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निबंध

छै! छै!! छै!!!
प्रतापनारायण मिश्र


हुश्‍त! मनहूस कहीं का! वाह रे तेरी छै!

हमारी छै काहे की, तेरी हो। जानैं न बूझैं कठोता ले के जूझैं। कुछ समझता भी है हम क्‍या कहते हैं कि मुँही पकड़ने दौड़ता है?

सब समझते हैं। बस, चुप रहो!

समझते हो! अपना सिर! समझते हैं! भला बता तो हम क्‍या कहेंगे?

वाह! हम कोई अंतरजामी हैं? हाँ अंदाज से जानते हैं, संख्‍यातार लिखते-लिखते दिमाग में गरमी चढ़ गयी है इसी से बार-बार छै की गिनती याद आती है।

फिर! इसी से क्‍या बुराई है? एक रात नाच देखने पर तो दूसरे दिन सोते-जागते, ऊँघते-पूँछते कानों में छुन-छुन की-सी आवाज गूँजती रहती है। हम महीनों से छै छै छै सुन रहे हैं। फिर हमारे मुँह से कैसे न निकले।

महीनों से! यह पहेली-सी क्‍या कह गये? भई सचमुच हम न समझे थे। हमारी जान में तो छै वही है जो पाँच के पीछे और सात के पहिले गिनती में आया करते हैं। सो सभी जानते हैं कि नाद में छै राग होते हैं, वेद में छै अंग होते हैं, विद्या में छै शास्‍त्र होते हैं, देवताओं के स्‍वामी कार्तिकजी के छै मुख होते हैं, पितरों में छै पिंडाधिकारी होते हैं, कन्‍यकुब्‍जों में छै घर होते हैं।

तुम्‍हारी ल्‍यौंड़ी पर छै गुद्दे होते हैं। हें। चले हैं पंडिताई छौंकने! अब जिन्‍हें तू कहता है, होते हैं, उन्‍हें कहना चाहिए होते थे। अब पुराने जमाने की सड़ी बातों पर हमारे काले साहब सौक पाँव होते हैं इससे समझ रख कि देवता-पितर, वेद-सवेद सब कहने-भर को होते हवाते हैं। सो भी यकीन है कि कुछ दिन में नई रोशनी वाले लंप की बू से और चुरुट की चिराइँध से भागभूग जायँगे। तब बस चारों तरफ देख लेना कि प्रातःकाल खटिया से उठते ही रकाबी पर छै अंडे होते हैं, साँझ को पूरी बोतल-भर के केवल छै डोस होते हैं स्‍नान के समय बकस में साबुन के छै चकत्ते होते हैं, सैर के वक्‍त कोट में छै बटन होते हैं, बातें करने में अंग-अंग से छै मोशन होते हैं, लेट रहने पर हाथ-मुँह चाटने को छै कुत्ते होते हैं! अब समझे?

कुछ भी नहीं समझे! परमेश्‍वर न समझावै! तुम्‍हीं ने समझ के क्‍या किया?

अब और क्‍या करें? तुम ऐसों को बात-बात में बना छोड़ते हैं। इतना थोड़ा हम क्‍या कहते थे तुम ले दौड़े कहाँ। इसी से तो कहते हैं कि यारों की बातों में टोंका न कर। न जाने किस तरंग में क्‍या कह उठते हैं।

अच्‍छा बाबा! हारे! पर जी में आवै तो बतला दो कि आप के छै का क्‍या मतलब है।

यह माना! इस तरह हारी मान के पूछो तो कुछ दिन में कुछ हो जाओ। लो सुनो, हमारे छै साहब गिनती वाले छै नहीं हैं।

वाह! यह अच्‍छा उड़ान भरा! तो फिर बोतल, अंडे और बटन क्‍यों उलट डाले?

तुम्‍हारी अक्किल देखने को! और यों न सही तो ऐसा समझ लो कि मरदों की जबान और गाड़ी का पहिया फिरता ही रहता है। अब भी क्‍या वह जमाना है कि चाहे धरती लौट जाय पर बचन न पलटे। अब तो अकलमंदी इसी में समझी जाती है कि मन में कुछ हो, दूसरों को कुछ समझाया जाए और मौका मिलने पर अपने लिखे को साफ झुठला दे। फिर ऐसे कलजुग में पैदा हो के हम दुअर्थी बात निकाल बैठे तो क्‍या बुरा करते हैं?

नहीं महात्‍मा! आप भला बुराई करेंगे! आप तो जो कुछ करें वही धर्म!

बस-बस! अब तुम समझ गए! जिसे खुशामद करना आता है वही इस जुग का समझदार है और उसी के सब काम बनते हैं, उसी से सब राजी रहते हैं हम भी इतने खुश हुए है कि अब बिना बतलाए नहीं रह जाता। अच्‍छा तो सुनो, यह "छै" वास्‍तव में संस्‍कृत वाले "क्षय" हैं और बंगाल में बानरजी तथा पंजाब के सिंहजी के मुख में जा के 'खय' अथवा 'खै' हो जाते हैं। पर हमारे यहाँ वो छै या छा (नाजुक तन और नाजुक दिमाग) पश्चिमोत्तरदेशी जी न हाथों-पैरों से कुछ कर-धर सकते हैं, न मस्तिष्‍क से काम ले सकते हैं। केवल मजेदार मीठी-मीठी बातें बनाना जानते हैं। उन्‍होंने देखा कि संस्‍कृत की क्ष बोलने में कठिन है और बंग भाषा तथा पंचनदीय भाषा की 'ख' - 'क्ष' उच्‍चारण में कर्कश है तथा कई शब्‍दों में और का और अर्थ सूचित करती है। इससे छै कहना ठीक होगा जो बोलने में सहज है एवं छैल-छबीलियों का छाती लगने के समेय छिन-छिन पर छड़कना याद दिलाता है। कुछ समझे?

हाँ इतना समझे कि आपकी बोली में 'छै' का अर्थ छः की संख्‍या और नाश होना दोनों है। आपने कहा था कि हम महीनों से छै-छै सुन रहे हैं। इसका क्‍या अभिप्राय है?

हैं! यह मैंने कब कहा था?

भैया, यह अदालत नहीं है कि झूठ बोले बिना काम न चले। यहाँ तो हमीं तुम हैं। फिर क्‍यों कह कहाय से इनकार करते हो?

वाह! अभ्‍यास बनाए रखना कुछ बुरी बात है? हमने कभी नहीं कहा, खुदा कसम नहीं कहा! राम दुहाई नहीं कहा! और कहा भी हो तो बिना खुशामद कराए न बतावैंगे!

अच्‍छा साहब! आप एक ही हैं। बाप बड़े वह हैं! आप जो हैं सो हैं! आप अपने आगे सानी नहीं रखते! अब तो बतलाइएगा।

खैर, तो कान फटफटा के सुनो बगले की तरह ध्‍यान लगा के सुनो-समझो। कचटियावलिन जो है सो राम आसरे ते जा समय के बिखै रामलीला का आरंभ होता है गोविंदाय नमोनम: वा समय के बिखै जो है सौ गाँवन-गाँवन नगरन-नगरन के बिखै आनंद करि-करि कै जै औ छै का आगमन होता है जो है सो गोविंदाय नमो नम:। कहो कैसे? तो जा समै के बिखै रामचंद्र कै सवारी निकरति हैं गोविंदाय नामो नम:, वा समय के बिखै, जहाँ कौन्‍यों रामादल कै वीर अथवा कौन्‍यौं तमासगीर के मुख ते जो है सो यतरा निकरि गा गोविंदाय नमो नमः कि बोलौ राजा रामचंद्र की जै, अथवा - बोलैगा सो निहाल होगा, बोल दे रजा आ आ आ आ रा आ म चन्न्द्र की ईई जै! हुअँई चारिउ कैती जै जै जै जै के धुनी छाय जाति है, गोविंदा, और जब रावण कै सवारी निकरति है, गोविं..., वा समै के बिखै जहाँ कोउ राच्‍छस जो है सो कहि देत है कि बोल रावन् जोधा कि जै! तौ कोऊ जै तौ नाहीं कहत, गोविंदा पै छै छै कै धुन छाय जाति है, गोविंदा...। और राच्‍छस नाहिंउ ब्‍वालै तुहुँ देखवैया जे हैं ते अपने छै छै करन लागत हैं, गोविंदा...।

या प्रकार सों कुँवार कै महीना माँ जो है सो जै के साथ छै को जन्‍म होत भयो गोविं...। अब समझौ! शब्‍द जो है सो सदा से अनादि है, गोविं..., जिनका बरसन व्‍याकरण रटत-रटत लाग हैं, गोविं..., औ जीविका तथा प्रतिष्‍ठा हिंदुनै के घर ते है जो है सो, औ जनम-भर कथै बाँचत है, गोविं..., वै हिंदी वाले का सहूर जो है सौ कबौ न होत भयौ, गोविं...।

यह तो गुरू सच कहत हौ! और ऊपर से तुर्रा यह कि यही लोक-परलोक के अगुवा हैं! यहीं हिंदुओं-भर के गुरू हैं। पर जाने दीजिए मतलब वाली कहिए।

तुम्‍हारी पागलों की-सी बकवाद से मतलब खब्‍त हो जाता है।

हैं! तौ हम पागल ठहरे। बस अब न बतलावें, जा!

नहीं महाराज! कृपानिधान! दयासिंधु! दीनबंधु! दास से तकसीर हुई! क्षमा कीजिए! इतना समझा दीजिए कि शब्‍द जितने हैं सब अनादि हैं इस न्‍यास से जै और छै अनादि हैं। इसके सिवा बरसों से लाहौर वाली देव समाज की सारी पुस्‍तकों पर देव धर्म की जै, सकल पाप की छै छापा जाता है। फिर जै और छै की उत्‍पत्ति कुँवार से क्‍यों कर मान लूँ?

हमारे कहने से मान ले, नहीं तो नास्तिक हो जाएगा और श्रद्धापूर्वक सुनता हौ तो सुन। अकेले शब्‍द ही अनादि नहीं है, सारा संसार अनादि है। इसे किसी ने बनाया-बुनाया नहीं है, यों ही लोग ईश्‍वर का नाम रख लेते हैं। पर आज कल के शिक्षितों का अधिकांश मत यही है कि सृष्टिकर्ता की जरूरत नहीं।

बस फिर जो कुछ है सब अनादि और अनंत है। पर बात जिन दिनों बहुत फैल जाती है वह उत्‍पन्‍न कहलाती है और जिसे बहुत थोड़े लोग जानते-मानते हैं वह नष्‍ट वा नष्‍टप्राय समझी जाती है। इस रीति से रामलीला के साथ 'छै' की उत्‍पत्ति और कीर्तिकी पौर्णमासी को नाश मंतव्‍य है। क्‍योंकि रामलीला में रावण की छै का शब्‍द गूँजने लगता है और शत् पूर्णिमा तक बना रहता है। फिर उसी दिन से जुवा का आरंभ होता है तब रावण का नाम जाता रहता है। किंतु छै छै की चर्चा बनी रहती है। यहाँ तक कि दिवाली के दो-चार दिन इधर-उधर छै छै के सिवा कुछ सुनी नहीं पड़ता। खास करके जहाँ कि हाकिम प्रजा के त्‍योहारों के आमोद-प्रमोद के द्वेष न हुए वहाँ तो गली गली, घर घर, जन जन, को छै छै की सनक-सी चढ़ जाती है! छै! छै! यह छै! आ तो जा छै! सोरही में तो छै! नवकी मूठ में तो छै! फिरकी में तो छै!

क्‍या गरीब, क्‍या अमीर, क्‍या बच्‍चा, क्‍या बुड्ढा, क्‍या पुरुष क्‍या स्‍त्री सभी के मुँह पर दिन-रात छै छै छै छै बसी रहती है। फिर दिवाली का मौसम टल जाने पर छै का प्राबल्‍य यद्यपि जाता रहता है किंतु दिठौनी इकादशी को हारे जुआरियों का अपील अर्थात् फिर जीतने की आशा पर खेल और कतकी को हाईकोर्ट अर्थात् अंतिम निर्धार जब तक नहीं हो जाता तब तक छै छै की छै नहीं होती। यद्यपि श्रेष्‍ठ द्यूतकारों के पवित्र मंदिरों में उसका बारहों मास बिहार होता रहता है, पर जन समुदाय का अधिकांश इन्‍हीं दिनों छै छै में विशेष रूप से मस्‍त रहता है।

इसमें हमें भी इसका थोड़ा-बहुत जाप कर लेना चाहिए। यदि बुराई है तो उनके लिए है जो लती हैं और घर के बनने-बिगड़ने का ध्‍यान नहीं रखते। पर त्‍योहार मनाना तथा पुरखों की रीति का पालन कर लेना कोई ऐब नहीं है। गृह कुटुंबादि के आवश्‍यक व्‍यय से उबरने पर थोड़ा-सा परिमित धन इष्‍ट मित्रों की प्रसन्‍नता संपादनार्थ इस बहाने भी उठ गया तो क्‍या हानि है? विलायती चीजों के बर्ताव से और सड़ी-सड़ी बातों के लिए कचहरी दौड़ने से लाखों रुपया विदेश को चला जाता है, उसका तो कोई ध्‍यान नहीं देता, पर होली, दिवाली में थोड़ा-सा मन बहलाने में पाप है! और उसी के लिए देशभाइयों को हँसना धर्म की दुम है!

अच्‍छा बाबा, हम जो कुछ हैं वही बने रहेंगे, किसी को बुरा लगे तो अपने कान बंद कर ले। पर हमें दिवाली के एक दिन पहिले एक दिन पीछे, यह कहने से न रोके कि छै छै छै!

अच्‍छा साहब छै सही, पर यह तो कहिए काहे की छै?

हाँ यह मन की बात पूछी है तो हम भी क्‍यों पिछावैं, कही डालें न! वर्षा के कारण अंतरिक्षस्‍थ गर्द-गुबार की छै। पर जिन घरों के किसी भाग में तारकोल चुपड़ दिया जाय उनके आसपास के आने-जाने वालों की मस्तिष्‍क संबंधिनी शांति की छै। दिवाली का दिया चाटने से मक्‍खी मच्‍छर कीड़े पतंगों की छै! सरसों का तेल और आतिशबाजी का गंधक जलने से मलेरिया उत्‍पादक वायुदोष की छै! किंतु नए शौकीनों के द्वारा मट्टी का तेल जलने से नेत्र ज्‍योति और कूबते दिमागे की छै! सब राहें खुल जाने से देश-देशांतर में गमनागमन करने वाले व्‍यापारियों के हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने की छै। विशेषतः हलवाई और कुम्‍हारों तथा ठठेरों की बेकदरी की शिकायत की छै! लक्ष्‍मी पूजा के द्वारा पुरोहितों की बेराजगारी और यजमानी और यजमानी के पाप की छै! त्‍यौहारों की चिंता से गृहपतियों के अनुयोग की छै! घर शोभयमान हो जाने से सुघर घरनियों की अप्रसन्‍नता की छै।

खील-खिलौना, मिठाई पा जाने से बालकों के भिन्‍न-भिन्‍न करने की छै! जुवारियों की भूख-प्‍यास, सच्‍चाई-ईमानदारी, आपस के हेल-मेल, बरस-दिन के कमाय धन इत्‍यादि सबकी छै छै छै! ले इतने हमने बात का बतंगड़ बना के गिना दिए। एक बार तुम भी तो प्रेम से पूरित हो के गद्गद स्‍वर से कह दो महारानी विक्‍टोरिया की जै! और हिंदी हिंदू हिंदुस्‍तान के द्वेषियों की छै! छै!!छै!!!


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