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कविता

औरत
दिविक रमेश


वहाँ भी आग है
कहा किसी ने
मैंने पूछा
सबूत?
उठता हुआ धुआँ
दिखा दिया उसने।
क्या उसे
सच में नहीं मालूम
वहाँ
बटोरी गई
गीली-सूखी लकड़ियों से खप रही
एक औरत है --
सदियों से / आग के लिए
धुएँ से लड़ रही
एक औरत।

 


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हिंदी समय में दिविक रमेश की रचनाएँ