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उपन्यास

टॉम काका की कुटिया
हैरियट वीचर स्टो

अनुवाद - हनुमान प्रसाद पोद्दार

अनुक्रम 13. नीलाम की मार्मिक घटना पीछे     आगे

टॉम को साथ लिए हुए हेली चलते-चलते एक नगर के निकट पहुँचा। मार्ग में दोनों ही चुप थे। कोई किसी से कुछ न बोलता था। दोनों अपनी-अपनी धुन में मस्‍त थे। देखिए, इस संसार में लोगों की प्रकृति में कितना निरालापन दिखाई पड़ता है। दोनों एक ही जगह बैठे हुए थे। आँखों के सामने का दृश्‍य भी दोनों के लिए एक ही-सा था, पर विचारों की लहर एक-दूसरे से बिल्‍कुल ही भिन्‍न थी। उनके पृथक्-पृथक् विचारों का नमूना देखिए। हेली सोच रहा था कि खूब लंबा-चौड़ा और ताकतवर मर्द है। इसे दक्षिण के देश में बेचूँगा तो कम-से-कम दो-तीन सौ रुपए नफे के तो जरूर ही मिल जाएँगे। फिर तरंग जो उठी तो सोचने लगा कि दास-व्‍यवसायियों में मुझ जैसे दयालु मनुष्‍य विरले ही निकलेंगे। देखो न, मैंने थोड़ी ही दूर आकर टॉम के हाथ खोल दिए, केवल पैर भर बाँध रखे हैं। फिर संसार का व्‍यवहार सोचकर मन-ही-मन कहने लगा कि मैंने टॉम के साथ इतनी भलमनसी की है, पर वह अकृतज्ञ क्रीत दास है। वह कभी मेरी इस भलमनसी की दाद न देगा।

उधर टॉम के विचार देखिए, वे और ही तरह के थे। टॉम सोच रहा था कि मंगलमय परमात्‍मा इस संसार का शासन करता है। इसलिए अपने को उसी पूर्ण ब्रह्म के हाथों में सौंप देना चाहिए। फिर किसी अमंगल का कोई डर न रहेगा। मनुष्‍य ईश्‍वर के उद्देश्‍य को समझने में सर्वथा असमर्थ है। इसी से वह जीवन की किसी-किसी घटना को विपत्ति या दुर्घटना समझ बैठता है। पर जब मनुष्‍य का मोह दूर हो जाता है तब वह समझने लगता है कि ईश्‍वर जो कुछ करता है, सब उसके भले के लिए ही करता है।

ऐसे ही भावों के सहारे टॉम अपने उमड़े हुए शोक को रोकता था। टॉम और हेली के ये चिंता-स्रोत अभी समाप्‍त न होने पाए थे कि वे सामने के नगर में आ पहुँचे। वहाँ हेली ने अपनी जेब से एक गजट निकाला और बड़ी तत्‍परता से उसमें छपा हुआ एक विज्ञापन इस प्रकार पढ़ने लगा:

नीलाम

अदालत की आज्ञानुसार आगामी मंगलवार, 20वीं फरवरी को वाशिंगटन नगर की दीवानी कचहरी के सामने, परलोकवासी ब्रांसन- साहब का ऋण चुकाने के लिए, नीचे लिखे हुए दास-दासी सबसे ऊँची डाक बोलनेवाले के हाथ बेचे जाएँगे:

नीलाम की सूची

नंबर दास-दासी उम्र

1 हागर (दासी) 60 बरस

2 जॉन 30 बरस

3 बेंजमिन 21 बरस

4 सेल 25 बरस

5 अलबर्ट 24 बरस

20 जनवरी, दस्‍तखत

1850 सेमुअल नरिश, टॉमस फ्लिट "मुंशी अदालत"

विज्ञापन पढ़कर हेली ने टॉम से कहा - "यहाँ हम कई और दास-दासी खरीदेंगे। इसलिए तुम्‍हें थोड़ी देर को जेलखाने में रखकर हम कचहरी जाते हैं।"

यह कहकर वह टॉम को जेल में रखकर खुद नीलाम-घर की ओर चला गया।

दोपहर हो चली है। कचहरी में लोगों की भीड़ जमा हो रही है। वहाँ से थोड़ी ही दूर, बिना छत का, लोहे की छड़ों से घिरा हुआ माल-गोदाम-सरीखा एक घर था। पैरों की धूल से वह घर भरा हुआ था। इस घर के एक कोने में कई काले दास-दासी बैठे बात कर रहे थे। इनमें हागर नाम की जो दासी थी, उसकी उम्र अस्‍सी से ऊपर जान पड़ती थी। पर असल में वह 60 से अधिक की न थी। दिन-रात की बेहिसाब मेहनत और भाँति-भाँति के कष्‍टों तथा भूख के दु:ख से वह ऐसी जीर्ण हो गई थी। चलने में लकवे के रोगी की भाँति उसका सारा शरीर काँपता था। उस हतभागिनी की बगल में एक 14 बरस का लड़का बैठा हुआ था। हागर के और सब लड़के-लड़कियों को उसके मालिक ने पहले ही जहाँ-तहाँ बेच डाला था। कम से कम 10-12 संतानों में केवल यही लड़का आज तक इसके साथ है। हागर बालक के गले में बाँह डाले बैठी थी। जब कोई खरीदार बालक के शरीर की जाँच करने आता, तब वह बुढ़िया चौंक जाती और कहती - "हम दोनों एकसाथ ही बेचे जाएँगे।" इतना कहकर बालक को और भी जोर से जकड़ लेती थी। वहीं तीस वर्ष का एक और दास बैठा था। वह बोला - "हागर मौसी, तुम क्‍यों डरती हो? मुंशीजी तो कह चुके हैं कि वह तुम्‍हें और अलबर्ट को एक ही साथ बेचने का यत्‍न करेंगे।"

इसी समय हेली वहाँ आया। वह एक-एक दास के शरीर की जाँच करके देखने लगा। उसने हर एक के मुँह में अँगुली डालकर पहले दाँत गिने, फिर खड़ा करके शरीर की लंबाई नापी। वह शरीर को जगह-जगह से टटोल कर देखने लगा। अंत में देखते-दिखाते हागर के पास पहुँचा और उसके चौदह वर्ष के पुत्र अलबर्ट की जाँच करने के लिए झटके से उसका हाथ खींचकर उठाया। यह देखकर वृद्ध माता बोली - "साहब, हम दोनों साथ ही बेचे जाएँगे, मैं अभी खूब काम-काज करने लायक हूँ।"

हेली ने हँसकर पूछा - "तुम तंबाकू के खेतों या चाय के बगीचों में काम कर सकोगी?"

बुढ़िया ने कहा - "हाँ-हाँ, खूब कर सकूँगी।"

हेली ने हँसते हुए एक दूसरे खरीदार के निकट जाकर कहा - "हम इस छोटे छोकरे को लेना चाहते हैं। लड़का खूब मजबूत है।"

इस पर उस दूसरे खरीदार ने कहा - "मैंने सुना है कि बुढ़िया और लड़का दोनों साथ ही बेचे जाएँगे।"

तब हेली बोला - "बुढ़िया की कीमत तो कोई एक पैसा भी नहीं देगा, हवा से इसकी कमर टेढ़ी हो गई है। एक आँख की कानी अलग है। ऐसी मरी हत्‍या को लेकर कौन अपनी पूँजी नष्‍ट करेगा। हमें तो कोई मुफ्त में दे तो भी नहीं लें। अगर बालक और बुढ़िया साथ बिकें तो बालक के दाम भी घट जाएँगे।"

हेली की बातें समाप्‍त न होने पाई थीं कि नीलाम का घंटा बजा। अदालत के मुंशी सेमुअल नरिश और टॉमस फ्लिट नाक पर चश्‍मा चढ़ाए नीलाम-घर में आए। नीलामवालों ने डाक की हाँक लगाई। वृद्ध हागर ने अलबर्ट से कहा - "बेटा, मुझे पकड़कर बैठ जा, जिससे हम दोनों एक ही हाँक में बिक जाएँ।" बालक ने आँखों में आँसू भरकर कहा - "माँ तू नाहक यों क्‍यों कह रही है? हम लोग एक साथ नहीं बेचे जाएँगे।"

हागर बोली - "जरूर बेचे जाएँगे, जरूर! तू मुझे पकड़कर बैठ जा।"

कुछ देर बाद जब कई नीलाम हो चुके, तब उस बालक को हाथ पकड़कर खड़ा किया। यह देखकर बुढ़िया चिल्‍लाकर बोली - "दोनों को एक साथ बेचो। हम दोनों को एक साथ नीलाम करो!"

पर नीलामवालों ने धक्‍का देकर उस बेचारी बुढ़िया को दूर धकेल दिया। बालक की बोली आरंभ हुई। एक-दो-तीन के बाद अंत में हेली ने बालक को खरीदा। तब बालक की माता ने हेली के पास आकर कहा - "साहब, मुझे भी आप ही खरीद लीजिए। बालक से अलग होने पर मेरी जान नहीं बचेगी।"

हेली बोला - "तुम्‍हें खरीदा जाए चाहे न खरीदा जाए, मरोगी तुम जल्‍दी ही। तुम्‍हारे मरने में अब बहुत दिन नहीं हैं।"

इसके बाद बुढ़िया की बोली आरंभ हुई। एक आदमी ने बहुत थोड़े दामों में उसे खरीद लिया, पर बुढ़िया ने बड़ा रोना मचाया। 'हाय-हाय'कर कहने लगी - "मेरे एक बच्‍चे को भी मेरे संग नहीं छोड़ा! मालिक ने मरते समय कह दिया था कि इस बच्‍चे को वह मेरी गोद से अलग नहीं करेंगे। पर हाय, लोगों ने उसे भी न छोड़ा- मुझसे छीन लिया!"

उनमें एक बूढ़ा गुलाम था। उसने कहा - "हागर मौसी, ईश्‍वर की मर्जी ऐसी ही समझकर तुम संतोष करो। अब रोने-धोने से क्‍या होगा! हम लोगों के लिए और कोई चारा नहीं है।"

पर हागर को शांति कहाँ? वह और अधिक रोने लगी, बोली - "बताओ, ईश्‍वर कहाँ है? एक बार उसे देखूँ तो सही। एक-एक करके तेरह लड़के मेरी गोद से छिन गए, पर ईश्‍वर ने इसका कुछ भी विचार न किया!"

तब बालक अलबर्ट कातर होकर कहने लगा - "माँ, रोओ मत, अपने मालिक के साथ चली जाओ। यह लोग कहते हैं कि तुम्‍हें खरीदनेवाला भला आदमी है।" किंतु उस शोक-संतप्‍त माता के मन को इतने से कब ढाढ़स होता। उसने फिर दौड़कर बालक को पकड़ लिया। पागल की भाँति चिल्‍लाकर कहने लगी - "यही मेरा आखिरी लड़का है। मेरा सबसे छोटा बच्‍चा है। इसे छोड़कर मैं कहीं नहीं जाऊँगी।" बड़ी मुश्किल से हेली ने उसके हाथ से बालक को छीनकर अपना रास्‍ता लिया। इधर वह स्त्री अचेत होकर पड़ गई।

इन नीलाम में हेली ने उस बालक के सिवा और भी चार गुलामों को खरीदा था। उन्‍हें साथ लेकर वह जेल में आया। और वहाँ से टॉम को लेकर सबको नदी की ओर ले गया। फिर दक्षिण देश की ओर जाने के लिए हेली अपने दासों सहित एक स्‍टीमर पर सवार हुआ।

जहाज के ऊपरी हिस्‍से में दस-बारह सजे-सजाए कमरे थे। इन कमरों को धनाढ्य यात्रियों ने किराए पर ले रखा था। हंसी-ठट्ठे और दिल्‍लगी-मजाक से ये कमरे गूँज रहे थे। एक कमरे में हँसी के फुहारे-से छूट रहे थे। जान पड़ता था, मानो इस कमरे में किसी नए दुलहे-दुलहिन का दखल है। दूसरे कमरे में संतान-वत्‍सला माता अपने बच्‍चे का मुख चूम-चूमकर आनंद-मग्‍न हो रही थी। किसी-किसी कमरे में शूपर्नखा की बहनें अंग्रेज कुल-कामिनियाँ कई अन्‍य यात्रियों को अपने से अच्‍छे कमरों में बैठा देखकर अपने स्वामीयों से लड़-भिड़ रही थीं, अपने भाग्‍य को कोसती थीं और कार्य-कारण भाव की कड़ी मिलाकर समालोचना करते हुए अंत में अपने इस दुर्भाग्‍य की जड़ अपने वर्तमान स्‍वामी को ही ठहराती थीं।

पर इस प्रकार के सजे हुए कमरों और इस आनंद-बहार को देखकर मन केवल क्षण भर के लिए आनंदित हो सकता है। यह बाहरी ठाठ-बाट, यह बनाव-ठनाव और कारीगरी के दृश्‍य मनुष्‍य के हृदय में कोई जीती-जागती कविता की तस्‍वीर नहीं खींच सकते।

पाठक, हमारे साथ आइए, हम आपको एक बार जहाज के गोदाम का दृश्‍य दिखाएँ। जरा लोहे की जंजीर से जकड़े हुए और अपनी प्‍यारी पत्‍नी तथा बाल-बच्‍चों से जन्‍म भर के लिए बिछुड़े हुए शोक-विह्वल टॉम के मुख की ओर देखिए। माता की गोद से बिछुड़े हुए मातृ-वत्‍सल चौदह साल के बालक की आहें कान देकर सुनिए। साथ ही हेली के दूसरे चार गुलामों की ओर तनिक ध्‍यान देकर देखिए कि वे क्‍या कह और कर रहे हैं। यहाँ आपको जीती-जागती कविता की छवि दिखाई देगी। इस प्रत्‍यक्ष काव्‍य के रस से आपका हृदय भर उठेगा।

हेली के चारों गुलाम इस अंधेरे गोदाम में बैठे आँसू बहा रहे हैं और एक-दूसरे को अपने दु:ख की मार्मिक कहानी सुना-सुनाकर धीरज रखने की चेष्‍टा कर रहे हैं। इनमें तीस साल की उम्र का जान नामक एक गुलाम था। उसने टॉम के जंजीर से जकड़े घुटनों पर अपना हाथ टेककर कहा - "भाई, मेरी स्‍त्री यहाँ से थोड़ी दूरी पर रहती है। मेरे बिकने के विषय में उसे कुछ भी नहीं मालूम है। बहुत जी चाहा है कि जन्‍म भर के लिए चलते-चलते एक बार उसे देख आऊँ। अब इस जिंदगी में तो फिर उससे भेंट नहीं होगी।"

इतना कहकर जान रोने लगा। आँसुओं से उसकी छाती भीग गई। टॉम उसे ढाढ़स दिलाने का यत्‍न करने लगा, पर उसको सूझ ही नहीं रहा था कि जान को कैसे समझाए। इसी समय एक बालक जहाज के कमरे से उतरकर नीचे आया। वह इन गुलामों को देखते ही अपनी माँ के पास दौड़ा गया और कहने लगा - "माँ, इस जहाज के गोदाम में चार गुलाम बँधे बैठे हैं। वे बहुत रो रहे हैं।"

बालक की माता ने उसके मुँह से यह बात सुनकर बड़े दु:ख से कहा - "यह गुलामी की प्रथा हमारे देश के लिए बड़ा भारी कलंक है। जिस मनुष्‍य के पास हृदय है, वह क्‍या ऐसी शोचनीय स्थिति देख सकता है?"

पास ही कमरे में एक और अंग्रेज स्‍त्री बैठी थी। आँखें उसकी बिल्‍ली की-सी थीं। यह बात सुनकर वह बोल पड़ी - "आपकी समझ में क्‍या गुलामी की प्रथा बहुत बुरी है? मैं तो नहीं समझती कि इसमें केवल दोष-ही-दोष हैं, कोई गुण नहीं है। इसमें गुण भी हैं, और दोष भी हैं। भलाई भी है और बुराई भी। मान लीजिए कि आज ही सारे गुलामों को गुलामी की जंजीर से मुक्‍त कर दिया गया तो क्‍या आप कह सकती हैं कि इससे उन्‍हें अधिक सुख मिलेगा! आप अच्‍छी तरह गौर से देखिए तो आपको मालूम हो जाएगा कि गुलाम लोग जिस हालत में हैं, उसे वे बहुत पसंद करते हैं, उसमें उन्‍हें स्‍वच्‍छंदता का आनंद आता है। यदि इन्‍हें स्‍वाधीनता दे दी जाए तो इनकी दशा बहुत ही खराब हो जाएगी।"

इस सभ्‍य रमणी की बात सुनकर बालक की माता ने कहा - "यदि यह घृणित गुलामी की चाल न होती तो माता की गोद से बालक को और स्‍वामी से स्‍त्री को बिछुड़कर जबरदस्‍ती दूसरे आदमी के साथ न रहना पड़ता। इन सब भयानक नृशंस व्‍यवहारों को स्‍मरण करके हृदय काँप उठता है। आप एक बार विचार करके देखिए कि यदि आपकी गोद से आपके बच्‍चे को कोई जबरदस्‍ती अलग कर दे तो आपको कितना अखरेगा, कैसा असहनीय कष्‍ट होगा?"

बालक की माता की बात समाप्‍त होने पर वह सभ्‍य स्‍त्री हँसकर बोली - "जो स्त्रियाँ आपकी भाँति हृदय के उच्छवास के वश में होकर काम करती हैं, उनमें कई विषयों के गुण-दोषों की परख करने की शक्ति नहीं रहती। हृदय का उच्छवास विचारशक्ति को निस्‍तेज बना देता है और मनुष्‍यों के भले-बुरे का ज्ञान हर लेता है। आपके हृदय में जैसा प्रेम-भाव है वैसे प्रेम का संचार क्‍या काले दास-दासियों के हृदय में भी हो सकता है? केवल अपने हृदय के अनुसार उनके सुख-दु:ख और भले-बुरे का अंदाज न कीजिए। गुलामी की प्रथा पर मैंने बहुतेरी पुस्‍तकें पढ़ डाली हैं। इस विषय पर मेरी बहुत बड़े-बड़े विद्वानों से भी बातचीत हुई है। मेरी समझ में गुलामी की प्रथा में किसी प्रकार की कठोरता नहीं है। यदि गुलामों को गुलामी की बेड़ी से मुक्‍त कर दिया जाए, तो इसमें संदेह नहीं कि वे इससे भी अधिक आफत में पड़ जाएँगे! मेरा तो खयाल है कि गुलामों की वर्तमान दशा बहुत अच्‍छी है।"

यह सभ्‍य स्‍त्री एक गोरे पादरी की स्‍त्री थी। इसका स्‍वामी सिर से पाँव तक काले कपड़े पहने हुए पास ही खड़ा था। अपनी स्‍त्री को एक दूसरी स्‍त्री से दासत्‍व-प्रथा के संबंध में बातें करते देखकर उससे न रहा गया। उसने झट जेब से बाइबिल की पोथी निकाली और उनके पास जाकर कहने लगा - "नाहक आप लोग तर्क-वितर्क कर रही हैं। गौर से आप लोगों ने बाइबिल पढ़ी होती तो इस झूठे तर्क-वितर्क की नौबत ही न आती। बाइबिल में तो लिखा है कि कैनान देश के आदमियों को दासों के दास बनकर रहना पड़ेगा। दासत्‍व-प्रथा का विरोध करना बाइबिल का विरोध करना है, ईसा के धर्म का अपमान करना है। ऐसे धर्म-विरोधी नास्तिक भावों को आप लोग कभी अपने हृदयों में स्‍थान न दीजिए। ध्‍यान से बाइबिल पढ़िए, फिर इसमें संदेह ही नहीं रहेगा कि दासत्‍व-प्रथा ईश्‍वरीय आज्ञा है।"

पास ही एक लंबा आदमी खड़ा हुआ इन लोगों की बातें सुन रहा था। पादरी साहब की बातें सुनकर उसने हँसते हुए वहाँ आकर कहा - "क्‍यों पादरी साहब, सचमुच गुलामी की प्रथा ईश्‍वरीय आज्ञा है? तब हम सभी लोगों को एक-एक दो-दो गुलाम खरीदने चाहिए।"

फिर वही आदमी हेली से बोला - "सुन लीजिए भाई साहब, पादरी महाशय क्‍या कहते हैं। आप दासत्‍व-प्रथा को ईश्‍वरीय आज्ञा बताते हैं। यदि पादरी साहब की बात सच्‍ची हो तो इसमें जरा भी संदेह नहीं हो सकता कि अपनी इस नई आज्ञा का प्रचार करने के लिए ही ईश्‍वर ने खुद आपको हमारे देश में भेजा है। नित्‍य ही तो आप हजारों स्‍त्री-पुरुषों को यहाँ खरीदकर वहाँ बेचा करते हैं और यही कार्य करके महान पुण्‍य लूट रहे हैं। न जाने आप कितनी ही माताओं की गोद से शिशुओं को छीन लेते हैं, कितनी ही स्त्रियों का सदा के लिए स्‍वामी से बिछोह करा देते हैं। भाई साहब, आप-सरीखे पुरुषों की तो देवताओं की-सी पूजा होनी चाहिए।"

हेली ने उत्तर दिया - "जनाब, हम बाइबिल की कुछ परवा नहीं करते। हमने तो अपनी जिंदगी में कभी बाइबिल पढ़ी नहीं। बाइबिल पढ़ने का काम पादरियों का है। हमें तो दो पैसे के नफे से काम है, उसी के लिए रोजगार करते हैं। इस पेशे से जब तक फायदा है, कभी नहीं छोड़ेंगे- चाहे बाइबिल नहीं, बाइबिल का बाप कहे, नफा होते यह काम नहीं छोड़ते। हाँ, अगर यह रोजगार बाइबिल के मत से भी ठीक है तो हम लोगों के लिए और भी अच्‍छा है।"

केंटाकी प्रदेश के राजमार्ग के पास के होटल में जिस भेड़वाले से गुलामी की प्रथा के संबंध में विलसन की बातें हुई थीं, यह लंबा-सा आदमी वही भेड़वाला है। यह भेड़ें चराकर अपना जीवन-निर्वाह करता है, इसी से पादरी साहब की तरह बाइबिल का विशेष जानकार नहीं है। जब पादरी साहब ने बाइबिल निकालकर तर्क शुरू किया तब इसने हार मान ली और पास ही जो एक युवा पुरुष बैठा था, उसके पास जाकर बैठ गया। उससे बोला - "क्‍यों साहब, क्‍या बाइबिल में दास रखने की आज्ञा है? अभी पादरी साहब ने बाइबिल के आधार पर बताया है कि काबुल देश के लोगों पर ईश्‍वर नाराज है। इसलिए वे दासों के दास होंगे।"

युवक पहले जरा मुस्‍कराया, फिर बोला - "पादरी साहब ने काबुल नहीं कैनान कहा है।" फिर बड़ी घृणा प्रकट करके वह कहने लगा - "भाई, इन धर्म-ध्‍वजी पादरियों की बातें बस रहने ही दो। जिस बात से देश के धनी बनियों और राजा-रईसों को सुभीता पहुँचे, उसी को पादरी साहब की बाइबिल समझिए। जिन धनवानों के टुकड़ों से इन धर्म-ढोंगियों का पेट भरता है, उनके स्‍वार्थ को सिद्ध करनेवाले मतों को ही ये पादरी ईश्‍वर का आदेश बताते हैं। क्‍या ये कभी बाइबिल के सच्‍चे धर्म-प्रचार का भी साहस करते हैं? म‍हर्षि ईसा की नजरों में काले-गोरे सब समान थे, कोई भेदभाव न था। उन्‍होंने साफ-साफ कहा है कि संसार की समस्‍त जातियों के अधिकार समान हैं। बाइबिल में इस मत का कहीं उल्‍लेख नहीं है कि एक जाति दूसरी जाति पर अत्‍याचार करे। आजकल तो स्‍वार्थपरता ही बाइबिल है। गुलामों के नीलाम-घर को गिरजा समझिए। जुआड़ी-खाना न्‍यायालय है। चोरों का सम्मिलन-स्‍थल व्यवस्थापिका-सभा है। उस समदर्शी परमात्‍मा के यहाँ क्‍या कभी काले और गोरे में भेद समझा जा सकता है? पर इन काले वस्‍त्रधारी-ऊपर से गोरे और अंदर से दिल के काले-पादरी साहबों ने बाइबिल की दुहाई देकर फतवा दे दिया कि परमेश्‍वर ने कालों को गोरों के दास होने के लिए पैदा किया है। और उसी मत का सहारा लेकर व्यवस्थापिका-सभा के माननीय सदस्‍य खुल्‍लमखुल्‍ला भाषण देते हुए नई-नई आज्ञाएँ निकालकर कहते हैं कि गोरों के दास होने के लिए ही काले बनाए गए हैं।"

इस आदमी की बात समाप्‍त होने के पहले ही जहाज एक नगर के पास जा पहुँचा। वहाँ किनारे लगने पर कई यात्री उतरने की तैयारी करने लगे। इसी समय घाट पर से एक काली स्‍त्री बड़ी तेजी से दौड़ती हुई आकर गोदाम में घुसी और जंजीर से जकड़े हुए जान नामक गुलाम के गले से लिपटकर रोने लगी। पाठक समझ गए होंगे कि यह काली स्‍त्री जान की पत्नी थी। जान ने टॉम से इसी की बात कही थी। स्‍वामी के बिकने की बात सुनकर वह तीस कोस पैदल दौड़ी आई थी और किनारे पर बैठी जहाज की बाट देख रही थी। इसकी दुख-भरी बातों और विलाप का विशद वर्णन अनावश्‍यक है। दास-दासियों के जीवन में ऐसे हृदय-भेदी दृश्‍य सदैव दिखाई देते हैं। जहाज खुलने की तैयारी हुई। युवती सदा के लिए विदा होते समय स्‍वामी से रोती हुई कहने लगी - "जान! अब इस जन्‍म में तुमसे भेंट होने की आशा नहीं। मैं ईश्‍वर पर भरोसा करके इस दु:ख को सह लूँगी। लेकिन अपने भविष्‍य की ओर देखकर मेरा कलेजा फटा जाता है। तुम्‍हारे चले जाने पर, बच्‍चों को बेचकर रुपए बटोरने के लिए, मालिक अवश्‍य ही मुझे दूसरे आदमी के साथ रहने को मजबूर करेगा। पर मैं तुमसे कहे देती हूँ कि मुझे आत्‍महत्‍या स्‍वीकार है, मार खाते-खाते मर जाना मंजूर है; पर मालिक की मार के डर से दूसरा पति करके मैं उसे बच्‍चे बेचने का मौका न दूँगी।"

इतना कहकर जान की स्‍त्री चली गई। जहाज लंगर उठाकर दक्षिण देश की ओर रवाना हुआ। चलते-चलते जहाज एक दूसरे नगर के पास पहुँचा। हेली यहाँ उतरा और थोड़ी देर बाद एक क्रीत दासी को साथ लेकर जहाज पर आ गया। उस दासी की गोद में एक साल भर का शिशु था। स्‍त्री बड़ी प्रसन्‍न दिखाई पड़ती थी। पर जब जहाज चलने लगा, तब हेली ने फिर उस स्‍त्री के पास आकर कुछ कहा। इस पर वह स्‍त्री अत्‍यंत उदास हो गई। कहने लगी - "मैं तुम्‍हारी इस बात पर विश्‍वास नहीं करती।"

हेली बोला - "इस कागज को देख तो मुझे मेरी कही बात का विश्‍वास हो जाएगा। जहाज में बहुतेरे पढ़े-लिखे आदमी हैं। जिससे तेरा जी चाहे, पढ़वाकर सुन ले।"

स्‍त्री ने कहा - "मुझे विश्‍वास नहीं होता कि मालिक ने मेरे साथ ऐसा छल-कपट किया है। मुझसे तो उन्‍होंने कहा था कि तेरे स्‍वामी को लूविल नगर का होटल किराए पर दिया है, वहीं जाकर मुझे मजदूरिन का काम करना पड़ेगा। तुम्‍हारे हाथ मुझे लड़के सहित बेच डाला, यह तो बिल्‍कुल नहीं कहा।"

हेली बोला - "तू दक्षिण देश के बनिए के हाथ बिकना सुनकर चिल्‍लाएगी, इसी से तेरे मालिक ने तुझे यह पट्टी पढ़ा दी है। तू इस कागज को जहाज के किसी पढ़े-लिखे आदमी को दिखा ले। तुझे सच-झूठ का पता चल जाएगा।" फिर हेली ने एक दूसरे आदमी से कहा - "जरा इस कागज को पढ़कर इस औरत को सुना दीजिए।" उस आदमी ने पढ़कर बताया कि जान फरसडिक नाम के साहब ने अपनी क्रीत दासी लूसी और उसके बच्‍चे को हेली के हाथ बेचा है, उसी का यह दस्‍तावेज है।

यह बात सुनकर वह स्‍त्री चीख उठी। उसका चीखना सुनकर जहाज के बहुत-से आदमी वहाँ जमा हो गए। तब स्‍त्री कहने लगी - "मेरे मालिक ने मुझे तो इसके साथ यह कहकर भेजा है कि तुझे तेरे स्‍वामी के पास भेजते हैं। पर अब भेद खुला कि यह निरी झाँसेबाजी थी। हाय, न जाने मेरे भाग्‍य में क्‍या दु:ख लिखे हैं।"

बस, वह स्‍त्री आगे एक शब्‍द भी न बोली। हेली ने मन-ही-मन कहा कि चलो, इतने ही में इसका झगड़ा खत्‍म हो गया।

उस स्‍त्री की गोद का बच्‍चा देखने में खूब हष्‍ट-पुष्‍ट था। जहाज में एक आदमी था। उसने हेली से कहा - "जान पड़ता है, तुम इस स्‍त्री को दक्षिण देश में रूई के खेतवालों के हाथ बेचने को लिए जा रहे हो। पर यह समझ लो कि वे लोग लड़के समेत इस स्‍त्री को कभी नहीं खरीदेंगे, क्‍योंकि बालक साथ रहने से कुलियों को खेत का काम करने में बड़ी अड़चन पड़ती है। इससे तुम्‍हें लड़के को कहीं-न-कहीं दूसरी जगह बेचना ही पड़ेगा। अगर सस्‍ते दाम में बेचो तो मैं ही इस लड़के को ले लूँ।" हेली ने कहा - "हाँ-हाँ, खरीदार होना चाहिए, हमें बेचने में कोई उज्र नहीं है।"

उस भलेमानस ने पूछा "अच्‍छा, बोलो, इसके क्‍या दाम लोगे?"

हेली - "यह लड़का खूब तैयार है। कीमत बहुत होगी। माल बड़ा चोखा है।"

भलामानस - "लेकिन छोटा कितना है, जरा इसे भी तो देखो। लेनेवाले को कई बरस तो इसे यों ही खिलाना-पिलाना पड़ेगा।"

हेली - "ऐसे लड़कों के पालने में खर्च ही क्‍या होता है? जैसे कुत्ते-बिल्‍ली के बच्‍चे जरा बड़े होने पर चलने-फिरने लगते हैं, वैसे ही ये भी चलने-फिरने लगते हैं।"

भलामानस - "मेरी एक क्रीत दासी के साल भर का एक बच्‍चा था, जो पानी में डूबकर मर गया है। वह इस बालक को पाल लेगी। इसी से मैं इसे लेना चाहता हूँ। दस रुपए लो तो दे डालो।"

हेली - "यह माल दस रुपए में! कभी नहीं बेचूँगा। तुम्‍हें खबर भी है, इसे छ: महीने पाल करके सौ रुपए खड़े करूँगा। तुम्‍हें लेना हो तो पचास से एक कौड़ी कम न लूँगा।"

भलामानस - "अच्‍छा, तीस रुपए ले लेना।"

हेली - "अच्‍छा, तुम इतना दबाते हो तो इस तरह करो, न हमारे न तुम्‍हारे तीस, पैंतालीस कर लो।"

भलामानस - "खैर पैंता‍लीस ही सही।"

हेली - "तुम कहाँ उतरोगे?"

भलामानस - "मैं लूविल नगर में उतरूँगा।"

हेली - "तो ठीक है। शाम के वक्‍त जहाज लूविल पहुँचेगा। उस वक्‍त बालक नींद में रहेगा। मजे में ले जाना। रोवे-चिल्‍लावेगा नहीं।"

संध्‍या हो गई। जहाज ने लूविल नगर में पहुँचकर लंगर डाला। जहाज में "लूविल नगर, लूविल नगर" की धूम मच गई। जो यात्री यहाँ उतरनेवाले थे वे हड़बड़ाकर अपना माल-असबाब बाँधने लगे। लूसी का स्‍वामी इसी नगर में काम करता था। लूसी अपने बच्‍चे को गोदाम में सुलाकर जहाज के किनारे जा खड़ी हुई। नदी के किनारे सैकड़ों आदमी आते-जाते थे। शायद उनमें उसका स्‍वामी भी हो। इसी आशा पर चाह-भरी आँखों से टकटकी लगाकर वह नदी की ओर देखने लगी। खयाल करने लगी कि संभव है, पानी भरने के लिए उसका स्‍वामी भी वहाँ आया हो। कोई घंटे भर तक जहाज किनारे पर ठहरा रहा पर लूसी ने अपने स्‍वामी को न देखा। इससे निराश होकर वह गोदाम में लौट आई, यहाँ देखा तो बच्‍चा नदारद। अब वह पागल की तरह अपने बच्‍चे को इधर-उधर जहाज में ढूँढ़ने लगी। यह दशा देखकर हेली साहब ने धीरे-धीरे उसके पास आकर कहा - "लूसी, तेरी फिक्र की कोई बात नहीं। तेरे लड़के को हमने एक बड़े दयावान आदमी के हाथ बेच दिया है। वह उसे बहुत मजे में पालेगा। लड़का साथ लेकर दक्षिण देश में जाने पर तुझे बड़ी दिक्‍कत होती। उसके लालन-पालन के लिए जरा भी फुर्सत न मिलती। अब मैंने तेरी सारी चिंता मिटा दी। जहाँ तक होगा हम तेरे भले ही का उपाय करेंगे।"

हेली की बात सुनकर स्त्री पर वज्रपात-सा हो गया। उसके मुँह में बात नहीं, काटो तो बदन में खून नहीं। उसे ज्ञान न रहा कि वह बैठी हुई है या खड़ी, सोई हुई स्‍वप्‍न देख रही है या जागती है। उसका मुँह सफेद पड़ गया। ऐसी सोचनीय दशा देखकर पत्‍थर का हृदय हो तो वह भी पिघल जाए। पर दिन-रात दास-दासियों की ऐसी विह्वल अवस्‍था देखते-देखते हेली का दिल पत्‍थर से भी सख्‍त हो गया था। उसे डर था कि स्‍त्री कहीं चिल्‍ला न उठे, जिससे जहाज भर में हुल्‍हड़ मच जाए। पर उसका वह डर जाता रहा, क्‍योंकि ऐसे भयानक शोक की हालत में कंठ और हृदय दोनों सूख जाते हैं। उस दशा में गले से आवाज नहीं निकलती, आँखों में आँसू नहीं आते। उस स्‍त्री की ऐसी दशा हो गई मानो किसी ने उसका हृदय बरछी से छेदकर उसे भारी पत्‍थर से दबा दिया हो। न तो वह चिल्‍लाई न उसकी आँखों से एक बूँद पानी ही गिरा। कठपुतली की तरह उसके हाथ जैसे-के-तैसे रह गए। आँखों की पलकें ऊपर को चढ़ गईं। यह नहीं जान पड़ता था कि वह आँखों से कुछ देख रही है।

उसकी यह निस्‍तब्‍ध दशा देखकर हेली मन-ही-मन प्रसन्‍न हुआ। उसने सोचा कि यह स्‍त्री शोरगुल नहीं मचाएगी। फिर हजरत उस स्‍त्री को इस तरह समझाने लगे - "लूसी, हम समझते हैं कि तेरे मन को कुछ दुख होता है। पर तू समझदार है। ऐसी मामूली-सी बात को लेकर खामखा उदास होने से क्‍या फायदा है। तू खुद ही समझ सकती है कि ऐसा किए बिना काम नहीं चलता, क्‍योंकि दक्षिण देश में रूई के खेतों पर काम करनेवाला मजदूर बच्‍चे को साथ में नहीं रख सकता।"

लूसी का कंठ रुक गया था। इससे वह अस्‍फुट स्‍वर में बोली - "मुझे माफ करो, मैं और कुछ नहीं सुनना चाहती।"

हेली इतने पर भी चुप न रहा, फिर बोला - "लूसी, तू बड़ी अक्‍लमंद है। जिसमें तेरा भला हो, वही हम करेंगे। दक्षिण देश में चलकर तुझे शीघ्र ही एक नया शौहर जुटा देंगे।"

इस पर वह स्‍त्री बाण से बिंधी सिंहनी की भाँति कर्कश स्‍वर में बोल उठी - "मुझसे आप न बोलिए, मैं आपकी कोई बात नहीं सुनना चाहती।"

हेली समझ गया कि उसका तीर निशाने पर नहीं लगा। इसलिए वह अपने कमरे में चला गया और वह स्‍त्री अपने को सिर से पैर तक कपड़े से ढँककर वहीं पड़ी रही।

उस स्‍त्री की ऐसी असहनीय मनोवेदना देखकर टॉम अपना दु:ख एकदम भूल गया और शोक भरे हृदय से उसके लिए ठंडी साँसें लेने लगा। टॉम का हृदय आप-ही-आप इस प्रकार भर आता था। उसने ईसाई पादरियों की भाँति बाइबिल से स्‍वार्थपरता की शिक्षा नहीं पाई। वह नीति-निपुण पंडितों की बखानी हुई राजनीति के गूढ़ तत्‍वों से बिल्‍कुल बेखबर है। वह अमरीका-वासी श्‍वेतांग-शार्दूलों के नैतिक व्‍यवहार का मर्म समझने में सर्वथा असमर्थ है। वह मौखिक सहानुभूति प्रकट करना नहीं जानता। शोक-विह्वला जननी के दु:ख से उसका हृदय विदीर्ण होने लगा, और वह उसे धीरज बँधाने का उपाय सोचने लगा। बहुत सोच-विचार के बाद उस स्‍त्री के सिरहाने बैठकर टॉम कहने लगा - "माता, तुम ईश्‍वर पर भरोसा रखकर अपनी हृदय-वेदना घटाने की चेष्‍टा करो। तुम्‍हारी इस दु:ख-मंत्रणा का कुछ ही दिनों बाद अवश्‍य अंत हो जाएगा।"

स्‍त्री शोक से अधीर हो गई थी। उसका हृदय स्‍तंभित हो गया था। टॉम के सांत्‍वना वाक्‍य उसके कानों में पड़े। टॉम की सहानुभूति उसके हृदय तक नहीं पहुँची।

देखते-देखते घोर अँधेरी रात आ पहुँची। सारे संसार में सन्‍नाटा छा गया। संसार के सब जीव-जंतु निद्रा में लीन हो गए और अपने-अपने हृदय के सुख-दु:खों को उसी अनंत तिमिर सागर में डुबो दिया। पर संतान-शोक से विह्वल जननी के हृदय की आग न बुझी। पुत्र-शोक से विदग्‍ध लूसी की आँखों में नींद नहीं है। पर-दु:ख प्रमीड़ित टॉम के हृदय में भी शांति नहीं है। जहाज के बालक, वृद्ध, युवा, नर-नारी सभी नींद में मस्‍त पड़े हैं, पर लूसी को चैन कहा? वह बार-बार पुकारती है - "हे परमात्‍मन्, इस यातना से उद्धार करो, अपनी गोद में स्‍थान दो।" लूसी के शब्‍द टॉम के सिवा दूसरों के कानों में नहीं पड़े। जहाज पर उस समय और कोई नहीं जागता था। इसके कुछ देर बाद जहाज से नदी में, धम से किसी चीज के गिरने का शब्‍द टॉम को सुनाई दिया।

रात बीती। तड़का हुआ। गुलामों को देखने के लिए हेली गोदाम में पहुँचा। वहाँ लूसी न दिखाई दी। लूसी को उसने एक हजार में खरीदा था। इससे उसे न देखकर हेली पागल-सा हो गया और जहाज में इधर-उधर ढूँढ़ने लगा। कहीं पता न पाकर अंत में टॉम के पास आकर बोला - "तू जरूर लूसी की बात जानता होगा।"

टॉम बोला - "साहब, मैं और तो कुछ नहीं जानता। हाँ, थोड़ी रात थी तब नदी में किसी के कूदने का-सा शब्‍द सुना था।"

यह सुनकर हेली ने समझ लिया कि लूसी ने आत्‍महत्‍या कर ली है। पर इससे उसे कुछ दु:ख न हुआ, क्‍योंकि वह बहुत बार दास-दासियों को आत्‍महत्‍या करते देखता था। इसी से इस घटना से उसके हृदय में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। उसे केवल अपने घाटे-मुनाफे का ही खयाल हुआ। वह मन-ही-मन में कहने लगा कि इस बार काम में घाटा छोड़ मुनाफा नहीं दिखता। शेल्‍वी के यहाँ के काम-काज में पाँच सौ मिट्टी में मिले और अब पूरे एक हजार पर पानी फिर गया।

पाठक, आप कहते होंगे कि हेली बड़ा निर्दयी है। आप हेली को मन-ही-मन बार-बार धिक्‍कारते और कोसते होंगे। पर इसके पहले एक बार वास्‍तविकता पर विचार कीजिए। हेली अनपढ़ है और अभी तक वह सामाजिक जगत के गहरे अंधकूप में पड़ा हुआ है। सभ्‍य समाज से उसका वास्‍ता नहीं है। वह दास-व्‍यवसायी है। पर बताइए किसने उसे दास-व्‍यवसायी बनाया है? क्‍या दासत्‍व-प्रथा का बनानेवाला हेली है? कभी नहीं। जो सुशिक्षित हैं; शिष्‍ट कहलाते हैं, सब से आदर पाते हैं, देश के शासन की बागडोर अपने हाथ में लिए हुए हैं, जो देश के उपकार के निमित्त कानून गढ़ते हैं और न्‍यायासन पर बैठकर इन कानूनों को काम में लाते हैं, वही हेली को दास-व्‍यवसायी बनानेवाले हैं, उन्‍हीं ने आज लूसी के बच्‍चे को गोद से अलग कराके उस निरपराध अबला के प्राण लिए हैं। देश के शासनकर्ताओं, विचारकों, तुम ठगों को सजा देते हो, चारों को जेलखाने भेजते हो और खूनियों को सूली पर चढ़ाते हो; पर तुम लोग स्‍वयं नित्‍य जो नर-हत्‍याएँ करते हो, नर-नारियों पर घोर अत्‍याचार करते हो, दूसरों का धन-दौलत हरते हो, उन बातों पर क्‍या भूलकर भी ध्‍यान नहीं देते? समझ रखो, परम न्‍यायी परमेश्‍वर के न्‍यायदंड से कोई बचा नहीं रह सकता। पुत्र-शोक में प्राण खोकर लूसी उसी अमृतमय के अमृतधाम को चली गई है। वह अब मंगलमय ईश्‍वर की गोद में विराज रही है। उस न्‍यायमूर्ति के निकट उसकी सुनवाई हो रही है। वहीं उसका न्‍याय होगा। पर अरे, ज्ञान-विज्ञानाभिमानी शासनकर्ताओं और विचारकों, तुम लोग ऐसे विषयांध हो रह हो कि पल भर भी उस अंतिम दिन की सुध नहीं करते। नहीं जानते कि लूसी की हत्‍या के अभियोग में तुम लोगों में से हरएक को उसी राजाधिराज के दरबार में कभी अभियुक्‍त होना पड़ेगा और वहाँ जवाबदेही करनी पड़ेगी।


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