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कविता

हादसा
चंद्रकांत देवताले


मुझे सात नवंबर को मरना था
मैं चार दिन पहले ही मारा गया

मैं अपने घर में मरा
झूठ और मक्कारी आदमी को कहीं भी दबोच सकती है
मैं पी रहा था तभी मेरी हत्या की कार्रवाई
शुरू हो गई थी जिससे मैं बेखबर था

छुट्टी के दिन जब खुशी को कोई आदमी
जाड़े के कोट की तरह पहनने को आमादा हो

और तभी उसकी बाँहें इत्मीनान से काट दी जाएँ
मेरे साथ इतवार की रात ऐसा ही हुआ
बस मैं उठकर रोटी तोड़ने जाने ही वाला था
कि मेरा गिलास झन्ना कर बिखर गया

यह गोली कहाँ से दागी गई थी
मैं अंतिम क्षण तक नहीं जान पाया

बस मुझे इतना होश रहा
कि जल्दी की गई और थोड़ी ज्यादती भी
सात नवंबर को तो मुझे मरना ही था
और तीन को ही यह हादसा हो गया

 


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