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कविता

घोड़े से विनती
बद्रीनारायण


भले नदी में डूब जाओ घोड़े
भले पहाड़ी से कूद जाओ
धरती से ऊपर जाओ घोड़े
मत जाओ उनके घुड़साल में
मत जाओ
आएँगे सुबह और कहेंगे
चलो ! रथ में जुतने चलो
चलो ! कुरुक्षेत्र में नया युद्ध लड़ो
चलो ! फिर से वाटरलू चलो
चलो ! रानी फूलमती चाहती है चूमना
तुम्हारा मुखड़ा
उसके चौसर की चाल चलो
वे आएँगे और कहेंगे
बुद्धराज बहुत देखने लगा है सपने
चलो, उसके सपनों पर खूनदार टाप
ले चलो ‍!
चलो छातियों पर, चलो दिलों पर
चलो हजारों स्त्रियों को रौंदने चलो
नहीं तो अंत में कहेंगे -
घोड़े चलो ! कसाई के पाट पर चलो

 


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