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उपन्यास

टॉम काका की कुटिया
हैरियट वीचर स्टो

अनुवाद - हनुमान प्रसाद पोद्दार

अनुक्रम 8. पकड़नेवालों की तैनाती पीछे     आगे

संध्‍या से पहले ही इलाइजा नदी पार करके दूसरे किनारे पहुँच गई। धीरे-धीरे अँधेरा छा गया। इससे अब वह हेली को दिखाई न पड़ी। हेली निराश होकर सराय में वापस चला आया। उस घर में अकेला बैठा-बैठा अपने भाग्‍य को कोसता हुआ मन-ही-मन कहने लगा - "इस संसार में न्‍याय नहीं है। यदि न्‍याय होता तो मेरे इतने रुपयों का नुकसान क्‍यों होता?"

इसी समय वहाँ दो आदमी और आ गए। उनमें एक ज्‍यादा लंबा था। उसके चेहरे से निर्दयता टपकती थी। जान पड़ता था, मानो नरक का द्वारपाल है। उसके कपड़े और चाल-ढाल भी इसी बात की गवाही दे रहे थे। उसे देखकर हेली बहुत संतुष्‍ट हुआ। बोला - "लोकर, आज तो तुम बड़े मौके से आए।"

इस आदमी का नाम टॉम लोकर था। पहले हेली इसके साझे में काम करता था। लोकर के दूसरे साथी कद का नाटा था। उसका नाम था मार्क। हेली ने उसे देखकर पूछा - "लोकर, यह आदमी तुम्‍हारा साझीदार जान पड़ता है।"

इस पर लोकर ने हेली और मार्क दोनों का आपस में परिचय करा दिया। फिर वह तीनों व्यवस्थापिका-सभा के मेंबरों की भाँति मेज पर बैठ गए। पहले हेली ने अपनी दु:ख-कहानी बड़े करुण शब्‍दों में आरंभ की। बार-बार वह अपने भाग्‍य को कोसकर कहने लगा - "औरत की जाति बड़ी दुष्‍ट होती है। उसे न्‍याय-अन्‍याय का जरा भी विचार नहीं होता। हमने कितने रुपए देकर तो उसके छोकरे को खरीदा और वह औरत एक छोकरे की माया न तज सकी। देखो, उस औरत ने कितना अन्‍याय किया है? वह छोकरे को लेकर भाग गई!"

हेली की बातें सुनकर लोकर का साथी मार्क बड़ी गंभीरता से अपना मंतव्‍य प्रकट करने लगा - "आजकल खेती-बाड़ी, वाणिज्‍य, शिल्‍प और विज्ञान आदि सभी विभागों में नए-नए आविष्‍कार हो रहे हैं। यदि संतान की मोह-माया न रखनेवाली जाति की स्त्रियों को पैदा करने की कोई कल निकल आए तो उससे संसार का बड़ा भला हो और सब भाँति के आविष्‍कारों की अपेक्षा ऐसी स्त्रियाँ पैदा करने का आविष्‍कार सबसे अधिक उपयोगी होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।"

हेली ने उसका हृदय से अनुमोदन करके कहा - "तुम बहुत ठीक कहते हो। कसम है, ऐसी औरतों के पैदा हुए बिना तो रोजी-रोजगार करना दुश्‍वार है। छोटे-छोटे बच्‍चे माताओं के सिर के बोझ ही हैं। भाई, तुम्‍हीं कहो, बच्‍चों से औरतों को क्‍या लाभ होता है? कुछ भी नहीं। लेकिन वे बच्‍चों को छोड़ना नहीं चाहतीं। वे यह भी नहीं समझतीं कि दु:ख देने के सिवा बच्‍चे उनका कोई फायदा नहीं करते, खास करके चुपचाप लड़कों को खरीदारों के हवाले न कर देने से कितना पाप लगता है, यह उन अल्‍हड़ों के दिमाग में नहीं बैठता।"

हेली की बात समाप्‍त होते ही मार्क फिर कहने लगा - "भाई, पिछले माह मैंने एक रोगी लड़के के साथ एक दासी मोल ली थी। सोचा था कि रोगी लड़के को माँ की गोद से लेकर बेचने में उसकी माँ कोई आपत्ति नहीं करेगी। लेकिन स्त्रियों की माया समझ में नहीं आती। रोगी लड़कों पर स्त्रियों का स्‍नेह और अधिक होता है। भाई, क्‍या कहूँ, उस रोगी लड़के के बेचने के थोड़े ही दिनों बाद उसकी माँ भी मर गई।"

मार्क की यह बात सुनते ही हेली ने कहा - "तुम्‍हारे सिर की कसम, भाई, सच कहता हूँ, हमपर भी एक बार ऐसी ही बीती थी। हमने एक बार एक अंधे छोकरे और उसकी माँ को खरीदा था। खरीदने के समय छोकरे के अंधे होने का पता नहीं था, पीछे से पता चलने पर उसे दूसरी जगह बेच दिया। फिर क्‍या था? उसकी माँ उसे गोद में लेकर नदी में डूबकर मर गई। हमारे सारे रुपए पर पानी फिर गया।"

टॉम लोकर अब तक ब्रांडी की बोतल में ही मस्‍त था। अब तक उसे बातें करने की फुर्सत न मिली थी। जब पूरी बोतल खाली कर चुका तब बोला - "भाई, मेरे काम का तो ढंग ही निराला है। लड़का-लड़की, पुरुष-स्‍त्री, कोई हो, मैं पहले से ही कह रखता हूँ कि बेचने के समय जरा भी रोना-पीटना सुना कि मारे बेंतों के चमड़ी उधेड़ दूँगा। युवतियों को खासतौर से समझा देता हूँ कि तुम्‍हारी गोद के बच्‍चे पर तुम्‍हारा कोई अधिकार नहीं है। मैंने रुपया देकर मोल लिया है, जो जी चाहेगा, करूँगा। इससे फिर किसी को चूँ करने का साहस नहीं होता और अगर कोई ऐसी निकलती है कि समझाने पर भी रोने-पीटने से बाज नहीं आती तो मेरे ये मजबूत हाथ उसे दुरुस्‍त करने के लिए तैयार रहते हैं।" इतना कहते-कहते उसने मेज पर इतने जोर से हाथ पटका कि मेज के टुकड़े-टुकड़े हो गए।

हेली ने कहा - "लोकर, हंटरों से यों खबर लेने को हम कोई तुम्‍हारी अक्‍लमंदी नहीं समझते। ये बातें कोई कारोबार की नहीं है। समझदार लोग कभी मार-पीट नहीं करते। आत्‍मा सब में है। चमड़ी उधेड़ने से तुम्‍हारी और उसकी सबकी आत्‍मा में बराबर दर्द होता है। हमको इस बात का तजुरबा है कि बिना मार-पीट के कारोबार में ज्‍यादा फायदा होता है।"

हेली की यह बात लोकर को बहुत चुभी। उसने कहा - "अरे बच्‍चू, मेरे सामने बहुत 'आत्‍मा-आत्‍मा' मत बको। मेरी आत्‍मा का हाल मैं खूब जानता हूँ। तेरे शरीर को पीसकर चलनी में छान डालने से भी आत्‍मा का एक कण नहीं निकलेगा।"

हेली ने मुँह बनाकर कहा - "लोकर, इतने झुँझलाते क्‍यों हो? मुनासिब बात कहने से जलकर खाक हो जाते हो!"

अब लोकर और भी बिगड़कर बोला - "तेरी धर्म की बातें मैं नहीं सुनना चाहता। तू मुझे उपदेश देने चला है? मैं तेरी नस-नस पहचानता हूँ। तू अपने मन में अपने को बड़ा धार्मिक समझता है, लेकिन क्‍या मुझे खबर नहीं कि तेरा धर्म और भलमनसी लोगों को ठगने के लिए एक तरह का जाल है। लोगों को कर्ज देते समय तू बड़ी भलमनसी दिखाकर मीठी-मीठी बातें बनाता है, और जब रुपया वसूल करने का समय आता है तब तू गला घोंटकर आदमी को मार डालता है और उसका सब-कुछ हजम कर जाता है। यही है न तेरी आत्‍मा?"

बात बढ़ती देख टॉम लोकर के साथी मार्क ने दोनों हाथ फैलाकर कहा - "भाई, इन झगड़े-टंटों में क्‍या रखा है! कुछ काम की बातें करो। सबके अपने अलग-अलग मत होते हैं। हेली का अच्‍छापन उसकी दो-ही-चार बातों से मुझे मालूम हो गया। अब हेली ने जो बात कही है, उसे झटपट तय कर डालो।" फिर हेली से बोला - "भाई, उस स्‍त्री को पकड़वाने पर क्‍या दोगे?"

"उस औरत से मेरा क्‍या मतलब! मैं तो सिर्फ लड़के को चाहता हूँ। उस लड़के को खरीदकर ही मुझे बेवकूफ बनना पड़ा है।"

लोकर ने कहा - "तुम बच्‍चू, आज के नहीं, हमेशा के बेवकूफ हो।"

मार्क ने कहा - "लोकर, तुम फिर टायं-टायं करने लगे। इन सब बखेड़ों से क्‍या मतलब? मतलब से मतलब रखो, देने-लेने की बातें करो।"

हेली बोला - "हाँ, बोलो न, तुम लोग कितना चाहते हो? हम कहते हैं कि लड़के को बेचने पर जो मुनाफा मिलेगा, उसमें से दस रुपया सैकड़ा तुम लोगों को देंगे।"

लोकर ने कहा - "अजी, अपनी ये चालाकियाँ रहने दीजिए, हमसे नहीं चलेंगी। तुम्‍हीं बड़े उस्‍ताद हो, उसकी खोज में सिर हम खपाएँगे, और जो न पकड़ पाए तो हमारी सारी मेहनत मिट्टी में मिली। पहले हम लोगों की मेहनत के पचास रुपए हाथ पर रखो, तब बात करो।"

मार्क बोला - "इसमें क्‍या कहना है! यह तो कायदा ही है। कहीं बिना बयाना दिए कोई काम होता है? मेरा तो वकालत का पेशा ही ठहरा, मैं यह सब खूब जानता हूँ।"

बड़ी दलील और हुज्‍जतों के बाद हेली ने उन लोगों को पचास रुपए दिए। मार्क और लोकर ने उस भगोड़ी को पकड़ने का बीड़ा उठाया। वकालत ही की भाँति यह पेशा भी उस समय बड़े गौरव का समझा जाता था। इससे केवल रुपयों ही की आमद नहीं थी, बल्कि यह पेशा देश-हितैषिता और देशी कानून के गौरव की रक्षा का समझा जाता था, अत: उस काम का बीड़ा उठाकर उनके लज्जित होने का कोई कारण न था। हेली से रुपए पाकर वे नदी पार करने का उपाय खोजने लगे।


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