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आलोचना

विनोदकुमार शुक्ल के उपन्यासों का समाजशास्त्र
रवि रंजन


चिड़ियाँ इसलिए नहीं गातीं कि उनके पास प्रश्नों के उत्तर हैं। वे गाती हैं, क्योंकि उनके पास गीत हैं।

- एक चीनी कहावत

सबसे अच्छी कविता / सबसे अच्छे दिनों में याद आयेगी सबसे अच्छी कविता / सबसे बुरे दिनों में भी पहचानी जायेगी।

- विष्णु नागर

कविता का अर्थ चरितार्थ है और अगर कविता का अर्थ मुख्यतः चरितार्थ है तो कविता नाटक है। वह उस आदमी की जिंदगी का नाटक है जो लिखता है, उस आदमी की कथा है जो उसे लिखता है और उसकी भी कथा हो सकती है जो उसे सुनता है।... एक नीला आसमान है, खुली स्लेट है और बीसवीं सदी जैसे हुई नहीं, ऐसा मानकर कुछ करना संभव नहीं। बीसवीं सदी को जानकर आप उसका अतिक्रमण कर सकते हैं। उसकी स्लेट पर जो अनगिनत इबारतें हैं, उनको पढ़कर, समझकर, सुनकर फिर आप एक नई इबारत लिख सकते हैं।

- अशोक वाजपेयीः ' कवि कह गया है ', पृ . 185

यदि आप कहते हैं कि उपन्यास की मौत हो चुकी है तो वास्तविकता यह है कि उपन्यास नहीं, बल्कि आप ही निष्प्राण हो गए है।

- ग्रैबियल गार्सिया मार्खेस

उपन्यास की संरचना की चर्चा करते हुए मिलान कुन्देरा ने लिखा है कि 'उपन्यास यथार्थ का नहीं अस्तित्व का परीक्षण करता है। अस्तित्व घटित का नहीं होता, वह मानवीय संभावनाओं का आभास है, जो मनुष्य हो सकता है, जिसके लिए वह सक्षम है। उपन्यासकार खोज के जरिए मानवीय संभावनाओं के अस्तित्व का नक्शा बनाता है। चरित्र और दुनिया संभावनाओं द्वारा जानी जाती है।'

मनुष्य को ठीक ही उपलब्धि और संभावना का मिश्रण कहा गया है। इसमें उपलब्धि को जहाँ हम यथार्थ की कसौटी पर कसकर आँकते हैं, वहाँ संभावना की हदबंदी हर तरह से अनुपयुक्त साबित होती है। कुन्देरा के ऊपर उद्धृत बयान से बाबस्ता होकर उन्हें अपने खेमे में खींचने या अपना मानने-समझने वाले तथाकथित यथार्थवादियों के मुखमंडल भले ही थोड़ी देर के लिए वक्रकुंचित हो गये हों, पर 'यथार्थ का इतिहास' से और 'इतिहास' का उपन्यास' से नाभिनाल-संबंध सिद्ध करने को पर्युत्सुक साहित्यिकों को इस सत्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि इतिहास आज वर्तमान के कंधे पर वैताल की तरह सवार होकर कई बार मिथक के रूप में उसकी छाती पर मूँग दलता दिखाई पड़ता है। ऐसे में फासीवादियों के पंजे से बचने के लिए आत्महत्या करने को बाध्य होने से ठीक पहले लिखित वाल्टन बेन्जामिन की पंक्ति अनायास याद हो आती है : 'अगर दुश्मन जीत जाएगा तो कब्र में मुर्दे भी सुरक्षित न रहेंगे; और साफ है कि उस दुश्मन का विजय अभियान अभी अवरुद्ध नहीं हुआ है।'

अपने देश में सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक बदहाली के इस दौर में यदि कोई रचनाकार बनी-बनायी लीक से हटकर अतीत एवं वर्तमान में अपनी रचनात्मक आकांक्षा के 'भावानुप्रवेश' से वस्तुस्थिति का 'अन्यथाकरण' करते हुए कोई नये तरह का घुलावटी रसायन तैयार करके 'मानवीय संभावनाओं के अस्तित्व का नक्शा' बनाने की पेशकश करता है, तो इसका हमें अपने तमाम पूर्वाग्रहों को तत्काल स्थगित कर हर तरह से स्वागत करना चाहिए। 'यूलिसिस' उपन्यास में जेम्स ज्वायस ने एक पात्र से कहलवाया है कि 'इतिहास तो फंदे में फँसाता है, मैं मुक्त होना चाहता हूँ।' किन्तु, कवि-कथाकार विनोदकुमार शुक्ल ने अपने किसी बयान में 'इतिहास' को नकारा या अपनी रचनाओं में किसी पात्र द्वारा इसे नकरवाया नहीं है। 'पहल-पुस्तिका' के रूप में प्रकाशित युवा कवि शरद कोकास की 'पुरातत्त्ववेत्ता' कविता से एक अंश उधार लेकर कहें तो किसी रचनाकार के लिए 'इतिहास तो दरअसल माँ के पहले दूध की तरह है / जिसकी सही खुराक पैदा करती है मुसीबतों से लड़ने की ताकत।' बावजूद इसके, किसी कवि-कथाकार का अतीत व अपने समय-समाज के प्रति रुख साहिेत्य में बहुसंख्यकों के बरअक्स उदाहरण होने से बचकर रहने वाला हो सकता है। 'तीन मीटर खुशबू के अहाते में उगा हुआ गुलाब' कविता में विनोदकुमार शुक्ल ने अपने इस रुख को व्यक्त किया है :

बहुत से उदाहरण थे
    उदाहरणों की भीड़
    कविता में आने की
    उनकी धकापेल मची।

x x x

उदाहरण को ढूँढ़ने के लिए
    सब कुछ उलट कर
    पहले अपनी तलाशी लेता हूँ

x x x

उदाहरण होने से बचता हुआ
    क्षितिज कमरे के अंदर घुसकर
    उदाहरणों की बैठक में
    कविता लिखने मित्रों और दुश्मनों को जवाबदेह हूँ।'

    (- वह आदमी नया गरम कोट पहिनकर चला गया विचार की तरह, पृ. 66)

विनोद जी कहते हैं कि 'मैं धर्मविहीन और जातिविहीन होकर इतिहास और परम्परा के आँगन में चीख रहा हूँ।' ऐसी बेचैनी-भरी काव्यपंक्ति के रचयिता की 'मुझे बचाना है' कविता से गुजरते हुए शिद्दत के साथ महसूस होता है कि यह रचना वस्तुतः उनके पूरे सृजन-कर्म का बीज वक्तव्य है : 'मुझे बचाने हैं एक-एक कर / अपनी प्यारी दुनिया को / बुरे लोगों की नजर से / इसे खत्म कर देने को।' स्पष्ट ही इसमें नज़ीर अकबराबादी रचित 'आदमीनामा'-जैसी उदात्तता है : इंसान की दखलंदाजी के जरिए आदमियत व इंसानियत को बचाए रखने की हर संभव कोशिश। और, इस कोशिश के सफल होने की आशा एवं आकांक्षा के बीच सृजनात्मक तनाव। उल्लेखनीय है कि वे रचना में 'विशेषण' के बजाय 'क्रिया' का ज्यादा सार्थक इस्तेमाल करते हैं और इस संदर्भ में 'देखना' और 'बचाना' जैसे क्रियापदों को उनकी रचनाओं में कुंजी शब्द के तौर पर प्रयुक्त हुए हैं। कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी ने सही लिखा है कि विनोदकुमार शुक्ल 'अब समयविद्ध कवि ही नहीं रह गए हैं। अपने समय में तो अनायास ही हुआ जा सकता है, लेकिन अपने समय को पार करने की स्थिति कोशिश से ही आती है। यह कोशिश कवि-कर्म की बुनियादी कोशिशों में से है। अपने स्वभाव में भले ही रोमांटिक जान पड़े, अपने प्रतिफल में वह हमेशा ही क्लैसिक है।' पाश्चात्य विचारक मिल ने लिखा है कि 'गद्य या वक्तृता श्रवणीय वस्तु है; काव्य चुपके से सुनने की चीज।' विनोद जी की, कविता की संवेदना से लबरेज, कथा-कृतियों में अपने समय-समाज की यातना को लेकर कभी-कभी जो सांद्र मौन की स्थिति है, उसे गहरी यातना भोगते मनुष्य की 'ईमानदार चीख' के बजाय एक तरह की समझदार चुप्पी के सौंदर्यशास्त्र' के रूप में भी देखा जाना चाहिए। जिस प्रकार बुरे भावों के चलते खुद को प्रताड़ित अनुभव करनेवाले लोगों को चीखने से नहीं रोका जा सकता, उसी प्रकार विनोद जी द्वारा भी उपन्यास-सृजन के दरम्यान प्रचलित परिपाटी से भिन्न स्वयं को पिघलाकर औसत भारतीय मनुष्य की सुकुमार संवेदनाओं एवं वांछित आदर्शों की कथा लिखने की कोशिश वाजिब है।

असल में विनोद जी के उपन्यास उनके तरल इतिहास-बोध को रग-रग में आत्मसात करके भारत की निम्नमध्यवर्गीय आबादी की मनोसामाजिक संरचना में निहित अन्तर्विरोधों को जिस अंदाज-ए-बयाँ के तहत प्रतिबिम्बित और प्रक्षेपित करते हैं, उसके चलते हिन्दी में उपन्यास के ऐसे प्रतिदर्श उभरकर सामने आये हैं, जो न तो पहले कभी उपन्यासकारों के सृजनात्मक व्यवहार में मौजूद थे, और न ही उपन्यास-विमर्श के किसी सैद्धान्तिक संज्ञान में। अतएव, औपन्यासिक सृजनशीलता से संबंधित अंदरूनी मुद्दों के आलोचकीय रेखांकन के संदर्भ में यह एक सर्वथा नवीन चुनौती, पर बेहद उत्तेजक कर्म है, जो पहले के आलोचनात्मक विमर्श में भी दूर-दूर तक उपस्थित नहीं रहा है। दूसरे शब्दों में, विनोदकुमार शुक्ल की लेखनी से उपन्यास की जैविकता या संघटनात्मक तंत्र में, उसकी पद्धति में, सामान्य तौर पर औपन्यासिक लेखन की पद्धति सर्वाधिक मुक्त होती हुई अपने विकास की एक बड़ी मंजिल पर जा पहुँची है। एक ऐसी मंजिल पर, जहाँ पहुँचकर उसका आस्वादन तथा अवगाहन जितना सरल प्रतीत होता है, विश्लेषण उतना ही जटिल : 'जिमि मुँह मुकुर मुकुर निज पानी। गहि न जाई अस अद्भुत बानी।'

वजह यह कि 'नौकर की कमीज' से आरंभ होकर 'खिलेगा तो देखेंगे' से होती हुई 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' तक की उनकी उपन्यास-यात्रा में प्रत्येक कृति की निजी विशेषता के बावजूद एक विलक्षण एकसूत्रता है और कई बार ऐसा लगता है कि एक कृति में जो बात कहने से रह गई है उसका दूसरी कृति में नए सिरे से और नए रूप-विन्यास के साथ पुनर्कथन हुआ है। उनकी रचना-यात्रा को समझने-समझाने के पूर्व पाठक या आलोचक द्वारा इन कृतियों में अन्तर्निहित 'अनुभूति की संरचना' को पूर्वाग्रहविहीन होकर महसूस किया जाना जरूरी है। 'कविता' और 'दर्शन' के बीच दुर्लभ तालमेल बिठाकर एक विलक्षण सर्जनात्मक तनाव पैदा करने के लिए सुविख्यात श्रीहर्ष ने सही लिखा है : अनुभवं वचसा सखि लुम्पसि। (किसी अनुभव का प्रत्याख्यान वाचिक तर्कों से नहीं किया जा सकता।) सच तो यह है कि किसी प्रामाणिक अनुभव का खंडन तो दूर, सार्थक मंडन भी कम कठिन नहीं होता। कहने की जरूरत नहीं कि अयुक्तियुक्त खंडन और मंडन वाली गंभीर से गंभीर आलोचना किस कदर हास्यास्पद हो जाने के लिए अभिशप्त होती है। ब्रेष्ट ने सही लिखा है कि हर दशा में किसी कलाकृति में व्यक्त की गयी जिन्दगी का व्यक्त की जा रही जिन्दगी से मिलान करना चाहिए, बजाय इसके कि उसकी दूसरी वर्णित जिन्दगी से तुलना की जाए।

बावजूद इसके, 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' जैसे औपन्यासिक विकास की उच्चतर मंज़िल से यदि हम हिन्दी में रचनात्मक गद्य-लेखन के अतीत का सिंहावलोकन करें, तब वहाँ साहित्य की एक-एक विधा की संरचना और पद्धति की अन्तःसलिलाएँ दिखाई देने लग जाती हैं, जो विनोदकुमार शुक्ल के उपन्यास-लेखन की पद्धति में विविध धाराओं की तरह संगमित-समेकित होती हुई किसी गहरे, पर शांत सरोवर की तरह प्रतीत होती हैं। इस कृति में निहित रचनात्मक शक्ति एवं संभावना के मद्देनजर फिर याद आते हैं मिलान कुन्देरा, जिन्होंने कहा है कि कई बार कलाकृति अपने सर्जक से ज्यादा परिपक्व साबित होती है। निर्मल वर्मा ने 'संस्कृति, समय और भारतीय उपन्यास' निबंध में अपनी जातीय जरूरतों के अनुसार जिस जातीय औपन्यासिक रूप के अन्वेषण पर बल दिया है, वह एक हद तक 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' उपन्यास में उपलब्ध हो गया-सा प्रतीत होता है। स्पष्ट ही हिन्दी में ऐसी कलाकृतियाँ उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं और उम्मीद है कि इनके प्रकाशन के बाद महेन्द्र भल्ला की वह शिकायत भी शायद दूर हो गयी होगी कि हिन्दी में ऐसा उपन्यास एक भी नहीं है जिसके पास फिर-फिर से जाया जा सके। जैसे दुनिया के क्लासिक्स के पास जाया जा सकता है। (विनोद दास : बतरस, पृ. 68) उन्होंने किसी उपन्यास के अंततः क्लासिक बनने के लिए जिन्दगी को उपन्यासकार द्वारा बिना चश्मे से देखने और सच को गहराई से महसूस करने-करा पाने की जिस जरूरत को कसौटी माना है उस पर विनोदकुमार शुक्ल की यह कलाकृति बहुत दूर तक खरी उतरती है।

विनोद जी के उपन्यासों में अभिव्यक्त संश्लिष्ट जीवनानुभवों से रूबरू होकर इनमें चित्रित जीवन-खंड का संपूर्ण घनत्व प्राप्त करने की कोशिश करते हुए पश्चिमी आलोचक पर्सी ल्युबक का एक कथन प्रासंगिक प्रतीत होता है : परिष्कृत रुचि और पैनी दृष्टि तब तक बेकार है जब तक हम आलोच्य कृति की समग्र प्रतिमा को अपने मन में सुरक्षित नहीं कर लेते और कृति है कि एक बादल के समान हमारी पकड़ से बाहर निकलती जाती है। स्पष्ट ही विनोद जी की किसी कहानी या कविता की तुलना में उनके उपन्यासों को पूर्णतः स्वायत्त करने का उपक्रम श्रमसाध्य तो है ही, समय-साध्य भी है। किंतु, सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उनकी कृतियों के कथानक का संक्षेपीकरण करके उसकी चरित्र-केन्द्री दृष्टि से आलोचनात्मक पुनःसृष्टि लगभग असंभव है। इस क्रम में सबसे बड़ी समस्या आलोचकीय प्रविधि को लेकर पैदा होती है, जो मुख्यतः दो प्रकार की हो सकती है : भारतीय काव्यशास्त्रियों द्वारा अनेकविध विवेचित 'तादात्म्य सम्बन्ध' या ब्रेष्ट कथित 'अलगाव-प्रभाव'। ज्ञातव्य है कि पहले से बनी-बनायी या प्रचलित किसी भी मूल्यांकन-पद्धति को उनके उपन्यासों के संदर्भ में यांत्रिक रूप में लागू करने की हर कोशिश सरलीकरण का शिकार हो जाने के लिए अभिशप्त होगी।

एक जमाने में मुक्तिबोध ने लिखा था कि 'सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रभाव के परिचालन द्वारा साहित्यिक प्रतिष्ठा और प्रभाव के विकास और प्रसार के दृश्य हिन्दी में खूब ही हैं, रहे हैं।' सर्वविदित है कि हमारे जमाने में यह दृश्य संभवतः अपने चरम पर है, जिसमें आलोचना (?) के जनसंपर्क पदाधिकारियों की नारकीय भूमिका 'पुस्तक-समीक्षा' के रूप में छपनेवाली ज्यादातर सामाग्री को देखते हुए अपने 'पतन की इन्तहा' खुद बयान करती है। एक विद्वान ने तो अपना ईमानदार क्षोभ प्रकट करते हुए यहाँ तक कह डाला है कि आज पुस्तक-समीक्षा साहिेत्य के कलेवर पर एक ऐसे बदसूरत नासूर की तरह है, जो साहित्य के रक्त पर पोषित होता है।' गौररतलब है कि विनोदकुमार शुक्ल का औपन्यासिक गल्प अपने समय व समाज के तेजाबी यथार्थ से कौटुंबिक संबंध में जुड़े रहने के बावजूद प्रचलित अर्थों में 'यथार्थवादी' उपन्यास नहीं है। कारण यह है कि वहाँ 'यथार्थ' किसी विचारधारात्मक आतंक के बजाय सुस्वादु भोजन में नमक की तरह मौजूद है। वह मुक्तिबोध की कविताओं में आयी फैंटेसी से भी भिन्न एक ऐसा गल्प है, जिसमें दैनंदिन जीवन की सांसारिकता के ऊबड़खाबड़पन को कलात्मक युक्तिसंगति प्रदान करते हुए विश्वसनीय बनाकर इस कदर पुनःसृजित किया गया है कि अन्ततः लेखकीय स्वप्निल गुणवत्ता अपनी संपूर्ण सृजनात्मकता का साक्ष्य प्रस्तुत करती हुई पाठक को औसत भारतीय मनुष्य के अनुभव से जोड़ देती है। इस क्रम में मानीखेज बात यह भी कि विनोद जी की किसी कृति से गुजरते हुए अनजाने में भी लेखक ऐसा कोई प्रयास करता हुआ नहीं दिखाई देता कि पाठक कैसा अनुभव करे। ऐसी किसी शिल्पगत तरकीब का दबे पाँव इस्तेमाल करने के बजाय यह काम आदि से लेकर अंत तक वह कृति पर ही छोड़ देता है। ज्ञातव्य है कि ग्राम्शी ने अपने देश-काल में रचित साहित्य के संदर्भ में ऐसे कई बिन्दुओं के आलोक में समझाया है कि कैसे सामाजिक यथार्थ का चित्रण करने वाले दो लेखकों में एक उसका प्रवक्ता होता है, जबकि दूसरा कलाकार।

साहित्य का समाजशास्त्रीय अध्ययन करने वाले आरम्भिक पुरोधाओं में अग्रणी माने जानेवाले इप्लोलित अडोल्फ तेन (1828-93) ने लिखा है कि जब हम शास्त्रों का ज्ञान या कलाकृतियों का बोध प्राप्त करते हैं तब हमारा मकसद उनमें छिपे मनुष्य की खोज करना होता है।... कोई साहित्यिक कृति न तो एक व्यक्ति की कल्पना की क्रीड़ा होती है न किसी उत्तेजित मन की भटकी हुई अकेली तरंग।... साहित्यिक कृति उस आवरण या कवच की तरह होती है, जिसके पीछे जीवन छिपा रहता है। जिस प्रकार जीवन के विषय में जानने के लिए उसके बाहरी आवरण या खोल को हटाना पड़ता है, उसी तरह कोई पुस्तक या साहित्यिक कृति निर्जीव होती हुई भी किसी जीवंत अस्तित्व की ओर संकेत करती है। हमें उस अस्तित्व को पहचानना पड़ता है और उसकी पुनर्निर्मिति करनी पड़ती है।' बहरहाल, कहना यह है कि किसी भी श्रेष्ठ कलाकृति का समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य प्रायः प्रच्छन्न हुआ करता है। दूसरे शब्दों में, समाज वहाँ कई बार सतह पर तैरता दिखाई नहीं देता। इसलिए, एक अच्छे पाठक से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि कृति की अंतर्वस्तु ही नहीं, बल्कि उसकी बनावट और खास तौर से अंदरूनी बुनावट में जहाँ कहीं भी सामाजिकता मौजूद है, उसको वह उजागर करे।

विनोद जी के रचनानुभव का नाभिकीय बिन्दु है भारतीय समाज का बचा-खुचा सामुदायिक जीवन और उसकी सामूहिक चेतना, जिसे प्रसिद्ध समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम ने 'समाज को एकीकृत करने वाले विश्वासों एवं नैतिक मूल्यों से निर्मित' माना है। कहना न होगा कि वैदिक वाङ्मय में भी एक खास सन्दर्भ में सामुदायिक जीवन की आकांक्षा का प्रकटकीरण हुआ है : 'सहनाभवतु सहनोभुनक्तु सहवीर्यं करवावहै तेजस्विना वधीतमस्तु मा विद्विषामहे'। नौकर की कमीज', 'खिलेगा तो देखेंगे' एवं 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' का कथानक कमोबेश इसी ग्रामीण सामुदायिक परिदृश्य से उठाया गया है और इसी में कथा परवान चढ़ती हुई एक अनोखे औपन्यासिक रूप-विन्यास को पा सकी है। इन कृतियों में जो सामाजिक-राजनैतिक एवं सांस्कृतिक अन्तःस्वर निहित है, वह भूमंडलीकरण के नाम पर वर्चस्वशाली वर्ग द्वारा भारतीय समाज के अंधपश्चिमीकरण या अमरीकीकरण के मौजूदा एवं संभावित दुष्परिणामों को लेकर कलात्मक प्रतिरोध के भाव से लबालब भरा हुआ है। 'नौकर की कमीज' में नैरेटर जब कहता है कि 'घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता, जितना लौटने के लिए होता है' - तो, अनायास उन तथाकथित प्रवासी भारतीयों की याद हो आती है, जो भारत लौटने के लिए विदेश न जाकर विदेश लौटने के लिए भारत आते हैं। ऐसे विश्वनागरिकों (?) में से कुछ की नियति अन्ततः बेघर होकर रह जाने वाली ही हो सकती है। इस 'बेघर' हो जाने के दंश की 'नॉस्टेलजिक' अभिव्यक्ति कुछ गिने-चुने एन.आर.आई कवियों-लेखकों की रचनाओं में कभी-कभार देखने को मिलती है। यह बात दूसरी है कि अपने घर में रहने के बावजूद कई बार हम एक त्रासद किस्म का बेगानापन झेलने के लिए अभिशप्त होते हैं :

उग रहे हैं दरोदीवार पे सब्ज़ा ग़ालिब
    हम बियाबान में हैं घर में बहार आयी है।

विनोदकुमार शुक्ल ने कथानायक से कहलवाया है : 'घर में मुझे घर की याद आती है।' स्पष्ट ही लगातार तेजी से बदलते परिवेश के साथ तालमेल न बिठा पाने वाले संवेदनशील मनुष्य के लिए आज के माहौल में 'घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है' (शहरयार)। दूसरे शब्दों में भूमंडलीकरण, बाजारवाद एवं नयी महाजनी सभ्यता के सर्वग्रासी व्यापक प्रसार के चलते हमारे समय में सामुदायिक भावना का बहुत हद तक लोप और मानवीय संबंधों में दरार एक 'हाइपर रियलिटी' है, जिसे गहरी कलात्मकता के साथ व्यंजित करते हुए वे लिखते हैं - 'सभी छुपते-छुपते रहेंगे। आना-जाना, काम करते रहेंगे। शुरू-शुरू में तो यह कठिन होगा। पेड़ की आड़ से, छत की आड़ से किराने की दुकान तक जाना होगा। पचास पैसे की हल्दी दुकानदार देगा। उसका चेहरा नहीं दिखेगा, हाथ दिखेगा। हाथ, अखबार फाड़कर पुड़ियाँ बनायेंगे। पैसा लेंगे। 'पचास पैसे की बस इतनी हल्दी!' 'हाँ! इतनी ही हल्दी।' कहीं से आवाज आयेगी। जो आवाज होगी वह भी छुपी हुई, बदली हुई होगी। एक बस आयेगी, ड्राइवर अपने कैबिन में बिना दिखे होगा। पोस्टमैन रजिस्ट्री की आवाज देकर आड़ में छिप जायेगा। हर घर में आड़ बनी होगी, ताकि लोग छुप सकें। छुपने की कला और सभ्यता होगी। एक समाज होगा और छुपते-छुपाते लोगों का शासन। छुपना बचने का ही काम होगा।' (खिलेगा तो देखेंगे, पृ. 62)

कविता के आईने में हमारे भीषण समय का अक्स कवि ने इस प्रकार उकेरा है :

1.

हुआ यह
    कि जहाँ मुझे जाना है
    और जहाँ मैं वापिस हूँ
    उस पूरी दूरी तक
    मैं खड़ा-खड़ा ऊब गया हूँ
    आसपास

xxx

दोस्त का घर मालूम नहीं है

xxx

अँधेरे-अँधेरे में कविता करना
    या मुझे बाजा करना है।'

2.

मैं इतना थका हूँ
    कि एक पेड़ से नहीं
    एक बगीचे से पीठ टेक कर सुस्ता रहा हूँ।
    यह बगीचा मेरा नहीं है।

स्मरणीय है कि अपने जमाने में पश्चिम में लोगों के बीच आरंभिक दिनों में ही रेडियो की अपार लोकप्रियता के मद्देनजर ब्रेष्ट ने लिखा था : 'मुझे पूरा यकीन है कि पूँजीवादी व्यवस्था इसके पश्चात कोई इसकी अन्य संपूरक तकनीक ईजाद करेगी। एक ऐसी ईजाद जिसके माध्यम से रेडियो से जो बात प्रसारित हो रही है, उसे अनंत काल के लिए जस का तस बनाये रखना मुमकिन होगा। आगामी पीढ़ियाँ साक्षी होंगी कि वह नयी संप्रेषण तकनीक पूरी दुनिया में वही संप्रेषित करेगी, जैसी उसकी मर्जी होगी और पूरे विश्व में लोगों को ऐसा प्रतीत होने लगेगा कि खुद उनके अपने कहने या सुनने के लिए कोई बात बची नहीं है।' मौजूदा समय-समाज में मनुष्य की संवेदनशीलता और मानवीय सरोकारों को दृष्टिपथ में रखकर आज हम अपने ही अनुभव को यदि खँगालें तो ब्रेष्त के ही शब्दों में हमें यह एहसास हुए बगैर नहीं रह सकता कि 'जो हँस रहा है, शायद बुरी खबर उस तक पहुँची नहीं है।'

विनोदकुमार शुक्ल भी स्वीकार करते हैं कि 'हमारे यहाँ साहित्य, कविता इत्यादि के लिखने को सामाजिक तौर पर इतना अनसुना और अनदेखा रखा गया है कि कविता और साहित्य का दायरा छोटा हो गया है। बाजार का सांस्कृतिक वर्चस्व जिस तरह बढ़ रहा है उसमें साहित्यकारों और बुध्दिजीवियों के हस्तक्षेप की भूमिका बहुत कमजोर नजर आती है।' उनकी यह आकांक्षा और आशंका जायज है कि कुछ ऐसी स्थितियाँ बननी चाहिए कि यह अनदेखापन और अनसुनापन जैसे कोई आग अचानक भड़कती है और लपट आती है ऐसा कुछ समाज का चौंकना हो जिसमें हमारे रोजमर्रे के कचरे की ढेरी में एक माचिस की तीली के बदले कोई कविता की तीली लगा दे। ऐसा मैं सोच लेता हूँ। इसे मैं एक अच्छी इच्छा की तरह अपेक्षा के रूप में सामने रखता हूँ। इसके सिवा हमारे सामने कोई चारा भी नहीं है।... कविता इक्कीसवीं शताब्दी को बचाएगी। लेकिन इक्कीसवीं शताब्दी कविता को कितना बचाएगी यह कहना कठिन है।' (आलोचना, सहस्त्राब्दी अंक बारह, पृ. 83)

फिर भी यह बात बहुत हद तक सही है कि हमारे इस कथित 'हिंस्र' और 'क्रूर' समय में बिरला ही कोई प्राचीन या मध्ययुगीन भूगोल में लौटना पसंद करेगा। कारण स्पष्ट हैं -- जाति, मजहब, लिंग, संस्कृति, क्षेत्रीयता एवं भाषा आदि के नाम पर धर्मध्वजी बर्बरता फैलाने की पुरजोर कोशिश करने वाले खतरनाक किस्म के कुछ विकृत लोगों की मौजूदगी के बावजूद मानवीय क्रूरताएँ पहले के मुकाबले एक हद तक जर्जर अवश्य हुई हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, मानवाधिकार, सामाजिक न्याय, स्त्री सबलीकरण, पर्यावरण आदि से जुड़े मुद्दों के प्रति लोगों की संवेदनशीलता एवं समझदारी में बेशक इजाफा हुआ है। 'पंचायती-राज व्यवस्था' के सफल-असफल कार्यान्वयन की वजह से भारत में विभिन्न दलित व पिछड़े समुदाय एवं महिलाएँ भी एक हद तक सशक्त होती देखी जा सकती हैं। देश के ज्यादातर हिस्सों में कानून और व्यवस्था की दुर्दशा तथा प्रशासन से लेकर कुछ व्यापारिक संस्थानों में व्याप्त भ्रष्टाचार के बावजूद एक खुशहाल मध्य वर्ग का उदय संभव हो सका है। ऐसे में सवाल उठना वाजिब है कि आखिर विनोदकुमार शुक्ल समेत ज्यादातर रचनाकार अपनी कृतियों में आज के जमाने के साथ-साथ मनुष्य के भविष्य को लेकर इतने आशंकित एवं कई बार आकुल-आतुर क्यों दिखाई पड़ रहे हैं। क्या उनमें 'कामनसेंस' का अभाव है? प्रसंगात निर्मल वर्मा ने लिखा हैः 'हर व्यक्ति जो 'कामनसेंस' को ठुकराकर चलता है, उसे सबसे ज्यादा जोखिम उठाना पड़ता है, वह चाहे मसीहा हो, गुफा में छिपा जादूगर, क्षुब्ध कलाकार... सबको एक पवित्र किस्म के खतरे का सामना करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति अपने मन में एक बम लेकर चलता है, एक प्राइवेट बम...। यह बम 'कामनसेंस' के आदर्शनगर पर गिरा देना चाहिए। उसके विस्फोट से जो लपटें निकलेंगी, उनके प्रकाश में हम असली 'कला' को पहचान सकेंगे या अतार्किक कल्पना की तर्कसंगत 'कामनसेंस' पर सबसे बड़ी विजय होगी।'

विनोदकुमार शुक्ल के सृजन की नैतिकता को वहाँ भी रेखांकित करना जरूरी है, जहाँ लगभग पाँच हजार साल पुरानी कही जाने वाली भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की कुक्षि से उत्पन्न मानवीय परिवेश एवं मूल्य पर आसन्न संकट को गद्य के बजाय कविता में पिरोया गया है -

याद आने की होगी
    थोड़ी बहुत सीमा -

x x x

दूर हो जायेगी गँवई, याद आने की अधिकतम सीमा भी

x x x

समय गुजर जाता है
    जैसी सरकारी वसूली के लिए साहब दौरे पर।
    फिलहाल सूखा है
    इसलिए वसूली स्थगित
    पिटते हुए आदमी के बेहोश होने पर
    जैसे पीटना स्थगित।
    मर गया प्रदेश
    मर गयी जगह पड़ी हुई उसी जगह
    उत्तर प्रदेश, राजस्थान
    बिहार, कर्नाटक, आंध्र
    बिखर गयी बैलों के अस्थिपंजर-सी जमीन उत्तर से दक्षिण
    जमीन के अनुपात से
    आकाश को गिद्ध कहूँ

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फिर मरे हुए दिन की परछाई रात अँधेरी।'

'खिलेगा तो देखेंगे' उपन्यास में पुलिस थाने से आतंकित औसत भारतीय ग्रामीण समुदाय के सदस्यों की मनोसामाजिक संरचना का जो मार्मिक एवं कलात्मक विवरण प्रस्तुत किया गया है वह मूल में ही पठनीय है। बहरहाल, कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं - 'पुलिस थाना करीब डेढ़-दो साल से खाली पड़ा था। और उजाड़ था।... थाना इतने दिनों से खाली था तब भी गाँववालों की उस तरफ जाने की हिम्मत नहीं होती थी। बकरियाँ तक भूले-भटके उस तरफ नहीं जाती थीं।... थाने के अहाते के अंदर मीठे पाने का कुआँ था। केवल यही कुआँ होता और थाना नहीं होता तो कुएँ के इर्द-गिर्द गाँव और बस गया होता। थाने के इर्द-गिर्द गाँव के बसने का कोई तुक नहीं था। गाँव हमेशा थाने के पीछे रहा आया और थाने इतने दिनों तक खाली रहने के बाद भी उसकी तरफ एक झोपड़ी नहीं बढ़ा।' (खिलेगा तो देखेंगे, पृ. 10)

उपन्यास के ऊपर उद्धृत अंश से गुजरते हुए हिंदी इलाके में हाशिए पर की जिंदगी जीने को अभिशप्त अनेक पिछड़े समुदायों पर पुलिस जुलुम के संदर्भ में यदि दो भिन्न प्रकृति के ठोस उदाहरणों के माध्यम से अपनी बात ज्यादा स्पष्ट करनी हो, तो, उसका एक पहलू अकबर इलाहाबादी की इन काव्यपंक्तियों में देखा जा सकता है, जिसके मूल में पुलिस द्वारा गलत मामले में फँसाए जाने को लेकर भले आदमियों के मन का डर व्यक्त हुआ है :

रक़ीबों ने लिखाई है रपट जा-जा के थाने में
    अकबर नाम लेता है खुदा का इस ज़माने में।

और दूसरा पहलू देहात में गाए जानेवाले कुछ मार्मिक लोकगीतों में, जिनमें सत्ता-व्यवस्था के आतंक के समक्ष आम आदमी की निरीहता की अभिव्यक्ति हुई है :

1. 'बाबू दरोगाजी! कोने बहनवे बन्हली पियवा मोर?
    ना मोर पियवा बा बटमरवा, ना मोर पियवा चोर।'

2. 'सुनहूँ दरोगा बाबू, हमरो बेयनियाँ जी
    रस्ता में समान छिनलक, छोड़लक मोर परनियाँ जी।'

सत्ता-व्यवस्था के इस आतंक का हिन्दी साहित्य-क्षेत्र में एक दिलचस्प उदाहरण 'आलोचक' को मुक्तिबोध द्वारा 'साहित्य का दारोगा' कहा जाना है। विचित्र बात है कि जिस 'आलोचक' को सम्मान के साथ ध्वन्यालोककार आनंदवर्धन ने कभी 'सचेतस्' सहृदय कहा था उसे एक बड़े रचनाकार को आखिर 'साहित्य का दारोगा' क्यों कहना पड़ा? आलोचना को केवल 'पोलेमिक्स' का पर्याय बना देने के लिए जवाबदेह आलोचकों को इस मुद्दे पर खुले दिमाग से विचार करना चाहिए।

इसे देखते हुए हमारे समय के तथाकथित अग्निवर्षी आलोचकों को शायद याद दिलाना जरूरी हो कि साहित्यिक कृतियों में किसी आत्यंतिक आक्रोश की राजनीति को न पाकर 'सिर धुनि-धुनि पछिताई' वाली मुद्रा अपनाने के बजाय उसमें उस गलदश्रु भावुकता' की सिरे से अनुपस्थिति का रेखांकन ज्यादा विवेकपूर्ण होगा, जिसका 'खिलेगा तो देखेंगे' उपन्यास की कला की सिद्धि में बहुत बड़ा योगदान है। भारतीय निम्नमध्यवर्गीय लोगों के सहज-स्वाभाविक जीवन को लेकर गहरी अंतर्दृष्टि, निष्ठा, समझदारी एवं सहानुभूति के संश्लेषण से निष्पन्न ऐसी कलाकृतियाँ अर्थबाहुल्य की स्निग्धता तथा रचनाकार की डबडबाई हुई आंतरिकता का पता स्वयं देती हैं, जिसमें 'मर्मस्पर्शिता और परिहास का निराला संतुलन' खास तौर से उल्लेखनीय है।

उनके उपन्यासों को पढ़ते हुए एक बात जो शिद्दत के साथ महसूस होती है वह यह कि पारंपरिक भारतीय सामाजिक जीवन की सादगी व सरलता में केवल आकर्षणहीनता की बात करना एक सीमा के बाद अनुचित है। यदि यह बात जायज है कि मानवता का कायदे से कोई भी अध्ययन मनुष्य के व्यापक अध्ययन के बिना नामुमकिन है, तो, इसमें विनोद जी का कथा-साहित्य बहुत हद तक स्रोत सामग्री के रूप में किसी भी विवेकी साहित्यिक और सहृदय समाजशास्त्री के लिए बड़े काम की चीज साबित हो सकता है, क्योंकि समाजवैज्ञानिकों द्वारा संकलित तथाकथित ठोस सामग्री की तुलना में साहित्य ही समाजशास्त्री को व्यक्ति और समाज के अंतःसम्बन्धों की प्रामाणिक जानकारी देता चला आया है। प्रसंगात एंगेल्स ने लिखा है कि फ्रांसीसी समाज के बारे में जो तथ्य उन्हें बालजाक के कथा साहित्य से गुजरते हुए मिले, वे तत्कालीन समाजशास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों के लेखन में मौजूद आँकड़ों की तुलना में ज्यादा प्रामाणिक थे। विनोद जी का कवि-कथाकार औसत भारतीय लोगों की सीमाओं, कमजोरियों और पराजयों से परिचित है, पर उसकी शक्ति, सामर्थ्य एवं आह्लाद का भी उसे अंदाजा है। दूसरे शब्दों में, लेखक को आम आदमी के सुख-दुःख', दोनों ही जीवनस्थितियों एवं मनोदशाओं का मर्मांतक बोध है, जिसे बौद्ध जातक कथा में एक स्थान पर इस प्रकार व्यंजित किया गया है :

'जंगल में अचानक बाघ को देखते ही घबराकर कोई आदमी अंधे कुएँ में कूद पड़ा और दीवार से लगी एक मजबूत टहनी से लटक गया। बहरहाल, उसकी जान बच गयी। अब कुएँ के जगत पर बैठा बाघ उसे बाहर निकलते ही खा जाएगा और कुएँ के भीतर एक जहरीला बहुत बड़ा काला साँप फण फैलाए दिखाई दे रहा है। उस आदमी की मुश्किल यह है कि इस हालत से वह निजात कैसे पाए। क्या खाए, क्या पिए, करे तो क्या करे? किन्तु, उसी कुएँ की दीवार पर मधुमक्खी का छत्ता है, जिससे कभी-कभार शहद की बूँद टपकती है जिसे चाटकर वह आदमी किसी तरह जिन्दा है।'

कवि विनोद कुमार शुक्ल ने भी अपने खास अन्दाज में मनुष्य की जिजीविषा को वाणी दी है :

'एक मनुष्य, मनुष्य की प्रजाति की तरह
    साइरन की आवाज सुनते ही
    जान बचाने गड्ढे में कूद जाता है
    गड्ढे के किनारे टहलती हुई
    गर्भवती स्त्री
    एक मनुष्य जीव को जन्म देने
    सँभलकर गड्ढे में उतर जाती है।'

- सब कुछ होना बचा रहेगा

यह मनुष्य की उत्कट जिजीविषा ही है जिसके चलते अतीत में भोगे गए घोर दुख के क्षणों का स्मरण करने पर भी उसे सुखानुभूति होती है। कालिदास के राम जब वन से अयोध्या लौटे तो वे एक चित्रशाला में गए जहाँ लोगों ने उनके दुखद वनवासी जीवन के चित्र बना रखे थे। तब राम कहते हैं कि दण्डकारण्य में उन्होंने जो दुख उठाए थे उन्ही के चित्र अब सुख की अनुभूति करा रहे हैं - 'प्राप्तानि दुःखान्यपि दंडकेषु संचिन्त्यमानानि सुखान्यभूवन्।'

साहित्यालोचन के क्षेत्र में व्याप्त यह एक बिडंबना ही कही जाएगी जिसके तहत ज्यादातर पढ़ने और खास तौर से हमेशा लिखने के लिए अतिउत्साही जन अपने प्रत्येक समकालीन कवि-कथाकार की रचनात्मक उपलब्धियों का जायजा लेते हुए एलियट के 'परंपरा एवं वैयक्तिक प्रज्ञा' निबंध को कभी न भूल पाने को बाध्य दिखाई देते हैं। नतीजतन, प्रायः किसी उपन्यास या कहानी को यांत्रिक ढंग से पहले से ही किसी परमपरा-विशेष के खाँचे में खतियाई हुई कृतियों की कसौटी पर कसने के वे आदतन शिकार होते हैं। स्पष्ट ही इसके चलते मूल्यांकन के क्षेत्र में अतिसरलीकरण की स्थिति का पैदा हो जाना अस्वाभाविक नहीं है। स्पष्टतः विनोदकुमार शुक्ल की रचनाओं के उपयुक्त मूल्यांकन के लिए ऐसी आलोचना-दृष्टि काम्य है, जो साहित्यिक कृतियों की प्रासंगिकता के सवाल को स्थूल समाजशास्त्रीयता की गिरफ्त से मुक्त करने में समर्थ हो।

इस संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इतिहास हो या साहित्येतिहास, कोई भी परंपरा अपने मूल या विशुद्ध रूप में वर्तमान में अवतरित नहीं होती। वस्तुतः वह इतिहास की धारा में समय-समय पर की जानेवाली अनेकानेक पुनर्व्याख्याओं व विश्लेषणों के सार तत्त्व को आत्मसात करती हुई और कई बार उनसे दूर तक प्रभावित होती हुई अतीत से वर्तमान तक की यात्रा तय करती है। इसलिए कथा-साहित्य में प्रेमचंद तथा जैनेन्द्र-अज्ञेय की तथाकथित 'प्रगतिशील' और 'कलावादी' परंपराओं की दुहाई देते हुए जिसे हम अपनी आस्वादपरक साहित्यिक रुचि या अरुचि मान बैठते हैं, वह भी वस्तुतः लंबे अरसे तक विभिन्न प्रचलित प्रतिमानों व मतवादों के अभिभूतकारी प्रभावों के तहत हमारी एक खास तरह की रचनाओं का आस्वादन करते रहने की आदत का ही नतीजा है। शूकिंग ने 'साहित्यिक अभिरुचि का समाजशास्त्र' पुस्तक में इस मुद्दे की भिन्न संदर्भ में परत-दर-परत पड़ताल की है। उनका कहना है कि किसी भी देश-काल में साहित्यिक रचनाशीलता की अभिरुचि एवं उसके पठन-पाठन व आस्वादन में गुणात्मक परिवर्तन प्रायः तभी घटित होता है, जबकि उस परिवर्तन को परिचालित करनेवाली कोई न कोई सामाजिक शक्ति उस जमाने में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अवश्य सक्रिय रहा करती है। इसी मुद्दे का दूसरा पहलू वहाँ सामने आता है, जहाँ हम अतिउत्साह में अपनी साहित्यिक रुचि अथवा अरुचि को भली भाँति जानने की ऊर्ध्वबाहु उद्घोषणा करने में तनिक भी नहीं हिचकते, जबकि वास्तविकता प्रायः उलट होती है। हमें प्रायः उन्हीं रचनाकारों की अनेकानेक कृतियों में से कुछ रचनाएँ अच्छी लगने लगती हैं, जिनसे हम बतौर पाठक परिचित होते हैं और जो हमारी सौन्दर्यात्मक संवेदनशीलता को तथाकथित 'अलौकिक' आनंद व तुष्टि देने में समर्थ होती हैं।

ऐसे में एक खास तरह की पाठकीय रुचि या अरुचि के तहत विनोदकुमार शुक्ल की कृतियों पर प्रेमचंद अथवा जैनेन्द्र की परंपरा के नाम पर कुंडली मारकर बैठ जाने की आलोचकीय जिद्द न केवल गैर-रचनात्मक और अनैतिहासिक है, बल्कि अविवेकी भी। यह सही है कि उनके यहाँ रचनात्मक वैविध्य की एक सीमा तक कमी है और कई बार जब वे औपन्यासिक शिल्प के स्तर पर एक रचनात्मक तरकीब से दूसरी और दूसरी से तीसरी तरकीब निकालने की कोशिश करते हैं, तो इससे कभी-कभी उनके उपन्यास अपने रचनात्मक अभिप्राय एवं प्रभाव की दृष्टि से एक खास तरह का 'कलात्मक धोखा' पैदा करते प्रतीत होते हैं। प्रसंगात् मुक्तिबोध ने 'व्यक्तित्त्व और रचना का संबंध' पर विचार करते हुए लिखा है : 'साहित्य बहुत हद तक एक धोखा।... यह भी कहा जा सकता है कि वह रोल लेखक का एक सधा हुआ मनोवैज्ञानिक विक्षेप है। भोक्ता और कलाकार के बीच जो एक आंतरिक संबंध है, वहीं इस रोल का स्थान है। इसीलिए वह एक नकाब नहीं है - जैसा कि स्वयं मार्क्सवादी आलोचक लांछन लगाते हैं। नकाब होती तो उतरती भी। कृतिकार अपने को या दुनिया को धोखा देना नहीं चाहता। उसका वह उद्देश्य नहीं है। लेकिन धोखा पैदा हो जाता है। जितना बड़ा धोखा पैदा होगा उतना वह बड़ा कलाकार भी माना जाएगा।' कहना न होगा कि विनोदकुमार शुक्ल का कथा-साहित्य और उसमें भी 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' उपन्यास ऊपर कथित कलात्मक धोखे का एक सुंदर संवेदनात्मक साक्ष्य है।

भगवानदास मोरवाल के सद्यःप्रकाशित उपन्यास 'रेत' पर विचार करते हुए एक सहृदय समाजविज्ञानी अभय कुमार दुबे ने अपने खास तल्ख-बौद्धिक अंदाज में सवाल उठाया है कि 'इसके कथानक की भाषा इतनी धुली-पुछी क्यों है कि जैसे नैतिकता की फिनाइल से सब कुछ साफ कर दिया गया हो? क्या हिन्दी साहित्य ने अभी तक ऐसी भाषा ईजाद ही नहीं की है जो पोर्नोग्राफी हुए बिना यौन जीवन के विवरण दे पाने में सक्षम हो? हिन्दी साहित्य की सेक्सुअल पालिटिक्स का यह कौन-सा रूप है?'

'सेक्सुअलिटी बनाम ब्रह्मचर्यवादी राजनीति' शीर्षकीय दिलचस्प, किंतु, विचित्र अपेक्षाओं से लबालब सहृदय समाजशास्त्री को दिनकर की 'उर्वशी', मृदुला गर्ग की 'चितकोबरा', सुधीर कक्कर की हिन्दी में 'कामयोगी' नाम से अनूदित (एसेटिक ऑफ डिज़ायर) औपन्यासिक कृति तथा हिन्दी साहित्य में मुख्यतः 'स्टंट' और स्कैंडल' की सनसनी के बल पर लोकप्रिय 'हंस' में प्रकाशित अनेकानेक अच्छी-बुरी रचनाओं से गुजरने का सुयोग अवश्य मिला होगा। इसके बावजूद यदि उन्हें देह भाषा का कुछ 'अभाव' खटकता हो तो : बाखुदा दीवानाबाश, बामुहम्म्द होशियार। स्पष्ट ही उपर्युक्त रचनाओं से आगे की जो 'देहभाषा' होगी या हो सकती है, वह हिन्दी कथा साहित्य में पोर्नोग्राफी का ही 'उत्पादन' करेगी, जिससे हिन्दी पाठकों को जितनी दूर रखा जाय उतना ही उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहतर है। बावजूद इसके, यह एक दुखद सत्य है कि रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड आदि के बुक स्टाल पर हिन्दी में भी लिखित व प्रकाशित लुगदी या घासलेटी साहित्य, खास तौर से उपन्यासों व पत्रिकानुमा चीजों की धड़ल्ले से बिक्री कम नहीं है, जो वस्तुतः हिन्दी समाज के सांस्कृतिक पतन की पैदावार हैं, जिनमें शायद प्रेमरहित यौन संबंधों को विकृति की चरम सीमा तक गर्हित रस के गढ़े में डुबो-डुबोकर लिखने व पढ़ने की वीभत्स प्रवृत्ति होती है।

यह सुखद है कि आज जबकि पश्चिम में, 'मध्यवर्ग के महाकाव्य' के तौर पर स्वतंत्र विधा के रूप में विकसित उपन्यास, मिलान कुंदेरा के शब्दों में, 'अपनी ऐतिहासिक परिणति में जाल में फँस-सी गई दुनिया की पड़ताल करने के लिए अभिशप्त है', वहीं एशिया और भारत में विनोदकुमार शुक्ल सरीखे कई रचनाकार आनेवाली पीढ़ी के लिए पश्चिमी उपन्यासों के स्वरूप एवं संरचना के बरक्स भारतीय आख्यान-परम्परा की उर्वर भूमि से रस खींचते हुए एक स्वकीय संरचना के माध्यम से औसत भारतीय मनुष्य की जिजीविषा का सृजनात्मक साक्ष्य रचने में मसरूफ हैं। स्पष्ट ही इनमें विनोद जी का शब्दकर्म उच्चवर्गीय एवं मध्यवर्गीय भारतीय जीवन की बाहरी चमक-दमक या तड़क-भड़क के संजाल से दूर आम आदमी के सहज स्वाभाविक जीवन में निहित आस्था का जीवंत आख्यान है, जिसमें मनुष्य की आत्मा में सुप्त बुनियादी रागात्मकता का उद्घाटन संभव हो सका है। उनके उपन्यासों में आए अधिकांश पात्र आधुनिक व उत्तर-आधुनिक कहे जानेवाले भारतीय मध्यवर्ग की शतमुख भोग की लालसा तथा उस अपराध भावना की उस समाजशास्त्रीय वास्तविकता से कोसों दूर है, जिसके तहत समान भाव से लूट में अपने हिस्से के लिए शिरकत करने की तमन्ना के साथ ही ऐसा मौका न मिलने पर लूट में शिरकत न कर पाने की बेचैनी भी दिखाई पड़ती है। भारतीय आख्यान-परम्परा की अपनी जमीन से जुड़े उनके औपन्यासिक आख्यानों की एक विशेषता पश्चिम से भिन्न काल-चेतना है, जो मैनेजर पाण्डेय से विचार-सूत्र लेकर कहें तो, 'उपन्यास की कथा की संरचना को ही प्रभावित नहीं करती है, उपन्यासकार की यथार्थ-चेतना और पात्रों की मानसिक बनावट को भी अनुशासित करती है।' (साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका, पृ. 283) इतिहासाचार्य विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े के 'कादंबरी' निबंध का हवाला देते हुए डॉ. पाण्डेय ने विस्तार के साथ समझाया है कि कैसे 'आरंभ में ही आत्यन्तिक औपनिवेशिक प्रभाव की वजह से भारत में उपन्यास विधा अभिशप्त हो गई।' फिर भी हमें इस समाजशास्त्रीय तथ्य की कतई अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि भारत में और खास तौर से हिन्दी में उपन्यास के जन्म के पीछे सिर्फ विदेशी प्रेरणा ही नहीं थी, बल्कि भारत के नये उभरते मध्यवर्ग की बौद्धिक आवश्यकताओं का दबाव भी था। भारतीय जनता के सामने एक ओर वर्चस्ववादी औपनिवेशिक संस्कृति थी तो दूसरी ओर भारत की पारम्परिक संस्कृति।... सामाजिक सुधारवाद के उद्देश्य से परिचालित होकर, एक विशेष 'मिशन' के तहत हिन्दी के सभी प्रारम्भिक उपन्यास लिखे गए।' (गरिमा श्रीवास्तव : आलोचना, अप्रैल-जून 2008, पृ. 81-83) उल्लेखनीय है कि कालांतर में प्रेमचंद, यशपाल, नागर, रेणु, हजारीप्रसाद द्विवेदी सरीखे अनेकानेक उपन्यासकारों द्वारा हिन्दी उपन्यास की एक स्वकीय संरचना का सृजन सम्भव हुआ, जिसकी एक बड़ी मंजिल पर उपन्यासकार विनोदकुमार शुक्ल खड़े दिखाई देते हैं। मैनेजर पाण्डे की शब्दावली उधार लेकर कहा जाय तो विनोद जी के उपन्यासों में भारतीय कथा-परंपरा और यूरोपीय ढाँचे के आधार पर स्वतंत्र रूप से हाल-हाल तक विकसित हिंदी उपन्यास की स्वकीय संरचना के बीच सृजनात्मक तनाव के साथ ही भारतीय कथा-कौशल के विलक्षण प्रयोग भी मिलते हैं।

उपर्युक्त विमर्श के आलोक में 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' उपन्यास में कथानायक रघुवर प्रसाद और उसकी घरनी सोनसी के बीच प्रणय की प्रगाढ़ता के चित्रण के दरम्यान जिस रचनात्मक व कलात्मक संयम के तहत मनुष्य (स्त्री-पुरुष) की मनोदैहिक प्रक्रिया की गहराई में उतरकर उनके काम-संवेगों की परत दर परत उकेरते हुए लेखक ने अपनी शक्ति एवं सीमा में साहिेत्य-रचना के दरम्यान स्त्री-पुरुष, दोनों की आत्मा में प्रवेश कर उनके संबंधों के इस त्याज्य- से माने जाने वाले पक्ष का जो तरोताजा सौन्दर्यशील यथार्थ रचा है, वह विस्तार से मूल कृति में ही पठनीय है। उदाहरण के लिए कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं - 'सोनसी रघुवर प्रसाद के गले में हाथ डालकर लटक गई। पीठ पर सोनसी को लादे रघुवर प्रसाद घूमे।... सोनसी उतरने-उतरने को थी कि रघुवर प्रसाद ने गले में लिपटे सोनसी के हाथों को कसकर पकड़ लिया... गहरी रात की शान्ति थी... सोनसी रघुवर प्रसाद के कन्धों में लदी रघुवर प्रसाद के हर कदम में धीरे से उछलती जाती... ऐसा था कि ये दोनों जागे थे और सब कुछ नींद में झूम रहा था... सोनसी अपने पैरों को रघुवर प्रसाद की कमर में लपेटना चाहती थी पर साड़ी के कारण वह लपेट नहीं पा रही थी... सोनसी ने रघुवर की कमर में पैर लपेटे तो रघुवर प्रसाद ने सोनसी के कूल्हे के नीचे दोनों हथेलियों को बाँधकर धीरे से ऊपर उछाला तो सोनसी के हाथ रघुवर प्रसाद की गरदन पर ढीले हो गये... रघुवर प्रसाद तालाब के किनारे-किनारे चलने लगे। सोनसी तालाब में रघुवर प्रसाद की परछाईं के ऊपर अपनी लदी परछाईं को देख रही थी। रघुवर प्रसाद सोनसी को लादे हुए धीरे से तालाब में उतर गए... तालाब से निकले तो और अच्छा लगा। तालाब के पास एक टीला था। सोनसी ने कहा, 'मुझे उतार दो। तुम बहुत थक गये होगे। मैं तुम्हें बहुत थकाती हूँ।' ... 'तुम्हारे कन्धे पर चन्द्रमा बैठा है।' सोनसी ने लेटे-लेटे हाथ उठाते हुए कहा। जैसे वह रघुवर प्रसाद को बुला रही हो और रघुवर प्रसाद बहुत दूरी पर थे। रघुवर प्रसाद खड़े-खड़े सोनसी को देख रहे थे। सोनसी को लगा रघुवर प्रसाद के कन्धे पर बैठा चन्द्रमा पास आ रहा है। सोनसी ने पास आने के सुख की चमक को सहने के लिए आँख मूँद लिए थे।' (पृ. 68)

इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि प्रणय-क्रीड़ा में सोनसी की सक्रियता अनायास ही अपभ्रंश के एक दोहे की याद दिलाती है, जिसमें प्रियतमा कहती है कि यदि प्रियतम मिल गया तो मैं उसे वैसे ही सोख लूगी जैसे कच्ची मिट्टी का सकोरा पानी सोख लेता है। याद रहे कि रघुवर प्रसाद और सोनसी की प्रणय-क्रीड़ा किसी भी तरह वेब्लेन और मांटेस्क्यू सरीखे विचारकों द्वारा चिह्नित 'सुखासीन समुदाय' (लेजर - लक्जरी क्लास) के 'नागर' की उन्मुक्त भोगवादी प्रवृत्ति से परिचालित काम-लीला नहीं है, जिसके पास हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में 'प्रचुर संपत्ति, पर्याप्त अवकाश और अकल्पनीय निश्चिन्तता' होती है और जिसकी 'रहनी' का ब्यौरा देते हुए वात्स्यायन ने 'कामसूत्र' में लिखा है : 'नागरिक का निवास किसी सरोवर के किनारे हो जिसमें अलग-अलग जरूरतों के लिए अनेक कमरे हों। घर के चारों तरफ रंग-बिरंगे सुगंधित फूलों से भरा बगीचा हो, सुंदर बेलें और कोमल घास हो... बैठक में सुंदर पलंग पर मुलायम गद्दा, बेलबूटों वाली सफेद चादर, तकिये। पलंग के पास ही संभोग लीला के लिए एक छोटा पलंग होना चाहिए ताकि बड़ा पलंग अशुद्ध न हो जाए... छोटी मेज पर संभोग सुख के सामान, सुगंधित लेप, फूल मालाएँ, श्रृंगार प्रसाधन.... कमरे में चौपड़ और शतरंज का सामान हो।' यह वही 'नागर' है जिसकी विलासितापूर्ण जीवन-शैली का रीतिकाल के अंतिम महत्त्वपूर्ण कवि पद्माकर ने 'गुलगुली गिल में गलीचा है, गुनीजन हैं, / चाँदनी है, चिक है, चिरागन की माला है' - जैसे छंद में चित्रण किया है और जो प्रेमचन्द की 'शतरंज के खिलाड़ी' कहानी का भी प्रतिपाद्य है। इनसे विलग रघुवर-सोनसी का प्रणय सुख एक औसत भारतीय मनुष्य का 'एक चिथड़ा सुख' है, जो रागात्मक ऐन्द्रिय-ऐश्वर्य की मांसलता से परिपूर्ण है। जदानोवाद से एक लम्बे अरसे तक प्रभावित जार्ज लुकाच के अंधअनुसरणकर्ता हिन्दी आलोचकों को शायद याद दिलाना शायद जरूरी हो कि साहित्य-सृजन में 'मांसलता' को अनिवार्यतः 'पतनोन्मुख समाज का लक्षण' (जार्ज लुकाज) मान लेना एक सौन्दर्यशास्रीय चूक भी हो सकती है और विनोद जी की औपन्यासिक कृतियाँ ऐसी तथाकथित आर्यसमाजी नैतिकता के विरुद्ध स्त्री-पुरुष के बीच गहरी आत्मीयता एवं ऐन्द्रिक संवेदना के गल्प का जबरदस्त नमूना पेश करती हैं। इस आत्मीयता के नैतिक पक्ष की अनिवार्य शर्त यह है कि 'अपने को बचाने से दूसरा नहीं बचता। दूसरे को बचाने में अपने बचे रहने की उम्मीद होनी चाहिए। लेकिन दूसरे को बचाने में जो नष्ट होता है वह नष्ट नहीं होता - या तो दूसरा बचा होता है या बचाने की कोशिश बची होती है।' (विनोदकुमार शुक्ल, आलोचना, सहस्त्राब्दी अंक 12, 2003, पृ. 83) 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' उपन्यास में वर्णित रघुवर-सोनसी के प्रेम की प्रगाढ़ता तथा उनके पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में सौमनस्य के मद्देनजर मिलान कुन्देरा का वह कथन सौभाग्यवश अविकसित एवं विकासशील देशों की अभावग्रस्त निम्न-मध्यवर्गीय आबादी के जीवन के प्रसंग में पूरी तरह लागू नहीं होता, जिसमें कहा गया है कि 'हमारे समय में महानतम प्रेम की परिणति भी निःसंवेद स्मृति-कंकाल में होती है।'

प्रसंगवश प्रियदर्शन की 'उसके हिस्से का जादू' कहानी-संग्रह की 'पेइंग गेस्ट' कहानी पर स्त्रीवादी आलोचक गरिमा श्रीवास्तव की टिप्पणी द्रष्टव्य है, जिसमें ईमानदार स्वीकृति है कि 'पुरुष द्वारा लिखित यह कहानी इस मिथ को भी तोड़ती है कि स्त्री ही स्त्री के अनुभूतिमण्डल को ज्यादा कारगर ढंग से समझ और अभिव्यक्त कर सकती है।' (संवेद - 17, सितंबर 2008, पृ. 303) गोकि यह आलोचकीय निष्कर्ष लेखक की 'माँ' कहानी के संदर्भ में संभवतः ज्यादा सार्थक है। बहरहाल, कहना यह है कि किसी भी समर्थ रचनाकार (स्त्री-पुरुष) में एक विलक्षण आत्मनिषेधात्मक क्षमता होती है, जिसके चलते वह वर्ण, जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, आयु आदि से जुड़ी स्वाभाविक सीमाओं का अतिक्रमण करता है। साथ ही, श्रेष्ठ गल्प की अर्थबहुलता प्रायः बहुसंदर्भ-मुखर हुआ करती है। बहुसंदर्भ-मुखर पाठों की यह 'अर्थबहुलता', फ्रेडरिक जेम्सन के अनुसार, किसी पाठक या आलोचक की कोई आकस्मिक सूझ या इलहाम के बजाय पाठ और परिप्रेक्ष्य के बीच अंतःसलिला की तरह विद्यमान कौटुम्बिक्ता की सिलसिलेवार गहरी पहचान का नतीजा होती है।

विनोदकुमार शुक्ल के प्रगीतात्मक गल्प का वैशिष्ट्य इस बात में है कि यह अपनी बनावट और बुनावट में अनेकानेक स्थानीय सांस्कृतिक तत्त्वों को इस कदर समेटे हुए है कि पाठक के सामने बिंदु-दर-बिंदु, प्रश्न-प्रति-प्रश्न एक सृजनात्मक संसार खुलता चला जाता है, जिसे आलोचना-क्रम में विवेचित, विश्लेषित व पुनर्रचित करना मुश्किल है। सच तो यह है कि इस दरम्यान रचनाकार के निगूढ़ वर्णन एवं अभिप्राय (मोटिव) के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ भी स्पृहणीय नहीं है, क्योंकि गहरे संवेदन-द्रव से लबरेज मूल पाठ के साथ ऐसा कोई भी आलोचकीय बर्ताव उपन्यासकार की किस्सागोई एवं चित्रण प्रस्तुत करने के उसकी निजी कला को नष्ट-भ्रष्ट कर दे सकता है। बावजूद इसके, 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' में आये प्रणय-प्रसंगों के बारे में विष्णु खरे का एक कथन द्रष्टव्य है : 'प्रदर्शनवाद से बचते हुए इसमें उन्होंने ऐन्द्रिकता, मांसलता, रति और श्रृंगार के ऐसे चित्र दिये हैं जो बगैर उत्तेजक हुए आत्मा को इस आदिम संबंध के सौन्दर्य से समृद्ध कर देते हैं, और वे चस्पाँ किये हुए नहीं हैं, बल्कि नितांत स्वाभाविक हैं - उनके बिना यह उपन्यास अधूरा, अविश्वसनीय, बंध्य होता। बल्कि आश्चर्य यह है कि उनकी कविता में यह शारीरिकता नहीं है।' विद्वान कवि-आलोचक को संभवतः विवेच्य उपन्यासकार की वह कवित्वपूर्ण स्वीकारोक्ति जरूर याद होगी जिसमें कहा गया है :

उपन्यास में पहले एक कविता रहती थी

x x x

    हवा का झोंका जो आया था
        वह भी था अनगिन हवा के झोंकों का
        पहला झोंका कुछ देर।
        अनगिन से निकलकर एक लहर भी
        पहली, बस कुछ पल।
        अनगिन का अकेला
        अनगिन अकेले अनगिन।
        अनगिन से अकेली एक -
        संगिनी जीवन भर।

यदि कोई सहृदय पाठक ऊपर उद्धृत काव्यांश या पूरी कविता को 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' में आए रघुवर प्रसाद एवं सोनसी के प्रणय-चित्रण तथा 'खिलेगा तो देखेंगे' में चित्रित गुरूजी एवं उनकी पत्नी के गहरे दाम्पत्य संबंध से जोड़कर पढ़ने की पेशकश करें, तो रचना के उत्स से लेकर उसकी अभिग्रहण-प्रक्रिया का वृत्त स्वतः पूरा हो जायेगा।

स्त्री-पुरुष के बीच ऐसा मनोदैहिक व आत्मीय प्रेम संबंध अनिवार्यतः तथाकथित 'सफल दाम्पत्य' के अन्तर्गत ही हो, यह कहना एक सीमा के बाद शायद अर्द्धसत्य होगा। प्रसंगात् एंगेल्स की 'परिवार, राज्य एवं निजी संपत्ति का उदय' पुस्तक में आये नीचे उद्धृत मंतव्य पर दृष्टिपात करना, स्त्रीवादी कवि-आलोचक अनामिका की शब्दावली उधार लेकर कहें तो, वर्तमान समय में हमें अपने 'मन माँझने की जरूरत' का गहरा अहसास कराता है : 'ऐसे पुरुषों की पीढ़ी जिन्हें अपने जीवन में कभी किसी नारी देह को पैसा देकर या सामाजिक शक्ति के अन्य साधन के द्वारा खरीदने का अवसर नहीं मिला है; और ऐसी नारियों की पीढ़ी जिन्हें सच्चे प्रेम के अतिरिक्त और किसी कारण से किसी पुरुष को अपनी देह सौंपने के लिए विवश नहीं होना पड़ा है और न अपने प्रेम के सामने आत्मसमर्पण करने के रास्ते में किन्हीं आर्थिक परिणामों के डर से हिचकिचाहट का सामना करना पड़ा है, एक बार जब ऐसे स्त्री-पुरुष पैदा हो जाएँगे तब वे इस बात की तनिक भी चिंता नहीं करेंगे कि हमारी आज की राय के अनुसार उन्हें क्या करना चाहिए।'

साहित्य का समाजशास्त्रीय अध्ययन करनेवाले कुछ उत्तर-आधुनिक विद्वानों ने साहित्यिक पाठों के पठन के दौरान पाठकीय अनुक्रिया पर विचारते हुए 'पठन' को एक प्रकार का 'प्रतिरोध' माना है। इस दृष्टि से 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' के औपन्यासिक पाठ से ऊपर विस्तार से उद्धृत रघुवर और सोनसी के प्रणय-चित्रण की प्रगाढ़ता से संबंधित अंश का पाठक के मन पर पड़नेवाले प्रभाव की पड़ताल करने के लिए यदि कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी द्वारा भिन्न संदर्भ मे व्यक्त एक मंतव्य से विचार-सूत्र लेकर कहें तो इस पूरे प्रसंग से गुजरते हुए 'पाठक वस्तुतः एक ही साथ विनोदकुमार शुक्ल, औपन्यासिक पाठ और प्रेम, तीनों को पढ़ता है : तीनों ही एक-दूसरे को अपनी-अपनी अद्वितीय आभा और आशा के साथ रचते-गढ़ते हैं। एक ठोस व्यक्ति के प्रेम को शब्दों में जानना और उससे तादात्म होना आसान नहीं है।' पर अगर ऐसा हो पाता है तो पाठक अपने प्रेम को भी, अपने अनकहे को भी मानो कह पाते हैं। इसलिए, विनोद जी के औपन्यासिक पाठ से ऊपर उद्धृत अंश या ऐसे ही अनेकानेक प्रसंग पाठक को एक साथ बिलकुल अपना और फिर अपने से अलग दोनों लग सकते हैं। अशोक जी ने सही इंगित किया है कि 'अपने और दूसरे के बीच यह एक तरह का नाजुक, लगभग खतरनाक-सा संतुलन है।' ('कवि कह गया है') विनोदकुमार शुक्ल की रचनाओं में शब्दों को लेकर जो क्रीड़ावृत्ति झलकती है उसके पाठक पर पड़नेवाले प्रभाव की मीमांसा में विनोद शाही द्वारा 'हर्ष जूनियर की फाल्टी पर्सपेक्टिव' पुस्तक में विस्तार के साथ विवेचित 'परिप्रेक्ष्यों की विविधता और अलहदगी की असंगतियों' के विवेचन-विश्लेषण के मद्देनजर खास तौर से हर्ष जूनियर की जिस 'बाई-फोकल विजन' की सैद्धांतिकी की चर्चा की गयी है, वह विवेच्य संभवतः कुछ काम की चीज हो सकती है। इसके तहत माना यह गया है कि लेखक का एक परिप्रेक्ष्य है जो उसकी कृति में गुँथा-पिरोया है और पाठक का एक और परिप्रेक्ष्य - जो दूसरी आँख से देखने की वजह बनता है। मानव मस्तिष्क अपनी दोनों आँखों से दो अलग दृश्य-बिम्बों की श्रृंखलाओं को दो अड़ोसी-पड़ोसी कोणों से देखने का नतीजा है। पर हमें जो दिखाई देता है, वह इन दोनों का संयुक्त-समन्वित दृश्य है।' (वसुधा - 75, पृ. 285)

विनोदकुमार शुक्ल के उपन्यासों को लेकर रमेश दवे ने एक मानीखेज सवाल उठाया है कि 'उन्हें आखिर किन संदर्भों में पढ़ा जाए?... उनके तीनों उपन्यास पढ़कर कैसा लगता है?' इन कृतियों के अनोखेपन का खुलासा करते हुए वे लिखते हैं, 'नौकर की कमीज' में नौकर, नौकरी, नौकर मानसिकता, साहब का दफ्तर, साहब का घर, साहब की पत्नी आदि को पढ़ते-पढ़ते कमीज को पढ़ना होगा। कमीज में समा गये शून्य को पढ़ना होगा। कमीज में एक मानसिक भूगोल भी पढ़ना या तलाशना होगा। कमीज का कमीज होना... एक संवेदन होना है, एक मनोविकार होना है और एक कथा होना है, जिसे… कमीज का ढाँचा कहता है।... 'खिलेगा तो देखेंगे' एक अदृश्य भविष्य की कल्पना भी है। कल्पना है तो फैंटेसी है, स्वप्न है लेकिन अश्वस्ति भी है और अश्वस्ति है तो यथार्थ भी है। फूल होने और फल होने के बीच की कल्पना और दोनों के होने का यथार्थ। इसी प्रकार 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' एक अद्भुत शिल्प। राग का भी, विराग का भी। पास का भी, आसपास का भी और दूर का भी, दूरी का भी... यहाँ तो वे यथार्थ में भी सुख की लय खोजते हैं। मध्य वर्ग की पीड़ा ही यथार्थ नहीं होता। मध्य वर्ग का एक टुकड़ा सुख भी होता है और 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' उसी मध्य वर्ग के सुख का उपन्यास है, सुख में जीने का महात्त्वाकांक्षा-विहीन और आत्मतुष्ट यथार्थ है। उनके तीनों उपन्यास ऐसे जैसे कल्पना की कोई अपनी लय हो, शब्द की अपनी लय, शिल्प की अपनी लय और स्थिति के उसी रूप में होने की अपनी यथार्थ-लय... विनोदकुमार शुक्ल को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे समय उनके यहाँ कोई पृथक उपस्थिति बनकर खड़ा ही नहीं रहता बल्कि वह तो एक निरंतर जीवन है, स्थान कोई स्थानीयता बना न रहकर एक जीवन-बोध है और शून्य या अवकाश ऐसा है जैसे सबकुछ होकर भी सबकुछ न होना या कुछ भी न होकर भी, सबकुछ होना।'

ऊपर उद्धृत यह लम्बा आलोचकीय वक्तव्य वस्तुतः दुविधा की भाषा में अपने पूर्व निर्धारित निष्कर्षों को तार्किक ढंग से किसी कृति पर थोपने की सुविधाजनक प्रवृत्ति की एक जबरदस्त मिसाल है। इस पूरे निबन्ध में कुछ अवधारणात्मक युग्मों के बाद प्रश्नवाचक चिह्नों के बारंबार प्रयोग के मद्देनजर स्पष्ट हो जाता है कि एंटनी गिडंस की 'द कांसीक्वेंसेस आँफ माडर्निटी' तथा स्टिफन हाँकिन की 'ए ब्रीफ हिस्ट्री आँफ टाइम' जैसी पुस्तकों में प्रस्तावित 'समय और अवकाश' के बीच द्वंद्वात्मक संबंध को लेकर जो चुनौतीपूर्ण दार्शनिक विवेचन-विश्लेषण मौजूद है, उसे ही यहाँ अपने ढंग से लागू करने की विद्वत्तापूर्ण कोशिश की गई है। प्रसंगवश याद आते हैं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, जिनका कहना है कि प्रधान प्रश्न उसके (साहित्य के) सिद्धांतों की सच्चाई जाँच करने का नहीं है (क्योंकि वह अन्य क्षेत्र का प्रश्न है), प्रधान प्रश्न यह है कि अपने विश्वासों से आबद्ध रहकर उसने जो सृष्टि की है, उसका सौंदर्य कहाँ है? उसके सौदर्य का आदर्श क्या है? और उसकी सृष्टि करने में कहाँ तक समर्थ हुआ है।' (ग्रंथावली 8, पृ. 1166) सराहनीय है कि रमेश दवे ने इन दोनों पुस्तकों का हवाला भी यहाँ दिया है। औपन्यासिक शिल्प को लेकर काफी गहराई से सोदाहरण विवेचन-विश्लेषण भी आलोचक की सामर्थ्य का साक्ष्य है, जिसे 'औपन्यासिक समय-शिल्प' या 'कथात्मक अवकाश-शिल्प' के नाम से अभिहित करते हुए तर्क यह दिया गया है कि विनोदकुमार शुक्ल अपने उपन्यासों में और खास तौर से 'खिलेगा तो देखेंगे' में जिस शिल्प को प्रगाढ़ बनाते चलते हैं वह न निर्धारित, निश्चित समय के प्रतिनिधित्व का शिल्प है और न किसी विशेष पहचान के साथ स्मृति में रेखाचित्र उकेरने वाले स्थान, स्थल या स्थानीयता के भूगोल का शिल्प। इस तर्क के लिए अंतःसाक्ष्य भी विवेच्य उपन्यास में ही मौजूद हैं। इन अंतःसाक्ष्यों में यथार्थ का शाब्दिक क्रीड़ावृत्ति के विनियोग से जिस कदर अन्यथाकरण किया गया है वह उपन्यासकार के रचनात्मक कौशल का श्रेष्ठ उदाहरण है। कहना न होगा कि उपन्यास में अन्यथाकरण के द्वारा मनुष्य की कल्पनाशीलता के उन अनदेखे-अनछुए आयामों को सामने लाने की पेशकश की गयी है, जिनसे गुजरते हुए किसी संवेदनशील पाठक को वस्तुस्थिति वैसी ही नहीं दिखती जैसी कि प्रायः लोग उसे देखने के आदतन शिकार हो चुके हैं। एडवर्ड सईद ने लिखा है कि मार्खेज की रुचि केवल कहानी के बजाय कहानी के कहने में है। स्पष्टतः विनोदकुमार शुक्ल की किसी भी कथाकृति के अध्येता को उनके कथा कहने के लहजे को भी अपने विवेचन-विश्लेषण की परिधि में शुमार करना ही चाहिए। उपन्यासकार कहता है : 'घड़ी नहीं थी। पर निरंतरता का बोध था। आकाश का होना निरंतर था। आकाश स्थिर, पर उसका होना निरंतर। स्थिर झरने में लगातार गिरते हुए पानी की निरंतरता। समय के बीतने का अभ्यास ठीक-ठाक हो, तो आदमी भागता जायेगा। और लौटकर नहीं आयेगा। जैसे छह महीने हो गये, नदी से जो पानी बहा था, अभी तक नहीं लौटा। वह जल कहाँ गया होगा? वह जल क्या कर रहा होगा?' ऐसे कई अंशों को उद्धृत करने के बाद रमेश दवे की जो आलोचकीय टिप्पणी है, वह कभी-कभार 'संध्या-भाषा'-सी प्रतीत होने के बावजूद गहन आलोचनात्मक अंतर्दृष्टि का परिचायक है। विवेचन-विश्लेषण के क्रम में यह सिद्ध किया गया है कि कैसे विनोदकुमार शुक्ल यथार्थों के संवेदनों से गुजरते हुए शिल्प के सौंदर्य तक पहुँचते हैं : 'समय उनके पास घड़ी बनकर नहीं आता। वह स्थान में भी है, वस्तु में भी है, शून्य में भी है, मनुष्य में भी है सभी में तदाकार, सभी में एकाकार। समय में 'कब' और 'कहाँ' के प्रश्नवाचक समाप्त हो जाते है जब नौकर की कमीज, कमीज से एक ढाँचा बनती है, पात्र बनती है, पात्र से पात्र का द्वंद्व बनती है, द्वंद्व से विचार बनती है, गोया कमीज एक संवेदनयुक्त चरित्र में रूपांतरित हो जाती है। अब कमीज का, नौकर का, साहब का, बड़े-छोटे बाबू का, दफ्तर का, सभी का रिश्ता भौतिक से मानसिक हो जाता है। कमीज में कमीज का एक स्थूल स्थान भी है और सूक्ष्म अवकाश भी। एक खालीपन जो पहनने-पहनाने से भरा जाता है। कमीज तो कमीज के ही आकार में है। उसके लिए शरीर बड़े-छोटे हैं। इसलिए कमीज का अवकाश शरीर है और शरीर का अवकाश कमीज।... इसलिए हम उपन्यास में कोई समय नहीं खोजते, स्थान नहीं तलाशते बल्कि उपन्यास को पूरा का पूरा पहन लेते हैं अपने ऊपर ठीक उस नौकर की कमीज की तरह, जिसकी तह में व्यंग्य भी है, व्यथा भी है और गल्प का आनंद भी।' (आलोचना, सहस्त्राब्दी अंक सात-आठ, पृ. 34) किन्तु, निष्कर्ष यह निकाला गया है कि विनोद जी के तीनों उपन्यास 'उस देशज और आंचलिक आकुलाहट के ही प्रतीक हैं जो हिन्दी में कथा को आधुनिकता की संज्ञा के साथ रचते रहे हैं। विनोदकुमार शुक्ल का द्वंद्व विचार या विचारधारा का द्वंद्व नहीं है बल्कि उनका द्वंद्व मुख्य रूप से समय और अवकाश का द्वंद्व है।' दिलचस्प है कि अंत-अंत तक विद्वान-आलोचक अपने पांडित्यपूर्ण विभ्रम के जाल में फँसा-का-फँसा ही रह जाता है, जिसका प्रमाण है निबन्ध के अंत में उसका यह बयान : 'विनोदकुमार शुक्ल को उनकी औपन्यासिकता में पढ़ना एक चुनौती भी है, बेचैनी भी, भ्रम या भ्रांति भी और उन्हे निरस्त करना तो और भी मुश्किल है - क्योंकि निरस्त करने से कुछ भी निरस्त नहीं होगा।' (आलोचना, सहस्त्राब्दी अंक 7-8, पृ. 36)

नामवर सिंह ने लिखा है कि जो कहानी कुछ भी अच्छी होती है उसमें अच्छे पाठ की 'संभावना' होती है और जो उससे अच्छी होती है वह अच्छे ढंग से पढ़ने को 'निमंत्रित' करती है किंतु जो कहानी बहुत अच्छी होती है, वह अच्छे ढंग से पढ़ने के लिए 'बाध्य' करती है। इस प्रकार संभावना, निमंत्रण और बाध्यता में एक निश्चित क्रम है। 'इस दृष्टि से विचारने पर स्पष्ट होता है कि अनंत पाठ की संभावना से युक्त विनोदकुमार शुक्ल के उपन्यास हिन्दी के सह्रदय एवं समझदार पाठकों को अच्छे ढंग से पढ़ने को निमंत्रित तो करते हैं, किन्तु, बाध्य भी करते हैं या नहीं, इसको लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना हिन्दी समाज के सांस्कृतिक बहरेपन को देखते हुए जल्दबाजी होगी। गौरतलब है कि एक जमाने में देवीशंकर अवस्थी को हिन्दी कथाकारों की अवधारणा क्षमता काफी सीमित प्रतीत हुई थी। उन्होंने अपने समय के कथाकारों के बारे में शिकायत के लहजे में लिखा था कि 'उपन्यास जैसे अधिक शक्तिशाली माध्यम को झेल जाने की सामर्थ्य वे नहीं जुटा पा रहे हैं।' स्पष्ट ही आज विनोदकुमार शुक्ल सरीखे कुछ चोटी के हिन्दी उपन्यासकारों की उपलब्धियों के मद्देनजर ऐसी कोई बात बेमानी होगी। विनोद जी के तीनों उपन्यासों के पाठ की सतही संरचना में यहाँ-वहाँ मौजूद कसावट भरी शब्द-क्रीड़ा की गहनता में गोता लगानेवाले पाठक को इसमें कौतुक के बजाय अन्तर्निहित गहरी व्यथा की विडंबना से निर्मित जटिलता का बोध अवश्य होगा। अनुषंगवश रघुवीर सहाय का स्मरण स्वाभाविक है : 'जब घने कष्ट में मन गंभीर हो उठे, जब व्यथा में जो व्यंग्य है वह भी हो - नहीं तो व्यथा ही कैसे वहाँ रहेगी।' (सीढ़ियों पर धूप में, पृ, 257) बावजूद इसके अगर कोई ऐसे शिल्पगत कौशल को उपन्यासकार का खिलन्दड़ापन या सनकीपन कहे तो यह कृतिकार की 'अनकहनी भी कुछ कहनी है' की अधूरी समझ का स्वाभाविक फलाफल ही कहा जायेगा, जिसे हिन्दी साहित्य-सृजन के क्षेत्र में एक लम्बे अर्से तक कायम 'यथार्थ का आतंक' से संबद्ध माना जा सकता है। स्मरणीय है कि साहित्य रचने और पढ़ने की अर्थवत्ता व सार्थकता सनकीपन पर यदि विजय पाना नहीं तो कम-से-कम उसे काबू में रखना जरूर है। किंतु, इस क्रीड़ा-कौशल की बड़ी कमजोरी है कि व्यथा को गंभीर हँसी और फिर उसके व्यथा में तत्त्वान्तरण के क्रम में उपन्यासकार के लिए अर्थ-गंभीर कथ्यगत संदर्भों का आस्फालन एक तरह से बाध्यता-सी बन जाती है, जो संदर्भ को भाव-गंभीर नहीं बनने देता। कहने की जरूरत नहीं है कि इतनी ही बातें, बल्कि इतनी बड़ी बातें यदि किसी रचनाकार को उपन्यास के बजाय कविता में कहनी हों तो स्वभावतः वहाँ शाब्दिक मितव्ययिता होगी क्योंकि उपन्यास की तुलना में कविता की कसावटभरी बुनावट में 'अरथ अमित अति आखर थोरे' की शक्ति और संभावना ज्यादा होती है।

पश्चिम में अरस्तू एवं अपने यहाँ के एक बड़े भारतीय दार्शनिक के बारे में एक दिलचस्प दन्तकथा प्रचलित है : 'एक गँवई लुहार के पास एक पुराना-सा, पर सुन्दर चाकू देखकर दार्शनिक ने उससे प्रश्न किया कि वह चाकू उसके पास कितने अरसे से है। लुहार का उत्तर था कि वह उसका पुश्तैनी चाकू है, जिसका हत्था और पत्ती वह समय-समय पर जरूरत के मुताबिक बदलता रहा है, पर चाकू वही है।' कहने की जरूरत नहीं कि विनोद जी का शब्दकर्मी किसी अनगढ़ लुहार के बजाय बारीक काम करनेवाले सुनार या दस्तकारी के महीन काम करनेवाले कारीगर की मुद्रा में रचनारत रहा है, जिससे एक हद तक हिन्दी में गल्प की भाषा का कायान्तरण संभव हो सका है। उनकी रचनाओं में सूक्ष्म कारीगरी का करिश्मा जिस लेखकीय निर्वैयक्तिता से संभव हुआ है, वह वस्तुतः गहरी वैयक्तिकता की उपज है, जो एक साथ यथार्थ के धरातल पर विडम्बना और बोध के स्तर पर अपनी अनुभूतिप्रवणता से हमें बेचैन व रससिक्त करने में समर्थ है। प्रसंगवश याद आते हैं 'उपन्यास का सिद्धान्त' के लेखक जार्ज लुकाज, जिन्होंने उपन्यास की सैद्धान्तिकी के निर्माण के दौरान विडम्बना के द्वंद्वाभासों को रेखांकित किया जाना अपरिहार्य माना है।

'दूसरा सप्तक' की भूमिका में अज्ञेय ने लिखा है : 'भाषा के विकास के क्रम में कविता की भाषा निरन्तर गद्य की भाषा होती जाती है।' अज्ञेय के ही शब्द उधार लेकर कहें तो विनोदकुमार शुक्ल की कथा-भाषा की अर्थवत्ता उनके कृतिकार को गद्य में प्रगीतात्मक सांगीतिकता की 'सही पकड़' के चलते कृती बनाती हुई उस भाषिक ऊँचाई पर ले जाती है, जहाँ 'ध्वनि, लय, छन्द आदि के सभी प्रश्न इसी में से निकलते हैं और इसी में विलय होते हैं। इतना ही नहीं, सारे सामाजिक संदर्भ भी यहीं से निकलते हैं : इसी में युग सम्पृक्ति का और कृतिकार के सामाजिक उत्तरदायित्व का हल मिलता है या मिल सकता है।' जाहिरा तौर पर विनोद जी का वाक्य-विन्यास उपन्यास-विधा की अपनी आंतरिक रचनात्मक माँग के तहत गद्य का ही रहता है, पर उसमें अन्तर्निहित लय मूलतः उनके कवित्व से नाभिनालबद्ध है। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' उनकी इसी रचना-यात्रा की सर्वाधिक प्रौढ़ कृति है, जिसे एक अर्थ में महाकाव्यात्मक संवेदना वाला जीवन्त औपन्यासिक आख्यान कहना अतिशयोक्ति न होगी, जिसका मूल मनोराग प्रगीतात्मक है और जिसमें संगीत की लय के बजाय संवाद की लय के द्वारा जीवन की लय को पाठ में समेटा गया है। प्रसंगवश आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के एक कथन की याद स्वाभाविक है, जिसमें उन्होंने भारतीय कथाकारों द्वारा कथासाहित्य की अपनी स्वकीय संरचना को बरकरार रखने की हिदायत दी थी : 'उपन्यास को काव्य के निकट रखनेवाला पुराना ढाँचा एकबारगी क्यों छोड़ा जाए? उसके भीतर हमारे कथात्मक गद्य-प्रबंधों (जैसे कादम्बरी, हर्षचरित) के स्वरूप की परम्परा छिपी हुई है। योरप उसे छोड़ रहा है, छोड़ दे। यह कुछ आवश्यक नहीं कि हम एकदम हर कदम उसी के पीछे-पीछे चलें।' विनोद जी के उपन्यासों में भारतीय मनुष्य की उस जीवन-पद्धति का गल्प रचा गया है, जहाँ आधुनिक व उत्तर आधुनिक कहे जानेवाले तमाम तरह के भौतिक संसाधनों एवं संजालों के बावजूद सामुदायिक जीवन की सुकुमार लय सुरक्षित है, जिसे खण्डित होते देखना उसके लिए एक त्रासद अनुभव होगा। इस प्रकार के सामुदायिक जीवन में मनुष्य के निजी व्यक्तित्व एवं उसके वैशिष्ट्य को ले कर संवेदनशीलता व समझदारी का कतई अभाव नहीं है। इसीलिए विनोद जी के उपन्यासों में औसत भारतीय जन-जीवन के प्रति किसी आरोपित सहानुभूति के बजाय अभिन्न भाव से जिन्दगी की जद्दोजहद को देखने की पेशकश है। गौरतलब है कि इस अभिन्न भाव की द्वन्द्वात्मकता में ही उनके औपन्यासिक कर्म की निजी सृजनात्मकता के बीज निहित हैं। उल्लेखनीय है कि उपन्यासकार ने इस क्रम में जो नयी कथा-भाषा निर्मित की है, वह हिन्दी कथा-परम्परा में पहले से मौजूद भाषा की लय को सुरक्षित रखते हुए अपनी नयी अन्तर्वस्तु एवं लक्ष्यीभूत पाठक के मद्देनजर इसे जीवन्तता में ग्रहण करके संभव हुई है, जिसमें चौंकानेवाले प्रयोग की जगह काव्योचित उत्साह है। वस्तुतः 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' उपन्यास में हिन्दी गद्य का यह संतुलित सृजन-प्रक्रिया में निखरा काव्यमय रूप पश्चिम के श्रेष्ठ कथाकारों की आधुनिक गद्य तकनीक को आत्मसात करके निखरा है। इस निखरे गद्य में जब मामूली-सी प्रतीत होनेवाली रोजमर्रा की जिन्दगी, वस्तुओं के यथातथ्य ब्यौरे, को लेकर छोटे-छोटे वाक्यों की सहायता से वर्णित होता है, तब उसकी सामर्थ्य देखते ही बनती है। यह दूसरी बात है कि इस रचाव के दरम्यान यदाकदा जिन्दगी खिसकती हुई-सी प्रतीत होती है। बावजूद इसके, रचनात्मक अभिप्राय एवं सौन्दर्यात्मक प्रभाव की दृष्टि से उनके प्रत्येक उपन्यास के प्रायः हरेक पृष्ठ पर कोई न कोई ऐसी पंक्ति जरूर आती है, जो उनके समूचे कवित्वपूर्ण गद्य को यकायक किसी अनकही आवृत्ति के साथ इस कदर काव्य-संगीत में तत्त्वान्तरित कर देती है कि उससे पाठक की मनोलय में किसी भाव की अभिव्यंजना या भावजाग्रति के बजाय मनुष्य-मात्र की भावनाओं-गुणों की बनावट तथा 'सत्त का अभिज्ञान' उत्पन्न होता है। कवि-आलोचक अरुण कमल की शब्दावली उधार लेकर कहें तो विनोद जी की रचनाएँ एक ऐसी स्मृति-मंजूषा हैं, 'जिस में हर नया बनाव पुराने बनावों को याद करता हुआ अपने भी चिह्न छोड़ता चलता है।' यह स्थिति मधुमास में हरे-भरे वृक्ष की तरह है, जहाँ रचना में पहले देखे हुए अर्थ-संदर्भ एवं बनाव भी रस-परिग्रह से नए जैसे प्रतीत होते हैं :

दृष्टपूर्वा अपि ह्यर्थाः काव्ये रसपरिग्रहात् ।
    सर्वे नवा इवाभान्ति मधुमास इव द्रुमाः।।

- अभिनवगुप्त

वाल्टर बेंजामिन ने गद्य रचना के तीन चरणों का उल्लेख किया है - एक सांगीतिक चरण जब उसे रचा जा रहा होता है, दूसरा वास्तुशास्त्रीय चरण जब उसे बनाया जा रहा होता है और तीसरा वस्त्र विज्ञानी चरण जब उसे बुना जा रहा होता है। विनोदकुमार शुक्ल के गद्य में सुचिंतित वाक्य विन्यास के मद्देनजर वह उपर्युक्त दूसरे और तीसरे चरण के बीच रचित गद्य कहा जा सकता है। उनके औपन्यासिक पाठ में अंतर्निहित कविता के कारण वहाँ एक हद तक गद्य का अपसरण दिखाई देता है। इस नये गद्य से गुजरते हुए पाठक एक ऐसे संसार में प्रवेश करता है जो औसत भारतीय लोगों की रोजमर्रा की बातचीत, उनके बनते-बिगड़ते रिश्ते और ले-देकर उनकी जिंदगी के तजुर्बे को खँगालता हुआ निर्मित होता चलता है। मंगलेश डबराल द्वारा एक भिन्न संदर्भ में की गई टिप्पणी उधार लेकर कहें तो इस नये गद्य में औपन्यासिक पाठ को रचने के लिए विनोदकुमार शुक्ल के कवि को अपने मुखोश, उत्तरीय और अलंकरण उतारने पड़े और लगभग निष्कवच होना पड़ा। उसे वास्तविकता को पहचानने की... क्षमता विकसित करनी पड़ी... वह अब विशिष्ट, अद्वितीय, कलात्मक निर्मिति नहीं, बल्कि साधारण जीवन का एक अंश, उससे उत्पन्न एक अभिव्यक्ति और उसके यथार्थ या उस यथार्थ के बरक्स एक और यथार्थ का विन्यास बन गयी। अपनी... काव्यात्मकता से उसका बाहर निकलना एक बड़ी घटना थी।' (कवि का अकेलापन, पृ. 118)

स्वीकार करना होगा कि किसी कवि का काव्यमयता के फिसलाऊपन, धुंध व वायवीयता से बाहर निकलना यदि बड़ी घटना हो सकती है तो कथाकार-विशेष की शक्ति और सीमा के तहत उसके गद्य में कवित्व का प्रवेश भी कथाकृति को पारंपरिक और आत्यंतिक किस्म की गद्यमयता के रूखेपन से एक हद तक अवश्य मुक्त करता है। नतीजतन, कथाकृति ठेठ अर्थ में कविता न होने के बावजूद कोरा गद्य नहीं, बल्कि एक बेहद सरस और अद्वितीय सृजन का रूप लेती है। मंगलेश डबराल के ही शब्दों में, 'ऐसा गद्य लगभग संपूर्ण गद्य होगा और इसे और अधिक गद्य नहीं किया जा सकेगा। ऐसे गद्य को पढ़ने के बाद ही हम उस कविता को पढ़ पाते है जो उसमें छिपी होती है।... गद्य के इन उपक्रमों में सब से अच्छी बात यह है कि कवि ओझल रहता है और कविता प्रकट होती रहती है।'

दर्शन एवं सर्जनात्मक लेखन की वैचारिकता और सौन्दर्यशीलता के बीच विलक्षण नातेदारी से रचित उनकी कृतियाँ, बकौल राजेश्वर सक्सेना, 'आवेग- मुक्त, निस्तेजित-सी दिखाई देती हैं, किन्तु निर्द्वन्द्व नहीं हैं। चूँकि, द्वन्द्व अपने 'मेंटल डिस्कोर्स' में है, वह प्रयोग में गुण-क्रिया-निरपेक्ष रह जाता है, वह व्यापार में या क्रिया-कारत्व में नहीं उतर पाता है, इसिलिए, वह मनोगतिय में और वाक्य-गतिकीय में ही गठित होता रहता है। वह एक सोचती हुई वाक्य-गतिकता के रूप में दिखाई देता है।' किन्तु, सच्चाई का एक दूसरा पहलू यह भी है कि विनोद जी की रचनाएँ बाह्य वस्तुओं की अनुपस्थिति के बावजूद पाठक को पाठ में निहित संवेगी उत्तेजन को महसूस कराने में बहुत हद तक समर्थ हैं। इस विलक्षण सामर्थ्य के मद्देनजर 'लिरिकल बैलेड्स' की भूमिका में वर्ड्स्वर्थ के एक कथन की याद स्वाभाविक है : 'स्थूल और हिंसक उत्तेजकों के प्रयोग के बिना मानवीय मस्तिष्क उत्तेजित होने की शक्ति से युक्त होता है, और उस व्यक्ति के पास इसके सौन्दर्य और सौम्यता का बहुत ही फीका बोध होता है जो यह नहीं जान पाता कि कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से इस जानकारी के अनुपात के हिसाब से ही श्रेष्ठ हो सकता है। इसीलिए मुझे ऐसा लगा है कि इस शक्ति को उत्पन्न करना अथवा इसका विस्तार करना किसी भी काल में किसी लेखक की सेवाओं में सर्वश्रेष्ठ सेवा हो सकती है।' पाठक के नजरिये से अगर देखें तो मूल बात ऐसे पाठों में तथ्यात्मकता, रोचकता एवं सरसता के घुलावटी रसायन से निर्मित वह पठनीयता है, जो हमें किसी आख्यान-विशेष की ओर बार-बार खींचती है और उसमें व्यक्त किये गये वे ईमानदार रचनात्मक अनुभव हैं, जो हमारे सुख और दुख के क्षणों में हमसफर बन सकने का माद्दा रखते हैं। दूसरे शब्दों में, ऐसी कृतियों में अनन्त पाठ की संभावनाएँ हुआ करती हैं जिसके चलते ये कृतियाँ हमें अपने पाठ में हरदम कुछ खोजने-कुछ पाने की कोशिश करने के लिए उकसाती हुई जिंदगी जीने में मदद करती हैं। दूसरे शब्दों में, उपन्यासकार विनोदकुमार शुक्ल में अपनी सृजनात्मक जातीय स्मृति को समयानुसार परिवर्तित कालबोध के मद्देनजर नए सिरे से जगाने की छटपटाहट है। इस क्रम में उनकी शब्द-क्रीड़ा जहाँ कहीं भी एक नवीन अर्थ प्रसारित करने लगती है, या बाह्य यथार्थ को इंगित करने लगती है, वहाँ वह औपन्यासिक पाठ की सतही संरचना का अतिक्रमण करती हुई आदमी के इंसान और इंसान के और बेहतर इंसान बनने की आकांक्षा, जो वास्तव में इंसानी रिश्तों को यथासंभव स्नेहिल और सौहार्दपूर्ण बनाने की आकांक्षा है, की अर्थवत्ता उद्घाटित करती है। अपनी एक कविता में उन्होंने लिखा है :

जो मेरे घर कभी नहीं आयेंगे
    मैं उनसे मिलने
    उनके पास चला जाऊँगा।
    एक उफनती नदी कभी नहीं आयेगी मेरे घर
    नदी जैसे लोगों से मिलने
    नदी किनारे जाऊँगा
    कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा।
    पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
    असंख्य पेड़ खेत
    कभी नहीं आयेंगे मेरे घर
    खेत खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
    गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।
    जो लगातार काम में लगे हैं
    मैं फुरसत से नहीं
    उनसे एक जरूरी काम की तरह
    मिलता रहूँगा।
    इसे मैं अकेली आखिरी इच्छा की तरह
    सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।'

- सब कुछ होना बचा रहेगा, पृ.13

मध्यवर्गीय जीवन की विडम्बनाओं, विसंगतियों और मुश्किलों पर नजर रखते हुए मनुष्य की रचनात्मक आकांक्षाओं को व्यक्त करनेवाली विनोदकुमार शुक्ल की ऐसी कविताओं से गुजरते हुए याद आ सकते हैं टेरी ईगल्टन, जिन्होंने अपने खास अन्दाज़ में कविता को कदाचित परिभाषित करते हुए लिखा है कि 'कविता एक काल्पनिक, नैतिक वक्तव्य है जो ऐसा शाब्दिक नवाचार या आविष्कार है कि जिसमें यह कवि तय करता है कि पंक्ति को कहाँ समाप्त किया जाना है।'

वस्तुतः विनोद जी की तमाम कृतियों में औसत भारतीय मनुष्य के जीवन की घटनाओं की एक ऐसी संरचना की सृष्टि की गयी है, उसके तजुर्बे का ऐसा सृजनात्मक वृत्तांत पेश किया गया है और उन तजुर्बों को एक तरतीब देकर उन्हें एक तरह से जिदगी की लय और छंद में ढालते हुए भारतीय मनुष्य की स्मृति को आधुनिक काल-बोध से इस कदर जगाया गया है कि उनका कोई भी प्रबुद्ध पाठक किसी भी हालत में अंतिम रूप में अपने जीवन को निरर्थक नहीं मान सकेगा। गौरतलब है कि विवेच्य कृतियों में उपन्यासकार ने इसके लिए शब्द-चयन के स्तर पर तत्सम के बजाय तद्भव की व्यंजना शक्ति से काम लिया है। कहीं-कहीं तत्सम और देशज शब्द भी आवश्यकतानुसार प्रयुक्त हुए हैं। किंतु, विनोद जी का झुकाव तद्भव की ओर ज्यादा है। कथाकार अखिलेश के एक मंतव्य से विचारसूत्र लेकर कहें तो 'तद्भव राजा, पंडित, व्याकरणाचार्य नहीं गढ़ते। उसे रचती है जनता। वह जनता की इच्छाओं, संघर्षों, अंतर्क्रिया से उपजता है और धीरे-धीरे शास्त्र एवं कुलीनता के अभेद्य प्रासादों को भी विजित कर लेता है। भाषा की तत्सम से तद्भव तक की यात्रा राजतंत्र से लोकतंत्र तक की यात्रा है। इसलिए हम बेहिचक कह सकते हैं कि तद्भव महज शब्दों की परिवर्तित वक्तृता नहीं है, बल्कि इसके प्रयोग में एक खास तरह का जीवन दर्शन, समाजशास्त्र है।' उनकी कृतियों में शब्दों को पवित्र भाव से छूने के अहसास के चलते जो शाब्दिक मितव्ययिता है, वह रचना में क्लासकीय अनुशासन को जन्म देता है और भाषा के कौतुकपूर्ण प्रयोग से जिस कदर ऐन्द्रिकता और रचनाकार के नैतिक द्वन्द्व की अभिव्यक्ति हुई है, वह अद्वितीय है।

अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में महावीर अग्रवाल से बातचीत करते हुए विनोदकुमार शुक्ल कहते हैं : 'प्रत्येक रचना अपनी रचना-प्रक्रिया को साथ लेकर आती है और उस रचना के समाप्त होने के बाद उसकी और उस रचना-प्रक्रिया भी समाप्त हो जाती है। अब सामान्य तौर पर ऐसा होता होगा परन्तु, रचना प्रक्रिया को रचती है। और यह रचना में चिह्न की तरह दिखाई देती है।... सहज कविताएँ लिखना कठिन काम होता होगा, नहीं तो कोई जान-बूझकर असहज नहीं होता है। मुझे नहीं मालूम कि मेरे सामने वह जो नीम का पेड़ है उसे मैं सहज पेड़ कहूँ या वह कितना असहज है। लेकिन रचना में वह एक कठिन पेड़ की तरह उगा होता है। मैं जितनी, जिन्दगी की धूप में रचना के बाहर पेड़ की छाया में सुस्ताता हूँ उतना ही रचना के अन्दर के पेड़ की छाया में भी। यह मैं अपने ही पेड़ के बारे में नहीं कह रहा हूँ। यह किसी भी रचना के पेड़ के बारे में है। यह कितना कठिन है कि एक-एक हरे-भरे पेड़ की एक पत्ती की मैं गिनता लगाता हूँ। और असंख्य होने के बावजूद एक पत्ती भी मुझे अतिरिक्त नहीं मिलती। मुझे जिन्दगी के मरुस्थल में रेत के ऊपर पड़ी हुई एक हरी पत्ती नहीं मिलती। परन्तु हरी पत्ती का आश्चर्य मिलता है। अगर हरी पत्ती का आश्चर्य मिलता है तो हरे पेड़ का आश्चर्य मिलता है।' (आलोचना, जनवरी-मार्च, 2003, पृ. 83) विनोद जी के ऊपर उद्धृत इस लम्बे वक्तव्य से गुजरते हुए अक्तोविया पाज़ की 'द बो एण्ड द लायर' पुस्तक की बरबस याद आती है, जिसमें एक जगह पर कहा गया है कि अच्छी रचना विवरण के बजाय विस्मय से जन्म लेती है।

नेरुदा के संस्मरणों में एक ऐसे आदमी की चर्चा है जिसने उनकी 'पृथ्वी पर घर' (रेसिदेंसीया एन ला तीयेरा) कविता संग्रह में शामिल कुछ हताशाग्रस्त रचनाओं को पढ़ने के बाद खुदकुशी कर ली थी। यह किताब एक पेड़ के नीचे पायी गयी उसकी लाश के नजदीक बरामद हुई थी। कहा जाता है कि इसके बाद नेरुदा ने अवसादग्रस्त अनुभूतियों एवं मृत्युबोध को अपनी कविताओं का विषय बनाना लगभग छोड़ दिया था। गौरतलब है कि विनोदकुमार शुक्ल की औपन्यासिक अनुभव-संरचनाओं में ईर्ष्या, अविश्वास, लोभ, लिप्सा, अहंकार, घृणा, स्वार्थ, हिंसा इत्यादि को लेकर प्रायः निःशब्दता-जैसी स्थिति है। कारण यह कि 'केवल शब्दहीनता ही भीतर की सत्यनिष्ठा को व्यक्त कर सकती है। वास्तविकता को अपर्याप्त शब्दों में कहना वास्तविकता और उन बेआवाज मृतकों को छलना है>' (एडोर्नो)।' जिस प्रकार उपर्युक्त बुरे भावों के चलते खुद को प्रताड़ित महसूस करनेवाले लोगों को चीखने से नहीं रोका जा सकता, उसी प्रकार विनोद जी सरीखे पेचीदा मानस वाले किन्तु सुकुमार संवेदना के धनी कलाकार को भी इस अकाल वेला में प्रवाह-पतित कहे जाने का खतरा उठाते हुए उपन्यास-सृजन के दरम्यान स्वयं पिघलकर प्रचलित परिपाटी से भिन्न मौजूदा व्यवस्था का नरक भोगने को अभिशप्त वर्तमान मनुष्य के जीवन की सिर्फ यातना का गल्प रचने के बजाय उसके कोमल सपनों का घुलावटी रसायन तैयार करने का नैतिक अधिकार है, जिसमें एकत्रित शब्दों की अर्थवत्ता की तलाश करना प्रकारांतर से अपने समय के यथार्थ से एक तरह की रचनात्मक मुठभेड़ ही हैः 'क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां'

'हिन्दी साहित्य में उपन्यास' शीर्षक निबन्ध में निराला ने लिखा है - 'जब तक किसी बहते प्रवाह के प्रतिकूल किसी सत्य की बुनियाद पर ठहर कर कोई उपन्यास नई-नई रचनाओं के चित्र नहीं दिखलाता, तब तक न तो उसे साहित्यिक शक्ति ही प्राप्त होती है और न समाज को प्रवहमान जीवन। तभी रचना-विशेष शक्ति तथा सौंदर्य से पुष्ट होकर नवीनता का आवाहन करती है। कला भी साहित्य को नवीन ऐश्वर्य से अलंकृत करती है।' (प्रबंध-प्रतिमा, पृ. 221) अपने एक दूसरे निबन्ध में निराला कहते है : 'कला उसी तरह समय के स्वर्ण-घट में प्राण प्राप्त कर पूजक साहित्यिकों की दिव्य दृष्टि बन जाती है, जिससे साहित्य का असामयिक 'जड़' पिघल कर जल बनकर बह चलता है।' (प्रबन्ध पद्म, पृ. 170)

तात्पर्य यह कि कोई रचनाकार जो कुछ रचता है, उसके मूल में उसके जीवन का कोई-न-कोई तत्त्ववाद अवश्य सक्रिय रहता है और यह जरूरी नहीं कि हर जगह वह तत्त्ववाद उजागर हो ही, जबकि लेखक के जाने-अनजाने उसका तत्त्ववाद उसके संपूर्ण शब्दकर्म को अपरोक्ष रूप में नियंत्रित करता रहता है। कहना न होगा कि बड़ा से बड़ा संतुलित व सत्यान्वेषी दृष्टि-संपन्न विद्वान आलोचक भी हर समय किसी लेखक की एक या दो कृतियों को पढ़कर उस 'बीज भाव' को पकड़ ही ले, यह जरूरी नहीं। विवेच्य संदर्भ में यह कहना असंगत न होगा कि बहुत सारी जीवनस्थितियाँ विनोद जी के रचनाकार के लहजे के मुताबिक अपने सामाजिक सांस्कृतिक विवरणों के साथ उनकी कविताओं एवं कथासाहिेत्य में ढल गयी हैं। उनकी कृतियों के सामाजिक अभिप्राय एवं सौन्दर्यात्मक प्रभाव की पड़ताल करने पर स्पष्ट होता है कि वे अपने परिवेशगत सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप बहुत हद तक एक नये नैतिक-बोध एवं नये सौन्दर्य-मूल्य की सृष्टि करने में सक्षम हैं। सच तो यह है कि लेखक ने अपने समय की कठोर वास्तविकता को नजरअंदाज किये बगैर औसत भारतीय जीवन में मौजूद बची-खुची बुनियादी रागात्मकता का उद्घाटन करने के लिए अपनी रचनाओं को जिस कदर तराशते हुए संवेदनक्षम एवं धारदार बनाया है, उसका एकमात्र मकसद अपने पाठकों को उस जीवन-सत्य का बोध कराकर उन्हें उस आसन्न संकट से उबारना है, जिसे शंकराचार्य ने 'वृहदारण्यक उपनिषद' पर अपने सुप्रसिद्ध भाष्य में 'स्वयं से अनभिज्ञता' कहा है। आधुनिक एवं उत्तर-आधुनिक कही जानेवाली मौजूदा जटिल जीवन-स्थितियों में उपर्युक्त 'स्वयं से अनभिज्ञता' उपन्यासकार के शब्दों में 'खुद का ओझल होना' है, जो और कुछ नहीं बल्कि आदमी की खुद से 'अजनबियत' का ही पर्याय है, जिससे निजात पाने के लिए हमारे मन की दीवार में एक खिड़की अवश्य होनी चाहिए, ताकि हमारे अंतर्जगत एवं बाह्य जीवन और जगत के बीच आवाजाही जारी रहे। प्रसंगात निर्मल वर्मा ने लिखा है : 'कला मनुष्य के उन स्मृति खंडों को नष्ट होने से बचाती है जिन्हें इतिहास भविष्य के जोम में जाकर कूड़ेदान में फेंक देता है। वे स्मृतियाँ जो अतीत को समेटने या हमारे जीने में सहायक होती हैं और जिनके बगैर हम अपने आपसे अजनबी बनकर रह जाते हैं।' उपन्यास में कहा गया है कि 'ओझल हो गये के पीछे-पीछे ओझल होकर ही जाया जा सकता था। दूसरे का ओझल होना पता चल जाता था। खुद का ओझल होना खुद को पता न चलता हो, दूसरे को पता चल जाता हो। हो सकता है रघुवर प्रसाद भी ओझल हो गये हो।' (पृ. 57) उपन्यासकार ने लक्षणा में जिस खिड़की की बात की है वह 'खिड़की' भारतीय पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में कभी एक आम बात हुआ करती थी, जिसके चलते इतिहास-प्रवाह में समय-समय पर आनेवाले अनेकानेक झंझावातों के बावजूद हमारी सभ्यता अपने मूल सार-तत्व को बचाए रखने में हाल-हाल तक सफल रही है। विनोदकुमार शुक्ल द्वारा उपन्यास के शीर्षक में खिड़की के साथ 'थी' का प्रयोग इसी वजह से बहुत ही व्यंजक है, क्योंकि भूमण्डलीकरण के उन्माद की गिरफ्त में आने के बाद भारतीय मनुष्य अपने परिवेश से लगातार कटते हुए एक तरह की अवसादग्रस्त अकेलेपन की मानसिकता को व्यक्ति-मानव की निजी स्वतंत्रता के नाम पर महिमा-मंडित करने के शौक से रोज-ब-रोज बुरी तरह बीमार होता चला जा रहा है। वस्तुतः आज हमारे मन की दीवार में खिड़की बहुत ज़रूरी है, जिसकी बदौलत हमारे ज़माने में अजीबोगरीब जिन्दगी जीने को मजबूर वर्तमान मनुष्य की आत्मा के अनुरोध और जिन्दगी की ठोस जरूरतों के बीच पैदा हो गयी दरार को पाटना शायद संभव हो :

खिड़कियाँ तो खोल दो ग़र बंद दरवाजा रहे
    आते-जाते मौसमों का कुछ तो अन्दाज़ा रहे

विनोद जी की कृतियाँ जिस खास अंदाज में खत्म होती हैं उससे उपन्यास के पात्रों से अंत में हमारा तादात्म्य भंग होता है। परिणामतः, कथा में संरचित दुनिया हमारी वास्तविक दुनिया से अलग होकर अपने स्वप्निल स्वरूप की माया को उजागर कर देती है। गौरतलब है कि उनकी औपन्यासिक कृतियों में आये जीवन एवं आंतरिक तथा बाह्य जगत को बिना किसी कतरब्यौंत के वर्णित किया गया है। बावजूद इसके, उनके रचना-संसार में एक खास तरह की औपचारिकता या निस्संगता भी मिलती है। जिस प्रकार संगीतकार भावनाओं की व्यंजना या सुननेवाले के सहानुभव का आवाहन करने के बजाय भावनाओं के रूपों का ज्ञान कराने की पेशकश करता है, उसी प्रकार उपन्यासकार विनोदकुमार शुक्ल जब अपने काव्योचित उत्साह के साथ एक औपन्यासिक तरकीब से दूसरी और दूसरी से तीसरी तरकीब निकालते हुए अपने 'रूप' को दर्शनीय बनाने की किसी अप्रत्यक्ष कलात्मक तकनीक का इस्तेमाल करने से चूकने का अनजाना लोभ संवरण नहीं कर पाते, तो, इस स्थिति में एक ऐसा संश्लिष्ट पाठ जन्म लेता है, जिस पर यदि एक ओर बड़े से बड़े आचार्य का बहुत दिनों तक कुंडली मारकर बैठे रहना असंभव है, वहीं दूसरी ओर उसे विसंरचित करने का कोई भी आलोचकीय उद्यम रघुवीर सहाय की एक काव्यपंक्ति उधार लेकर कहें तो 'दो खंभों के बीच तनी हुई रस्सी पर नाचने' की तरह दुष्कर है : 'जो तेरी बज्म से निकला, वो परीशां निकला।'

कहने की जरूरत नहीं कि उनका गल्प, उसे विसंरचित करके पुनःसृजित करने की कोशिश करनेवाले किसी भी आलोचक से 'सतेजस्' सह्रदयता के साथ ही एक गहरी कल्पनाशील अंतर्दृष्टि की भी माँग करता है, जिसके बगैर उनके औपन्यासिक पाठ का कोई भी ग्रहणकर्ता अपनी ओर से और रचनाकार की ओर से इसमें निहित गतिमान अन्तर्तत्वों के मनःसंश्लेष को अपनी मनोलय की एकतानता के द्वारा न तो स्वकीय कर सकता है और न उसका कोई सार्थक विवेचन-विश्लेषण ही।

अशोक वाजपेयी ने सही लिखा है कि 'किसी भाषा में बिना वयस्क गद्य के सार्थक कविता संभव नहीं है जैसे बिना महत्त्वपूर्ण कविता की उपस्थिति के गद्य धारदार और संवेदनशील नहीं हो पाता।' संप्रेषण-वैविध्य की दृष्टि से विनोदकुमार शुक्ल के 'अन्तःकरण का आयतन' भले ही कुछ लोगों को बहुत व्यापक न लगे, पर उसकी गहराई को लेकर किसी तरह के संदेह की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। कविता तो कविता, उनकी कथाकृतियों में भी अन्तर्वस्तु एवं रूप के स्तर पर काव्योचित अनुभव के अंदर से उठता हुआ संगीत का-सा स्वप्न-वैभव विद्यमान है। उपन्यासकार के रूप में वे चरित्रों को अपने संवेदनशील चौकन्नेपन के तहत ऐसे परिवेश में अवस्थित करने का सौन्दर्यशील उपक्रम करते हैं, जिससे औसत भारतीय लोगों की जिन्दगी के सान्द्र मौन में अन्तर्निहित सांगीतिक रहस्यमयता एवं उज्ज्वल सहजामिय रसात्मकता से भरेपूरे जीवन संघर्षों का यथास्थान सहज उद्घाटन सृजनात्मक फलश्रुति के रूप में सामने आता है।

विनोदकुमार शुक्ल के कवि-कथाकार द्वारा पूरे कलात्मक संयम से हुआ यह रहस्यमूलक रसोद्घाटन निश्चय ही सहृदय पाठक के रागात्मक संस्कारों को इस कदर भावप्रवण बनाने में समर्थ है कि वह, रोलाँ बार्थ की शब्दावली में कहें तो, उनके उपन्यासों के 'प्लेज़र ऑफ टेक्स्ट' में डूबने-उतराने के उपरान्त अपने ही भाव-जगत में खुद को एक नये आगंतुक की सर्जनात्मक मनोदशा में पाता है। स्पष्ट ही ऐसी दशा में रचना में एक विलक्षण अमूर्तन उत्पन्न होता है जिसके प्रति आलोचकीय रुख कदापि निषेधात्मक नहीं होना चाहिए। क्योंकि, बकौल लूसिएँ गोल्डमान, 'अमूर्तन' कई बार 'यथार्थ' का निषेध करने के बजाय उसका पोषण करता है। सच तो यह है कि विनोद जी ने अमूर्तन के माध्यम से यथार्थ को ऐन्द्रिक संवेदन में सफलतापूर्वक तत्त्वान्तरित कर दिया है। विपिन कुमार अग्रवाल के 'अमूर्तन के पक्ष में' दिये गये एक स्वतंत्र मंतव्य से यदि विचार-सूत्र लेकर कहें, तो विनोदकुमार शुक्ल की कृतियों में हर वर्णन कुछ सत्य है, कुछ संभावना। उसमें सत्य उतना ही है, जो एक घटना-विशेष में प्रत्यक्ष हो जाता है, शेष संभावना है और उसके सत्यापन के लिए दूसरी उपयुक्त घटना की संरचना आवश्यक है। इस दृष्टि से वस्तु या अनुभव कोई एक निश्चित पारिभाषिक इकाई नहीं है वरन, संभावनाओं का पुंज है। कौन-सी संभावना रूपायित होगी, यह इस पर निर्भर करेगा कि हम कैसे उसे देखना चाहते हैं।

निराला की दुहाई देकर केवल 'गद्य को ही जीवन संग्राम की भाषा' तथा रचनात्मक लेखन को केवल जीवन-संग्राम का साहिेत्य बनाकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने को आमादा विद्वानों को शायद प्रेमचंद के उस कथन की याद दिलाना जरूरी हो, जहाँ उन्होंने अपने जमाने की रचनाओं में विनोदवृत्ति के अभाव पर चिंता जाहिर करते हुए लिखा था : 'इस जीवन संग्राम में साहिेत्य पर जो सबसे बुरा असर पड़ है वह यह है कि वह दिनोंदिन मर्सिया हुआ जाता है।' ऐसे में कविता एवं कथासाहिेत्य के आलोचकों को विनोदकुमार शुक्ल की कृतियों पर भी नये सिरे से सोचने की जरूरत का गहरा एहसास होना चाहिए, जिनमें पाठक के साथ यथार्थ के आतंक के बजाय एक रागात्मक बोध का संबंध बनाने की लेखकीय बैचेनी अन्तर्निहित है।

उत्तर-आधुनिक विचारक हेराल्ड ब्लूम ने साहिेत्य-सृजन में सौन्दर्यात्मक मूल्यों को नजरअंदाज़ कर 'एक्टिविज्म' खोजने वाले नाराज लोगों' पर तीक्ष्ण व्यंग्य करते हुए कहा है : 'यदि आप यह विश्वास करते हैं कि कविताओं, उपन्यासों, नाटकों अथवा कहानियों का मूल्य वास्तव में शासक वर्गों की सेवा में लगा हुआ केवल एक रहस्यीकरण मात्र है तो आप अध्ययन में लगें ही क्यों? क्यों न जाकर शोषिेत वर्ग की भीषण आवश्यकताओं में लग जाएँ?... साहिेत्य के अध्येता शौकिया राजनीतिशास्त्री, एकांगी समाजशास्त्री, नीम-हकीम नृतत्त्वशास्त्री व दार्शनिक तथा जड़ सांस्कृतिक इतिहासवेत्ता होकर रह गये हैं। वे साहित्य से नाराज हैं अथवा इसको लेकर लज्जित हैं या इसके पठन-पाठन में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है।' विनोदकुमार शुक्ल के शब्दकर्म में राजनीति से शून्य कला के बजाय मनुष्य की गहरी जिजीविषा एवं जीवनधर्मिता के बुनियादी तत्त्व को जिस तरह जिया गया है, उसमें अनुभव की जो सघनता व सुखात्मकता है, उसके सामाजिक-राजनैतिक गर्भितार्थों के विवेचन-विश्लेषण के लिए कोई मध्यम मार्ग, किसी वैकल्पिक सौंदर्यशास्त्र की तलाश जरूरी है जिसके बगैर विनोदकुमार शुक्ल सरीखे रचनाकारों द्वारा प्रस्तावित वैकल्पिक समाज का सौंदर्य आलोचना के 'थके लोचन' के चलते अनदेखा ही रह जायेगा। हिन्दी आलोचना को हिन्दी साहित्य' के हित में यह जरूरी काम जल्द से जल्द करना ही होगा, तभी वह उनकी कृतियों की अनुभूति की संस्कृति से हमारी पूरी जान-पहचान करा सकने की स्थिति में पहुँच सकेगी, अन्यथा वह 'काव्यमीमांसा' में राजशेखर कथित 'तत्वाभिनिवेशी' के बजाय अरोचकी' आलोचना ही कहलायेगी।

जार्ज ऑरवेल के 'पशुबाड़ा' (एनिमल फार्म) उपन्यास में नेपोलियन नामधारी एक पात्र द्वारा उसके भाषण के दौरान कहलवाया गया है कि अब तक बाड़े में एक मूर्खतापूर्ण परंपरा चली आ रही थी कि पशु एक-दूसरे को 'कामरेड' कहकर संबोधित करते थे। इसे समाप्त किया जाता है।' यह सुखद है कि हाल के दशकों में हिन्दी रचनाकारों के बीच कुछेक हास्यास्पद अपवादों को छोड़कर विचारधारात्मक कट्टरता में बहुत हद तक कमी आई है। इसका सुफल यह है कि प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संध एवं जनसंस्कृति मंच से जुड़े ज्यादातर मसिजीवी न केवल आपस में, बल्कि गैरमार्क्सवादी रचनाकारों के प्रति भी सहिष्णु और उदार हुए हैं। अंतोनियो ग्राम्शी ने सही लिखा है कि 'कलाकार के सम्मुख एक राजनैतिक परिदृश्य अवश्य होता है, किंतु, किसी राजनीतिकर्मी की अपेक्षा वह कम नपा-तुला होता है। इसलिए, वह कम कट्टर होता है।' ग़ालिब कहते हैं :

दुश्मनी में हमने खोया ग़ैर को
    ग़ौर से दुश्मन को देखा चाहिए।

हिन्दी-संसार में प्रगतिशील-जनवादी कही जाने वाली बिरादरी में अपने खुले जीवट, अद्वितीय सत्यनिष्ठा, मूलगामी आलोचना-दृष्टि एवं वाग्मिता के प्रकर्ष के चलते लगभग सर्वसमादृत प्रो. मैनेजर पाण्डेय का भी मानना है कि 'अपने समाज एवं समय के संदर्भ में प्रगतिशील होने के लिए मार्क्सवादी होना आवश्यक नहीं है। अगर कोई रचनाकार अपने समय और जीवन से गहरे स्तर पर जुड़ा हुआ है, तो उसकी रचनाशीलता में प्रगतिशीलता होगी।'

मुख्यतः और मूलतः एक साहित्यकार व संस्कृतिकर्मी होने के बावजूद मुक्तिबोध ने एक गहरे सत्य का उद्घाटन करते हुए लिखा है कि मनुष्य की सत्ता का निर्माण करने का एक मात्र मार्ग राजनीति है। गौरतलब है कि यहाँ केवल सत्ता हथियाने के लिए लोभ-लाभ की चुनावी राजनीति के बजाय उनका आशय उस राजनीति से है जिसे भारतीय गणतंत्र के पूर्व राष्ट्रपति भारतरत्न डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम ने राष्ट्र के नाम अपने एक सम्बोधन में विकासात्मक राजनीति कहा था। स्पष्ट ही इस राजनीति के दायरे में वे तमाम रचनात्मक सामाजिक-सांस्कृतिक कर्म स्वभावतः आ जाते हैं, जो सत्ता-व्यवस्था को केवल पानी पी-पीकर कोसने के बजाय यथासम्भव मानवीय बनाने के लिए सतत प्रयासरत रहते हैं।

उपर्युक्त मंतव्यों के आलोक में विनोदकुमार शुक्ल की रचनाओं को उनकी गहन जीवनधर्मी प्रगतिशीलता का सृजनात्मक साक्ष्य मानना निराधार न होगा। वजह यह कि हिन्दी शब्द-चेतन समुदाय के एक अग्रगामी पुरोधा के तौर पर उनकी छवि मतान्धता-मुक्त वातायन के प्रणेता के रूप में सामने आती है। उनके उपन्यासों में आये ज्यादातर पात्र आर्थिक विपन्नता के मारे हैं। 'नौकर की कमीज़' के आत्मसजग कथानायक संतू बाबू का बयान हैः 'अपने बस में करने और अपना गुलाम बनाने के तरीके बदल गए हैं।' उल्लेखनीय है कि संतू बाबू अपने साहब द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न का प्रतिकार करते हुए अंततः कमीज को फाड़कर चिथड़े-चिथड़े कर देता है। नौकरशाही की इंतहा को रेखांकित करने वाली इस कृति में उपन्यासकार की सृजनात्मक कल्पना के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष का उद्घाटन करते हुए कवि-आलोचक विनोद दास लिखते हैं : संतू बाबू छल, पाखण्ड, लूट तथा गैर-बराबरी पर टिकी व्यवस्था से घुटते-चिढ़ते और एक सीमित दायरे में मुठभेड़ करते हैं। एक तरह से संतू बाबू एक अत्यंत आत्मसजग पात्र हैं। दरअसल उनकी यह आत्मसजगता एक वैकल्पिक जीवन की खोज है। दूसरे शब्दों में, इसे एक स्वतंत्र मनुष्य की पहचान कह सकते हैं। इसके लिए विनोदकुमार शुक्ल ने ऐसी कथा-तकनीक अपनाई है, जिसमें नायक हर अनुभव में शामिल भी रहता है और उससे अलग देखते हुए साथ ही साथ उसकी विवेचना करता चलता है। एक तरह से यह एक अदृश्य प्रतिनायक है। यह प्रतिनायक अपने नश्तरी विश्लेषण से अनुभव के रोएँ-रेशे चीर कर अलग कर देता है। इसकी अंतर्विरोधी चमकदार उक्तियों, सूक्ष्मतम दृष्टि और यथार्थ और स्वैरकल्पना का अद्भुत मेल, संवेदना के रंग, अंदाज और तेवर तथा भाषा के गहरे और अप्रत्याशित अर्थ पाठक को चकित कर देते हैं।' (भारतीय सिनेमा का अंतःकरण, पृ. 80) कहना न होगा कि इस गहरी अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण विश्लेषण में लगभग वे सारे सूत्र समाहित हैं जो कमोबेश विनोदकुमार शुक्ल के सम्पूर्ण कथा-साहित्य के विश्लेषण क्रम में कुंजी के तौर पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

'नौकर की कमीज़' के संतू बाबू, 'खिलेगा तो देखेंगे' के गुरुजी और 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' के रघुवर प्रसाद के घर को देखकर ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानी 'पिताजी चुप रहते है' की सहसा याद आती है, जिसमें घर को लेकर कहानीकार की चिन्ता की व्यापकता, अर्थवत्ता और विडंबना को इस प्रकार व्यक्त किया गया है : 'कोई घर का हुलिया देखता, तो पहली नजर में राय कायम कर लेता कि ये किसी बाबू का घर है, जिसकी जेब में नोट नहीं, खुशफहमियों के नीले जुगनू टिमटिमाते रहते हैं। कुल एक कमरा था जिसे हम अपना घर कहते थे। उस कमरे को घर कहते हुए ऐसा लगता, कोई तौफीक चरमरा गई। कोई एहसास औंधे मुँह गिर पड़ा है। यह कमरा घर नहीं, घर की प्रस्तावना भर था, इसमें घर नाम की शय इतिहास हो चुकी थी, जो भूगोल बचा था, वह किसी बदशक्ल स्टोर जैसा था। कभी-कभी ऐसा लगता, हम पाँच जीव भी इस स्टोर की वस्तुएँ-मात्र हैं।'

प्रसंगवश हिन्दी पाठकों के सूचनार्थ निवेदित है कि तेलुगु में कोडवटिगंटि कुटुंबराव द्वारा बहुत पहले रचित 'बतुकु भयं' ('जिन्दगी का डर') उपन्यास की बनावट एवं बुनावट 'नौकर की कमीज' से बहुत दूर तक मिलती-जुलती है और उसका मुख्य पात्र सीतप्पा भी लगभग संतू बाबू की ही तरह का है। किंतु, इन दोनों उपन्यासों का तुलनात्मक विवेचन-विश्लेषण बेहद दिलचस्प, चुनौतीपूर्ण और उत्तेजक आलोचनात्मक उपक्रम हो सकता है जो कि स्वतंत्र अध्ययन का विषय है।

'खिलेगा तो देखेंगे' उपन्यास में आए चरित्र भी निम्न-मध्यवर्गीय अभाव से पीड़ित है। पर वे भी संतू बाबू की तरह ही भाग्यवाद में विश्वास नहीं रखते। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' में भी केवल आठ सौ रुपये मासिक वेतन पर महाविद्यालय में गणित पढ़ाने वाले अध्यापक रघुवर प्रसाद सोचते हैं कि 'वेतन अच्छा होता तो बताता कि एक पुत्र पिता की किस तरह परवाह करता है।' विनोदकुमार शुक्ल ने भारतीय निम्नमध्यवर्ग की आर्थिक तंगी से आगे बढ़कर अपने समय की दरिद्रता को भी रेखांकित किया है : 'यह ऐसा गरीब समय है, जिसमें गरीबी मुद्दा नहीं। यह ऐसी भुखमरी का समय है जिसमें पेट भरना कोई मुद्दा नहीं बनता।' कवि जब कहता है कि 'यह सामाजिक-समाज का समय नहीं है' तो, प्रकारांतर से इस सोचती हुई-सी संरचना से ध्वनि यह निकलती है कि हमारा यह तथाकथित उत्तर-आधुनिक समय सामाजिक के बजाय केवल भूगोलीय समय बनकर रह गया है। अपनी एक कविता में विनोद जी कहते हैं :

'दूर से अपना घर देखना चाहिए
    दूसरे देश से अपना देश
    अंतरिक्ष से अपनी पृथ्वी

.................................

घर में अन्न जल होगा कि नहीं की चिंता
    पृथ्वी में अन्न जल की चिंता होगी
    पृथ्वी में कोई भूखा
    घर में भूखा जैसा होगा
    और पृथ्वी की तरफ लौटना
    घर की तरफ लौटने जैसा।'

- सब कुछ होना बचा रहेगा, पृ. 24

गौरतलब है कि लिविस्ट्रास जैसे विचारक यह दलील भी पेश करते रहे हैं कि समाज संबंधों की एक स्थिर संरचना है। जबकि सर्वविदित है कि समाज में मानवीय संबंधों में प्रायः गत्वरता या गतिशीलता होती है जिसके बगैर कोई सामाजिक विकास असंभव है। अपने मुल्क में हाल के दशकों में बड़े पैमाने पर किसानों, कवियों-कलाकारों आदि की आत्महत्या की दर और व्यवस्थापोषक राजनीतिज्ञों, बुद्धिजीवियों आदि के यथास्थितिवादी बयानों-विमर्शों में नैतिक कल्पना की दरिद्रता के मद्देनजर यह बात और साफ हो जाती है। बावजूद इसके, विनोद जी की सभी कृतियों में मनुष्य के जीवन में अवसाद के साथ-साथ एक हद तक आत्मसंतोष एवं आह्लाद के दर्शन भी होते हैं। भूमण्डलीकरण और बाजारवाद के प्रभाव की वजह से साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी दबे पाँव घुसपैठ कर रहे कल्पना-दारिद्र्य से उत्पन्न सतहीपन या उथलेपन के इस युग में जो गिनी-चुनी रचनाएँ अपने समय-समाज की चुनौतियों के सृजनात्मक उत्तर देने व पाने की बेचैनी से भरी हैं, उनमें विनोदकुमार शुक्ल के उपन्यास अग्रगण्य हैं।

साहित्य की समाजशास्त्रीय विश्लेषण-पद्धति की कसौटी पर विनोदकुमार शुक्ल के उपन्यासों को यदि कायदे से कसा जाए तो उनमें साहित्यिक कल्पना का जिस कदर वस्तुगत प्रत्यक्षीकरण संभव हुआ है, वह लेखक की उस 'विश्वदृष्टि' का परिचायक है, जिसके तहत साँप मर जाय और लाठी भी न टूटे वाली खामोश होशियारी का रचनात्मक इस्तेमाल करते हुए उपन्यासकार ने भूमण्डलीकरण एवं वित्तीय-पूँजीवाद व नयी महाजनी सभ्यता के इस दौर में ऐसी अनोखी 'प्रति-आर्थिकी' या 'भिक्षुक अर्थव्यवस्था' (सेनोबाइट इकॉनॉमी) का गल्प रचा है, जो आधुनिक मनुष्य के दैनन्दिन जीवन में उपभोक्तावाद की मुखालफत करती है, जिससे कि आदमी बाजार की तानाशाही से यथासम्भव मुक्त होकर उसके विरुद्ध अपने तईं मोर्चा खोल सके। याद आ सकते है टाल्स्टाय, जिन्होंने कहा था - 'र्ईश्वर को धन्यवाद कि जिन चीजों की हमें जरूरत है, उनका पाना कठिन नहीं है और जिनका पाना कठिन है, वे जीवन के लिए अनिवार्य नहीं हैं।'

'कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र' (1848) में मार्क्स-एंगेल्स ने लिखा है : 'पूँजपति वर्ग न, जहाँ पर भी इसका पलड़ा भारी हुआ है, वहाँ सभी सामन्ती पितृसत्तात्मक और 'काव्यात्मक' सम्बन्धों का अन्त कर दिया। उसने मनुष्य को अपने 'स्वाभाविक बड़ों' के साथ बाँध रखने वाले नाना प्रकार के सामन्ती सम्बन्धों को निर्ममता से तोड़ डाला और नग्न स्वार्थ के नकद-पैसे-कौड़ी के ह्रदयशून्य व्यवहार के सिवा मनुष्यों के बीच कोई दूसरा सम्बन्ध बाकी नहीं रहने दिया। धार्मिक श्रद्धा के स्वर्गोपम आनन्दातिरेक को, वीरोचित उत्साह और कूपमण्डूकतापूर्ण भावुकता को उसने आना-पाई के स्वार्थी हिसाब के बर्फीले पानी में डुबो दिया है।' और, हमारे ज़माने में भारतीय उपमहाद्वीप के एक बड़े कवि शमशेर ने कहा :

इल्मो-हिक़मत दीनों ईमां मुल्को-दौलत हुस्नो-इश्क
    आपको बाजार से जो कहिए ला देता हूँ मैं

स्मरणीय है कि जिस तरह भारत की पराधीनता के युग में रचित सारा का सारा साहित्य मुक्ति के लिए प्रेरणा देने वाला साहित्य था, उसी तरह बाजार की तानाशाही के इस दौर में रचित विनोदकुमार शुक्ल की कृतियों में तथाकथित 'प्रगतिशीलता' के नाम पर समकालीन साहित्य के क्षेत्र में प्रचलित 'दहाड़ते आतंक' के मानदण्डों के बीच उनकी अद्वितीय सृजनात्मक आकांक्षाएँ उदाहरण होने से बचकर जिस निजी शैलीगत विशिष्टता के साथ अभिव्यक्त हुई हैं, वह उन्हें बाजार के शिकंजे में कसमसाते वर्तमान भारतीय मनुष्य की मुक्ति के लिए छटपटाहट का 'औरेबी हमसफर' सिद्ध करती है।

गौरतलब है कि पूँजीवादी बाजार पर आधारित अर्थव्यवस्था के अनेक अंतर्विरोधों में से एक है - उपभोक्ता सामग्री का अतिउत्पादन, जिससे अंततः विकसित देशों में महामंदी की स्थिति उत्पन्न होती है। इससे निजात पाने के लिए विकसित राष्ट्र तथाकथित तीसरी दुनिया के देशों के बाजार में अपने अतिरिक्त उत्पादन को जबर्दस्ती खपाने के लिए तरह-तरह के माया-जाल बिछाते हैं। किन्तु, जब यह तरकीब उनकी अपेक्षा के अनुसार काम नहीं आती, तो, वे दुनिया को युद्ध की ओर ढकेलने की साजिश रचते हैं, जिससे युद्धरत राष्ट्रों को हथियार बेचकर मुनाफा कमाया जा सके। इसे ही कुछ विचारकों ने बाजार की मूलगामिता कहा है। कहना न होगा कि यदि आज किसी भी वजह से कोई युद्ध छिड़ता है तो उसका रूप परमाणु युद्ध हो सकता है, जिसके नतीजे के बारे में अपनी अद्भुत समाजशास्त्रीय कल्पनाशीलता का परिचय देते हुए अरुन्धति रॉय ने लिखा है : "Our cities and forests, our fields and villages will burn for days. Rivers will turn into poison. The air will become fire. The wind will spread the flames. When everything there is to burn has burned and the fires die, smoke will rise and shut out the sun. The earth will be enveloped in darkness." (The End of Imagination)

ऐसे विध्वंसक दौर में मनुष्य की जिजीविषा के प्रति कवि विनोदकुमार शुक्ल की आस्था का सौंदर्य उनकी कई कविताओं में देखते ही बनता है :

1. किसी होने वाले युद्ध से
    जीवित बच निकलकर
    मैं अपनी
    अहमियत से मरना चाहता हूँ
    कि मरने के
    आखिरी क्षणों तक
    अनंतकाल जीने की कामना करूँ
    कि चार फूल हैं
    और दुनिया है।

- सब कुछ होना बचा रहेगा. पृ. 31

2. बचाओ! बचाओ!! चिल्ला सकने वाले लोग
    बचाओ भी नहीं चिल्लाते
    कोई बचा है
    यह पूछने वाला भी नहीं बचेगा।
    लगता है दुनिया को नष्ट करने का धमाका
    अभी शायद हो
    हो सकता है जिंदगी को नष्ट करने के धमाके के पहले
    जिंदगी का बड़ा धमाका हो।

- सब कुछ होना बचा रहेगा, पृ. 33

स्पष्टतः नई महाजनी सभ्यता की चपेट में उभरते सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों में एक, भारत को अपने हित में बाजार की मूलगामिता के संभावित खतरों से उबरने का विकल्प ढूँढ़ना ही होगा और 'दीवार में एक खिड़की रहती थी उपन्यास में यह विकल्प भिक्षुक अर्थव्यवस्था' (Cenobyte Economy) के विलक्षण सौन्दर्य के रूप में विद्यमान है।

विनोदकुमार शुक्ल की 'महाविद्यालय' कहानी में वस्तुतः न केवल 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' उपन्यास का सृजनात्मक बीज निहित है, बल्कि वहाँ बाजारवादी अर्थव्यवस्था का क्रिटीक भी मौजूद है। इस कहानी में नैरेटर कहता है : 'मेरा खाली समय बाजार घूमने में बीतता था। बाजार घूमना मेरी आदत हो गयी थी। मुझे मजा आता था।... खुद की खरीदी से दूसरों को खरीदते देखना ज्यादा अच्छा लगता था। सारा बाजार घूम लेने के बाद भी, हमारे पैसे बिल्कुल खर्च नहीं होते थे।... बिना एक पैसा खर्च किये बाजार से घूम-फिरकर निकल आना मुझे लगता था, कितनी आजादी है, कहीं कोई जबरदस्ती नहीं।... फिर भी मैं समझता था कि बाजार के बिना बचा नहीं जा सकता। भीख के पैसे लेकर भिखारी भी खरीददार। उधार लेकर खरीददारी। चोरी-डाके के बाद खरीददारी, नहीं तो बाजार में रहते हुए, भूखे-नंगे, बिना दवा के मर जाइए...पिताजी का कहना था कि कोसा, ऊन, सोना, रुपया इत्यादि में छूत नहीं होता। मैं पिताजी से कहता था, 'ये सभी तो कीमती चीजें हैं, कोई सस्ती चीज बतलाइए'। जब मैंने उनसे कहा था 'गरीब छूत होता है' तब पिताजी ने कहा था, 'हम भी तो गरीब हैं'। पिताजी चिढ़ गये थे।' प्रसंगवश याद आती है विनोद जी के कविता-संग्रह 'कविता से लम्बी कविता' की एक पंक्ति :

अपनी ही मजबूरी की मजदूरी का / गरीबी अपने में एक बड़ा घेरा - कविता से लम्बी कविता, पृ. 14

'काव्य-कला तथा अन्य निबन्ध' में जयशंकर प्रसाद ने लिखा है कि 'यथार्थवाद क्षुद्रों का ही नहीं अपितु महानों का भी है। वस्तुतः यथार्थवाद का मूल भाव है वेदना। जब सामूहिक चेतना छिन्न-भिन्न होकर पीड़ित होने लगती है, तब वेदना की विवृत्ति आवश्यक हो जाती है।' विनोद जी अपने उपन्यासों में औसत भारतीय मनुष्य के सामुदायिक जीवन में निहित सामूहिक चेतना से परिचालित आम तजुर्बे की समाज ही नहीं, बल्कि प्रकृति एवं पशु-पक्षियों से जितनी गहरी और विलक्षण नातेदारी दिखाते हैं, वह 'जादुई यथार्थवाद' से जुड़े संसार के कुछ बड़े लेखकों की कृतियों की याद दिलाता है। इस क्रम में वे ज्ञान की भूमि पर खड़ी भारतीय विचारधारा और संवेदनशीलता से भरपूर आख्यान-परम्परा से गहरे जुड़े होने के चलते अपने उपन्यासों में विभिन्न जीवनस्थितियों के वर्णन-चित्रण के दरम्यान मूर्त और अमूर्त के बीच अक्सर पैदा हो जाने वाली फाँकों को भरते हुए बाह्य और आभ्यंतर में विलक्षण एकात्मता स्थापित करने की भरसक कोशिश करते है। 'जादुई यथार्थवाद' के बारे में सैलमैन ने लिखा है कि 'उत्तर-औपनिवेशिक लेखक बहुधा जादुई यथार्थवाद को आधार बनाकर अपनी कृतियों का ताना-बाना बुनते हैं। ये कृतियाँ प्रायः राजनैतिक एवं सांस्कृतिक अन्तःस्वर, प्रतीक कथाओं और रूपकों के माध्यम से प्रतिबिम्बित होती हैं।' तथाकथित तीसरी दुनिया और खास तौर से लैटिन अमेरिकी जादुई यथार्थवादी रचनाकार मुख्यतः और मूलतः सामुदायिकता को ही केंद्र-बिंदु बनाकर कथा-साहित्य का सृजन करते रहे हैं। वजह यह कि सामुदायिक जीवन की सामूहिक चेतना का 'उज्ज्वल वरदान' किसी समुदाय के सदस्यों को विषम स्थिति से मुकाबला करते हुए नाकाम हो जाने पर भी प्रायः नाउम्मीदी से बचा ले जाता है। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' उपन्यास में महाविद्यालय में रघुवर प्रसाद के न मिलने पर साधू के साथ ही हाथी का भी उदास हो जाना, साधू के अस्वस्थ होने पर हाथी का भी अस्वस्थ हो जाना, गाय का प्रतिदिन सोनसी की खिड़की पर आना, बूढ़ी अम्मा के स्वर्ण-कण पाने पर, जो वस्तुतः बुनियादी सांस्कृतिक मूल्यों के प्रतीक हैं, लंगूर और तोते का आह्लादित होना, तालाब का रघुवर-सोनसी के लिए इंतजार करना, रघुवर प्रसाद का सोनसी के साथ तालाब में जल-क्रीड़ा करते समय तोते को यह बताना जरूरी लगना कि वह अपनी घरनी के साथ क्रीड़ा में लिप्त है - जैसे अनेकानेक प्रसंग इस कृति को तथाकथित तीसरी दुनिया के देशों में हो रहे जादुई यथार्थवादी लेखन का सगोतिया सिध्द करते हैं। कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं - 'सोनसी की साड़ी लगता है हवा उड़ा ले गई थी, पर वह नग्न नहीं थी। हवा में उड़कर जाती हुई रंगोली ने उसे ढाँक लिया था। वह रंगोली की साड़ी पहनी हुई थी। हवा जब थम गई तो पेड़ों, फूलों, दूबों की गन्ध जो फैल गई थी वह पेड़ों, फूलों, दूबों के आसपास सिमटने लगी। यह सिमटना इस तरह का था कि पेड़ों के पास फूलों की गन्ध लय सिमट गई। दूबों के पास पेड़ों की गन्ध थी। एक पेड़ के पास जो बरगद का पेड़ था वहाँ तीज त्यौहारों के दिन की पूजा स्थल की सुगन्ध थी। उसी के पास एक पेड़ का तना एकदम काला चिकना था, यह शिवलिंग की तरह पेड़ था... तभी सोनसी की बाईं बाँह पर टाँय टाँय करता एक पक्षी आकर बैठा। 'देखो तो मेरे कंधे पर कोई पक्षी बैठा है।' पत्नी ने पूछा। उसके अपने भूले अस्तित्व से उसकी आवाज आ रही थी। सोनसी के हिलने-डुलने से पक्षी सरकता तो उसके पंजे के नाखून कन्धे पर गड़ते। 'हाँ एक सुन्दर हरा तोता है। पहाड़ीकरन। इसका कण्ठ फूट गया है।' 'तोता गहरी साँस और फुसफुसाहट को याद कर लेगा,' सोनसी ने गहरी साँस लेकर और फुसफुसाकर कहा। 'मैं उसे बता दूँगा कि हम पति पत्नी हैं' रघुवर प्रसाद ने कहा।... एकदम सुबह का सूर्य बाईं तरफ तालाब में था। सूर्य के बाद तालाब में रघुवर प्रसाद थे, फिर सोनसी थी।' (पृ. 57-58) वस्तुतः उपन्यासकार ने 'नौकर की कमीज' में भी यहाँ-वहाँ प्राकृतिक परिदृश्य का मनुष्य के परिप्रेक्ष्य में जो जीवन्त चित्रण प्रस्तुत किया था, उसका उत्कर्ष उसकी आगे की कृतियों में स्पष्ट दिखाई देता है।

सच तो यह है कि विनोद जी की रचनाशीलता में प्रकृति को लेकर आरंभ से ही गहरा आकर्षण दिखाई पड़ता है। दूसरे शब्दों में, उनकी रचनाओं में प्रकृति एवं संस्कृति के बीच की द्वंद्वात्मकता को सृजन के स्तर पर रेखांकित करने की छटपटाहट है :

जो शाश्वत प्रकृति है उसमें पहाड़ हैं उनकी चट्टानों, पत्थरों में
    बार बार उगते पेड़ और वनस्पतियाँ हैं
    वहाँ मैं जा रहा हूँ
    वहाँ ऐसा एकांत हिमांचल है
    कि कोई पहले गया न हो
    वे मनुष्य की राह देख रहे हैं
    वे पर्वत, श्रेणियों में उसी तरह स्थिर हैं
    जैसे चित्र खिंचवाने के लिए
    एक समूह होता है बाहर
    उनके बीच एक मेरी जगह है
    वहाँ मैं अटल स्थिर हो जाऊँगा क्या?
    मैं स्थिर नहीं होऊँगा
    घूमूँगा, दौडूँगा, हँसूँगा, चिल्लाऊँगा,
    रोऊँगा,
    कि इस एकांत में पहाड़ों को
    यह याद न आये कि एक समय था
    जब पृथ्वी में मनुष्य नहीं थे
    शायद उन्हें वह समय याद आ रहा हो
    जब पृथ्वी में मनुष्य नहीं थे।

- सब कुछ होना बचा रहेगा, पृ. 23

विनोदकुमार शुक्ल की ज्यादातर कविताएँ भले ही छत्तीसगढ़ी इलाके के जन-जीवन को लेकर रचित हों, किन्तु, उनके उपन्यास किसी विशेष भौगोलिक या जातीय सीमाओं में बँधे हुए नहीं हैं। उनमें परस्पर मुठभेड़ करने वाले जिन दो परिप्रेक्ष्यों को चित्रित किया गया हैं उनमें एक जहाँ सच्चाई के युक्तियुक्त नजरिये से बाबस्ता है, वहीं दूसरा परिप्रेक्ष्य अलौकिक को नीरस वास्तविकता के तौर पर अंगीकार करने से सम्बद्ध। एंजेल फ्लोर्स के 'जादुई यथार्थवाद' विषयक एक मंतव्य से विचार-सूत्र लेकर कहें तो विनोद जी के उपन्यास यथार्थ और स्वप्नचित्र के अनोखे संयोजन की सृष्टि हैं।

लूसिएँ गोल्डमान के शब्दों में कहा जाय तो उनकी कृतियों में 'भारतीय जनजीवन की वास्तविक सामूहिक चेतना' के बजाय 'संभाव्य चेतना' की कलात्मक अभिव्यक्ति हुई है। साहित्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन के क्षेत्र में 'उत्पत्तिमूलक संरचनावाद' की प्राक्-कल्पना का खुलासा करते हुए गोल्डमान रचनाकार की मुक्त सृजनात्मक कल्पनाशीलता की वकालत करते हैं : Its basic hypothesis being precisely that the collective character of literary creation derives from the fact that the structures of the world of the work are homologous with the mental structures of certain social groups or is in intelligible relation with them, whereas on the level of content, that is to say, of the creation of the imaginary world governed by this structures, the writer has total freedom. (Towards Sociology of the Novel, Page 159) अपनी इसी पुस्तक में उन्होंने बाजार से आक्रांत किसी समाज में कलाकार को एक ऐसे आलोचनात्मक चेतना-सम्पन्न व्यक्ति-मानव के रूप में हैसियत दी है, जो अपने समय-समाज में प्रचलित धारणाओं का विरोध करने का माद्दा रखता है : In a society bound up with the market, the artist is a problematic individual. And this means a critical individual, opposed to society" (Page 15)

दीगर बात है कि आज विकसित एवं विकासशील, दोनों ही तरह के देशों द्वारा परस्पर दोषारोपण करते हुए वहाँ के वर्चस्वशाली वर्गों के हित में तथाकथित विकास के नाम पर प्रकृति के निरंतर दोहन के इस उन्मादी युग में विनोदकुमार शुक्ल की कविताओं एवं खास तौर से कथा-साहिेत्य को ऐसे वृत्तांत के रूप में भी विसंरचित किया जना चाहिए, जिसमें भूमंडलीकृत पूँजीवादी विकास-प्रक्रिया का कलात्मक प्रतिपक्ष रचित है। यहाँ 'प्रतिपक्ष' को 'कलात्मक' कहने पर बल इसलिए कि स्पष्ट ही कला के बगैर किसी भी अन्तर्वस्तु के प्रभावशील होने की संभावना स्वतः नष्ट हो जाती है। कवि-आलोचक विष्णु खरे ने 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' पर अपने 'अनुकथन' में सही लिखा है कि इस उपन्यास में अपने जल, चट्टान, पर्वत, वन, वृक्ष, पशुओं, पक्षियों, सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्र, हवा, रंग, गंध और ध्वनियों के साथ प्रकृति इतनी उपस्थित है जितनी फणीश्वरनाथ रेणु के गल्प के बाद कभी नहीं रही...।'

दुनिया के लगभग सारे विचारक एवं साहिेत्यालोचन से जुड़े लोग इस मुद्दे पर सहमत रहे हैं कि साहित्यिक कृतियों की जड़ें प्रायः किन्हीं अनदेखे-अनजाने गुमनाम अंचल की बदरंग-सी माने जाने वाली जिन्दगी में गहरे धँसी होती है। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' उपन्यास का सृजन हिन्दी के शब्द-चेतन समुदाय के लिए वस्तुतः एक सांस्कृतिक परिघटना की तरह है और इसकी सबसे बड़ी वजह है इसमें अपने देशज जीवन-सत्य का रचनात्मक साक्षात्कार, जिसमें इस कृति की कथा-भाषा की अहम भूमिका रेखांकनीय है। स्पष्ट ही यहाँ गद्य तीक्ष्ण एवं संवेदनक्षम ही नहीं, बल्कि आम आदमी की बातचीत को सिझाकर निर्मित एक सुलिखित गद्य भी है, जिसमें ग्रामीण सामुदायिक जीवन के सच्चे गवाह की तरल आवेगमयता है। एक ऐसी सकरात्मक आवेगमयता, जिसे किसी भी स्थिति में आक्रामक होना गवारा नहीं है। सच तो यह है कि उपन्यासकार का सात्विक आक्रोश रचना-प्रक्रिया का वृत्त पूरा करके उसके कवित्वपूर्ण गल्प की संवेदना में पूरी तरह ढल गया है। 'खिलेगा तो देखेंगे' एवं 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' उपर्युक्त संदर्भ में खास तौर से उल्लेखनीय उपन्यास हैं। इनमें नकार की भाषा, भीड़ की भाषा का हो-हल्ला आदि से प्रयत्नपूर्वक बचते हुए उपन्यासकार ने पूरे के पूरे दृश्य को सघन रूपक में बाँध कर प्रतीकों में, और वह भी कम से कम गंभीर, छोटे अर्थगर्भी, अहिंसक शब्दों में कहने की कला को वैसे ही साधा है, जिसे पाणिनि ने शब्दों के सही उच्चारण की कला को व्याघ्री द्वारा अपने शिशु-शावक को दाँत के हल्के दबाव से सावधानीपूर्वक पकड़ने का उदाहरण देकर समझाया है। दूसरे शब्दों में, विनोद जी में उपन्यास-लेखन के क्रम में विभिन्न ज्वलंत बौद्धिक विमर्शों को तरजीह देने के बजाय औसत भारतीय सद्गृहस्थ के दैनंदिन जीवन की चारुता को चीन्हने की चाह है। 'छान्दोग्योपनिषद' में कहा गया है कि 'ते हैते महाशाला माहाश्रोत्रियाः समेत्य मीमांसापक्रुः को नु आत्मा किं ब्रह्मेति।' उल्लेखनीय है कि शंकराचार्य ने अपनी व्याख्या के क्रम में 'माहाशाल' का अर्थ महागृहस्थ किया है। आज के तथाकथित आधुनिक एवं उत्तर-आधुनिक माहौल में दाम्पत्य संबंधों में बिखराव के मद्देनजर रघुवर प्रसाद और सोनसी को एक ऐसे आदर्श महागृहस्थ के रूप में देखा जा सकता है, जिनका जीवन हमारे लिए आचरित यथार्थ का एक सौंदर्यशील विकल्प सामने रखता है। इस दृष्टि से भी यह उपन्यास हिन्दी में सर्जनात्मकता की एक नयी कसौटी सामने ला सका है।

एक साहित्यिक विधा के रूप में उपन्यास की सीमा और संभावना को रेखांकित करते हुए पश्चिमी आलोचक टिम पियर्स कहते है कि कोई उपन्यास दुनिया को नहीं बदल सकता, परंतु एक महान उपन्यास लोगों के दिमाग को अभूतपूर्व रूप से खोल देता है और जब दिमाग खुलता है तब भविष्य का दरवाजा भी खुलता है। (गार्जियन, 23 सितंबर, 2004)। स्पष्ट ही 'सापेक्ष' पत्रिका की विनोदकुमार शुक्ल के रचना-संसार पर केन्द्रित विशेषांक की योजना से हिन्दी आलोचना के भविष्य का दरवाजा भी देर आयद दुरुस्त आयद खुलता-सा नजर आता है। आसपास की जिन्दगी की जमीन में गहरे धँसी अपनी कृतियों को जीवंत बनाने के लिए रस खींचने में माहिर विनोदकुमार शुक्ल लिखते हैं : 'भविष्य निश्चित नहीं होता है इसलिए उसके बारे में कुछ भी सोच सकने की बहुत छूट होती है पर इस स्वतंत्रता का उपयोग नहीं होता। भविष्य के बारे में बुरा सोच सकने की कोई रोकटोक अपना विवेक नहीं करता पर अच्छा सोचने की स्वतंत्रता में बहुत रुकावट होती। जिन्दगी को जीना स्थगित मौत को जीना होता पर बहुत दिनों तक स्थगित मौत को भी नहीं जिया जा सकता। आत्महत्या करते हुए मौत की परीक्षा होती। ज्यादातर लोगों के जीने का तरीका आत्महत्या का तरीका होता है।' (खिलेगा तो देखेंगे, पृ. 18) उपन्यास में आया दार्शनिक-सा प्रतीत होनेवाला यह वक्तव्य किसी मिथ्या प्रतीति का प्रकाण्ड दर्शन या वागाडम्बर का प्रदर्शन नहीं है, जिसके पीछे 'श्लोकवार्तिक' के लेखक कुमारिल भट्ट के अनुसार प्रायः वाग्छल छिपा होता है। इसके विपरीत, यहँ जो बातें कही गयी हैं, वे आधुनिक एवं उत्तर-आधुनिक कही जानीवाली मनुष्य की जीवन-प्रणाली के अनुभवों की कोख से पैदा हुई हैं। इसलिए, विनोद जी के कथा-साहित्य में जगह-जगह अनुस्यूत ऐसे अनेकानेक वक्तव्यों की पृष्ठभूमि में मौजूद मंतव्यों तक पहुँचे बगैर इन पाठों की अन्दरूनी संरचना में निहित लेखकीय अन्तर्दृष्टि को चीन्हना असंभव है। स्पष्ट ही ऐसी कृतियों के अभिग्रहण का वृत्त पूरा होने के लिए पाठक में औपन्यासिक पाठ की केवल सतही संरचना से गुजरने के बजाय उसकी गहन अंतःसंरचना में गोता लगाने का धीरज होना जरूरी हैं :

अब्धिर्लंघित एव वानरभटैः किन्त्वस्य गम्भीरताम्।
    आपाताल-निमग्न-पीवरतनु-र्जानाति मन्द्राचलः।।

स्मरणीय है कि अपनी एक पाक्षिक पत्रिका में डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने लिखा था कि मराठी संत-साहित्य पर पर्याप्त अनुचिंतन के उपरांत उन्हें इस बात का गहरा अहसास हुआ कि अन्य कवियों को लेकर चाहे जो कुछ कहा जाए, परंतु संत ज्ञानेश्वर एवं तुकाराम को वे हर हालत में बचाकर रखना तथा बारंबार उनकी रचनाओं को पढ़ना-गुनना चाहेंगे। तात्पर्य यह कि किसी भी युग में विभिन्न सामाजिक-राजनैतिक आंदोलनों की अंदरूनी माँग के चलते इतिहास-प्रवाह में आनेवाली विचारधारात्मक ज्ञान की आँधी में भी श्रेष्ठ कला को मनुष्यता के पक्ष में किसी न किसी तरह बचाकर रखा जाना जरूरी ही नहीं, बल्कि हमारा ऐतिहासिक व नैतिक दायित्व भी है। विनोद जी की कविताओं एवं उनके कथा-साहित्य के प्रति भी हमारे समय की विभिन्न वर्चस्वशाली एवं उदीयमान विचारधाराओं के हथियारों से लैस आलोचकों को अपनी इतिहास-दृष्टि के मुकाबले सौंदर्यशील संवेदना का अनुपात बढ़ाना चाहिए, जिससे एक ही साथ औपन्यासिक पाठ-परीक्षण और इतिहास-प्रवाह में उस पाठ को रखकर युगीन संवेदना के निर्धारण-क्रम में पाठक के भीतर आस्वाद और मूल्य के द्वंद्वात्मक संबंधों की समझ विकसित हो सके। अन्यथा, उनके आलोचना-कर्म की भूमिका भविष्य में संभवतः सृजन-विरोधी मानी जाएगी।

बतौर शब्दकर्मी, विनोदकुमार शुक्ल की रचनात्मक उपलब्धियाँ हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य को अपनी शक्ति एवं सीमा में विस्तार और गहराई देने में स्वयं समर्थ हैं। उनकी कृतियों की श्रेष्ठता को किसी आलोचक की निर्मिति या समर्थन की बहुत जरूरत नहीं है। उनकी कथा-कृतियों में 'कविता' और 'गद्य' की अंतरंगता के विलक्षण और गहरे कौटुम्बिक सम्बन्ध-सूत्र मौजूद हैं। भले ही इसे प्रयोग माना जाए, लेकिन जैसा कि नामवर सिंह ने एक भिन्न संदर्भ में कहा है : 'कलाओं की दुनिया में इस तरह के प्रयोग होते रहते हैं, होने चाहिए।' बावजूद इसके, हिन्दी के सुरुचि-संपन्न पाठकों को भविष्य में उनकी किसी ऐसी कृति का बेसब्री से इंतजार रहेगा, जो मौजूदा समय के उन्मादी उपभोक्तावाद की गिरफ्त में बुरी तरह से फँस चुके भारतीय उच्चवर्ग व शहरी मध्यवर्ग के गहरे आंतरिक संकट और आसमान छूती महँगाई के मारे 'देह धरे का दंड' भोगने के लिए अभिशप्त छोटे किसानों, निम्न मध्यवर्गीय शहरी लोगों और भूमिहीन मज़दूरों के त्रासद जीवनानुभवों के साथ-साथ अपने देश में राजनीतिक स्वाधीनता की असलियत, आर्थिक स्वावलंबन व तथाकथित तरक्की की हकीकत, नागरिक स्वाधीनता की वास्तविकता, संसदीय जनतंत्र का यथार्थ, बुद्धिजीवी कहे जाने वाले मेरुदण्डविहीन प्राणियों के निहित स्वार्थ और तथाकथित 'संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न समाजवादी लोकतंत्रात्मक गणराज्य' में सत्ताधारी ही नहीं, बल्कि जनपक्षधर कहे जाने वाले विपक्षी दलों द्वारा, नागार्जुन की शब्दावली में, 'बहुमत' के नाम पर जनहित की चाँदमारी' के चरित्रहीन करिश्मों का भी कच्चा चिट्ठा उपन्यास-कला की शर्त का यथासंभव अनुपालन करती हुई इस कदर खोल सके जिसमें सामाजिकता एवं सौन्दर्यबोध, दोनों के बीच संश्लिष्ट सर्जनात्मक संतुलन संभव हो।


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हिंदी समय में रवि रंजन की रचनाएँ