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कहानी

परदा
सुधाकर अदीब


शकुंतला देवी जब घर के कामकाज से ऊब जातीं या फिर उनके स्कूल में अवकाश होता तो वह मोहल्ले के दो ही घरों में जाती थीं। एक सहाय साहब का घर, दूसरा फारुख मियाँ का घर। सहाय साहब के घर अक्सर और फारुख मियाँ के यहाँ छठे-छमाहे।

बात यह थी कि शकुंतला देवी और फारुख मियाँ के मकान का पिछवाड़ा आपस में सटा हुआ था। दोनों मकानों के ऊपर की छतें जुड़ी हुई थीं। बीच में केवल एक कॉमन दीवार थी।

अक्सर मुँडेर पर से फारुख मियाँ की दोनों बेटियाँ फरहा और तबस्सुम शकुंतला चाची से या मुन्नी से शाम के वक्त झाँक-झाँक कर बातें किया करती थीं। दोनों लड़कियाँ अत्यंत गोरी और गुलाब की पत्ती की तरह सुंदर थीं। दोनों काफी शोख और नटखट भी थीं। उन्हें शकुंतला देवी ने बचपन से किशोर होते हुए देखा था। अगर वह मुसलमान न होती तो शकुंतला देवी का बस चलता तो उनमें से किसी एक से अपने बिट्टू का ब्याह रचा देतीं।

छत पर कभी-कभी फरहा और तबस्सुम की भाभी भी आ जातीं। उस दिन मुन्नी को दुगना मजा़ आ जाता। नजमा भाभी से बड़े गुर की बातें सुनने को मिल जाया करती थीं। नजमा भाभी, मुन्नी को अकेला पा जाने पर उतनी ही दिलचस्प हो जाती थीं। अपने और जावेद भाई के शादी से पहले के रोमांस के किस्से बड़े चटकारे ले कर सुनाती थीं वह।

लालजी को लखनऊ गए पूरा एक हफ्ता हो गया था। मुन्नी भी अभी वहाँ से वापस नहीं आई थी। बिट्टू तो इन दिनों अपने मामा के संरक्षण में था। सूना घर शकुंतला देवी को काटने को आता था। आज इतवार का दिन था। दोपहर के दो बजे थे। शकुंतला देवी ने शॉल लपेटा। घर को ताला लगाया और फारुख मियाँ के घर चली गईं।

तबस्सुम ने दरवाजा खोला। शकुंतला देवी को देख कर बोली - 'सलाम आंटी... आइए... आइए।'

शकुंतला देवी ने कहा - 'खुश रहो... कहाँ हैं सब लोग?'

तबस्सुम ड्योढ़ी से रास्ता दिखाते हुए आंटी को भीतर ले चली। वह एक साँस में कह रही थी -

'फरहा पड़ोस में गई है... नजमा भाभी अपने कमरे में हैं। अम्मी आँगन में बैठी हैं... बाकी सब काम पर गए हैं...'

'हाँ-हाँ और तू... तू क्या कर रही है बेटी?'

'मै? ...मैं तो कबूतरों को दाना चुगा रही थी।'

दोनों जनों ने एक गलियारा क्रॉस किया और मकान के बड़े आँगन में प्रवेश कर गईं। आँगन के इस सिरे पर वाकई अनेक कबूतर फर्श पर बिखरा दाना चुग रहे थे। शकुंतला देवी के कदमों की आहट सुन उनमें से आधे फड़फड़ा कर उड़े, फिर साथ में तबस्सुम को देख कर, पुनः बैठ कर दाना चुगने तथा साथ में 'गुटरगूँ-गुटरगूँ' का स्वर निकाल कर, अपनी खुशी जाहिर करने लगे। उनमें से कुछ कबूतर जंगली थे, और कुछ कबूतर सफेद।

शकुंतला देवी कबूतरों की जमात से थोड़ा बचती हुई उस ओर बढ़ीं जिस ओर फारुख मियाँ की बेगम जोहरा आपा आँगन में एक पलँग पर बैठी थीं। आँगन काफी बड़ा था। एक नौकरानी जोहरा बेगम के सिर में तेल लगा रही थी। शकुंतला देवी को देखते ही वह बोली -

'अरे आइए भाभी जान! ...आदाब! ...आखिर आ ही गई आपको याद हमारी...?'

'नमस्कार!... कैसी हैं आपा?'

'इनायत है... आप सुनाइए कैसी हैं?'

'ठीक ही है सब।'

नौकरानी ने मेहमान के लिए एक मोढ़ा ला कर रख दिया। जोहरा बेगम ने नौकरानी से कहा - 'अब तू जरा छत पर चली जा। ...गेहूँ सूख रहे हैं। उन्हें देख।'

नौकरानी चली गई। जोहरा आपा इसके बाद शकुंतला देवी से मधुर स्वर में बोलीं...

'इधर बहुत दिनों से निकलना नहीं हुआ आपका?'

यद्यपि जोहरा बेगम को उनके परिवार के साथ बीते हादसे का पता था। फारुख मियाँ ने उन्हें सब कुछ बता दिया था कि उनके बेटे को एक झूठे मुकदमे में लोकनाथ पंसारी के लड़के ने फँसा दिया था। मगर जोहरा अपनी ओर से कुछ कह कर शकुंतला का दिल नहीं दुखाना चाहती थीं।

शकुंतला देवी को स्पष्ट वाचन में किंतु कोई कठिनाई नहीं थी।

उन्होंने कहा -

'उस दिन भाई साहब ने हमारी बहुत सहायता की। ...अगर वह न होते तो हमारे बिट्टू की जमानत में हमारे ये तो कतई कुछ न करते...'

'अरे नहीं-नहीं भाभी! ...ये कोई खास बात नही है। अल्लाह न करे कभी किसी के ऊपर बुरा वक्त आए... वो तो जो भी हो फरहा के अब्बा का फर्ज था। भाईजान आजकल यहाँ नहीं हैं क्या?'

'इन्हें अचानक जरूरी काम से लखनऊ जाना पड़ गया। हेड आफिस से बुलावा आया था।'

'अच्छा जभी। ...फरहा के अब्बा कई दिनों से भाई जान से मिलना चाह रहे थे। पिछले दिनों बड़ी बेटी कुलसुम आई हुई थी दुबई से... अपने शौहर के साथ। सिनेमा-विनेमा के पास चाह रहे थे दोनों...। अभी कल ही वापस चले गए दुबई।'

फारुख मियाँ और जोहरा के चार बच्चे थे। सबसे बड़ा जावेद। उससे छोटी कुलसुम। फिर दोनों किशोर वय की बेटियाँ फरहा और तबस्सुम। बड़ी बेटी कुलसुम का निकाह अभी गत वर्ष ही हुआ था। उसका पति अख्तर हुसैन दुबई में नौकरी करता था। बाकी दोनों बेटियाँ अभी पढ़ रही थीं।

इकलौते बेटे जावेद की शादी लखनऊ की काफी पढ़ी-लिखी और आधुनिक खयालात की लड़की नजमा से हुई थीं। वह एक अलग कहानी थी...

जावेद डिश-एन्टीना का कारोबार करता था। वह एक होनहार और मेहनती नौजवान था। स्मार्ट और खुले विचारों का व्यक्ति। एक दिन उसे लखनऊ की लड़की नजमा बेहद पसंद आ गई। एक नजर में नजमा उसे ऐसी भाई कि जावेद उससे निकाह करने के सपने देखने लगा।

नजमा महिला विद्यालय में बी.ए. फाइनल की छात्रा थी। लखनऊ के चौपटिया मोहल्ले में उसका घर था। जावेद अपने कारोबार के सिलसिले में अक्सर लखनऊ आता-जाता रहता था। उसका एक चाचाजात भाई हनीफ चौपटिया में ही रहता था। जावेद जब लखनऊ जाता तो हनीफ के ही घर ठहरता। हनीफ ने ही उसे नजमा की दीदार करा दिए थे।

नजमा एक तीखे नाक-नक्शवाली, लंबे कद की, सुंदर युवती थी। उसके बाल बेहद घने और कमर तक लंबे थे। चेहरे पर सुकोमलता के साथ दृढ़ आत्मविश्वास के चिह्न नजमा के व्यक्तित्व की विशेषता थी। एक बात और ... नजमा परदा नहीं करती थी।

उसके वालिद सिविल इंजीनियर थे। अब रिटायर हो चुके थे। नजमा उनकी सातवीं और अंतिम संतान थी। उससे बड़े छह भाई-बहन सब सैटिल्ड हो चुके थे। नजमा की माँ का इंतकाल हो चुका था। उसके वालिद अपनी इस बेटी को बहुत चाहते थे। नजमा भी अपने अब्बू की आँखों का तारा थी।

नजमा रिक्शे पर अकेली महिला विद्यालय आया-जाया करती थी। जावेद अक्सर उन दिनों किसी न किसी मोड़ पर नजमा की झलक पाने को बेताब खड़ा रहता था। एक दो बार वह अपनी किसी सहेली के साथ अमीनाबाद के बाजार में खरीदारी करती हुई भी दिखी। गड़बड़झाला मार्केट में जावेद ने दूर तक नजमा का पीछा किया। वह उससे कुछ कहना चाहता था। लेकिन कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था।

जावेद के भाई हनीफ के घरवालों का नजमा के घर आना-जाना था। सो एक दिन हनीफ की एक बहन सलमा के जरिए जावेद ने अपनी मोहब्बत का पैगाम नजमा तक पहुँचा दिया।

जावेद का खत पढ़ कर नजमा का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसे जावेद की हरकतों पर आश्चर्य तो पहले ही हो चुका था, पर वह यह नहीं जानती थी कि जनाब के दिल में बात इस हद तक पनप चुकी है। सलमा ने जब नजमा को जावेद के बारे में और उसके खानदान के बारे में तफसील से बताया तो जावेद उसे पसंद आ गया।

दरअसल नजमा के तसव्वुर में अभी कोई लड़का उभरा ही नही था। उसका मन कच्ची मिट्टी की तरह था। जावेद उसमें अनायास आ गया। इसलिए आसानी से समा गया। वह था भी बहुत अच्छा। स्वस्थ शरीफ और सुदर्शन। भला नजमा को क्यों न भाता?

जावेद ने जब नजमा के बारे में अपने माँ-बाप से बताया तो फारुख मियाँ ने कोई एतराज नही किया। लेकिन जोहरा बेगम ने अच्छा-खासा हंगामा खड़ा कर दिया। असल में जोहरा बेगम को शुरू से ही अपने मामू की नवासी रुकैय्या बहुत पसंद थी, जो कड़े इस्लामिक अनुशासन में पली-बढ़ी थी। रुकैय्या रोजा, नमाज की बड़ी पाबंद थी और एक सीधी सादी पर्दानशीन लड़की थी। घर में भी रहती तो भी दुपट्टे के आँचल से हमेशा उसका सिर ढँका रहता। घर के बुजुर्गों के सामने वह हमेशा निगाह नीची करके बात करती। उसका बोलना, उसका उठना-बैठना, सब कुछ शालीनता से संयुक्त था।

जोहरा आपा और रुकैय्या की अम्मा में खूब छनती भी थी। जोहरा चाहती थी कि उनका बेटा जावेद रुकैय्या से ही शादी करे। दो-चार बार वह उससे इस बारे में कह भी चुकी थीं, लेकिन जावेद को वह लड़की एकदम आकर्षणविहीन और दकियानूस लगती थी। वैसे भी जावेद को घरघुस्सू टाइप के लड़के-लड़कियाँ बेहद नापसंद थे।

अब जब जावेद ने नजमा के नाम का प्रस्ताव रखा तो जोहरा बेगम का भड़क उठना लाजमी था। वैसे भी उन्हें घर में बैठे-बैठे हुकुम चलाने की आदत थी। फारुख मियाँ ने जवानी के दिनों में उनके बड़े नाजो-नखरे उठाए थे। फिर इकलौते बेटे की अपनी मर्जी के मुताबिक शादी कराने के उनके बड़े पुराने अरमान थे। इसलिए वह नजमा का जिक्र चलने के बाद साल-भर तक उस रिश्ते का विरोध करती रहीं। जावेद भी जिद पर अड़ गया। ...अगर वह निकाह करेगा तो सिर्फ नजमा के साथ करेगा... वर्ना सारी जिंदगी कुँआरा रहेगा।

बेटे की जिद के आगे आखिर माँ को झुकना पड़ा। लेकिन उन्होंने जावेद और नजमा की शादी के लिए एक अनिवार्य शर्त रखी...

'भले ही नजमा कितनी पढ़ी-लिखी मॉर्डन खयालात की क्यों न हो, इस घर में आने के बाद उसे परदे के उसूलों और कायदों को निभाना पड़ेगा।'

जावेद को तहेदिल से यह शर्त मंजूर नहीं थी। उन दिनों उसका नजमा से रोमांस चरम सीमा पर था। उसने यह बात नजमा से बताई। नजमा ने मुस्करा कर जावेद को अपनी मोहनी अदा दिखाई और कहा कि -

'सरकार अगर यही चाहेंगे... तो मैं... इस कुर्बानी के लिए भी तैयार हूँ।'

और जावेद व नजमा की शादी हो गई। बड़ी नाजो अदा के साथ बहू घर में आई। शुरू-शुरू में दो-तीन महीने परदा और बुर्का भी चला। लेकिन स्कूटर पर घर से बाहर बीबी को कभी-कभार घुमाने या सिनेमा दिखाने की चाहत के पीछे उसका बुर्का शौहर की तमन्नाओं के सामने आड़े आने लगा।

नजमा जब भी जावेद के साथ बाहर जाने को होती, जावेद उससे बुर्का पहने बगैर साथ चलने को कहता। और नजमा की सास जोहरा बेगम उसे बुर्का पहनने के लिए याद दिलाना न भूलतीं।

जावेद जब माँ से बहस करता कि - 'आप अपनी लड़कियों को तो कभी बुर्का पहनने को नहीं कहतीं... फिर नजमा पर ही यह पाबंदी क्यों?'

तो झट से जोहरा बेगम का जवाब होता - 'कुलसुम, फरहा और तबस्सुम इस घर की ही नहीं इस शहर की भी बेटियाँ हैं। जबकि ये... ये बाहर से आई है और इस घर की बहू है। इसलिए इसका बुर्का पहनना लाजमी है।'

जावेद इस अजीबोगरीब तर्क को कतई हजम नहीं कर पाता था। इसी मुद्दे पर घर के आँगन में अक्सर माँ बेटे का वाक्युद्ध छिड़ जाता। नजमा का उस सारे प्रसंग में रुख रहता कि - 'पहले माँ-बेटे आपस में तय कर लो कि बुर्का पहनना है कि नहीं पहनना... फिर मैं घर से पाँव बाहर निकालूँ।'

शादी के साल भर बाद ही नजमा ने एक चाँद से बेटे को जन्म दिया। सलीम नाम रखा गया उसका। घर में ढेरों खुशियाँ मनाई गईं। बेटे के जन्म के बाद से नजमा का वकार जावेद की निगाहों में और भी बढ़ गया।

कुछ दिनों बाद नजमा जब फिर से घूमने-फिरने लायक हुई तो एक दिन एक शादी के समारोह में दोनों पति-पत्नी फिर से साथ निकलने को तैयार हुए। नन्हा सलीम अपनी दादी की गोद में था।

घर में फिर बुर्का-प्रसंग छिड़ा। जावेद ने पूर्व की भाँति विरोध किया। फारुख मियाँ भी उन दिनों बाहर गए हुए थे। बड़ी बेटी कुलसुम ने माँ को समझाया, लेकिन जोहरा बेगम नहीं मानीं। वह फिर से पूरे फार्म में आ गईं।

नजमा ने, जो पहले खामोश रह कर बेडरूम में जावेद मियाँ को समझाया करती थी, उस दिन उसने सबके सामने साफ-साफ कह दिया -

'ये रोज-रोज की खिटखिट से मैं तंग आ चुकी हूँ। आप कहती हैं बुर्का पहनो। यह कहते हैं परदा मत करो। आज आप लोग हमेशा के लिए ये तय कर दीजिए कि आखिर मुझे करना क्या है? आज के बाद या तो मैं हमेशा परदा ही किए रहूँगी... या फिर जिंदगी भर बुर्का नहीं पहनूँगी।'

नजमा ने यह कहते हुए हाथ में गोलमोल किया गया रेशमी बुर्का एक खाली चारपाई पर उछाल दिया और पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गई।

जोहरा बेगम यह सुन कर आग बबूला हो गईं। उनके मुख से नई-नई ईजाद की हुई ऐसी गंदी-गंदी गालियाँ फूटने लगीं जो न कभी किसी ने किसी से सुनी थीं, और न ही कभी कही होंगी।

बीवी के दो-टूक फैसले और माँ की गालियों की बौछार में घिर कर जावेद मियाँ का 'ब्लड प्रेशर' भी 'शूट अप' कर गया। शाम का वक्त था। आँगन में एक अँगीठी जल रही थी। उस पर कुलसुम सींक-कबाब भून रही थी। जावेद मियाँ ने चारपाई पर पड़े बुर्के को खूँखार आँखों से देखा। वह उसकी ओर बढ़े। कुलसुम ने लपक कर बुर्का अपने कब्जे में ले लिया। लेकिन वह नहीं माने। उन्होंने बुर्का बहन के हाथ से छीन लिया और कहा - 'लाओ इसे मुझे दो... न रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी।'

कुलसुम के मना करते-करते जावेद मियाँ ने बीबी का बुर्का सुलगती हुई अँगीठी पर रख दिया। रेशमी कपड़ा धू-धू कर जल उठा। जोहरा बेगम हाय-हाय करके छाती पीटती रह गईं। उस दिन के बाद से जोहरा ने नजमा बहू को कभी भी परदा करने को नहीं कहा।

शकुंतला देवी को वहाँ आए काफी देर हो चली थी। वह अब चलना चाहती थीं। जोहरा बेगम उठ कर बरामदे तक गईं। तख्त पर रखा पानदान उठा लाईं और चारपाई पर बैठ कर इत्मीनान से पान लगाने लगीं। जोहरा बेगम खूब जानती थीं कि शकुंतला चाय-वाय नहीं लेंगी। अगर पूछा जाएगा तो रटा-रटाया उनका एक ही जवाब होगा -

'मेरा तो आज व्रत है।'

आज इतवार का दिन है। भला बताओ आज कौन सा बरत है? क्या सूरज देवता का बरत है? कुछ पूछना फिजूल है इनसे... हालाँकि लालजी भाईजान को कोई परहेज नहीं है... हैं तो इन्हीं के शौहर... ईद-बकरीद पर दावत भी कुबूल कर लेते हैं। मगर इन्हें तो मुसलमान के घर का पानी भी हराम है। पान खा लेती हैं अलबत्ता... यही क्या कम गनीमत है?


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