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उपन्यास

मेरे मुँह में ख़ाक
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

अनुवाद - तुफ़ैल चतुर्वेदी

अनुक्रम सीजर, माताहारी और मिर्जा पीछे     आगे

'हाय अल्लाह! यह हाथी का हाथी कुत्ता काहे को ले आए?'

'चौकीदारी के लिए।'

'किस की?'

'घर की!'

'इस घर की?'

'हाँ! बहुत ही होशियार कुत्ता है घर में कुछ न हो तब भी चौकीदारी कर सकता है।'

इस संवाद से बाद में यह लाभ अवश्य हुआ कि वेतन मिलते ही हमने घर गृहस्थी का जुरूरी सामान खरीद डाला ताकि कुत्ता उसकी चौकीदारी कर सके, लेकिन माँ-बाप की समझ में आने वाला जो त्वरित लाभ हमने अभी बयान किया, इससे अपने अबोध बच्चों को जान-बूझकर वंचित रखने के लिए पत्थर का कलेजा चाहिए। वह लाभ यह था कि हमारे यहाँ अनपढ़ से अनपढ़ आदमी भी अपने कुत्ते का नाम अंग्रेजी में रखता है और अंग्रेजी ही में उससे बातचीत और डाँट-डपट करता है। चुनांचे हमने सांकेतिक तौर पर ध्यान दिलाया कि इस कारण से बच्चों को अंग्रेजी बोलनी आ जाएगी।

यह सुनते ही बेगम ने कुत्ते के सर पर हाथ फेरा और जंजीर ऐसे निर्णयात्मक झटके से हमारे हाथ से छीन ली, जैसे लेडी मैकबेथ ने मैकबेथ के हाथ से खंजर छीना था :

Inform of purpose!

Give me the dagger...

अच्छा याद आया! इस ड्राप सीन से कोई बीस साल उधर जब आतिश जवान, बल्कि नौजवान था, उसने नीली आँखों, भरी-भरी टाँगों और ब्लांड बालों वाली मेम को बाग में अपने पॉकेट साइज के 'पामरेनियन' कुत्ते को भींच-भींचकर प्यार करते देखा था। था भी जालिम इसी काबिल। गोल-मटोल, झबरा, सफेद गाले से बालों से सारा शरीर इस बुरी तरह ढँका हुआ था कि जब तक चलना शुरू न करे यह बताना मुश्किल था कि मुँह किस तरफ है। हाय! वह भी क्या जमाना था जब हर चीज जवान थी, हर चीज हसीन थी। हर चीज पर टूट के प्यार आता था, कैसे महकते दिन थे वह भी।

 

मिरी साँस में है गर्मी कि ये लू-सी चल रही है

अच्छी तरह याद है कि इन पापी आँखों को जंजीर के दोनों तरफ हुस्न नजर आया और दिल में यह प्यार-भरी हसरत करवट लेने लगी कि अंग्रेज की गुलामी से आजाद होने के बाद कभी चैन और कुंज की छाँव मिली तो एक नीली आँखों, भरी-भरी टाँगों और ब्लांड बालों वाला कुत्ता जुरूर पालेंगे मगर एक तो मिर्जा के कथनानुसार उच्च-जाति के कुत्ते बड़े महँगे दामों मिलते हैं, दूसरे उस जमाने में मकान इतना तंग था कि जानवर का तंदरुस्त रहना मुश्किल। वह तो खुदा भला करे मिस्टर एस.के. डीन (शेख खैरूद्दीन) एम.ए. (आक्सन) का जो हमारे प्रेम की आग को हवा देते रहे। यह हमारे दूर परे के संबंधी पड़ोसी थे। इनके पास एक बड़ा जबरदस्त कुत्ता था। असील 'ग्रे हाडंड', जिसे वह पड़ोसियों का खून पिला-पिला कर पाल रहे थे। जिस्म ततैय्ये जैसा और स्वभाव भी अर्थात वही। यूँ तो भौंकने की सारी व्यवहारिक विधाओं में पारंगत था, लेकिन चाँदनी छिटकी हो और मूड बन गया हो तो फिर कुछ ऐसी 'ओरीजनल' शैली का उपयोग करता कि जितनी बार भौंकता तबीअत को हर बार एक नई कुढ़न हासिल होती। देखा गया है कि ऐसे वैसे शौकिया भौंकने वाले कुत्ते की साँस तो दो-चार बार ट्याँऊ-ट्याँऊ करने में उखड़ जाती है, मगर यह कुत्ता बकौल मिर्जा, उर्दू में भौंकता था यानी भौंकता ही चला जाता था। कहने वाले कहते थे कि मिस्टर एस.के. डीन अपने खुद के बुजुर्गों को अपने लायक नहीं समझते थे मगर अपने असील कुत्ते की वंशावली पंद्रहवीं पीढ़ी तक फर-फर सुना देते और उसके पुरखों पर ऐसे गर्व करते, जैसे उनका शुद्ध रक्त मिस्टर डीन की अपनी मूल्यहीन रगों में दौड़ रहा है। कहते थे, नहर के इस पार इतना शुद्ध और खूँख्वार कुत्ता ढूँढ़े से नहीं मिलेगा। इसका दादा पंद्रह जून 1941 को पौंडिचेरी में देसी कुत्तों से लड़ता हुआ मारा गया। चाँदनी रात, हू का आलम, चौराहे पर घमासान का रण पड़ा, कुत्तों के पुश्ते लग गए। मुहल्ले में मशहूर था कि मिस्टर के यहाँ कोई घबराया-घबराया भी फायर ब्रिगेड को फोन करने चला जाए तो उसे अपने स्वर्गीय कुत्तों के अलबम दिखाए बिना फोन को हाथ नहीं लगाने देते थे। ड्राइंग रूम में मिस्टर डीन की एक बड़ी-सी तस्वीर भी टँगी थी, जो उन्होंने अपने कुत्ते के जीते हुए कप और ट्राफियों के साथ खड़े होकर और उसके बिल्ले कोट पर लगाकर खिंचवाई थी। हमारी एक प्राचीन इच्छा और आसक्ति को ध्यान में रखते हुए अकेले में हमें अपने टेपरिकार्डर पर मौजूदा कुत्ते के स्वर्गीय पिताश्री का भौंकना सुनाया, सुनकर उनकी आँखें छलक पड़ीं और हमें भी उनकी हालत देखकर रोना आ गया।

कुत्ता पालने की इच्छा हमने बहुत बार मिर्जा के सामने रखी, मगर वह कुत्ते का नाम आते ही काटने को दौड़ते हैं। कहते हैं, हटाओ भी। वाहियात जानवर है, बिल्कुल अनुपयोगी। कुत्ते की उत्पत्ति का एक मात्र उद्देश्य यह था कि पितरस उस पर एक लाजवाब लेख लिखें, सो यह मंतव्य, युग बीते पूरा हो चुका और अब इस नस्ल को जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं। वह तो यहाँ तक कहते हैं कि यह नस्ल समाप्त हो भी गई तो उर्दू व्यंग्यकारों से इसका नाम चलता रहेगा। यूँ तो सभी जानवरों के बारे में मिर्जा को जानकारी जालिमाना हद तक अधूरी है (मसलन अभी कल शाम तक वह लोमड़ी को गीदड़ की मादा समझे बैठे थे और - गजब खुदा का - बड़े चींटे को आम चींटी का नर) मगर कुत्तों के साथ वह विशेषकर सांप्रदायिक व्यवहार करते हैं और अपनी बात को सिद्ध करने के लिए एक से एक दलील पेश करते हैं। मिसाल के तौर पर एक दिन कहने लगे -

'जिस घर में कुत्ता हो, उस घर में चोर ही नहीं, देवदूत भी नहीं जा सकते।'

'चोर का न जाना तो समझ में आता है, मगर देवदूतों को क्या डर है?'

'इस लिए कि कुत्ता अपवित्र होता है।'

'मगर कुत्ते को साफ-सुथरा तो रखा जा सकता है। अंग्रेजों को देखिए, सुबह-शाम नहलाते हैं।'

'उपले को अगर सुबह-शाम साबुन से धोया जाए तो क्या पवित्र हो जाएगा?'

'मगर सवाल यह है कि कुत्ता अपवित्र कैसे हुआ?'

'गलत बहस करना कोई तुम से सीखे, स्वर्गीया नानी जान कहा करती थीं कि कुत्ते के मुँह में सूअर की राल होती है।'

'लीजिए, आपने अपवित्रता का एक अछूता तर्क ढूँढ़ निकाला।'

'भाई मेरे! एक मोटी सी पहचान तुम्हें बताए देता हूँ। याद रखो, हर वह जानवर जिसे मुसलमान खा सकते हैं, पाक है।'

'इस कारण मुस्लिम देशों में बकरों को अपनी पवित्रता की वजह से खासा नुकसान पहुँचा है।'

'बकने वाले बका करें। मुसलमान ने कुत्ते को हमेशा कुत्ता ही कहा। बड़े आदमियों के नाम से नहीं पुकारा, बड़े आदमियों की एक ही रही। आपने सुना नहीं कि वंशानुगत सब कुत्ते एक जमाने में भेड़िये थे? आदमी के सानिध्य में उनका भेड़ियापन जाता रहा - मगर खुद आदमी...'

'देखो तुम फिर लिटरेचर बोलने लगे। ज्ञान देना समाप्त करो यार!'

इस विषय विशेष में मिर्जा के नस्ली पूर्वाग्रह की जड़ें उनके कुत्ता-काटे बचपन तक पहुँचती हैं। इसलिए हमने अकारण उनसे उलझना मुनासिब न समझा और चुपचाप कुत्ता पालने की आकांक्षा को पालते रहे। यहाँ तक कि वह दिन आ गया जब हमारा अंग्रेज अफसर भारी दिल और उससे जियादा भारी पैरों से अपने वतन की तरफ रवाना हुआ और कूच से पहले उस लगाव के कारण जो हमें उससे और उसे अपने कुत्ते से था, पूछा, 'तुम चाहो तो मेरा कुत्ता बतौर यादगार साथ रख सकते हो। इंपोर्टिड अल्सेशियन है। तेरह माह का। 'सीजर' कह कर पुकारो तो दुम हिलाता आता है।' आप कल्पना नहीं कर सकते इस खास बुलावे में एक कमजोर दिल के आदमी के लिए ललचाहट के क्या-क्या सामान छिपे हुए थे। इसमें बिल्कुल शक न था कि इससे बेहतर कोई और यादगार नहीं हो सकती कि जब भी वह भौंकेगा, अफसर की याद ताजा हो जाएगी। फिर यह कि अल्सेशियन!

कभी हम उसको, कभी अपने घर को देखते हैं

अफसर की मामूली मेहरबानी से हमें इतनी खुशी हुई है कि बकौल मिर्जा, अगर उस वक्त हमारे दुम होती तो ऐसी हिलती कि फिर न थमती।

रही-सही हिचकिचाहट को लफ्ज 'इंपोर्टिड' ने दूर कर दिया। उस काल में हर वह चीज जो हमारे प्यारे वतन में न पैदा हुई हो, आदरपूर्ण दृष्टि से देखी जाती थी। चुनांचे हर बिगड़ा हुआ मुसलमान रईस यह साबित करने पर तुला बैठा था कि न सिर्फ उसके कुत्ते बल्कि उसके अपने बुजुर्ग भी अस्ली इंपोर्टिड थे और सिर्फ एक तलवार लेकर... से हिंदुस्तान में पधारे थे। इंपोर्टिड कुत्ता समाज में क्या हैसियत रखता है, इसका सरसरी अनुमान उन घटनाओं से लगाया जा सकता है जो दो साल पहले हमारी नजर से गुजर चुकी थीं। हम से चार घर दूर मिस्टर खिलजी, बैरिस्टर रहते थे। इनके स्वर्गीय वालिद ने चंद नायाब कुत्ते विरसे में छोड़े थे। छोड़ने को तो चंद नायाब किताबें भी छोड़ी थीं, मगर यूँ कि वह भी कुत्तों ही से संबंधित थीं इसलिए हमने जान-बूझ कर उनकी चर्चा नहीं की। इन्हीं में से एक दोगली सी कुतिया थी जिसके बारे में उनका गर्वीला दावा था कि उसकी नानी जोजफीन के संबंध रासपुटिन से रह चुके थे, जो एक इंपोर्टिड 'ग्रेट डेन' कुत्ता था। साथ ही यह कि वह शिमला सिविल एंड मिलिट्री कैनेल से इस दिलीधड़के का सर्टीफिकेट हासिल कर चुके हैं, जो उनके सोने के कमरे में आज भी आँखों को नूर, दिल को सुरूर बख्शता है। नाम माताहारी रख छोड़ा था। किसी समय में उसके लिजलिजे कान हर वक्त लटके रहते थे मगर उन्होंने शहर के बेहतरीन सर्जन से आपरेशन कराके अल्सेशियन की तरह खड़े करा लिए थे। रंग हल्का ब्राउन जैसे मीठी आँच पर सिका हुआ टोस्ट। बैरिस्टर साहब की ऐंग्लोइंडियन बीवी, जो खुद भी बड़ी भरी-पूरी औरत थी और साम्राज्य की तरह हस्तांतरित हुई थीं, उस पर अपने हाथ से यूडीक्लोन छिड़क कर, मगरमच्छ की खाल का जड़ाऊ कालर पहना कर घुमाने ले जातीं और अपने जूते से मैच करने के लिए उस पर ब्रश से खिजाब लगा देती। कभी सियाह, कभी बोलता हुआ उन्नाबी। यह तो गर्मियों की शामों के सामान्य क्रिया-कलापों में से था। जाड़े में माताहारी फ्रेंच ब्रांडी के दो चमचे गटागट पीकर ईरानी कालीन पर अपनी मालिका की तरह इटैलियन रेशम की अंगिया का आरोप लगाए सोते जागते पहरा देती थी। सूरत से भेड़िया और सीरत से भेड़। हम भेड़ इस लिए कह रहे हैं कि सुबह-शाम विलायती बिस्कुट और डिब्बे का गोश्त खाते रहने के बावजूद या शायद इसी कारण बकर-ईद की रात को मुहल्ले के कसाई के कुत्ते के साथ भाग गई और तीन रात बाद भटकती भटकाती लौटी भी तो इस तनतने से कि एक दर्जन जीवन-साथी दाएँ-बाएँ। चाल जैसे कुर्अतुलऐन हैदर की कहानी - पीछे मुड़-मुड़ कर देखती हुई, सार्वजनिक मिलन के गली-गली चर्चे। मगर अक्ल छू कर नहीं गई थी। बकौल मिर्जा बिल्कुल गधी थी। उन्हीं से सुना कि अक्सर बाजारी कुतियों के पिल्ले आकर चुसर-चुसर उसके दूध का आखिरी बूँद तक पी जाते और अपने बच्चे दुम हिलाते या प्लास्टिक की हड्डियाँ चचोड़ते रह जाते मगर ईमान की बात यह है कि चौकीदारी के लिए कतई बुरी नहीं थी कि अपनी इज्जत-आबरू के अलावा हर चीज की भरपूर सुरक्षा कर सकती थी। इसके यह लच्छन देखे तो बैरिस्टर साहब ने उसकी रखवाली के लिए एक चौकीदार रखा। इसी साल गर्मियों की छुट्टियों में वह अपने कुनबे और कुतिया समेत कार से मरी जाने लगे तो उनके नानाजान किबला ने अच्छा खासा हंगामा खड़ा कर दिया। बस अड़ गए कि मैं इस 'अपवित्र कुतिया' के साथ कार में सफर नहीं कर सकता। लिहाजा बैरिस्टर साहब उनको हमारे यहाँ छोड़ गए। जितने दिन उक्त बुजुर्गवार हमारे यहाँ मेहमान रहे रात की नमाज के बाद हाथ फैला-फैला कर उस सच्चे न्यायकर्ता से दुआ माँगते कि परवरदिगार! मालजादी माताहारी सालाना जच्चगी में अपनी भूमिका के अंत को पहुँचे। कुतिया कहीं की -! हर रंग, हर साइज की गाली उनकी दैनिक बातचीत में नगीने की तरह जड़ी होती। दिन भर नमाज की चौकी पर बैठे सबको उनके रुतबे के मुताबिक छोटी-बड़ी गालियाँ देते रहते। दुआ में भी यही रंग रहता। मिर्जा का विचार था कि वह अगर अपने दिल पर जबरदस्ती करके दुआ में से गालियाँ निकाल देते तो सारा असर जाता रहता। जो दुआ दिल से न निकले वह कैसे कुबूल हो सकती है। दुआ माँगने के वक्त के अलावा हर आए गए के सामने अपनी अवज्ञाकारी धेवती के तुलनात्मक व्यवहार (कुतिया से) की शिकायतों का पिटारा खोल देते। उनके तमाम शिकवे का सार बस यह था कि मेरे साथ कुत्ते जैसा व्यवहार क्यों नहीं किया जाता! आखिर मैं भी जानदार हूँ।

इंपोर्टिड कुत्ते और छैल-छबीली धेवती की यह मजेदार कहानी को बयान करने का कारण यह है कि लफ्ज 'इंपोर्टिड' ने अंग्रेज अफसर के मुँह से निकलते ही हमारी सुरक्षा की दीवार को एकदम ढा दिया। भला ऐसे रख-रखाव वाले कुत्ते रोज-रोज कहाँ मिलते हैं। अंततः यह अनुपयोगी शौक हमारे प्राकृतिक डर से जीत गया और जहाज का लंगर उठने से पहले हमने अपने-आपको एक खुशनसीब कुत्ते का मालिक पाया।

लेकिन एक बात के लिए हम भी मानसिक बल्कि शारीरिक तौर पर भी तैयार न थे। 'तेरह महीने' की उम्र सुनकर हमारे ध्यान में एक बहुत ही भोली-भाली सूरत उभरी थी। हमने सोचा जैसे तेरह महीने का आदमी का बच्चा बड़ा प्यारा-सा होता है - थन्नम थन्ना, गबदा-सा, गाऊँ-गाऊँ करता हुआ। वैसा ही यह भी होगा। सच तो यह है कि बच्चा किसी का भी हो, बड़ा 'स्वीट' लगता है। फिर यह तो अल्सेशियन का बच्चा ठहरा। जी हाँ बच्चा! दरअस्ल हम इसके 'इंपोर्टिड' होने से इस कदर रोब में आए हुए थे कि पिल्ला कहते हुए खुद शर्म-सी महसूस होती थी।

मगर सीजर हर एतबार से हमारी उम्मीदों से बढ़ कर निकला। इसका नख-शिख वर्णन करके दर्शकों का समय नष्ट करना नहीं चाहते। इसके डील-डौल का सरसरी अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हमारे पुराने कृपालु प्रोफेसर काजी अब्दुल कुद्दूस की पूरी रान उसके मुँह में आ जाती थी।

और यह उक्त प्रोफेसर ही ने बताया कि खुदा के बंदे तुमने भी बड़ा गजब किया। तेरह महीने का अल्सेशियन तो पूरा पाठा कुत्ता होता है। किताबों में लिखा है कि तीन महीने से बड़ा अल्सेशियन नहीं लेना चाहिए। इस पर मिर्जा ने यह नमक छिड़का कि आँखों देखी बात है, कुत्ते की तंदुरुस्ती और नस्ल अगर मालिक से बेहतर हो तो वह आँखें मिला कर डाँट भी नहीं सकता। फिर यह तो गैर मामूली तौर पर खूँख्वार भी नजर आता है। हमने कहा, 'मिर्जा! तुम अकारण डरते हो।' बोले, 'जो शख्स कुत्ते से भी न डरे मुझे उसकी वल्दियत में शक है।' हमने कहा, 'मिर्जा! कुत्ता अगर खूँख्वार न हो तो पालने से फायदा? फिर आदमी बकरी क्यों न पाल ले।' बोले, 'हाँ! बकरी कुत्ते से कई गुना बेहतर है। बड़ी बात यह है कि जब चाहो काट कर खा जाओ।'

गरचे छोटी है जात बकरी की

दिल को भाती है बात बकरी की

बहस में हम दोनों पटरी से उतर गए थे, लिहाजा प्रोफेसर काजी अब्दुल कुद्दूस ने बहैसियत पंच बीच में पड़ के इस सामान्य राय पर बहस समाप्त की कि कुत्ते में से अगर जबड़ा निकाल दिया जाए तो खासा अच्छा और शालीन जानवर है।

काजी अब्दुल कुद्दूस ने कुछ गलत नहीं कहा था कि कुत्ता बड़ी मुश्किल से सधाया जाता है। फिर नया घर, नए चेहरे, नई बू-बास। नतीजा यह कि पहली रात न खुद सोया न दूसरों को सोने दिया। रात भर एक साँस में मुँहजुबानी भौंकता रहा।

दूसरी रात भी यही हाल रहा। अलबत्ता चौबीस घंटे के प्रशिक्षण से इतना फर्क जुरूर पड़ा कि झुटपुटे के वक्त जिन घर वालों की आँख लग गई थी उनके मुँह चाट-चाट कर गहरी नींद से जगाया। तीसरे रतजगे से पहले हमने उसे एक नींद की गोली दे दी। कोई लाभ नहीं हुआ। चौथी रात दो दीं, मगर साहब! क्या मजाल, जो जरा चुप हो जाए। मिर्जा से संपर्क किया तो कहने लगे, 'मेरी मानो, आज इसे कुछ न दो। खुद तीन गोलियाँ खा लो।' हमने ऐसा ही किया। उस रात वह बिल्कुल नहीं भौंका।

लेकिन हैरत इस बात पर हुई कि सुबह दस बजे हमारे बहरे पड़ोसी ख्वाजा शम्सुद्दीन (इंपोर्टर एंड एक्सपोर्टर) ने, जो नए-नए पड़ोस में आए थे, हमें बड़ी बेतमीजी से झँझोड़ कर जगाया और शिकायत की कि रात भर आपका कुत्ता मेरे घर की तरफ मुँह करके खूब भौंका (हियरिंग-एड यानी श्रवण यंत्र, अपने कान में फिट करते हुए) और देख लीजिए, इस वक्त भी बहुत जी लगा के भौंक रहा है। हमने कहा, आपका रेडियो भी तो सारे-सारे दिन मुहल्ले को सर पर उठाए रहता है। खुदा गवाह है जिस दिन से आप पड़ोस में उठकर आए हैं, हमने अपने रेडियो प्रोग्राम सुनना बंद कर दिया है फिर यह कि हमारे पास तो कुत्ते का लाइसेंस भी है। लाइसेंस का नाम आते ही उनके चेहरे का रंग काले से बैंगनी हो गया जिसके नतीजे में वह और उनका रेडियो तीन सप्ताह तक चुप रहे। अलबत्ता उनके चौकीदार की जुबानी मालूम हुआ कि वह रातों को उठ-उठकर अपनी हियरिंग-एड कान से लगाकर सुनते हैं कि हमारा कुत्ता भौंक रहा है या सो गया। हमारे कानों में यह भनक भी पड़ी कि अब वह हर एक से यह कहते फिर रहे हैं कि कुछ कर्ज न चुकाने वाले अपने कर्जदार से बचने के लिए कुत्ता पाल लेते हैं। वह यह कहते भी सुने गए कि सीजर शरीफों का कुत्ता मालूम नहीं होता। उधर उनकी बीवी का यह हाल कि सीजर झूठों भी दरवाजे में से झाँक ले तो झट हाथ भर कर घूँघट निकाल लेती थीं।

तीन हफ्ते बाद देखा कि फिर मुँह फुलाए घर की तरफ चले आ रहे हैं। हमारे पुरजोश अस्सलाम अलैकुम के जवाब में फरमाया, 'देखिए इस सूअर के बच्चे ने क्या किया है?' मिर्जा बीच में बोल उठे, 'मुँह सँभाल कर बात कीजिए। वह कुत्ते का बच्चा है।' इस विरोधी हमले के बाद हम भी कुछ सख्त बात कहने वाले थे कि मिर्जा ने जो उस वक्त हम से लूडो खेल रहे थे, हमारे कुहनी मार कर अपनी छज्जेदार भवों को हिलाकर ख्वाजा शम्सुद्दीन की बाईं टाँग की तरफ इशारा किया जो घुटने तक पाँयचे से वंचित थी। हमने कनखियों से देखा तो वाकई जख्म इतना लंबा था कि जिप लगा कर आसानी से बंद किया जा सकता था।

शर्म और इंसानी हमदर्दी की भावनाओं से दबकर हमने पूछा, 'क्या कुत्ते ने काटा है?'

'जी नहीं! मैंने खुद ही काटा है।'

'अरे साहब! घोड़े भी कुछ कम जालिम नहीं होते?' मिर्जा बोल उठे।

खुशी से लदा हुआ मिर्जा का यह वार ऐसा अचानक और प्रभावकारी था कि वहीं ढेर हो गए। एक बार को अपने जिस्मानी जख्म भूल गए और अंदरुनी चोटों को सहलाते और घोड़ों की माँ बहनों को अरमान भरी गालियाँ देते 'फेड आउट' हो गए। किस्सा दरअस्ल यह था कि उनके बुजुर्ग खैबर पार से घोड़े बेचने हिंदुस्तान आए थे और मालामाल होकर यहीं पड़ रहे। आगे चलकर इन बुजुर्गों की औलाद को इन्हीं घोड़ों की अवज्ञाकारी औलादों ने तबाह कर डाला। वह इस तरह कि इस गुरुकुल के अंतिम प्रकाशस्तंभ ख्वाजा शम्सुद्दीन की 'ब्लैक' की कमाई की एक-एक पाई रेस में इन्हीं घोड़ों की भेंट चढ़ती और इनके अपने बीवी-बच्चे इनकमटैक्स वालों की तरह मुँह देखते रह जाते।

इस तरह के अच्छे स्वभाव से अलग सीजर बेतमीजी की आयु के प्रारंभ से पहले दर्जे का काहिल था और दौड़-दौड़ कर काम करने के बजाय दिन के अधिकतर हिस्से में 'दरवाजे' पर मेहराब के रूप में छायी हुई बोगनविलिया की छाँव में लोटें लगाता रहता। दर्जी की सुई यूँ तो हर तरह के कपड़े में से निकलती है मगर ईमान की बात है, हमने सीजर को कभी किसी गलत आदमी को काटते नहीं देखा और यह कहना तो सरासर गलत यानी मिथ्यारोपण होगा कि वह बिल्कुल जंगली और बेकहा था। सधा-सधाया जुरूर था मगर सिर्फ पचास प्रतिशत। इस शोकपूर्ण आशुकथन का विवरण यह है कि अगर बच्चे हुक्म देते कि जाओ और उसके पीछे लग जाओ तो ये मेरा शेर अपने घात-स्थल से निकलकर आदेश पालन में झपट पड़ता और उसकी टाई पकड़ कर लटक जाता लेकिन जब दूसरा आदेश मिलता, 'छोड़ दो', तो क्या मजाल जो छोड़ दे।

मिर्जा को दाता ईश्वर ने बहुत सतर्क और वहमी मानसिकता प्रदान की है। हमें यकीन है कि अगर उन्हें अमृत भी पीना पड़े तो बगैर उबाले नहीं पिएँगे। इस एहतियात की परिपाटी के कारण उन्होंने सीजर के आने के बाद हमारे यहाँ आना जाना इतना कम कर दिया कि कभी भूले-भटके आ निकलते तो हम सब उनका इतना आदर सत्कार करते, ऐसी गर्मजोशी से मिलते कि उन्हें संशय होने लगता कि हम उधार न माँग बैठें। एक दिन हमारे कहने से प्रोफेसर अब्दुल कुद्दूस मिर्जा को तरह-तरह से समझाने लगे कि कुत्ता बड़ा अद्वितीय जानवर है। कुत्ते के सिवाय कोई जानदार पेट भरने के बाद अपने पालने वाले का शुक्र अदा नहीं करता। गौर करो, दुमदार जानवरों में कुत्ता ही तन्हा ऐसा जानवर है जो अपनी दुम को प्रेम और प्रसन्नता की अभिव्यक्ति के यंत्र के तौर पर इस्तेमाल करता है। वरना शेष गँवार जानवर तो अपनी पूँछ से सिर्फ मक्खियाँ उड़ाते हैं। दुंबा यह भी नहीं कर सकता। इसकी दुम सिर्फ खाने के काम आती है। अलबत्ता बैल की दुम से 'ऐक्सीलेटर' का काम लिया जाता है मगर तुम्हें बैलगाड़ी थोड़े ही दौड़ानी है। (मिर्जा की रान पर हाथ मार कर) हाय! एक फ्रांसीसी लेखिका क्या सुंदर बात कह गई है कि मैं आदमियों को जितने करीब से देखती हूँ, उतने ही कुत्ते अच्छे लगते हैं। (लहजा बदलकर) कुत्तों से डरना बड़ी नादानी और बुजदिली है, विशेषकर विलायती कुत्तों से। फिर मिर्जा का डर निकालने के लिए उन्हीं के खिचड़ी सर की कसमें खा-खाकर यकीन दिलाया कि अंग्रेजों के कुत्तों के दाँत नकली होते हैं। खाने के और, काटने के और। कसमों से भी बात बनती नजर न आई तो हमारी तरफ इशारा करके अपना निजी अनुभव बताया कि इनकी देखा-देखी मैंने भी तीन हफ्ते से एक दुमकटा 'कॉकर स्पैनियल' पिल्ला पाल रखा है। (कॉकर स्पैनियल की मशहूर पहचान मालूम है? उसके कान उसकी टाँगों से लंबे होते हैं और टाँगें इतनी छोटी कि जमीन तक नहीं पहुँच पातीं!) दो हफ्ते तक तो बच्चे दिन भर उसे गोद में लिए भौंकना सिखाते रहे मगर अब उनको इससे जरा दूर ही रखता हूँ क्योंकि जुमे को छोटे बच्चे ने खेलते-खेलते इसे काट खाया। अपने पहले दाँत से। अभी तक पिल्ले के पैन्सिलीन के इंजेक्शन लग रहे हैं।

प्रोफेसर काजी अब्दुल कुद्दूस बेदूध की काफी के घूँट ले लेकर यह श्वान-कथा सुना रहे थे। बैठे-बैठे सीजर को जाने क्या हुड़क उठी कि बोगनविलिया की ओट से उनके कीमा भरे समोसे पर झपटा। काफी मुँह की मुँह में रह गई। बदहवासी में पियाली मिर्जा के सर पर गिरी (जिससे सर कई जगह से चटख गया) और प्रोफेसर गर्म काफी का गरारा करते हुए अपने कद से ऊँचा फाटक फलाँग गए।

मिर्जा ने पूछा 'कुत्ते से डर गए?'

'नहीं तो', वह फाटक के दूसरी तरफ से आत्मसम्मान-भरे लहजे में थर-थर काँपते हुए बोले।

मुमकिन है यह बातचीत कुछ देर और जारी रहती मगर बातचीत की विषयवस्तु ने एक ही छलांग में प्रोफेसर अब्दुल कुद्दूस को दबोच लिया और उनकी सुडौल रान में अपने नोकीले कीले गाड़ दिए। वह मुँह फेर कर खड़े हो गए। चार-पाँच दिन पहले भी ऐसी ही गुत्थम-गुत्था हो चुकी थी कि कभी कुत्ता उनके ऊपर और कभी वह कुत्ते के नीचे। लिहाजा हमने फिर बोगनविलिया की काँटेदार टहनी तोड़कर एक संटी बनाई और उस बेतमीज को सड़ाक-सड़ाक मारने को दौड़े मगर प्रोफेसर जहाँ-के-तहाँ हाथ जोड़कर खड़े हो गए। कहने लगे, 'खुदा के वास्ते यह न करो, अभी तो मेरे पिछले नील भी नहीं मिटे।'

जैसा कि हमारे पाठकों ने भाँप लिया होगा, कुत्ता पालना तो एक तरफ रहा, कुत्तों और प्रोफेसर काजी अब्दुल कुद्दूस के आपसी संबंध काटने और कटवाने के कामयाब अनुभवों से आगे कभी नहीं बढ़े। वर्ना उनका जीव-विज्ञान का ज्ञान इस हद तक पुस्तकों तक सीमित यानी त्रुटिपूर्ण है कि हमारे बच्चे जिस दिन बाजार से तोते का पहला जोड़ा खरीद कर लाए तो उनसे पूछा, 'चचाजान! इनमें नर कौन-सा है और मादा कौन-सी है?' विद्वान प्रोफेसर ने चार-पाँच मिनट तक सवाल और जोड़े को उलट-पलट कर देखा फिर बड़े सतर्क अंदाज में फरमाया, 'बेटा यह बहुत आँखें फेर लेने वाला जानवर होता है। अभी दो-तीन महीने और देखो। दोनों में से जो पहले अंडे देना शुरू कर दे वही मादा होगी।' खैर यह अज्ञानता तो मानवीय असमर्थता समझकर फिर भी माफ की जा सकती है क्योंकि तोता अपनी मादा को इनसान के मुकाबले अधिक आसानी से पहचान लेता है लेकिन एक दिन उपदेशात्मक अंदाज में बड़े अनुभव की बहुत बारीक बात यह बताई कि विश्वास करो, कुत्ता रखने से सेहत बेहतर हो जाती है! यह सुनना था कि मिर्जा ने इतने जोर का ठहाका लगाया कि संबंधों में फौरन बाल पड़ गया जो कई बार काफी पिलाने के बाद दूर हुआ।

जब संबंध नए सिरे से इस हद तक मधुर हो गए कि अबे-तबे से बातचीत होने लगी तो मिर्जा को तपाने के लिए वह फिर श्वान-वंदना में लग गए। एक दिन मौज में जो आए तो ज्ञान-प्रदान किया कि आयुर्वेदिक दृष्टि से कुत्ता बहुत फायदेमंद और पौष्टिकतापूर्ण जानवर है। यह सुनकर मिर्जा उन्हें मुसलमान नजरों से देखने लगे तो वह अपने दोनों हाथों की उँगलियों पर अपने साथ के उन बीमारों के नाम गिनवाने लगे, जिन्हें इस कुत्ता-जाति ने तंदुरुस्ती से मालामाल कर दिया था और दूर क्यों जाएँ। खुद उनको अपने बालिश्त भर के पिल्ले से बेइंतहा फायदा पहुँच रहा था। मिर्जा ने कहा, 'जरा खोल कर बात करो।' बोले, 'अब तुम से क्या पर्दा। कुत्ते को रोजाना गोश्त चाहिए और यह ज्ञान हमें कुत्ता पालने के बाद ही मिला कि पहले हमारे घर में रोजाना गोश्त नहीं पकता था और हम बड़ी अज्ञानता भरी जिंदगी गुजार रहे थे।' उनके वनस्पतिक-जीवन पर जो सुप्तावस्था छायी हुई थी, उसके अचानक जाग जाने के बाद हम अपनी आँखों से देख रहे थे कि अब वह अपनी सेहत से इतने संतुष्ट हो गए थे कि एक नंबर बड़ा जूता पहनना शुरू कर दिया था।

हम तो इसको एक सुहानी होनी ही कहेंगे कि मुद्दतों बाद उक्त प्रोफेसर की तंदुरुस्ती ऐसी बहाल हुई कि हमें डाह होने लगी। इसलिए कि अब वह इस योग्य हो गए थे कि महीने में तीन-चार दिन दवा के बिना रह सकते थे। मिर्जा कहते थे कि उसका अस्ली कारण यह है कि इन्हें अपने काल्पनिक पिल्ले को सुबह-शाम दो-तीन मील टहलाना पड़ता है।

'ऊँची जाति के कुत्तों' के स्वास्थ्यवर्धक सानिध्य से प्रोफेसरों की काया पलट होना तो अकाव्यात्मक विचार को व्यक्त करना है, फिर भी इसकी गवाही सारा मुहल्ला देगा कि हमारे कई कृतघ्न पड़ोसियों के खराब होते हुए स्वास्थ्य पर सीजर की मौजूदगी, विशेषकर इसके भौंकने का बड़ा सुहाना प्रभाव पड़ा जिसका एक छोटा-सा करिश्मा यह था कि हमारे घर के सामने से गुजरते हुए लद्धड़ से लद्धड़ पड़ोसी की चाल में एक अजीब चौकन्नापन, एक अजीब चुस्ती और लपक-झपक पैदा हो जाती थी। सीजर पलों का फासला क्षणों में तय करवा देता था। औरों का क्या जिक्र, खुद ख्वाजा शम्सुद्दीन (इंपोर्टर एंड ऐक्सपोर्टर), जो कहने को तो सीजर से तंग आ चुके थे, उसके सानिध्य के लाभ से खुद को न बचा सके। उक्त सेठ साहब कम-बढ़ती पंद्रह साल से लो ब्लड प्रेशर के लाइलाज मरीज थे। दवा-दारू, टोने-टोटके पर लाखों खर्च कर चुके थे। सब बेकार और यह नौबत आ गई थी कि लालची से लालची डॉक्टर भी उन्हें अपना नियमित मरीज बनाने को तैयार न था। कहीं ऐसा न हो कि उन्हें रोज क्लीनिक में बैठा देखकर दूसरे मरीज बिदक जाएँ कि उस डॉक्टर के हाथ में आराम नहीं लेकिन हमारे पड़ोस में आने के तीन महीने के अंदर न सिर्फ यह कि उनका ब्लड प्रेशर बढ़ कर नार्मल हो गया बल्कि खुदा के करम से इससे भी पंद्रह बीस दर्जे ऊपर रहने लगा।

इन घटनाओं का संबंध उस अज्ञानता के युग से है जब हम कुत्ता पालना खेल समझते थे। कैनल क्लब का नियमानुसार मेंबर बनने के बाद हमें अहसास हुआ कि सीजर बेचारा बिल्कुल बेकुसूर था। गलती सरासर हमारी ही थी कि कुत्ते को अपनी औलाद की तरह यानी डाँट-डाँट कर पाल रहे थे। बड़े-बड़े जुगादरियों से कुत्ता पालने के कायदे-कानून सीखे तो पता चला कि कुत्ते के साथ तो शिष्ट व्यवहार अनिवार्य है, बल्कि उसके सामने तो बच्चों को भी बेदर्दी से पीटना नहीं चाहिए वरना उसका व्यक्तित्व पिचक के रह जाता है और यहाँ यह दशा थी कि घर के हर व्यक्ति ने उस पर भौंक-भौंक कर अपना गला बैठा लिया था लेकिन जैसे-जैसे कुत्ता बड़ा हुआ, हममें भी समझ आती गई और डाँट-फटकार का सिलसिला बंद हो गया।

सीजर ही के दम-खम से आठ नौ साल तक ऐसी निश्चिंतितता रही कि कभी ताला लगाने की आवश्यकता अनुभव न हुई। उसको हमारे सामान की सुरक्षा का इतना ध्यान था कि शामत का मारा कोई कौआ या बिल्ली किचिन के पास से भी निकल जाए तो नथुने फैलाकर इस बुरी तरह खदेड़ता कि सारे चीनी के बरतन टूट जाते। घर की चौकीदारी और कामकाज में इस तरह हाथ बँटाने के अलावा वह एक समझदार कुत्ते की अन्य जिम्मेदारियाँ भी निभाता रहा जिनसे साफ वफा की सुगंध आती थी। यही नहीं कि वह नाश्ते में हमारे लिए ताजा अखबार मुँह में दबाकर लाता, बल्कि जब महीने की पहली तारीख को अखबार वाला बिल लेकर आता तो उस पर भौंकता भी था। एक मुँह में अखबार लाना ही नहीं, वह तो कहिए हमने खुद दो तीन बार सख्ती से मना कर दिया, वरना वह तो हमारे लिए टोस्ट भी इसी तरह ला सकता था। खाने पर दोनों वक्त वह हमारी कोहनी से लगा बैठा रहता और नियमानुसार हम हर पाँच निवालों के बाद एक निवाला उसे भी डाल देते। अगर वह उसे सूँघ कर छोड़ देता तो हम भी तुरंत ताड़ जाते कि हो न हो खाना बासी है।

गरज कि बहुत जहीन था और खूब सेवा करता था। वक्त गुजरता दिखाई नहीं देता मगर हर चेहरे पर एक कहानी लिख जाता है। कल की-सी बात है जब सीजर बच्चा-सा आया था तो प्रोफेसर काजी अब्दुल कुद्दूस जो सदा से एकरंगी के कायल हैं, इतवार के इतवार मोचने से अपने सर के सफेद बाल उखाड़ा करते थे। बाल वह अब भी उखाड़ते हैं मगर सिर्फ काले। (उन्हें खुद भी अपनी उम्र का अहसास हो चला था और शायद इसी कारण अब सिर्फ बाल-बच्चों वाली औरतों पर उनकी तबीयत आती थी।) नादान बच्चों की वह पहली खेप जिसने सीजर के जरिये अंग्रेजी सीखी, अब माशाअल्लाह इतनी सयानी हो चुकी थी कि उर्दू शेरों का सही मतलब समझकर शरमाने के काबिल हो गई। सीजर भी धीरे-धीरे परिवार ही का एक बूढ़ा सदस्य बन गया - इस दृष्टि से कि अब कोई उसका नोटिस नहीं लेता था। हमारे देखते-देखते वह बूढ़ा हो गया और साथ ही साथ दिल में उसके लिए संगत और सहयात्रा का अहसास, दर्दमंदी और सहभाग्य का एक बंधन पैदा हो चला कि हमने एक दूसरे को बूढ़ा होते देखा था। एक साथ समय से हार मानी थी।

आज उसकी एक-एक बात याद आ रही है। जवान था तो राह-चलतों का पंजे झाड़ कर ऐसा पीछा करता कि वे घिघिया कर निकटतम घर में घुस जाते और बेआबरू होकर निकाले जाते। वह ताक में रहता और निकलते ही उनके मुँह और गरदन को हर बार दूसरे ढंग से ऐसे भँभोड़ता कि जैसे जानवर नहीं किसी अंग्रेजी फिल्म के नदीदे हीरो हों। (यह मिर्जा के शब्द हैं, वो कहते हैं अंग्रेजी फिल्मों में लोग यूँ प्यार करते हैं जैसे तुख्मी आम चूस रहे हों।) अभी तीन साल पहले तक उसे देखकर पड़ोसियों का चुल्लुओं खून सूखता था मगर अब इतना बूढ़ा हो गया था कि दिन भर बोगनविलिया के नीचे किसी पहुँचे हुए फकीर की तरह ध्यान में डूबा पड़ा रहता। बहुत हुआ तो वहीं से लेटे-लेटे दुम हिलाकर वात्सल्य व्यक्त कर दिया। अलबत्ता छोटे बच्चों को, चाहे घर के हों या पास पड़ोस के, उसने कभी निराश नहीं किया और ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई बच्चा उसे आवाज देकर गेंद फेंके और वह गूदा भरी नली छोड़-छाड़, गेंद अपने मुँह में रखकर वापस न लाए। इस मामले में उसे बच्चों का दिल रखने का इतना ध्यान था कि कई बार फुटबाल तक मुँह में रखकर लाने की कोशिश की।

हाथ-पाँव धीरे-धीरे जवाब दे रहे थे। सारी तुन-फुन गायब। गर्रा-फिश खत्म। मिर्जा के शब्दों में उसका बुढ़ापा जवानी पर था। किसी-किसी दिन तीसरे पहर बोगनविलिया की छाँव में वही सनसनीखेज उर्दू अखबार ओढ़े ऊँघता रहता जिसमें नौकर सुबह कीमा बंधवा कर लाया था। चाँदनी और मादाओं की मस्त-महक से अब उसके खून में ज्वार-भाटा नहीं आता था। कहाँ तो यह नौबत थी कि 'गर्मी' पर आता तो शाम ही से जंजीर तुड़ाकर आदमकद ऊँची दीवार फाँद जाता और सुबह की अजान के वक्त कामयाबी का सुख लिए लौटता था अब इस जवानी देखे बुजुर्ग का यह हाल हो गया था कि गर्माई हुई मादा और हड्डी एक ही समय में नजर आ जाएँ तो हड्डी पर ही झपटता और जब इस हड्डी को पपोलते-पपोलते उसके बूढ़े जबड़े दुखने लगते तो उसे लाल बोगनविलिया के नीचे दबा के वुजू के लोटे में मुँह डाल कर पानी पीने चला जाता। यकीन नहीं आता था कि यह वही सीजर है जिसके जबड़े की मुहर मुहल्ले के हर तीसरे आदमी की पिंडली पर आज तक गवाही दे रही है कि -

'अब जिस जगह पे दाग है, याँ आगे दर्द था'

वही दुम जो एक जमाने में प्रश्नवाचक चिह्न की तरह खड़ी रहती थी, अब निर्धन की मूँछ की तरह लटकने लगी। उसके हमउम्र एक-एक करके वह गलियाँ सूनी कर गए, जहाँ से रातों को अनदेखे भेद-भरे जिस्मों की खुश्बुओं के बुलावे आते थे। वह तन्हा रह गया। बिलकुल तन्हा और उदास। नई पौध के मुँहजोर कुत्तों के साथ उठना बैठना तो अलग वह उनके नए दौलतमंद मालिकों पर भौंकना भी अपने रुतबे के खिलाफ समझता था लेकिन जिस दिन से माताहारी की जवान पठोर बेटी क्लियोपेट्रा भरी दोपहरी में एक हलवाई के बेनाम कुत्ते के साथ भागी, वह हफ्तों अपनी जाति की आवाज तक को तरसने लगा। जब तन्हाई से बहुत जी घबराने लगता तो रेडियो के पास आकर बैठ जाता और पक्के गाने सुनकर बहुत खुश होता।

जिस्म के साथ-साथ नजर भी इतनी मोटी हो गई थी कि कभी प्रोफेसर अब्दुल कुद्दूस उजले कपड़े पहन कर आ जाते तो उन्हें अजनबी समझ कर भौंकने लगता। अलबत्ता सुनने में फर्क नहीं आया था। साफ मालूम होता था कि वह अटकल से गेंद का पीछा करता है और इसके टप्पा खाने से दिशा और स्थान का अंदाजा कर लेता है। एक दिन शाम को अच्छा खासा बोगनविलिया के नीचे अपना विशिष्ट आसन मारे (दाईं आँख जो बचपन से लाल रहती थी, आधी बंद किए, बाएँ पंजे पर थूथनी रखे) बैठा था कि एक नीले रिबन वाली बच्ची ने 'शू' कहकर सड़क पर पिंगपांग की गेंद फेंकी। वह आवाज की सीध पर लपका मगर जैसे ही गेंद मुँह में पकड़ के तेजी से पलटा, एक कार के ब्रेक लगने की दिल चीर देने वाली आवाज सुनाई दी।

बच्चे चीखते हुए दौड़े। सड़क पर दूर तक टायरों के घिसटने से दो काली पट्टियाँ बन गईं। कार एक धचके के साथ रुकी और अपने स्प्रिंगों पर दो-तीन हिचकोले खाकर गुर्राती हुई तेजी से पहले ही मोड़ पर मुड़ गई मगर सीजर बीच रास्ते में ही रह गया। इसका पिछला धड़ कार का पूरा भार सहार चुका था। मुँह से खून जारी था और पास ही गेंद पड़ी थी जो अब सफेद नहीं रही थी।

सबने मिलकर उसे उठाया और फाटक के पास बोगनविलिया के नीचे लिटा दिया। लगता था धमनियों के मुँह खुल गए हैं और उसका जीवन दिल की हर धड़कन के साथ रिस रहा है, घाव-घाव, बूँद-बूँद, पल-पल। हर एक उसे छू-छूकर उँगलियों की पोरों से दिल की धड़कन सुन रहा था। वह धड़कन जो दूसरी धड़कन तक एक नया जन्म, एक नई योनि प्रदान करती है। किस जी से कहूँ कि उसका दाना-पानी उठ चुका था और वह विदा हो रहा था। इस हिम्मत, इस हौसले, इस सुकून के साथ जो सिर्फ जानवरों का भाग्य है। बगैर कराहे, बगैर तड़पे, बगैर मायूस हुए। बस शून्य में नजरें जमाए देखे चला जा रहा था। बारी-बारी सबने उसे चुमकारा, सर पर हाथ रखते ही वह आँखें झुका लेता था और यह याद कर के सबकी आँखें भर आईं कि उसकी जिंदगी में आज पहला मौका था कि सर पर हाथ फिरवाते वक्त वह जवाब में अपनी रेशम-सी मुलायम दुम नहीं हिला सकता था। आज उसके नथनों में एक अजनबी खून की बू घुसी जा रही थी। कोई आधा घंटा गुजरा होगा कि चार-पाँच कौए ऊपर मंडराने लगे और धीरे-धीरे इतने नीचे उतर आए कि उनके मनहूस साये उस पर पड़ने लगे। कुछ देर बाद अहाते की दीवार पर आ बैठे और शोर मचाने लगे। सीजर ने एक नजर उठा कर उन्हें देखा। एक क्षण के लिए उसके नथुने फड़क उठे। फिर उसने अपनी आँखें झुका लीं। हमसे यह न देखा गया। उसका खून से सना मुँह खोलकर नींद की गोलियों की शीशी हल्क में उलट दी और कालर उतार दिया।

जरा सी देर बाद वह अपने प्यार करने वालों की धुँधलाती सूरतें देखता-देखता हमेशा के लिए सो गया।

मार्च के चढ़ते चाँद की भीगी-भीगी रोशनी में जब बच्चों ने मिलकर उसकी प्रिय बोगनविलिया के नीचे जमीन की अमानत जमीन को सौंपने के लिए गहरा-सा गढ़ा खोदा तो छोटी बड़ी बेशुमार हड्डियाँ निकलीं, जिन्हें वह शायद दफ्न करके भूल गया था। दूर-दूर तक बोगनविलिया की लंबी-लंबी उँगलियों जैसी जड़ें अपना रास्ता टटोलती हुई जमीन के हल्के गर्म सीने में उतरती चली गई थीं और उसका रस चूस-चूस कर शाखों के सिरों पर दहकते हुए फूलों तक पहुँचा रही थीं। सूखी-प्यासी जड़ों को आज सीजर के लहू ने उन फूलों से भी अधिक लाल कर दिया होगा जो बच्चों ने कब्र का मुँह अपनी स्लेटों और तख्तियों से बंद करके ऊपर बिखेर दिए थे। अंत में नीले रिबन वाली बच्ची ने अपनी सालगिरह की मोमबत्तियाँ सिरहाने जला दीं। उनकी उदास रोशनी में बच्चों के मैले गालों पर आँसुओं की नमकीन उजली लकीरें साफ चमक रही थीं।

कई महीने बीत गए। पतझड़ के बाद बोगनविलिया फिर अंगारे की तरह दहक रही है मगर बच्चे आज भी उस जगह किसी आदमी को पाँव रखने नहीं देते कि वहाँ हमारा एक साथी सो रहा है।


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