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कहानी

सभ्यता समीक्षा
राकेश मिश्र


आजाद शेखर को मैं बंगाली समझता था, उसके सरनेम माँझी के बावजूद! दरअसल उसने पहली बार जब अपना नाम बताया था तो उसका माँझी कहना मुझे कुछ माजी जैसा सुनाई दिया था। या यूँ कहें कि मेरे कान उसके रूप-रंग और पहनावे-ओढ़ावे को लेकर इसके लिए तो तैयार ही नहीं थे कि मैं उसके माँझी ही सुनूँ! फिर उसका नाम भी 'आजाद शेखर!' यदि वह माँझी ही था तो मेरे हिसाब से उसका नाम बिरसा, तिलका, कान्हू या ऐसा ही कुछ होना था! यह तो उसने बहुत बाद में बताया था कि दरअसल उसका जन्म पंद्रह अगस्त को हुआ था और उसके पिताजी, जो उसके पिताजी जो उसके अपने समाज के मुखिया थे, देश की आजादी और उसमें चंद्रशेखर आजाद की भूमिका से काफी प्रभावित थे। इसलिए उसका नाम 'आजाद शेखर' रखा गया और वह शुद्ध रूप से आदिवासी था। इसलिए माँझी था! 'शुद्ध रूप' से इसलिए भी कि झारखंड के उसके गाँव के कुछ परिवार ही ऐसे बच गये थे जो आदिवासी होते हुए भी ईसाई नहीं बन गये! वैसे उसे इस बात का कोई गर्व भी नहीं था और न ही कोई क्षोभ था अपने उन दोस्तों के लिए, जिनका नाम जॉन केरेकेट्टा या रंजीत विल्सन बाखला था। मैं थोड़ा धोखा इसलिए भी खा गया था कि दलित और आदिवासी मेरी दृष्टि में हमेशा सुलगते हुए होने चाहिए थे। उनकी मुट्टियाँ भिंची हों, उनकी आँखों में आक्रोश हो, उनकी शिराओं में रक्त की जगह लावा खौलता हो। कुल मिलाकर उन्हें ऐसा होना चाहिए था जैसे उनसे बातचीत करके पता चले कि सदियों से हाशिये पर रखे गये समाज जब मुख्य धारा से अपना हक और हकूक माँगते हैं तो उनकी भाषा की तुर्शी कैसी होती है! लेकिन आजाद शेखर की आवाज में खनक थी, उसकी हँसी में संतुष्टि थी और सबसे खास बात उसके पास ढेरों चुटकुले थे जो खासकर सरदारों और बंगालियों पर थे। उसके इन चुटकुलों के आधार पर भी मैं उसे 'स्याणा बंगाली' समझता था, जो अपने बंगालीपन को बनारस के घाट से रगड़कर छुड़ा रहा हो। घाट पर ही मैंने उसे अपनी इस पूर्व धारणा को बताया तो वह ठठाकर हँस पड़ा था। न सिर्फ वही, बल्कि वहाँ उपस्थित अधिकांश लोग जोर से हँसे थे, इतनी जोर से कि मैं लगभग झेंप गया। मेरा वह झेंपना मेरी प्रकृति के विपरीत था, लेकिन जो 'अधिकांश' की उपस्थिति थी, उसमें उस समय आजाद शेखर का बहुमत था। मतलब वह एक पार्टी थी - टी पार्टी! जो रंजीत विल्सन बाखला ने दी थी अपनी कजिन के बर्डे के उपलक्ष्य में। बाखला मेरी ही क्लास में था लेकिन मेहमान मैं आजाद शेखर का था। बल्कि इस पार्टी में आने के बाद ही मुझे पता चला कि यह बाखला की पार्टी है और यह भी कि उसकी कोई कजिन भी है जो इसी साल बी.कॉम में पढ़ने आयी है। पहले तो मैं बाखला को वहाँ देखकर ही अचकचा गया था और तुरंत ही मुझे यह भी महसूस हुआ कि वह तो मुझे देखते ही बौखलाने की हद तक अनियंत्रित हुआ था।

'तुम यहाँ कैसे का भाव दोनों तरफ था और फिर मैं यह अफसोस जाहिर कर पाया कि मैं तो गफलत में यहाँ चला आया था! दरअसल विश्वविद्यालय में बंगालियों ने अपना अलग 'घेटो' या द्वीप बना रखा था! बी.एफ.ए. मतलब बंगाली फ्रेंड्स एसोसिएशन जैसा उसका नाम था, जिसे हम, जो बंगाली नहीं थे 'ब्लू फिल्म एडवर्टाइजर्स' कहा करते थे और किसी भी तरह इस एसोसिएशन में घुस जाना चाहते थे, चाहे वह किसी भी कीमत पर हो! मार-पीट, झगड़ा, फसाद, डर, धौंस, धमकी! लेकिन हम जानते थे कि इस एसोसिएशन मतलब बंगाली लड़कियों पर इन कीमतों का कोई असर नहीं था! एक-एक मरियल लुक्खा-सा बंगाली दो-दो, तीन-तीन एसोसिएट मेंबर्स के साथ ऐंगेज्ड था और हम सिर्फ उन्हें डराने, धमकाने या कभी-कभी पीट देने के कुछ नहीं कर पाते थे! ऐसे में जब आजाद शेखर ने मुझे टी-पार्टी में चलने को कहा था तो मेरी बाँछें इसी से खिली थीं कि आज तो कोई न कोई एसोसिएशन होके रहेगा लेकिन वहाँ पहुँचकर लगा जैसे 'रसगुल्ले' के विकल्प में बताशा खाने को कहा जा रहा हो! मेरा चेहरा लगभग 'डाइबिटिक' जैसा हो गया। चाय भी मैंने बेमन से ही पी। बाखला अपनी गिटार साथ लाया था, लोग उससे बार-बार कोई गाना सुनाने को कह रहे थे। थोड़े नखरे के बाद उसने गाया भी लेकिन मैं लगभग फेश्चुला के मरीज की तरह बैठा रहा कि कब यह खत्म हो और मैं वहाँ से कटूँ! मैं साफ-साफ अपने को ठगा गया महसूस कर रहा था और मेरा चेहरा है भी इतना पारदर्शी कि कोई भी समझ सकता था कि टाट में पैबंद लगे मखमल को कैसा महसूस हो सकता है। मुझे रह-रहकर आजाद शेखर पर गुस्सा आ रहा था कि चलो साले गलती हुई मुझसे तुम्हें समझने में, लेकिन तुम तो मुझे समझो और कटो यहाँ से! लेकिन मैंने देखा, जैसे वह मुझे इस पार्टी में लोकर किसी गुरुतर दायित्व से मुक्त जैसा होकर मेरी तरफ से बेखबर था। वह उस 'बर्डे' को चुटकुले सुनाने में मशगूल था और वह उम्मीद से दुगुना हँसे जा रही थी। आखिरी चुटकुला मैंने भी सुना, ''संता अपने घर से निकला और केले के छिलके से फिसल कर गिर पड़ा! वापस घर जाकर नहा-धोकर जब फिर वह बाहर निकला तो उसकी नजर पुनः एक छिलके पर पड़ी! संता ने मायूस होकर सोचा उफ् अब फिर से गिरना पड़ेगा!''

यह सुनकर मैं भी थोड़ी संजीदगी से मुस्करा दिया। इन दिनों मेरी स्थिति भी चुटकुले वाले से कमतर नहीं थी। दो-दो इश्क कर धड़ाम से गिर पड़ा था मुँह के बल...! फिर भी किसी लड़की को देखकर लगता उफ् इश्क तो करना ही पड़ेगा! मुझे चुटकुले के इस दार्शनिक अनुवाद पर फिर मुस्कान आयी और मैंने यूँ ही नजरें उठाकर उस हँसकर दोहरी हुई जा रही बर्डे गर्ल को देखा... हँसते-हँसते उसने भी ठीक मेरी तरफ देखा। हँसी के रुकते ही पूछा, ''आप सिर्फ मुस्करा रहे थे! चुटकुला समझ नहीं पाये क्या?' मैं इस अचानक हमले के लिए तैयार नहीं था, झेंपकर मैंने खींसें निपोर लीं! इससे लड़की ने मुझे काफी झेंपू समझा और 'अटेंशन प्लीज' के अंदाज में ताली बजाकर ऐलान किया कि उसे भी एक चुटकुला सुनाना है। उसने सुनाया कि एक बार चिड़ियाघर में किसी ने चुटकुला सुनाया तो सारे जानवर हँसे, केवल गधा नहीं हँसा! क्योंकि उसे चुटकुला समझ नहीं आया था। दो दिन बाद जब सारे जानवर चुप थे तो गधा जोर-जोर से हँसने लगा! क्यों क्योंकि उसे चुटकुला तब समझ में आया था! कहते हुए लड़की ने फिर ठहाका लगाया। हँसे तो सब थे लेकिन इस बार आजाद शेखर कुछ ज्यादा ही दुहरा-तिहरा होता दिखा। मेरे लब सुर्ख हो गये थे। नजरें नीची किये ही मैं धीमे सुर में हँसी की लयबद्ध आवाज निकालता रहा। उस आवाज को हँसी तो नहीं ही कहा सकता था। मैंने कनखियों से बाखला को देखा। उसकी हँसी गायब थी। बल्कि उसके चेहरे पर अजीब-सा तनाव आ गया था जो मेरी कारगुजारियों और रुतबे के लिहाज से जायज था। उसकी कजिन से सरेआम सरे महफिल मुझे 'गधा' कहा था। अपनी नजरें मैंने बाखला पर से हटायीं नहीं, बल्कि अपने होठों को भी तिरछा ही रहने दिया। मैं बाखला की हालत समझ रहा था। अकेला होता तो जरूर उस भोली और नादान लड़की की तरफ से मुझसे माफी माँग लेता या मेरे बड़प्पन को बखानते हुए उसकी गुस्ताखी भूल जाने की गुजारिश करता! लेकिन उसने सिर्फ हड़बड़ी और जल्दबाजी में कहा, ''चलो हो गया! खत्म किया जाए।'' सब लोग पार्टी इतनी जल्दी खत्म नहीं होने देना चाहते थे। वह लड़की तो जैसे रूठने की हद तक रुआँसी हो गयी। लेकिन बाखला ने जरूरत से ज्यादा तत्परता दिखाते हुए अपना गिटार उठाया और चलने की मुद्रा में आ गया।

मैं भी उठ खड़ा हुआ। आजाद शेखर को कहा कि अच्छा तुम लोग इंज्वॉय करो, फिर मिलते हैं! लेकिन वह भी शायद कुछ भाँप गया था। बोला, ''नहीं-नहीं! पार्टी तो हो चुकी। चलो साथ ही चलते हैं!''

रास्ते में लौटते समय दोनों काफी देर तक चुप रहे। आजाद शेखर के बंगाली और आदिवासी होने का ख्याल और भ्रम मेरे लिए बेकार हो चले थे। मेरे कानों में रह-रहकर उस लड़की की जालिम हँसी गूँज रही थी और मेरी नाक की फड़कन 'अनैच्छिक क्रिया' के दायरे में आ गयी थी। सन्नाटा आजाद शेखर ने ही तोड़ा - ''अच्छी रही पार्टी! मजा आया।''

''बहुत!'' मैंने हुंकारी भरी! लगभग गुर्राते हुए। ''अच्छी लड़की के बर्डे की पार्टी तो अच्छी होगी ही।''

मेरी आवाज की घरघराहट से आजाद शेखर थोड़ा विचलित दिखा, बल्कि कहें कि थोड़ा सहम भी गया।

मेरे साथ दोस्ताना होते हुए भी वह मुझसे थोड़ा बहुत तो परिचित था ही। उसने चलते हुए अचानक मेरे कंधे पर अपनी बाँहें डाल दीं, ''यार, सच बताऊँ! बहुत अच्छी लड़की है! मैं उससे प्यार करता हूँ।''

''अच्छा' मैं थोड़ा चिहुँका! ''लगा था थोड़ा बहुत मुझे।'' मैंने अपनी आवाज को पूर्ववत रखा। ''कब से अभी तो नयी ही आयी है'

''हाँ, लेकिन मैं तुम्हें कैसे बताऊँ लव ऐट फर्स्ट साइट! तुम यकीन करते हो इस पर उसे देखते ही लगा जैसे मैं इसे प्यार करता हूँ!''

''बकवास! बच्चों की बातें हैं ये!'' मेरे मुँह से बेसाख्ता निकला।

''तुम बड़े हो और अनुभवी भी। बेशक ऐसी बातें कर सकते हो। लेकिन तुम देखते-देखते ही इतने बड़े हो गये!'' उसने मेरी पीठ पर धौल मारते हुए कहा। मैंने यूँ ही नजर उठाकर उसकी ओर देखा। उसका मेरे कंधे पर हाथ रखना और फिर पीठ पर धौल मारना - दोनों ही क्रियाएँ मेरे लिए अनपेक्षित थीं। या यूँ कहें कि मेरे लिए उसके दायरे से बाहर की थीं। दायरा को यूँ ही बने देने की गरज से मैंने थोड़ा गुर्राते हुए कहा, ''वैसे लड़की है इस काबिल। 'फर्स्ट साइट' का मामला बन सकता है। 'लव' हो कि नहीं, मैं कह नहीं सकता!''

मेरा यह कमेंट निश्चित रूप से आजाद शेखर को अच्छा नहीं लगा। वह खामोश हो गया। मैं भी चुप था। थोड़ी ही देर में मैं 'तनाव-मुक्त' जैसा होने को आ गया था। बेकार में ही 'लोड' ले गया मैं! अब वह लड़की क्या जानती थी, कौन हो तुम, होगे तीसमार खाँ! डरते होंगे क्लास में तुमसे सब! वह तो तुम्हारी क्लास में नहीं पढ़ती। नयी आयी है बिचारी! नयी जगह है उसके लिए। इतने सारे लड़के! इतनी सारी लड़कियाँ! सब स्वतंत्र, उन्मुक्त आजाद! लड़कियों के जीवन में ऐसे अवसर कितने महत्वपूर्ण होते होंगे! और तुम! क्या जरूरत थी अपनी 'नाक' के साथ वहाँ जाने की! वो भी ऐसी नाक जिससे 'ठकुरई' हमेशा चूने को आतुर हो। कुछ तो 'आदमी' बनो यार! खामोश आत्म-भर्त्सना के उस प्रवाह ने मुझे काफी हल्का कर दिया! मैं यूँ ही गुनगुनाने भी लगा - एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा। जैसे उजली किरन। जैसे बन में हिरन। मैंने यूँ ही आश्वस्ति और हल्केपन के साथ आजाद शेखर को देखा, लेकिन शायद वह मेरे इस व्यवहार और खुलेपन से और भारी हो गया था! उसकी काँपती और सोचती-सी आवाज निकली, ''लेकिन यार, मैं सचमुच उससे प्यार करता हूँ!''

''लड़की भी करती है तुमसे प्यार?' अब मैंने उसकी पीठ पर धौल मारा! मेरे धौल से वह थोड़ा आश्वस्त हुआ। बल्कि थोड़ा शरमा भी गया। धीरे से बोला, ''पता नहीं! लेकिन पता तो होगा ही कि मैं चाहता हूँ उसे।''

'अबे! ये पता-वगैरह की बातें रहने दे। उसे ठीक से अपने दिल का पता दे। वरना चिट्टी किसी गलत पते पर पहुँच जाएगी और तू तो जानता है, ऐसी चिट्टियों को कोई री-डायरेक्ट भी नहीं करता!'' मैं खासा वाचाल हो गया था।

उस दिन हॉस्टल के पूरे रास्ते मैं उसे छेड़ता रहा।

दूसरे दिन बाखला जब क्लास में मिला तो लगा जैसे वह नजरें चुरा रहा हो। मैं उसे आश्वस्त करना चाहता था कि कल की बात वाकई कल की बात हो गयी है, मेरे मन में इस सिलसिले को आगे बढ़ाने की कतई इच्छा नहीं है। लेकिन बात शुरू कहाँ से करूँ, समझ नहीं आ रहा था। मैं यूँ ही उसके पास जाकर, उसकी बगल में बैठ गया। मुझे देखकर उसने अपनी नजरें किताबों में घुसा दीं। मैंने कहा, ''कल बहुत अच्छी रही थी पार्टी। तुमने गाना भी बहुत जोरदार गाया था।

पार्टी का नाम सुनते ही वह एकदम से असहज हो गया। कहा, ''नहीं! वो पार्टी-वार्टी नहीं थी! वो तो हम लोग यूँ ही कभी-कभी एक साथ बैठते हैं। वो तो 'लकली' कल उसका बर्डे भी था। बिचारी नयी आयी है तो उसका वेलकम भी हो गया।'' मैंने गौर किया कि उसने 'हमलोग' और 'बिचारी' पर कुछ ज्यादा ही जोर दिया था। मुझे बात बढ़ाने और अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोई गुंजाइश नहीं दिख रही थी। मैं जानता था कि स्थिति स्पष्ट करने के चक्कर में बात और उलझ सकती है, जैसा कि पिछली बार हुआ था जब 'झारखंड' राज्य बनने की घोषणा हुई थी। दरअसल अपना गाँव बिहार में होने के बावजूद मैं पैदा झारखंड में हुआ था और अलग राज्य बनने की खुशी मुझे भीतर से महसूस हुई थी। मैं लोगों से अपनी खुशी बाँटना चाहता था। मैं जानता था कि इतिहास के ऐसे निर्णायक क्षण अपने पीछे संघर्षों और त्याग की लंबी दास्तान लिये होते हैं।

मैं झारखंड बनने के तमाम उतार-चढ़ाव और ऊँच-नीच से परिचित था। ठाकुर जयपाल सिंह मुंडा की हॉकी स्टिक से लेकर शिबू सोरेन के तीर-धनुष तक का इतिहास मुझे पता था कि कब वे आक्रामक हुईं और कब वे गिरवी रख दी गयी थीं। मैं झारखंड राज्य बनने पर वाकई दिल से खुश था और यह मानता था कि इससे लंबे समय तक चलनेवाले आर्थिक और राजनीतिक शोषण का एक दिन तो अंत होना ही था। मैं अपनी खुशियाँ बाँटने रंजीत विल्सन बाखला के पास गया था और उससे कहा था कि यह खुशी मनाने की बात है। हम तमाम झारखंडियों को एक साथ मिलकर 'झारखंड उत्सव' मानना चाहिए। मेरी बात सुनकर वह सकपका गया था। मैंने उसकी सकपकाहट भाँपते हुए पूछा कि कहीं वह मुझे 'दिकू' (बाहरी आदमी) तो नहीं समझता और यह तो नहीं मानता कि मैं झारखंड के बनने से दुखी हूँ। बाखला ने स्पष्टतः तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके निरुत्साहित रहने से मुझ धीरे-धीरे क्रोध आने लगा था। मैं जितना उसे समझाता गया, उतना ही उसका संदेह बढ़ता गया। बहुत जोर देने पर उसने बताया कि झारखंड उत्सव तो मनाना है लेकिन केवल वे लोग ही मनाएँगे। उसमें बाहरी आदमी को शामिल नहीं किया जाएगा। मैं लगभग तैश में आ गया। मैंने गुर्राकर कहा, ''मैं झारखंड में पैदा हुआ हूँ और किसी भी तरीके से खुद को बाहरी नहीं मानता।'' मैंने उसे समझाना चाहा कि मैं शुरुआत से ही इस राज्य के बनने के पक्ष में रहा हूँ। मैंने अखबारों में इस आंदोलन के समर्थन में लेख भी लिखे हें, झारखंड राज्य के समर्थक कई नेताओं से मेरी जान-पहचान है बलिक उनमें से एक सूर्य सिंह बेसरा के साथ तो मेरा उठना-बैठना भी रहा है। लेकिन मैं जैसे-जैसे अपने समर्थन और लगाव का हवाला देता जा रहा था, वैसे-वैसे उसकी शंका और हिचक बढ़ती जा रही थी। मुझे उसकी हालत और प्रतिक्रिया देखकर लग रहा था जैसे बड़ी मुश्किल से हाथ आया उसका 'स्वराज' मैं अपने तर्कों और दलीलों से छीने ले रहा हूँ। उसका इस तरह 'हमलोलों-अपने लोगों' पर अडिग रहना और मुझे खारिज करना धीरे-धीरे मुझे बर्दाश्त के बाहर लगने लगा और तब मैंने चेतावनी में कहा था, ''सोच लो! बिहार के लड़के झारखंड बनने से वैसे भी खुश नहीं हैं। तुम्हारे उत्सव की सुरक्षा के लिए भी यह जरूरी है कि तुम मुझे शामिल रखो!'' यह चेतावनी देकर मैं खुश नहीं था। मैं सहजता, सरलता से उसके उत्सव में शामिल होकर अपनी खुशी जाहिर करना चाहता था। लेकिन अंततः मुझे सहारा अपने उसी 'छवि' का लेना पड़ा जिसके लिए मैं बदनाम था। जो जोड़-तोड़ में माहिर था, जिसका कोई काम कभी रुकता नहीं था, जिसने खुद से शायद ही कभी मार-पीठ की हो लेकिन जिसकी उपस्थिति से मार-पीट का भय लगे, जिसके हित-नात, दोस्त-रिश्तेदार हर जगह फैले थे और अंततः वह वही था जिससे बचने के लिए मैं खुद को संवेदनशील, जिम्मेवार, जागरूक और प्रगतिशील दिखाने का अब तक प्रयत्न करता था - हाई कास्ट हिंदू मेल - एच.सी.एच.एम.!

अंततः मैं उस झारखंड उत्सव में शामिल हुआ ही, लेकिन वही हाई कास्ट हिंदू मेल के प्रतिनिधि चरित्र के रूप में। इस बीच कई लोग मुझे अलग-अलग तरीकों से समझाने की कोशिश करते रहे थे - शार्दूल भाई जाने दीजिए! हमलोगों का निजी किस्म का कार्यक्रम है। समाज की महिलाएँ, लड़कियाँ होगी। आप लोगों के सामने सहज नहीं हो पाएँगी! या फिर यार शार्दूल! एक कमेटी है हम लोगों की, जो तय करती है कि किसी को बाहर से बुलाना है या नहीं। तुम्हारा नाम रखा था हम लोगों ने लेकिन यह पास नहीं हो पाया! एक तल्ख मुस्कराहट के साथ मैं सबके मशविरे और गुजारिश सुनता रहा! मैंने बाखला से स्पष्ट कहा था कि मुझे बाहरी न समझा जाए, इसलिए झिझक का तो कोई सवाल नहीं और कमेटी मेरे बारे में सोच-विचारकर कोई फैसला करे क्योंकि असुरक्षित कार्यक्रम तो वह भी करना नहीं चाहेगी।

उत्सव की सुबह जब बाखला मेरा कार्ड मुझे देने आया था, तो उसके चेहरे से लग रहा था जैसे वह अपनी आजादी, अपनी पहचान और अपने अधिकार का मृत्युपत्र मुझे दे रहा हो। उसकी लाचार सूरत देखकर एकबारगी मेरी इच्छा हुई कि मैं जाने से मना कर दूँ, लेकिन बात इतनी ज्यादा बढ़ चुकी थी कि मेरे न जाने में मुझे अपनी हेठी दिखाई दे रही थी। इसलिए मैं न केवल वहाँ गया, बल्कि अपने वहाँ होने की महत्ता भी दिखायी। शुरूआती झिझक और संकोच के बाद तो जैसे मैं वहाँ उन्हीं का हो गया। हँड़िया-पचौनी के बाद घेरेबंदी के नाच का ऐसा मजा आया कि मुझे पहली बार लगा कि झारखंड होने का क्या मतलब था... नहीं तो मैं ज्यादातर आर्थिक मसलों और निष्कर्षों पर ही सोचा करता था कि झारखंड के खनिज सम्पदा और औद्योगिक इकाइयों का पर्याप्त शोषण और दोहन बिहार सरकार और वहाँ की जनता ने किया है, लेकिन वहाँ, उस उत्सव में चारों तरफ ऐसी नायाब चीजें दिख रही थीं जो मेरे लिए बिल्कुल अनजानी थीं।

जय झारखंड! जोहार झारखंड के साथ मैं मस्त होकर वापस आया था, लेकिन उसी दिन से बाखला और मेरी एक साथ की उपस्थिति माहौल में असहजता ला देती। मुझे देखते ही उसमें खुद को हारने और कमजोर होने का भाव गहरा जाता और चूँकि मेरे न चाहने के बावजूद ऐसा होता था, इसलिए मैं भी एक दूसरे भाव में आ जाता। शायद अपराधबोध में।

और आज। आज उसे देखकर लग रहा था कि जैसे मैं पठान होऊँ और जुए में हारे गये पैसों का हिसाब उसके गोश्त या खून से ही चुकाने वाला हूँ! दरअसल हॉस्टल की सीढ़ियों के पास ही हॉस्टल का टेलीफोन था, जो उन दिनों नया-नया ही लगा था। शुरू में केवल वह रिसीविंग की सुविधा तक के लिए था परंतु 'आई.टी.बी.एच.यू.' के शानदार खुराफाती मस्तिष्क के कारण वह 'टू-वे' हो चला था। नयी उम्र के लौंडे दिन-भर फोन के पास जमावड़ा लगाये रहते, जो देर-रात तक जारी रहता। उस दिन सुबह-सुबह जब मैं चाय पीने के लिए उतर रहा था तो फोन पकड़े आजाद शेखर खड़ा था। उसे देखकर मैं कौतूहल ओर उत्सुकतावश रुक गया। उसने माउथपीस पर हाथ रखकर एक आँख दबाते हुए फुसफुसाकर कहा, ''वही है! उसी को कॉल लगाया है।''

मैं समझ गया, फिर भी अनजान बनते हुए पूछा, ''कौन वही'

''अबे वही! पार्टी वाली! ब्रिजिट!''

मैंने उसी दिन जाना कि उस लड़की का नाम ब्रिजिट था।

''बात करोगे?' उसने फिर पूछा।

दरअसल, इतनी सुबह-सुबह फोन करके कॉल तो उसने लगवा दी थी, लेकिन अब पछता रहा था कि कहीं वह ऐसा-वैसा समझकर बिफर न पड़े कि इतनी सुबह, वो भी इतवार को, ऐसी क्या बात हो गयी! वैसे भी यह बात सबको पता थी कि गर्ल्स हॉस्टल में जिन लड़कियों के लिए कॉल लगती है उसे सब अजीब नजरों से देखती हैं, खासकर नयी लड़कियों के लिए तो यह आफत का ही सबब होता था। मैं इस स्थिति के लिए तैयार नहीं था। जब उसने मेरे हाथों में रिसीवर थमाया। मैं उजबक-सा उसका मुँह ताक रहा था! तभी मेरे कानों ने सुना, ''हेलो'

मैं यूँ ही रिसीवर थामे खामोश रहा।

''हेलो... कौन है भाई?'

संयोग में मैं बहुत यकीन नहीं करता हूँ लेकिन इतिहास की उस धारा को क्या कहा जाए जो 'टिलियोलॉजी' कहलाती है! सबकुछ का होना तय रहता है, हम तो केवल उस क्षण के हिस्से बन जाने को अभिशप्त होते हैं। भारत क्या, समूचे विश्व के इतिहास की घटनाओं पर नजर डालें तो ऐसा न हुआ होता, कैसा होता, या ऐसा हो जाता, तो फिर कैसा होता के आश्चर्य से भरा होता है! मध्यकालीन इतिहास के बर्बरतम पन्नों में एक दाराशिकोह का वह लोमहर्षक हश्र! यदि हम बर्नियर की बात पर यकीन करें तो उस निर्णायक युद्ध में, जिसके बाद उसका सिर काटकर शाहजहाँ को पेश किया गया था, वह बिल्कुल जीत के कगार पर था। केवल एक चूक! अपने किसी सिपहसालार की बात मानकर वह हाथी से उतरकर घोड़े पर आ गया। बाजी वहीं पलट गयी! उसके सिपाहियों को लगा कि उनका सेनापति दारा मारा गया और जीतती फौज भाग खड़ी हुई। बहुत दूर क्यों सोवियत संघ को ही लें! यदि ट्रॉटस्की उस एक दिन मुर्गाबियों के शिकार पर न गया होता और वहीं उसे न्यूमोनिया न हो गया होता, तो आंतरिक युद्ध में स्टालिन का पराभव तय था। फिर क्या दशा और दिशा होता सोवियत संघ की।

और इसी तर्ज पर मुझे भी लगता है और लगने का हक भी है कि यदि उस दिन ठीक उसी समय मैं हॉस्टल की सीढ़ियों से उतरकर चाय पीने न जा रहा होता, तो यह खेल भी शुरू न हुआ होता।

अचानक मेरी इंद्रियाँ जाग्रत हो गयीं। फोन के दूसरे सिरे पर कोई लड़की थी, यही बात मेरे भीतर के वाचाल को जगाने के लिए पर्याप्त थी!

''हलो... कौन ब्रिजिट जी...'

''जी! कहिए... कौन है भाई?'

''बिना जाने-पहचाने किसी को भाई नहीं कहते मोहतरमा, बाद में हेठी हो जाती है!''

''अरे... कौन हैं भई आप?'

''फिर वही! कहा तो, इतनी जल्दी संबंध न बनाया जाए तो अच्छा है!''

''अरे कमाल है, जान न पहचान, मैं तेरा मेहमान...''

''मेहमान तो आप हैं हमारी। नयी आयी हैं। हम तो मेजबान हैं। और देखिए ये खास बात कि मौका होने पर भी हम फायदा उठाना नहीं चाहते, वरना क्या बात है कि खाकसार मेहमान नहीं होना चाहता!''

''ओफ्फोह! आप बताएँगे कि कौन हैं आप?'

''बहुत करीबी हूँ आपका! नाम न पूछेंगी, तो कुछ और बता सकता हूँ आपके बारे में... मसलन आपकी आँखों, आपकी मुस्कराहट और सबसे ज्यादा तो आपकी बातें...''

''बकवास! ...क्या बकवास कर रहे हैं आप मैं फोन रख रही हूँ।''

''यह तो जुल्म है! मैंने तो सुना है, हजारीबाग वाले दिल में हजार ख्वाहिशें रखते हैं।''

''अरे! आप यह भी जानते हैं कि मैं हजारीबाग से हूँ...!'

''मैंने बताया न, मैं आपकी हँसी की खनक की सरगम भी जानता हूँ!''

''भाई, आम इंप्रैस्ड। नाऊ प्लीज टेल मी, कौन हैं आप?'

''मैं बता दूँगा! लेकिन प्लीज! इतना बता दीजिए कि मुझसे बात करके आपको बुरा तो नहीं लगा?'

''नहीं! बिल्कुल नहीं! ...लेकिन मैं पजल्ड हूँ!''

''इंज्वॉय इट! इट इज जस्ट अॅ फन! लेकिन मैं तो आपका फैन हूँ!''

''लेकिन...''

''लेकिन-वेकिन छोड़िए! मैं फिर फोन करूँगा आपको, यदि आप मना न करें।''

''अरे! यह तो टू मच है, आप अपना नाम तो बताइए।''

''क्या फर्क पड़ता है, यदि मैं कहूँ मैं 0007 हूँ! या कोई और हूँ। यही जानिए कि आप बहुत अच्छी हैं और मैं आपको अच्छे से जानता हूँ! फिर फोन करूँगा मैं... बाय...''

''अरे! अजीब बात है!'' यह आखिरी वाक्य था जो मेरे कानों से टकराया था और एक अजीब-सी कौंध मेरी आँखों में कौंधी थी, जब मैंने रिसीवर रखा था। उस कौंध और उस बातचीत में मेरी पलकें भारी हो गयी थीं! रिसीवर रखकर जब मैं मुड़ा तो आजाद शेखर को अपनी ओर आश्चर्य, विस्मय, भय और कौतूहल से ताकते पाया!

''गया बेटा तू आज से! लड़की तो आ गयी लगती है मेरे चक्कर में!'' मैं उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोला!

''अबे स्साले! तुम ऐसा कैसे कह सकते हो?' उसकी काँपती-सी आवाज निकली।

''देखा नहीं अभी तो एक बार की बातचीत है और वो ऐसी है! जब आगाज ऐसा है तो अंजाम की तुम खुद सोच सकते हो!''

''ऐसा नहीं है! वह तुमसे फ्लर्ट कर रही थी! फोन पर तो कोई भी ऐसा करता है!''

''अच्छा तुमसे कितनी लड़कियों ने ऐसा किया है बेटे, मैं शर्तिया कह रहा हूँ! चार-छह बातचीत में लड़की यहाँ...।'' मैंने चुटकी बजाते हुए और अपनी बाँहों को फैलाते हुए इशारे में कहा।

उसका चेहरा तमतमा गया। उसे निश्चय ही उस लड़की पर क्रोध आ रहा होगा। लेकिन वह किसी भी कीमत पर मुझसे हारना नहीं चाह रहा था। उसकी कसमसाहट से मुझे मजा आ रहा था। मेरे भीतर बैठी शार्क पहले जैसे जोरों से उछली। मैंने फिर से उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ''चलो! छोड़ा मैंने! तुम भी क्या याद करोगे!''

उसका तमतमाया चेहरा और लाल हो गया। बोला, ''ऐसी गलतफहमी में मत रहना। लड़की प्यार करती है मुझसे।''

''दिल को बहलाने को गलिब ये ख्याल अच्छा है। हकीकत तुम भी जानते हो। मेरे जैसे आदमी से ऐसी बात नहीं करनी चाहिए नहीं तो तुम तो जानते ही हो, मैं कुछ ठान बैठूँगा।''

यह उसके अहम् पर घनघनाती हुई चोट थी। वह बिफर पड़ा। लेकिन उसकी आवाज संयत थी, ''चलो लग गयी शर्त! तुम उस लड़की को जरा भी प्रभावित नहीं कर पाओगे।''

''मंजूर है! लेकिन तुम उसे बताओगे नहीं कि मैं कौन हूँ! यदि मर्द हो तो इसे कबूल करो!''

दुनिया में कम ही लोग होते हैं, जो मर्द नहीं कहलवाना चाहते। उसने यह शर्त मंजूर की, मेरे साथ चाय पी और यह तय रहा कि पचीस दिनों के भीतर मुझे कुछ कर गुजरना है, वरना छब्बीसवें दिन वह उसे खुल्लमखुल्ला कह देगा कि वह उससे प्यार करता है। तब मुझे भरी पब्लिक में कान पकड़कर कहना पड़ेगा कि वह मेरा बाप है, मैं तो मूर्ख हूँ!

यह एक ऊँचा दाँव था मेरे लिए। इसमें पिटने का मतलब था लोग बेकार में मुझे शार्क कहते थे, था तो मैं गधा ही। मैं उस लड़की को बिल्कुल नहीं जानता था। मैं यह भी नहीं जानता था कि अपने मामले में आजाद शेखर कितनी दूर तक बढ़ चुका है। अजीब अंधा खेल था, जो मुझे सिर्फ फोन के सहारे खेलना था। मेरा हथियार सिर्फ मेरी आवाज थी जो मुझे ठीक से पता नहीं थी कि कितनी कारगर है।

चाय पीकर वापस लौटते समय मैं चुप था। आगामी योजनाओं के बारे में सोच रहा था, जबकि आजाद शेखर जरूरत से ज्यादा बोल रहा था कि मैंने अपनी शेखी में गलत फैसला ले लिया है, मुझे इस बार अपनी औकात का पता चल जाएगा... और भी बहुत कुछ!

दूसरे दिन मैंने लड़की को फोन नहीं किया। तीसरा दिन भी यूँ ही जाने दिया। चौथे दिन दोपहर को जब अमूमन फोन के पास कोई नहीं होता था, मैंने उसको फोन लगवाया।

''हलो...' एक उनींदी-सी आवाज आयी।

''उम्मीद है इन दो दिनों में मैं आपके सपनों में तो हर्गिज नहीं आया होऊँगा!''

''ओह! आप!' लड़की के मुँह से बेसाख्ता निकला।

''शुक्र है! आप झल्लायीं नहीं। वैसे झल्लाने से जो आपकी पेशानियों पर बल पड़ते हैं, वह मुझे खास तौर से पसंद हैं।''

''क्या किस पर क्या पड़ता है' वह उत्सुक हो उठी थी।

''पेशानी! मतलब आपका माथा और उस पर बल, मतलब सिलवटें।''

''ओफ्फोह! बहुत डेंजरस हिंदी बोलते हैं आप!" उधर से खिलखिलाहट थी, लेकिन हिंदी के साथ का डेंजरस विशेषण मुझे काफी खतरनाक और लगभग भयावह लगा था! इससे मेरी 'लिरिकल चेतना' पर व्याघात हुआ था, लेकिन अब मैं कुछ कर नहीं सकता था। गैरमामूली दाँव में मामूली चीजों के देवता कूच कर जाते हैं।

''अरे नहीं! आप हिंदी-विंदी पर न जाइए। वैसे भी आपकी उपस्थिति को भाषा में बाँधा नहीं जा सकता।'' कहा मैंने यह जानते हुए कि आशय नहीं, इसकी अनुगूँज और कसावट उसे प्रभावित करेगी।

वह काफी देर तक चुप रही। फिर उसकी धीरे-से आवाज आयी, ''लेकिन कौन हैं आप मैं अब परेशान हो रही हूँ।''

''लीजिए, आप परेशान न हों! ऐसा मेरा कोई इरादा नहीं, पृथ्वी सिंह, पृथ्वीराज सिंह नाम है मेरा! साइंस पढ़ता हूँ, एम-एस.सी फर्स्ट ईयर।''

''लेकिन यह नाम मैंने कहीं नहीं सुना। मैं आपको एकदम से नहीं जानती।''

''कैसे जानेंगी आप कामर्स जो पढ़ती हैं। इतिहास पढ़ा होता आपने तो जानतीं। मैं बड़ा प्रतापी राजा हुआ करता था, तब आप यह भी जानतीं कि आपका नाम संयोगिता होता।''

''उफ्! आपसे तो बात ही करना मुश्किल है। कितना बोलते हैं आप, मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा।''

''समझ तो मुझे भी नहीं आ रहा है! लेकिन प्लीज! आप मुझे खुद ही समझने का मौका दीजिाए। वैसे यदि आप बहुत परेशान हो रही हों तो मैं फिर फोन न करूँ।'' यह अँधेरे में तीर था।

''नहीं, नहीं, मैंने ऐसा कब कहा।'' लेकिन निशाना सटीक था!

मैं बढ़त में था! फोन रखने के बाद मैं आजाद शेखर के पास गया और उसे पूरी बातचीत बतायी! उसे फिर 'मर्द' वाली बात याद दिलायी और यह भी कहा कि यदि वह डर रहा हो तो मैं यह खेल अभी भी खत्म कर सकता हूँ। लेकिन डरने जैसी बात पर वह थोड़ा नाराज हो गया। उसने मुझे बताया कि उसका नाम आजाद शेखर है और इतिहास की थोड़ी-बहुत जानकारी भी यदि मुझे हो तो समझना चाहिए कि इस नाम के लोग डरते नहीं, डराते हैं। यह कहते हुए वह थोड़ा हँसा। उसकी हँसी में गहराई थी, यह मुझे महसूस हुआ!

दिन लगातार बीत रहे थे पचीस दिन - ये मनुष्यता के इतिहास में कोई नहीं जानेगा। लेकिन ये दिन मेरे लिए 'उन दस दिनों' से कम नहीं थे जब जॉन रीड के लिए दुनिया हिल उठी थी। मैं काफी सधी चालें चल रहा था। मुझे यह सुविधा थी कि मैं लड़की को पहचानता था, वह मुझे नहीं। मैं बाजार में, लाइब्रेरी में, घाट पर या मंदिर पर बिल्कुल उसके आसपास ही खड़ा होता। उसकी एक-एक हरकत पर नजर रखता। मसलन उस दिन उसने कौन से कपड़े पहने हैं, वह क्या चीजें खा रही है, क्या खरीद रही है और कभी-कभी तो इतने करीब कि उसके नेलपॉलिश और लिपस्टिक के रंग तक की जानकारी मुझे हो जाती। मैं शाम को या कभी-कभी रात में उसे फोन करके ये सारी बातें बता देता था। वह बिल्कुल चौंक पड़ती थी! वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर कौन हूँ मैं जो हवा, धूप और बादल की तरह उसके आसपास रहता हूँ लेकिन जिसे वह छू नहीं पाती है। मैंने फोन पर उसे एहसास दिलाया कि वह बहुत खूबसूरत है और मैंन महसूस किया कि वह जब भी मुझे दिखती थी, कुछ ज्यादा ही बनी सँवरी-सी दिखती थी। कभी-कभी जब मैं उसे देखता था तो लगता था उसकी नजरें किसी को ढूँढ़ रही हैं। फोन पर वह मेरे कंप्लेक्सन और हाइट के बारे में पूछती। मैंने बताया कि मैं बहुत साधारण हूँ। रंग मेरा खिलता-सा दरम्यानी है और हाइट पाँच ग्यारह के आसपास। उसने कहा, यह तो बहुत है। आप निश्चय ही काफी हैंडसम दिखते होंगे!

उसे अपने साँवले रंग पर कोफ्त हुई। कहा उसने कि मैं तो बिल्कुल दबती-सी साँवली हूँ। पता नहीं आपको मुझमें ऐसा क्या दिखता है! मैंने कहा कि वो अपनी आँखें बंद कर मेरी आँखों को अपने चेहरे पर महसूस करने की कोशिश करे, उसे खुद से कोई शिकायत नहीं रहेगी।

ये सब हवाई बातें थीं। वह हवा में उड़ती जा रही थी। मैं आजाद शेखर से नियमित मिल रहा था। मैं उसे बताता था कि उस लड़की से मेरी क्या-क्या बातचीत हुई। फोन की बातचीत उसके कमरे में दुहारते हुए मैं जैसे एक हिंसक बनैले पशु में तब्दील हो जाता था। जितने मुलायम और शानदार शब्द मैं उस लड़की के लिए कहता था, मुझे पता था कि वे उतने ही कँटीले और खतरनाक हैं उसके लिए।

लड़की ने मुझे अपने घर-परिवार के बारे में बताया। उसने बताया कि चार भाई-बहनों में वही पहली है जो पढ़ने के लिए घर से बाहर आयी है। यह भी कि वह काफी डरी हुई थी और उसके परिवार वाले भी, लेकिन इस बार जब वह छुट्टियों में जाएगी तो बता पाएगी कि दुनिया उतनी बुरी भी नहीं है।

मैं जानता था, उसके लिए दुनिया बहुत बुरी साबित होने वाली है। मैं महसूस कर पा रहा था कि उसकी हँसी पहाड़ी झरने-सी निश्छल और अल्हड़ है। वह एकदम महुए या टेसू के फूल की तरह महकती और कोमल है। मैं यह भी जानता था, मेरे साफ-शफ्फाक दिखने वाली भाषा के भीतर एक तेजाब बह रहा था। एक हिंसक खेल था, जो न जाने मैं क्यों और किससे खेल रहा था। उससे बातें करते हुए अब मुझे डर लगने लगा था। मैं जानता था कि आदिवासी समुदाय में प्रेम, शरीर, आकर्षण सब एक ही बातें थीं लेकिन मैं उसे शब्दों के जाल में उलझा चुका था। वह उन शब्दों पर यकीन करने लगी थी। यह छल था, घात था। मैं आजाद शेखर पर जीतता हुए दिखते हुए भी खुद से हार रहा था। मैं दिल से चाह रहा था कि खेल खत्म हो जाए।

वह छब्बीसवाँ दिन था, जब नियम के मुताबिक मेरी मियाद खत्म होनी थी। इस बीच मैंने कई बार चाहा कि बता दूँ उसे मैं कोई पृथ्वीराज सिंह नहीं हूँ, मैं शार्दूल सिंह हूँ। मैंने ये सारे शब्द तुमसे किसी खेल, किसी शर्त के कारण कहे हैं। लेकिन हर बार मेरी जुबान को लकवा मार जाता। मैं जानता था कि ये पचीस दिन आजाद शेखर पर भी काफी भारी पड़े होंगे। छब्बीसवें दिन मैंने सुबह लड़की को फोन किया, उससे कहा कि आज मैं उससे मिलना चाहूँगा। वह इस पर यकीन ही नहीं कर पा रही थी। मैंने कहा, ''चलो आज दस बजे ही मिल लेते हैं।'' इस प्रस्ताव पर वह थोड़ी झेंपी और बोली, ''नहीं दस बजे मुझे थोड़ा काम है, एक सहेली से मिलना है! आज शाम को मिलेंगे।''

मैं जानता था कि दस बजे आज उसे आजाद शेखर से मिलना था। उसकी प्रार्थना पीड़ा की आज असली परीक्षा थी। मैं दिल से चाह रहा था कि उसकी प्रार्थना जीते। क्योंकि मुझे जीतकर कुछ चाहिए नहीं था, जबकि उसकी हार से उसका सबकुछ चला जाना था, कुछ हद तक मेरा भी नष्ट होना था। मैं दो बजे आजाद शेखर के कमरे में पहुँचा। वहाँ भरी गर्मी में पंखा बंद कर चादर ओढ़े लेटा था। उसे देखते ही मैं वस्तुस्थिति समझ गया। उसकी हालत देखकर मुझे झुरझुरी हो आयी। मरी-सी आवाज में कहा मैंने, ''क्यों, मानते हो बाप अपना मुझे!''

उसने एक फीकी-सी हँसी से इसका स्वागत किया। धीरे-धीरे उसने सबकुछ बताया कि किस तरह उसने आज लड़की से कहा कि वह पहले दिन से ही उसे चाहता है। उसका प्यार सच्चा है... वगैरह... वगैरह....

लड़की ने कहा कि वह तो उसे अपना बड़ा भाई जैसा मानती थी, जैसे बाखला भैया, वैसे वह। उसने तो कभी सपने में भी उसके बारे में नहीं सोचा।

''जबकि यह बात सच नहीं थी।'' आजाद शेखर ने कहा। ''उसे पहले दिन से ही पता था कि मैं उसके बारे में क्या सोचता हूँ। यह भाई वाली बातें पिछले ही दिनों की उपज हैं।''

''नहीं, हो सकता है तुम्हें केवल लगता हो कि वह तुम्हारी भावनाओं को समझती है।'' मेरी हारी हुई-सी आवाज निकली।

''मैं भी ऐसा सोच सकता था, यदि वह मुझसे पृथ्वीराज सिंह के बारे में जानना नहीं चाहती तो...।'' कहकर शेखर ने पुनः चादर ओढ़ ली। मैं चुपचाप उठकर चला आया।

शाम को मुझे लड़की से मिलना था। मैं शहर से ही भाग जाना चाहता था। मैं उससे माफी माँग लेना चाहता था। मैं उसे बात देना चाहता था। मैं आजाद शेखर के लिए उससे प्यार की भीख माँगना चाहता था, जबकि मैं अच्छी तरह जानता था कि सबकुछ खत्म हो गया है।

दो दिनों तक मैंने उसे फोन नहीं किया। तीसरे दिन जब उसे फोन किया तो एक अपरिचित-सी आवाज आयी, ''कौन पृथ्वीराज सिंह, या शार्दूल सिंह?' मैंने काँपते हुए पूछा, 'आप कौन?' वह ब्रिजिट की सहेली थी। परसो ही ब्रिजिट को सारी सच्चाई पता चल चुकी थी। उसे सुनकर बहुत तेज बुखार चढ़ आया था। मैंने पूछा कि क्या मैं एक बार उससे बात कर सकता हूँ - तब तक एक क्षीण-सी आवाज सुनाई पड़ी ''कौन! आप?' वह ब्रिटिज थी। ''...मेरी माँ ठीक ही दुनिया से बचकर चलने को कहती थी। मैं ही ज्यादा भोली थी। मैंने अपना क्या बिगाड़ा था! मैं तो पहली बार ही घर से बाहर निकली थी। अब तो यह दुनिया हमेशा के लिए बुरी हो गयी मेरे लिए। मैंने सोचा था प्यार के बारे में, यह भी कि यह बहुत अच्छा अहसास होता है, लेकिन अब तो मैं किसी से भी प्यार नहीं कर सकूँगी!'' टूटती-सी हिचकियों से रुँधी-बँधी उसकी आवाज आती गयी। रिसीवर पकड़े मेरा हाथ पसीज रहा था, लेकिन मुझे लग रहा था किसी चूजे के जिबह का खून रिस रहा हो।

वह लड़की बार-बार पूछ रही थी कि मैंने ऐसा क्यों किया। मैं एक बार ही बोल पाया, ''मैं आपको सच्चाई बताने ही वाला था।''

''ठीक है, सच्चे आदमी! मैंने सच्चाई जान ली है। अब कभी मुझे फोन न कीजिएगा और यदि कोई ईश्वर है आपके लिए तो किसी लड़की के साथ ऐसा न कीजिएगा...'' उसने रिसीवर रख दिया। मैं भारी मन से लौटता हुआ सोच रहा था मैंने आखिर ऐसा क्या कर दिया। इस दुनिया में लोग लड़की के साथ क्या-क्या कर जाते हैं, मैंने तो उसे छुआ तक नहीं। लेकिन जैसे-जैसे मैं सोचता जाता था, वैसे-वैसे ही मेरे भीतर रुलाई का जोर मारता जा रहा था। अंत में हॉस्टल पहुँचते-पहुँचते मैं रो ही पड़ा। मेरे जैसे आदमी का यूँ रोना समूचे हॉस्टल में चर्चा का विषय हो सकता था। मैंने देखा कि मैं बाखला के कमरे में रो रहा था और बाखला ने दरवाजा बंद कर दिया था ताकि लोग इस पर चर्चा न करें। कुछ दिनों बाद मुझे पता चला कि आजाद शेखर अपने घर चला गया था। मुझे लगा कि शायद छुट्टियों के बहाने गया हो या यूँ ही मन बहलाने, लेकिन बाद में बाखला ने ही बताया कि उसने वहाँ क्रेशर का काम सँभाल लिया था और बनारस लौटने की उसकी कोई इच्छा नहीं थी।

मैंने एक बार दबी जुबान में बाखला से ब्रिटिज के बारे में भी जानना चाहा तो उसे बताया कि उसका सलेक्शन उसी वर्ष रूरल मैनेजमेंट के लिए राँची में हो गया था और वह तो उसी समय चली गयी थी। मैंने एक बार उससे कहा भी कि उस दौरान मुझसे बड़ी भारी गलती हुई थी और उन सब बिखराव के पीछे कहीं न कहीं मेरा ही हाथ है तो जैसे उसने कुछ सुना ही नहीं और गिटार पर बहुत तेज कोई गाना गाने लगा था। बोल तो मुझे समझ में नहीं आया, लेकिन मुझे उसका तेज होना पसंद आया था। शायद उससे अंदर का कोई शोर दबता हो। उसका भी और मेरा भी।


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