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उपन्यास

मेरे मुँह में ख़ाक
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

अनुवाद - तुफ़ैल चतुर्वेदी

अनुक्रम हिल स्टेशन पीछे     आगे

उन दिनों मिर्जा के स्नायुओं पर हिल स्टेशन बुरी तरह सवार था लेकिन हमारा हाल उनसे भी अधिक बुरा था। इस लिए कि हम पर मिर्जा अपने स्नायु-मंडल और हिल स्टेशन समेत सवार थे। जान मुश्किल में थी। उठते-बैठते, सोते-जागते इसी की चर्चा, इसी का जाप। हुआ यह कि वह सरकारी खर्च पर दो दिन के लिए कोयटा हो आए थे और अब इस पर मचले थे कि हम अवैतनिक छुट्टी पर उनके साथ दो महीने वहाँ गुजार आएँ, जैसा कि गर्मियों में कराची के शरीफों और रईसों का दस्तूर है। हमने कहा, 'पूछो तो हम इसीलिए वहाँ नहीं जाना चाहते कि जिन लोगों की परछाईं से हम कराची में साल भर बचते फिरते हैं, वह सब मई-जून में वहाँ जमा होते हैं।' बोले, 'ठीक कहते हो! मगर खुदा के बंदे अपनी सेहत तो देखो। तुम्हें अपने बाल-बच्चों पर तरस नहीं आता? कब तक हकीम, डॉक्टरों का पेट पालते रहोगे? वहाँ पहुँचते ही बगैर दवा के ठीक हो जाओगे। पानी में दवा की तासीर है और किसी-किसी दिन (मुस्कुराते हुए) मजा भी वैसा ही। यूँ भी जो समय पहाड़ पर बीते, उम्र में से काटा नहीं जाता। मक्खी, मच्छर का नाम नहीं। कीचड़ ढूँढ़े से नहीं मिलती। इसलिए कि पानी की सख्त किल्लत है। लोगों की तंदुरुस्ती का हाल तुम्हें क्या बताऊँ। जिसे देखो, गालों से गुलाबी रंग टपका पड़ रहा है। अभी पिछले साल वहाँ एक मंत्री ने अस्पताल का उद्घाटन किया तो तीन दिन पहले एक मरीज को कराची से बुलवाना पड़ा और उस की निगरानी पर चार बड़े डॉक्टर तैनात किए गए कि कहीं वह उद्घाटन से पहले ही ठीक न हो जाए। हमने कहा, 'हवा-पानी अपनी जगह, मगर हम दवा के बिना स्वयं को नार्मल महसूस नहीं करते।' बोले, 'इसकी चिंता न करो। कोयटा में आँख बंद करके किसी भी बाजार में निकल जाओ। हर तीसरी दुकान दवाओं की मिलेगी और हर दूसरी दुकान तंदूरी रोटियों की।' पूछा, 'और पहली दुकान', बोले, 'उसमें दुकानों के लिए साइन बोर्ड तैयार किए जाते हैं।' हमने कहा, 'लेकिन कराची की तरह वहाँ कदम-कदम पर डॉक्टर कहाँ? आज कल तो बगैर डॉक्टर की मदद के आदमी मर भी नहीं सकता। कहने लगे, 'छोड़ो भी। फर्जी बीमारियों के लिए तो यूनानी दवाएँ सबसे कारागर होती हैं।'

हमारे अनुचित शकों और गलतफहमियों का इस अकाट्य ढंग से निपटारा करने के बाद उन्होंने अपना वकीलों का-सा ढंग छोड़ा और बड़ी गर्मजोशी से हमारा हाथ अपने हाथ में लेकर हम नेको-बद हुजूर को समझाए जाते हैं वाले अंदाज में कहा, 'भई तुम्हारी गिनती भी संपन्न लोगों में होने लगी, जभी तो बैंक को पाँच हजार कर्ज देने में संकोच न हुआ। कसम खुदा की, मैं ईर्ष्या नहीं करता। खुदा जल्द तुम्हारी हैसियत में इतनी तरक्की दे कि पचास हजार तक के कर्जदार हो सको। मैं अपनी जगह सिर्फ यह कहना चाहता था कि अब तुम्हें अपने इन्कम-ब्रेकेट वालों की तरह गर्मियाँ बिताने हिल स्टेशन जाना चाहिए। यह नहीं तो कम से कम छुट्टी लेकर घर ही बैठ जाया करो। तुम्हारा यूँ खुले आम सड़कों पर फिरना किसी तरह उचित नहीं। मेरी सुनो! 1956 ई. की बात है। गर्मियों में कुछ यही दिन थे। मेरी बड़ी बच्ची स्कूल से लौटी तो बहुत रुआँसी थी। कुरेदने पर पता चला उसकी एक सहेली ने, जो स्वात घाटी जा रही थी, ताना दिया कि क्या तुम लोग गरीब हो जो साल भर अपने ही घर में रहते हो? साहब! वह दिन है और आज का दिन, मैं तो हर साल मई-जून में छुट्टी लेकर सपरिवार 'अंडर ग्राउंड' हो जाता हूँ।' फिर उन्होंने कराची के और भी बहुत से छुपे हुए सज्जनों के नाम बताए जो उन्हीं की तरह हर साल अपने सम्मान की रक्षा करते हैं। अपना यह वार कारगर होते देखा तो 'नाक-आउट' की आवाज बुलंद की। बोले, 'तुम जो इधर दस साल से छुट्टी पर नहीं गए तो लोगों को खयाल हो चला है कि तुम इस डर के मारे नहीं खिसकते कि दफ्तर वालों को कहीं यह पता न चल जाए कि तुम्हारे बगैर भी काम बखूबी चल सकता है।'

किस्सा हातिमताई में एक जादुई पहाड़ का जिक्र आता है। कोहे-निदा (आवाज देने वाला पहाड़) उसका नाम है और यह नाम यूँ पड़ा कि पहाड़ की खोह से एक अजीबो-गरीब आवाज आती है कि जिस किसी को यह सुनाई दे, वह जिस हालत में, जहाँ भी हो, बिना सोचे समझे उसी की तरफ दौड़ने लगता है। फिर दुनिया की कोई ताकत, कोई रिश्ता-नाता, कोई बंधन उसे रोक नहीं सकता। अब लोग इसे किस्सा-कहानी समझकर मुस्कुरा देते हैं। हालाँकि सुनने वालों ने सुना है कि ऐसी आवाज अब हर साल हर पहाड़ से आने लगी है। मिर्जा का कहना है कि यह आवाज जब तुम्हें पहले-पहल सुनाई दे तो अपनी निर्धनता को अपने और पहाड़ के बीच में बाधक न होने दो। इसलिए तय हुआ कि सेहत और गैरत का तकाजा यही है कि हिल स्टेशन चला जाए। चाहे और अधिक कर्ज ही क्यों न लेना पड़े। हमने दबे लहजे में याद दिलाया कि कर्ज मुहब्बत की कैंची है। मिर्जा बोले, 'देखते नहीं लोग इस कैंची को कैसी आतुरता से प्रयोग करके अपनी परेशानियाँ दूसरों को शिफ्ट कर देते हैं? साहब! हुनरमंद के हाथ में औजार भी हथियार बन जाता है।' यहाँ यह स्पष्टीकरण अनुचित न होगा कि कर्ज के बारे में मिर्जा की पंद्रह-बीस साल से वही आस्था है जो मौलाना हाली की ज्ञान के बारे में थी यानी हर तरह से हासिल करना चाहिए -

जिस से मिले, जहाँ से मिले, जिस कदर मिले

लेकिन हमने यह शर्त जुरूर लगा दी कि प्रोफेसर काजी अब्दुल कुद्दूस साथ होंगे तो जरा दिल्लगी रहेगी और जिरगौस भी साथ चलेंगे बल्कि हम सब इन्हीं की चमचमाती ब्यूक कार में चलेंगे।

प्रोफेसर काजी अब्दुल कुद्दूस हँसोड़ न सही हास्य के मौके जुरूर उपलब्ध कराते रहते हैं मगर उन्हें साथ घसीटने में दिल बहलाने के अलावा उनकी दुनिया और परलोक सँवारने का विचार भी था। वह यूँ कि कस्बा चाकसू से कराची अवतरित होने के बाद वह पंद्रह साल से रेल में नहीं बैठे थे और अब यह हाल हो गया था कि कभी म्यूनिसिपल सीमा से बाहर कदम पड़ जाएँ तो अपने-आप को मातृभूमि से दूर महसूस करने लगते। आखिर किस बाप के बेटे हैं। उनके पूज्यवर मरते मर गए, मगर फिरंगी की रेल में नहीं बैठे और अंतिम समय तक इस आस्था पर बड़े स्थायित्व से स्थिर रहे कि दूसरे कस्बों में चाँद इतना बड़ा हो ही नहीं सकता जितना कि चाकसू में। प्राकृतिक सौंदर्य के चाहने वाले। विशेष रूप से दरिया सिंध के। कहते हैं खुदा की कसम! इससे खूबसूरत दरिया नहीं देखा। वह कसम न खाएँ तब भी यह दावा शब्द-शब्द सही है, इसलिए कि उन्होंने वाकई कोई और दरिया नहीं देखा। खुदा जाने कब से उधार खाए बैठे थे। बस टोकने की देर थी। कहने लगे, 'जुरूर चलूँगा। कराची तो निरा रेगिस्तान है। बारिश का नाम नहीं। दो साल से कान परनाले की आवाज को तरस गए हैं। मैं तो सावन भादों में रात को गुस्लखाने का नल खुला छोड़ कर सोता हूँ ताकि सपने में टप-टप की आवाज आती रहे।' मिर्जा ने टोका कि कोयटा में भी बरसात में बारिश नहीं होती। पूछा, 'क्या मतलब?' बोले, 'जाड़े में होती है।'

फिर भी पाक बोहेमियन कॉफी हाउस में कई दिन तक अटकलें लगती रहीं कि प्रोफेसर कुद्दूस साथ चलने के लिए इतनी जल्दी कैसे आतुर हो गए और कोयटा का नाम सुनते ही मुल्तान की कोरी सुराही की तरह क्यों सनसनाने लगे। मिर्जा ने कुछ और ही कारण बताया। बोले, 'किस्सा दरअस्ल यह है कि प्रोफेसर के एक दोस्त उनके लिए पेरिस से समूर के दस्ताने भेंट में लाए हैं, जिन्हें पहनने के चाव में वह जल्द-से-जल्द किसी पहाड़ी स्थान पर जाना चाहते हैं, क्योंकि कराची में तो लोग दिसंबर में भी मलमल के कुर्ते पहन कर आइस्क्रीम खाने निकलते हैं।' इस अतिशयोक्ति अलंकार की पुष्टि एक हद तक उस सूटकेस से भी हुई जिसमें प्रोफेसर यह दस्ताने रखकर ले गए थे। उस पर यूरोप के होटलों के रंग-बिरंगे लेबिल चिपके हुए थे। वह कभी उसे झाड़ते-पोंछते नहीं थे कि कहीं वह उतर न जाएँ।

अब रहे जिरगौस तो औपचारिक परिचय के लिए इतना काफी होगा कि पूरा नाम जिरगामुल इस्लाम सिद्दीकी एम.ए., एल.एल.बी., सीनियर एडवोकेट हैं। हमारे यूनिवर्सिटी के साथी हैं। उस जमाने में लड़के प्यार और सार में उन्हें 'जिरगौस' कहते थे। इन शिष्ट दायरों में वह आज भी इसी संक्षिप्त नाम से पुकारे और याद किए जाते हैं। अक्सर अपरिचित एतराज कर बैठते हैं कि, भला यह भी कोई नाम हुआ, लेकिन एक बार उन्हें देख लें तो कहते हैं, ठीक ही है। प्रोफेसर ने उनके व्यक्तित्व का वर्णन बल्कि पोस्टमार्टम करते हुए एक बार बड़े मजे की बात कही। बोले, 'उनके व्यक्तित्व में से 'बैंक-बैलेंस और ब्यूक' निकाल दें तो बाकी क्या रह जाता है?' मिर्जा ने झट से लुकमा दिया, 'एक बदनसीब बीवी!' सैर-सपाटे के रसिया, लेकिन जरा खुरच कर देखिए तो अंदर से ठेठ शहरी। ऐसा शहरी जो बड़ी मेहनत और मशक्कत से जंगलों को खत्म करके शहर बसाता है और जब शहर बस जाता है तो फिर जंगलों की तलाश में मारा-मारा फिरता है। बड़े रख-रखाव वाले आदमी हैं और उस कबीले से हैं जो फाँसी के तख्ते पर चढ़ने से पहले अपनी टाई की गाँठ ठीक करना जुरूरी समझता है। अधिकतर कार से सफर करते हैं और उसे भी अदालत का कमरा समझते हैं। इसलिए अगर कराची से काबुल जाना हो तो अपने मुहल्ले के चौराहे से ही खैबर के दर्रे का पता पूछने लगेंगे। दो साल पहले मिर्जा उनके साथ मरी और कागान घाटी की सैर कर आए थे और उनका बयान है कि कराची म्यूनिसिपल कार्पोरेशन की सीमा से निकलने से पहले ही वह पाकिस्तान का रोड-मैप (सड़कों का नक्शा) सीट पर फैलाकर ध्यान देखने लगे। मिर्जा ने कहा, 'तुम्हें बगैर नक्शा देखे भी यह मालूम होना चाहिए कि कराची से निकलने की एक ही सड़क है। शेष तीन तरफ समंदर है।' बोले, 'इसी लिए तो सारी समस्या है।'

इसी सफर की यादगार एक तस्वीर थी जो जिरगौस ने शोग्रां के पहाड़ पर एक पेंशनयाफ्ता टट्टू पर इस तरह बैठ कर खिंचवाई थी जैसे नमाज में झुके हुए हों। इस तस्वीर में वह पूँछ के अलावा टट्टू की हर चीज पर सवार नजर आते थे। लगाम इतने जोर से खींच रखी थी कि टट्टू के कान उनके कानों को छू रहे थे और चारों कानों के बीच में टट्टू की गरदन पर उनकी तीन मंजिली ठोड़ी की कलम लगी हुई थी। अपना सारा वज्न रकाब पर डाले हुए थे ताकि टट्टू पर बोझ न पड़े। मिर्जा कहते हैं कि खड़ी चढ़ाई के दौरान कई बार ऐसा हुआ कि टट्टू कमर लचका कर रानों के नीचे से सटक गया और जिरगौस खड़े के खड़े रह गए। कठिन ढलवानों पर जहाँ पगडंडी तंग और दाएँ-बाएँ हजारों फिट गहरे खड्ड होते, वहाँ वह खुद टाँगें सीधी करके खड़े रह जाते। कहते थे, अगर मुकद्दर में गिर कर ही मरना लिखा है तो मैं अपनी टाँगों की गलती से मरना पसंद करूँगा, टट्टू की नहीं। यह तस्वीर तीन चार हफ्ते तक उनके दफ्तर में लगी रही। बाद में दूसरे वकीलों ने समझा-बुझा कर उतरवा दी कि अगर जानवरों पर बेरहमी को रोकने वालों में से किसी ने देख ली तो खटाक से तुम्हारा चालान कर देंगे।

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चार दरवेशों का यह काफिला कार से रवाना हुआ। रेगिस्तान की यात्रा और लू का यह हाल कि पसीना निकलने से पहले खुश्क। जैकबाबाद से आगे बढ़े तो मिर्जा को बड़ी व्यग्रता से चनों की कमी महसूस होने लगी। इस लिए कि अगर वह उनके पास होते तो रेत में बड़े खस्ता भूने जा सकते थे। दोपहर के खाने के बाद उन्होंने सुराही में पत्ती डालकर चाय बनाने का सुझाव पेश किया जो बिना धन्यवाद इसलिए रद्द कर दिया गया कि सड़क से धुआँ-सा उठ रहा था और थोड़ी-थोड़ी देर बाद जिरगौस को यही गर्म पानी उससे अधिक गर्म टायरों पर छिड़कना पड़ता था। 120 डिग्री गर्मी से पिघले हुए तारकोल के छींटे उड़-उड़ कर कार के शीशे को दागदार कर रहे थे। इस छलनी में से झाँकते हुए हमने उँगली के इशारे से प्रोफेसर को सात-आठ साल की बिल्लोच लड़की दिखाई जो सर पर खाली घड़ा रखे, सड़क पर नंगे पाँव चली जा रही थी। जैसे ही उस पर नजर पड़ी, प्रोफेसर ने बर्फ की डली जो वह चूस रहे थे, फौरन थूक दी। इस पर जिरगौस कहने लगे कि वह एक बार जनवरी में कराची से हिमपात का दृश्य देखने मरी गए। शहर के बाहरी हिस्से के आस-पास बर्फ पर पैरों के निशान नजर आए जिनमें खून जमा हुआ था। होटल गाइड ने बताया कि यह पहाड़ियों और उनके बच्चों के पैरों के निशान हैं। प्रोफेसर के चेहरे पर दर्द की लहर देख कर जिरगौस तसल्ली देने लगे कि यह लोग तो 'लैंड-स्केप' ही का हिस्सा होते हैं। इनमें अहसास नहीं होता। प्रोफेसर ने कहा, 'यह कैसे हो सकता है?' हार्न बजाते हुए बोले, 'अहसास होता तो नंगे पाँव क्यों चलते?'

रास्ते की कथा जो रास्ते ही की तरह लंबी और दिलचस्प है, हम अलग रिपोर्ट के लिए उठा रखते हैं कि हर मील के पत्थर से एक यादगार मूर्खता जुड़ी है। चलते-चलते इतना इशारा पर्याप्त है कि प्रोफेसर और मिर्जा के साथ के मजे ने छह सौ मील के सफर और थकन को महसूस न होने दिया। पहाड़ी रास्तों के उतार-चढ़ाव प्रोफेसर के लिए नई चीज थे। विशेष रूप से हमें संबोधित करके बोले, खुदा की कसम यह सड़क तो हार्ट-अटैक के कार्डियोग्राम की तरह है। हर तीखे मोड़ पर उन्हें बेगम की माँग उजड़ती दिखाई देती और वह मुड़-मुड़ कर सड़क को देखते जो पहाड़ के गिर्द साँप की तरह लिपटती बल खाती चली गई थी। जिरगौस ने कार को एक सुरंग में से पिरो कर निकाला तो मिर्जा अंग्रेज इंजीनियरों को याद करके एकदम भावुक हो गए। दोनों हाथ फैलाकर कहने लगे, 'यह हिल स्टेशन अंग्रेजों की देन है। यह पहाड़ अंग्रेज की खोज हैं।' प्रोफेसर कुद्दूस ने दाईं कनपटी खुजाते हुए फौरन बात काटी की। बोले, 'इतिहास कहता है कि इन पहाड़ों पर अंग्रेजों से पहले भी लोग रहते थे।' मिर्जा ने कहा, 'बजा! मगर उन्हें यह नहीं मालूम था कि हम पहाड़ पर रह रहे हैं।' अंत में नोक-झोंक और पहाड़ी सिलसिला खत्म हुआ और साँप के फन पर एक हीरा दमकता हुआ दिखाई दिया। 'Eureka! Eureka!'

शहर में घुसते ही हम तो अपने-आप को स्थानीय हवा-पानी के हवाले करके ठीक हो गए लेकिन मिर्जा की बाँछें कानों तक खिल गईं और ऐसी खिलीं कि मुँह में तरबूज की काश फिट आ जाए। सड़क के दोनों तरफ बहुत ऊँचे चिनार देख कर उन्हीं की तरह झूमने लगे। बोले, 'इसको कहते हैं दुनिया भर की सजावट। एक पेड़ के नीचे पूरी बरात सो जाए। यूँ होने को लाहौर में भी पेड़ हैं। एक से एक ऊँचे, एक से एक छतनार मगर जून-जुलाई में पत्ता तक नहीं हिलता मालूम होता है। साँस रोके फोटो खिंचवाने खड़े हैं।' हम बढ़कर बोले, 'लेकिन कराची में तो चौबीस घंटे ताजगी देने वाली समंदरी हवा चलती रहती है।' फरमाया, 'हाँ! कराची में पीपल का पत्ता भी हिलने लगे तो हम उसे प्रकृति का एक चमत्कार जानकर म्यूनिसिपल कार्पोरेशन का धन्यवाद करते हैं, जिसने यह बेल-बूटे उगाए, मगर यहाँ इस नेचुरल-ब्यूटी की दाद देने वाला कोई नहीं। हाय! यह दृश्य तो बिल्कुल क्रिसमस कार्ड की तरह है।'

हम तीनों यह क्रिसमस कार्ड देखने के बजाय प्रोफेसर को देख रहे थे और वह 'जिंदा' पेड़ों को उँगलियों से छू-छू कर अपनी नजर की पुष्टि कर रहे थे। दरअस्ल वह खुबानियों को फल वालों की दुकानों में रंगीन कागजों और गोटे के तारों से सजा-सजाया देखने के इस कदर आदी हो गए थे कि अब किसी तरह यकीन नहीं आता था कि खुबानियाँ पेड़ों पर भी लग सकती हैं।

विद्वान प्रोफेसर देर तक उस आत्मा को तृप्त कर देने वाले दृश्य से आनंदित होते रहे बल्कि इसके कुछ हिस्सों का स्वाद भी लिया।

3

पहली समस्या रहने की थी। इसका चयन और इंतजाम प्रोफेसर की तुच्छ राय पर छोड़ दिया गया मगर उनकी नजर में कोई होटल नहीं जंचता था। एक अल्ट्रामॉर्डन होटल को इसलिए नापसंद किया कि उसके बाथरूम बड़े खुले थे मगर कमरे शरारती व्यक्ति की कब्र की तरह तंग। दूसरे होटल को इसलिए कि वहाँ मामला बिल्कुल उलट था। तीसरे को इसलिए कि वहाँ दोनों चीजें एक ही डिजाइन पर बनाई गई थीं यानी - आप समझ ही गए होंगे। चौथे आलीशान होटल से इस कारण पर भाग लिए कि बंदा किसी ऐसे होटल का कायल नहीं जहाँ के बैरे मुसाफिरों से अधिक स्मार्ट हों। फिर कार पाँचवें होटल के पोर्च में जाकर रुकी, जहाँ एक साइनबोर्ड दो-दो फीट लंबे अक्षरों में शयन व भोजन की दावत दे रहा था।

घर का रहना और खाना

अबकी बार मिर्जा बिदक गए। कहने लगे, 'साहब मैं एक मिनट भी ऐसी जगह नहीं रह सकता', जहाँ फिर वही...'

वाक्य पूरा होने से पहले हम उनका मतलब समझकर आगे बढ़ गए।

छठा नंबर 'जंतान' होटल का था। अंग्रेजों के वक्त की यह तरशी तरशाई-सी इमारत सफेदे के चिकने-चिकने तनों की ओट से यूँ झिलमिला रही थी जैसे सालगिरह का केक! देखते ही सब लहालोट हो गए। प्रोफेसर ने आगे बढ़ कर उसके बीते युग की यादगार ऐंग्लो-इंडियन मैनेजर से हाथ मिलाने के बाद किराया पूछा। जवाब मिला, सिंगिल-रूम पचपन रुपए रोज, डबल रूम मियाँ-बीवी के लिए - पिचहत्तर रुपए। सब सन्नाटे में आ गए। जरा होश ठिकाने आए हुए तो मिर्जा ने सूखे मुँह से पूछा, 'क्या अपनी निजी बीवी के साथ भी पिचहत्तर रुपए होंगे?'

खैर, रहने का ठिकाना हुआ तो सैर-सपाटे की सूझी। प्रोफेसर को कोयटा कुल मिलाकर बहुत पसंद आया। यह 'कुल मिलाकर' की पख हमारी नहीं, उन्हीं की लगाई हुई है। दिल में वह इस सुंदरियों के शहर, इस इतराते हुए सौंदर्य के शहर की एक-एक अदा, बल्कि एक-एक ईंट पर न्योछावर थे लेकिन महफिल में खुल कर तारीफ नहीं करते थे कि कहीं ऐसा न हो कि लोग उन्हें टूरिस्ट ब्यूरो का अफसर समझने लगें। चार-पाँच दिन बाद हमने एकांत में पूछा, 'कहो! हिल स्टेशन पसंद आया?' बोले, 'हाँ! अगर यह पहाड़ न हों तो अच्छी जगह है।' पूछा, 'पहाड़ों से क्या हरज है?' बोले, 'किसी के कथनानुसार दूसरी तरफ का दृश्य दिखाई नहीं पड़ता।' दरअस्ल उन्हें बिना घास-पात के पहाड़ देखकर थोड़ी मायूसी हुई। इसलिए एक दिन कहने लगे,

'मिर्जा! यह पहाड़ तुम्हारे सर की तरह क्यों हैं?'

'एक जमाने में यह भी देवदारों और सनोबरों से ढके हुए थे। पर्वत-पर्वत हरियाली ही हरियाली थी मगर बकरियाँ सब चट कर गईं। इसीलिए शासन ने बकरियों के दलन के लिए एक मोर्चा बनाया है और पूरा समाज हाथों में खंजर लिए शासन के साथ है।'

'मगर हमें तो यहाँ कहीं बकरियाँ नजर नहीं आईं।'

'उन्हें यहाँ के लोग चट कर गए।'

'मगर मुझे तो गली-कूचों में यहाँ के अस्ली बाशिंदे भी दिखाई नहीं देते?'

'हाँ, वह अब सब्बी में रहते हैं।'

हर रह जो उधर को जाती है सब्बी से गुजर कर जाती है

हमने दोनों को समझाया, 'आज पेड़ नहीं हैं तो क्या? वन-विभाग सुरक्षित है तो क्या नहीं हो सकता।' बोले, 'साहब! वन-विभाग है तो हुआ करे। इन 'क्लीन-शेव' पहाड़ों में उसके शायद वही दायित्व होंगे जो अफगानिस्तान में समुद्री बेड़े के।'

प्रोफेसर यह ठोस पत्थर के पहाड़ देखकर कहा करते थे, 'ऐसे खालिस पहाड़, जिनमें पहाड़ के अलावा कुछ न हो, दुनिया में बहुत कम पाए जाते हैं।' मिर्जा ने बहुतेरा समझाया कि पहाड़ और अधेड़ औरत दरअस्ल आयल पेंटिंग की तरह होते हैं - इन्हें जरा दूर से देखना चाहिए। मगर प्रोफेसर दूर के जलवे के कायल नहीं। बिन-पेड़ पहाड़ों से उनकी बेजारी कम करने की गरज से मिर्जा ने एक दिन सूरज डूबने के समय मुर्दा पहाड़ की श्रृंखला की वह मशहूर सुरमई पहाड़ी दिखाई जिसके स्लॉट को देखने वाला अगर नजर जमाकर देखे तो ऐसा मालूम होता है जैसे एक सुंदरी मुर्दा पड़ी है। उसके पीछे को फैले हुए बाल, चौड़ा माथा, चेहरे का तीखा-तीखा प्रोफाइल और सीने के तिकोन गौर से देखने पर एक-एक करके उभरते चले जाते हैं। मिर्जा उँगली पकड़कर इस तस्वीर के टुकड़े कंठस्थ कराते गए। वह अपनी आँखों पर दाएँ हाथ का छज्जा बनाकर गौर से देखते रहे और उस हसीन मंजर से न सिर्फ प्रभावित हुए बल्कि मुआइने के बाद एलान किया कि सुंदरी मरी नहीं, सिर्फ बेहोश है।

पहाड़ों के खाली आँचल का शिकवा दो दिन बाद दूर हुआ जब सब मंजिलें मारते मुहम्मद अली जिनाह के प्रिय हिल स्टेशन 'जियारत' (आठ हजार फीट) पहुँचे। जहाँ तक प्रोफेसर की ऐनक काम करती थी, हरा ही हरा नजर आ रहा था। बिस्तरबंद खुलने से पहले योग्य प्रोफेसर ने एक पहाड़ जीत लिया और उसकी चोटी पर पहुँचकर तस्वीरें भी उतरवाईं। जिनमें उनके होटों पर वह विजयी मुस्कुराहट खेल रही थी, जो नवाबों और महाराजों के चेहरों पर मुर्दा शेर के सर पर रायफल का कुंदा रखकर फोटो खिंचवाते समय होती थी। वह इस घमंडी चोटी की ऊँचाई आठ हजार पचास फीट बताते थे और इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं थी इसलिए कि समुद्र-तल से इसकी ऊँचाई इतनी ही थी, वैसे जमीन की सतह से सिर्फ पचास फीट ऊँची हो पाई थी। झूठ-सच का हाल अल्लाह जाने, मगर मिर्जा का हल्फिया बयान है कि विजित पहाड़ की चोटी पर कदम रखने के पाँच मिनट बाद तक विजयी प्रोफेसर की आवाज पचास फिट नीचे 'बेस-कैंप' में साफ सुनाई दी थी, जहाँ जिरगौस मूवी कैमरा लिए शाम की नारंगी रोशनी में इस ऐतिहासिक दृश्य को फिल्मा रहे थे। इस मुहिम के आखिरी चरण में प्रोफेसर ने यह विचार भी प्रकट किया कि ऐसे पहाड़ों पर शासन बिजली की लिफ्ट लगा दे तो देशवासियों में पर्वतारोहण का शौक पैदा हो जाए। इस आरामतलबी पर मिर्जा ने ताना दिया कि हमारी ही जाति का एक व्यक्ति 'जहीरुद्दीन बाबर' जिसके घोड़ों की टापों से यह पहाड़, यह घाटियाँ और यह रेगिस्तान गूँजे थे, दो मजबूत-बदन मुगल सिपाहियों को बगल में दबा कर किले की दीवार पर बेथकान दौड़ता था। यह सुनते ही प्रोफेसर सोते के पास सुस्ताने बैठ गए। उसके साफ पानी से हाथ-पाँव धोए और गले में लटकी हुई छागल से मरी बीयर उड़ेलते हुए बोले, 'मगर हमारा इतिहास बाबर पर खत्म नहीं होता सरकार! आप यह कैसे भूल गए कि वाजिद अली शाह, अवध के नवाब जब जीने पर लड़खड़ाते हुए चढ़ते तो सहारे के लिए (उस जमाने में लकड़ी की रेलिंग का आविष्कार नहीं हुआ था) हर सीढ़ी पर, जी हाँ! हर सीढ़ी पर दोनों तरफ नवयौवना कनीजें खड़ी रहती थीं, मुगलों की तलवार की तरह झुकी हुई और बिना म्यान।'

प्रोफेसर ने भौगोलिक कठिनाइयों पर इस तरह काबू पाने के और भी कई ऐतिहासिक ढंग बयान किए। जिनके विश्वसनीय होने में शक हो तो हो, नएपन में कोई शक नहीं, लेकिन चोटी को जीतने के बाद जब वह सँभल-सँभल कर घुटनियों उतर रहे थे तो बराबर की चोटी पर एक डरावनी परछाईं नजर आई। पहाड़ों पर सूरज जल्दी डूब जाता है और उस समय दृश्य की बारीक चीजों पर रात का काजल फैलता जा रहा था। सन्नाटा ऐसा गहरा साफ और ऐसा आर-पार कि कलाई अपने कान से लगाकर सुनें तो नब्ज की धक-धक साफ सुनाई दे। अचानक उस भेद-भरी परछाईं ने हरकत की। प्रोफेसर के मुँह से अनायास एक चीख निकली और निकलती चली गई और जब वह निकल चुकी तो, 'रीछ' कह कर वहीं सजदे में चले गए। मिर्जा को भी हिदायत की कि जहाँ हो वहीं बैठ जाओ और सिगरेट बुझा दो। मिर्जा पहले ही बरफानी रीछों के किस्से सुन चुके थे। यूँ भी सीधे-सादे मुसलमान हैं, लिहाजा हिदायत पर आँख बंद करके अमल किया बल्कि अमल के बाद भी आँखें बंद रखीं लेकिन कुछ देर बाद जी कड़ा करके उन्हें खोला तो पूछने लगे, 'मगर यह में-में क्यों कर रहा है?' प्रोफेसर ने सजदे ही में जरा देर कान लगाकर सुना और फिर उछल कर खड़े हो गए। फरमाया, 'अरे साहब! आवाज पर न जाइए। यह बड़ा मक्कार जानवर होता है।'

4

जिरगौस जिस व्यवस्था और उपयुक्तता से सफर करते हैं वह देखने योग्य है। मुहम्मद शाह रंगीले के बारे तो सुना ही था कि जब उसकी जीतती रहने वाली सेना (???) नादिर शाह दुर्रानी से लड़ने निकली तो जनरल अपने स्तर के हिसाब से पालकियों में सवार आदेश देते जा रहे थे और आगे-आगे उनके सेवक उनकी चमकदार तलवारें उठाए चल रहे थे। युद्ध के दूसरे सामान के साथ-साथ कई छकड़े मेहँदी से लदे बराबर में थे ताकि सिपाही और सेनापति अपने हाथ-पैरों और बालों को रण में जाने से पहले बादशाह के प्रिय रंग में रँग सकें। मिर्जा की कही है कि सफर तो खैर सफर है, जिरगौस शहर में भी इतना रख-रखाव बरतते हैं कि उनका बड़ा लड़का जब क्रिकेट खेलता है तो चपरासी छतरी लगाए साथ-साथ दौड़ता है। 'ग़ालिब' की तरह जिरगौस तलवार और कफन ही नहीं, शवस्नान का तख्ता और काफूर तक बाँधकर ले जाने वालों में से है। लिहाफ और मलमल का कुर्ता, नमक और कोका-कोला, ताश और कैसानोवा (उनका काला कुत्ता), डिनर जैकेट और 'पिक-विक पेपर्स', बंदूक और फर्स्ट-एड-बाक्स - गरज कि कौन-सी बेकार चीज है जो यात्रा के समय उनके सामान में नहीं होती? अलबत्ता इस बार वापसी पर उन्हें यह दुख रहा कि सफर यूँ तो हर तरह से कामयाब रहा मगर फर्स्ट-एड का सामान इस्तेमाल करने का कोई अवसर नहीं मिला।

उनके अंदर वो शहरी बसा हुआ है वह किसी क्षण उनका पीछा नहीं छोड़ता और उनका हाथ पकड़ कर कभी बादाम के तने पर चाकू की नोक से अपना नाम और आने की तारीख लिखवाता है और कभी पहाड़ी चकोर के चटख रंगों की प्रशंसा बाईस बोर की गोली से करवा है। कभी गूँजते गरजते झरनों के दामन में 'रॉक एंड रोल' और 'ट्विस्ट' के रिकार्ड बजा कर सीटियों से संगत करता है और कभी जंगलों की सैर को यूँ निकलता है गोया 'ऐल्फी' या 'माल' पर शाम के शिकार को निकला है। मिर्जा ने कई बार समझाया कि देखो पहाड़ों, जंगलों और देहातों में जाना हो तो यूँ न निकला करो - इ यू डी कोलोन लगाए, सिगार मुँह में, हर साँस बियर में बसा हुआ, बातों में ड्राइंग रूम की महक - इससे देहात की भीनी-भीनी खुशबुएँ दब जाती हैं। वह सहमी-सहमी खुशबुएँ जो याद दिलाती हैं कि यहाँ से देहात की सीमा शुरू होती है। वह सीमा जहाँ सदा खुशबुओं का इंद्रधनुष निकला रहता है - कच्चे दूध और ताजा कटी हुई घास की मीठी-मीठी बास, छप्परों-खपरैलों से छन-छन कर निकलता हुआ उपलों का कड़वा-कड़वा धुआँ, घुमर-घुमर चलती चक्की से फिसलते हुए मकई के आटे की गर्म-गर्म सुगंध के साथ 'कुँवारपने की तेज महक', जोहड़ की काई का भीगा छिछलांदा झोंका, सरसों की बालियों की कंटीली महकार, भेड़-बकरियों के रेवड़ का भभका, अंगारों पर सिकती हुई रोटी की सीधी पेट में घुस जाने वाली लपट और उनमें रची हुई, उन सब में पिघली हुई खेतों और खलियानों में ताँबे से तपते हुए जिस्मों की हजारों साल पुरानी महक - यह जमीन की वहशी साँस की खुशबू है। जमीन को साँस लेने दो। उसकी खुशबू के सोते खून से जा मिलते हैं। उसे पसीने के छेदों में सहज-सहज घुलने दो। उसे हवाना के सिगार और डियोडरेंट से न मारो कि यह एक बार जिस बस्ती से रूठ जाती है, फिर लौट कर नहीं आती। तुमने देखा होगा, छोटे बच्चों के जिस्म से एक भेद भरी महक आती है। कच्ची-कच्ची, कोरी-कोरी, जो बड़े होकर अचानक गायब हो जाती है। यही हाल बस्तियों का है। शहर अब बूढ़े हो चुके हैं। उनमें अपनी कोई खुशबू बाकी नहीं रही।

प्रोफेसर कुद्दूस को ऐसी बातों में 'ला दे इक जंगल मुझे बाजार से' वाली फिलास्फी दिखाई पड़ती है। जो सफेद कालर वालों के सुगंधित पलायन की पैदावार है। कहते हैं कि शहरी हिरनों की नाभि उनके सर में होती है। हमने देखा है कि बहस में चारों तरफ से शह पड़ने लगे तो वह मिर्जा के किसी अर्धदार्शनिक वाक्य की दीवारों के पीछे दुबक जाते हैं और इस दृष्टि से उनका रवैया ठेठ प्रोफेसराना होता है। यानी मूल विषय के बजाय फुटनोट्स पढ़ना पुण्य समझते हैं। वह इस तरह कि वो प्राकृतिक दृश्यों की दाद अपने पेट से देते हैं, जहाँ मौसम अच्छा और दृश्य सुंदर हुए, उनकी समझ में उसका आनंद उठाने का एक यही ढंग आया कि डटकर खाया जाए और बार-बार खाया जाए और इस अच्छे कार्य से जो थोड़ा सा समय बच रहे, उसमें रमी खेली जाए। दुर्भाग्य से मौसम हमेशा अच्छा रहता था। इसलिए रोज खाने के बीच के अंतरालों में रमी की बाजी जमती। घनिष्ट मित्रों ने इस तरह पूरे छह हफ्ते एक दूसरे को कंगाल बनाने की घनिष्ट कोशिशों में बिता दिए। जिरगौस तो आँख बचाकर पत्ता बदलने को भी गलत नहीं समझते। इसलिए कि यह न करें तब भी प्रोफेसर हर जीतने वाले को बेईमान समझते हैं। बहरहाल हमने तो यह देखा कि अनगिनत अच्छे क्षण जो चीड़ और चिनार के दृश्यों में बिताए जा सकते थे, वह दोनों ने चिड़िया के गुलाम और पान के चौक्के पर नजरें जमाए बिता दिए और कभी पलट कर बड़े-बड़े पहाड़ों पर डूबते सूरज और चढ़ते चाँद का प्रताप नहीं देखा और न आँख उठा कर इस रूपनगर की आन देखी जिसके सर से भूकंप की प्रलय बीत गई मगर जहाँ आज भी गुलाब दहकते हैं। रास्तों पर भी, गालों पर भी। इनकी कनपटियों पर अब रुपहले तार झिलमिलाने लगे हैं मगर वह अभी उस आवारगी के आनंद से परिचित नहीं हुए जो एक पल में एक युग का रस भर देती है। अभी उन्होंने हर फूल, हर चेहरे को यूँ जी भर के देखना नहीं सीखा जैसे आखिरी बार देख रहे हों, फिर देखना नसीब न होगा। ऐसे पहाड़ों और घाटियों से गुजरते हुए बाबर ने अपनी आत्मकथा में कितनी मायूसी के साथ लिखा है कि जब हम किसी दरिया के किनारे पड़ाव डालते हैं तो हम और हमारी मुगल फौज अपने तंबुओं की दिशा नदी के सुंदर दृश्यों की तरफ रखती है लेकिन हमारी हिंदी फौज अपने खेमों की पीठ नदी की तरफ कर लेती है।

यहाँ जिरगौस की कम-निगाही दिखाना उद्देश्य नहीं, ईमान की बात यह है कि कराची पहुँच कर उन्होंने अपनी खींची हुई रंगीन फिल्में स्क्रीन पर देखीं तो दंग रह गए। कहने लगे, 'यार! कमाल है, इनसे तो मालूम होता है कि कोयटा खूबसूरत जगह है।'

5

जिरगौस खुद को ह्वेन सांग और एडमंड हिलेरी से कम नहीं समझते। इस यायावरी की इच्छा का विस्तार यह है कि एक दिन मिर्जा ने पूछा, 'यार कंचनजंघा भी देखी?' बोले, 'नहीं हम चीनी फिल्में नहीं देखते। मगर कौन सी फिल्म में काम कर रही है?'

मिर्जा भी उनके साथ दूसरी बार अपने देश की खोज में निकले थे, मगर जहाँ गए, जिधर गए, खुद को ही सामने पाया। आखिर दो महीने भूगोल में आत्मकथा का रंग भर के लौट आए। कहना पड़ेगा कि एक का दिल और दूसरे की आँखें शहरी हैं और उसकी पुष्टि पग-पग पर पिछली यात्रा के वृत्तांत से होती है। आप भी सुनिए, कभी इनकी कभी उनकी जुबानी। जिरगौस का बयान है कि त्योरस्साल मिर्जा कागान घाटी में ग्यारह हजार फिट की ऊँचाई पर फीरोजी रंग की जमी हुई झील, मीलों तक फैले हुए ग्लेशियर और बर्फ से ढके पहाड़ देखकर बहुत हैरान हुए। वह सोच भी नहीं सकते थे कि मलाई की बर्फ के अलावा कोई और भी बर्फ हो सकती है और वह भी मुफ्त! न्यूनाधिक इतनी ही तीव्रता की आत्मलीनता की स्थिति कनहार नदी देखकर उन्होंने अपने ऊपर हावी कर ली। इस तिलमिलाती, झाग उड़ाती, पहाड़ी नदी के पुल पर देर तक दम साधे आश्चर्य की लहरों में गोते खाते रहे। आखिर एक चमकदार मोती लेकर उभरे। बोले, 'किस कदर खूबसूरत झाग हैं। बिलकुल लक्स साबुन जैसे।' उपस्थित लोगों ने इस विज्ञापनी उपमा का मजाक उड़ाया तो तुनक कर बोले, 'साहब! मैं तो जब जानूँ कि वर्ड्सवर्थ को बीच में डाले बगैर आप नेचर पर दो वाक्य बोलकर दिखा दें।'

मिर्जा इस 'गजल' के जवाब के रूप में, इसी जगह और इसी घड़ी का एक और समाँ खींचते हैं, जिससे पता चलता है कि समय का सदुपयोग करने वाले किस-किस तरह प्राकृतिक सौंदर्य की ऊँचाई बढ़ाते हैं। (तस्वीर में जगह-जगह जिरगौस ने भी शोख रंग लगा दिए हैं।) यह जगह बालाकोट के दामन में इस किनारे पर है, जहाँ नदी दो भारी पहाड़ों के बीच नर्तकी की कमर की तरह बल खा गई है। इससे यह करिश्मा जुड़ा हुआ है कि जहाँगीर के साथ इस रास्ते से कश्मीर जाते हुए नूरजहाँ की आँखों में जलन हुई। जहाँगीर को रात-भर नींद न आई। शाही हकीम के कुहल, सुर्मा और जमाद से कोई लाभ नहीं हुआ। अचानक एक दरवेश उधर से निकला। उसने कहा, जैसे ही चाँद इस सनोबर के ऊपर आए, मलिका नदी का पानी अंजुलि में भर कर उसमें अपना चेहरा देखे और उसी से सात बार अपना चेहरा धोए। मौला अपनी कृपा करेगा। नूरजहाँ ने ऐसा ही किया और आँखें तारा सी हो गईं। उसी दिन से उस जगह का नाम नैन-सुख हो गया और इधर से निकलते हुए आज भी बहुत से हाथ मोती-सा पानी चुल्लू में भर के उस अलबेली मलिका की याद ताजा कर जाते हैं।

हाँ! तो यह जगह थी और शुरू बरसात की रात। सुबह इसी जगह एक ऐतिहासिक फिल्म की शूटिंग के समय हीरोइन के पैर में मोच आ गई थी और दिया जलने तक बालाकोट की घाटी का हर वह निवासी जो उस दिन तक संन्यासी नहीं हुआ था, उस घोड़े को देखने आया जिससे हीरोइन गिरी या गिराई गई थी। इस पल रात की जवानी अभी ढली नहीं थी। यहाँ इस फिल्म के प्रोड्यूसर (जिन का मुकदमा मजिस्ट्रेट से सैशन जजी, सैशन जजी से हाईकोर्ट और हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक जिरगोस ने बिना पारिश्रमिक और परिश्रम लड़ा और हारा था) जिरगौस के आतिथ्य में बिछे जा रहे थे। साथ में शहद जैसी रंगत के बालों वाली हीरोइन थी जो ट्रांजिस्टर रेडियो पर 'चा चा चा' की धुन पर बैठे ही बैठे अपनी बेजान न हुई टाँग थिरका रही थी और मिर्जा के शब्दों में 'ओपन एयरहोस्टेस' के कर्तव्य बड़ी लगन से पूरे कर रही थी। जिरगौस फीरोजे की अँगूठी से 'पिक विक पेपर्स' की जिल्द पर ताल दे रहे थे। रेडियो पर कोई गर्म गीत आता तो सब के सब सुर मिलाकर इतने जोर से डकराने लगते कि अस्ल गाना बिल्कुल न सुनाई देता। सिर्फ नापसंदीदा गाने खामोशी और ध्यान से सुने गए। अलबत्ता मिर्जा शाम ही से संजीदगी व सर्दी के कारण चुप थे। उन्हें जब अधिक सर्दी लगने लगती तो टूट कर उन डरावनी मशालों को टकटकी बाँध कर देखने लगते, जो बीस मील दूर पहाड़ों पर एक महीने से रात होते ही रोशन हो जाती थीं। एक महीने से कागान के जंगल धड़-धड़ जल रहे थे और दूर-दूर से यात्री सनोबरों की आग देखने लाए जा रहे थे लेकिन यहाँ चारों तरफ अँधेरा था, जिसमें पहाड़ी जुगनू जगह-जगह मुसलमानों की उम्मीदों की तरह टिमटिमा रहे थे। मिर्जा नजरें नीची किए रस भरी गँड़ेरियाँ चूसते रहे। थोड़ी-थोड़ी देर में जिरगौस अपनी कार की हैडलाइट जला देते और साँवली रात अपने भेद सौंप कर चंद पीछे हट जाती। उनके सोने के दाँत से किरनें फूटने लगतीं और कैसानोवा की काली-काली आँखों के चराग जल उठते। कुछ और स्वरूप भी जिन्हें रोशनी ने रात की चट्टान चीरकर तराशा था, आँखों के सामने कौंध जाते।

इस कौंधे में नदी झमाझम करने लगती, जैसे टिशू की साड़ी। (माफ कीजिए, यह तीर भी इसी तरकश का है।)

सामने मिर्जा चुपचाप पालथी मारे बैठे हुए थे। कुछ बर्फीली हवा, कुछ गँड़ेरी का असर। उनका हाथ अपनी नाक पर पड़ा तो ऐसा लगा कि जैसे किसी दूसरे की है। फिर नदी के पानी में हाथ डाला तो लगा जैसे पिघली हुई बर्फ है और यह इसलिए महसूस हुआ कि वह वाकई पिघली हुई बर्फ थी। इससे फायदा उठाने के लिए ब्लैक एंड व्हाइट की दूसरी बोतल की गरदन मिर्जा की टाई से बाँधकर नदी में डाल दी गई। अभी कुछ देर पहले प्रोड्यूसर साहब को एक शैंपेन ग्लास के किनारे पर लिपस्टिक का भ्रम हुआ तो उतना हिस्सा अपने दाँतों से तोड़ कर कटर-कटर चबाने लगे और अब वह अँधेरे में सिगरेट का कश लेते तो मुँह के दोनों कोनों पर जीते-जीते खून की धारें चमक उठती थीं। गँड़ेरियों से निवृत्त होकर मिर्जा इस दृश्य को अपनी आँखों से पिए जा रहे थे जिनमें गुलाबी डोरे उभर आए थे, जो शायद नींद के होंगे। इसलिए कि गँड़ेरी में अगर नशा होता तो मौलवी गन्ने लेकर गँड़ेरी खाने वालों के पीछे पड़ जाते। उनके ढंग बेढंगे होते देखे तो जिरगौस ने कंधे झिंझोड़ कर पूछा, 'मिर्जा! तुमने कभी व्हिस्की पी है?' नशीली आँखें खोलते हुए बोले, 'पी तो नहीं, मगर बोतल से ऐसी बू आती है, जैसी उनके मुँह से। बिल्कुल टिंक्चर आयोडीन जैसी।' यह कहकर पुष्टि चाहने वाली नजरों से प्रोड्यूसर को देखने लगे, जो इस टिंक्चर आयोडीन से अपने मुँह और दिल के जख्मों को डिसइनफैक्ट कर रहे थे। यह कार्य उस समय तक चलता रहा, जब तक न पीने वालों ने नींद से बेहाल होकर ऑल फौल बकना शुरू न कर दिया और महीने के आखिर की चाँदनी में बालाकोट की ऊँचाई पर उस मकबरे के किनारे दमकने लगे, जहाँ सवा सौ साल पहले इसी घाटी, इसी रुत और उतरते चाँद की इन्हीं तिथियों में एक जियाले ने अपने खून से अपनी जाति के दागों को धोया था और जहाँ आज भी खुदा के सादादिल बंदे नसवार की भेंट चढ़ा कर मुरादें माँगते नजर आ जाते हैं।

6

बात एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ जा पहुँची। दिखाना सिर्फ यह था कि पहाड़ पर जिंदगी हर ढंग और हर ढब से बिताई जा सकती है। हँस कर, रो कर या अधिसंख्या की तरह सो कर। मिर्जा किसी घर बंद नहीं। कुछ नहीं तो, चोरी-चोरी बेगम जिरगौस के मुहब्बत और इमला की गलतियों से भरे हुए खत ही पढ़ते रहते मगर एक दिन एक अजीब रंग में पाए, बल्कि पकड़े गए। देखा कि विभिन्न रंगों और खुशबुओं के टूथपेस्ट से कैरम बोर्ड पर कुछ पेंट कर रहे हैं। खैर टूथपेस्ट के इस्तेमाल पर तो हमें कोई अचंभा नहीं हुआ। इसलिए कि सुन चुके थे कि एब्सट्रेक्ट आर्टिस्ट तस्वीर पर नेलपॉलिश और फिनाइल तक लगाने से नहीं चूकते। एक साहब तो ऐसे गुजरे हैं, जिन्होंने कैनवस पर घोड़े का नाल, अपने कटे हुए नाखून और इकलौती पतलनू के सातों बटन मॉडल की चूसी हुई गम से चिपका कर बगदादी जिमखाना में प्राइज हासिल किया था। कहने का मतलब यह है कि आर्टिस्टों की सुहबत में रहते-रहते हम ऐसी बातों के आदी हो चुके हैं। ठठेरे का कबूतर तालियों से नहीं उड़ता लेकिन इस वक्त परेशानी जो हुई तो इस बात से कि हमारी तारीफ को सच समझ कर वह हमसे इस स्वादिष्ट तस्वीर का शीर्षक पूछने लगे।

'शीर्षक में क्या रखा है। अस्ल चीज तो तस्वीर होती है, तस्वीर!', हमने टालना चाहा।

'फिर भी, क्या नजर आता है तुम्हें?' वह भला कब छोड़ने वाले थे।

'नजर तो आता है, मगर समझ में नहीं आता।'

'पिकासो से भी कभी किसी ने कहा था कि साहब! आपकी तस्वीरें समझ में नहीं आतीं। उसने बड़ा प्यारा जवाब दिया, कहने लगे, चीनी भाषा आपकी समझ में नहीं आती मगर पचास करोड़ आदमी उसे बोलते हैं। क्या समझे?'

'लेकिन यह तस्वीर तो पिकासो की भी समझ में नहीं आ सकती।' हमने कहा।

'बला से न आए। एक तवायफ अपने हुस्न और कमाल की दाद लेने दूसरी तवायफ के पास नहीं जाती। दाद तो दर्शकों से मिलती है।' मिर्जा ने कहा।

जिरगौस की तरह मिर्जा भी हिल-स्टेशन को एक पैदाइशी शहरी की प्यार भरी नजर से देखते हैं और नजर भी ऐसे शहरी की, जिसकी पैदाइश और पहली बीमारी की तारीख एक ही हो। खैर मिर्जा तो हमारे साथ उठने-बैठने वाले और दम बढ़ाने वाले ठहरे, जिनके स्वभाव से हम इस तरह परिचित हैं जैसे अपनी हथेली से। लेकिन इस बार हमें जिरगौस और हिल-स्टेशन दोनों को बहुत निकट से देखने का अवसर मिला और हम इस नतीजे पर पहुँचे कि खुदा अगर आँखें दे तो उन्हें इस्तेमाल करने के मौके भी दे, वरना लानत ऐसी जिंदगी पर। मगर हिल-स्टेशन पर - चाहे वह मरी हो या मसूरी, उटाकमंड हो या कोयटा - जिंदगी हमारी आपकी तरह व्यर्थ नहीं होती। उसका एक उद्देश्य, दृष्टि का एक केंद्र होता है। वह यह कि सदा सुहागिन सड़कों पर वह फैशन परेड देखी जाए, जिसमें हर साल चैन से भरे घरानों की बेचैन बेटियाँ धन और तन की बाजी लगा देती हैं। इन्हीं सड़कों पर काली काफी और आलू की हवाइयों पर गुजारा करने वाले साहित्यकार स्त्रैण भाषा में एक दूसरे को रक्तिम क्रांति पर उकसाते हैं। इन्हीं सड़कों पर अपने गमलों में बरगद उगाने वाले इंटेलेक्चुअल किसी खूबसूरत लड़की को पत्नी का रूतबा देने की घात में लगे रहते हैं। उधर खूबसूरत लड़की अपने सुंदर मुखड़े का दिया लिए इस तलाश में लगी हुई कि जल्दी-से-जल्दी किसी बूढ़े लखपति की विधवा बन जाए। यह स्वयंवर, यह सुहाग-रुत हर हिल-स्टेशन पर हर साल मनाई जाती है और इससे पहले कि दमकती हरियाली बर्फ का कफन पहन कर सो जाए, चिनारों की आग ठंडी और काफी हाउस वीरान हो जाएँ, मवेशी मैदानों में उतरने लगें और सड़कों पर कोई जानदार नजर न आए, सिवाय टूरिस्ट के - इससे पहले कि फूलों का मौसम बीत जाए, बहुत से हाथों की तीसरी उँगली में अँगूठियाँ जगमगाने लगती हैं। अगरचे जिरगौस के सेहरे के फूल दो बार खिले क्या, मुरझा चुके हैं मगर अब भी सड़क पर ढेर सारे हसीन चेहरे देखकर उनका हाल ऐसा होता है जैसे खिलौनों की दुकान में अनाथ बच्चे का।

इस स्वयंवर के साथ हिल स्टेशन पर सारे देश के लाइलाज रईसों और खाते-पीते कमजोरों का एक विराटकाय सालाना मेला लगता है। इसमें बड़े पैमाने पर बीमारियों का आपसी आदान-प्रदान होता है। आपने शायद सुना हो कि बनारस में, जो अपनी सुबह और साड़ियों के बावजूद एक पवित्र स्थान की हैसियत से प्रसिद्ध है, सारे हिंदुस्तान के आस्थावान बूढ़े मरने के लिए खिंच कर चले आते हैं और बहुत जल्द दिली मुराद पाते हैं। जो बीमार अपनी इच्छाशक्ति की कमजोरी के कारण खुद को मरने के लिए तैयार नहीं कर पाते, वह निकटतम हिल-स्टेशन की दिशा पकड़ते हैं। हमारे मिर्जा साहब का बाद वाली चीज से कितना पुराना संबंध है, इसका अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि बीस बरस पहले आई.सी.एस. की परीक्षा में प्रथम आने के बाद उनकी डॉक्टरी जाँच हुई तो पता चला, दाँतों के अलावा और कोई चीज ठीक नहीं। वैसे बिरादरी के एक मेंबर होने के नाते हम खुद भी अपने स्वास्थ्य की तरफ से एक क्षण भी बेध्यान नहीं, फिर भी अभी यह नौबत नहीं आई कि विटामिन की गोली हल्क से उतरते ही अपनी बाँहों की मछलियाँ फुला-फुलाकर देखें, लेकिन मिर्जा का वह दैनंदिन कार्य हो गया कि दवाएँ हज्म करने के लिए शाम को माँगे-ताँगे की छड़ी घुमाते हुए निकल जाते। दस्तानों की तरह यह सुडौल छड़ी भी प्रोफेसर के दोस्त पेरिस से लाए थे। उस पर फ्रेंच ऐक्ट्रेस बरजेत बारदो की टाँग का ऊपरी हिस्सा बतौर दस्ता लगा हुआ था। इसी के सहारे प्रोफेसर ने वह टीला 'फत्ह' किया जिसकी विजय का हाल पहले सुनाया जा चुका है। इसी के जरिये वह अँधेरी रातों में अपने और अशिष्ट कुत्तों के बीच एक गर्वीली दूरी कायम रखते हैं और अब इसी को हिलाते, सहलाते हुए मिर्जा जिनाह रोड की हर तीसरी दुकान में (जो दवाओं की होती है) धड़धड़ाते घुसते चले जाते हैं। काउंटर के पास लगी मशीन में खोटी इकन्नी डालकर अपना वज्न लेते और अगर औंस दो औंस बढ़ जाता तो स्थानीय हवा-पानी की शान में कसीदे पढ़ते लौटते हैं। एक दिन हमने कहा, 'देखो! दवाओं की यह दुकान कितनी चलती है मगर तुम्हें यहाँ तुलते कभी नहीं देखा।' कहने लगे, 'तौबा कीजिए साहब! मालूम हुआ है कि उसकी मशीन खास तौर पर औरतों के लिए बनाई गई है। एक दिन तुला तो कुल चालीस पौंड उतरा। धक से रह गया। सेठ से जाकर शिकायत की', तो जवाब मिला कि यह दुश्मनी थोड़े ही है। सभी को पचास पौंड कम बताती है। उस के बाद उस बेईमान ने खोटी इकन्नियों की ढेरी में से मिर्जा को एक इकन्नी वापस करनी चाही, जिसे उन्होंने शालीनता के कारण स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

भला मिर्जा ऐसी दुकान में जाकर सेरों बल्कि मनों मायूसियाँ क्यों मोल लेने लगे। वह तो उन स्वस्थ लोगों में से हैं, जो टहलने निकलें तो कदमों की गिनती रखते हैं और ताकत देने वाला कौर लेने से पहले उस खून की एक-एक बूँद का हिसाब लगा लेते हैं, जो उससे बननी चाहिए - मगर नहीं बनती। उनके खाने के पैमाने के हिसाब से काले हिरन की कलेजी में एक पूरे ऊँट की पौष्टिकता होती है और एक पहाड़ी चकोर में एक हिरन के बराबर लेकिन कोयटा की एक खुबानी पूरे तीन चकोरों के बराबर होती है, बाकी अंदाजे पर। एक दिन अपने हिसाब से डेढ़ दो दर्जन साबुत ऊँट पेड़ से तोड़ कर कचर-कचर खाए और झूमते-झामते हमारे पास आए। कहने लगे, 'साहब! यह शहर तो इतना बढ़िया है कि खा-खा के अपना तो दिवाला निकला जा रहा है। खाना हल्क से उतरा नहीं कि हज्म।' हमने कहा, 'इससे लाभ?' बोले, 'देखते नहीं? टूरिस्ट बीबियाँ बेकारी से बचने के लिए जो स्वेटर सटासट बुनती रहती हैं, वह तैयार होने से पहले तंग हो जाते हैं। शाम को चाय और चिलगोजे के साथ दूसरों की बुराई बड़ा मजा देती है। फिर हर चीज सस्ती, हर चीज शुद्ध। हद यह कि स्कैंडल में भी झूठ की मिलावट नहीं। कराची में शुद्ध दूध तो बड़ी बात है, पानी भी शुद्ध नहीं मिलता। उसमें भी दूध की मिलावट होती है मगर यहाँ दुकानदार आदतन सच बोलते हैं और सस्ता बेचते हैं। इसी लिए कई टूरिस्ट समझते हैं कि छोटा शहर है।'

फिर वह कोयटा की बेहतरी एक के बाद एक दुनिया के दूसरे शहरों पर साबित करने लगे।

'लाहौर?'

'कलैंडर से अप्रैल, मई, जून, जुलाई, अगस्त, सितम्बर के महीने हमेशा के लिए निकाल दिए जाएँ तो वल्लाह! लाहौर का जवाब नहीं।'

'रोम?'

'एक हसीन कब्रिस्तान। जमीन के नीचे की आबादी, ऊपर की आबादी से कहीं अधिक है। रहे ऐतिहासिक खंडहर, सो उनमें चिमगादड़ें और अमरीकी टूरिस्ट बसेरा करते हैं। जेम्स ज्वायस ने झूठ नहीं कहा था कि रोम की मिसाल एक ऐसे व्यक्ति की सी है जो अपनी नानी की लाश की नुमायश करके रोजी कमाता है।'

'मरी, पहाड़ों की रानी मरी?'

'साहब! दृश्यों में कोयटा से कम नहीं, वही नक्शा है भले इस कदर आबाद नहीं।'

'और दिल्ली?'

'शहर बुरा नहीं, मगर गलत देश में बसा है।'

'जिनेवा - दुनिया के लोगों की सेहत बनाने वाला शहर?'

'साहब मरने के लिए उससे बढ़िया जगह इस धरती पर कहीं नहीं।'

'कराची के बारे में क्या राय है हुजूर की?'

'बहुत अच्छी! अगर आप सर के बल खड़े हो कर देखें तो कराची की हर चीज सीधी नजर आएगी।'

'यार! तुम कराची के साथ तो बिल्कुल जियादती कर रहे हो।'

'हरगिज नहीं। मैं कराची के अधिकारों के लिए हमेशा लड़ता रहूँगा। इसीलिए मैं कराची वालों की इस माँग की बड़ी दृढ़ता से हिमायत करता हूँ कि मलेर के पुल और सड़क की मरम्मत होनी चाहिए, जुरूर होनी चाहिए और जल्द होनी चाहिए ताकि कराची से निकलने में आसानी रहे।'

'यही बात है तो तुम वापस क्यों जा रहे हो?'

'मगर (तर्जनी उठाते हुए) एक बात है। कराची वाले आगे होकर कराची की बुराई करते हैं लेकिन कोई और उनकी हाँ में हाँ मिला दे तो बुरा मान जाते हैं। बस इसी अदा पर प्यार आता है।'

फिर कोयटा की श्रेष्ठता साबित करते-करते बेध्यानी में कहने लगे, 'हाय! यह महान शहर अगर कराची में होता तो क्या बात थी।'

मिर्जा ने इतना कहा और दायाँ हाथ फैलाकर अपना सीना फुलाया और छाती पीटने लगे। फिर एक ठंडी आह भरी और चुप हो गए।

उनके गालों पर पवित्र रक्त की वह बूँदें चमक रही थीं, जिन्हें हालात की आग ने बहुत जल्द सुखा दिया।

(अप्रैल - 1963)


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