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निबंध

वाजिदअलीशाह
प्रतापनारायण मिश्र


हाय! आज हमीं नहीं रो रहे हैं, हमारी लेखनी का भी हृदय विदीर्ण हो रहा है! हँसी मत समझो, मारे दुःख के उन्‍माद हो रहा है, इससे रक्‍त काला पड़ गया है और आँसुओं के साथ नेत्र द्वारा बहा जाता है। हमारा कानपुर यवनों का नगर नहीं सही, पर लखनऊ यहाँ से दूर नहीं है, बरंच यहाँ से सहस्रों संबंध रखता है। फिर क्‍यों न लखनऊ के साथ इसे भी शोक हो। संपादक और उसके मित्र श्री बाबू राधेलाल आदिक कई लोग प्रत्‍यक्ष अश्रुवर्षा कर चुके हैं। यह बात किसी के देखने की नहीं, बरंच हृदय के सच्‍चे संताप से थी। हाय शाह वाजिद अली! हा सुलताने आलम! हा अख्‍तर! हाय सूबे अवध के कन्‍हैया! तुम हमारा शासन न करते थे, तुम हमारी जाति के न थे तो भी, हमारा बादशाह कलकत्ते में बैठा है, स्‍मरण हमारे लिए संतोषजनक था। तुम्‍हारा अंतःकरण हमसे ममता रखता था, इसमें कोई संदेह नहीं।

पर हाय! दुष्‍ट दैव से इतना भी न देखा गया, मूर्ख, खुशामदी और अपने दुर्गुणों से भी पराए सद्गुण तक को तुच्‍छ समझने वाले चाहे जो कुछ झख मारें, पर हम भली भाँति जानते हैं कि तुम्‍हारे दोष भी मनुष्‍य जाति की अपूर्ण शक्ति से अधिक कुछ न थे। तुमने अपनी प्रभुता के समय हिंदू मुसलमान दोनों को अपनी प्‍यारी प्रजा समझा है। यह तुम्‍हारा एक गुण ऐसा है कि तुममें सचमुच के सहस्र दोष भी होते तो भस्‍म कर देता! जो मूर्ख और दुष्‍ट लोग अपने मतवालेपन से दूसरों के पूज्‍य पुरुषों की निंदा और उनसे घृणा किया करते हैं उनसे तुम लाखों कोस दूर थे। सहस्रों लोगों का रक्‍त बहेगा, सहस्रों ललनाओं का अहिवात जाता रहेगा, इस भय से अपने तईं प्रसन्‍नातपूर्वक दूसरों के हाथ में सौंप दिया।

यह गुण तुम्‍हारा हमारे हृदय को प्रफुल्लित करता है। गुणग्राहकता आश्रितपोषकता और दुःख-सुख दोनों में एकरसता आदि के कारण तुम प्रेम समाज के प्रातः स्‍मरणीय हो। सितंबर की 21 तारीख तुम्‍हारे वियोग का दिन है, अतः सहृदयों को दुखदाई होगी। कहाँ तक लिखें, शोक के मारे तो अधिक विषय सूझते ही नहीं। इस दशा में भी सहस्रों के पेट तुम्‍हारे अनुग्रह से पलते थे, हाय! आज उनके चित्त की क्‍या दशा होगी!!


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