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कहानी

बदमाश
पांडेय बेचन शर्मा उग्र


हमारे मुहल्‍ले का वह जो त्रिभुवननाथ है - बुड्ढा, अव्‍वल दर्जे का मक्‍खी-चूस है। उम्र तो है उसकी हा‍थ से लकड़ी पकड़कर चलने की, पर वह दाँत से कौड़ी पकड़ता चलता है। वह भी भोगने के लिए नहीं, दानार्थ भी 'नैव', केवल जोड़ने के लिए!

मगर, लक्ष्‍मी की कृपा...! 'पुरुष-पुरातन' की वह 'चंचला औरत', एक बार लड़कपन में, जो त्रिभुवननाथ पर आशिक हुई, सो हुई। मुहल्‍ले की दादियाँ साँझ-सबेरे साश्‍चर्य गलचौर करती हुई कहती हैं - 'त्रिभुवननाथ के घर में लक्ष्‍मी टाँग तोड़कर बैठ गई हैं!' लेकिन, जो लोग चंचला की मायाविनी प्रकृति को समझते हैं, बूढ़ियों की बातों पर केवल मुस्किरा देते हैं। कहते हैं - लक्ष्‍मी यदि किसी के यहाँ पाँव तोड़कर बैठ जाय, तो नारायण को संसार सँभालना तो दूर, अपना पीतांबर सँभालना भी दुश्‍वार हो जाय। शेष भू-भार उतारकर अपार पारावार के महाकार में मिला दें। अजी जनाब! यह तो भगवती माया ही हैं, जिनके लिए सृष्टि कर कोई अपने को कर्ता कहता है, दया-दृष्टि कर धर्ता और प्रलयाग्नि-वृष्टि कर संहर्त्ता। परदे के पीछे वही चंचला चमकती हैं, बाहर-बाहर उनके बेदाम गुलाम नाचते हैं।

ऐसी सर्वव्‍यापिनी, विश्‍व-विमोहिनी भला एक जगह टिक सकती है - टाँग तोड़कर -छि:!

त्रिभुवननाथ जब दस वर्ष का था, तभी अपने नाना की संपत्ति के लिए गोद ले लिया गया था। उस समय वह संपत्ति, चल-अचल कुल मिलाकर, बीस हजार रुपयों से अधिक की न थी। मगर, पिछले साठ वर्षों में त्रिभुवननाथ पूरे दो लाख का अधिकारी हो गया। इस समय, आप जानें, उसकी अवस्‍था पछत्तर साल की है।

त्रिभुवननाथ की एक सुंदरी स्‍त्री है - अट्ठारह वर्षीय, और एक लड़का है - जवान, जिसके वय का सत्रहवाँ वर्ष चल रहा है। अर्थात त्रिभुवननाथ की यह पाणिगृहीता चौथी हैं। पाँच वर्ष हुए, इस औरत को उसने चाँदी के जाल में फँसाया था; नहीं तो भला, खुशी से कोई आँखोंवाला बाप उसे अपनी बेटी देता? बात यों है - इस युवती के पिता को त्रिभुवननाथ ने असल में नौ सौ रुपए ऋण दे रक्‍खा था, जो पाँच वर्ष पूर्व, सूद-दर-सूद, पूरे पाँच हजार हो गया था! अब या तो वह गरीब त्रिभुवननाथ के तेरह वर्ष के 'बच्‍चे' को चौदह वर्ष की एक माँ देता, या अपना चिथड़ा-लत्ता, अर्तन-बर्तन, घर-बाहर। बस, बुड्ढे की गोटी लाल हो गई।

पाँच हजार मूल्‍य पर औरत का सौदा त्रिभुवननाथ कदापि न करता, यदि उसे बुढ़ौती में जवान बीबी के पुष्‍ट गुण न मालूम होते। कुछ लोग उसके सौभाग्‍य या दुर्भाग्‍य से व्‍यग्र होकर कहते - 'यह साला औरत खाकर जीता है।' मगर ज्‍यादातर लोग यह मानते हैं कि वह पुरुषत्‍व-हीन है, दिखावट और घर सँभालने के लिए औरत पर औरत ब्‍याह कर लाता है, उन्‍हें खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने की इतनी तकलीफें देता है कि या तो वे बदचलन हो जाती हैं, या जहर खाकर सो जाती हैं।

और त्रिभुवन का वह लड़का जवान सुखदेव, मुहल्‍लेवाले कहते हैं - त्रिभुवन की तीसरी स्‍त्री, उसकी जननी, ऐसी बदमाश थी कि दोहाई! उसने मुहल्‍ले-भर के युवकों को परख रक्‍खा था। उस पर प्रेत और प्रेतनियाँ भी आतीं, और उन्‍हें उतारनेवाले महीने में पंद्रह दिन त्रिभुवन नाथ के घर के आगे-पीछे मँडराते नजर आते थे।

किसी प्रेत-पिचाश के प्रसाद ही से सुखदेव ने संसार का मुँह देखा है, ऐसी उन सब लोगों की धारणा है, जो त्रिभुवननाथ को और उनकी झुकी कमर को जरा भी पहचानते हैं। और कहते हैं, इसीलिए यह लौंडा ऐसा विकट बदमाश है।


वह लौंडा - मैं उसे तब से जानता हूँ, जब से वह हमारी दुनिया में साँस लेने लगा है। एक ही मुहल्‍ले में रहने से स्‍वभाव चाहे न मिलता हो, पर उसका पिता त्रिभुवन है हमारा मित्र। और, एक बात और - विचार, सिद्धांत मिलें या न मिलें, पैसेवालों की परवा साधारणतया सभी लोग करते हैं। पैसा ही एक ऐसा मल है, जिसे ढोनेवाले लोग अश्‍पृश्‍य नहीं समझते, बल्कि अर्थ-मल वाहक को हक-नाहक लोग प्रेम-पुलित भाव से छाती और गले से लगाते फिरते हैं। किसी के हाथ में वह मल लगे, जिससे गरीब भंगी ढोता है, तो तुरंत ही वह व्‍यक्ति व्‍यग्र भावेन निर्मल होने को दौड़ता है। मगर अमीर भंगी का भार, चाँदी-मल हाथ लगते ही मनुष्‍य अपने हाथों के बाहर होकर बड़े चाव से मल-मल हो उठता है। इस त्रिभुवन नाथ को ही देखिए!

पहले तो वह 'हाय लड़का! हाय लड़का!' किया करता था - निपूता होने के कारण जन्‍म-भर की कंजूस कमाई आँखें मूँदते ही क्‍या जाने किसके हाथों में चली जायगी, यह सोचकर। जिस दिन सुखदेव पैदा हुआ, उसी दिन से घर में जो सवा पाव रोज दूध लिया जाता था, बंद कर दिया गया। कारण, वह ग्‍वाला ही मर गया, जो सूद के पैसे में दूध दे जाता था। सूखदेव के जन्‍म के दो वर्ष पूर्व त्रिभुवन ने उस ग्‍वाले को दो रुपए ऋण दिया था। दो पैसे रोज या सवा पाव सुच्‍चा दूध - सूद के वादे पर। ग्‍वाला बेचारा दो साल तक बराबर सवा पाव दूध त्रिभुवन के दरवाजे पर - एक सलाम और चार चापलूसियों के साथ - पहुँचाता रहा, पर उसके पास कभी पूरे रुपए न जुड़ सके। आखिर वह‍ मर भी गया, ठीक उसी दिन, जिस दिन सुखदेव ने जन्‍म का जग-मग देखा। इसीलिए त्रिभुवन ने उस दिन को बड़ा मनहूस समझा। जब घर के भीतर से सूद पर चाकरी करनेवाली मजूरिन यह कहने आई कि सरकार! बधावे बजें, घर में लाल ने जन्‍म लिया है, तब त्रिभुवन अपने उस ऋणी मुख्‍तार के बुलावने की व्‍यवस्‍था कर रहा था, जो सूद में उसके मुकदमें लड़ दिया करता था। उसके कान में बधावे की बात जा ही न सकी - वह अहीर की बकरियाँ कुर्क कराने की घातें टहल-टहलकर और उछल-उछल कर सोचता रहा।

अब सुखदेव की माँ सूतिकागार से बाहर आई, तो वह दूध-पूत से पूर्ण थी।

त्रिभुवन ने उसे समझाया - 'अब, जब भगवान ने अपना ही घर दूध से भर दिया है, तब पाव-सवा पाव के लिए गाय, ग्‍वाला और बकरियों का मुँह देखना फिजूल है।'

सुखदेव की माँ त्रिभुवन की कंजूसी जानती ही नहीं, भोग रही थी। वह उसकी ऐसी दुष्‍ट, स्‍वार्थ-भरी सलाहों का मर्म समझती थी, इसलिए उस खूसट को प्‍यार भी नहीं करती थी। और, पुरुषत्‍व की दृष्टि से प्‍यार करने के योग्‍य त्रिभुवन के पास था ही क्‍या? इसीलिए वह उससे नफरत करती। पहले बोलती ही नहीं; बोलती, तो गालियाँ दे चलती, और घृणा से जमीन पर थूककर पाँव रगड़ डालती। त्रिभुवन उसे इन सब बातों की पूर्ण स्‍वतंत्रता देता - नहीं देता, तो पैसे।

पैसे उसे मुहल्‍ले तथा इधर-उधर के 'जानकार' यार देते। बदले में वह उन्‍हें देती अपना व्‍यभिचारी प्‍यार!

जब सुखदेव दो साल का था, उस वक्‍त उसकी माँ मुहल्‍ले-भर में दुर्गंध फैला रही थी। मगर कहे, तो क्‍या, और सुने, तो कौन? अंगरेजी राज और तेली का तेल - फिर बीच में बोलनेवाला बेकवूफ नहीं, तो और क्‍या कहा जाता? अस्‍तु।

अपने दरवाजे पर बैठे-बैठे हम रोज सुनते कि यार लोग आठों पहर त्रिभुवन के दरवाजे पर डेरा डाले रहते हैं। वह दिन-भर और आठ बजे रात तक, कमर झुकाए, गली-गली में घूम-घूमकर अपने रुपए का सूद तहसीलता फिरता, और इधर उसकी बीबी अपनी आर्थिक समस्‍या घर बैठे हल करती।

लोग बतलाते, शाम को वह सजी-बजी अपने दरवाजे पर या पिछवाड़े, सुखदेव को गोद में लिए, खड़ी रहती है। समझे-सधे 'सज्‍जन' आते हैं। वे लड़के के हाथ में रुपया या रुपए देते हैं, और मा के मुँह से चुम्‍मा या चुम्‍मे लेते हैं!

अब सुखदेव पाँच वर्ष का नटखट बालक था, उसकी जननी की तनिक-सी नैया भव-सागर में डूब गई। भरपूर थपेड़े खाते-खाते जर्जर हो गई थी।

और, तब तक उस लड़के ने बाप को गंदी गालियाँ देने, दूसरों से रुपए-पैसे ऐंठने और फिर हृदय से लगकर चुंबन देने का पाठ पढ़ा था - अपनी माँ से!

बाप को तो अपना ही पाठ रटने से फुरसत नहीं थी।
 

पाँचवे वर्ष से वय के सत्रहवें साल तक सुखदेव त्रिभुवननाथ के तत्‍वावधान में रहा। पुत्र के प्रति पिता की जो स्‍वाभाविक वात्‍सल्‍य-भावना होनी चाहिए, वह तो सुखदेव के प्रति त्रिभुवन के मन में कदापि न थी। लोग इसके दो कारण बतलाते हैं - एक त्रिभुवन का अर्थ-प्रेम, जिसके आगे वह संसार के किसी भाव, अनुभाव, विभाव को नगण्‍य मानता, और दूसरा, लड़के की असलियत में संदेह। सुखदेव सचमुच त्रिभुवन का पुत्र न मालूम पड़ता। कहाँ वह बुड्ढा, निस्‍तेज जीव और कहाँ सुंदर सुखदेव! मुहल्‍ले के अच्‍छे-अच्‍छों के बालकों से सुखदेव अधिक सुश्री और तेजस्‍वी था। वह किसी तरह भी त्रिभुवन का पुत्र होने योग्‍य नहीं था।

मुहल्‍ले के लोग कभी-कभी सुखदेव के व्‍यवहार से चिढ़कर उसके स्‍वरूप को अपमानित करते। कहते - 'कमअसल है न साला! तभी ऐसा सुंदर होने पर भी शैतान-सा बदमाश है।'

त्रिभुवन के मन में सुखदेव की असलियत के बारे में संदेह ही नहीं, पूरा विश्‍वास था। इसीलिए वह उसके हित की कभी न सोचता। वह अच्‍छे की सोहबत में पड़ता है या बुरे की, इसकी कभी परवा न करता, और शहर के विख्‍यात बदमाशों के पास भी - अपने रुपए के तकाजे पर या सूद के रोजाना पैसे लाने को उसे भेजता। पढ़ने-लिखने की तो चर्चा तक न चलाता। कहता - 'पढ़ने के नाम पर फिजूल लोग अपने पैसे और वक्‍त का नुकसान करते हैं। एक वक्‍त हमारी जिंदगी में ऐसा आता है, जब पढ़े हों, या अनपढ़े अपने लाभ की बातें आदमी की समझ में खुद-बखुद आने लगती है। और बारह बरस तक सरस्‍वती की भट्टी में भाड़ झोंकने का अधिक-से-अधिक अर्थ यही तो है कि आदमी 'अपना भला-बुरा' समझने लगे।'

सुखदेव की पढ़ने की ओर प्रवृत्ति भी न थी। भरसक वह एक क्षण भी घर पर न बैठना चाहता। हमेशा इस गली से उस गली में दौड़ना चाहता। गली-गली के लड़कों को बुरी गालियाँ देता। उन्‍हें वैसा बनाना चाहता, जैसे को समाज में लोग 'बुरा' कहते हैं। अनेक बार वह लड़के-लड़कियों को चूमते और उनसे चूमे जाते हुए देखा, पकड़ा, लतिआया गया था।

ज्‍यों-ज्‍यों सुखदेव की बदमाशियों की शिकायतें त्रिभुवन के पास आतीं, त्‍यों-त्‍यों वह उसे अधिक-से-अधिक अपने अनुशासन में रखने का जोर मारता। आज्ञा-भंग पर अक्‍सर उसे थप्‍पड़, लात, घूँसे और बेंत से मारता। व‍ह ऐसे अवसरों पर त्रिभुवन के हाथों पिट तो जरूर जाता, पर घोर युद्ध करता हुआ, थूकता हुआ, अयोग्‍य गालियाँ देता हुआ।

पर 'मार' के आगे भूत भी भागता है, यह अमोघ मंत्र त्रिभुवननाथ ने जकड़कर पकड़ रक्‍खा था। वह सुखदेव को तब तक मारता, जब तक वह पूरी तरह परास्‍त न हो जाता; और परास्‍त होते ही पहले उससे अपना हुक्‍म मनवाता। कहता - 'दौड़ता हुआ जा -अरे, अभी खड़ा है! दौड़ता हुआ जा।'

कहाँ जा, क्‍यों जा, यह पहले कुछ न बताता। पिटाई से थका सुखदेव अपने झुके बाप का राक्षसी मुख देखने लगता। भयभीत-सा।
'अरे, अभी गया नहीं?'

'कहाँ?' वह धीरे से पूछता।

'अली बाजार, रज्‍जबअली इक्‍कावान के यहाँ। ब्‍याज के पैसे लेने!'

'अभी?' अब डरते-डरते सुखदेव कहता - 'अभी वह इक्‍का लेकर स्‍टेशन गया होगा। रात को लौटता है।'

'अरे रात के बच्‍चे!' बुड्ढा उसे एक कनथप्‍पड़ और लगाता - 'गली-गली घूमकर बदमाशी कर सकता है, और अपने बाप के पैसे लाने के लिए उस इक्‍कावान के दरवाजे पर दस मिनट बैठ नहीं सकता - भाग! भाग!'

त्रिभुवन डंडा तानकर उसे दौड़ाता, और सुखदेव छूटकर भागता।

मुहल्‍ले के लोगों ने बेहया होकर दस-दस बार त्रिभुवन को बताया कि रज्‍जबअली इक्‍कावान शहर का मशहूर आवारा है। उसके पास भेजना सुखदेव की बदमाशियों पर पॉलिश कराना होगा।

एक दिन कुछ लोगों ने उसे खबर दी कि रज्‍जबअली अपने इक्‍के पर बैठाकर सुखदेव को शहर की सड़क-सड़क की हवा खिलाता है। यदि लड़के के तेज से आकर्षित हो, लोग उसके बारे में उससे पूछते हैं, तो वह कहता है कि सुखदेव उसका 'रखैला' है।

'त्रिभुवन दादा!' - लोगों ने बुड्ढे को समझाने की चेष्‍टा की - 'तुम बहुत ही बुरा करते हो, जो ऐसे बदमाशों के पास सुखदेव को भेजते हो।'

'चलो-चलो।' एक ही त्रिभुवन का उत्तर होता - 'तुमसे सलाह कौन माँगता है? अरे! भाई वाह! अब कोई अपना रुपया-पैसा भी न वसूल करे। कौन साला कहता है कि रज्‍जबअली सुखदेव के साथ बदमाशी करता है? अजी मैं समझता हूँ। लोगों की छाती फटती है कि यह त्रिभुवन चार पैसे क्‍यों बना लेता है। हाय री कमबख्‍त दुनिया!'

जो हो, पर इसमें कोई संदेह नहीं कि तेरह वर्ष की वय में सुखदेव औरतों को घूरना, मर्दों के गले से लिपटना, किसी के भी पैसे को पलक झपते ही घुमा देना, और बड़े-छोटे सबके सामने बदतहजीब रहने का अभ्‍यासी हो गया था।

वह ज्‍यादातर भठियारों की सोहबत में रहता, क्‍योंकि त्रिभुवन के असामियों में ऐसे ही नीच लोग होते, जो उससे दस-पाँच रुपए रोजाना सूद की शर्त पर लेते - रुपए कभी न देते, और रोज सूद के पैसे बराबर भरते जाते।

उन लोगों ने बड़े प्रेम से बालक सुखदेव को बीड़ी पीना, बीड़ी में गाँजा पीना और गाँजे में चरस पीना भी सिखाया। कई बार मुहल्‍ले के लड़कों को बीड़ी में गाँजा पिलाते हुए सुखदेव पकड़ा और बेभाव पीटा गया था।

वह मार खाने में रुस्‍तम हो गया था, या कुत्ता; जो दो पग दूर बढ़ते ही भयानक-से-भयानक लतखोरी भूल जाता है।

उस दिन प्रातः छः बजे हाथ में नीम की दतून लिए मुँह साफ करता अपने दरवाजे पर जो आया, तो क्‍या देखता हूँ, गली में चारों ओर लाल पगड़ी की भरमार है। त्रिभुवन का घर घिरा हुआ है, और उसके दरवाजे पर मुहल्‍ले के अनेक लोग साश्‍चर्य, सभय, खड़े हैं। मेरे द्वार के पास भी एक सिपाही खड़ा था।

'क्‍या है जमादार साहब, आज सबेरे-सबेरे?' - मैंने दरियाफ्त किया।

'तुम्‍हारे मुहल्‍ले में चोरों का लकड़दादा रहता है। वही गिरफ्तार किया गया है।' 'कौन? कौन?'

'वही, त्रिभुवन का जवान पट्ठा - सुखदेव। इधर एक साल के भीतर जितनी चोरियाँ इस शहर में और इसके आस-पास हुई हैं, सबमें उस बदमाश का नाम है।'

त्रिभुवन के घर की ओर देखते हुए मैंने पूछा - 'तलाशी हो रही है क्‍या?'

'हाँ, भीतर कोतवाल साहब, छोटे दरोगा और बड़े जमादार तलाशी ले रहे हैं। गवाह की तरह मुहल्‍ले के 3-4 आदमी भी हैं।'

इसी समय बड़े जमादार घर से निकलकर उस सिपाही के पास आए।

'उत्तमसिंह! झपटकर जरा थाने पर तो जाओ, और एक बड़ी हथकड़ी फौरन लेकर आओ। हमारे साथ जितनी हथकड़ियाँ हैं, उनमें एक भी उसकी जबरदस्‍त कलाई पर नहीं चढ़ती।'

'कुछ माल बरामद हुआ?'

'ओह! बहुत। कई चोरियों की चीजें निकली हैं। अच्‍छे-अच्‍छे कपड़े, संदूकें, गहने, बर्तन। या अल्‍लाह! यह मुहल्‍ला तो डाकुओ का अड्डा निकला!'

मारे शर्म के मेरा सिर झुक गया - नीम और मुँह के कुरस को जमीन पर थूकते हुए जमादार से मैंने कहा - 'एक मछली सारा तालाब गंदा कर देती है।'

'गंदा? छि: - तौबा!' जमादार ने नफरत से कहा - 'यह बुड्ढा त्रिभुवन पूरा शैतान है।'

'वह भी घर में मिला?' सिपाही ने पूछा।

'कहाँ - वह तो चार ही बजे से सूद के पैसे तहसील से निकलता है, और हम यहाँ पहुँचे थे ठीक पाँच बजे। घर में एकाएक घुसने पर हमने देखा - वह बदमाश सुखदेव अपने बाप की नई जोरू के साथ लिपटकर खर्राटे ले रहा था! वाह रे जमाना!'

'छि:-छि:!' - सिपाही थाने की ओर बढ़ता हुआ बोला - 'ऐसे नालायक का तो सिर काट लेना चाहिए।'

'उसे बाप की जोरू के साथ सोते देख कोतवाल साहब को ऐसा गुस्‍सा आया कि उन्‍होंने जोर-जोर से कई बेंत लगाकर उसे उठाया। इस नीचता के लिए जवाब-तलब होने पर उसने निधड़क बताया कि उसका बाप हिजड़ा है, और वह जान-बूझकर उस औरत को उसके साथ सोने देता है।'

'क्‍या उसका बयान पुलिस ने लिख लिया?' मैंने पूछा।

'हाँ, बयान खत्‍म होने के बाद ही मैं बाहर आया हूँ।'

'चोरी की चीजों के बारे में उसने क्‍या कहा?'

'कबूल करता है। कहता है, मुझे आप लोग मारिए या सताइए नहीं - नहीं तो मैं भी हाथ छोड़ूँगा। मैं कबूल करता हूँ, मैंने चोरियाँ की है।'
मैंने पूछा - 'त्रिभुवन भी फँसेगा इस मामले में?'

'जरूर।' जमादार ने दृढ़ता से कहा - 'सारी खुराफातों की जड़ तो वही बुड्ढ़ा है, रुपए का गुलाम।

इस वक्‍त दो-तीन सिपाहियों के बीच में घिरा बुड्ढा त्रिभुवन आता दिखाई पड़ा। वह जोर-जोर से चिल्‍लाता आ रहा था - 'हे भगवान! ऐसा लड़का दुश्‍मन को भी न देना। इस बदमाश ने बैठे-बिठाए मेरे सिर पर आफत का पहाड़ ढा दिया है!'
 

सब कुछ बरामद हुआ, मगर त्रिभुवन के घर से रुपया एक भी न निकला। शहर का विख्‍यात कंजूस और धनी होने के कारण वह हमेशा पुलिसवालों की नजर में काँटे-सा खटकता था। कोतवाल के बाद कोतवाल आए, और चले गए, पर त्रिभुवन किसी के चंग पर न चढ़ सका - इसका पुलिसवालों को बड़ा खार था। पर त्रिभुवन हमेशा समाज के चोरों से मिलकर उनकी 'कमाई' कौड़ियों के भाव खरीदता, और फिर उनसे रुपए सीधे करता, पुलिसवालों की कंजी आँखों में सरासर धूल झोंककर।

सुखदेव यदि मुर्ख और बातुल न होता, तो त्रिभुवन की कलई कभी न खुलती। यह तो वही जिस-तिस पर बमककर बक देता कि तुम्‍हें रातों-रात लुटवा न दूँ, तो यह नहीं और वह नहीं। धीरे-धीरे पुलिसवालों की नजर उस पर गई। उसकी डायरी लिखी जाने लगी। उसका पीछा किया जाने लगा। उसके मिलने-जुलनेवालों का चरित्र अध्‍ययन किया जाने लगा। पुलिस पहचान गई, त्रिभुवन के कुपुत्र की खाल में उसके नीच व्‍यापार को।

पुलिसवालों ने अपने गोयंदों से जब अच्‍छी तरह पता पा लिया कि अब त्रिभुवन के घर में काफी प्रमाण एकत्र है - उसकी गर्दन नापने के लिए - तब बड़े विश्‍वास और आशा से, प्रातःकालीन मंद-मलय-समीकरण के साथ, चुपचाप छापा मारा था। उनको विश्‍वास था कि त्रिभुवन के घर में हजारों की झंकार नाचती नजर आएगी, मगर वहाँ नजर आई एक झंझी कौड़ी भी नहीं!

'साला गाड़कर रखता होगा।' - कोतवाल ने सोचा, और बस, त्रिभुवन का सारा घर खोद डाला गया। जिस कमरे में वह सोता था, उसको पुलिसवालों ने चारों ओर से कमर-भर गहरा खोदा, मगर भगवान की तरह वहाँ भी रुपए न मिले। अब उनका क्रोध प्रचंड हुआ त्रिभुवन पर।
'नकद रुपया कहाँ छिपाया है, हजरत?' कोतवाल ने उससे डाँटकर पूछा।

'दोहाई है कोतवाल साहब की!' - बुड्ढा रटने लगा अपना अभ्‍यास - 'किस ससुरे के पास एक कौड़ी भी हो हुजूर! पैसे-पैसे को तबाह हूँ। गली-गली ठोकरें खाता फिरता हूँ, और तिस पर भी लोग रुपए नहीं लौटाते।'

इतना कहकर त्रिभुवन रोने का नाट्य करते हुए बोला - 'दोहाई हुजूर की, खाने बिना हम लोग मरे जा रहे हैं!'

वह अभी बकता ही, अगर जमादार ने उसे एक थप्‍पड़ न जमा दिया होता - 'साला! चोरी का माल सरकाकर सेठ बना है और रुपयों का पता पूछने पर 'ढंडरच' करता है! जोखनसिंह! उस कमरे में ले जाकर इसका 'बयान' लो।'

'बयान लो' का अर्थ बाद में हमने समझा, जब कमरे से फटाफट जूते की आवाज और फिर त्रिभुवन की चीत्‍कार सुनाई पड़ी! दर्शक लोग दहल-से उठे - पुलिस के इस 'बयान लेने' पर हम सब धीरे-धीरे वहाँ से सरकने लगे। अभी उसका फटाफट बयान हो ही रहा था कि सभी दर्शक घटना-स्‍थल से सरक गए, पुलिस के सधे गवाहों को छोड़कर।

सच-झूठ की राम जाने, उस तलाशी के बारे में, बाद में, शहर में बड़ी-बड़ी बदशकल खबरें फैलीं। लोग फुसफुसाकर बातें करते थे - 'त्रिभुवन बुरी तरह जुतिआया गया, रुपयों का पता बताने के लिए। उसे पचासों तरह से - थुका-चटाकर, नंगा कर, उल्‍टे टाँगकर -जलील किया गया कि वह नकदी माल का पता दे। यहाँ तक कि उसकी बीवी तक को पुलिस छेड़ने पर उतर आई। वह तो सुखदेव मरने-मारने पर अड़ गया, तब उसकी इज्‍जत बची।'मगर था त्रिभुवन का सोना खोटा; उसका कोना बुरी तरह दबता था, उसके उस जीवन के कारण, जिन पर समाज नफरत भेजता है। उसके घर पर सचमुच चोरी का माल निकला था। उसका पारिवारिक इतिहास भी सर्व-साधारण की दृष्टि में निहायत अश्‍लील था। उसकी अर्थ-पिशाचता से लोगों को चोट लगती थी। अस्‍तु।

पुलिस के अन्‍यायी आचरण थे जरूर, पर त्रिभुवन की ओर से कोई किस मुँह से क्‍या बोलता?

जिसकी पिछली तीन औरतें एक भाव से समाज की दोनों आँखों में परिहास, विलास या घृणा की पात्री रह चुकी हों - चौथी की कहानी भी स्‍वभावतः निस्‍तेज ही - उस पर यदि पुलिस ने कुछ जुल्‍म किया, तो बु‍रा किया, मगर ठीक ही किया - जैसे को तैसा। ऐसा सोचकर तलाशी की नीचताओं पर हैरत करनेवाले समाजी गैरत से चुप रहे।


त्रिभुवन के आसामी लोग उसकी विपत्ति का समाचार सुनकर मन-ही-मन प्रसन्‍न हो रहे थे कि अच्‍छा हुआ, बदमाश फँसा। अब सुबह-सुबह उसका वह मनहूस मुँह तो देखने को न मिलेगा! मगर दूसरे ही दिन जब वह उनके दरवाजे पर लाठी पटकता और गला साफ करने के लिए खाँसता सुनाई पड़ा, बेचारे ऋणी बहुत उदास हुए।

दरियाफ्त करने पर मालूम हुआ कि त्रिभुवन जमानत पर छूट गया, और सुखदेव नहीं छोड़ा गया। दूसरे दिन 10 बजे जमादार और दो-तीन पुलिसवाले त्रिभुवन के घर पर आए, और उसे तथा उसकी जवान बीवी को कोतवाली लिवा ले गए। और, इसके बाद शहर में खबर फैली की कोतवाल त्रिभुवन की बीवी पर आशिक हो गया है, और रिश्‍वत-रूप में उसको बँगले पर बुलाकर त्रिभुवन को बेदाग छोड़ देने को तैयार है। उसी दिन, रात को एक बजे, अपनी बीवी और एक कांस्‍टेबिल के साथ त्रिभुवन घर पर लौटा - यह तो मुहल्‍लेवाले भी जानते हैं।

उधर अदालत में सारा दोष सुखदेव के माथे पर मढ़ा जाने लगा कि यही असली बदमाश है, सारा सामान इसी की कोठरी से बरामद हुआ है। बेचारे बूढ़े रईस त्रिभुवन के घर का यह जवान पट्ठा कलंक है। स्‍वयं त्रिभुवन का बयान ऐसा था, जैसे वह पुलिस का गवाह है। उसका झूठा कथन सुनकर सुखदेव सरे-अदालत उसे गालियाँ देने लगा। उसने कहा - 'मैं समझता हूँ बुड्ढे! जानता हूँ, तू क्‍यों और कैसे पुलिसवालों से मिल गया।' सुखदेव ने अदालत के सामने जूता फेंककर अपने बाप को मारा। इससे उसका मुकदमा और भी बिगड़ गया। उसे दो साल की सख्‍त सजा हुई।

सजा होने के तीसरे दिन वह जेल से भागा - रातोंरात - और सीधे अपने घर आया। कोई तीन बजे रात त्रिभुवन के घर से चिल्‍लाने की आवाज सुनाई पड़ी। त्रिभुवन गली में दौड़-दौड़कर चिल्‍ला रहा था - 'खून! खून!'

मुहल्‍ले के सैकड़ों प्राणियों ने जब उसके घर को घेरकर, भीतर घुसकर जाँच करना शुरू किया, तब पता चला कि खून तो किसी का नहीं हुआ - हाँ, त्रिभुवन की जवान बीवी और पुलिस का जमादार बुरी तरह घायल हुए हैं, जिन्‍हें एक ही साथ कमरे में सोते पाकर सुखदेव ने आक्रमण कर दिया था। जमादार था काफी मजबूत, घायल होने पर भी उसने सुखदेव को हत्‍या-कांड करने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया था। अस्‍तु।

इस बार की गिरफ्तारी में सुखदेव पर बड़े-बड़े संगी अभियोग थे। इस बार केस सेशन तक गया, और मुकदमे के दौरान पुलिस और जेलवालों ने उसे मारा-पीटा भी बहुत। अंत में उसे आजन्‍म कारावास-दंड मिला, और वह बड़ी सावधानी से बरेली सेंट्रल-जेल भेज दिया गया।

जिस समय उसे आजन्‍म कारावास का दंड दिया गया - वह बीस वर्ष और कुछ महीने का हुआ था।

यद्यपि अब सुखदेव जेल में है, फिर भी शहरवाले उसे भूले नहीं हैं। वह 'बदमाश सुखदेव' के नाम से अक्‍सर याद किया जाता है।

मगर जब हमारे मुहल्‍ले के कुछ विवेकी पुरुष विचार से काम लेते हैं, तब सुखदेव का 'बदमाश' प्रमाणित होना मुश्किल हो जाता हैा पाँच वर्ष तक एक प्रकार की बदमाशी उसे उसकी कुमाता ने सिखाई - भला कहकर। फिर, प्रायः जेल जाने तक, वह मक्‍खी-चूस और नीच त्रिभुवन के दुर्भावों और बुरे षड्यंत्रों का अभ्‍यास करता रहा - डंडे और थप्‍पड़ों की मार के साथ। वह ऐसे वातावरण में उत्‍पन्‍न हुआ, जिसमें उसे वैसा ही ज्ञान मिला, जिसे लोग 'बदमाशी' कहते हैं। उसकी जगह पर समाज का कोई भी बालक शायद बदमाश से एक इंच कम न होता। अस्‍तु।

हमारी नजर में सुखदेव से बड़ा बदमाश है, पुराना पापी त्रिभुवन और वह समाज, जो त्रिभुवन-ऐसों को पहचानकर भी अपने बीच में पनपने देता है। मगर कानून और उसका सूत्र-संचालन करनेवाले समाज के रक्षक त्रिभुवन को बदमाश न प्रमाणित कर सके, और वह बेचारा लड़का मुक्‍त में अपने दुष्‍ट बाप के पापों के प्रायश्चित के लिए नरक में ठेल दिया गया।

वह आज भी बरेली सेंट्रल-जेल में है, और आज भी उसका नाम-धारी बाप धड़ल्‍ले से शहर में अपना व्‍यापार करता है। वही सूद पर रुपए उठाने का और चोरी का माल पचाने का। लोग कहते हैं - अब वह पुलिस से मिलकर अपना रोजगार करता है।


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हिंदी समय में पांडेय बेचन शर्मा उग्र की रचनाएँ