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कविता

मन की दुनिया
संजय कुंदन


मन का पहाड़ एकदम अलग
मन का आकाश एकदम अलग
मन के इंद्रधनुष की छटा एकदम अलग

मन में रोज होती कविताओं की बारिश
निकलती रोज किस्सों की धूप
उगती रहती सवालों की दूब

मन का लोक कभी लगता असंख्य प्रकाश वर्ष दूर
तो कई बार एकदम धरती के दरवाजे पर
एक दिन दस्तक देता है मन से निकला एक बवंडर,

एक आदमी अचानक भरी सभा में माँगने लगता है
अपने हिस्से की जमीन
एक औरत कहती है - अब वह केवल अपने मन की सुनेगी
उड़ जाती है पृथ्वी के इंद्र की नींद
तब सक्रिय होते हैं नव ऋषि नव गुरु
वे जीने की कला समझाते हैं
बताते हैं कैसे बाँधा जाए
मन की लहरों को मजबूत बाँधों से...

 


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