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कहानी

पिशाची
पांडेय बेचन शर्मा उग्र


बाबू श्रीलाल ने अभिवादनोपरांत अपने मित्र रामनाथ के नख-शिख का निरीक्षण किया। और फिर किंचित आश्‍चर्य से चमक उठे - 'वाह भई, अभी तक यह होलीवाला कुरता बदला नहीं? अजीब देहाती हो। शहर के लोगों ने रास्‍ते में तुम्‍हें देखकर क्‍या समझा होगा? और - अररर! जरा पीछे की ओर घूम तो जाओ। नहीं घूमते? मुझे इस तरह घूर क्‍यों रहे हो? लो, अगर पीछे घूमने में तुम्‍हारी नजाकत को ठेस लगने का अंदेशा है, तो मैं ही घुमाए देता हूँ।

'आ...हा! भले बने हो नाथ!' दोनों कंधे पकड़, बरबस रामनाथ को पीछे मोड़कर और उन्‍हें एँड़ी से चोटी तक पान-पीक रंजित, कीचड़-कर्दम से रंगे देखकर श्रीलाल ने व्‍यंग्‍य किया।

मानो यह व्‍यंग्‍य रामनाथ की स‍हन-शक्ति से अधिक था। वह एक बार आवेश से दमककर नीरस गंभीरता से बोले - 'मैं तुम्‍हें उलाहना देने आया हूँ।'

'देना उलाहना।' अपनी अस्‍वाभाविक गंभीरता से श्रीलाल ने कहा - 'मगर पहले मेरे महज एक सवाल का जवाब दे लेने के बाद। यह बताओ कि यह किस ग्रामीण प्रेयसी ने तुम्‍हारे यशः शुभ्र परिधान का कीचड़ उछाला है, और यह मल-मूत्र आपको इतना प्रिय क्‍यों है, जो आप इसे इतने दिनों बाद भी अपनी पीठ पर लादे फिर रहे हैं?'

'बनो मत श्रीलाल!' रामनाथ ने सावेश उत्तर दिया - 'तुम सब कुछ मजे में जानते हो। जो मोटर पर बैठकर मटरगश्‍ती करना जानता है, वह उसके उछले हुए कीच-कर्दम को यदि न पहचाने, तो यह घोर लज्‍जा का विषय है।'

'अच्‍छा!' जैसे जरा सावधान होकर पुनः रामनाथ के रंगीन कपड़े देखने लगे - 'यह मोटर की माया है। है तो बेशक वैसी ही जरूर, मैंने पहचानने में जल्‍दी और देखने में भूल की। कितनी भी कोई प्रेयसी या ग्रामीण हो, तुम-से भले आदमी पर कोई इस तरह गंदा कीचड़ नहीं डाल सकती। ओह! छिः-छिः! अब तो घृणा लगती है, न-जाने किस बेवकूफ की मोटर थी, और न-जाने कौन अंधा उसे 'ड्राइव' कर रहा था। यदि मेरे कपड़े इस तरह खराब हुए होते, तो - खुदा कसम! मोटरवाले को मैं जूता खींचकर मार देता। किसकी गाड़ी थी? तुमने नंबर क्‍यों नहीं नोट कर लिया?'

'झूठ न बोलो श्रीलाल, तुमने सब कुछ देखा था, और उस पर भी मोटर-सवारी के मद में मुस्किराते हुए सर्र से निकल गए थे - कल आठ बजे रात लालगंज की चौमुहानी के बाएँ मोड़ पर। याद पड़ी? सोचो, वह तुम्‍हीं थे न, या तुम्‍हारा शैतान - एक और आदमी के साथ - उस मोटर पर जा रहा था। मुझे देखकर भी तुमने नहीं देखा था। शायद इसलिए कि तुम मोटर पर और उस हैटधारी गोरे की बगल में थे। दूसरे की मोटर पर तुम्‍हारे मिजाज का पारा जब इतने ऊँचे उठ गया था, तब यदि कभी तुम्‍हारी अपनी गाड़ी होगी, तो क्‍या करोगे! मैं तो इसी चिंता से कल रात ही से, हैरान हूँ। मुझे याद है, किसी दिन तुमने कोई सेकेंड-हैंड 'कार' खरीदने की इच्‍छा प्रकट की थी। बात मानो, अब ऐसी गलती मत करना, नहीं तो मोटर खरीदते ही तुम्‍हारा मिजाज ऐसा बिगड़ जाएगा कि बिना दो-चार खून किए तुम मानेगे नहीं। दिल्‍लगी समझकर मुस्किराओ मत। मैं सच कहता हूँ।'

श्रीलाल अपनी निंदा सुन सकते थे, मोटर की नहीं; क्‍योंकि फिलहाल उनका प्रेम सब स्‍थानों से हटकर मोटर ही में आकर एकत्र हो गया था। वह मोटर को आधुनिक सभ्‍य संसार में विभूति-विलास का अन्‍यतम साधन समझते थे। उन्‍होंने कहा - 'देखो जी, जब तुम मोटर की निंदा करने लगते हो, तब मुझे ऐसा लगता है, मानो तुम्‍हारी दुर्बलता तुम्‍हारे सिर चढ़कर बोल रही है। यह अनमिले का संन्‍यास मैंने बहुत देखा-सुना है, नहीं तो इस जमाने में मोटर के खिलाफ तो कोई कुछ कह ही नहीं सकता। तुमने सुना है, पढ़ा है कि नहीं? राष्‍ट्र-भाषा, हिंदी के किसी पुरातन-पंथी कवि ने मोटर का वर्णन करते हुए उसकी तुलना चंचला लक्ष्‍मी से की है, पूर्ण रूपक बाँधा है। मुझे वह दोहा बहुत पसंद है। सुन लो -

अति चपला, अति चंचला, सदा नेह-आधार;

चक्र-पाणि-अनुगामिनी, रमा? कि मोटरकार?'

'मालूम पड़ता है,' रामनाथ ने कहा - 'इस दोहे का निर्माता लक्ष्‍मी का बड़ा भक्‍त है। अजी हजरत, महज रमा-सी होकर कोई महिमामयी नहीं बन सकती। तुम्‍हारे दोहे के कवि से भी किसी पुराने ने कहा है, और खूब कहा है - 'हलाहलं नैव विषं, विषं रमा।' और, रमा, चाहे उतनी विषवती न हो, पर यह मोटर तो सर्पिणी से अधिक जहरीली, व्‍यार्घिणी से अधिक हिंस्रिणी, मतवाले शराबी से अधिक उन्‍मादिनी और धर्मांधों से भी अधिक दूसरों पर कीचड़ और धूल उछालनेवाली है।'

'मोटर से इस बीसवीं शताब्‍दी को अनेक लाभ हुए और हो रहे हैं। रेल रहे या उलट जाय, एक मोटर ही विश्‍व के कोने-कोने तक लोगों को पहुँचा सकती है। कोई बीमार पड़े और पचास कोस पर भी योग्‍य डॉक्‍टर हो, तो वह चुटकियों में प्राप्‍त हो सकता है। जीवन का सुख लेने के लिए तो यह अभूतर्पूव संगिनी है। मेरा तो खयाल है - यार हो, गुलजार हो, मय हो, फिजाँ हो, मैं हूँ, और मेरी मोटर हो, तो फिलहाल मुझे स्‍वराज्‍य की उतनी जरूरत नहीं। मैंने अनेक मोटरवालों को टटोल देखा है। जीवन-व्‍यापार की दृष्टि से चाहे वह 'स्‍वराज्‍य! स्‍वराज्‍य!' दिन में दस-पाँच बार पुकार लें, पर उनके भीतर के भीतर में स्‍वराज्‍य की न तो वैसी कामना है, जैसी मोटरबाजी की, और न जनता के दिल में पैठने की वैसी चाह है, जैसी मोटर में बैठने की। अस्‍तु महोदय! कीचड़ पड़ गया है, तो कुरता उतार दीजिए, धोती के भी बाहर हो जाइए, मैं सब धुलाए देता हूँ। साथ ही दंड-स्‍वरूप उसी मोटर पर चढ़कर घूमने के लिए आपको न्‍योता भी देता हूँ, जिसके चंचल, चारु चरणों के पंक से आपके वस्‍त्र चर्चित हो गए हैं। अब वह मोटर मेरी है। मेरे साथ कल जिस गोरे को आपने देखा था, वह यहाँ के मशहूर इंजीनियर मिस्‍टर फारेस्‍टर थे। उन्‍हीं से वह मैंने खरीदी है। नया मॉडल 'ब्‍यूक' है। गाड़ी केवल एक वर्ष उनके यहाँ रही है, बहुत कम चली है। नई 'ब्‍यूक' पाँच हजार से अधिक में ही मिलती है। मिस्‍टर फारेस्‍टर ने दो हजार तीन सौ रुपए में मुझे वह गाड़ी दी है। कल मैं उसका ट्रायल ले रहा था। अभी बिलकुल नई है - लकदक। आज शाम को चलकर देखो, अजीब गुदगुदी-भरी है वह गाड़ी। चढ़ते ही ऐसा लगता है, मानो आसमान पर चढ गए। क्‍या...? माफ करो, अब ज्‍यादा प्रश्‍नोत्तर नहीं। भिखना - अरे भिखना! एक धोती ला, और मेरे संदूक से वह नया कुरता भी निकाल ला।'

श्रीलाल अपने हाथ से रामनाथ के कुरते के बटन खोलने लगे। क्षण-भर के लिए अमीर के शिष्‍टाचार में गरीब का उलाहना घुल गया।

शाम के ठीक छह बजे शोफर ने गाड़ी लाकर बाबू श्रीलाल के दरवाजे पर खड़ी की, और फिर बैठक में जाकर सलाम करते हुए निवेदन किया - 'मोटर तैयार है।' तुरंत ही रामनाथ के साथ श्रीलाल बाहर आए। शोफर ने उनके लिए गाड़ी का दरवाजा खोल दिया। वह बैठे। सेल्‍फ-स्‍टार्टर-संपन्‍न गाड़ी क्षण-भर बाद ही, शहर की सड़क पर, सर्पिणी-सी सर्र-सर्र सरकने लगी। आँधी-सी उसकी गति थी, चिंघाड़ती सिंहनी-सा उसका स्‍वर। उसके चलते ही जैसे आस-पास का वातावरण काँपने लगा।

'कहो।' श्रीलाल ने मोटर के एक कोने में नजाकत से उँठगते हुए पूछा - 'कैसी चाल है?'

'बहुत अच्‍छी। यह तो नाम-मात्र को सेकेंड हैंड कार है; असल में बिलकुल न्‍यू। मगर एक बात है...।'

'वह भी कहो।'

'मोटर पर बैठने से ऐसा अवश्‍य लगता है, गोया इंद्रासन पर बैठा हूँ। रास्‍ते के अन्‍य राहगीर तुच्छ मालूम पड़ते हैं। मन में अनायास ही आत्‍माभिमान का शैतान मस्‍ती से मुस्किराने लगता है।'

'गप्‍पी हो, कमजोर-दिल हो, और बनते भी हो। मैं तो केवल आनंद लेता हूँ। मेरे मन मे न तो शैतान मुस्किराता है, और न इंसान।'

इसी समय किसी राहगीर पर सेरों धूल मोटर के पहियों से उड़कर पड़ी, इसे रामनाथ ने देखा। श्रीलाल का ध्‍यान भी पथिक के क्रुद्ध मुख की ओर आकर्षित किया।

'क्‍या है?'

'सुनो वह गाली दे रहा है।'

'मोटर पर बैठकर कम्‍यूनिज्‍म सोचना और परिस्थिति से परेशान राहगीरों की नाक-भौं के उत्‍थान-पतन पर ध्‍यान देना मूर्खता है। यहाँ तो आनंद-ही-आनंद का खयाल मुनासिब है।'

'ओ ओ ओ!' शोफर को लक्ष्‍य कर रामनाथ चिल्‍ला उठे - 'बचाना उस बोझवाले को।'

'ए...सु...अ...र!' शोफर ने अपनी ड्यूटी अदा की - 'बहरा है साला, सुनता नहीं।'

बेचारा बोझवाला, प्राण बच जाने से प्रसन्‍न और मुफ्त की गालियों से क्षुब्‍ध, क्षण-भर के लिए खड़ा हो गया, और मोटरवालों को इस तरह गरेरने लगा, जिसका आशय था - 'बच्‍चू, सड़क पर उतरकर जबानी कैंची चलाओ, तो सारी मोटरबाजी ठेंगे में मिला दूँ -।'

रामनाथ ने असंतुष्‍ट भाव से शोफर की शाब्दिक प्रतारणा की - 'गाली क्‍यों देते हो? एक तो अंधाधुंध हाँकोगे, और उस पर गाली।'

'अरे हुजूर, ये पैदल चलनेवाले निरे लट्ठ होते हैं। इन्‍हें यह तमीज ही नहीं होती कि सड़क पर आदमी ही नहीं, गाड़ियाँ और मोटरें भी चलती हैं। अभी कुचल जाता, तो? जान तो मेरी मुसीबत में पड़ जाती।'

'इसीलिए मैं तो कभी-कभी यह सोचा करता हूँ कि मोटरों के लिए सड़कें ही अलग होनी चाहिए। और सर्वसाधारण के रास्‍ते में मोटरें न चलनी चाहिए। इससे केवल चंद पैसापतियों को मजा मिलता है, और गरीबों की जान खतरे में रहती है।'

रामनाथ ने श्रीलाल से पूछा - 'यह शोफर कहाँ का है?'

'जहाँ की गाड़ी हुजूर!' स्‍वयं शोफर ने उत्तर दिया - 'छह महीने से मैं फारेस्‍टर साहब की नौकरी में था, अब गाड़ी के साथ ही सरकार के यहाँ चला आया हूँ।'

'अच्‍छा जी!' रामनाथ ने शोफर से पूछा - 'तुम्‍हें कुछ मालूम है, साल-भर में इस गाड़ी ने फारेस्‍टर साहब के यहाँ कितने खून किए हैं?'

'हा...हा...हा!' श्रीलाल हँसने लगे - 'अरे यार, सब गाड़ियाँ खूनी नहीं होतीं। इससे एक भी 'एक्‍सीडेंट' आज तक नहीं हुआा'

'नहीं हुजूर!' शोफर मोटर का हैंडिल सँभालते हुए बोला - 'इस नजर से यह बड़ी ही खराब गाड़ी है। इसीलिए तो साहब ने इसे पानी के दामों में निकाल दिया है। एक ही वर्ष में इस गाड़ी से तीन एक्सिडेंट हुए। एक बार एक कुत्‍ता दबकर मर गया, उस वक्‍त खुद इंजीनियर साहब हाँक रहे थे और दूसरी बार एक गाय रवारवी में सड़क न लाँघ सकने के कारण फूट की तरह बिखर गई। तीसरी बार एक किसान की जान जाते-जाते बची। इन्‍हीं घटनाओं के कारण साहब ने इस गाड़ी को हत्‍यारिणी समझ लिया था।'

'सुनते हो।' रामनाथ ने श्रीलाल को छेड़ा - 'आप अहिंसावादी और हिंदू होकर ऐसी सवारी पर चल रहे हैं, जिसने श्‍वान-हत्‍या और गो-हत्‍या तक की है। ओह! उतारो मुझे। मैं बाज आया इस राक्षसी आनंद से। यह मोटर नहीं, पूरी दानवी है।'

इस बार श्रीलाल भी जरा प्रभावित हुए - 'क्‍यों जी,' उन्‍होंने शोफर से पूछा - 'क्‍या सचमुच इस गाड़ी से गो-हत्‍या हुई है?'

'जी हाँ हुजूर! इसमें झूठ बोलने की क्‍या बात है। मगर आज तक आपके एकबाल से मेरे हाथों एक भी दुर्घटना नहीं घटी।'

'यह कोई आश्‍चर्य की बात नहीं।' रामनाथ ने कहा - 'अभी तो इस गाड़ी की उम्र बहुत है, और तुम्‍हारी भी। समयानुसार यह हौसला भी पूरा हो जायगा। मेरा तो यह अनुमान है कि प्रत्‍येक मोटर यमराज की दूतिका है, मृत्‍यु की बहन है। दुनिया की हर मोटर-गाड़ी के पहिए बेकसूरों के खून से रँगे हैं।'

'झूठी बात - झूठी बात!' श्रीलाल आवेश में आ गए - 'कहाँ का मैं तुम्‍हें घुमाने लाया! ऐसा रोना तुमने शुरू किया कि सारा मजा मि‍ट्टी हो गया। अजी हजरत! मोटर हत्‍या ही नहीं, उपकार भी करती हैं। महात्‍मा गांधी और उनके लेफ्टिनेंटों से मोटरों की महिमा पूछिए।'

'पूछिए आप। मैं सब कुछ पूछ चुका हूँ। स्‍वयं महात्‍माजी के माथे पर मोटर की एक हत्‍या नाच रही है। तुम तो शायद अखबार पढ़ते ही नहीं। भूल गए, उस पहाड़ी ठाकुर की मृत्‍यु, जिसके सिरहाने अस्‍पताल में बैठकर महात्‍माजी मोटरों की निंदा कर चुके हैं?'

श्रीलाल निरुत्तर-से हो गए। धीरे-धीरे जैसे रामनाथ की तर्क-प्रणाली का उन पर प्रभाव पड़ने लगा। कम-से-कम इस हत्‍यारिणी मोटर के खरीदने का पश्‍चात्ताप मन में अवश्‍य होने लगा। रात अँधेरी थी, और सड़क पर दोनों ओर के गुंजान वृक्षों के कारण अंधकार का आकार भी विकराल हो उठा था। सामने से एक मोटर आती दिखाई पड़ी। श्रीलाल ने देखा, उसके दोनो प्रकाशक नेत्र ऐसे लगते थे, जैसे किसी राक्षसी के! राक्षसी? हत्‍यारिणी? श्रीलाल के रोंगटे अनायास ही खड़े हो गए। उधर से आनेवाली मोटर इधरवाली पर पसेरियों धूल उछालकर साफ निकल गई। श्रीलाल और रामनाथ मुँह पर रूमाल लगाकर रह गए। इसी समय बीच सड़क पर किसी के कराहने की आवाज सुनाई पड़ी। शोफर ने तेज रोशनी से सड़क की जाँच की। देखा, एक छोटा-सा मनुष्‍य एक ओर पड़ा मुर्ग-बिसमिल-सा तड़प रहा था। रामनाथ ने भी देखा, श्रीलाल ने भी। दोनों ने एक साथ ही शोफर को ललकारा - 'गाड़ी रोको। मालूम पड़ता है, जाने वाली मोटर खून करती गई है।'

गाड़ी रोककर तीनों ने देखा, कोई गरीब देहाती बालक कमर तक कुचला, अर्धमृतकावस्‍था में तड़प रहा था।

'क्‍या हुआ रे!' शोफर से पूछा।

मुँह से कुछ न बोलकर जानेवाली मोटर की दिशा में बेचारे बालक ने संकेत-मात्र कर दिया।

'ओह! रामनाथ उबल पड़े - 'हत्‍यारे, कायर! पाजियों ने मुड़ कर देखा भी नहीं। नाश हो ऐसे हरामजादे मोटरवालों का।'

'कहाँ का रहनेवाला है रे?' शोफर ने पुनः प्रश्‍न किया।

'मधुपुर का...' धीरे से बालक ने उत्तर दिया। उसका तड़पना देखकर दर्शकों का कलेजा मुँह को आने लगा।

मधुपुर पास ही का एक गाँव था। शोफर से समाचार पाकर शत-शत ग्रामीण स्‍त्री-पुरुष घटना-स्‍थल पर दौड़ आए। कुशल इतनी ही हुई कि दम तोड़ने के पूर्व बालक ने अपने पिता को बता दिया कि वह श्रीलाल की गाड़ी से नहीं घायल हुआ था, असली हत्‍यारिणी तो फरार हो गई।

बालक के दुःखद और करुण अंत पर सारा गाँव रोने लगा, माताएँ अपने बच्‍चों को छाती से चिपकाकर सिसकने लगीं। श्रीलाल भी भर उठे थे, छलक पड़े।

दूरी अधिक होने पर भी श्रीलाल ने पैदल ही घर लौटने का निश्‍चय किया, और निश्‍चय किया कि अब वह कभी...।


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