरात्मा जवान नहीं रह गई थी। उसके चेहरे पर झुर्रियाँ दिखाई पड़ने लगी थीं और उसे दिखने भी कम लगा था। पर नाक और कान पहले से ज्यादा सजग हो गए थे। वह सब कुछ सुनने और सूँघने की कोशिश करती थी। इससे उसे जो सामग्री मिलती, उसके कारण वह बहुत चिंतित रहती थी और कल्याण सिंह से बातचीत करने का मौका ढूँढ़ती रहती थी। कल्याण सिंह थे कि अकसर उसे धता बता कर कहीं निकल जाते थे। उनकी अधेड़ अंतरात्मा घर में अकेले बैठी कुढ़ती रहती थी। कभी-कभी उसका मन करता था कि वह कल्याण सिंह को हमेशा के लिए छोड़ कर गोमती में छलाँग लगा दे। पर अंतरात्माएँ बेवफा नहीं होतीं। सो वह उस समय का इंतजार करती रहती थी जब कल्याण सिंह सुबह के भटके की तरह शाम को घर लौट आएँगे।

आज कुछ वैसा ही वाकया हुआ। कल्याण सिंह ने अपनी अंतरात्मा को दोनों हाथों से हौले से उठाया और छाती से लगा लिया। अंतरात्मा के सामने के तीन दाँत टूट चुके थे, इसके बावजूद उसकी हँसी में सम्मोहन बरकरार था। उसने कल्याण से कहा, ‘मुझे हमेशा यह लगता रहा है कि तुम मुझे सच्चे दिल से प्यार करते हो। तुम लौट आए, तो मेरी सारी शिकायत जाती रही।’

कल्याण सिंह ने अपनी अंतरात्मा को रिझाते हुए कहा, ‘मुझ पर तुम्हारा बोझ बढ़ता जा रहा था। आज मैंने सारा हिसाब चुकता कर दिया। मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण तुम दोनों ही हो। एक वह और एक तुम। उसके साथ तो मैंने हर हाल में वफा की, पर तुम्हारा दर्द कचोटता रहता था। आज मैंने सब कुछ स्वीकार कर अपने को हलका कर लिया।’

अंतरात्मा कुछ क्षणों के लिए ठिठकी, फिर बोली, ‘उसकी बात छोड़ो। मैं बच्ची नहीं हूँ। दिल के मामलों में कुछ भी बोलना मैंने छोड़ दिया है। बस दूर से देखती रहती हूँ कि क्या गुल खिल रहा है। मुझे पता है कि यही वह जगह है जहाँ अंतरात्मा को दरवाजे के बाहर छोड़ दिया जाता है। लेकिन तुमने ऐसा क्या किया कि मेरा दूसरा बोझ हलका हो गया?’

कल्याण सिंह ने मुसकराते हुए कहा, ‘आज मैंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया कि बाबरी मस्जिद के गिरने की पूरी नैतिक जिम्मेदारी मैं लेता हूँ।’

‘लेकिन यह नैतिक जिम्मेदारी तो तुम पहले ही स्वीकार कर चुके थे। बावरी मस्जिद गिरते ही तुमने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दे दिया था?’

‘वह नैतिक जिम्मेदारी नहीं, राजनीतिक जिम्मेदारी थी। मुख्यमंत्री का पद नैतिक पद नहीं, राजनीतिक पद होता है। इसलिए मेरा वह इस्तीफा राजनीतिक था। असली नैतिक जिम्मेदारी तो मैं अब स्वीकार कर रहा हूँ। अब मुसलमान मुझ पर भरोसा कर सकते हैं।’

अंतरात्मा अचानक जोर-जोर से हँसने लगी। इससे उसे खाँसी आ गई। कल्याण सिंह ने उसे पास रखे गिलास से पानी पिलाया और उसकी पीठ सहलाई। खाँसी रुक गई, तो अंतरात्मा कल्याण सिंह की गोद में लेटते हुए गुनगुनाने लगी, ‘सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है।’

कल्याण सिंह लजा गए। मुसकराते हुए बोले, ‘खुदा से ही तो समझौता करके आ रहा हूँ। अब उसकी गाज गिरेगी तो आडवाणी, राजनाथ सिंह वगैरह पर। मैं तो मुक्त हो गया।’

अंतरात्मा गोद से छिटक कर पलंग पर सीधे बैठ गई। बोली, ‘मुझसे मत बनो। मैं तुम्हें बचपन से जानती हूँ। तुम्हें सत्ता चाहिए। वह चाहे रामलला की कृपा से मिले या खुदा की मेहरबानी से। इसके लिए तुम मस्जिद भी तुड़वा सकते हो, चर्च भी और मंदिर भी। तुम हमेशा अपने चक्कर में रहते हो। मेरी बात तुमने कभी सुनी। इसी तरह कुढ़ते-कुढ़ते एक दिन कूच कर जाऊँगी।’

कल्याण सिंह पुचकारने लगे, ‘तुम्हारे साथ यही परेशानी है। जमाना बदल गया, मैं बदल गया, पर तुम नहीं बदली। मुलायम सिंह जी को देखो। उन्होंने किससे समझौता नहीं किया? कभी मायावती का हाथ पकड़ा, कभी कांग्रेस के साथ लेटे। कभी-कभी भाजपा की कलाई भी थाम लेते हैं। आज उन्हें मेरी जरूरत है। मुझे भी उनकी जरूरत है। तो साथ आने में बुराई क्या है?’

कल्याण सिंह की अंतरात्मा ने खिसियाई हुई आवाज में कहा, ‘मेरे सामने मुलायम सिंह का नाम मत लो। मैं तो फिर भी कुछ ठीक-ठाक हूँ। उनकी अंतरात्मा अधमरी हो चुकी है। एक दिन हजरतगंज के पास मिली थी। बोल रही थी -- ‘बहन, अब हद हो गई। मुलायम तो मेरे पास अब आता ही नहीं है। कहता है, चुपचाप एक किनारे पड़ी रहो। मैं राजनीति में हूँ। इसमें तुम्हारा कोई काम नहीं।’

कल्याण सिंह की अंतरामा की पीठ पर धौल जमाते हुए बोले, ‘फिर भी तुम्हारी आँख नहीं खुली! एक राज की बात बताता हूँ। इन दिनों सभी अंतरात्माओं का यही हाल है। इसलिए तुम्हें अफसोस नहीं करना चाहिए।’

कल्याण सिंह की अंतरात्मा ने तुनक कर कहा, ‘खबरदार जो मुझे छुआ। आज से मैंने अपने आपको विधवा मान लिया। अब मैं विधवा की तरह ही रहूँगी। तुम्हें जो करना है, शौक से करते रहो।’

तभी कल्याण सिंह का मोबाइल बज उठा। फोन सुनने के बाद कल्याण सिंह गंभीर हो गए। फोन करनेवाले से उन्होंने कहा, ‘रात को एक बज रहे हैं। फिर भी आता हूँ। आप लोग वहीं मेरा इन्तजार करें।’


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