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व्यंग्य

दो अंधों की बातचीत
राजकिशोर


दोनों अंधे काफी समय के बाद मिले थे। पहले ने दूसरे को गले से लगा लिया। दूसरे को बहुत राहत मिली। पहला भी खुश हुआ। आँखवालों के बीच से निकल कर यह अपनी दुनिया में आ जाना था। वहाँ जितना अँधेरा था, उससे ज्यादा रोशनी थी। या, कम से कम ऐसा लगता था।

पहला अंधा : ‘कैसे हो भाई? कहीं बाहर तो नहीं चले गए थे? तुम्हारा बहुत इन्तजार रहा।’

दूसरा अंधा : ‘बाहर कौन ले जाता है? लोग समझते हैं, इसकी अतिरिक्त देखभाल करनी होगी। सो अपने में सिमटा रहता हूँ। तुम कैसे हो?’

पहला अंधा : ‘मेरा हालचाल भी तुम्हारी तरह ही अच्छा है। न उठने की खुशी, न सोने का गम। लोग कहते हैं, दुनिया बदल रही है। तेजी से बदल रही है। मुझे तो कोई बदलाव दिखाई नहीं देता।’

पहला अंधा : बिलकुल भोलराम हो। आँख न होने पर भी देखने की उम्मीद करते हो। मैंने तो यह उम्मीद बहुत पहले ही छोड़ दी थी। आँख बन्द किए चुपचाप पड़ा रहता हूँ।

दूसरा अंधा : ‘मानो आँख खोल देने से सब कुछ दिखाई पड़ने लगेगा।’

पहला अंधा : ‘आँखवालों की तरह बात की खाल मत निकालो। भाषा तो उन्हीं की है। मुहावरे भी उन्हीं के। उनका मतलब हमें अपनी स्थिति के अनुसार निकालना चाहिए। इतने दिनों से अंधे हो। अभी तक तुम्हारी समझ में नहीं आया कि हमेशा शब्दों पर नहीं, अर्थ पर जाना चाहिए। शब्द दूसरों के होते हैं, अर्थ हमारा।’

दूसरा अंधा : ‘ठीक कहते हो। मेरी जिन्दगी तो अर्थ का पीछा करते हुए ही बीत रही है। शायद तुम्हारी भी। नहीं तो दिल को छू लेनेवाली बात नहीं कहते।’

पहला अंधा : ‘कोई कह रहा था कि तुम्हारे घरवाले तुम्हारा इलाज कराने के लिए चेन्नई ले जा रहे हैं।’

दूसरा अंधा : ‘हाँ, चर्चा तो चली थी। उन्होंने कहीं अखबार में पढ़ा था कि अब उनका इलाज सम्भव है जो जन्म से अंधे नहीं हैं। लेकिन इसमें खर्च बहुत आता है। फिर इस बात की पूरी गारंटी भी नहीं है कि रोशनी वापस लौट ही आएगी। इसलिए मैंने ही मना कर दिया।’

पहला अंधा : ‘कोशिश करके देखने में क्या हर्ज था। क्या पता, तुम्हें दुनिया सचमुच दिखाई देने लगती।’

दूसरा अंधा : ‘जितनी जरूरत है, उतनी तो अभी ही दिखाई देती है। मेरे घर में कमाने वाला बस मेरा छोटा भाई है। खाने वाले आठ हैं। उसकी इनकम भी इतनी नहीं है कि वह दो-तीन लाख रुपए का जुआ खेल सके। मान लो, रुपए खर्च हो गए और मैं अन्धा का अन्धा रह गया। तब? वह तो कह रहा था कि कर्ज ले लेंगे। मैंने ही मना कर दिया।’

पहला अंधा : ‘अच्छा, यह नहीं हो सकता कि सरकार यह लोन सीधे तुम्हें दे देती और रोशनी वापस आने पर तुम दिन-रात काम करके उसका कर्ज उतार देते।’

दूसरा अंधा : ‘और रोशनी वापस नहीं लौटती तो?’

दूसरा अंधा : ‘तब क्या? तुम्हारा लोन भी उसी तरह माफ कर देती जैसे वह किसानों का कर रही है।’

दूसरा अंधा : ‘हाँ, मैं भी तो किसान ही हूँ। दिखाई नहीं देता, इसलिए खेतीबाड़ी के काम में ज्यादा सहायता नहीं कर पाता। क्या सरकार को यह दिखाई नहीं देता?’

पहला अंधा : ‘सरकार को सब दिखाई देता है और कुछ भी दिखाई नहीं देता। किसान कई साल से मर रहे थे। तब सरकार को दिखाई नहीं दे रहा था। अब चुनाव नजदीक आ गया है, तो दिखाई देने लगा है।’

दूसरा अंधा : ‘यानी जो आँखवाले हैं, वे भी उतना ही देखते हैं जितना वे देखना चाहते हैं। उनसे तो हम अंधे ही भले, जिन्हें सब कुछ एक जैसा दिखाई देता है। एक घुप्प अँधेरा, जिसे चीरते हुए सिर्फ आवाजें हमारे पास आ सकती हैं।’

पहला अंधा : ‘इसीलिए तो हमारे लिए आवाजों का इतना महत्व है। हमें हर साँस सुनाई पड़ती है, उनके लिए शोर का भी कोई मूल्य नहीं है।’

दूसरा अंधा : ‘सुना, तुम्हारे यहाँ टीवी आ गया है। दिन-रात टीवी सुनते होंगे।’

पहला अंधा : ‘सुनता हूँ, पर बहुत ज्यादा नहीं। सुनने से देखने की इच्छा होती है। इसलिए अपनी इच्छा को काबू में रखता हूँ। चूँकि बाकी दुनिया से मेरा सम्पर्क सुन कर ही है, इसलिए बहुत ज्यादा सुनना भी अच्छा नहीं लगता। और, सुन कर भी क्या कर लूँगा? मुझे तो बहुत दिनों से लग रहा है कि मैं दुनिया में ही नहीं हूँ।’

दूसरा अंधा : ‘हम अगर अमीर परिवारों के अंधे होते, तो शायद हमारी यह दशा न होती। मैं सुबह-शाम रेडियो जरूर सुनता हूँ। बताते हैं कि अमेरिेका, यूरोप में अन्धों के लिए नए-नए यन्त्र बन रहे हैं जिससे उनका जीवन आरामदेह बन सके। हमारे बारे में यहाँ कोई कुछ सोचता ही नहीं है।’

पहला अंधा : ‘जब आँखवाले गरीबों के लिए ही कोई कुछ नहीं सोचता, तो अंधे गरीबों की ओर कौन ध्यान देगा? एक तो पहले से ही दुनिया बँटी हुई थी - आँखवाले और बिना आँखवाले। उस पर अमीर-गरीब का फर्क। उसमें भी गाँव और शहर का अन्तर। शहरी अन्धों के लिए तो फिर भी कुछ हो जाता है। हम ठहरे देहाती अंधे। हमारी औकात ही क्या है!’

दूसरा अंधा : ‘कुछ दिन पहले हमारे गाँव में अंधता निवारण कार्यक्रम के तहत कुछ लोग आए थे। उन्होंने चौपाल पर मीटिंग भी की। पर मुझे नहीं बुलाया।’

पहला अंधा : ‘तुम्हें तब बुलाएँगे जब दृष्टिहीन कल्याण जैसी कोई योजना बनेगी। इन्तजार करो। जब सभी वर्गों की ओर ध्यान दिया जा रहा है, तो एक दिन हमारा भी नम्बर आएगा।’

दूसरा अंधा : ‘देखते हैं।’

पहला अंधा : ‘हाँ, देखने के अलावा हम और कर ही क्या सकते हैं!’


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