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कविता

ताकि सुन पाऊँ ठीक से चुटकुला
चंद्रकांत देवताले


छाती पर रात पहाड़ जैसी
और आटे में नमक जितनी
चुटकी भर नींद
गुंडी में पानी नहीं कटोरी भर भी

कोशिश कर रहा फिर भी
उस अपने को देखने की
जो वह देख रही
और सपने ही में कह रही
मैं भी देखूँ जिस हालत में
जहाँ हूँ वहीं से...

मैं चिल्ला रहा -
तुम भी वहीं से थोड़ी मदद करो
खींच लो परदा बादल का
जो पड़ा मेरी आँखों पर
और बोलो थोड़ी ऊँची आवाज में
ताकि सुन पाऊँ ठीक से चुटकुला
जिससे तुम टाँका लगाना चाह रही
मेरे वीरान हो चुके जख्म पर ।

 


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