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निबंध

गुप्त ठग
प्रतापनारायण मिश्र


कपड़ा लत्ता चेहरा मुहरा देखो तो भले मानसों का सा। बातें सुनो तो साक्षात् युधिष्ठिर जी का अवतार। "झूठ बोलना और… और… बराबर है" यह जिनके तकिया कलाम हैं, "रामौराम पर" "धर्मौधरम पर" "जनेऊ कसम" "राम धै" "परमेसुर जानै" "जो तुम्‍हारे ईमान में आवै" "अरै भैया रुपया पैसा हाथ का मैल है, धरम नहीं तौ कुछ भी नहीं" - दिन भर यही बातैं बात-बात पर निकलैंगी। गंगाजी के दर्शन दोनों पहर करैंगे, मंदिर में घंटों घंटा हिलावैंगे, कथा में बैठे तो श्‍लोक-श्‍लोक पर आँसू चले आते हैं। कोई जाने धरती के खंभ, धर्म का पुतला, प्रेम का रूप, जो हैं सो बस आप ही हैं। पर कौड़ी-कौड़ी के लिए सब सतजुग वाली बातैं बिलैमान हो जाती हैं। दुकान पर आये नहीं कि "या महादेव बाबा भेज तौ कोई भोला भाला आँख का अंधा गाँठ का पूरा।"

अ ह ह ह ह बलिहारी-बलिहारी बगुला भगत, बलिहारी! ध्‍यान करते देखै सो तो जानै कि ब्रह्म से तन्‍मय हो रहे हैं पर मछली निकली की गप। जानते होंगे कि कोई जानता नहीं, यह नहीं समझते "पापु अँटारी चढ़ि कै गोहरावत है।" भला यार लोगों से भी कुछ छिपती है! यार बुरा मानो चाहै भला पर कहैंगे वही जो तुम्‍हारे और सबके हित की हो। जब तक आचरण न सुधरैंगे तब तक यह सब भगतई और भलमनसी कौड़ी काम की नहीं है। अपने मुँह चाहो जो बने रहो जानि परो जब जइहौ कचहरी। 'फक्‍कड़ भाई यह किस पर फ‍बतियाँ हो रही हैं?' दो एक थोड़ी हैं, हम कहते जायँ तुम गिन चलो। पहिले चलो नाज की मंडी। बैपारी राम तो जानते हैं भाई अच्‍छी सोने की चिड़िया हाथ हाथ लगी है, रुपया उधार दिया है जो माँगते तक नहीं, आओ तो कुछ नजर करैं, जावों तो कुछ भेट धरैं, जब तक रहो आँखों पर रक्‍खैं, बात-बात पर कहैं कि 'हमार तुम्‍हार घर का वास्‍ता है।' यह नहीं समझते कि 'बनिया का बेटा कुछ तो समझकर फिसल पड़ा।

भला रुपए, की आढ़त पर यह धम-धम कैसे सहे जा सकते हैं, वहाँ कनवाँ बधिया मासा चलता है। ब्‍योपारी से कहा बीस सेर बिका और ग्राहक से इशारा किया 'कनवाँ', बस 'खग जानै खग ही की भाषा।' बिचारा गँवार ब्‍योपारी क्‍या जानै कि इस गूढ़ मंत्र का यह अर्थ है कि छँटाक रुपया तो अढ़तिया जी के बाप का हो गया। जहाँ कहा 'मासा' बस पौवा रुपया अलग ही अलग चित्त हुआ। यह तो ब्‍योपारी का माल बेचने का हतखंडा है। जब अपना माल बेचेंगे तब बानगी और दिखाई तुलाय और दिया। 'गुरु यह तो विश्‍वासघात है!!' अबे चुप! बनियाई के पेंच हैं उल्‍लू, कहीं तुलसी सोना डालै रोजगार होते हैं।

अब घी वाले की दुकान प देखो चलैं। ग्राहक के दिखाने को भंड़िया पर ताजा अरंड का पत्ता बँधा हुआ है, मानौं अभी दिहात से आया है। जहाँ खोल के देखा, घी क्‍या है घी का बाबा है, आँच दिखाते ही जानोगे। 'गुरु यह पहेली सी क्‍या कहि गए, घी का बाबा तो मट्ठे को कहते हैं क्‍योंकि मट्ठे से मक्‍खन और मक्‍खनी से घी होता है'। अबे ऐसा नहीं कहते, दैख तो कैसा घी धरा है। सच है, सच है, दानेदार नहीं बरुक दाने का जीव और घी का जीव एक हो गया है, तभी तो रंगत तक नहीं बदली। खासा भैंस का सा घी बना है।

भैंस का न सही यह लेव गाय का घी है। इसमें भी गुल्‍लू का तेल मिला होगा। हाय! इन रतन में जतन करने वालों की क्‍या दशा होगी नारायण! चलो-चलो ऐसा घी खाए बिना क्‍या डूबा जाता है। दूध खाया करैंगे। दूध वाले ही कौन दूध के धोये बैठे हैं, वहाँ भी 'सेरुक दूध अढ़ैयक पानी। धम्‍मक धम्‍मक होय मथानी'। की धैना है। उन्‍हें कुछ कम समझे हो, वह भी बकरी भेंड़ी का दूध मिला-मिला के एक-एक के दो-दो करते हैं। तभी तो घी दूध का गुन जाता रहा। हाय! इन ठगों की खबर सर्कार क्‍यों नहीं लेती कि अभी दूध पानी का पानी हो जाए। सर्कार को क्‍या पड़ी है कि छोटी बातों में अपना समय खोवै, सर्कार को अपने लाइसेंस टैक्‍स से काम है कि तुम्‍हारे धंधों से? फिर क्‍या ग्राक लोग नहीं जानते कि राक्षसों के मारे गाय भैंस तो बचने ही नहीं पातीं घी दूध आवै कहाँ से?

ऐसा ही शरीर रक्षा करनी हो तो हिंदू भाई यदि अधिक न हो सके तो एक गाय पाल ही लें, जिसमें शरीर रक्षा, स्‍वादिष्‍ट भोजन और धर्म तीनों मिलैं। सर्कार से किस-किस बात की शिकायत करते फिरोगे। यहाँ तो यह कहावत हो गई है कि 'पेशे में सभी चोरी करते हैं' हलवाई की दुकान पर जाओ, सब चीज ताजी घी की बनी तैयार है, पर खाते ही जानोगे। जो तीन ही दिन की हो तहाँ तक ही कुशल समझो। सेर भर घी में पाव भर तेल मिला हो तो तब तक तो जानो बड़े ईमानदार का सौदा है नहीं तो शुद्ध एक वर्धा 'तेल गले मढ़ैगा'। अत्तार के यहाँ बरषों की सड़ी दवाएँ, सुंदर ऊँख का शहद, खालिस शिरे का शर्बत और गंगा जी का अरक तो एक साधारण बात है। संबत् 1936 में बीमारी बहुत फैली थी, तब बहुतेरे महापुरुषों ने लसोरे की गुठली पर अमरस चिपकाय के आलूबुखारे बनाए थे और बड़ी कठिनाई से पैसा के तीन-तीन देते थे। क्‍यों न देश का देश निर्वीज हो जाए?

रोगी राम कहते हैं, हकीम जी की दवा से फायदा नहीं होता। फायदा कहाँ से हो, दवा तो यार ही लोगों के यहाँ से आवेगी। हाय! यह भी तो नहीं हो सकता कि सब काम अपने हाथ ही से किए जायँ। संसार में काई किसी का विश्‍वास न करै तो भी तो काम नहीं चल सकता। पर विश्‍वास कीजिए किसका, यहाँ तो वही लेखा है कि 'हुशियार यारे जानी यह दस्‍त है ठगों का। याँ टुक निगाह चूकी और माल दोस्‍तों का'। 'सबको ठग बनाते हो? ऐसा न हो कि कोई बिगड़ जाए।' अरे भाई ऐसे डरने लगते तो यह काम ही क्‍यों मुड़ियाते? यहाँ तो खरी कहना माथे के अक्षर ठहरे। कुछ हो हमसे तो बिना कहे नहीं रहा जाता कि अपने मन के धन के लिए ऐसे अनर्थ करना कि दूसरों की तंदुरुस्‍ती (स्‍वास्‍थ्‍य) में भी बाधा लगै, केवल लोभी का नहीं बरंच महा अधम का काम है।

इसमें परलोक ही अकेला नहीं बिगड़ता, दुनिया में भी साख जाती है। अन्‍य देशी लोग बेईमान बनते हैं। रोजगार जैसा सावधानी और ईमानदारी से चलता है वैसा इन अँधेरों से सपने में न चल सकेगा। हमेशा तीन खाओगे तेरह की भूख बनी रहेगी। विश्‍वास न हो तो जैसे अपनी रीति पर अब तक चले हो वैसे ही जी कड़ा करके कुछ दिन हमारी बूटी का भी सेवन करो तो देखो कैसा मजा होता है, कैसे-कैसे लाभ उठाते हो। हम ब्राह्मण हैं। हित की कहते हैं। हमारी मानोगे तो धरम मूरत धरमा औतार हो जाओगे नहीं तो कोई अंगरेज सुन पावैगा तो 'डेम फूल' बना के मनवावैगा। वह मानना और तरह का होगा, बस आगे तुम जानो तुम्‍हारा काम जानै।


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हिंदी समय में प्रतापनारायण मिश्र की रचनाएँ