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कविता

बाई दरद ले!
चंद्रकांत देवताले


तेरे पास और नसीब में जो नहीं था
और थे जो पत्थर तोड़ने वाले दिन
उस सबके बाद
इस वक्त तेरे बदन में धरती की हलचल है
घास की जमीन पर लेटी,
तू एक भरी पूरी औरत
आँखों को मींच कर
काया को चट्टान क्यों बना रही है

बाई! तुझे दरद लेना है
जिंदगी भर पहाड़ ढोए तूने
मुश्किल नहीं है तेरे लिए
दरद लेना

जल्दी कर होश में आ
वरना उसके सिर पर जोर पड़ेगा
पता नहीं कितनी देर बाद रोए
या ना भी रोए
फटी आँख से मत देख
भूल जा जोर जबरदस्ती की रात
अँधेरे के हमले को भूल जा बाई

याद कर खेत और पानी का रिश्ता
सब कुछ सहते रहने के बाद भी
कितना दरद लेती है धरती
किस किस हिस्से में कहाँ कहाँ
तभी तो जनम लेती हैं फसलें
नहीं लेती तो सूख जाती सारी हरियाली
कोयला हो जाते जंगल
पत्थर हो जाता कोख तक का पानी

याद मत कर अपने दुःखों को
आने को बेचैन है धरती पर जीव
आकाश पाताल में भी अट नहीं सकता
इतना है औरत जात का दुःख
धरती का सारा पानी भी
धो नहीं सकता
इतने हैं आँसुओं के सूखे धब्बे

सीता ने कहा था - फट जा धरती
ना जाने कब से चल रही है ये कहानी
फिर भी रुकी नहीं है दुनिया

बाई दरद ले!
सुन बहते पानी की आवाज
हाँ! ऐसे ही देख ऊपर हरी पत्तियाँ
सुन ले उसके रोने की आवाज
जो अभी होने को है
जिंदा हो जाएगी तेरी देह
झरने लगेगा दूध दो नन्हें होठों के लिए
बाई! दरद ले

 


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