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कहानी

तुमने जहाँ लिखा है प्यार, वहाँ सड़क लिख दो...
राकेश मिश्र


वैसे देखा जाए तो रामसुधार मिसिर झटकों के आदी थे, परंतु यह झटका उनके चलते-फिरते जहाज को टाइटैनिक बना देगा, इसकी कल्पना उन्हें नहीं थी, वरना जहाँ तक उनकी समझदारी का सवाल है तो उनके यार-दोस्त उनसे अपेक्षा रख ही सकते थे कि वे अभी इस जहाज को समुद्र में न उतारें और उतारें भी तो हवा के बहाव का ध्यान रखें और हवा प्रतिकूल बह रही हो तो अतिरिक्त बुद्धि के मुगालते में चट्टान के करीब-करीब से जहाज को निकाल ले जाने के भ्रम में ना रहें।

लेकिन यह भी तय है कि इस समूचे प्रकरण में चाहे आप अतिरिक्त बुद्धि के मुगालते को केंद्र बिंदु मानकर इस पर फाइनल रिपोर्ट लगा दें, परंतु यही वह अतिरिक्त बुद्धि थी, जिसके चलते वे सिर्फ और सिर्फ रामसुधार मिसिर नहीं थे, बल्कि एक इंटेलेक्चुअल भी थे।

वैसे इस अंग्रेजी शब्द के तथाकथित हिंदी अनुवाद 'बुद्धिजीवी' से उनका दूर-दूर तक कोई संबंध न था। वे शुद्ध रूप से पिता-जीवी थे, अर्थात उन्हें अपनी मूलभूत आवश्यकताओं तथा भोजन, वस्त्र, आवास के साथ-साथ अपनी कुटेव आवश्यकताओं सिनेमा, सर्कस, चाय-सिगरेट आदि तक के लिए पिताजी के भेजे मनीऑर्डर पर निर्भर रहना था जो हर महीने कलेजे पर पत्थर रख एक बड़े विश्वविद्यालय में गंभीर पढ़ाई करने के स्वाँग पर बतौर पारिश्रमिक भेजे जाते थे। वैसे इस प्रक्रिया को निर्बाध और सुचारु रूप से जारी रखवाने के लिए वे जितनी बुद्धि खर्चते थे, उससे भी आप उन्हें 'बुद्धिजीवी' मान सकते हैं।

परंतु अपने आपको इंटेलेक्चुअल समझने की उनकी समझ दूसरी थी और कहलवाने के हथियार दूसरे।

अब उनकी समझ और उनके हथियारों पर विस्तृत और ब्यौरेवार कैनेथ स्टारीय रिपोर्ट की तफसील में न जाकर बात वहीं से शुरू हो, जहाँ से शुरू हुई थी। मतलब झटकों से। यहाँ यह सूचना आवश्यक है कि रामसुधार मिसिर अपनी मुकम्मल जिंदगी के आधे से भी कम पायदानों पर खड़े थे, और इन पायदानों पर अकसर दो ही किस्म के झटके लगते हैं। एक तो एक स्थायी 'चेयर' का मतलब नौकरी का, दूसरे एक हल्के से 'केयर' का यानी छोकरी का। रामसुधार मिसिर इस बात पर तय थे कि यदि किसी बुद्धिजीवी की चिंता में ये चेयर और केयर सम्मलित रूप से शामिल हो जाएँ तो उसके विकास के आगे 'बैरियर' का लगना तय है, और रामसुधार मिसिर अपने विकास में किसी किस्म का अवरोधक बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। इसलिए इस समूची अभिक्रिया से 'चेयर' नामक तत्व को गायब कर चुके थे। मतलब कैरियर का झटका उनको नहीं लगना था। सच कहें तो एक तरह से वे कैरियरप्रूफ थे।

वैसे उनके कैरियरप्रूफ होने का यह मतलब नहीं था कि उनके पिता बिल गेट्स के रिश्तेदार लगते थे बल्कि रात को जब वे अपने छात्रवास के कमरे में अँधेरा कर अपने दिल पर हाथ रख दिल से सोचते थे तो वाकई उनकी आँखों के आगे अँधेरा छा जाता था, लेकिन उनकी 'अतिरिक्त क्षमताओं' में से एक क्षमता यह भी थी कि दिल में आँख में चाहे घुप्प अँधेरा हो, दिमाग की बत्ती जली रहती थी और उसकी 'लाइट' चेहरे पर साफ देखी जा सकती थी। और जब कभी उनकी अतिरिक्त निश्चिंतता से आतंकित उनके सहपाठी और उनके प्रभामंडल से आकर्षित उनके जूनियर उनके कैरियर के बारे में आशंकित होते तो उनके चेहरे पर निहायत दार्शिकाना भाव आ जाता और उनके दीर्घ और लचकदार भाषण का सारांश यह होता है कि वर्तमान व्यवस्था में जो कि मुख्यतः अमेरिकी पूँजीवादी व्यवस्था का निकृष्टतम संस्करण है, नौकरी का उपक्रम निश्चित रूप से घृणित व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास होगा और यह मानव को उत्तरोत्तर 'लघुमानव' बनाते जाने की साजिश है, जिससे उन्हें पूरी शिद्दत से इनकार था। प्रतिप्रश्न की गुंजाइश हालाँकि उनके पास कम होती थी, परंतु यदि हो भी तो उनके उतार-चढ़ाववाले लच्छेदार वक्तव्यों की आँधी में उनका टिक पाना बहुधा असंभव नहीं तो कठिन जरूर होता। कुल मिलाकर उनके शारीरिक अवयवों की स्थूल संरचना पर न जाएँ तो वे सिर्फ और सिर्फ तर्कों से बने थे। अपने हर काम के औचित्य के लिए उनके पास लाजवाब तर्क थे, जिसमें धुआँधार सिगरेट की निकोटिन और यदा-कदा अल्कोहलिक उत्तेजना का 'न्यूरान्स' पर सकारात्मक प्रभाव से लेकर 'पैसा दुनिया का नाश करता है, हम पैसे का नाश करते हैं' तक का व्यापक फैलाव था जिसमें वे संबंधों, संवेदनाओं, भावनाओं, भावुकताओं को बचाने के लिए पूरी ईमानदारी के साथ जिंदा रहने के मुकम्मल कारणों से जीवित थे। और जब कभी वे अपनी तर्कशक्ति पर आत्ममुग्धता की स्थिति में पहुँचते, अकसर कागजी घोड़े पर सवार हो जाते थे और मन-ही-मन कभी आई.ए.एस. की पी.सी.एस. कभी लेक्चरर और ज्यादातर मशहूर पत्रकार होने तक के क्षेत्र में दौड़ लगाते। खैर, यह तो हुई ठोस दुनिया की बेरहम दौड़, जिसमें रामसुधार मिसिर 'कागजी घोड़े' पर चढ़ते थे, परंतु इन सबों से अलग उनकी एक और दुनिया भी थी, वाद-विवाद प्रतियोगिता, भाषण प्रतियोगिता, निबंध और कवितादि प्रतियोगिताओं की दुनिया। और कहना न होगा, इस दौड़ में वे तर्क-सवार होते थे, इसलिए अकसर 'अपराजेय'।

उनके लगातार अपराजेय रहने के प्रमाण में हालाँकि उनके पैतृक आवास के बैठक खाने में रखे पुरस्कारों से भरे शो-केस को देखा जा सकता है, परंतु इसकी आवश्यकता उन्हें न थी, बल्कि इसी दुनिया में दौड़ जीतने के पुरस्कार में उन्हें वह मिला था, जिसकी घोषणा अकसर ठोस दुनियावादी दौड़ के लिए ही की जाती है। मतलब कि इस घोर कैरियरवादी युग में भी अपने कैरियर के प्रति पूरी तरह सचेत एक लड़की रामसुधार मिसिर की जिंदगी में थी - कविता।

जिंदगी में जितना विश्वास रामसुधार को अपने तर्कों पर था उससे ज्यादा आकर्षण कविता को रामसुधार मिसिर के लिए था। उम्र में वह उनसे चार साल बड़ी थी, परंतु अपने मानसिक विकास के कारण रामसुधार मिसिर उस अवस्था में थे, जहाँ उम्र की सांख्यिकी कोई मायने नहीं रखती थी। अपनी उम्र के दुगुने, तिगुने उम्र के लोगों के साथ उनका बैठना या बराबराना व्यवहार था। अतः उन्हें कम-से-कम इस बात पर आश्चर्य नहीं था कि उनसे चार साल ही बड़े कमलेश गौतम उनके सर्वाधिक करीबी मित्र - रूप-रंग, पहनावा-ओढ़ावा और बात-विचार में कई मौलिक भिन्नताओं के बावजूद ऐसे कई प्लेटफार्म थे, यहाँ दोनों एक साथ खड़े थे। दोनों धुआँधार धुआँ छोड़ते थे, दोनों 'पैसों के नाश' के प्रति प्रतिबद्ध थे। दोनों की चिंता समकालीन साहित्य में पहचान बनाने की थी और इन सबसे बढ़कर दोनों की जिंदगी में एक-एक अदद प्रेमिका थी, जिसके साथ बिताये एकांतिक क्षणों को दोनों एक दूसरे से शेयर करते थे।

लेकिन कमलेश गौतम की जिंदगी में प्रभा का वही मतलब नहीं था, जो रामसुधार मिसिर के लिए कविता का। कविता का होना एक नया अनुभव था, जिसे वे अपनी तमाम गहराइयों के साथ अनुभूत करना चाहते थे, जबकि कमलेश गौतम के लिये प्रभा लंबी यात्रा के दौरान, पकड़ी गई तीसरी पैसेंजर ट्रेन थी, जिसके पहले वे सुषमा व अनामिका नामक दो सुपर फास्ट ट्रेन से उतर चुके थे और उन दोनों ट्रेनों के छूटने का गहरा अफसोस भी था उनको। लेकिन परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी बनी थीं कि उनके पास अफसोस जाहिर करने के अलावा कोई चारा न था।

अब दोनों पूर्व प्रसंगों के उल्लेख में चाहे आप अनामिका के संदर्भ में अन्य कारकों को चिह्नित करते हुए, बाजारवाद, उपभोक्तावाद के खतरों को सूँघ लें, लेकिन सुषमा-प्रसंग में महज और महज परिस्थिति ही जिम्मेदार थी। अब इसे क्या कहेंगे कि सोलहसाला कमलेश गौतम अपनी उच्च मानसिक अवस्था के साथ पंद्रहसाला पड़ोसन सुषमा से प्यार कर रहे हैं। उसकी हँसी, उसकी छुअन, उसका चुंबन, उन्हें हर रोज एक नयी पुलक से भर दे रहा है और विज्ञान के मेधावी छात्र कमलेश गौतम रासायनिक अभिक्रिया के नीरस परिणामों को छोड़कर वास्तविक रूप से रसज्ञ हो रहे हैं कि एक रात सुषमा के पिता ने अपने तबादले से समूची प्रतिक्रिया में ही आमूल-चूल तब्दीली ला दी। कमलेश गौतम की प्रयोगशाला में इस अवांछित केमिकल की अभिक्रिया से विस्फोट होना ही था। हुआ भी। लेकिन परिणाम अंततः सुखद ही हुआ। यह कुछ-कुछ एक रेडियोऐक्टिव विस्फोट ही था, जिसका उद्देश्य शांतिपूर्ण तथा रचनात्मकता में उसका उपयोग होना था, हुआ और प्रकारांतर से कमलेश गौतम कला के मेधावी छात्र होकर उसी बड़े विश्वविद्यालय में विशुद्ध कला (फाइन आर्ट्स) के विशुद्ध व्यावसायिक विभाग अप्लाइड में नामांकित हुए, जिनमें रामसुधार मिसिर साहित्य में गहरी दिलचस्पी लेते हुए इतिहास की गंभीर पढ़ाई कर रहे थे।

रामसुधार मिसिर से कमलेश गौतम का मिलना करीब-करीब वैसे ही तय था जैसे कृष्ण का अर्जुन से, गांधी का राजेंद्र से, मार्क्स का एंगेल्स से, लेकिन जो तय नहीं था, वह था कमलेश गौतम का अनामिका से मिलना। क्योंकि सुषमा प्रकरण के बाद कमलेश गौतम ने भी हीरामन की तरह 'तीसरी कसम' खायी थी - जिंदगी में लड़की कभी नहीं। लेकिन कसम तभी सही हो पाती, जब 'फाइन आर्ट्स' की जिंदगी इसी दुनिया की जिंदगी होती और अनामिका सिर्फ लड़की। विश्वविद्यालय का फाइन आर्ट्स विभाग एक तिलिस्म था और अनामिका आदि लड़कियाँ उसकी परियाँ। विश्वविद्यालय का यह विभाग सर्वाधिक प्रगतिशील और संवेदनशील था। सभी लड़के सभी लड़कियों के लिए और उससे थोड़ा ज्यादा अनुपात में सभी लड़कियाँ सभी लड़कों के लिए संवेदनशील थीं। अतः यदि एक लड़के की संवेदनात्मक फ्रिक्वेंसी किसी लड़की की फ्रिक्वेंसी से मिल जाती तो उसे विभाग में 'जोड़े' की संज्ञा दे दी जाती। लेकिन यहाँ 'जोड़े' अलग फ्रिक्वेंसी से अलग नहीं होते थे और जहाँ कोई अन्य फ्रिक्वेंसी ज्यादा हांट करने लगे तो साथी बदलने से उन्हें कोई गुरेज न था। जब तक फ्रिक्वेंसी साथ दे, तब तक वे स्पर्श, आलिंगन, चुंबन, भ्रमण के बाद 'नाइट शेयर' की सीमा तक प्रोग्रेसिव थे और फ्रिक्वेंसी के टूटते ही एक अजनबीपन भरी मुस्कान के साथ शिष्टाचारवश कहा गया 'हलौ' का संबोधन होता।

सो एक निश्चित समय में अनामिका की फ्रिक्वेंसी कमलेश गौतम की फ्रिक्वेंसी से मिल गयी। अनामिका इस तिलिस्म की उन परियों में से थी जिसका संवेदनात्मक विस्तार काफी दूर तक था। दूर का मतलब विभाग की परिसीमा से बाहर तक भी। वस्तुतः अनामिका उन लड़कियों में से थी जो अपनी इच्छाओं के हरेक प्रतीक के साथ जुड़ना चाहती हैं। उसकी इच्छा एक सफल कैरियरिस्ट बनने की थी। अपने कैरियर के प्रति पूरी तरह समर्पित एक लड़का गिरीश उसकी जिंदगी में आया। वह एक अच्छा चित्रकार होना चाहती थी। विभाग के प्रतिभाशाली चित्रकार साहा से उसकी नजदीकियाँ बढ़ीं और इसी क्रम में जब उसकी प्रतिभा ने जोर मारा, तो उसकी जिंदगी में कमलेश गौतम आ गये।

कमलेश गौतम इन तरंगों के उतार-चढ़ाव से अनभिज्ञ थे। उनके दिमाग में तो प्यार-प्रेम का मतलब सुषमा के होने से था। आँखों में आँखें डालकर देखना, हौले से सिर पर हाथ फेरना, उँगलियों के पोरों को हाथों से चटखाना फिर चेहरे को हाथों में भरना, उसकी अधखुली, अधमुँदी पलकों को उठाना, उसके कपोलों पर धीरे-से अपने होठों को रख देना, इस सारी हरकतों में एक क्लासिकल रोमांटिक टच हुआ करता था और इन सबसे बढ़कर यह अहसास कि ऐसा उस लड़की के साथ वे और सिर्फ वे ही कर सकते हैं।

इस फ्रिक्वेंसी की शुरुआत विभाग में एक आयोजन से हुई। कमलेश गौतम ने उसमें एक कविता पढ़ी जिसमें उन्होंने खुद को खरगोश और प्रेमिका को हरे घास का मैदान बताया था। कविता सुनकर अनामिका के मन में हरे घास का मैदान बनने की इच्छा बलवती हो उठी और खरगोश फाँसने के लिए उसने जाल बिछा दिया। पहले उसने कमलेश गौतम से उनकी कविताओं की डायरी माँगी। झिझकते हुए कमलेश गौतम ने दिया। फिर कविताओं की प्रशंसा हुई। कमलेश गौतम सिहरे! फिर कुछ दिनों तक प्रणयातुर आँखों का वार हुआ। कमलेश गौतम काँपे और जब एक दिन अनामिका ने उनके कँपकँपाते होठों पर अपने होठ रख दिये, तो कमलेश गौतम को उसका स्पर्श सुषमा जैसा लगा। फिर अब तो सुषमा ही सुषमा थी, अनामिका कहीं नहीं। अनामिका की चाल उन्हें सुषमा की चाल लगती, अनामिका की हँसी सुषमा की हँसी। उसकी बातें सुषमा की बातें और एक दिन ऐसा भी अया जब उन्हें अनामिका का चेहरा भी सुषमा का चेहरा लगने लगा।

कमलेश गौतम के लिए भले अनामिका सुषमा हो गयी हो, परंतु अनामिका के लिए कमलेश गौतम न तो गिरीश थे, और न ही दीपांशु साहा। उसकी फ्रिक्वेंसी अब तक दौड़ रही थी और एक दिन उसकी गायन प्रतिभा ने अपने पर फैलाये और बिना इसकी परवाह किये कि कमलेश गौतम की आबाद होती दुनिया पुनः बर्बाद हो जाएगी, वह उनकी दुनिया से विभाग के ही एक गवैये पोद्दार के साथ उड़ ली। कमलेश गौतम का हृदय चीत्कार उठा! अनामिका अब उनकी लत बन चुकी थी और जब धीरे-धीरे उन्होंने अभ्यस्त होना शुरू किया, तब तक वे धुआँधार सिगरेट, सप्ताहांत में अल्कोहलिक उत्तेजना और प्रतिदिन रामसुधार मिसिर उर्फ इंटेलेक्चुअल के लती और अभ्यस्त। ये रामसुधार ही थे जिन्होंने कमलेश गौतम के माया-मोह को छाँट कर उन्हें ब्रह्मज्ञान दिया - वह तुम्हारी छवि है। यह मत समझो कि कोई लड़की तुम्हें तुम्हारे इस हाड़ मांस चमड़े से प्यार करती है, दरअसल वह तुम्हारी 'छवि' से प्यार करती है।

इस ब्रह्मज्ञान के पाते ही, देखते ही देखते कमलेश गौतम की 'छवि' समूचे विभाग में घूमने लगी और इस बार वह जिस शीशे में उतरी वह उनके ही विभाग की प्रभा का दिल था।

प्रभा से मिलने के बाद उससे यह स्वीकार कर लेने के बाद भी कि दोनों एक-दूसरे को प्यार करते हैं, कमलेश गौतम अब कोई 'रिस्क' उठाने को तैयार न थे। वे सिर्फ अपनी छवि तक सीमित थे, और उतना ही 'बंद' और संपादित व्यवहार वे प्रभा से करते थे।

उनका यह बंद व्यवहार प्रभा को दीवानगी की हद तक खोलता गया। किसी भी कीमत पर कमलेश गौतम को पाना उसका अभीष्ट हो गया। इस खोलने के क्रम में पहले उसने अपने विचारों को खोला जो बाद में कपड़े तक के खुलने पर आ गयी और जब कपड़े खुले तब जाके उसका दिमाग खुला कि जिस शहर जिस परिवेश की वो थी वहाँ के लोग तो इतने खुले नहीं थे। वापसी का रास्ता उसके लिए नहीं था। वह खुलेआम कमलेश गौतम की दिवानी हो गयी। उसकी सुबह कमलेश जग गया होगा, से शुरू होकर शाम 'अब वह सो गया होगा' पर खत्म होती। उसने अपने कमरे में एक बच्चे की तस्वीर टाँग ली थी जिसे वह बड़े फख्र और गुमान से अपना और कमलेश गौतम का बच्चा कहती! समूचा विभाग उसकी इस दीवानगी पर हैरान था, परंतु उसे अपना नाम मीरा बाई सुनना बहुत अच्छा लगता।

कमलेश गौतम प्रभा से बिल्कुल तटस्थ-सा व्यवहार करते। इतना तटस्थ और ठंडा कि रामसुधार को भी कभी-कभी कोफ्त होती। उन्होंने कमलेश गौतम को बताया भी कि देखो, एक बार एक जोड़ा प्रशांत महासागर के तट पर टहल रहा था कि लड़की अचानक शार्क के जबड़े में आ गयी। लड़की का चिल्लाना-चीखना बहुत द्रावक होता जा रहा था। लेकिन वह लड़का सत्तर के दशक का भावुक, बेवकूफ नहीं था जो झट पानी में कूद पड़ता और अपनी जान-जोखिम में डालता। वह हमारे ही घटिया समय का चालाक प्रतिनिधि था। उसने आराम से अपना कैमरा निकाला और शार्क के जबड़े में धीरे-धीरे जाती और जोर से छटपटाती लड़की के विभिन्न कोणों से फोटो उतारता रहा। बाद में वही फोटो उसने 'शार्क और लड़की' नाम से हजारों डालर में बेचे। और उसके मुकाबले यह देखो कि इतने कठोर और खतरनाक समय में भी एक लड़की हर हाल में तुम्हारे साथ रहना चाहती है, चाहे तुम भीख ही क्यों न माँगो।

कमलेश गौतम अकसर उनकी चिंताओं की आँधी से लड़खड़ा जाते परंतु तुरंत ही एकदम से सँभल के कहते, यदि तुम्हें पता हो कि तुम्हारा अगला कदम एक भयानक गड्ढे में पड़ने जा रहा, तो हमें नहीं लगता कि तुम्हारी समझदारी उसमें तुम्हें कूद ही पड़ने को कहेगी। प्रभा के साथ किसी भी निर्णायक बिंदु पर आगे बढ़ना गड्ढे में कूदने के ही बराबर होगा। रामसुधार मिसिर को अपनी अतिरिक्त बुद्धि का इस्तेमाल करने के बावजूद गड्ढे में कूदने का निहितार्थ पता नहीं चल पाता था। वे जो कुछ समझते थे, वह कमलेश गौतम का अभीष्ट नहीं था, और कमलेश गौतम जो कहना चाहते थे, वह रामसुधार समझना नहीं चाहते थे।

वैसे भी उन्हें ज्यादा समझ कर करना भी क्या था। मुकम्मल स्वरूप में एक घोषित प्रेमिका उनकी जिंदगी में थी ही जिससे मिलने के लिए उन्हें प्रतिदिन महिला महाविद्यालय के फाटक पर पहुँचना ही था, उसे लेकर घाट पर बैठना ही था, उसे लेकर बाजार में टहलना ही था, समय से नहीं पहुँचने पर उलाहना सुनना ही था, सप्ताह में कम-से-कम दो दिन उससे झगड़ा होना ही था और तीसरे दिन फिर से रामसुधार मिसिर को उसके मनोबल के लिए जाना ही था।

रामसुधार मिसिर के लिए ये चीजें परेशानी का सबब नहीं थीं। कविता के साथ घाट पर बैठने, बाजार में घूमने या प्रतिदिन उससे मिलने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी, बल्कि नास्तिक होने के बावजूद वे इसे ईश्वर का वरदान ही समझते थे। लेकिन रामसुधार विश्वविद्यालय में प्रेम के प्रचलित स्वरूप से इतर प्यार करना चाहते थे, कविता से एकदम भावनात्मक एवं रूहानी प्रेम संबंध जिसमें यदि वे कविता के पास महीनों तक न जा पाएँ, तो भी कविता उन्हें हमेशा एकदम से अपने पास महसूस कर सके, जैसे वे कर लेते थे कविता को। फिर प्रतिदिन मिलना, घाट-घाट घूमना, सिनेमा-रेस्टोरेंट जाना यह तो विश्वविद्यालय के 95 प्रतिशत जोड़े करते हैं और जो 5 प्रतिशत नहीं करते वे या तो सामाजिक दबाव में बँधे रहते हैं या कोई कोई कमलेश गौतम जैसे अफलातून होते हैं। फिर उनका प्यार औरों से अलग कहाँ है। वे संवेदनाओं, भावनाओं को बचाने के लिए जिंदा थे। वे अपने और कविता के बीच बिल्कुल एक अनछुआ, अनकहा, अनकिया-सा संबंध बनाना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने गंगा के निर्जन एकांत तट पर पानी की उठती-गिरती तरंगों पर जीवन की निस्सारता और प्रेम के अमरत्व की उपमाएँ खोजी थीं, बालू की रेत पर अपना और कविता का नाम लिखकर प्रलय के बावजूद उसके अमिट रह जाने की कल्पना की थी, रेस्टारेंट में 'बिल के पीछे' के सफेद हिस्से पर प्रेम कविताएँ लिखी थीं, और सिनेमा घर के अंधकार में मंगलेश डबराल की पंक्तियों का अनुसरण करते हुए अपने आपको इतिहास से बाहर और पुनः इतिहास में वापस लाने का अनुभव किया था। कविता उनकी उपमाओं पर सम्मोहित थी, उनकी कल्पनाओं पर मुग्ध थी, और उनकी क्रियाओं से आवेशित। पर इतना सब होने के बावजूद वह इन प्रचलित स्वरूपों को बदलना नहीं चाहती थी। प्यार है, ठीक है, अलग प्यार है, वह भी ठीक है, परंतु यह दिखेगा कैसे, रामसुधार मिसिर 'होने' और 'दिखने' को अलग-अलग डिफाइन करते हुए होने की महत्ता को सिद्ध करें, परंतु कविता, जो दिखेगा वही रहेगा के सिद्धांत पर दृढ़ रही।

धीरे-धीरे रामसुधार मिसिर के अंदर यह दिखना इतना गहराने लगा कि उन्हें सबकुछ होना बड़ा लिजलिजा लगने लगा। प्रतिदिन का मिलना, घाटों पर बैठना, बाजार में घूमना, सबकुछ उन्हें एक शिफ्टवाइज ड्यूटी लगने लगा, जो उन्हें प्यार 'दिख' रहा है, उसे मेहनताने पर निभाना था। कविता के साथ घूमते हुए रामसुधार को अपनी भूमिका एक बॉडीगार्ड की लगने लगी, जिसे हर वक्त उसकी सुरक्षा पर चौकस रहना था। लिहाजा रामसुधार लगातार प्रसंग में गलत ऐक्शन लेते चले गये और इसके परिणामस्वरूप कविता गहरे रिऐक्शन में! आये दिन दोनों के बीच चख-चख, किट-किट! लेकिन दोनों एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील भी थे, इसलिए जुड़े हुए भी! या यों कहें कि दोनों एक-दूसरे से जुड़े थे, इसलिए संवेदनशील रहना था।

रामसुधार मिसिर के ये 'ऐक्शन' अप्रत्याशित नहीं थे। प्यार करने वाली लड़कियों के प्रतीक के रूप में उनके सामने प्रभा का मॉडल था। कमलेश गौतम उसे लाख झिड़कें, लाख उससे दूर रहें, वह एक बहाना बनाए तो वे हजार ताने दें, कमलेश गौतम उसकी हरेक बात को चाहे धागों से उलझा दें, पर उसकी उँगलियाँ जैसे अनेक बालों को सुलझाने के लिए ही बनी थीं। कमलेश गौतम के लिए चाहे वह सिगरेट का धुआँ हो, परंतु उसके लिए उनका सिगरेट से गंधाता मुँह भी गुलाब की खुशबू लिये रहता था।

रामसुधार अहंकारी नहीं थे, वे क्रूर भी नहीं थे। वह गैर-ईमानदार भी नहीं थे। फ्लर्ट करने का तो सवाल ही नहीं था, लेकिन अब कविता के साथ उनको झुकना, अपनी हेठी लगने लगा। जब वे रूठी कविता को मनाने की कोशिश करते, उन्हें अपने आस-पास कमलेश गौतम का अट्टहास सुनाई पड़ता। और इन्हीं दिनों पता नहीं, कब उनके दिमाग में यह बात आ गयी कि प्रभा कमलेश गौतम के लिए नहीं बनी है, साथ ही यह भी कि यदि कविता की जगह प्रभा होगी, उनकी जिंदगी में तो...।

बड़ा खतरनाक ख्याल था यह! इस ख्याल की जरा-सी भनक उन्हें कहीं का नहीं छोड़ती। यह ख्याल नहीं, कुदाल थी, न सिर्फ कविता और उनके संबंधों के लिए, साथ-साथ दोस्ती के लिए भी जो अपने अस्तित्व में आते ही कब्र खोदने का कार्य आरंभ करती। रामसुधार मिसिर अनुभवी थे। उन्होंने अपने दिल की गहराइयों में यत्नपूर्वक इस खतरनाक कुदाल को दफन कर दिया जो एक साथ कई चीजों के दफन का कारक हो सकती थी। अब रामसुधार मिसिर अपने व्यवहार के प्रति ज्यादा चौकस हो गये। कमलेश गौतम से प्रभा की चर्चा करते हुए अब वे विभाग के अन्य प्रेमी-प्रेमिकाओं का भी हाल-चाल लेने लगे। इसी क्रम में फाइन आर्ट के ही एक अन्य छात्र रोहित कुमार के प्रेम-संबंधों में उसके घरवालों ने दरारें खींचीं तो रोहित-संगीता से सबसे ज्यादा सहानुभूति रखने वालों में रामसुधार ही थो। धीरे-धीरे रामसुधार ने अपने आपको तमाम अच्छे और स्वस्थ प्रेम-संबंधों के पैरोकार के रूप में स्थापित करना शुरू किया और उनका सोचना था कि वे लोग प्रभा की चर्चा को कमलेश गौतम के सामने उसी तरह लेंगे जैसे रोहित कुमार के सामने संगीता की चर्चा को! इधर कविता से रामसुधार जितना देखने-दिखाने की प्रवृत्ति को नकारने की कोशिश करते, कविता ने और आँखें फाड़-फाड़कर चीजों को देखना शुरू किया। उसने देखा कि ठीक है, रामसुधार अद्भुत हैं, अद्वितीय प्रतिभाशाली हैं, लेकिन उनका उपयोग कहाँ है? वे अपनी कविताओं से कितने स्कूटर, टी.वी. या फ्रिज खरीद सकते हैं, अपनी कहानियों से कितने घर बना सकते हैं। तब उसे दिखा कि रामसुधार मिसिर उससे चार साल उम्र में छोटे हैं, और बी.ए. आर्ट्स के साधारण छात्र हैं, उनकी जिंदगी का कोई विशेष ठिकाना नहीं, बल्कि बहुत संभव है शिक्षित बेरोजगारों के आँकड़ों को व्यक्त करने वाली सांख्यिकी ही उनका अस्तित्व हो। उसे अपना कैरियर दिखा, वह पी-एच.डी. कर रही है, नेट क्वालीफाइड है, कहीं-न-कहीं कम-से-कम लेक्चरर तो हो ही जाएगी और रामसुधार मिसिर भावनाओं-संवेदनाओं के संवाहक। हुँह! कविता में धीरे-धीरे, बड़प्पन आ रहा था और रामसुधार उसी अनुपात में छोटे हो रहे थे, इतने छोटे कि रामसुधार अब जब भी कविता से मिलते, कविता की चिंताओं में सबसे पहली चिंता रामसुधार के कैरियर की होने लगी। रामसुधार को बड़ा अजीब लगता। ठीक है, वे घोर कैरियरिस्ट नहीं हैं, लेकिन भूखों मरने की भी उन्होंने नहीं सोच रखी है। फिर अभी वे मात्र बी.ए. के ही तो छात्र हैं, पत्रकारिता के इम्तहान के बारे में उन्होंने सोच ही रखा है। उन्होंने कविता को बताया भी था, लेकिन अब कविता की बातों में उसका सारा परिवार था, परिवार से उसकी बेपनाह मुहब्बत थी, अपने गृह राज्य और दक्षिण भारत की लाजवाब समृद्ध संस्कृति थी जिसके मुकाबिल यह अफसोस कि यदि उनकी शादी हो जाती है तो रामसुधार का तो परिवार उसके साथ ही रहेगा और बिहार के रीति-रिवाज, पर्व-त्यौहार... उफ कितने भदेस...

वह जो समझाना चाह रही थी, रामसुधार उसे अच्छी तरह समझ रहे थे। वह जो दिखाना चाह रही थी, उसे वह देख भी रहे थे, लेकिन वह जो कहना-कहलवाना चाह रही थी, उसे रामसुधार इतनी जल्दी अंजाम नहीं देना चाह रहे थे। इस समूचे प्रकरण के अंत में उन्हें अपनी हार स्पष्ट दिख रही थी। और वह रामसुधार उर्फ बुद्धिजीवी क्या जो इतना आसानी से हार स्वीकार कर ले, यह मानते हुए वे उचित स्थिति की तलाश में थे और जब यह स्थिति नहीं थी, वे परिवारों की मनोदशा, पत्रकारिता में कैरियर के सुनहरे अवसर और देश में विभिन्न संस्कृतियों के सामंजस्य पर तर्कपूर्ण व्याख्यान देते रहे, यह मानकर कि ये बातें भैंस के आगे बीन बजाने से ज्यादा का अर्थ नहीं रखतीं।

रामसुधार को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा। विश्वविद्यालय के सत्रांत में दो बातें ऐसी हुईं जिसमें उनको तत्काल कष्ट तो हुआ परंतु आने वाली खुशियों की पदचाप भी उनकी अद्भुत श्रवण शक्ति से बची न रह सकी। कमलेश गौतम के गृहनगर में पुनः सुषमा के पिता का तबादला हो गया था और छुट्टियों में जब वे अपने घर गये तो सुषमा से मिलकर अवाक रह गये। यह जानकर तो और ज्यादा कि जहाँ वे दो-दो ट्रेनें बदल चुके हैं, सुषमा उसी प्लेटफार्म पर अब तक खड़ी है। उन्होंने सुषमा को अनामिका और प्रभा वाली सच्ची बात बता दी। सुषमा ने कहा कुछ नहीं लेकिन न जाने क्यों, कमलेश गौतम को लगा कि गाड़ी पटरी से ज्यादा दूर नहीं गयी है। लिहाजा गाड़ी को वापस लाने के नेक ख्याल के साथ बंदे कमलेश गौतम ने विश्वविद्यालय के बैचलर तक की डिग्री को पर्याप्त समझा और शहर, विश्वविद्यालय और प्रभा को 'जय श्रीराम करते' हुए रामसुधार मिसिर से मिलते रहने का वादा कर अपने गृहनगर वापस हो गये।

इसके साथ ही कविता की अस्थायी नियुक्ति दक्षिण भारत के किसी कॉलेज में तीन महीनों के लिए हुई और वह भी वहाँ जाने को तैयार हो गयी! रामसुधार मिसिर के लिए दोनों स्थितियाँ कष्टकर थीं, लेकिन इसके आगे तो उन्हें दूर तक दिख रहा था, उसमें प्रभा की उनसे निकटता थी और कविता को उसका माकूल जवाब।

जवाब तो खैर देना ही था लेकिन उसके लिए अनुकूल परिस्थितियाँ भी चाहिए थीं। कमलेश गौतम के रहते प्रभा से उनका व्यवहार सिर्फ 'हैलो' तक का था। वैसे यह पर्याप्त था कि प्रभा के लिए उनकी पहचान एक बुद्धिजीवी साहित्यकार और संवेदनशील लड़के के रूप में थी। परिस्थितियाँ जल्दी ही बनीं। कमलेश गौतम के बुलावे पर रामसुधार को उनके गृहनगर जाना था। उन्होंने कमलेश गौतम के सहपाठियों के बीच इसका डंका पीटा और उसकी आवाज प्रभा के कानों तक पहुँची। आवाज पहुँचते ही प्रभा का रामसुधार के पास पहुँचना हुआ, कमलेश गौतम की चर्चा छिड़ी और प्रभा के अंदर कई दिनों से घुमड़ते बादल ने जब बरसना शुरू किया तो न जाने कितनी बार उसकी आँखें भीगीं और रामसुधार का हृदय! रामसुधार ने भी संवेदनाओं की बाँध खोल दी। प्रभा घंटों डूबती-उतराती रही। भीगने-भिगाने, डूबने-उतराने की वह पहली सिटिंग ही ढाई घंटे की थी।

इस तरह आधुनिक समय में रीति-काल के एक दूत की तरह विरहिणी राधा की व्यथा को लेकर रामसुधार कमलेश गौतम के गृहनगर कानपुर पहुँचे। प्रभा की विरह गाथा का यथोचित वर्णन किया, यह जानते हुए भी कि कानपुर निवासी गौतम ने यदि उसके नाम से कान पकड़ लिया तो पकड़ लिया।

रामसुधार ने कानपुर की सड़कों पर घूमते हुए अपने प्यार में आये अवरोध का बखान किया और एक गंभीर चिंता व्यक्त की कि वे इसकी एकरसता से ऊब गये हैं। प्यार से हमें किसी किस्म की रचनात्मक ऊर्जा नहीं मिल रही है। प्यार में एक खास किस्म की रोमांचकता, एक रहस्यमयता होनी चाहिए तभी वह किसी को कोई नया अनुभव दे सकता है। बातचीत में इस बात पर रश्क था कि कमलेश गौतम को इस तरह के उतार-चढ़ाव का खास अनुभव है और वह इस बात का सर्जनात्मक उपयोग कर सकता है। बातचीत के अंत में रामसुधार मिसिर का निर्णयात्मक रुख था कि उन्हें भी एक रहस्य-रोमांच से भरपूर प्यार का अनुभव करना है और चूँकि कमलेश गौतम का विभाग तिलिस्म है, इसलिए इस बात की सर्वाधिक संभावना वहीं है।

कमलेश गौतम शायद एक बेहतर मनोविज्ञानी होते यदि कलाकार न होते। छूटते ही उन्होंने रामसुधार के चेहरे पर नजर गड़ायी और कहा, 'प्रभा कैसी रहेगी?'

ये बातें कानपुर के बड़े घंटाघर के पास हो रही थीं, रामसुधार मिसिर को अचानक महसूस हुआ कि मीनार पर टँगा घंटा उनके दिल में धाड़-धाड़ बजने लगा है। कहाँ वे प्याज की एक परत भर छीलना चाह रहे थे और कहाँ कमलेश गौतम ने उसकी सलाद तक तैयार कर डाली। उन्हें लगा कि भरे चौराहे सड़क पर किसी ने उनका जाँघिया खींच लिया हो। एकदम से हड़बड़ाकर बाले - 'यह क्या मजाक है?'

उनकी यह हालत देख कमलेश गौतम को भी लगा कि शायद उन्हीं के गुणा गणित में कोई गलती है। लिहाजा बात बदलते हुए उन्होंने कहा - हाँ यार, मजाक ही कर रहा हूँ। वैसे फैकल्टी में सब तो एंगेज्ड हैं, हाँ, एक वर्षा है तुम्हारे लायक! रामसुधार ने वर्षा को कभी देखा भी न था, न देखने की इच्छा थी, लेकिन बात उन्होंने लपक ली और समूचे सफर में वर्षा को लपकते-फेंकते और उछालते रहे जबकि कान में घंटे से भी तेज आवाज में प्रभा का नाम बज रहा था।

प्रभा के प्रति कमलेश गौतम उदासीन रहे थे लेकिन रामसुधार के आग्रह पर उन्होंने प्रभा के लिए एक लाइन का पत्र लिखा, जिसमें समय मिलने पर पत्र लिखने की बात थी। समय की कमी की बाबत लिखे इस पत्र ने दूसरी सिटिंग में रामसुधार को काफी समय मुहैया कराया। रामसुधार ने कानपुर का आँखों देखा हाल सुनाया। कमलेश गौतम की उदासीनता के किस्से कहे, यह विश्वास दिलाया कि वे उसके दुख के सहभागी हैं और यह विश्वास पाया कि प्रभा अब उसकी यानी रामसुधार मिसिर की आदी हो रही है।

रामसुधार मिसिर गलत नहीं थे। अपने पूर्व अनुभवों से उन्हें यह इल्म था कि एक बार इन लच्छेदार उतार-चढ़ाव वाली बातों की जद में आना था कि छूटना बहुत मुश्किल। प्रभा उनकी जद में थी। वह रोज रामसुधार मिसिर से मिलने उनके अड्डे 'घाट' पर आने लगी। उनके देर से पहुँचने पर इंतजार करने लगी। घंटों बातें। बातों में छोटी-छोटी बातों से बड़ी-बड़ी बातें तक। यह रामसुधार मिसिर की बातों का जादू था जो प्रभा के सिर चढ़कर बोल रहा था। अब रामसुधार दोस्तों से शर्त लगाकर घाट पर बैठते कि वो आएगी और कहना न होगा कि वह लगातार जीतते।

इन जीतों ने रामसुधार के अंदर इतना तो विश्वास भर ही दिया कि यदि प्रभा कविता की तरह उनकी घोषित प्रेमिका न बनी तो भी यह कहने की स्थिति है कि दोनों एक-दूसरे की जिंदगी में हैं और जब जिंदगी में हैं ही तो किसी और को लेकर दुविधा में क्यों रहा जाए। और इन्हीं दिनों जब कविता ने उनसे मिलने पर पुनः उनके कैरियर की बाबत बात उठायी तो उन्होंने बड़ी निश्चिंतता के साथ अमेरिकी पूँजीवादी व्यवस्था पर एक सारगर्भित डॉयलाग मारा और उसके बरखिलाफ एक उच्चतर मानव-समाज के निर्माण को अपना कैरियर बताया।

कविता विस्मित हुई। उसने उन्हें फिर समझाना चाहा। रामसुधार मिसिर ने साफ-साफ कह दिया कि यदि वह चाहती है कि उन्हें आई.ए.एस. अथवा पी.सी.एस. होना ही चाहिए तो वे यह बनने से इनकार करते हैं। उन्होंने इस बात पर गहरा क्षोभ प्रकट किया। वे अपने जिन गुणों को अपनी पूँजी मानकर, आत्ममुग्धता की स्थिति में थे, उसका उन्होंने बखान कर डाला यानी उनकी ईमानदारी, उनकी प्रतिभा, उनकी निर्भीकता, उनका समर्पण। कविता ने उन सबों को कैरियर के तराजू में तौलकर उन्हें अपनी ही नजर में अस्तित्वहीन बना दिया। निर्णय यह कि इस व्यवस्था में दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते। लिहाजा उन्हें अलग ही हो जाना चाहिए।

कविता खुद भी अवचेतन में इन स्थितियों की कल्पना कर चुकी थी, परंतु रामसुधार का इतना निरपेक्ष होकर बोलना, उसे दहला गया। उसकी आँखों में आँसू आ गये। रामसुधार एकदम तटस्थ रहे और उसी गंगा के तट पर जिसकी उठती-गिरती लहरों में उन्होंने जीवन और प्रेम की उपमाएँ खोजी थीं, जिसकी रेत पर प्रलय के बावजूद न मिटने वाला अपना नाम लिखा था, रामसुधार ने अपनी जिंदगी से कविता को आजाद कर दिया। शाम को जब तमाम पक्षी अपने-अपने घोसलों में लौट रहे थे, कविता खुद भी इस घोसले में असहज थी। लेकिन इस बेबाकी से उजड़ने की कल्पना उसे न थी। उसके लिए यह अचानक था, इसलिए दुखी थी। दुख तो रामसुधार मिसिर को भी था लेकिन उनका दुख बाँटने के लिए प्रभा थी जिसकी परेशानियाँ वे खुद भी बाँटने को तत्पर थे।

लिहाजा इस 'पटाक्षेप-मंचन' के दूसरे ही दिन जब प्रभा ने लखनऊ जाने की अपनी परेशानी जाहिर की तो रामसुधार उसकी मदद को फौरन तत्पर हो गये।

रामसुधार मिसिर अपनी इमेज को लेकर भी सतर्क थे। अतः प्रभा के साथ अकेले लखनऊ यात्रा में उन्हें अफवाहों की आशंका हुई। उन्होंने साथ चलने के लिए प्रभात को फाँसा। प्रभात उसकी फैकल्टी के उन उम्मीदवारों में से था, जो प्रभा के पूर्व चरित्र का आकलन करते हुए कमलेश गौतम के बाद अपने को उनका उत्तराधिकारी समझते थे।

प्रभा भी एक गहरे रोमांच में थी। यह एक अजीब फिल्मी मेलोड्रामा था जिसमें उसको जबर्दस्त मजा आ रहा था। कमलेश के प्रति प्रभा की दीवानगी के जितने किस्से थे, उससे किसी कदर कम रामसुधार और कमलेश की दोस्ती के नहीं थे। दो जिगरी दोस्त। एक को बेहद चाहने वाली उसकी प्रेमिका! दूसरे का उसके प्रति संवेदनात्मक लगाव! पहले का शहर से बाहर चला जाना, फिर लड़के-लड़के में दोस्ती कशमकश, दोस्ती-मुहब्बत-प्रेम-दोस्ती! कशमकश! वाह! वह इस समूचे ड्रामा की सबसे जीवंत पात्र थी। यह अनुभूति ही उसको गहरी रोमांचकता से भर देती थी! लखनऊ-यात्रा में प्रभात उसकी जिंदगी से कमलेश गौतम के सफे फाड़ता रहा। वह फटते देखती रही, न फाड़ने की बनावटी जिद करती रही। बनावटी गुस्से से रामसुधार सिगरेट फूँकते रहे और लौटते-लौटते जबकि प्रभात गाड़ी में गहरी नींद में था, प्रभा का ट्रेन की खिड़की से चोटिल हाथ रामसुधार के हाथों में था। रामसुधार के हृदय में तरंगें थीं। प्रभा की आँखों में सपने थे, आवेग था। रामसुधार के होठ पर केदारनाथ की कविता थी, उसका हाथ मैंने अपने हाथों में लेते हुए सोचा। दुनिया को हाथ की तरह सुंदर और मुलायम होना चाहिए।

ट्रेन तमाम हिचकोलों के साथ दौड़ रही थी। रामसुधार की दुनिया उतनी ही सुंदर और मुलायम हो रही थी। उसके कठोर हाथों में प्रभा का नर्म मुलायम हाथ था और न उसके व्यवहार में कोई प्रतिरोध था और न आँखों में ही।

वापस शहर में लौटकर रामसुधार को अहसास हुआ कि वे शातिर हो रहे हैं। वे साफ तौर पर फ्लर्ट कर रहे थे लेकिन मानने को तैयार न थे। उनके यार-दोस्तों में उनकी जो एक साफ-सुथरी इमेज थी, टूटने लगी। उनके प्रभामंडल से आकर्षित उनके जूनियर्स उनके इस कृत्य से विकर्षित होने लगे। कमलेश गौतम का सारा विभाग जो पहले उनकी दोस्ती के किस्से गाता था, उनके विश्वासघात पर वक्राक्ष था। रामसुधार ने इससे निपटने की भरसक कोशिश की। उन्होंने कविता के साथ अपने कैरियर संबंध मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए अपने प्रेम संबंध की कुर्बानी की दुहाई दी।

कोई उनके तर्कों से सहमत हो तो हो वरना उसे जयश्री राम! रामसुधार को अपने ऊपर गर्व करने के लिए पर्याप्त चीजें थीं - उनका आदर्श, उनके आदर्शों पर पूरी तरह खरा उतरने वाली प्रेमिका! कमलेश गौतम पर डोमिनेशन और इन सबसे ऊपर उनकी अपनी अतिरिक्त बुद्धि जो इस समूचे प्रकरण में कहीं चूकी न थी। उनकी बुद्धि का इस्तेमाल बदस्तूर जारी रहा और कविता के सुदूर दक्षिण में अस्थायी नौकरी के ज्वाइन करते न करते प्रभा ने रामसुधार मिसिर की जिंदगी को स्थायी रूप से ज्वाइन कर लिया।

रामसुधार मिसिर के चेहरे पर अभीष्ट सिद्धि का संतोष था तो प्रभा का दिल एक गहरी रोमांचकता में था। दोनों अपने भूतकाल में भी थे और वर्तमान को भी महसूसने की कोशिश करते। फिल्म 'दिल तो पागल है' दोनों ने दसियों बार देखी और आश्वस्त हुए कि 'दिल तो है दिल, दिल का एतबार क्या कीजे।'

रामसुधार अब निश्चिंत रहना चाहते थे। वे बड़े आराम से प्रभा के दिमाग से कमलेश गौतम को इरेज करते जा रहे थे कि प्रभा को धीरे-धीरे यह रोमांचकता खत्म होती महसूस हुई। उसके व्यवहार में तमाशा खत्म हो जाने की बात-सी खिन्नता झलकने लगी और एक दिन जब उसने पुलक में भरकर रामसुधार के सामने इस दृश्य की कल्पना की कि उन्हें पति-पत्नी के रूप में देख कमलेश गौतम पर क्या गुजरेगी, तो रामसुधार एकदम से बिफर पड़े। उन्होंने फिर इत्मीनान से समझाया कि जिंदगी एक सिनेमा नहीं है, इसे जिंदगी के नजरिये से ही देखा और जिया जाना चाहिए, तो प्रभा का रहा-सहा उत्साह भी जाता रहा। रामसुधार मिसिर की बुद्धि काम नहीं कर रही थी। प्रभा की फितरत उनकी समझ से परे जा रही थी। बाजार को नकारते हुए वह इसके जबर्दस्त प्रभाव में थी। उसे रामसुधार के कैरियर से कोई लेना-देना नहीं था, वह रामसुधार को आई.ए.एस., के तराजू में नहीं तौलना चाहती थी लेकिन वह एक सीधी-सादी जिंदगी भी नहीं जीना चाह रही थी। उसके अवचेतन में एक जबर्दस्त फिल्मी ड्रामा बसा था, और उसकी सारी क्रियाएँ उसी से संचालित हो रही थीं। रामसुधार ने गौर किया, उसके उदास होने, उसके चहकने, उसके गंभीर होने और रूठने-मानने तक में हिंदी क्लासिकल फिल्म का टच देखा जा सकता था।

इस क्लासिकल टच को सामान्य बनाने के लिए रामसुधार ने उसे मार्क्सवाद के क्लास स्ट्रगल से लेकर डीक्लास होने तक की प्रासंगिकता और सार्थकता समझायी। अमृता प्रीतम से लेकर उदय प्रकाश तक की कहानियों की चर्चा की, सर्वेश्वर दयाल से लेकर बद्री नारायण तक की कविताओं की पंक्तियाँ गुनगुनायीं, लेकिन जो रोमांचकता प्रभा को चाहिए थी, उसकी रंचमात्र की आपूर्ति भी नहीं हो सकी। वह सारे प्रसंगों को शबाना आजमी की तरह गंभीरता से सुनती और अंत में स्मिता पाटिल की तरह आँखें झपका देती। रामसुधार मिसिर को अब अपने से चिढ़ होने लगी। कहाँ वे सीधे-सीधे सपाट दौड़ना चाहते थे, कहाँ हरेक मोड़ पर सैकड़ों पेचो-खम।

रामसुधार की चिंताओं में जितनी तेजी से सामान्य बनने की बात थी, उतनी ही व्यग्रता थी प्रभा को रोमांचकता तलाशने में। उसकी रोमांचकता अब सीमा पार तक दौड़ लगाने लगी। शहर में मीरा नायर की चर्चित फिल्म 'कामसूत्र' आयी थी। प्रभा ने रामसुधार के साथ फिल्म देखने की इच्छा व्यक्त की। रामसुधार अंदर तक सिहर उठे। क्या चाहती है यह लड़की? वे तो प्रभा के सामने उस फिल्म का पोस्टर तक न देखें। हमारे जो संस्कार हैं, ठीक हैं, उन्हें प्रगतिशील होना चाहिए लेकिन यह कैसी प्रगतिशीलता? आज सिनेमा देखकर इसे नया रोमांच होगा, उसके आगे तो रामसुधार को ही देखना होगा।

रामसुधार आगे तक देख रहे थे। अतः किसी तरह सिनेमा देखने से मना कर दिया, लेकिन प्रभा अपनी सहेलियों के साथ देख ही आयी, न सिर्फ देख आयी बल्कि सिनेमा देखने के बाद कई दिनों तक उसकी आँखों में रसदेवी की मादकता रही। उसका स्पर्श, उसका सिहरना, उसका देखना रामसुधार को अनजाने ज्यादा गतिशील बनाने लगा। घाट पर एकांत में जब वह रामसुधार की बाँहों पर हल्के से दाँत गड़ा कर हटा लेती या अपने लंबे नाखूनों को उनकी टाइट जींस पहनी जाँघों पर फिरा देती तो रामसुधार एक अजब-सी गनगनाहट से भर उठते। रामसुधार मेले की भीड़ में खोये बच्चे-सा विस्मित थे, हैरान थे। एक गजब परेशानी थी जिसे वे भी बार-बार मोल लेना चाह रहे थे।

परेशानी तो मोल ले ही ली उन्होंने थोड़े ही दिनों बाद, जब उन्होंने कमल नामक लड़के का परिचय प्रभा से कराया, दरअसल कविता-प्रकरण के बाद रामसुधार के आकर्षण-क्लब की सदस्य संख्या में खासी गिरावट आयी थी। उनके बोलने और करने में लोगों को एक फाँक दिख रही थी। उन्हें अपना रुतबा बरकरार रखने के लिए नये 'फैंस' की जरूरत थी। इसी क्रम में कमल मिश्रा उनके प्रभामंडल के प्र्भाव में थे। रामसुधार मिसिर प्रभा और अपने बीच एक स्वस्थ वातावरण भी चाहते थे। उनका अनुमान था कि अपने मित्रों के साथ प्रभा को लेकर बैठने में दिमाग ज्यादा भटकेगा नहीं। कमलेश से प्रभा का परिचय कराते हुए रामसुधार ने मुस्कुराकर कहा, 'देखो, इसके चेहरे का एक एंगल कमलेश गौतम से कितना मिलता है।' इस वाक्य को कहते समय रामसुधार मिसिर की बुद्धि काम कर रही थी। उन्हें इल्म था कि चीजों को सरलीकृत करने की दिशा में यह एक सार्थक कदम होगा कि देखो प्रभा कमलेश गौतम को लेकर अब भी मेरे मन में कोई कांप्लेक्स नहीं है।

फिर रामसुधार ने प्रभा के सामने जो इमेज बनायी थी, वह भी कमलेश गौतम को ध्वस्त करके नहीं, बल्कि उनका प्रयास था कि देखे कि यदि तुम अब भी कमलेश गौतम को याद करती हो तो भी मेरा दिल इतना बड़ा है कि मैं तुम्हारी चाहत के प्रति भी संवेदनशील हूँ।

पता नहीं, कमल मिश्रा का चेहरा कमलेश गौतम से कितना मिलता-जुलता था लेकिन प्रभा को इसमें गजब को रोमांच आया। पहले परिचय में ही दोनों ऐसे मिले जैसे बरसों से जान-पहचान हो।

कमल मिश्रा फर्स्ट इयर में आया था, बच्चा था। रामसुधार मिसिर को भैया कहता और इसी लिहाज से प्रभा को दीदी। लड़का गजब का फास्ट था। थोड़े ही समय में 'प्रभा दी' से उसकी इतनी अंतरंगता बढ़ी कि रामसुधार के साथ वैसे क्षणों की भी जिसे वे संगोपन की संज्ञा देते थे, प्रभा उससे शेयर करने लगी। बाद में वह उन्हीं प्रसंगों को रामसुधार को सुनाकर उन्हें भौंचक कर देता। रामसुधार संस्कारी प्रगतिशील थे, अतः सरेआम उन्हें प्रभा को छूने में भी सोचना पड़ता जबकि कमल मिश्रा को 'प्रभा दी' के कंधे पर हाथ रखकर चलने में कोई गुरेज न था। छोटा बच्चा। कभी-कभी तो रामसुधार किसी बात पर अपना हाथ उठाकर नीचे कर लेते थे। जैसे वे प्रभा के सिर पर हाथ फेरना चाहते हों, परंतु लोक-लिहाजवश ऐसा कर पाने में असमर्थ हों और कमल मिश्रा तब तक प्रभा के सिर पर हाथ फेर देते, क्यों यही करना चाह रहे थे न आप? रामसुधार ऊपर से तो मुस्कुराते परंतु अंदर से उसकी रफ्तार से भयभीत होते। अब कल को यदि उनकी इच्छा प्रभा को चूमने की हुई तो, फिर किसी दिन शादी के बाद... तो?

प्रभा कमल को पाकर निहाल थी। कमल घाट पर नहीं आता तो वह उत्सुकता से उसका इंतजार करती, उससे मिलने रामसुधार जाते तो वह पूछती, 'कमल नहीं आया?' रामसुधार जब तक इस चक्कर को समझते, एक और जबर्दस्त घनचक्कर हो गया! 'प्रभा दी' कहते-कहते एक दिन कमल मिश्रा को लगा कि प्रभा तो उसकी माँ जैसी देखभाल करती है, फिर माँ जैसी हो तो माँ ही क्यों नहीं। उसने प्रभा को मम्मी कहना शुरू किया। प्रभा पहले थोड़ी अकबकायी, लेकिन फिर एक रोमांचकता! उसने कमल को अपना बेटा माना ही नहीं बल्कि समूचे विभाग में ढिंढोरा पीट दिया, कमल उसका बेटा है। उसके कमरे में कमलेश गौतम के समय से बच्चे की जो तस्वीर थी, वह जैसे जिंदा हो गयी थी। प्रभा और उसका बेटा कमल। रामसुधार मिसिर इसमें जबर्दस्ती के बाप बने हुए थे। जब प्रभा के सामने कमल मिश्रा मुस्कुराकर उन्हें 'डैड' कहता तो एक मिनट में सैकड़ों बार 'डेड' हो जाते। उनसे महज दो-तीन साल छोटा उन्हीं की कद-काठी का युवक उनसे बराबरी का व्यवहार रखते हुए उनका बेटा बना हुआ था। उनके कंधे पर हाथ रखकर चलता हुआ, उनके सामने सिगरेट उड़ाया हुआ, अल्कोहलिक उत्तेजना में उनका साथ देता हुआ। कुल मिलाकर कहें तो उनकी छाती पर मूँग दलता हुआ।

लेकिन प्रभा को तो जैसे रोमांचकता का पिटारा मिल गया था। उससे महज चार साल छोटा उसका जवान लड़का। अब कमल मिश्रा को तिल की जरूरत होती, प्रभा ताड़ के लिए परेशान हो जाती, कमल आइसक्रीम की जिद करता, प्रभा उसे रेस्टोंरेंट लेकर जाती। वह सिगरेट पीना चाहता, प्रभा दारू के पैसे देती। रामसुधार असमंजस में थे, तनाव में थे। वैसे भी बेटा हो जाने के बाद बाप की पूछ कम ही होती है। यह कैसी उत्तर-आधुनिकता थी, उपभोक्तावाद का कौन-सा नया चेहरा था, एक भोली-भाली लड़की की इमोशन ब्लैकमेलिंग। उसे मम्मी कहकर उसके पैसों पर ऐश।

लेकिन रामसुधार को क्या? प्रभा को पैसे उसके माँ-बाप भेजते हैं। वह जिस पर चाहे उस पर खरचे लेकिन कमल के प्रति उसका यह अतिरिक्त उत्साह रामसुधार को निरुत्साही करता गया। प्रभा उनकी मनःस्थिति समझ रही थी। रामसुधार कहीं ऐसा-वैसा न समझने लगें, इसलिए वह हमेशा कमल को 'कम्मो बेटा' ही कहती और उसे भी इन्वॉल्व करने की कोशिश कि देखो तुम्हारा बेटा क्या कह रहा है?

गजब ड्रामा चल रहा था। रोज रामसुधार चौंकाने वाले दृश्यों के ठगे-से दर्शक की भूमिका में आते जा रहे थे। कम्मो बेटा पहले अपनी मम्मी के हाथ पकड़कर चलता था, अब कंधा। बेटे को माँ का प्यार पाने का पूरा हक होता है। लिहाजा बेबी किस। अब उस दिन ही कम्मो बेटा दो दिनों के लिए अपने असली माँ-बाप से मिलने जा रहा था। प्रभा देर तक उसे पुचकारती रही, जल्दी आने की हिदायत देती रही। बगल में बैठे रामसुधार सिगरेट पीते हुए सिगरेट की तरह सुलगते रहे। कमल थोड़ी देर में उठकर चला गया। न जाने क्यों प्रभा को लगा कि जाते हुए कम्मो बेटा की आँखों में आँसू थे। फिर क्या था, कमल बीस-पच्चीस कदम आगे जा चुका था, उसके पीछे दौड़ती-भागती प्रभा। घाट के सारे लोग 70 के दशक की फिल्मी नायिका की दीवानगी के उत्सुक दर्शक। रामसुधार का कलेजा लहकता चैला हो गया था। दस मिनट में प्रभा लौट आयी। आते ही कहा, 'बेचारा जाते हुए रो रहा था।'

रामसुधार के चेहरे पर बुद्ध की मुस्कुराहट थी। दिल-दिमाग सब पोखरण हो गया था। जब विस्फोट थोड़ा शांत हुआ, तब यथासंभव उन्होंने शीत लहजे में ही पूछा, 'क्या है यह सब?'

प्रभा रुआँसी हो उठी। रामसुधार को उस पर तरस आ गया। बेचारी हिरणी किस मृग-मरीचिका में दौड़ी जा रही थी। उन्होंने प्यार से उसे समझाया, 'देखो प्रभा, हम जिस समय में हैं, उसमें प्यार करना एक बड़ी बात है। तुम्हारे जितना करना तो और भी बड़ी बात। लेकिन जो प्रेमी-प्रेमिका होते हैं, वे सिर्फ यौनाकर्षण से बँधे नर-नारी नहीं होते। उनकी अनकहीं भूमिकाएँ भी काफी होती हैं। प्रेमी कभी प्रेमिका का बड़ा भाई हो सकता है, कभी पिता हो सकता है, कभी छोटा भाई हो सकता है, कभी पति तो कभी बेटा भी हो सकता है। उसी तरह प्रेमिका भी उसके लिए अलग-अलग भूमिकाओं में होती है, कभी छोटी बहन होती है, कभी माँ होती है, तो कभी नन्हीं बेटी भी हो सकती है।'

रामसुधार की बौद्धिकता पूरे शबाब पर थी। उन्होंने प्रभा की ओर ताका अपेक्षित प्रभाव देखने के लिए। प्रभा ने फिर शबाना आजमी की तरह सुना और स्मिता पाटिल की तरह पलकें झपकायीं! ...मीना कुमारी की तरह असमंजस में उसके शब्द निकले, लेकिन मैं कमल के बारे में वैसा नहीं सोचती जैसा तुम्हारे बारे में।

रामसुधार का दिमाग झन्न गया। वैसा नहीं सोचती? क्या मतलब है? वैसा भी सोच सकती है क्या? फिर भी अपनी झन्नाहट कम करते हुए बोले, 'मैं, कब ऐसा कह रहा हूँ? लेकिन क्या कमल की भूमिका से मेरी भूमिका में कोई कटौती नहीं हो रही है?'

इस समूचे भाषण का सारांश प्रभा के दिमाग में इतना ही आया कि रामसुधार का कहना है कि कमल की भूमिका को काटो। मतलब रोमांचकता पर हमला। उसने रामसुधार और कमल को अलग-अलग कोणों से देखा। कमल खूबसूरत है, बच्चा जैसा है, कहना मानता है, स्मार्ट है। रामसुधार! नाम भी मध्ययुगीन, सोच भी। बौद्धिकता का ऐसा प्रकोप कि रामसुधार नहीं, उदय प्रकाश हों (बौद्धिकता के प्रतीक के रूप में रामसुधार यही नाम अकसर लेते थे) उम्र में छोटे हैं, परंतु बड़प्पन की धौंस, फैसला कठिन न था।

दो दिनों तक प्रभा घाट पर नहीं आयी। रामसुधार आशंकित हुए कि शायद ज्यादा बुरा मान गयी हो। तीसरे दिन मनाने की मंशा से जब उन्होंने एक साथ 'टाइटैनिक' देखने का प्रस्ताव रखा, तब उसने प्रस्ताव खारिज कर सारे प्रसंग को ही टाइटैनिक बना दिया।

बड़े नपे-तुले शब्दों में उसने रामसुधार को जवाब दे दिया, 'अब मैं तुम्हारे साथ और नहीं चल सकती। तुम्हारे साथ क्या, इस तरह किसी के साथ नहीं।'

रामसुधार को इसकी आशंका न थी। उसके इस ठंडे बर्ताव से कुहककर बोले, 'लेकिन क्यों? कुछ कारण भी पता चले।'

'बस यूँ ही! समझ लो कि मैं तुम्हारे लायक नहीं।' रामसुधार को लगा यह आवाज पहले भी कभी सुनी है। उन्हें याद आया फिल्म 'दिल तो पागल है' के अंत में नायिका माधुरी दीक्षित यही संवाद कहती है।

इस कठिन समय में भी उन्हें मसखरी सूझी, नायक शाहरुख खान की तरह संजीदा होकर हाथ बढ़ाया 'रामसुधार! नाम तो याद होगा।'

प्रभा ने आराम से हाथ मिलाया, 'बिल्कुल।' रामसुधार को लगा, आखिर प्रेम-संबंध ऐसे थोड़े ही टूटते हैं। रामसुधार को अब भी सबकुछ ठीक हो जाने का विश्वास था। घाट पर बैठते हुए वे अब भी प्रभा का इंतजार करते। सप्ताह भर बाद प्रभा आयी तो कमल उसके साथ था। वे लपककर दोनों के पास गये। प्रभा उनके सामने निरपेक्ष खड़ी रही। मुस्कुराने की कोशिश में रामसुधार दयनीय लगने लगे। थोड़ी देर बाद वे पुनः वापस लौटे। उस रात कमल ने उनके छात्रावास में उनसे देर तक बात की। इस बात पर गुस्सा थी कि मम्मी से उसके बारे में कोई सवाल नहीं करना चाहिए था और अंत में एक अनुभवी डॉक्टर-सा मरीज रामसुधार के कंधे पर हाथ रखकर आश्वासन, 'घबराइए मत डैड! मैं सबकुछ ठीक कर दूँगा।'

रामसुधार को अब भी अपनी आवाज और शब्दों के जादू पर भरोसा था। उन्हें विश्वास था कि प्रभा उनकी कही बातें भूल नहीं पायी होगी, नहीं भूल पायी होगी कि प्रभा को उन्होंने वह अनुभूति कहा था जो पैरों में छोटे जूते पहनने के बाद हुए घावों को सहलाने से होती है। अपने लिए कोरामिन की संज्ञा दी थी उसे।

वह जब भी प्रभा के सामने खड़े होते, उन्हें लगता कि उसे वे सब बातें याद होंगी उसका उनकी बाँहों पर दाँत गड़ाना, जाँघों पर नाखून फिराना, लेकिन आँखें फाड़-फाड़कर देखने के बावजूद उन्हें उन यादों की कोई जुंबिश न दिखती, उसकी आँखों में।

रामसुधार को अपनी सारी जिंदगी निरुद्देश्य लगने लगी। लोग अब उनसे प्रभा की बेवफाई की चर्चा करते। वे चुपचाप अपराधी की तरह सिर झुका कर सुनते। उनके मित्र उनके सामने कविता ओर प्रभा की तुलना करते, प्रभा को गालियाँ देते। वे कोई भी टिप्पणी कर पाने में असमर्थ रहते।

वे किसी भी तरह प्रभा की निकटता चाहते। थे। दोस्त बनकर ही सही। दोनों को साथ बैठे देख वे उनके पास चले जाते। प्रभा कमल से बोटिंग पर चलने को कह देती। कमल उनसे नजर बचाता निकल जाता। वह अपनी दयनीय स्थिति दिखाकर प्रभा से सहानुभूति की उम्मीद रखते। प्रभा की बातों से लगता, उसे इससे क्या।

उनके मित्र प्रभा-कमल के बारे में तरह-तरह की बातें करते। वे दुखी होते, लेकिन मानने को तैयार न थे। उन्होंने एक घोषित कम्युनिस्ट मित्र से इसकी चर्चा भी की। उन्होंने भी आश्वस्त किया कि वे दोनों ज्यादा देर तक आगे नहीं बढ़ पाएँगे। यदि उनके बीच ऐसी-वैसी बात हुई भी तो, यदि एक भी ईमानदार होगा, तो वह दूसरे दिन सल्फास ढूँढ़ेगा।

रामसुधार दोनों में से किसी के सल्फास ढूँढ़ने की प्रतीक्षा करते रहे और खुद उनकी जिंदगी सल्फास खाते मरीज की-सी होती रही। प्रतिदिन भाँग का सेवन करने लगे। फाइनल के पेपर्स गड़बड़ाये। कई प्रतियोगी परीक्षाओं में भी बुरी तरह लुढ़के। फिर भी वे अकसर कहते, 'जब जिंदगी की परीक्षा में ही लुढ़क गये। तो...।'

कमल के व्यवहार में जबर्दस्त परिवर्तन हो रहा था। अब वे डैडी से भैया, फिर रामसुधार जी हो गये थे। रामसुधार तिलमिला कर उसे जोर से बेटा कहते तो उसकी आँखों में झुँझलाहट आ जाती।

अब दोनों क्या बात करते हैं, रामसुधार को जिज्ञासा बनी रहती। उनके हितचिंतकों ने बताया कि दोनों प्रेमी-प्रेमिका की तरह बातें करते हैं। कमल की बातों में भी 'प्रभाजी' का नाम शुमार होने लगा।

एक दिन उनके दोस्तों ने बताया कि प्रभा कमल के कमरे में गयी है। रामसुधार रात भर अपने दोस्तों के साथ लौटने वाले रास्ते पर रहे। सुबह तड़के प्रभा कमल के साथ आती दिखी। उसके अंग-अंग से थकावट चू रही थी। उसके चेहरे पर फिर एक रोमांचकता को जीने की खुशी थी। उससे चार साल छोटा लड़का। पहले भाई, फिर बेटा, फिर धीरे-धीरे दिल में उसके लिए मुहब्बत, फिर कशमकश फिर मन-ही-मन इनकार, अंत में इकरार, गजब।

रामसुधार ने दोनों को देखा और सिर्फ थूक दिया। एक असत्य-सा सत्य उनके सामने था। किस दौर में दौड़ रहे हैं हम। संबंधों की भूमिका सिर्फ संबोधन तक है, उसकी भावनात्मकता से कोई मतलब नहीं? बहन-माँ के बाद प्रेमिका फिर पत्नी उन्हें कमल मिश्रा-प्रभा से बेतरह घृणा होने लगी। सारा वातावरण उन्हें एक जुगुप्सा से भरने लगा। वे सिहर उठे।

वातावरण अब भी ज्यादा नहीं बदला है। रामसुधार धीरे-धीरे अपने को सँभाल रहे है। उनके शब्दों में वे अपने को रिआर्गनाइज कर रहे हैं। वही घाट है। वही विश्वविद्यालय है। प्रभा कमल के साथ वहीं बैठती है, जहाँ रामसुधार के साथ बैठती थी। रामसुधार उससे थोड़ी दूर पर अपने 'फोसला मेंबर' दोस्तों के साथ बैठते हैं और दोनों को हँसते-खिलखिलाते देख टिप्पणी करते है, 'मनुष्य के पतन की कोई सीमा नहीं होती।'

इस समूचे प्रसंग को जब कोई रामसुधार से विश्लेषित करने को कहता है तो उपभोक्तावाद, उत्तर-आधुनिकता, विखंडनवाद कई चीजें एक साथ गड्ड-मड्ड हो जाती हैं। इधर कई दिनों से वे इस समूचे प्रसंग पर कोई कहानी लिखने की सोच रहे हैं। उन्हें विश्वास हो रहा है कि अनुभव की यह विलक्षणता उन्हें समकालीन साहित्य में अपेक्षित स्थान दिला सकती है। उनके मित्र उनका हौसला बढ़ाते हैं और अकसर समझ नहीं पाते कि जब अनुभव के नाम पर उन्हें इतनी नायाब चीज मिल गयी है तो प्रभा को एकटक देखते हुए और कविता के बारे में सोचते हुए अब भी उनकी आँखें छलछला क्यों जाती हैं...?

 

( शीर्षक केदारनाथ सिंह कि कविता से लिया गया है। उनके प्रति आभार के साथ - कथा लेखक )


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