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कहानी

नर वानर
सुधाकर अदीब


बंदरों का उत्पात तो कमोबेश प्रायः सभी जगह रहता है, जहाँ-जहाँ वे पाए जाते हैं। परंतु एक प्रांत में कुछ नगरीय क्षेत्र ऐसे हैं, जहाँ बंदरों का बाकायदा आतंक है।

उत्पात जब आतंक की श्रेणी में पहुँच जाता है तब वह लोगों को शुरू में तो भयभीत करता है, किंतु समय बीतने के साथ-साथ लोग उसी में जीने-मरने और रहने के आदी हो जाते हैं।

कभी-कभी वह आतंक इंसानों से अतिरिक्त-बहादुरी और समझदारी की भी माँग करता है। किसी इन्सान अथवा उनके नर-समूह का यदि आतंक हो, जैसे कि डकैतों इत्यादि का, तो उससे किसी हद तक निपटा भी जा सकता है। लेकिन यदि आतंक पशु-समुदाय का हो तो वह तो स्वयं में ही टेढ़ी खीर होगा। वैसे भी जानवरों में बंदर सबसे अधिक बुद्धिमान प्राणी माना जाता है।

ऐसे ही एक नगर में इनसानी जिंदगी के बीच में 'बंदर-राज' भी पाया जाता है। जनपद और नगर का नाम नहीं बता रहा हूँ, क्योंकि इससे स्थान-विशेष की कम, वहाँ के बंदरों की अधिक बदनामी होगी और मुझे भय है कि कहीं उनका कोई प्रतिनिधि प्रतिकारवश मुझे भी सबक सिखाने हेतु मेरे अपने शहर में न आ धमके।

तो... उस नगर के मुहल्ले और वहाँ के घर भी आम नगरों की ही भाँति थे। मेरा तात्पर्य है कि आज भी हैं। परंतु यह कहानी अभी पिछले कुछ ही वर्ष पूर्व की है। अतः हम फिलहाल भूतकाल में चलने को विवश हैं।

उस मुहल्ले के घरो की छतें दूर तक आपस में जुड़ी हुई थीं। कहीं-कहीं अलग भी थीं, सड़कों, गलियों अथवा अन्य कारणों से। जाड़ों की दोपहर में उन छतों पर औरतें धूप सेंकती थीं और अड़ोसनों-पड़ोसनों से सामाजिक-समागम भी चलता था।

घर के मर्द दफ्तर चले जाते या अपने-अपने काम धंधों पर। बच्चे स्कूल कॉलेज। औरतें घर के एक-एक कमरे के खिड़की-दरवाजे नीचे बंद कर लेतीं, तभी इत्मीनान से सीढ़ियाँ चढ़ती, वह भी हाथ में डंडे ले कर। कहीं ऐसा न हो कि वह आपस में छतों पर वार्तालाप करती रह जाएँ और उधर बंदर-समाज आँख बचा कर आँगन में उतर कर किसी कमरे में घुस जाए।

बंदर वास्तव में इतने चालाक थे कि वह आदमी से भी बढ़ कर अकल लगाते थे। अगर किसी कमरे की खिड़की गलती से खुली रह गई तो उसके सींखचों के भीतर अपना नन्हा सा बंदर-बच्चा भेज देते। वह छोटा बंदर भी मानों माँ के पेट से ट्रेनिंग ले कर आया होता। अभिमन्यु की तरह। वह अंदर घुस कर खट से दरवाजे की भीतरी चिटकनी गिरा देता और सारे के सारे बंदर दरवाजा ठेल कर कमरे में दाखिल हो जाते। घौकले बंदरों को खाना चाहिए। वे सदैव भूखे रहते। खाना न मिलने पर घर के खुले हिस्से को तहस-नहस कर डालते।

धीरे-धीरे नगरवासियों ने बंदरों के इस उत्पात की भी काट निकाल ली। खिड़कियों पर सीधे-सीधे सींखचे न लगा कर उन पर डिजाइनदार लोहे के फ्रेम लगाने लगे। इन फ्रेमों में निर्मित आकृतियाँ इतनी घुमावदार होतीं कि उनमें किसी बँदरिया का दुधमुँहा बच्चा तक मुंडी न घुसा सके। इसके अतिरिक्त लोग दरवाजों में आगे-पीछे सिटकनी-सिस्टम के बजाय बेलनदार-कुंडे लगाने लगे। मजबूत किस्म के। जहाँ आवश्यकतानुसार ताले जड़े जा सकें।

मगर इससे बंदरों का आत्मबल टूटने वाला नहीं था। उन्होंने अपनी 'न्यूसेंस वैल्यू' अब इतनी बढ़ा ली कि शादी ब्याह के समारोह के शुभ अवसरों तक पर वह मानव-समाज को बाकायदा 'ब्लैकमेल' करने लगे। केला फेंक कर चप्पल छुड़ाने की तरकीब तो बहुत पुरानी है। बंदर कपड़ा ले गया... चप्पल ले गया। उसे दाँतों से काटने को तत्पर है। अब उसे केला फेंको... रोटी फेंको। तभी छोड़ेगा। अन्यथा कब्जे में आया सामान वह दाँतों से बुरी तरह काटपीट डालेगा।

अपनी इस प्रवृत्ति का सामूहिक प्रयोग बंदर लोग जब उस नगर में वैवाहिक समारोहों इत्यादि में भी करने लगे तो घबरा कर लोगों ने बाकायदा दावत करने से पूर्व बंदरों को उनका हिस्सा देना शुरू कर दिया।

पूरी-सब्जी, हलुवा, खीर, पुलाव, सलाद, अटरम-सटरम जो भी बना होता मेहमानों के लिए... पहले मुहल्ले के बंदरों के लिए कहीं एक किनारे रख कर पत्तलों पर ढेर-सारा परोसा जाता। जिन पर वह टूट कर खाते और तभी अपना रास्ता नापते। उसी के बाद आदमियों की दावत का निर्विघ्न संचालन संभव था।

लेकिन इसमें भी एक शर्त थी। आप ईमानदारी से बंदरों को वह सब परोसें जो आपने पकवान तैयार कराए हों। कोई आइटम छूट न जाए। बंदर छतों से और उनमें कोई-कोई तो शामियाने के छेदों में मुँह डाल कर मुआयना करता कि नीचे मेजों पर परोसी जानेवाली डिशों में कोई ऐसी तो नहीं रह गई जो उन्हें खाने में न दी गई हो। अगर ऐसी कोई गलती पकड़ी जाती तो आफत आ जाती। अपने 'मुखबिर-खास' की खबर पर इलाके के सारे बंदर उस पंडाल पर एक साथ धावा बोल देते।

खौं-खौं-खौं-खौं ...चीं-चीं-चीं-चीं ...अरे! अरे!! ...मारो भगाओ ... बचाओ-बचाओ- बचाओ का चारों ओर कोहराम मच जाता। आदमियों और बंदरों का बिला-वजह का युद्ध होता। लाठी-डंडे पटके जाते। बंदर शामियाने और परदे फाड़ डालते। खाने की सामग्री उलट डालते। रंग में पूरी तरह भंग कर डालते।

इसलिए बंदरों को न्योतते समय फिर लोगों ने अतिरिक्त सतर्कता बरतनी शुरू कर दी। घर का मुखिया बंदर-भोज के समय स्वयं यह देख कर सुनिश्चित कर लेता कि पकवानों का कोई आइटम बंदरों को परोसने से छूटा तो नहीं। उनको खिला-पिला कर बाइज्जत विदा करने के बाद ही अब यजमान अपने अतिथियों को भोजन के लिए आमंत्रित किया करते थे।

शहर में बंदरों के इलाके भी बँटे हुए थे। अपने-अपने इलाकों में विभिन्न वानर-समूह रहते और विचरण करते थे। एक इलाके का बंदर दूसरे इलाके में प्रवेश नहीं करता था। अगर गलती से किसी बंदर ने इस नियम को तोड़ दिया तो उस इलाके के बंदर उस बाहरी वानर को एकजुट हो कर तत्काल खदेड़ बाहर करते थे। कहीं-कहीं तो कोई सड़क ही उनके क्षेत्रों की विभाजक रेखा हुआ करती थी। सड़क के इस पार हमारा इलाका। सड़क के उस पास का तुम्हारा। नजदीक मत आना वर्ना...

उस मोहल्ले में एक ठाकुर साहब का घर था। एक बार की बात है कि ठाकुर साहब की बूढ़ी माता जी दोपहर के समय छत पर धूप सेंक रही थीं। ठाकुर साहब अपने खेत-खलिहान का हिसाब करने गाँव गए हुए थे। माता जी दोपहर बीत जाने के बाद छत से घर की सीढ़ियाँ उतरने लगीं। तभी एक दुष्ट घौकले बंदर ने उन्हें उछल कर पीठ पर धक्का दे दिया। बूढ़ी महिला बेचारी लड़खड़ा कर सीढ़ियों से नीचे लुढ़कती हुई गिर गईं। उनकी हाय-हाय सुन कर घरवाले दौड़े। उन्हें उठाया। मुहल्लेवालों ने मदद कर अस्पताल पहुँचाया। माता जी को टाँग और हाथों में कई फ्रैक्चर आ गए। पट्टियों-प्लास्टर की नौबत...

शाम को ठाकुर साहब घर आए। पूरा किस्सा सुना। बंदरों पर उनका वर्षों पुराना दबा हुआ क्रोध फट पड़ा। रायफल उठा कर छत पर आ गए। ज्यादातर बंदर अपने ठिकानों पर चले गए थे। तीन बंदर उन्हें सामने पड़ोसी की मुंडेर पर बैठे दिखे। एक बंदर सामने लेटा हुआ था। बंदरिया उसकी जूँ बीन रही थी। एक अन्य बंदर पास बैठा हुआ था। ठाकुर साहब ने राइफल तान कर निशाना लगाया।

धाँय... एक बंदर चिथड़ा हो कर गली में गिरा। दूसरा भागा। धाँय... वह भी गिरा। तब तक बंदरिया दूसरी छत पर कूद कर फरार हो गई।

दो बंदर मारे गए। अभी इस घटना को दस मिनट भी नहीं बीते होंगे कि उस मुहल्ले में मानो तूफान आ गया। सैकड़ों बंदरों ने एक साथ उस मोहल्ले पर आक्रमण कर दिया।

मोहल्लेवाले खौफ से घरों में घुस गए। गली की दुकानों के शटर धड़ाधड़ बंद हो गए। जिसे जहाँ सींग समाया सुरक्षित स्थानों में घुस गया। दो आदमियों को खुले में बंदरों ने काट खाया।

लोगों ने अपने-अपने घरों में घुस कर भीतर से खिड़की दरवाजे बंद कर लिए। बंदर चिंचिया कर ओर खौखिया कर सब कुछ तबाह कर डालने पर आमादा हो गए थे। बंदर खंभे हिला रहे थे... बंदर टीन की छतों पर कूछ रहे थे... बंदर इक्का दुक्का हवाई फायरों से भी नहीं डर रहे थे...। बल्कि फायर की आवाजें उन्हें और अधिक उत्तेजित किए डाल रही थीं।

ठाकुर साहब के घर पर तो विशेष मुसीबत आ गई। बंदरों के एक बड़े समूह ने उनके घर को निशाना बनाया। उनके आँगन और घर के सामने के सहन में धावा बोल कर बंदरों ने जो कुछ मिला उसे चीर-फाड़ कर नष्ट भ्रष्ट कर डाला। यहाँ तक कि उनके गमले भी फोड़ डाले और ठाकुर साहब की खड़ी स्कूटर ढकेल कर उसकी रबड़ की गद्दी तक नोच-चबा डाली।

ठाकुर साहब के घर वालों ने बड़ी मुश्किल से उन्हें राइफल ले कर दोबारा घर के बाहर निकलने से रोका। उनके घर के सारे खिड़की-दरवाजे पुराने जमाने की मजबूत बनावट के थे। बंदर उन पर निरंतर प्रहार कर रहे थे। उन्हें हिला-हिला कर तोड़ देना चाहते थे। परंतु उन्हें कामयाबी नहीं मिल पा रही थी।

ऐसा लगता था कि अपनी अस्मिता पर आए संकट को देख कर शहर भर के सारे बंदर अपने सारे भेदभावों को भुला कर वहाँ इकट्ठा हो गए थे। वे सैकड़ों की तादाद में थे और निरंतर शहर के कोने-कोने से भाग कर वहाँ आते जा रहे थे।

उस मुहल्ले में चारों तरफ घरों के भीतर से डरी हुई औरतों और बच्चों की रोने-चिल्लाने की आवाजें उठ रही थी। बंदरों की चिल्लपों बाहर से अलग कान फाड़े डाल रही थी।

इसी बीच किसी ने पुलिस-प्रशासन को फोन कर दिया। कुछ अधिकारियों की गाड़ियाँ वहाँ आई। फायर ब्रिगेड भी आई, जिसने बंदरों पर पानी की बौछार की। लेकिन बंदरों ने सरकारी अमले पर भी आक्रमण कर दिया। सारे बंदर मजिस्ट्रेट, पुलिस और फायरब्रिग्रेड के विरुद्ध लामबंद हो गए। खौखिया कर गाड़ियों की ओर दौड़े। कुछ देर पुलिस के जवानों ने हवा में डंडे हिलाए और जमीन पर पटके। फिर बंदरों की पूरी फौज को अपनी ओर आता देख कर उनकी भी हिम्मत जवाब दे गई। घबराए हुए जवान कूद कर अपनी-अपनी गाड़ियों में चढ़ गए।

फायरब्रिगेडवाले अपनी लाल-गाड़ी में दुबक कर शीशा चढ़ा कर बैठ गए। बंदर शीशे तोड़ने का प्रयास करने लगे। लाचार सिपाहियों ने भीतर से ही डंडे हिला कर प्रतिरोध किया। फिर... सरकारी गाड़ियाँ भी भाग खड़ी हुईं।

इसी सब घटनाक्रम में रात हो गई। बंदर कुछ शांत हुए। मगर सबके सब छतों पर और मुहल्ले की गलियों में जमे रहे। कोई बंदर मोर्चा छोड़ कर कहीं गया नहीं। मुहल्ले के स्त्री-पुरूष-बच्चे अपने-अपने घरों के भीतर सहमे और दुबके रहे। सभी बंदरों ने उनको उनके घरों के भीतर नजरबंद कर अपना 'वानर-कर्फ्यू' लगा दिया था।

उधर गली मे भर कर गिरे दोनों बंदरों का अनेक बंदर घेरे हुए थे। उनमें से दो-तीन बंदर पों-पों करके रो भी रहे थे। शायद वे मरनेवालों के अति निकट के संबंधी थे। एक अजीब अवसाद और भय का माहौल था।

जिला प्रशासन ने भारी पुलिस फोर्स के साथ रातों रात उस मुहल्ले को दूर से घिरवा लिया। बंदरों के निकट जाने का तो खैर किसी में साहस ही नहीं था। फिर रात में ही बंदरों का खेल दिखानेवाले मदारियों के एक गाँव से कुछ मदारी लोग बुलवाए गए। मदारी बंदरों का मनोविज्ञान काफी कुछ समझते हैं और बंदर भी उनसे कुछ डरते या लिहाज करते हैं।

एक बूढ़ा और तीन जवान। वे कुल चार मदारी थे। सुबह डमरू बजाते हुए चारों मदारी धीरे-धीरे उस मुहल्ले में घुसे। वहा पहुँच कर उन्होंने मिल कर सफेद कपड़ों में उन दोनों मृत वानरों के शव लपेटे। उन पर कुछ फूल चढ़ाए। अगरबत्ती दिखाई। फिर उन्हें दो मदारियों ने अपने हाथों में उठाया और गली के बाहर चल दिए। धीमे-धीमे डमरू बजाते हुए।

अजीब दृश्य था। मदारी वानर-शवों के साथ आगे-आगे चले जा रहे थे, सैकड़ों बंदरों का जुलूस उनके पीछे-पीछे बेआवाज चल रहा थे। घरों में कैद नर-नारी अपनी-अपनी खिड़कियों से आँखें फाड़े यह अभूतपूर्व नजा़रा देख कर हैरान थे। दूर पर खड़े पुलिस के अधिकारी कर्मचारी, मजिस्ट्रेट भी सभी चुपचाप इसे देख कर चकित थे।

मदारी लोग चलते चलते पास के एस वीरान मैदान में गए। फिर वहाँ उन्होंने एक गड्ढा खोदा और उसमें कफन सहित दोनों शहीद बंदरों को दफन किया। इस सारे कार्यक्रम के दौरान पूरा वानर-समाज वहाँ मौजूद रहा। कोई बंदर वहाँ से हिला तक नहीं। सब के सब मानों अपने मृत साथियों को मूक श्रद्धांजलि दे रहे थे।

आपस में चाहे ये बंदर एक-दूसरे से कितना ही लड़ते झगड़ते हों, विपत्ति के समय उनका वह एका देखने के काबिल था। बंदरों की ऐसी हरकतें कभी-कभी मजबूर करती हैं हमें यह सोचने के लिए कि क्या वाकई हम उनके वंशज हैं? अथवा वे कभी हमारे पूर्वज थे?


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