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कहानी

जवांमर्दी
महमूदुज्ज़फ़र


वह मेरी बीवी जा रही है। मगर उसके होंठो पर उस मुस्‍कुराहट का नाम तक नहीं जैसा कि लोगों ने मेरे दिल की तस्‍कीन के लिए मुझसे कहा था। बस हड्डियों का एक ढाँचा है। उसकी भयानक सूरत से जाहिर होता है कि वह किसी जानलेवा बीमारी का शिकार है और मौत का डर उस पर हावी है। उसकी आँखों में मेरे लिए अब दिलचस्‍पी और प्‍यार की जगह, बेगानगी और नफरत है। मैं इसी लायक था। इस नफरत की वजह वह नवजात बच्‍चा है-जिसका सर उसके कूल्‍हे की हड्डियों में अब तक फँसा दिखाई देता है-जिसकी वजह से उसकी जान गयी, यह भला कौन सोच सकता था कि मेरी बीवी को मरते वक्त मुझसे नफरत होगी। मैंने उसको तकलीफ और मौत से बचाने के लिए कौन-सी बात उठा रखी थी। मगर नहीं। मैं ही, उसकी मौत का कारण हुआ, मैंने ही उसको दर्द और दुख पहुँचाया। मर्दों की जहालत और हिमाकत का शिकार था। यह सरासर गलत है। दरअसल, मुझे गुरूर के पंजे ने जकड़ लिया था। इसका मुझे एतराफ है।

हमारी शादी ऐसी उम्र में हुई थी, जब हममें एक दूसरे के जज्‍बात समझने की सलाहियत तक न थी। लेकिन बाद में जो हादसा पेश आया, उसका इल्‍जाम मैं किस्‍मत या ऐसे हालात पर जिन पर मुझे कोई काबू न था, नहीं रखना चाहता था।

मुझे अपनी बीवी से कभी मोहब्‍बत नहीं हुई और होती भी तो कैसे? हम जिंदगी के दो अलग दायरों में चक्‍कर लगा रहे थे, मेरी बीवी पुराने जमाने की तंग व अंधेरी गलियों में और मैं नये जमाने की साफ-चौड़ी और पक्‍की सड़कों पर। लेकिन जब मैं दूसरे मुल्‍कों में गया और उससे कई बरस तक जुदा रहा तो कभी-कभी मेरा दिल उसके लिए बेचैन होता था। वह अपने छोटे-से मजबूत पुराने किले में थी और मैं जिंदगी की गहमागहमी में फिजूल और बेफैज इश्‍कबाजी से तंग आ कर कभी-कभी उस पाक व बावफा औरत का ख्‍वाब देखा करता था जो बिला किसी मुआवजा के मुझ पर सब कुछ लुटाने को तैयार थी। जब मेरी यह कैफियत होती तो बेताबी के साथ मुझे उससे मिलने की ख्‍वाहिश होती। एक दफा मुझ पर ऐसी ही कैफियत हावी थी कि मुझे उसका एक खत मिला। मैं बेकरार हो गया और फौरन छह हजार मील के फासले से वतन की तरफ चल पड़ा। उसके खत में लिखा था -

"मैंने अभी तकिया के नीचे से फिर आपका खत निकाल कर पढ़ा। बहुत मुख्‍तसर है। शायद आप अपने काम में मशगूल होंगे। मगर खैर मुझे इसकी कोई शिकायत नहीं। बस मुझे आपकी खैरियत मालूम होती रहे और आप अच्‍छे रहें, खुश रहें, मेरे लिए यही काफी है। जब से मैं बीमार हूँ, सिवाय इसके कि आपको याद करूँ और उन अजीब-अजीब चीजों और नये-नये लोगों का ख्‍याल करूँ जिनसे आप वहाँ मिलते होंगे, मुझे और काम नहीं। मुझसे चला नहीं जाता, इस वजह से पलंग पर पड़ी-पड़ी तरह-तरह के ख्‍याल किया करती हूँ। कभी तो इसमें लूत्‍फ आता है और कभी इससे सख्‍त तकलीफ होती है। जब लोग मेरी सेहत के बारे में गुफ्तगू करते हैं और मुझसे हमदर्दी जाहिर करते हैं और नसीहत करते हैं तो मुझे बड़ी कोफ्त होती है। यह लोग यह तक नहीं समझते कि मुझे क्‍या रोग है। उन्‍हें सिर्फ अपने दिल की तसकीन के लिए मेरे ऊपर रहम आता है। अपने माँ-बाप पर भी मैं भार हूँ। वे अपने दिल में ख्‍याल करते होंगे कि बावजूद मेरी शादी हो जाने के बाद मैं ऐसी बदनसीब हूँ कि उनके गले पड़ी हूँ। इसका नतीजा यह है कि मैं हर वक्त इस कोशिश में रहती हूँ कि बहुत ज्‍यादा मायूसी और रंज जाहिर न करूँ और मेरे माँ-बाप ऐसी कोशिशें करते हैं जिससे यह जाहिर होता है कि उन्‍हें मेरी बीमारी की वजह से बड़ी ऊहापोह और चिंता है। गरज दोनों तरफ बनावट है। मैं आपसे किसी बात की शिकायत नहीं करना चाहती और न आपके काम में रुकावट डालना चाहती हूँ। आप मुझे भूल न जाएँ और कभी-कभी खत लिख दिया करें। मेरे लिए यही बहुत है। बल्कि कभी-कभी तो मुझे यह ख्‍याल होता है कि आपका मुझसे दूर ही रहना बेहतर है। मुझे डर इस बात का है कि जैसे बीमारी के बाद से मैं यहाँ करीब-करीब सबके लिए बेगानी-सी हो गई हूँ, वैसे ही कहीं मैं आपको न खो बैठूँ। दिन-रात मेरी बुरी हालत देख कर कहीं आपका दिल भी मेरी तरफ से न हट जाये। वहाँ से तो आप महज इसकी कल्‍पना कर सकते हैं और मैं आपकी अपनी जिन्‍दगी के मुकम्‍मल महाफिज के तौर पर कल्पना करती हूँ, जिसकी मेरे दिल को तमन्‍ना है। "

जब मुझे यह खत मिला तो मुझ पर इश्‍क व मोहब्‍बत की एक लहर-सी दौड़ गयी। गो कि वह बीमार थी और उसे रोग लग गया था मगर उसको सीने से लगाना मेरा फर्ज था। मैं यह साबित कर देना चाहता था कि मेरी मोहब्‍बत में कोई बात हायल नहीं हो सकती है। मैं चाहता था कि उसे मालूम हो जाये कि मैं ही वह सच्‍चा साथी हूँ, जिसकी उसे तलाश थी। मैंने अपने को कुसूरवार और बुरा करार दिया और उसको मासूम व निर्मल। जैसी उसने मेरे साथ खाकसारी बरती और मेरी खिदमत की, मेरा भी फर्ज था कि मैं भी उसके साथ वैसा ही सलूक करूँ। यह फैसला करके मैं अपना काम छोड़कर घर की तरफ चल खड़ा हुआ।

मैं अभी रास्‍ते में ही था कि मेरे जज्‍बात में तब्‍दीलियाँ होने लगीं। वह शुरू का-सा पाक जज्‍बा बिल्‍कुल गायब हो गया और रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों की तरफ मेरे ख्‍यालात दौड़ने लगे। मसलन, रोजी कमाने का मैं कौन-सा रास्‍ता निकालूंगा, अपने दोस्‍तों में किन-किन से मुलाकात जारी रखूंगा, अपने ससुर और सास से किस तरह मिलूंगा, उनसे साफ-साफ बातें करूँ या उनकी तरफ से बेरुखी बरतूँ वगैरा-वगैरा। सिर्फ अपनी बीवी से मिलने की तमन्‍ना बाकी है। यही नहीं, बल्कि जरा-जरा-सी रोजाना जिंदगी की समस्‍याओं ने मेरी तमन्‍नाओं और जोश का खात्‍मा कर दिया। घर पहुँचने पर ये समस्‍याएँ विकृत सच्‍चाइयों में बदल गयीं जिनसे बच पाना मुमकिन नहीं था। पुराने जमाने की जिन-जिन दिलफरेबियों की मैंने अपने जहन में तस्‍वीर खींची थी, उनका कहीं पता नहीं था। बजाए इसके खुद को मैंने तंग व तारीक, गंदी, जुल्‍म व जाहिलियत से लबरेज एक दुनिया में बन्‍द पाया। स्‍टेशन पर जो लोग मुझसे मिलने आये, उनमें ज्‍यादातर बेहूदा, बदमाश, तंग नजर, संकरी सोच वाले नाकारा किस्‍म के आदमी थे। उन सबने बहुत खुशी के साथ मेरा स्‍वागत किया, मुझे हार पहनाया, मुझ पर फिकरे कसे गये, वही पुराने गैर शालीन, भोंडे मजाक हुए और दूसरों की बुराइयाँ की गयीं। कई दिनों तक जलसों, बैठकों और दावतों का सिलसिला रहा। इसके बाद कहीं उन लोगों से निजात मिली। इस दरम्‍यान मैं अपनी बीवी से सिर्फ थोड़ी-थोड़ी देर के लिए मिल सका। लेकिन उसके तेल से चिपके हुए बाल, उसका लागर जिस्‍म और जर्द चेहरा, दावतों, संगीत व नाच की महफिलों और इधर-उधर बातचीत के वक्त भी बारहा मेरी नजर में सामने आ जाता था।

जब सब मेहमान रुख्‍सत हो गये तो मैं अपनी बीवी के पास गया और उसके करीब पलंग पर जा कर बैठा। वह खामोश लेटी रही और मेरी तरफ उसने नजर उठा कर नहीं देखा। मैं थोड़ी देर तक तो उसकी साँस के साथ उसके सीने का चढ़ाव उतार देखता रहा, फिर मैंने उसका कमजोर-लागर हाथ अपने हाथ में ले लिया और कुछ देर तक हम यों ही खामोश बैठे रहे। फिर मैं बोला, "लीजिये अब तो मैं आपके पास आ गया, कुछ बातें कीजिये, आप इतनी चुप क्‍यों हैं?" उसने जवाब दिया, "मैं क्‍या बातें करूँ, खैर आप आ गये।" मैंने सहसा महसूस किया कि इस तरह काम नहीं चलने का। मैंने जल्‍दी से कहा, "वाह, आपको तो मुझसे बहुत कुछ कहना है। इतने दिन जो मैं यहाँ नहीं रहा तो आप क्‍या करती रहीं और कैसी रहीं। सब मुझे बताइये। आखिर इतने दिन आपने मुझसे बातचीत नहीं की थी, अब उसकी कसर निकालिये। याद है आपको, आपने मुझको एक दफा खत में लिखा था कि आपको एक हमदम व दमसाज की जुस्‍तूजू है। मैं ही वह शख्‍स हूँ और अब आपके पास इसलिए हूँ कि हर वक्त आपके पास रहूँ और कभी आपसे जुदा न होऊँ।"

मगर मेरी तमाम कोशिशें बेकार साबित हुईं। मेरी बातों से जाहिर था कि रहे हुए पाठ की तरह ऊपरी हैं और उनसे मेरी बीवी को कोई तसल्‍ली नहीं हुई। कुछ देर तक मुझे यह उम्‍मीद रही कि उसको शायद इसका एहसास नहीं हुआ। मगर वह घबड़ाहट और बेचैनी से मेरी टोपी उठा कर हाथों से मलने-दलने लगी और फिर ऐसी गुफ्तगू हुई कि मुझे आपनी नाकामयाबी का यकीन हो गया। उसने कहा, "भला मैं क्‍या कहूँ? यहाँ तो जैसे दिन वैसी रात। लेकिन आप क्‍यों चुप हैं। आपको नये-नये तजूर्बे हुए होंगे। नये मामलों से सबका पड़ा होगा। आप मुझसे उन सब बातों का तजकिरा कीजिए। वहाँ की अजीब-अजीब चीजें, तरह-तरह की मशीनें, किस्‍म-किस्‍म के लोग, नई जिंदगी। आप लिखा करते थे कि आपको इन सबके बारे में मुझे लिखने का वक्त नहीं। लेकिन अब तो आप मेरे पास हैं। अब तो आपको वक्त है।"

यह उसने जानबूझ कर मेरी खुद्दारी पर हमला किया। अब मुझे मालूम हो गया कि सालों की जुदाई ने हमारे ताल्‍लुकात में कोई फर्क पैदा नहीं किया है। हम पहले की तरह अब भी एक दूसरे से बेगाने थे और एक दरिया के दो अलग किनारों पर अजनबी की तरह खड़े हुए थे। हमने फिर एक-दूसरे के साथ धोखा-धड़ी शुरू कर दी।

मैंने कहा, "हाँ-हाँ, मुझे तो आपसे बहुत-सी बातें करनी हैं। हम दोनों मिल कर क्‍या-क्‍या करेंगे, यह तय करना है। लेकिन पहले आप जल्‍दी से अच्‍छी तो हो जायेंगी तब हम इसके बारे में बातें करेंगे। अभी तो आपको खमोशी से आराम करना चाहिए। आप अपने दिल-ओ दिमाग पर जोर न डालिए। मेरे आने की वजह से शायद आपको तकलीफ हो गयी। आप आराम कीजिये और ज्‍यादा सोचिये मत। अच्‍छा, अब मैं जाता हूँ। आप सो जाइये।"

मैंने उसका हाथ छोड़ दिया और वहाँ से उठ कर चला आया। इसके बाद न तो मैंने उससे ज्‍यादा राब्‍ता बढ़ाने की कोशिश की और न किसी खास बात पर ज्‍यादा देर तक गुफ्तगू ही की। दिन में एक-दो-दफा उसे देखने जाया करता, दरयाफ्त करता कि उसकी सेहत कैसी है और ऐसी ही दो-एक बातें करके चला आता और अपने काम में मसरूफ हो जाता। इत्तफाक से मेरा काम भी इन दिनों अच्‍छा नहीं चल रहा था और मुझे फुर्सत काफी थी। रफ्ता-रफ्ता मैं फिर अपने पुराने दोस्‍तों की सोहबत में रहने लगा और उनकी गंदी तथा बेकार आदतें मुझमें भी आ गयीं। ताश, शराब और बेसिर-पैर की बातों का सिलसिला जारी रहने लगा। हम अपने को संगीत का भी माहिर समझते थे। चुनांचे शहर की नामवर गाने वालियों के सर परस्‍त बन बैठे। ऐसे हालत में जाहिर है कि मैंने एक औरत भी रख ली थी। हमने बेमानी और बेमकसद जिंदगी बसर करने की यही तरकीबें निकाली थीं। हममें से जो लोग दूसरे मुल्‍कों का सफर कर आये थे वो अपनी जवांमर्दी और आशिकी की दास्‍तानें दूसरों को सुना-सुना कर उन पर रौब जमाते थे। लेकिन मेरे लिए अपनी बीवी से छुटकारा पाना नामुमकिन था। उसकी बीमारी की वजह से मेरे पास मिजाजपुर्सी के लिए खत और दोस्‍तों व रिश्‍तेदारों का सिलसिला कायम रहता। कोई मुझे नसीहत देता तो कोई उलाहना, कोई दिलासा देता तो कोई हमदर्दी जाहिर करता। इन सब बातों से मेरी जिंदगी अजाब (नारकीय) हो गयी। मेरे सास और ससुर को मेरी आजादी और तौर-तरीके बहुत खलते थे। वो डरते थे कि मैं उनकी लड़की को कहीं एकदम न छोड़ दूँ। इधर मेरी माँ का लगातार इसरार था कि मैं दूसरी शादी कर लूँ। खानदान में दो ऐसे गिरोह बन गये जिन्‍हें एक-दूसरे से सख्‍त अदावत थी। दोनों मुझे अपनी तरफ खींचने की हर वक्त कोशिश करते रहते थे। लेकिन बावजूद माँ के इसरार के मैं दूसरी शादी करने पर राजी नहीं हुआ। आखिरकार, लोगों ने मेरी मर्दानगी पर शक शुरू कर दिया और तरह-तरह की कानाफूसी करने लगे। मैं अजब पशोपेश में फँस गया और मैंने यह तय कर लिया कि कुछ-न-कुछ जरूर करना चाहिए।

मैं अपनी ससुराल गया और वहाँ जा कर कहा कि आपकी लड़की बीमार-वीमार कुछ भी नहीं। ये सब बेकार के अपने यहाँ रोकने के बहाने हैं। मैं उसे अपने साथ लिए जाता हूँ। मैंने अपनी बीवी से भी कहा कि आप बिल्‍कुल बीमार नहीं, कम से कम ऐसी बीमारी नहीं जैसा यहाँ लोग आपको बनाना चाहते हैं। ये सब आपके अम्‍मी-अब्‍बू की चाल है। यह बात कोई आपसे छिपी हुई नहीं है। आप मेरे साथ चल कर रहिये तब पता चलेगा कि आपको क्‍या बीमारी है। पहले तो मेरी साफगोई कुछ उसकी समझ में नहीं आयी। मगर थोड़ी न-नकार के बाद वह मेरे साथ चलने पर राजी हो गयी।

हम दोनों ने एक लम्‍बा सफर किया और दूर पहाड़ों पर जा कर रहने लगे। बर्फ से ढकी जगह की खुश्‍क और ताजा हवा में दूर-दूर टहलने के लिए निकल जाते। जब थोड़े दिनों बाद मेरी बीवी की सेहत ठीक हो गयी तो उसे घर ले आया। मेरे दोस्‍तों और रिश्‍तेदारों ने जब हमें साथ देखा तो मुझे फख्र महसूस हुआ। मगर उनके दिलों में शक बाकी था। वे पूरे सुबूत के लिए किसी और चीज के इन्‍तजार में थे। लेकिन मुझे अपनी फतहयाबी का पूरा यकीन था। एक महीने के बाद दूसरा महीना आहिस्‍ता-आहिस्‍ता गुजरता जाता था और मेरी बीवी का पेट बढ़ता जाता था।

मेरी हालत उस माली की थी जो अपने लगाये दरख्‍तों पर कलियों को खिलते हुए देख कर खुशी से फूला नहीं समाता है। हर-हर दिन, हर-हर क्षण मेरी कामयाबी ज्‍यादा नुमाया होती जाती। लेकिन मेरी बीवी खामोश रही। मैं समझता कि इसका सबब शायद प्रसव की परेशानी और घबड़ाहट है। आखिरकार उसको प्रसव का दर्द शुरू हुआ। घंटो बेचैनी और तकलीफ का आलम रहा। दर्द की शिद्दत से जिस्‍म तड़प रहा था और उसे किसी पहलू चैन न था। लगता था उसकी आत्‍मा तक आह व फरयाद कर रही है। लेकिन उसकी छटपटाहट और तड़प, उसका दर्द से चीखना-चिल्‍लाना, उन सबसे मेरी जवान मर्दानगी का सुबूत मिल रहा था। और उसके बाद चारों तरफ खामोशी छा गयी जिसने मेरी अकड़ और शान को खाक में मिला दिया। अल्‍लाह माफ करे, मेरे कानों में अभी तक उसका दर्दनाक कराहना गूँज रहा है। वह समां अभी तक मेरी आँखों के सामने है। लेकिन उसके मरने के बाद जब लोग मुझसे यह कहने आये कि मरते वक्त उसके लबों पर मुस्‍कुराहट थी तो मेरे दिल को कुछ सुकून हो गया।


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