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उपन्यास

टॉम काका की कुटिया
हैरियट वीचर स्टो

अनुवाद - हनुमान प्रसाद पोद्दार

अनुक्रम 22. आपसी चर्चाएँ पीछे     आगे

कुछ दिनों बाद बुढ़िया प्रू की जगह एक दूसरी स्‍त्री बिस्‍कुट और रोटियाँ लेकर आई। उस समय मिस अफिलिया रसोईघर में थी। दीना ने उस स्‍त्री से पूछा - "क्‍यों री, आज तू रोटी कैसे लाई है? प्रू को क्‍या हुआ?"

"प्रू अब नहीं आएगी" , उस स्‍त्री ने यह बात ऐसे ढंग से कही, जैसे इसमें कुछ रहस्‍य हो। दीना ने पूछा - "क्‍यों नहीं आएगी? क्‍या वह मर गई?"

उस स्‍त्री ने मिस अफिलिया की ओर देखते हुए कहा - "हम लोगों को ठीक-ठीक मालूम नहीं है। वह नीचे के तहखाने में है।"

मिस अफिलिया के रोटियाँ ले लेने के बाद दीना उस स्‍त्री के पीछे-पीछे दरवाजे तक गई। उससे पूछा - "प्रू है कहाँ? कुछ तो कह!"

वह स्‍त्री कहना चाहती थी, पर डर से नहीं कह रही थी। अंत में दबी जबान से चुपके-चुपके बोली - "अच्‍छा देख, तू किसी से कहना मत। प्रू ने एक दिन फिर शराब पी ली, इस पर उन लोगों ने उसे नीचे के तहखाने में बंद करके दिन भर रख छोड़ा। फिर मैंने लोगों को कहते सुना कि उसके शरीर पर मक्खियाँ भिन-भिना रही हैं और वह मरी पड़ी है।"

यह सुनकर दीना ने विस्‍मय से हाथ उठाया और पीछे हट गई। तभी देखती क्‍या है कि इवान्‍जेलिन उसके पास खड़ी है। इवा की आँखें स्थिर हैं, मुँह सूख गया है, गालों और होंठों की सुर्खी गायब होकर सफेदी छा रही है। दीना चिल्‍ला उठी - "बाप-रे-बाप! भगवान बचाएँ! इवा बेहोश हो रही है। अरे, हम लोगों को क्‍या पड़ी थी जो उसे ये सब बातें सुनने दीं? मालिक को पता लगने से वह बहुत नाराज होंगे।"

बालिका ने दृढ़ता से कहा - "मुझे बेहोशी नहीं होगी। और मुझे ये बातें सुननी क्‍यों नहीं चाहिए? कष्‍ट की बातें सुनने में मुझे उतनी पीड़ा नहीं होगी, जितनी प्रू को कष्‍ट सहने में।"

दीना ने कहा - "नहीं, तुम-सरीखी कोमल नन्‍हीं बालिकाओं को ये कष्‍ट-कथाएँ नहीं सुननी चाहिए। इन बातों से तुम्‍हें बड़ी पीड़ा होती है।"

इवा ने फिर ठंडी साँस ली, और बड़े वितृष्ण चित्त से पैर धरती हुई दुमंजिले कमरे में चली गई।

मिस अफिलिया ने प्रू के बारे में बड़ी सरगर्मी से पूछताछ की। दीना से जो कुछ सुना था, उसे खूब नमक-मिर्च लगाकर कह सुनाया। टॉम ने अपने पहले दिन की तहकीकात सुनाई।

सेंटक्‍लेयर जिस कमरे में बैठा अखबार पढ़ रहा था, उसमें जाकर पैर रखते ही मिस अफिलिया ने कहा - "ओफ, कैसा बीभत्‍स कांड है! कैसा जघन्‍य व्‍यापार है!"

सेंटक्‍लेयर ने पूछा - "जीजी, आज कौन-सा अधर्म का पहाड़ टूट पड़ा?"

मिस अफिलिया बोली - "तुम्‍हारे लिए कोई बात ही नहीं है। मैंने तो ऐसी बात कभी नहीं सुनी। उन लोगों ने मारे कोड़ों के प्रू को मार डाला।" मिस अफिलिया ने बहुत विस्‍तार से वह बात कह सुनाई।

सेंटक्‍लेयर ने अखबार पढ़ते-पढ़ते कहा - "मैंने तो पहले से समझ रखा था कि किसी दिन यही होना है।"

अफिलिया बोली - "तुमने समझ रखा था और इसके प्रतिकार का कोई उपाय नहीं किया! क्‍या तुम्‍हारे यहाँ ऐसे पाँच भलेमानस नहीं हैं, जो मिलकर इन निष्‍ठुरताओं का निवारण करने का यत्‍न करें।"

सेंटक्‍लेयर ने कहा - "जो अपने दास-दासियों की जान लेता है, वह स्‍वयं अपना माल नष्‍ट करता है। इसमें दूसरे को बोलने का कोई अधिकार नहीं। अपना नफा-नुकसान हरेक आदमी दूसरे की अपेक्षा अच्‍छी तरह समझता है। भरसक अपने दास-दासियों को मारकर अपना नुकसान कोई नहीं करता, पर प्रू पैसे चुरा-चुराकर शराब पीती थी, इससे उसके मालिक का बहुत नुकसान होता था, इसी से उसे मार डाला होगा।"

मिस अफिलिया ने कहा - "अगस्टिन, वास्‍तव में यह बड़ा ही भयंकर धंधा है। निश्‍चय ही इसके लिए तुम्‍हें ईश्‍वर का कोप-भाजन बनना पड़ेगा।"

सेंटक्‍लेयर बोला - "प्‍यारी जीजी, मैंने कभी ऐसा नहीं किया, पर मैं दूसरों को नहीं रोक सकता। यदि नीच पशु के जैसे मनुष्‍य अपनी इच्‍छानुसार यह अत्याचार करते हैं तो बताओ, मैं उसमें क्‍या करूँ? कानूनन हर आदमी अपने-अपने दास-दासियों पर पूर्ण अधिकार रखता है। दास-दासियों को जान से मारकर भी कोई दंड नहीं पा सकता। जब कानून ने उन्‍हें इतना अधिकार दे रखा है तो कोई क्‍या कर सकता है? इसलिए सबसे भली बात चुप रहना है। उधर से अपने आँख-कान बंद किए बैठे हैं। जो होता है सो होता है।"

मिस अफिलिया ने कहा - "तुम कैसे अपनी आँखों और कानों को इधर से बंद कर लेते हो? तुम कैसे चुपचाप ये अत्‍याचार होने देते हो? इस भयंकर आचरण की कैसे उपेक्षा की जा सकती है?"

सेंटक्‍लेयर बोला - "बहन, तुम क्‍या आशा करती हो? देखो, यह एक मूर्ख, आलसी, भले-बुरे का ज्ञान न रखने वाली, चिर-पराधीन मनुष्‍य-जाति दूसरी बहुत ही स्‍वार्थ-परायण, अर्थ-पिशाच मनुष्‍य-जाति के पंजों में फँसी हुई है। इन स्‍वार्थियों को जब इतनी बेहिसाब ताकत दे दी गई है, तब ऐसे भयंकर और कठोर आचरणों का होना अवश्‍यंभावी है। ऐसे समाज में एकाध सज्‍जन होकर ही क्‍या कर सकते हैं? मेरी अकेले की ऐसी बिसात नहीं कि इस देश भर के गुलामों को खरीदकर उन्‍हें दु:ख से मुक्‍त कर दूँ।"

यह कहते-कहते सेंटक्‍लेयर का सदा प्रफुल्‍ल मुख कुछ देर के लिए कुम्‍हला गया। उसकी आँखें डबडबाई-सी जान पड़ीं, पर तुरंत उसने अपने मनोभाव को छिपाकर मुस्‍कराते हुए कहा - "बहन, तुम वहाँ यमराज की नानी का-सा मुँह बनाए क्‍या खड़ी हो? इधर आओ। तुमने अभी देखा क्‍या है? इस संसार भर के पाप, अत्‍याचार और सख्तियों का हिसाब लगाकर सोचा जाए तो जीवन मुश्किल हो जाए। इस संसार में कुछ भी अच्‍छा न लगे।"

यह कहकर सेंटक्‍लेयर लेट गया और अखबार पढ़ने लगा।

मिस अफिलिया जमीन पर बैठी-बैठी उदासी के साथ मोजा बुनने लगी। उसके हाथ चलते थे, पर जब वह उन बातों को सोचने लगी तो अकस्‍मात उसके हृदय में आग भभक उठी और अंत में वह फूट पड़ी। उसने कहा - "अगस्टिन, मैं तुम्‍हारी भाँति इस विषय की उपेक्षा नहीं कर सकती। मेरा मत है कि इस प्रथा का समर्थन करना तुम्‍हारे लिए बहुत ही घृणाजनक है।"

सेंटक्‍लेयर बोला - "क्‍यों बहन, तुमने फिर वही पचड़ा छेड़ा।"

अफिलिया ने और तेजी के साथ कहा - "मैं कहूँगी कि इस प्रथा का समर्थन करना तुम्‍हारे लिए बहुत ही घृणाजनक है।"

सेंटक्‍लेयर बोला - "प्‍यारी बहन, मैं इसका समर्थन करता हूँ? किसने कहा कि मैं इसका समर्थन करता हूँ।"

अफिलिया ने कहा - "निस्‍संदेह तुम इसका समर्थन करते हो - तुम सब जितने दक्षिणी हो वे सब। नहीं, तो बताओ कि तुमने दासों के लिए क्‍या किया?"

सेंटक्‍लेयर बोला - "क्‍या तुम मुझे संसार में कोई ऐसा निर्दोष मनुष्‍य बताओगी, जो किसी काम को बुरा समझ लेने पर फिर उसे नहीं करता? क्‍या तुमने कभी ऐसा काम नहीं किया या नहीं करती हो, जिसे तुम बिल्‍कुल ठीक नहीं समझती?"

अफिलिया ने कहा - "यदि कभी करती हूँ तो मैं उसके लिए पश्चाताप करती हूँ।"

सेंटक्‍लेयर ने नारंगी छीलते-छीलते कहा - "मैं भी ऐसा ही करता हूँ। सारा समय इस पश्‍चाताप ही में बीतता है।"

अफिलिया बोली - "पश्‍चाताप करने के बाद आखिर उस को क्‍यों करते जाते हो?"

सेंटक्‍लेयर ने कहा - "बहन, तुम क्‍या अनुमान करने के बाद फिर उस बुरे काम को नहीं करती?"

अफिलिया ने उत्तर दिया - "केवल ऐसी दशा में जब मैं बहुत लोभ में पड़ जाती हूँ।"

सेंटक्‍लेयर बोला - "हाँ, तो मैं बड़े लोभ ही में फँसा हुआ हूँ। जो मुश्किल तुम्‍हें पड़ती है, वही मुझे भी पड़ती है।"

अफिलिया ने कहा - "पर मैं सदा अपने दोष को दूर करने की चेष्‍टा किया करती हूँ।"

सेंटक्‍लेयर बोला - "बहुत ठीक। मैं भी तो दस वर्षों से चेष्‍टा कर रहा हूँ, पर अभी तक मैं अपने कितने ही दोष दूर नहीं कर पाया। कहो बहन, तुम क्‍या सब पापों से छुटकारा पा चुकी हो?"

इस बार मिस अफिलिया ने बड़ी गंभीरता से बुनने के काम को किनारे रखकर कहा - "भाई अगस्टिन, मुझमें अनेक दोष हैं, उनके लिए तुम मेरी भर्त्‍सना कर सकते हो। तुम्‍हारा कथन यथार्थ है। अपनी कमजोरी के विषय में मुझसे अधिक कोई दूसरा अनुभव नहीं कर सकता। पर मैं तुमसे कहूँगी कि अपना यह दाहिना हाथ काटकर फेंक सकती हूँ, पर अपने दोष की उपेक्षा कभी नहीं कर सकती। जिस काम को मैं बुरा समझती हूँ, उसे सदा कभी नहीं करती रह सकती।"

अगस्टिन ने कहा - "बहन, क्‍या तुम्‍हें मेरी बात पर गुस्‍सा आ गया? तुम तो जानती हो कि मैं बराबर दुष्‍ट लड़का था। मुझे तुम्‍हें खिझाने में हमेशा आनंद आया करता था। तुम्‍हारा स्‍वभाव कितना पवित्र है, सो क्‍या मैं जानता नहीं! तुम्‍हारी सहृदयता क्‍या मैं भूल गया हूँ? पर तुम जरूरत से ज्‍यादा भली हो - इतनी भली कि तुम्‍हारे मरने का खयाल करके मुझे बड़ा दु:ख होता है।"

अफिलिया ने माथे पर हाथ रखकर कहा - "अगस्‍ट, यह बड़ी गंभीर बात है। हँसी-मजाक की नहीं।"

सेंटक्‍लेयर बोला - "हाँ, हिसाब से गंभीर है सही, पर मैं इतनी गर्मी में तो गंभीर होने से रहा। गर्मी तो गर्मी, उस पर मच्‍छरों का उपद्रव अलग परेशान किए हुए है। इस समय कोई भी इतनी ऊँचाई की नैतिक आलोचना नहीं कर सकता।"

सेंटक्‍लेयर ने एकाएक अपने आप उठकर कहा - "मैंने अब समझा कि तुम्‍हारे यहाँ के उत्तरवाले लोग हम दक्षिणवालों से यों अधिक धार्मिक होते हैं। इसका कारण यह जान पड़ता है कि तुम्‍हारे वहाँ यहाँ के जैसी गर्मी नहीं पड़ती। लो, मुझे इस नए आविष्‍कार के लिए बधाई दो।"

अफिलिया बोली - "अगस्टिन, तुम बड़े ही खफ्ती दिमाग के हो।"

सेंटक्‍लेयर ने कहा - "मैं खफ्ती दिमाग का हूँ! ठीक है, होऊँगा, कोई ताज्‍जुब की बात थोड़े ही है। पर अब मैं एक बार गंभीर बनता हूँ। तुम जरा यह नारंगी की टोकरी मुझे उठा देना। देखो, तुम मेरे लिए थोड़ा कष्‍ट करो, मैं भी तो गंभीर बनने में कितना कष्‍ट उठाऊँगा।"

इतना कहने के बाद सचमुच ही उसका चेहरा गंभीर हो आया। वह बड़ी संजीदगी से, अपने भाव प्रकट करने लगा - "बहन जहाँ तक मेरा खयाल है, इस दासत्‍व-प्रथा के खयाल पर कोई मतभेद नहीं हो सकता। पर हमारे यहाँ के अर्थलोभी गोरे जमींदार, स्‍वार्थवश, दासत्‍व प्रथा को न्‍यायसंगत बताते हैं और उनके टुकड़ों पर बसर करनेवाले खुशामदी पादरी इन्‍हें खुश रखने के लिए इसे बाइबिल से साबित करने को तैयार रहते हैं। वकील और नीति के पंडित अपना मतलब गाँठने के लिए आडंबर फैलाकर इस भयंकर रीति का समर्थन करते हैं। ये लोग अपने मतलब के लिए भाषा, नीति और धर्मशास्‍त्र का मनमाना अर्थ लगाते हैं। इस काम में इनकी अक्‍ल की दौड़ देखकर हैरान होना पड़ता है। पर सच तो यह है कि चाहे इसे बाइबिल से सिद्ध किया जाए, अथवा कानून की दुहाई दी जाए, या कितनी युक्तियाँ क्‍यों न दिखाई जाएँ, किंतु दुनिया कभी उनपर विश्‍वास नहीं कर सकती। यह घृणित दास-प्रथा नरकीय प्रथा है, नरक से निकली हुई है।"

अगस्टिन बड़ी उत्तेजना से ये बातें कह रहा था। मिस अफिलिया को इस पर बड़ा विस्‍मय हुआ। वह अपना बुनना छोड़कर सेंटक्‍लेयर का मुँह देखने लगी। उसे विस्मित देखकर सेंटक्‍लेयर फिर कहने लगा - "तुम मेरी बात पर विस्मित-सी जान पड़ती हो, पर मैं आज जब कहने ही बैठा हूँ तब सारी बातें खोलकर कहता हूँ। गुलामी की इस घृणित प्रथा का मूल कारण देखना चाहिए, इसके ऊपर के सारे आवरणों को अलग करके देखना चाहिए कि यह क्‍या है? वास्‍तव में, हम भी इंसान हैं और कुएशी (जो लोग दास बनाए जाते थे) भी इंसान हैं। पर वे बेचारे मूर्ख और निर्बल हैं और हम बुद्धिमान और सबल हैं। हम छल-बल में पक्‍के हैं, इससे हम उनका सब कुछ हर लेते हैं और उसमें से जितना हमारा जी चाहता है, उन्‍हें लौटा देते हैं। जो काम गंदा, कठिन और अप्रिय जान पड़ता है, उसे हम कुएशियों से कराते हैं, क्‍योंकि हमें मेहनत करना पसंद नहीं, इसलिए कुएशी हमारे लिए पिसेंगे। हमें धूप अखरती है, कुएशी धूप में जलेगा। कुएशी रुपए कमाएगा और हम उसे खर्च करेंगे। हमारे जूतों में कीचड़ न लगे, इसके लिए कुएशी अपने हाथ से कीचड़ उठाकर रास्‍ता साफ रखेगा। यहाँ तो कुएशी को हमारी इच्‍छा के अनुसार चलना ही है, किंतु उसके परलोक के स्‍थान के निर्णय का ठेका भी हमीं लोगों के हाथ में है। हमारी कोई स्‍वार्थ-सिद्धि होती हो तो उसे अवश्‍य नरक में जाना पड़ेगा। हमारे देश के कानून का मतलब इसके सिवा और कुछ नहीं है। गुलामी की प्रथा के दुर्व्‍यवहार करने का हल्‍ला मचाना पागलपन है। इतनी बड़ी कुप्रथा का और क्‍या दुरुपयोग हो सकता है? इस घृणित रिवाज का जारी होना ही मनुष्‍य-शक्ति का घोरतर दुरुपयोग है। इस पाप से यह पृथ्‍वी रसातल को क्‍यों नहीं चली जाती? इसका कारण यह है कि हम में से सब जंगली जानवर ही नहीं है, कोई-कोई आदमी बनकर पैदा हुए हैं। हम में से कुछ के हृदय में थोड़ी बहुत दया भी है। कानून ने गुलामों पर अत्‍याचार करने की जो शक्‍ति प्रदान की है, उसका भी हम पूरा-पूरा प्रयोग नहीं करते। इस देश का नीच-से-नीच दास-स्‍वामी गुलामों के साथ चाहे जितना बुरा बर्ताव करता हो, चाहे जितने अत्‍याचार करता हो, सब कानून की सीमा के अंदर ही हैं।"

इतना कहते-कहते सेंटक्‍लेयर बेहद उत्तेजित हो गया। वह उठकर फर्श पर जल्‍दी-जल्‍दी टहलने लगा। उसका सुंदर चेहरा सुर्ख हो गया, और उसके विशाल नेत्रों से आग-सी निकलने लगी। इसके पहले मिस अफिलिया ने कभी उसकी ऐसी भावभंगिमा नहीं देखी थी। इससे विस्मित होकर वह चुपचाप उसकी ओर देखती रही। सेंटक्‍लेयर ने एकाएक मिस अफिलिया के सामने रुककर कहा - "इस विषय पर कुछ कहने या सोचने का कोई नतीजा नहीं है। पर मैं तुमसे कहता हूँ, एक समय था जब मैं सोचता था कि सारी पृथ्‍वी रसातल में चली जाए और यह भीषण अन्‍याय और अविचार निबिड़ अंधकार में लुप्‍त हो जाए, तो मैं सानंद इसके साथ रसातल को चला जाऊँगा। जब-ज‍ब मैं जहाज की यात्रा में या अपने खेतों के दौरे के समय सैकड़ों नीच, निष्ठुर पशुप्रकृति गोरों को अन्‍याय से प्राप्‍त किए गए धन द्वारा उन अनगिनत स्‍त्री-पुरुषों और बालक-बालिकाओं को खरीदकर उनपर मनमाना अत्‍याचार करते देखता हूँ तब मेरी छाती फट जाती है। मैं मन-ही-मन अपने देश को कोसता हूँ और सारी मनुष्‍य-जाति को शाप देता हूँ।"

मिस अफिलिया बोली - "अगस्टिन, अगस्टिन, मैं समझती हूँ कि तुमने बहुत-कुछ कह डाला। मैंने अपने जीवन में गुलामी की प्रथा के विरुद्ध ऐसे ओजस्‍वी घृणापूर्ण वाक्‍य कभी उत्तर प्रदेश में भी नहीं सुने।"

यह सुनकर सेंटक्‍लेयर के मुँह का भाव बदल गया। उसने स्‍वाभाविक व्‍यंग्‍य के साथ कहा - "उत्तर प्रदेश में? तुम्‍हारे उत्तर प्रदेशीय लोगों का खून बहुत ही सर्द है। तुम लोग हर बात में ठंडे हो। हृदय के आवेग द्वारा उत्तेजित होकर उत्तर प्रदेशवाले हम लोगों की भाँति अन्‍याय के विरुद्ध जोरदार आंदोलन करके आकाश-पाताल नहीं गुँजा सकते। तुम्‍हारे उत्तर प्रदेश में निम्‍नश्रेणी के लोगों से क्‍या सच्‍ची सहानुभूति रखी जाती है?"

पाठक जरा ध्‍यान से देखेंगे तो उन्‍हें मालूम हो जाएगा कि गुलामी की यह प्रथा संसार भर में फैली हुई है। संसार में कोई स्‍थान ऐसा नहीं है, कोई जाति ऐसी नहीं है, जहाँ और जिसमें यह घृणित प्रथा किसी-न-किसी रूप में प्रचलित न हो। मनुष्‍य-समाज के मानसिक भावों की जाँच कीजिए और देखिए कि प्रत्‍येक व्‍यक्ति के अंदर क्‍या भाव काम कर रहे हैं। दूसरों पर प्रभुत्‍व रखना, दूसरों को नीचे रखकर स्‍वयं ऊपर जाना, यही मनुष्‍यों के मन का एक सार्वभौमिक भाव है। इसी लिए समाज में, जहाँ देखिए, वहीं सबल निर्बल को सताता है, पंडित मूर्ख पर प्रभुत्‍व जमाता है। बड़े आदमी अपने से छोटी श्रेणी के मनुष्‍यों का खून चूस-चूसकर मोटे बन रहे हैं। अपने से ऊपरवाली श्रेणी के कारण निम्‍न श्रेणी के लोग बड़े दु:ख से दिन बिता रहे हैं।

मिस अफिलिया ने उत्तर प्रदेश क बात सुनकर कहा - "ठीक है, पर यहाँ एक प्रश्‍न उठता है।"

सेंटक्‍लेयर बोला - "मैं तुम्‍हारे प्रश्‍न को समझ गया। तुम यही कहना चाहती हो न कि यदि मैं गुलामी की प्रथा का अनुमोदन नहीं करता, तो फिर क्‍यों इन दास-दासियों को रखकर अपने सिर पाप की गठरी लादता हूँ? ठीक है, मैं तुम्‍हारे ही शब्‍दों में इसका उत्तर दूँगा। तुम बचपन में मुझे बाइबिल पढ़ाने के समय कहा करती थीं कि हमारे पाप पुरुष-परंपरा से हमारे पीछे लगे हुए हैं। वही बात इन दासों के संबंध में भी है। ये पुरुष-परंपरा से मुझे मिले हैं। मेरे दास मेरे पिता के थे। और तो क्‍या, मेरी माता के भी थे। अब वे मेरे हैं। तुम जानती हो कि मेरे पिता पहले न्यू इंग्लैंड से यहाँ आए थे और उनकी प्रकृति बिल्‍कुल तुम्‍हारे पिता के समान ही थी। वह सब तरह से प्राचीन रोमनों की भाँति न्‍यायी, तेजस्‍वी, महानुभाव और दृढ़-प्रतिज्ञ मनुष्‍य थे। तुम्‍हारे पिता न्यू इंग्लैंड में ही रहकर पत्‍थरों और चट्टानों पर शासन करते हुए कमाने-खाने लगे और मेरे पिता लुसियाना आकर अगणित नर-नारियों पर प्रभुत्‍व फैलाकर उन्‍हीं के परिश्रम से अपनी जीविका का निर्वाह करने लगे। मेरी माता..."

कहते-कहते सेंटक्‍लेयर उठ खड़ा हुआ और कमरे में दूसरे सिरे पर लटकती हुई माता की तस्‍वीर के पास जाकर खड़ा हो गया और बड़े भक्ति-भाव से उस चित्र की ओर देखकर कहने लगा - "वह देवी थी... मेरी ओर इस तरह क्‍या देखती हो? तुम जानती हो कि मेरे कहने का तात्‍पर्य क्‍या है। यद्यपि माता ने मानव का तन धारण किया था तथा जहाँ तक मेरा अनुभव है, मैंने देखा और समझा है, उनमें मानसिक दुर्बलता और भ्रम का लेश तक न था। क्‍या अपने, क्‍या पराए, और क्‍या दास-दासी, सभी की यही राय है। बहन, माता ने ही मुझे कट्टर नास्तिकता के भाव से उबारा। मेरी माता एक जीती-जागती धर्मशास्‍त्र थीं और मैं उस धर्मशास्‍त्र की सत्यता में संदेह नहीं कर सकता।"

यह कहते हुए सेंटक्‍लेयर का हृदय एकदम उछल उठा। वह अपने को भूलकर हाथ जोड़कर माता के चित्र की ओर देखते हुए, 'माँ, माँ' कहकर पुकारने लगा और फिर सहसा अपने को सँभालकर वह लौट आया। अफिलिया के पास एक कुर्सी पर बैठकर उसने फिर कहना आरंभ किया - "मेरा भाई और मैं, दोनों जुड़वा पैदा हुए थे। लोग कहा करते हैं कि जुड़े हुए पैदा होनेवाले दो भाइयों में विशेष समानता होती है; पर हम दोनों में सब विषयों में भिन्‍नता थी। उसकी गठन रोमनों की भाँति दृढ़ थी, आँखें दोनों काली और ज्‍योतिपूर्ण थीं, सिर के बाल घने और छल्‍लेदार थे, शरीर का रंग भी गोरा था। मेरी आँखें नीली, बाल सुनहरे, देह की गठन ग्रीकों की-सी और रंग सफेद है। वह कामकाजी और चतुर था; मैं भावुक था, पर कामकाज में बिल्‍कुल निकम्‍मा। वह बराबरवालों तथा मित्रों के साथ बड़ी सज्‍जनता का व्‍यवहार करता था; पर अपने से छोटे लोगों पर बड़ा रौब रखता था। अपनी इच्‍छा के विरुद्ध काम करनेवाले पर वह कभी दया नहीं करता था। हम दोनों ही सत्‍यवादी थे। उसकी सत्‍य-प्रियता साहस और अहंकार से उत्‍पन्‍न हुई थी, और मेरी सत्‍यनिष्‍ठा भावुकता से। हम दोनों एक-दूसरे को चाहते थे। वह पिता का प्‍यारा था और मैं माता का दुलारा। मैं बड़ा भावुक था। मैं हर बात की बारीकी से छान-बीन करता था, जरा-सी बात से मेरा हृदय टूट जाता था। मेरे इस भाव से उसकी और पिता की जरा भी सहानुभूति न थी, पर माता मेरे हृदय को समझती थी और मेरे भाव से पूरी हमदर्दी रखती थी। इसी कारण अलफ्रेड से झगड़ने पर जब पिता मुझे तीखी निगाह से देखते थे, तब मैं माता के कमरे में आकर उसके पास बैठ जाता था। माँ की उस समय की वह स्‍नेह-भरी दृष्टि मुझे आज भी याद आती है। वह हमेशा सफेद कपड़े पहना करती थीं। मैं जब कभी बाइबिल के 'रेवेलेशन' अंश में निर्मल, शुभ्रवस्‍त्रधारी देवताओं का वर्णन पढ़ता हूँ तब मुझे अपनी माता की याद आ जाती है। अनेक विषयों में माता बड़ी पारदर्शिनी थी। संगीत में उनकी बड़ी पहुँच थी। माँ जब आर्गन बाजे पर अपने देवोपम कंठ से गातीं, तब मैं उनकी गोद में सिर रखकर कितना विह्वल हो जाता, कितने स्‍वप्‍न देखता, कितना सुख पाता - इसका वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्‍द नहीं हैं।..."

"उन दिनों दास-प्रथा का विषय इतने वाद-विवाद का विषय नहीं था। कोई व्‍यक्ति स्‍वप्‍न में भी इसे हानिप्रद नहीं समझता था।"

"मेरे पिता जन्‍म से ही जात्‍यभिमानी थे। जान पड़ता है कि इस लोक में जन्‍म होने के पूर्व वे आध्‍यात्मिक जगत की किसी उच्‍च श्रेणी में थे और वहीं से अपनी कुल-मर्यादा और अहंकार को साथ लेकर उतरे थे, नहीं तो दरिद्र और उच्‍च-कुल से रहित व्‍यक्ति के घर में जन्‍म लेकर भी कुल का ऐसा अभिमान होना पूर्वसंस्‍कार के सिवा और क्‍या कहा जा सकता है? मेरे भाई ने पिता की प्रकृति पाई थी।"

"तुम जानती हो, जाति-कुलाभिमानियों के हृदय में सार्वभौम प्रेम का स्‍थान नहीं हो सकता। उनकी सहानुभूति समाज की एक निर्दिष्‍ट-सीमा के पार नहीं जा सकती। इंग्‍लैंड में सीमा की यह रेखा एक जगह टिकी हुई है, तो ब्रह्मदेश में दूसरी जगह, अमरीका में तीसरी जगह; पर इन सब देशों के जाति-कुलाभिमानियों की दृष्टि इससे आगे कभी नहीं बढ़ती। इस श्रेणी के लोग केवल अपने बराबरवालों से ही सहानुभूति रखते हैं। वे अपनी श्रेणीवालों के लिए जिन बातों को अत्‍याचार और अन्‍याय में गिनते हैं, उन्‍हीं बातों को दूसरी श्रेणीवालों के लिए कुछ भी नहीं समझते। पिता की दृष्टि में 'रंग' सीमा-निदर्शक था। गोरों को वह अपनी श्रेणी का समझते थे और उनके साथ उनका व्‍यवहार भी न्‍याय-संगत और आदर्श था। पर इन बेचारे गुलामों को वह मनुष्‍य नहीं समझते थे - इन्‍हें तो वे मनुष्‍यों और पशुओं के बीच की श्रेणी का जीव मानते थे। मैं समझता हूँ कि अगर कोई उनसे पूछता कि इन गुलामों में आत्‍मा है या नहीं, तो वह बड़े संदेह में पड़कर, 'हाँ' में इसका उत्तर देते। मेरे पिता आध्‍यात्मिक आलोचना की कुछ भी परवा नहीं करते थे। धर्म पर भी उनकी वैसी श्रद्धा न थी। वह समझते थे कि कोई ईश्‍वर है तो जरूर, पर वह भी उच्‍चजाति के लोगों का ही रक्षक है।"

"मेरे पिता के कपास के खेतों में कम-से-कम पाँच सौ गुलाम काम करते थे। इनके काम की देखरेख के लिए स्‍टव नाम का एक नर-पिशाच रखवाला था। वह गुलामों को दिन-रात सताया करता था। वह व्‍यक्ति माता को और मुझे फूटी-आँख न सुहाता था, पर पिता उसे चाहते और उसका विश्‍वास करते थे, इससे गुलामों को वह खूब सताता और मारता-पीटता था..."

"मैं उस समय बच्‍चा ही था, पर उसी समय से मामूली आदमियों पर मेरा बड़ा प्रेम हो गया था। मैं सदा खेत और घर के गुलामों की झोंपड़ियों में जाया करता, उनकी सब तरह की शिकायतें सुनकर आता और माता से कहता। फिर हम दोनों मिलकर उनका दु:ख दूर करने के उपाय साचते थे। हम लोगों की कोशिश से जुल्‍म कुछ कम होने लगे। हम जब कभी गुलामों का दु:ख थोड़ा भी दूर करने में सफल हो जाते, तो हमारे हर्ष की सीमा न रहती। इन सब बातों को देखकर एक दिन स्‍टव ने जाकर मेरे पिता से शिकायत की कि उससे प्रबंध नहीं हो सकेगा, उसका इस्‍तीफा मंजूर कर लिया जाए। मेरी माता पर पिता का बड़ा अनुराग था, पर वह जिस काम को आवश्‍यक समझते थे, उसमें कभी पीछे नहीं हटते थे। सो उन्‍होंने सम्‍मानसूचक पर स्‍पष्‍ट शब्‍दों में मेरी माता से कहा कि घरेलू दास-दासियों पर उनका पूरा अधिकार है, किंतु खेत के गुलामों के संबंध में उनकी कोई बात न मानी जाएगी। वह कहा करते कि मेरी माता ही क्‍या, स्‍वयं ईसा की माता मेरी भी आकर उनके काम में व्‍याघात डालें तो वह ऐसी ही खरी-खरी सुनाएँगे।"

"इसके बाद भी माता कभी-कभी पिता से स्‍टव के अत्‍याचारों की बातें कहा करती थी। पिता अवि‍चलित मन से उन बातों को सुन लेते और अंत में कह देते कि क्‍या करें, स्‍टव को नहीं छुड़ा सकते। उसके जैसा काम में होशियार और बुद्धिमान आदमी दूसरा नहीं मिलेगा। स्‍टव इतना ज्‍यादा सख्‍त भी नहीं है। यों कभी-कभी थोड़ी-बहुत सख्‍ती कर लेता है, उसके लिए उसे दोष नहीं दिया जा सकता। बिना शासन के काम बिगड़ जाता है। कहीं की शासन-प्रणाली देख लो, कोई भी निर्दोष नहीं मिलेगा। आदर्श शासन-प्रणाली इस संसार में है ही नहीं। जिनका हृदय मेरी माता की भाँति कोमल और ममतामय है, जिनकी प्रकृति महान है, वे जब चारों ओर अत्‍याचार-अविचार और दु:ख यंत्रणाएँ देखते हैं तथा उन्‍हें दूर नहीं कर सकते, तब उन्‍हें जैसी मानसिक वेदना होती है, इसका हाल अंतर्यामी के सिवा दूसरा नहीं जान सकता। वे जिसे अन्‍याय समझते हैं उसे दूसरा कोई अन्याय नहीं कहता; वे जिसे भीषण निष्‍ठुर समझते हैं, उसे दूसरे दस निष्‍ठुरता नहीं मानते। इसी से लाचार होकर वे चुपचाप अपने मन के दु:ख को मन ही में दबाए बैठे रहते हैं। इस पाप-संताप-कलुषित पृथ्‍वी पर उनका जीवन सदा दु:खों का आधार बना रहता है। मेरी माता ने जब देखा कि वह दु:खी दासों का दु:ख दूर नहीं कर सकतीं तब वह निराश हो गईं। लेकिन हम दोनों भाइयों को भविष्‍य में निष्‍ठुर न होने देने के विचार से अपने विचारों और भावों की शिक्षा देने लगीं। शिक्षा के संबंध में तुम चाहे जो कुछ क्‍यों न कहो, पर मैं समझता हूँ कि जन्‍म से मनुष्‍य की जैसी प्रकृति होती है, वह सहज में नहीं बदलती। अलफ्रेड जन्‍म से ही हुकूमत-पसंद और जात्‍याभिमानी था। उस पर माता के उपदेशों और अनुरोधों का कोई असर न होता था। मानो संस्‍कारवश अलफ्रेड की युक्तियाँ और तर्क दूसरा पक्ष समर्थन करते थे, परंतु मेरे हृदय में माता की कथनी अच्‍छी तरह जमने लगी। उनका जीता-जागता विश्‍वास और उनके हृदय की गाढ़ी भक्ति, उनके प्रत्‍येक उपदेश के साथ-साथ मेरे हृदय में प्रवेश करती थी। वह मुझे समझाया करती थीं कि 'मनुष्‍य धनी हो या दरिद्र, उसके धनी या दरिद्र होने से उसकी आत्‍मा का महत्व नष्‍ट नहीं हो जाता। एक दिन आकाश में तारे दिखाकर मुझे कहने लगीं, 'बेटा अगस्टिन! आकाश में जो लाखों तारे दिखाई दे रहे हैं, किसी समय इनका नाम-निशान मिट जाए ऐसा हो सकता है; सारा संसार भी नष्‍ट हो सकता है, और सूर्य का पूर्व से पश्चिम में उदय हो सकता है; पर एक आत्‍मा का चाहे वह कितना ही दीन और दरिद्र क्‍यों न हो, नाश नहीं हो सकता। धनी, निर्धन, पंडित, मूर्ख, सब अमर रहेंगे और मंगलमय ईश्‍वर की गोद में सदा सुख-शांति पाएँगे। प्रत्‍येक दीन-दरिद्री के लिए उसकी भुजाएँ सदा फैली रहती हैं।'…

"माता के कमरे में बहुत-सी तस्वीरें थीं। उनमें एक वह तस्वीर थी, जिसमें ईसा मसीह का अंधे को आँखें देने का दृश्‍य दिखाया गया था। उस तस्वीर को दिखाकर माता कहा करतीं, 'देखो अगस्टिन, परम धार्मिक यीशु की दीन पर कितनी दया है। वह अपने हाथों से बेचारे अंधे की सेवा-शुश्रूषा कर रहे हैं। अंधे को आराम पहुँचाने का प्रयत्‍न कर रहे हैं।' यदि मुझे अधिक दिन तक ऐसी स्‍नेहमयी दयालु जननी की छत्रछाया का सौभाग्‍य रहता तो मैं अवश्‍य उच्‍च कोटि का मनुष्‍य होता। यदि जवानी तक भी मुझे माता का साथ मिला होता तो मेरा जीवन ऐसा सुगठित हो जाता कि फिर मैं इन दास-दासियों के उद्धार के लिए अपने प्राणों की मोह-माया तज सकता था। देश-सुधार का व्रत ले सकता था। पर मेरा दुर्भाग्‍य कि मुझे तेरह वर्ष की अवस्‍था में ही उत्तर की ओर जाना पड़ा और जननी का साथ छोड़ना पड़ा। यही कारण है कि मैं जैसा चाहता था, वैसा जीवन प्राप्‍त नहीं कर सका।"

सेंटक्‍लेयर सिर पर हाथ रखकर जरा देर तक चुप रहा। वह फिर कहने लगा - "इस संसार के कामें में क्‍या कहीं सत्‍य धर्म-भाव, न्‍यायसंगत आचरण और नि:स्‍वार्थ प्रेम दिखाई पड़ता है? मैंने लड़कपन में भूगोल में पढ़ा था कि सब जगह की जलवायु भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार की होती है, इसी से भिन्‍न-भिन्‍न स्‍थानों में भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार के पेड़-पौधे होते हैं। यही हाल मनुष्‍य-समाज के आचरण और मतामत का है। जिस देश का जैसा आचार-व्‍यवहार होता है वहाँ के लोगों का, सामाजिक दशा के अनुसार, वैसा ही चरित्र बन जाता है। हमारे देश में दास-प्रथा प्रचलित है, इसी से यहाँ के लोग इस दास-प्रथा में कोई बुराई नहीं समझते। पर इंग्‍लैंडवालों के कानों में जब इस प्रथा की कठोरता की भनक पहुँचती है तब उनकी छाती दहल जाती है। इस संसार में क्‍या शिक्षित और क्‍या गँवार, अधिकतर लोग ऐसे ही होते हैं कि जिनका निज का कोई स्‍वतंत्र मत नहीं होता। वे प्रवाह के साथ बहते हैं। वे अवस्‍था के दास होते हैं। देश में प्रचलित अवस्‍था उन्‍हें जिस ओर ले जाती है उसी ओर आँख-कान बंद करके बहे चले जाते हैं…।"

"किसी विषय की भलाई-बुराई की स्‍वाधीनतापूर्वक परख करने की शक्ति उनमें नहीं होती। तुम्‍हारे पिता उत्तर की दास-प्रथा के विरोधी संप्रदाय के साथ रहते थे, इससे दासत्‍व-प्रथा के विरोधी हो गए थे; और मेरे पिता इस दास-प्रथा के चलनेवाले देश में रहते थे, इससे इस प्रथा के पक्षपाती थे। पर इस देश और संग-भेद से उत्‍पन्‍न हुई भिन्‍नता के सिवा उनमें और किसी प्रकार की भिन्‍नता नहीं थी। और बातों में उनकी प्रकृति में पूरी समता थी। दोनों में ही अपनी जाति का अभिमान था और शासन को पसंद करते थे।"

मिस अफिलिया सेंटक्‍लेयर की इस बात का प्रतिवाद करने जा रही थी, पर सेंटक्‍लेयर ने उसे रोककर कहा - "तुम जो कहना चाहती हो, उसे मैं जानता हूँ। मैं यह नहीं कहता कि वे बिल्‍कुल एक से-ही थे। मैं मुक्‍त कंठ से स्‍वीकार करता हूँ कि तुम्‍हारे और मेरे पिता के कामों में भिन्‍नता थी, पर इसमें कोई संदेह नहीं कि स्‍वभाव दोनों का एक ही-सा था। इस संसार में दो तरह के आदमी होते हैं। एक तो जो वृथाभिमान में फूलकर लोगों के साथ बात तक नहीं करते, मनुष्‍यों को मनुष्‍य नहीं गिनते; अपने को सबसे बड़ा और दूसरों को अपने से छोटा समझते हैं। और दूसरे वे जो इन सब दुर्गुणों के रहते हुए भी लोगों के सामने यह साबित करने की फिक्र में लगे रहते हैं कि उनमें अहंकार की छूत भी नहीं है। इसी लिए वे छोटे-बड़े सबका ऊपर से आदर-सत्‍कार करते हैं, खुले दिल से आत्‍माभिमानियों की निंदा करते हैं, वे भी वैसे ही कुलाभिमानी हैं जैसे पहली श्रेणी वाले। एक खुल्‍लमखुल्‍ला दूसरों से घृणा करके अपने हार्दिक अभिमान को तृप्‍त कर लेते हैं और दूसरी श्रेणीवाले वैसा अवसर न पाने के कारण अपने अभिमान को तृप्‍त करने के लिए दूसरे उपाय की शरण लेते हैं। इन दो श्रेणियों के मनुष्‍यों में जितना भेद है, उतना ही भेद तुम्‍हारे और मेरे पिता के आचरणों में भी था। तुम्‍हारे पिता जाति के अभिमान से घृणा दिखाकर हृदय के महत्‍व का परिचय देते थे और मेरे पिता हजारों मनुष्‍यों के मस्‍तक पर पैर रखकर अपनी श्रेष्‍ठता साबित करते थे। दोनों अगर लुसियाना के जमींदार होते तो बिल्‍कुल ही एक प्रकृति के होते, इसमें कोई संदेह नहीं।"

अफिलिया ने कहा - "अगस्टिन, तुम कैसे आदमी हो!"

अगस्टिन बोला - "मैं पिता या चाचा की निंदा की नीयत से ये बातें नहीं कहता, लेकिन किसी पर मेरी झूठी भक्ति भी नहीं है, विशेषकर मुझे अपने जीवन की घटनाओं के प्रसंग में इन बातों का उल्‍लेख करना पड़ा है। पर अब फिर मैं अपने रामकहानी चलाता हूँ। पिता मरते समय सारी संपत्ति हम दोनों भाइयों के लिए छोड़ गए और उसको आपस में बाँट लेने का भार हमीं लोगों पर रहा। हम दोनों भाइयों ने बड़ी सफाई से आपस में बँटवारा कर लिया। मैं कहूँगा कि आपसवालों के साथ उत्तम व्‍यवहार करने में अल्‍फ्रेड-सरीखा आदमी इस संसार में शायद ही दूसरा होगा। हम दोनों ने खेत का काम उठा लिया। थोड़े ही दिनों में अल्‍फ्रेड खेत के काम में बड़ा पक्‍का अनुभवी और पारदर्शी मनुष्‍य बन गया। पर मैंने दो वर्षों के परिश्रम से समझ लिया कि मुझसे यह काम पार नहीं पड़ेगा, क्‍योंकि कम-से-कम सात सौ कुली हमारे खेतों में काम करते थे। उन्‍हें पीट-पीटकर काम लेना, उनकी देख-रेख के लिए शैतान से बढ़कर देखभाल करनेवाला रखना, इत्‍यादि सैकड़ों तरह के ऐसे काम थे, जिनसे मुझे बड़ी घृणा थी। यह पैशाचिक व्‍यवहार मुझे असह्य हो उठा। मुझे अपनी जननी के वचनों का ध्‍यान आने लगा कि इन काले दीन-दु:खी गुलामों में भी हमारी-जैसी आत्‍मा है, ये भी उसी मिट्टी के बने हैं, जिसके हम। इन्‍हें सताने से उतना ही दु:ख मिलता है, जितना हमें। ये सब बातें सोचकर तथा दास-दासियों की यंत्रणा देखकर मेरा हृदय पिघल जाता था। मैं ईश्‍वर से प्रार्थना किया करता था कि इस पाप-भरे संसार से मुझे शीघ्र उठाकर माता के पास पहुँचा दो। भला ऐसी मानसिक दशा में क्‍या कभी किसी का काम में जी लग सकता है? धीरे-धीरे मेरे दिल में यह खयाल पक्‍का होने लगा कि इन गुलामों का सत्‍यानाश हम लोगों के हाथों से हो रहा है। ईश्‍वर ने इन्‍हें मनुष्‍य बनाया है, पर हमने इन्‍हें पशुओं से बदतर बना डाला है। वास्‍तव में ऐसी पराधीन अवस्‍था में रहकर मनुष्‍य क्‍या मनुष्‍यत्‍व को पहुँच सकता है? मनुष्‍य की स्‍वाधीन इच्‍छा में बाधा पड़ते ही वह मनुष्‍यत्‍व-विहीन हो जाता है। यह सब सोचते-सोचते मैंने खेत का काम छोड़ने का संकल्‍प कर लिया।"

अफिलिया ने कहा - "अगस्टिन, मेरा सदा से यह विश्‍वास था कि तुम सब लोग दास-प्रथा को बाइबिल से सिद्ध सचाई मानते हो। और तुम लोगों की दृष्टि में दास-प्रथा ईश्‍वरीय विधान है।"

अगस्टिन बोला - "हम लोगों का अभी यहाँ तक पतन नहीं हुआ है। अल्‍फ्रेड इतना सख्‍त आदमी है कि बाध्‍य होने पर दासों की जान लेने में संकोच नहीं करता। दासों को किसी प्रकार के मानुषिक अधिकार हैं - इस बात तक को वह स्‍वीकार नहीं करता, किंतु इस दास-प्रथा को तो वह भी बाइबिल-अनुमोदित या ईश्‍वर-सम्‍मत विधान नहीं समझता। इस विषय में उसका यह मत है कि जब तक एक श्रेणी के मनुष्‍य आत्‍मविहीन होकर पशुओं की भाँति काम न करें, तब तक मनुष्‍य-समाज की उन्‍नति नहीं होती, संसार की सभ्‍यता आगे नहीं बढ़ती। उसका कथन है कि मनुष्‍य-समाज के अधिकार उन्‍नत बनाने के लिए बलवान और बुद्धिमानों का निर्बल मूर्खों पर प्रभुत्‍व रहना आवश्‍यक है, अपने इस मत के समर्थन में वह कह सकता है कि दास-प्रथा कहाँ नहीं, सारे विश्‍व में तो छाई हुई है। अमरीका के जमींदार अपने गुलामों से जैसा सख्‍त बर्ताव करते हैं, इंग्‍लैंड के बड़े आदमी और महाजन लोग दूसरी तरह से अपने देश के मजदूरों से ठीक वैसा ही व्‍यवहार करते हैं कि मानव-समाज की व्‍यवस्‍था को ध्‍यान से देखने पर पता चलता है कि जब तक एक श्रेणी के लोगों का दासत्‍व न करें तब तक किसी प्रकार सामाजिक-उन्‍नति और सभ्‍यता का विकास संभव नहीं है। उसके मतानुसार संसार की समता-वृद्धि के लिए निर्बल और मूर्खों को सदा बलवान और बुद्धिमानों के अधीन रहना पड़ेगा; आजन्‍म उन्‍हें पशुवत्-कार्य करना पड़ेगा और बलवान तथा बुद्धिमानों के आराम के लिए अपने शरीर को कष्‍ट देना पड़ेगा। पर मैं अल्‍फ्रेड की इन युक्तियों में सार नहीं देखता। स्‍वार्थी मनुष्‍य ही अपने मन को समझाने के लिए ऐसी युक्तियों का सहारा लेते हैं।"

अफिलिया बोली - "भला इंग्‍लैंड के मजदूरों के साथ तुम्‍हारे यहाँ के गुलामों की तुलना कैसे हो सकती है? तुम्‍हारे यहाँ की तरह न वे बेचे ही जाते हैं, न उनका सौदा ही किया जाता है, और न वे अपने कुटुंब से अलग ही किए जाते हैं। उन्‍हें दोष भी नहीं लगाए जाते।"

अगस्टिन ने कहा - "बहन, हम कोड़ों की मार से गुलामों को मारते हैं, पर इंग्‍लैंडवाले क्‍या करते हैं कि मजदूरों का सारा धन चूसकर उन्‍हें भूखों मारते हैं। हम लोग गुलामों के बाल-बच्‍चों को उनके माता-पिता से अलगकर बेचते हैं; पर इंग्‍लैंड के मजदूरों के बाल-बच्‍चे बिना भोजन के भूखों मरते हैं। इसमें कौन बुरा और अच्‍छा है, यह नहीं कहा जा सकता।"

अफिलिया ने कहा - "पर तुम्‍हारी इस युक्ति से दास-प्रथा का पाप दूर नहीं होता। दूसरी जगह कोई बुराई होती हो, तो क्‍या उसका उल्‍लेख करके तुम अपने यहाँ के अत्‍याचार का समर्थन कर सकते हो?"

अगस्टिन बोला - "मैंने दास-प्रथा के समर्थन के अभिप्राय से इस विश्‍वव्‍यापी अत्‍याचार का उल्‍लेख नहीं किया। मैंने तो उन्‍हीं युक्तियों को दोहराया है, जिनके बल पर अल्‍फ्रेड दास-प्रथा का समर्थन करता है। मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि हमारे यहाँ की गुलामी की चाल हद से ज्‍यादा घृणित है। यह भी सही है कि अन्‍य देशों में निम्‍न श्रेणी के मनुष्‍यों पर जो अत्‍याचार होते हैं, उनसे हजार गुना भारी अत्‍याचार और उत्‍पीड़न हमारे यहाँ के गुलामों को सहना पड़ता है। हमारे देश के गोरे इन कालों को निरा पशु समझते हैं। क्रीत-दासियों के गर्भ से संतान पैदा करके उन्‍हें भेड़-बकरियों की भाँति बेचते हैं। ऐसा हृदय कँपानेवाला व्‍यापार और कहीं नहीं दिखाई पड़ता। और देशों में निर्बल को सताने के लिए छल-बल की दरकार होती है, पर यहाँ कोई जरूरत नहीं। जैसे जी चाहे, निर्बल को सताया जा सकता है, उनके प्राण तक लेने में कोई कानून किसी तरह की बाधा नहीं डालता।"

अफिलिया ने कहा - "आज मैंने दास-प्रथा के संबंध में तुमसे बहुत-सी नई बातें सुनीं। मैंने इस विषय में कभी इतना नहीं सोचा था।"

अगस्टिन बोला - "मैंने इंग्‍लैंड के अनेक स्‍थानों की सैर करके वहाँ की निचली श्रेणी के लोगों की अवस्‍था का खूब अनुभव किया है। उनकी दुर्दशा देखकर हृदय पिघल जाता है। अल्‍फ्रेड सदैव बड़े अहंकार से कहा करता है कि उसके गुलाम इंग्‍लैंड के मजदूरों से अधिक सुखी हैं। वह सचमुच अपने दास-दासियों को खाने-पहनने का कष्‍ट नहीं देता। यों उसकी प्रकृति बहुत कठोर भी नहीं है। कोई उसका कहा नहीं मानता, तभी वह आग-बबूला होकर उसकी जान तक लेने में नहीं हिचकता। उसके कहे पर चलने से वह किसी को कभी नहीं पीटता। जब हम दोनों भाई साथ-साथ खेत का काम करते थे तब मैंने अल्‍फ्रेड से बड़ा अनुरोध किया कि इन दास-दासियों की शिक्षा के लिए एक पादरी रख दो। अल्‍फ्रेड का खयाल था कि कुत्ते-बिल्लियों के लिए पादरी रखने से जो नतीजा होता है, वही इन गुलामों के लिए पादरी रखने से होगा। फिर भी उसने मेरी प्रसन्‍नता की खातिर गुलामों की शिक्षा के वास्‍ते एक पादरी रख दिया। हर रविवार को पादरी साहब आकर उन्‍हें धर्म-शिक्षा दिया करते थे, लेकिन गुलामी में पड़े-पड़े इन गुलामों की आत्‍माएँ जड़ हो गई हैं। अच्‍छे-अच्‍छे उपदेश और शिक्षा का इनके जड़ हृदय पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ता। बहन, तुम मुझे इन गुलामों को शिक्षा देने के संबंध में अक्‍सर कहा करती हो। लेकिन मैं तुमसे कहता हूँ कि जब तक इन्‍हें गुलामी की जंजीर मुक्‍त करके स्‍वाधीनता नहीं दी जाएगी, तब तक इन्‍हें शिक्षा देने का कोई नतीजा न होगा। इनमें कुछ धर्म जीवित जरूर दीखता है, पर उस धर्म-भाव में किसी प्रकार की वीरता व निर्भीकता का भाव नहीं है। यह भयभीत प्रकृति से उत्‍पन्‍न धर्म है।"

अफिलिया बोली - "हाँ, तुमने खेती के काम से कब संबंध छोड़ा, सो तो बताया ही नहीं।"

अगस्टिन ने कहा - "हाँ, दो बरस तक मैंने अल्‍फ्रेड के साथ खेत का काम किया। पर इतने दिनों के अनुभव से ही मुझे मालूम हो गया कि मेरे लिए यह काम बड़ा मुश्किल है और अल्‍फ्रेड ने भी जान लिया कि मुझसे कोई काम नहीं होता। मेरे संतोष के लिए वह कुलियों को नाना प्रकार की सुविधाएँ भी देने लगा, पर मेरा मन किसी तरह राजी न हुआ। मुख्‍य बात यह थी कि मैं कुलियों के साथ जैसा बर्ताव करने को कहता था, वैसा करने से काम में पूरी हानि होने की संभावना थी। मैं कुलियों से पशुओं की भाँति काम लेना बिल्‍कुल नहीं चाहता था। मनुष्‍य को पशु बनाकर धन बटोरने की फिक्र करना मुझे अत्‍यंत घृणित मालूम होने लगा। मैं स्‍वयं बड़ा आलसी हूँ, इससे स्‍वभावत: मुझे आलसी कुलियों पर भी तरस आ जाता था। आलस्‍य करने पर भी मैं उन्‍हें कभी मारने नहीं देना चाहता था। ऐसी दशा में मैंने सोचा तो यही उचित जान पड़ा कि मुझसे कुछ होना-जाना तो है नहीं, मेरे द्वारा अल्‍फ्रेड के काम में उल्‍टे और अड़चन पड़ती है, इससे उस काम को मैंने बिल्‍कुल छोड़ दिया। अल्‍फ्रेड ने सब खेत ले लिए और मैंने मकान और नकद संपत्ति ले ली।"

अफिलिया बोली - "इसके बाद फिर अपने दासों को तुमने क्‍यों नहीं छोड़ दिया?"

अगस्टिन ने कहा - "मेरा दिल इतना ऊँचा नहीं था। मैंने सोचा कि इन्‍हें रुपए कमाने की कल न बनाना ही काफी है, घर रखकर इनका भरण-पोषण करने से कोई दोष न होगा, खासकर इनमें से बहुतेरे हमारे पुराने नौकर हैं। मैं उन्‍हें बहुत चाहता था, और वे भी मुझे बहुत चाहते थे। जिन नए लोगों को तुम देखती हो, ये सब उन्‍हीं पुराने गुलामों के वंशज हैं। ये हमारे घर से किसी तरह हटना नहीं चाहते। ये यहीं पैदा हुए, यहीं बड़े हुए, इससे मुझसे इनकी बड़ी ममता हो गई है। बहन, मेरे जीवन में भी कोई समय था जब मैं बड़े-बड़े खयाली पुलाव बनाता था। मैं सोचा करता था कि इस संसार में मैं कुछ-न-कुछ करूँगा जरूर। यों ही निकम्‍मा जीवन नहीं बिताऊँगा। देश-सुधारक बनकर जन्‍म-भूमि से दास-प्रथा का कलंक दूर करने की मेरी बड़ी इच्‍छा थी, पर कोई भी इच्‍छा पूरी न हुई। जान पड़ता है, युवावस्‍था में सबके मन में ऐसी ही तरंगे उठा करती हैं। पर जब संसार की बेड़ी पाँव में पड़ जाती हैं तो जवानी के सब मंसूबे जहाँ-के-तहाँ रह जाते हैं।"

अफिलिया ने पूछा - "तुमने अपने जीवन के इस महान उद्देश्‍य को छोड़ क्‍यों दिया? अभी क्‍या बिगड़ा है। अब से तुम अपने उद्देश्‍य को पूरा करने के लिए यत्‍न कर सकते हो।"

अगस्टिन बोला - "युवा-अवस्‍था के आरंभ में ही मेरी आशा-लता पर पाला पड़ गया। मैं जैसे जीवन की आशा करता था, उसे प्राप्‍त नहीं कर सका। इसी से किसी काम में मेरा उत्‍साह नहीं रह गया। अब तो घटना-स्रोत के साथ बह रहा हूँ। पूर्णरूप से अवस्‍था का दास बन गया हूँ। संसार की वर्तमान अवस्‍थाओं और घटनाओं के पीछे खिंचा चला जा रहा हूँ। सच तो यह है कि अल्‍फ्रेड मुझसे सौगुना मजे में है। वह अर्थ-संग्रह को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्‍य समझता है और अपने उसी विश्‍वास के अनुसार काम भी कर रहा है। पर मेरा जीवन व्‍यर्थ ही जा रहा है। वही मसल हुई कि 'धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का'।"

अफिलिया ने कहा - "भैया, यों लक्ष्‍यहीन जीवन बिताकर क्‍या तुम शांति प्राप्‍त कर सकते हो?"

"शांति! कहाँ है शांति? अपने इस पाप-भरे जीवन में मुझे स्‍वयं से घृणा है। अपने आचरण और व्‍यवहार से मैं स्‍वयं संतुष्‍ट नहीं हूँ। ईश्‍वर से प्रार्थना करता हूँ कि शीघ्र ही यहाँ से उठाकर जननी से मिला दे। मैं इस दास-प्रथा के संबंध में कभी अपना मत प्रकट नहीं करता, पर आज तुमने बड़े आग्रह से बार-बार पूछा, तब मुझे अपने मन की इतनी बातें तुमसे कहनी पड़ीं। इस देश में ऐसे बहुत से आदमी हैं, जो मेरी ही तरह गुलामी की प्रथा से हृदय से घृणा करते हैं। इस प्रथा के कारण सारे देश का सत्‍यानाश हुआ जा रहा है। तरह-तरह के पाप और व्‍यभिचार हमारे समाज में घुसते जाते हैं। नैतिक वायु दूषित होकर नाना प्रकार के मानसिक रोग उत्‍पन्‍न कर रही है। इस घृणित दास-प्रथा के कारण गुलामों का ही बुरा नहीं हो रहा है, बल्कि जो लोग इन्‍हें अपने घर में रखते हैं, इन पर प्रभुत्‍व करते हैं, उनकी इनसे भी अधिक क्षति हो रही है। मानसिक रोग भी, कई शारीरिक रोगों की भाँति, संक्रामक होते हैं। इन गुलामों की गिरी हुई मानसिक अवस्‍था संक्रामक रोग की भाँति हमारे सभ्‍य समाज का नाश कर रही है। यह निश्चित बात है कि जहाँ कहीं अथवा जिस किसी जाति में किसी एक श्रेणी के लोग बिल्‍कुल गिरी हुई दशा में जीवन बिताते हैं, वहाँ अथवा उस जाति के सब लोगों की अंतरात्‍माएँ उन गिरी हुई दशावाले लोगों की छूत से धीरे-धीरे कलुषित हो जाती हैं। समाज में एक श्रेणी के लोगों की अव‍नति दूसरी श्रेणी के लोगों को भी अवनति की ओर आकर्षित करती है। पर हमारे यहाँ इन गुलामों की गिरी हुई अवस्‍था सभ्‍य लोगों के जीवन को जितना कलुषित करती है, वैसी दशा और कहीं नहीं है। कारण यह है कि हमें दिन-रात इनके साथ रहना पड़ता है, क्‍योंकि इन्‍हें आठ पहर चौंसठ घड़ी घर में ही रखना पड़ता है, पर इंग्‍लैंड में यह बात नहीं। वहाँ गरीब मजदूरों के साथ रईस, जमींदार और महाजनों को रहना नहीं पड़ता। वहाँ काम लिया, दाम लिया और छुट्टी। यहाँ तो ये दिन-रात घर में बने रहते हैं। इसलिए इनके जीवन के बुरे उदाहरण, इनसे मालिकों का कठोर व्‍यवहार हमारे बाल-बच्‍चे दिन-रात देखते रहते हैं। इन बुरे उदाहरणों का प्रभाव उनके जीवन पर पड़े बिना नहीं रह सकता। इससे उनके चरित्र बिगड़ जाते हैं और मन विकृत हो जाते हैं। इवा यदि जन्‍म से ही देव-बाला सरीखी निर्मल प्रकृति की न होती तो अवश्‍य इनके साथ बरबाद हो जाती। हैजे के रोगी के पास रहने से जैसे हैजा होने का डर रहता है, वैसे ही इन्‍हें घर में रखकर सदैव अपना बुरा होने का डर है। हमारे यहाँ के राज-कर्मचारी इन्‍हें शिक्षित नहीं बनाना चाहते। वे कहते हैं कि शिक्षा पाते ही इनकी आँखें खुल जाएँगी और फिर ये तत्‍काल अपनी स्‍वाधीनता के लिए विद्रोही बन खड़े होंगे। पर इन अक्‍ल के अंधों को यह बात नहीं सूझती कि शिक्षा पाने से तो ये स्‍वाधीनता के लिए विद्रोही होंगे और दासता की बेड़ी काटने की चेष्‍टा करेंगे, पर बिना शिक्षा के कौन-सी भलाई हो रही है? भीतर-ही-भीतर उससे भी अधिक नाश हुआ जा रहा है, इसका उन्‍हें ख्‍याल ही नहीं। सचमुच इन कानून बनानेवालों और वकीलों से मनुष्‍य-समाज का जितना नुकसान हो रहा है, उतना और किसी श्रेणी के लोगों से नहीं।"

अफिलिया बोली - "गुलामी की इस प्रथा का अंतिम परिणाम क्‍या होगा?"

अगस्टिन ने कहा - "पता नहीं। पर एक बात निश्चित है; इनकी आँखें खुल रही हैं और इनकी दृष्टि स्‍वाधीनता की ओर बढ़ रही है। स्‍पष्‍ट दिखाई दे रहा है कि थोड़े ही दिनों में बड़ा भारी सामाजिक विप्‍लव होनेवाला है। संसार के सभी देशों में निम्‍नश्रेणी के लोगों में नवजीवन का संचार दिखाई दे रहा है। मेरी माता कभी-कभी कहा करती थी कि जगत में शीघ्र ही स्‍वर्ग का राज्‍य होगा। उस समय ईसा मुकुट धारण करके इस संसार में राज्‍य करेंगे। तब संसार में दु:ख, कष्‍ट और यंत्रणा का नाम भी न रहेगा। सारे संसार में शांति छा जाएगी। मेरी माता ने जो प्रार्थना मुझे सिखलाई थी, उसमें यह वाक्‍य भी था-'हे पिता! संसार में आपका राज्‍य हो।' कभी-कभी मैं इन बेचारे गुलामों की आहें और उत्तेजित भाव देखकर, सोचता हूँ कि अब शीघ्र ही संसार में वह राज्‍य होनेवाला है। पिछले फ्रांसीसी विप्‍लव की आलोचना करने से सहज ही मालूम हो जाता है कि संसार में बहुत थोड़े ही दिनों में समानाधिकार की दुंदुभि बजनेवाली है।"

अफिलिया ने अपना बुनने का काम छोड़कर कहा - "मैं तो कभी-कभी सोचती हूँ कि तुम इसी स्‍वर्ग-राज्‍य में विचरते हो।"

अगस्टिन बोला - "हाँ, मेरी बातों से यही जान पड़ेगा, पर कार्य देखकर मालूम होगा कि मैं घोर नरक में पड़ा हुआ हूँ।"

ये बातें हो ही रही थीं कि भोजन की घंटी हुई।

भोजन के समय मेरी ने प्रू की घटना का उल्‍लेख करके कहा - "दीदी, मैं समझती हूँ कि तुम हम सब लोगों को जंगली जानवर समझती हो।"

अफिलिया बोली - "प्रू के साथ जैसा व्‍यवहार हुआ है, उसे मैं अवश्‍य पशु-तुल्‍य व्‍यवहार समझती हूँ। लेकिन मैं तुम सब लोगों को जंगली जानवर नहीं समझती।"

मेरी ने कहा - "तुम्‍हें नहीं मालूम कि इस गुलाम-जाति में कोई-कोई ऐसे पाजी होते हैं कि वे किसी तरह वश में नहीं आते। ऐसे पाजियों का मरना ही भला है। मुझे ऐसे लोगों से जरा भी हमदर्दी नहीं होती। मालिक के कहने पर चलें और भले बनने का यत्‍न करें तो इन लोगों को मार खाकर कभी न मरना पड़े।"

इवा ने कहा - "माँ, वह बेचारी बड़ी दु:खी थी। अपना दु:ख भूले रहने के लिए शराब पीती थी।"

मेरी बोली - "तू रहने दे दु:ख की बातें। दास-दासियों को दुख क्‍या? मैं तो दिन-रात शारीरिक दु:ख में पड़ी रहती हूँ, पर शराब नहीं पीती। मुझसे अधिक दुख उसे क्‍या होगा? पर सच तो यह है कि गुलामों की जाति बड़ी पाजी होती है। कितने तो ऐसे भी होते हैं कि हजार बेंत मारो, तब भी वे सीधे नहीं होते। मुझे याद है कि मेरे पिता के यहाँ एक गुलाम बड़ा ही आलसी था। वह काम से बहाना करके दलदल में रहता था। चोरी करता था, और भी कितने ही बुरे-बुरे काम करता था। उस पर बहुत मार पड़ती, पर उसका चाल-चलन तनिक भी न सुधरा। अंत में एक दिन कोड़ों की मार से उसकी चमड़ी उधड़ गई, फिर भी वह भटकते-भटकते दलदल में चला गया और वहीं मर गया। अब कोई क्‍या करे, पिता तो दासों के साथ बड़ी दया का बर्ताव करते थे।"

सेंटक्‍लेयर ने कहा - "मैंने एक बार बदमाश गुलाम को सीधा किया था। कितने ही मालिक और खेतों की देखभाल करनेवाले उससे हार चुके थे।"

मेरी बोली - "अच्‍छा, बताओ, तुमने भी इस जन्‍म में कभी कोई ऐसा काम किया था?"

सेंटक्‍लेयर ने कहा - "मैंने जिसे वश में किया था वह आदमी बड़ा बलवान था, सूरत-शक्‍ल में दैत्‍स-सा था। बड़ा स्‍वतंत्रता-प्रिय और तेजस्‍वी था। किसी से नहीं दबता था। ठीक अफ्रीकी सिंह-सा था। लोग उसे सीपिओ कहते थे। बहुतों के हाथ के नीचे वह रहा, पर किसी से सीधा न हुआ। अंत में अल्‍फ्रेड ने उसे खरीदा, क्‍योंकि उसने सोचा कि वह उसे दुरुस्‍त कर लेगा। एक दिन सीपिओ खेत के ओवरसियर को लात मारकर जंगल में भाग गया। मैं उसी समय अल्‍फ्रेड से मिलने गया था। यह बात मेरे खेत का साझा छोड़ देने के बाद की है। इस घटना से अल्‍फ्रेड बड़ा क्रुद्ध हो रहा था। मैंने उससे कहा कि उसके निज के दोष से ऐसा हुआ है। मैं उसे सहज ही वश में कर सकता हूँ। और यह तय हुआ कि उसे पकड़कर दुरुस्‍त होने के लिए मुझे सौंप दिया जाएगा। उसे पकड़ने के लिए पाँच-छ: आदमी, शिकारी कुत्ते और बंदूकें लेकर चले। हिरन का शिकार करने में मनुष्‍य जैसे उत्‍साही रहता है, वैसा ही मनुष्‍य का शिकार चालू रहने पर शिकार में भी मनुष्‍य का उत्‍साह हो जाता है। मैं भी थोड़ा उत्‍साही हो गया था, पर मेरा भाव उसे शिकारियों से बचाकर ही वश में करने का था। खैर, हम लोगों के इस दल ने उसका पीछा किया। कुछ देर तक तो वह भागा और उछला, पर थोड़ी ही देर में एक बेंत के झाड़-झंकार में उलझ गया और पकड़ा गया। तब उसने घूंसों से लड़ना आरंभ किया, और मैं तुमसे कहता हूँ कि वह बड़ी ही भयंकरता से लड़ा। उसने केवल घूंसों की मार से तीन कुत्तों को मार गिराया, पर अंत में हम लोगों की गोली की चोट खाकर वह धरती पर, मेरे पैरों के पास, गिर पड़ा। उसका सारा शरीर लहू-लुहान हो गया। उसने आँख उठाकर मेरी ओर देखा। उसकी आँखों में वीरता की ज्‍योति और निराशा का अंधकार, दोनों दिखाई पड़ते थे। मैंने अल्‍फ्रेड के आदमियों को उसे मारने से मना किया और मैं अल्‍फ्रेड से उसे खरीदकर ले आया। यहाँ वह पंद्रह दिन में ही इतना सीधा हो गया कि मेरे लिए जान तक दे सकता था।"

मेरी ने कहा - "तुमने उस पर ऐसा कौन-सा जादू कर दिया था?"

सेंटक्‍लेयर बोला - "मुझे उसके लिए कुछ अधिक नहीं करना पड़ा। मैं उसे साथ लेकर अपने निजी कमरे में गया और उसके लिए अच्‍छा बिछौना लगा दिया, उसकी मरहम-पट्टीकर दी और अपने हाथों से उसकी सेवा करता रहा। जब वह ठीक हो गया, तब मैंने उसे मुक्ति-पत्र देकर कहा कि जहाँ जी चाहे, वहाँ चला जा।"

अफिलिया ने पूछा - "क्‍या वह चला गया?"

सेंटक्‍लेयर ने जवाब दिया - "नहीं। उस मूरखराज ने उस कागज के दो टुकड़े करके फेंक दिए और मुझे छोड़कर जाने से इनकार कर दिया। ऐसा सा‍हसी और विश्‍वासी नौकर मुझे फिर कभी नहीं मिला। थोड़े दिनों बाद वह ईसाई हो गया, और बच्‍चों की तरह सीधा हो गया। एक बार हैजे का बड़ा प्रकोप हुआ। मैं भी उसके चक्‍कर में आ गया। उस समय उसने मेरे लिए अपनी जान की बाजी लगा दी, क्‍योंकि मेरे बचने की आशा न देखकर घर के जितने लोग थे सब भाग गए, पर वह निर्भीक होकर जी-जान से मेरी सेवा करता रहा। उसी के यत्‍न और परिश्रम से मैं जीवित बच गया। पर अफसोस, कुछ ही दिनों बाद उसे भी हैजा हो गया और बहुत कोशिश करने पर भी वह मृत्‍यु के पंजे से न बच सका। उसकी मृत्‍यु से मुझे जितना दु:ख हुआ, उतना कभी नहीं हुआ।"

सेंटक्‍लेयर जब ये बातें कह रहा था, उस समय इवा धीरे-धीरे उसके पास आकर खड़ी हो गई थी। वह बड़ी उत्‍सुकता से आँखें फाड़कर एकाग्रता से पिता की ओर देख रही थी। सेंटक्‍लेयर की बात समाप्‍त होते ही वह उससे लिपटकर रोने लगी। उसका सारा शरीर काँपने लगा।

सेंटक्‍लेयर ने कहा - "इवा, प्‍यारी बच्‍ची, क्‍या हुआ?" और फिर कहा - "तुमको ये बातें नहीं सुननी चाहिए। तुम बहुत ही कमजोर हो।"

तब इवा ने आत्‍मसंयम करके कहा - "नहीं बाबा, मैं कमजोर नहीं हूँ; पर ये बातें मेरे हृदय में बहुत चुभती हैं।"

सेंटक्‍लेयर बोला - "इवा बेटी, तुम्‍हारे कहने का क्‍या मतलब है?"

इवा ने कहा - "बाबा, मैं तुम्‍हें समझा नहीं सकती। मेरे मन में बहुतेरे विचार चक्‍कर लगाया करते हैं। शायद किसी दिन मैं तुमसे कहूँगी।"

सेंटक्‍लेयर ने कहा - "बेटी, चाहे जितना सोचती-विचारती रहो, केवल रोकर अपने बाबा का जी मत दुखाना। लो, यह देखो, तुम्‍हारे लिए मैं कैसा सेब लाया हूँ।"

पिता के हाथ से सेब लेकर इवा मुस्‍कराई, किंतु उस समय भी उसके होठ काँप रहे थे। सेंटक्‍लेयर उसका हाथ पकड़कर उसे बरामदे में ले गया और तरह-तरह की चीजें दिखाकर उसे बहलाने लगा। कुछ ही क्षणों के बाद दोनों को हँसी सुनाई दी, मानो दोनों खेल रहे हों।

बड़ों की बातें कहते-कहते हम अपने मित्र टॉम की बात भूले जा रहे हैं, पर यदि आप हमारे साथ अस्‍तबल की कोठरी में चलें तो टॉम की कुछ खबर पा सकते हैं। टॉम की यह कोठरी बहुत ही साफ-सुथरी है। उसमें एक चारपाई, एक कुर्सी और एक मेज रखी है। उस पर एक बाइबिल और भजनों की एक पुस्‍तक है। टॉम इसी कोठरी में बैठा हुआ किसी गहरी चिंता में डूबा है। सामने एक स्‍लेट है। स्‍त्री, पुत्र और कन्‍या आदि के लिए उसका मन व्‍याकुल हो रहा है। उनका समाचार जानने के लिए उसने इवा से चिट्टी लिखने का एक कागज माँग लिया है और पत्र लिखने के कठिन काम में जुट गया है। पहले के मालिक के लड़के जार्ज से टॉम ने थोड़ा-थोड़ा लिखना सीखा था; लेकिन सब अक्षर अब उसे याद नहीं हैं। जो याद हैं, उनमें भी कोई कहाँ लिखना चाहिए, यही समझ में नहीं आता। टॉम बड़ी कठिनाई से स्‍लेट पर पत्र-रचना कर रहा था, इसी समय चिड़ियों की तरह फुदकती हुई इवा चुपके से आकर उसके पीछे खड़ी हो गई और कंधे पर से झाँककर बोली - "अहा टॉम काका! यह तुम क्‍या तमाशा कर रहे हो?"

टॉम ने कहा - "मिस इवा! मैं अपनी बेचारी बुढ़िया पत्‍नी तथा अपने छोटे बच्‍चों को पत्र लिखने की कोशिश कर रहा हूँ, पर मैं देखता हूँ कि यह काम मुझसे होगा नहीं।"

इवा ने कहा - "टॉम, मैं तुम्‍हारी सहायता करना चाहती हूँ। मैंने कुछ लिखना सीखा था। पिछले साल मैं सब अक्षर जानती थी, पर जान पड़ता है, अब मैं सब भूल गई हूँ।"

इसके बाद दोनों पास बैठकर एक मन से पत्र लिखने में लग गए। दोनों की विद्या की दौड़ बराबर ही है। बड़े परिश्रम और एक-दूसरे से सलाह करने के बाद एक-एक शब्‍द लिखा जाने लगा। अंत में इवा ने उत्‍साह से कहा - "टॉम काका, खूब अच्‍छी चिट्ठी बन गई। तुम्‍हारी पत्‍नी और बच्‍चे इसे पाकर बड़े खुश होंगे। ओह, बड़े दु:ख की बात है कि इन लोगों को छोड़कर तुम्‍हें आना पड़ा। मैं किसी दिन बाबा से कहूँगी कि वह तुम्‍हें उन लोगों के पास लौट जाने दें।"

टॉम ने कहा - "मेरी मालकिन ने कहा है कि रुपया जुटते ही वह मुझे फिर खरीद लेंगी। मालिक के बेटे जार्ज ने कहा है कि वह खुद आकर मुझे ले जाएँगे। यह देखो, उन्‍होंने अपनी याद की निशानी के रूप में मुझे यह मुद्रा दी है।"

उसने कपड़ों के भीतर से मुद्रा निकालकर दिखलाई।

इवा बोली - "हाँ-हाँ, तब वह जरूर आकर तुम्‍हें ले जाएँगे। मुझे बड़ी खुशी होती है।"

टॉम ने कहा - "इसी से मैं पत्र लिखकर उन्‍हें अपना पता बता देना चाहता हूँ और अपनी कुशल लिख देना चाहता हूँ। इससे मेरी पत्‍नी लोई को बड़ा संतोष होगा। चलते समय वह मेरे लिए बहुत रोई थी।"

इतने में सेंटक्‍लेयर ने दरवाजे से आते हुए आवाज दी - "टॉम!"

टॉम और इवा दोनों चौंक पड़े।

सेंटक्‍लेयर ने अंदर आकर और स्‍लेट देखकर कहा - "क्‍या हो रहा है यह?"

इवा बोली - "यह टॉम की चिट्ठी है। मैं लिखने में इसकी मदद कर रही हूँ। क्‍या यह अच्‍छी बात नहीं हुई?"

सेंटक्‍लेयर ने कहा - "मैं तुम्‍हारा साहस भंग नहीं करना चाहता। पर मेरी समझ में अच्‍छा होता कि टॉम मुझसे चिट्ठी लिखवा लेता। मैं घूमकर आऊँगा तो लिख दूँगा।"

इवा बोली - "यह जरूर चिट्ठी लिखवाएगा क्‍योंकि उसकी मालकिन ने उसे रुपया भेजकर फिर खरीद लेने का वादा किया है। वह अभी मुझे बता रहा था।"

सेंटक्‍लेयर ने मन-ही-मन सोचा कि यह केवल फुसलाने की बात है। जो लोग कुछ दयालु होते हैं, वे दासों को बेचने के समय ऐसी ही बातें कहकर झूठमूठ उसे समझा देते हैं। लेकिन उसने मुँह से कुछ कहा नहीं, केवल टॉम को घोड़ा कस लाने की आज्ञा दी।

शाम को लौटकर सेंटक्‍लेयर ने टॉम की चिट्ठी लिखकर डाक में डलवा दी।

इधर मिस अफिलिया घर के कामों में लगी रहती थी। दीना से लेकर दास बच्‍चे तक सब कहते थे कि मिस अफिलिया अजब किसम की स्‍त्री है, क्‍योंकि उसके नियमों के कारण सब तंग आ रहे थे।

उच्‍च श्रेणी के दास-दासियों अर्थात् एडाल्‍फ, रोजा और जेन की तो राय थी कि वह भली औरत नहीं है, क्‍योंकि उसके हावभाव बड़े आदमियों के-से नहीं हैं। इस पर उन्‍हें बड़ा अचरज होता था कि वह सेंटक्‍लेयर की चचेरी बहन है। मेरी का कहना था कि अफिलिया दीदी जिस तरह दिन-रात काम में जुटी रहती हैं, उसे देखने से ही आदमी को थकावट हो जाती है।


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