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विद्वान
अजित वडनेरकर


महा भारत के प्रसिद्ध पात्र पांडु के छोटे भाई और दासीपुत्र विदुर को
मनीषी और बुद्धिमान के तौर पर दर्शाया गया है। विदुरनीति से भी बुद्धिमानीपूर्ण बात ही स्पष्ट होती है। यह शब्द बना है संस्कृत की विद् धातु से। संस्कृत के विद् का मतलब होता है जानना, समझना, सीखना और खोजना। महसूस करना, प्रदर्शन करना, दिखाना आदि भाव भी इसमें समाहित हैं। अत्यधिक ज्ञान भी घातक होता है, इसलिए संस्कृत में धूर्त और षड्यंत्रकारी को भी विदुर कहा गया है।

विद्वान शब्द की उत्पत्ति इसी विद् से हुई है। विद्या में यही विद् समाया हुआ है जाहिर है, विद्यार्थी भी इसी कड़ी का शब्द है। किसी शब्द के साथ विद् लगा दिए जाने पर मतलब निकलता है जाननेवाला, मसलन भाषाविद् यानी भाषा का जानकार। इसी तरह जाननेवाले के अर्थ में उर्दू-फारसी में दाँ लगाया जाता है जैसे कानूनदाँ। यह दाँ भी इसी विद् का रूप है।
 

यह जानना दिलचस्प होगा कि अंग्रेजी के विज़न शब्द के पीछे भी यही विद् है। विज़न से ही बना है टेलीविज़न। इसी तरह किसी अनोखी सूझ, विचार, तरकीब के अर्थ में हिंदी भाषी बड़ी सहजता से अंग्रेजी के आइडिया का इस्तेमाल करते हैं। आइडिया से आइडियल। ये तमाम शब्द प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार से ही जन्मे हैं और भाषाशास्त्री इनके पीछे weid जैसी किसी धातु की कल्पना करते हैं जिसका मतलब भी बुद्धिमानी, जानना और समझना ही है। संस्कृत विद् से इसकी समानता गौरतलब है। जाहिर है, संस्कृत इनकी जन्मदात्री नहीं मगर बहन तो अवश्य ही है।

इसी विद् से केवल अंग्रेजी में ही करीब दो दर्जन से ज्यादा शब्दों की रिश्तेदारी है। अन्य योरोपीय भाषाओं में भी इसका योगदान है । इसी से बना है वेद। यही वेद अवेस्ता (फारसी का प्राचीनतम रूप) में वैद , प्राचीन स्लाव में वेडे, लैटिन में वीडियो या वीडेयर, अंग्रेजी में वाइड या वाइस, विज़न और जर्मन में वेस्सेन के रूप में भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं। ये तमाम शब्द इन भाषाओं में भी देखना, जानना, ज्ञान या परखना जैसे अर्थ बतलाते है। विद् ने ही ग्रीक में आइडेन का रूप ले लिया जिसका मतलब है देखना। वहाँ से यह अंग्रेजी के आइडिया, आइडियल जैसे अनेक शब्दों में ढल गया।

पुलाव

विश्व का शायद ही कोई कोना ऐसा होगा जहाँ लोगों ने पुलाव का नाम न सुना होगा। पुलाव के प्रति इसी ललक ने हिन्दी-उर्दू में एक खास मुहावरा बना डाला है - ख़याली पुलाव पकाना अर्थात कल्पनालोक में घूमना, हवाई किले बनाना आदि। पुलाव को किस ज़बान का शब्द माना जाए? यह फारसी में भी है और उर्दू-हिंदी में भी। दरअसल, पुलाव की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है। आइए जानते हैं कैसे।

हर्ष, खुशी आदि का भाव जब मन में संचरित होता है तो इसे पुलक या पुलकित होना कहते हैं। संस्कृत की एक धातु है पुल् जिसका मतलब है रोमांच होना। इससे बना पुलकः जिसका मतलब भी रोमांच के साथ आनंदित होना, गदगद होना, हर्षोत्फुल्ल होना आदि है। गौर करें कि अत्यधिकरोमांच की अवस्था में शरीर में सिहरन-सी होती है। त्वचा के बाल खड़े हो जाते हैं। इसे ही रोंगटे खड़े होना कहते हैं। यही पुलक है। यह पुलक जब चेहरे पर दिखती है तो खुशी, उत्साह, आवेग नुमायाँ हो रहा होता है। यानी खिला-खिला चेहरा। एक तरह की सरसों अथवा राई को भी पुलकः ही कहा जाता है। वजह वही है - खिला-खिला दिखना। राई के दाने पात्र में रखे होने के बावजूद खिले-खिले ही नज़र आते हैं।

पुल् से ही बना है पुलाकः या पुलाकम् जिसका मतलब है सुखाया गया अन्न, भातपिंड, संक्षेप या संग्रह और चावल का माँड़। इससे ही बना पुलाव जो बरास्ता फारस, अरब मुल्कों में गया, जहाँ से स्पेन हो कर यूरोप में भी इसने रंग जमा लिया । पुलाव की सबसे बड़ी खासियत है इसकी सुगंध और चावल का दाना-दाना खिला होना। अब जब भी पुलाव खाएँ तो उसके दाने-दाने में पुलक महसूस करें और तब इसके नाम की सार्थकता आपकी समझ में आ जाएगी।


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हिंदी समय में अजित वडनेरकर की रचनाएँ